UP News: खुद को उत्तर प्रदेश का ‘शो-विंडो’ कहने वाला गौतमबुद्धनगर (नोएडा) आपदा के समय कितना असहाय है, युवराज मेहता की मौत ने ये साबित कर दिया. करीब 2 घंटे तक रेस्क्यू मिशन के नाम पर चले ड्रामे के दौरान न तो जिला प्रशासन का कोई बड़ा अधिकारी मौके पर पहुंचा और न ही नोएडा प्राधिकरण का. पुलिस, एनडीआरएफ और दमकल विभाग के जो कर्मचारी मौके पर पहुंचे भी, वे सिर्फ तमाशबीन बने रहे और बल्कि उन की लापरवाही ने इंजीनियर की मौत को ऐसा लाइव शो बना दिया कि…
गलगोटिया कालेज से 2022 में बीटेक की पढ़ाई करने वाले 27 साल के युवराज मेहता मूलरूप से बिहार के सीतामढ़ी जिले के रहने वाले थे. वह पढ़ाई में शुरू से ही अच्छे थे. पढ़ाई के बाद युवराज मेहता गुरुग्राम स्थित डनहमबी कंपनी में सौफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर कार्यरत थे. डनहमबी एक जानीमानी डेटा साइंस और कस्टमर एनालिटिक्स कंपनी है, जो दुनिया भर में रिटेल और टेक्नोलौजी सेक्टर में काम करती है.
युवराज की मम्मी का 2 साल पहले देहांत हो गया था. युवराज की बहन ब्रिटेन में रहती हैं. वह भी शादी के बाद ब्रिटेन में ही जा कर बसने की योजना बना रहे थे. उन के पिता राजकुमार मेहता भी एक कंपनी में नौकरी करते थे. नौकरी लगने के बाद युवराज पहले वह गाजियाबाद में रहते थे. वहां से वह रोजाना मेट्रो के जरिए गुरुग्राम स्थित अपने औफिस आतेजाते थे. मेट्रो कनेक्टिविटी होने की वजह से उन का सफर आसान था, लेकिन नवंबर 2024 में वह ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 150 स्थित टाटा यूरेका पार्क सोसाइटी में आ कर रहने लगे.
ग्रेटर नोएडा शिफ्ट होने के बाद चूंकि वहां से सीधे कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट या मेट्रो जैसा साधन नहीं था, इसलिए वह अपनी नई ब्रिजा कार से ही गुरुग्राम आनेजाने लगे. 16 जनवरी, 2026 की रात के करीब 12 बज रहे थे. युवराज अपनी कंपनी से शिफ्ट खत्म होने के बाद कुछ देर दोस्तों से गप्पें लड़ाने के बाद अपनी कार द्वारा गुरुग्राम से ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 150 स्थित अपने घर की तरफ निकले.
उस वक्त रात के करीब 12 बज रहे थे, जब युवराज की कार नोएडा के सेक्टर 150 में 90 डिग्री कोण वाली मोड़ पर पहुंची. उस समय दिल्ली एनसीआर में सुबह और शाम के समय घने कोहरे का प्रकोप चल रहा था. युवराज भी इसी घने कोहरे की वजह से उस बाउंड्री वाल को नहीं देख पाए, जो सड़क के मोड़ पर बनी थी. कार की स्पीड भी थोड़ी ज्यादा थी, जिस से उन की कार उस मामूली से सीमेंटिंड रेलिंग को तोड़ती हुई पानी से भरे गहरे गड्ढे में जा गिरी.
एक ही क्षण में युवराज को अहसास हो गया कि वह कार समेत सड़क के किनारे बने पानी से भरे बेसमेंट के लिए बनाए गए गड्ढे में जा गिरे हैं. दरअसल, यह सब कुछ ही सेकेंडों में हो गया था. कार के भीतर पानी तेजी से भरने लगा. युवराज ने दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं खुला. शीशा तोडऩे की कोशिश की, लेकिन उस पल जान जाने के डर से उस के हाथ कांप गए. ताकत होते हुए भी हिम्मत जवाब दे रही थी.
