Crime News: बुजुर्ग मांबाप के सिर को लोहे के बट्टे से फोड़ा, आरी से दोनों की लाशों के टुकड़े किए, फिर उन्हें नदी में बहा दिया. सवाल यह है कि हैवानियत की सारी हदें पार करने वाले इकलौते इंजीनियर बेटे ने ऐसा क्यों किया? उस से भी बड़ा सवाल तो यह है कि आज के टूटतेबिखरते परिवार और बंटतेकटते समाज पर यह दोहरा हत्याकांड कितना भारी पड़ेगा, जिस ने मानवता के माथे पर कलंक लगा दिया है?
उत्तर प्रदेश के जौनपुर का रहने वाला इंजीनियर बेटा अंबेश अपनी पत्नी और 2 बच्चों के साथ कोलकाता में रहता था. दशहरे से ठीक पहले वह अपने घर चला आया था, जबकि उस की पत्नीबच्चे कोलकाता में ही रह गए थे. बच्चों को साथ नहीं लाने पर उस के मम्मीपापा ने शिकायत भी की थी और उसे तीखे ताने भी मारे थे, ”गैर जातिधर्म वाली औरत क्या समझेगी घरपरिवार क्या होता है?’’
इस पर अंबेश तिलमिला गया था. चुप रहने के बजाय उस ने भी मम्मीपापा के तानों का जवाब ताने से ही दिया, ”आप लोग मेरी बीवी को बहू मानते ही नहीं हो तो वह कैसे यहां आएगी…’’
इस बात को ले कर अंबेश की अपने ही मम्मीपापा के साथ काफी समय तक नोकझोंक होती रही. दिसंबर की 8 तारीख को सर्द भरी रात थी. जौनपुर के ग्रामीण इलाके में कोहरा घना होने लगा था. चारों तरफ शांति थी. हालांकि उसे भंग करने करने के लिए बीचबीच में कुत्तों के भौंकने या फिर पास के हाइवे से वाहनों के हार्न की आवाजें सुनाई दे जाती थी. अंबेश अपने कमरे में लेटा था. उसे नींद नहीं आ रही थी. रजाई में था. घर में कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था, जो उस के कहने पर कुछ दिन पहले रोक दिया गया था. असल में उस ने एक तरह से घर में होने वाले निर्माण के काम को जबरन रुकवा दिया था.
अचानक वह बैड से उठा. हवाई चप्पलें पहनीं और बेसमेंट में चला गया. अंधेरे में टटोलते हुए बिजली का स्विच औन किया. एक नजर उस ने कमजोर रोशनी वाले बल्ब की ओर तो दूसरी नजर बेसमेंट के चारों तरफ घुमाई. सीमेंट की खुली बोरी का मुंह बंद कर दिया. इधरउधर बिखरी लोहे की छड़ें, तख्ते, लकडिय़ां, कुदाल, आरी, तसले, बाल्टी, कड़ाही आदि को सहेजने लगा. यह सब करते हुए उस की नजर लोहे के एक बट्टे पर पड़ी. जाने उसे क्या सूझी कि भारी बट्टे को वहां से उठा लाया और अपने कमरे में बैड के नीचे रख दिया.
बेसमेंट में खटपट की आवाज सुन कर अंबेश की मम्मी बबीता देवी की नींद खुल गई थी. वह सीधे बेटे के कमरे में चली आईं.
”क्या बात है अंबेश, नींद नहीं आ रही?’’
”नींद कैसे आएगी मम्मी, एक तरफ तुम्हारी बहू जिद कर रही है और दूसरी तरफ तुम और बाबूजी एक ही बात पर अड़े हो.’’
”तो हम क्या करें… हमें तो इसी परिवार और समाज में रहना है. तुम्हारे बाबूजी की गांव में इज्जत है. हमारे खानदान में आज तक किसी ने दूसरी बिरादरी में शादी नहीं की…तो फिर हम कैसे तुम्हारी पत्नी को बहू मान लें. उस से भी बड़ी बात ये कि वह दूसरे धर्म की है.’’
”दूसरे धर्म की है तो क्या हुआ मम्मी, अब जमाना बदल गया है. जातिधर्म के चलते क्या मैं अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़ दूं?’’
”…तो हम उसे स्वीकार कर लें? हम से भी यह कभी नहीं होगा,’’ नाराज होती हुई अंबेश की मम्मी बोलीं.
”जो आप से हो सकता है, वह तो कर दो.’’ अंबेश ने भी नाराजगी के साथ तेज आवाज में कहा.