युवराज पूरी ताकत से चीखेचिल्लाए, लेकिन उन की आवाज कार के भीतर ही दबी रह गई. किसी तरह हिम्मत जुटा कर सनरूफ खोला और कार की छत पर आ गए. मौत के उस पल में उन्हें अपने पापा की याद आई. कांपते हाथों से पापा को फोन किया. बस इतना कहा, ‘मैं गड्ढे में फंस गया हूं, जल्दी आइए. कार धीरेधीरे डूब रही है.’
पानी तेजी से युवराज को अपनी चपेट में ले रहा था. आंखों के सामने फेमिली वालों और दोस्तों के चेहरे तैरने लगे. लगा कि अब जिंदगी नहीं बचेगी. कुछ ही देर में पापा राजकुमार मेहता सड़क के पास पहुंच गए. उन्हें करीब 20 मिनट लगे. वह जोरजोर से चीखने लगे. पानी में डूबते युवराज को लगा कि अब मदद आ जाएगी. युवराज ने मोबाइल की टौर्च जलाई ताकि पापा को उन की लोकेशन दिख जाए. लेकिन मदद सिर्फ सड़क तक आई थी, गड्ढे के अंदर नहीं उतरी. युवराज बेबस और असहाय सा मौत को करीब आते हुए मदद का इंतजार करता रहा. कार और नीचे धंसती जा रही थी. जैसेतैसे युवराज कार की छत पर इधर से उधर पहलू बदलता रहा. कार की छत से ही वो ‘हेल्प…हेल्प’ चीखते हुए मदद की गुहार लगाने लगा.
चूंकि राजकुमार मेहता ने डायल 112 पर फोन कर दिया था, इसलिए थोड़ी ही देर में पुलिस और दमकलकर्मी व उस के बाद एसडीआरफ के कर्मचारी भी पहुंच गए. युवराज की उम्मीद फिर जागी, सोचा अब तो बच ही जाऊंगा. लेकिन यही उन की सब से बड़ी भूल थी. उन्हें पानी में डूबते हुए कुछ आकृतियां दिखीं. वे सब लोग ऊपर खड़े थे. लेकिन नीचे उतरने को कोई तैयार नहीं था. पानी करीब 70 फुट गहरा था. ‘जोखिम है,’ कह कर सरकारी एजेंसियों के अधिकारी व कर्मचारी संसाधन आने का इंतजार करते रहे. रस्सी आई… मगर इस में काफी देर हो गई. उपकरण देर से पहुंचे और वक्त हाथ से निकलता चला गया.
वह सड़क, जिस पर न बैरिकेड था, न चेतावनी बोर्ड, न लाल झंडी, वहां युवराज की मौत इस की गवाह बन रही थी. पूरा सिस्टम मौके पर था, लेकिन संवेदना नहीं थी. तिलतिल कर के मौत युवराज के करीब आ रही थी और लंबे इंतजार के बाद उन की उम्मीद भी डूबने लगी थी. क्योंकि पानी उन की छाती तक आ चुका था, सांसें टूटने लगीं और आवाज गले में अटकने लगी थी. जब तक वह पूरी तरह पानी में डूब नहीं गया, तब तक सड़क पर वह उम्मीद और हसरतभरी नजरों से देखते रहे. नाकारों की भीड़ के बीच युवराज के पापा खुद को असहाय महसूस कर रहे थे और हृदयविदारक चीखों के साथ वहां खड़े सिस्टम से जुड़े लोगों से हाथ जोड़ कर कहते रहे, ‘सर, कुछ तो कीजिए.’

वरदीधारी लोग, सरकारी गाडिय़ां और एक ऐसा सिस्टम जो फाइलों में तो तेज है, लेकिन इंसान को बचाने के लिए पानी में उतरने से डरता है, वह सिर्फ यही कहता रहा, ‘सर, पानी बहुत गहरा और ठंडा है. भीतर बहुत से सरिए भी हैं.’ राजकुमार मेहता को उस वक्त लगा कि काश! उस सड़क पर पहले ही बैरिकेड लगा होता. काश! उस गड्ढे को ढक दिया गया होता. काश! सिस्टम हादसे से पहले जागा होता तो उन का बेटा जिंदा पानी भरे गड्ढे में न होता. मदद सामने थी, लेकिन सिस्टम के नकारेपन, अधिकारियों और कर्मचारियों की संवेदनहीनता के आगे उन के बेटे की जिंदगी हार गई.