”क्या करूं मैं?’’ मम्मी बोली.
”मुझे पैसे दे दो, उस से मैं कोलकाता में अपने घर की मरम्मत करवाऊंगा.’’ अंबेश बोला.
”कहां से पैसे दूं…और किसलिए दूं, जब मैं उसे बहू ही नहीं मानती.’’ मां बोली.
”गांव की जमीन बेच दो, वो तो आज नहीं कल मेरी ही है.’’ अंबेश बोला.
”जमीन बेच दें और उस के बाद हम भीख मांगें!’’ मां बोली.
”मुझे पैसा निकालना अच्छे से आता है,’’ अंबेश गुस्से में आंखें लाल करता हुआ बोला.
”लगता है उस हरामजादी के चलते पागल हो गया है तू,’’ मां भी गुस्से में बोली और कमरे से बाहर जाने के लिए मुड़ी.
मांबाप की कर दी हत्या
पत्नी को मम्मी द्वारा दी गई गाली सुन कर अंबेश का चेहरा तमतमा गया. वह बैड के नीचे झुका और लोहे के बट्टे से मम्मी पर पीछे से हमला कर दिया. अचानक हुए इस हमले से मम्मी बबीता की चीख निकल गई और वह वहीं गिर पड़ीं. उन के सिर से खून बहने लगा था. अंबेश ने उन्हें उठाने के बजाय बट्टे से उन पर और 3-4 वार कर दिए. इस दौरान हुए शोरगुल को सुन कर दूसरे कमरे से उस के पापा श्याम बहादुर भी आ गए. उन्होंने वहां का दृश्य देखा तो सन्न रह गए. मानो उन्हें काठ मार गया हो. उन के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी.
अगले पल हाथ में पकड़े मोबाइल से वह कहीं कौल करने लगे. अंबेश अपने पापा को कौल करता देख घबरा गया. उन के हाथ से उस ने मोबाइल झपट लिया, जिस से श्याम बहादुर लडख़ड़ा गए और वापस अपने कमरे की ओर लौटने लगे. किंतु पलक झपकते ही अंबेश ने उन के गले में एक रस्सी फंसा कर खींच लिया और उन्हें वहीं गिरा दिया. उस वक्त उस के दिमाग में हिंसा की सनक सवार थी. वह आक्रामक बना हुआ था. उस ने तुरंत लोहे के खून सने बट्टे को उठाया और दनादन अपने पापा के सिर पर कई वार कर दिए.

श्याम बहादुर भी अपनी पत्नी की तरह कुछ पल में ही लहूलुहान जमीन पर धराशाई पड़े थे. उन्हें कुछ पल तक अंबेश निहारता रहा. उस के बाद बाथरूम में गया और खून से सने अपने हाथपैर धोए. अगले रोज अंबेश की बहन वंदना ने हर रोज की तरह अपनी मम्मी बबीता को कौल किया, लेकिन उन का मोबाइल फोन स्विच्ड औफ था. उस के बाद वंदना ने अपने पापा के नंबर पर कौल की. वह भी नौट रिचेबल मिला. उसे चिंता तो हुई, लेकिन उस ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और अपने दैनिक घरेलू काम में लग गई.
बेटी ने शुरू की तलाश
दोपहर बाद उस ने फिर से मम्मी और पापा को कौल की. उस वक्त भी दोनों में से किसी से बात नहीं हो पाई. उस की चिंता बढ़ गई थी. उस ने न चाहते हुए भी भाई अंबेश को कौल कर दी. उसे अपने भाई की मम्मीपापा से आए दिन होने वाले झगड़े के बारे में मालूम था. इस कारण वह उस से कम ही बात करती थी. भाई का फोन भी स्विच्ड औफ मिला. रेलवे से रिटायर होने के बाद श्याम बहादुर (65 वर्ष) अपनी पत्नी बबीता (63 वर्ष) के साथ अहमदपुर गांव के 3 मंजिला मकान में रहते थे. श्याम बहादुर की 3 बेटियां और एक बेटा था. बेटा अंबेश अपनी पत्नी और 2 बच्चों के साथ कोलकाता में रहता था.

उस ने बीटैक की पढ़ाई की थी और पिछले 3 महीने से वह अकेला ही घर चला आया था. घर में मम्मीपापा और बेटा ही थे. उस की पत्नी मुसलिम समाज की है, जो कोलकाता की रहने वाली है. उसे ले कर अंबेश की अपनी मम्मी से हमेशा नोकझोंक हो जाती थी. मम्मी उसे किसी भी सूरत में बहू स्वीकारने को राजी नहीं थी. उस का नाम आते ही वह भद्दीभद्दी गालियां बकने लगती थीं. बेटे पर बहू को छोडऩे का दबाव बनाए हुए थीं. जबकि अंबेश उस के लिए मम्मीपापा से पैसे मांगता रहता था.
उस रात इसी बात को ले कर मम्मी के साथ ज्यादा बहस हो गई थी. इसे से पहले वह दिन में जमीन और पैसे के लिए पापा से भी उलझ पड़ा था. इस कारण अंबेश गुस्से से भरा हुआ था, जिस का अंजाम यह हुआ कि उस ने पैसे और जमीन के विवाद में अपने मम्मीपापा की नृशंस हत्या कर दी थी. उस के बाद वह फरार हो गया था. वंदना द्वारा मम्मीपापा को फोन मिलाते हुए पूरा दिन निकल गया था. वह जौनपुर में रहती थी. अगले रोज मायके जाने की सोच कर किसी तरह से रात गुजारी. गांव जाने से पहले उस की बात भाई अंबेश से हो गई.
उस से मालूम हुआ कि मम्मीपापा गुस्से में कहीं चले गए हैं. वह उन्हें तलाशने के लिए बनारस चला आया है. इस से वंदना को थोड़ी राहत मिली, लेकिन मम्मीपापा के कहीं गुम हो जाने की अलग चिंता सताने लगी. वह बेचैन हो गई. भाई से न तो मम्मीपापा की सही जानकारी मिल पा रही थी और न ही उन से फोन पर बात हो रही थी. भाई का फोन भी कभी स्विच्ड औफ मिलता तो कभी नौट रिचेबल आता. मम्मीपापा से तो बात किए हुए 4 दिन बीत गए थे. आखिरकार उस ने 13 दिसंबर, 2025 को जाफराबाद थाने जा कर मम्मीपापा और भाई की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करवा दी.
इस शिकायत पर जाफराबाद थाने की पुलिस पहले श्यामलाल के घर के पते पर गई. वहां कोई नहीं मिला. घर का मेन गेट बाहर से लौक था. पड़ोसियों से मालूम हुआ कि यह गेट तो 9 दिसंबर से ही बंद है.
पकड़ में आया अंबेश
उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के सिंधौरा थाना क्षेत्र की कटौना गांव निवासी वंदना द्वारा थाने में दर्ज करवाई गई शिकायत में अनहोनी की आशंका जाहिर की गई थी. जाफराबाद थाने की पुलिस ने पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए 3 टीमें गठित कीं, जिस के बाद जांच शुरू हुई. अंबेश समेत श्याम बहादुर और बबीता के फोन नंबरों को सर्विलांस पर लगाया गया और उन के पिछले कौल की डिटेल्स निकलवाई गई. जल्द ही पुलिस को सफलता मिल गई और पुलिस ने 15 दिसंबर, 2025 को अंबेश को तलाश कर लिया. वह अपने घर के पास ही मिल गया.

लापता मम्मीपापा के बारे में पूछने पर उस ने सीधे तौर पर कुछ बताने से इनकार कर दिया. उस की बातों से पुलिस समझ गई कि वह अपने मम्मीपापा के बारे में बताने से बच रहा है. पुलिस को उस की बातें संदिग्ध लगीं. फिर उस से सख्ती से पूछताछ की गई. इस के बाद उस ने चौंकाने वाला खुलासा किया, जिस का किसी को अंदेशा नहीं था. जब उस ने कहा कि उस के मम्मीपापा अब इस दुनिया में नहीं हैं, उन की उस ने हत्या कर दी है, तब पुलिस समेत फेमिली वाले भी सन्न रह गए. बहन वंदना की स्थिति विक्षिप्तावस्था की हो गई. वह अपने पेरेंट्स की बड़ी बेटी थी और अंबेश दूसरे नंबर का.
पुलिस ने पूछताछ की तो उस ने मम्मीपापा की हत्या की बात स्वीकार की. हत्या का कारण बताया कि 8 दिसंबर, 2025 की रात करीब 8 बजे पैसों के लिए उस का पेरेंट्स से झगड़ा हुआ था. वह आपा खो बैठा और उन पर बट्टे से हमला कर दिया. उन के शवों को ठिकाने लगाने के बारे में उस ने आगे जो बताया, उस से उस की हैवानियत का पता चला. उस ने अपने पेरेंट्स की न केवल नृशंस हत्या कर डाली थी, बल्कि उन के शवों को ठिकाने लगाने के लिए उन को कई टुकड़ों में काट डाला था.

दोनों शवों के कटे टुकड़ों को बेसमेंट में रखे सीमेंट के बोरे में भर दिया था. यह सब करने में उसे कोई रुकावट नहीं आई, क्योंकि उस वक्त घर में वह अकेला था. फिर उन्हें ठिकाने लगाने के लिए बोरे को कार में रखा. यह वही कार थी, जो उस के पेरेंट्स ने उसे खरीद कर दी थी. कार अपने घर से 8 किलोमीटर दूर गोमती नदी के बेलाव घाट ले कर गया था. वहां उस ने लाश के सभी बोरे नदी में फेंक दिए थे. किसी को शक न हो, इसलिए वह घर वापस आ गया था.
इस के बाद खुद को बचाने के लिए अगले दिन 9 दिसंबर को पेरेंट्स को खोजने का नाटक करने लगा. उस ने उन के लापता होने की खबर अपने परिचितों, रिश्तेदारों को भी दी. खोजबीन में जुटा अंबेश 12 दिसंबर को खुद लापता हो गया. इधरउधर घूमतेघूमते वह वाराणसी चला गया, जहां उस ने गंगा स्नान किया और कुछ समय घाट पर गुजारने के बाद घर चला आया. इस बीच खोजबीन में जुटी पुलिस ने उसे पकड़ लिया. पुलिस के सवालों में वह इस कदर उलझ गया कि पेरेंट्स की हत्या की पूरी कहानी बता दी.
मृतक श्याम बहादुर रेलवे में लोको पायलट थे. वह मूलरूप से थाना गद्दी के खरसेनपुर गांव के रहने वाले थे, लेकिन वह अपनी ससुराल में आ कर बस गए थे. वह रामनारायण के 3 दामादों में से एक थे. अंबेश के बयान के बाद पुलिस शवों की गोमती नदी में तलाश करवाने में जुट गई थी. इस के लिए 15 गोताखोर लगाए गए. इस खुलासे के बाद पुलिस ने हत्या की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कर ली. मुख्य और एकमात्र आरोपी अंबेश कुमार की निशानदेही पर शवों की बरामदगी का प्रयास किया गया. उस ने अपने बारे में बताया कि उस ने 5 साल पहले कोलकाता की एक महिला से कोविड काल के दौरान प्रेम विवाह किया था, जो वहीं पर ब्यूटीपार्लर चलाती थी.
इकलौते बेटे के इस तरह लव मैरिज करने से उस के मम्मीपापा दुखी रहते थे. यह भी बताया जाता है कि पेरेंट्स का अपनी तीनों बेटियों के प्रति झुकाव अधिक रहता था. इसी वजह से अंंबेश का उन से कई बार विवाद हो चुका था. गांव के लोग दबी जुबान से यह भी कहते पाए गए कि अंबेश अपनी पत्नी के साथ ही पिता के रुपए ले कर शिफ्ट होना चाहता था.
वह 4 भाईबहनों में दूसरे नंबर पर था. सभी बहनों की शादी हो चुकी है. ननिहाल में अंबेश कुमार की अच्छी जिंदगी गुजरती थी. उस ने पिता के पैसों से एक कार भी खरीदी थी. कार से चलने का शौकीन था. पुलिस के मुताबिक इसी कार में रख कर उस ने अपने पेरेंट्स के शव को ठिकाने लगाया था. अंबेश के अनुसार वह पत्नी द्वारा पैसे की मांग और मम्मीपापा द्वारा दूसरे धर्म की पत्नी को स्वीकार न किए जाने से मानसिक तनाव में था. पैसे के लिए ही बीते 3 माह से घर आया हुआ था. पैसों को ले कर घर पर बात की. पेरेंट्स ने उसे पैसे देने से इंकार कर दिया. इसी बात से 8 दिसंबर की रात वह उग्र हो गया. उग्र हो कर उस ने लोहे के बट्टे से दोनों के सिर पर हमला कर डाला.
घर में कंस्ट्रक्शन के काम के लिए बेसमेंट में आरी और अन्य औजार रखे हुए थे. आरी से दोनों शवों को 3-3 टुकड़ों में काट दिया. फिर उन टुकड़ों को 6 सीमेंट की बोरियों में भरा. इस के बाद उस ने अपने पेरेंट्स के ही कपड़ों से ही फर्श को साफ किया.
कथा लिखे जाने तक अंबेश कुमार न्यायिक हिरासत में था और बरामद शव के टुकड़ों से उस की डीएनए जांच की तैयारी की जा रही थी. Crime News