कुछ देर बाद जब पानी भरे बेसमेंट से चीखनेचिल्लाने और मदद की पुकार करने वाली आवाजें आनी बंद हो गईं तो राजकुमार मेहता को अहसास हो गया कि अब बेटा उन से दूर जा चुका है.
तमाशबीन सिस्टम
युवराज करीब 2 घंटे तक संषर्ष करते रहे, सिस्टम वहां खड़ा हो कर देखता भी रहा, इस के बाद बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका. जब ये सारी कवायद चल रही थी, उस वक्त एक फूड कंपनी का डिलीवरी बौय मुनेंद्र जरूर गाडिय़ों व लोगों की भीड़ देख कर वहां रुका था. जब मुनेंद्र को पता चला कि एक युवक गाड़ी समेत उस पानी भरे बेसमेंट में डूब गया है तो उस ने एसडीआरएफ वालों से लाइफ सेविंग जैकेट ले कर उस पानी भरे गड्ढे में छलांग लगाई थी. उस ने करीब आधा घंटा प्रयास भी किया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.
राजकुमार मेहता ने तब तक अपने कुछ रिश्तेदारों और पहचान वालों को फोन कर दिया तो वे भी मौके पर आ गए, लेकिन वहां खड़ा सिस्टम का कोई भी इंसान दिन निकलने से पहले उन की मदद नहीं कर सका. सुबह करीब 6 बजे सुबह रेस्क्यू औपरेशन शुरू हुआ. तब करीब एक घंटे बाद युवराज की डैडबौडी को बाहर निकाला जा सका. चूंकि दिन का उजाला हो चुका था. युवराज की मौत का मामला इस दौरान सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा. सुबह जब लोग वहां पहुंचे तो उन्हें पूरे घटनाक्रम की जानकारी मिली और उन्होंने घटना की वीडियो क्लिप बना कर उसे सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर दिया.
चूंकि ये मामला नालेज पार्क थाने के अंतर्गत आता है, इसलिए पुलिस ने दुर्घटना का मामला दर्ज कर लिया और शव को पेास्टमार्टम के लिए भेज दिया. लेकिन राजकुमार मेहता व उन के साथ जुटे लोग तब तक समझ चुके थे कि युवराज की मौत सिर्फ हादसा नहीं है, बल्कि सिस्टम की लापरवाही से हुई हत्या है. लिहाजा उन्होंने पुलिस को नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कराने की तहरीर दे कर मुकदमा दर्ज करने जिद पकड़ ली.
संयोग से दिन चढ़तेचढ़ते युवराज की मौत का मामला तूल पकडऩे लगा था. मुनेंद्र नाम के उस डिलीवरी बौय का बयान भी सोशल मीडिया की सुर्खी बन चुका था, जिस ने पूरे सरकारी तंत्र की मौजूदगी के बावजूद खुद जान पर खेल कर युवराज को बचाने का असफल प्रयास किया था. पुलिस महकमा समझ गया कि उन से भूल हुई है, लिहाजा उच्चाधिकारियों का निर्देश मिलने पर नालेज पार्क पुलिस ने आननफानन में बीएनएस की धारा में गैरइरादतन हत्या की धारा 105, लापरवाही से मौत 106(1) और जीवन को खतरे में डालने वाले कार्य की धारा 125 को जोड़ कर उन 2 बिल्डरों को नामजद कर दिया, जिन की जमीन पर बेसमेंट की खुदाई के बाद ये पानी भरा था.
दूसरी तरफ युवराज के शव को पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को सौंप दिया गया. उसी दिन कुछ फेमिली वालों, सोसाइटी के लोगों व युवराज के मित्रों की मौजूदगी में अंतिम संस्कार कर दिया गया. लेकिन 17 जनवरी, 2026 की शाम होतेहोते युवराज की मौत का मामला नोएडा शहर से निकल कर देशव्यापी स्तर पर मीडिया की सुर्खी बन चुका था. चारों तरफ हाइटेक कहे जाने वाले नोएडा के प्रशासन, शहर के सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता और मामले पर उस की चुप्पी को ले कर लताड़ लगाई जाने लगी.
यह घटना जरूर साधारण थी, लेकिन इस ने पूरे सरकारी तंत्र पर इतने सवाल खड़े कर दिए थे कि उन का जवाब देने के लिए सरकार को ही डैमेज कंट्रोल के लिए सामने आना पड़ा.
एसआईटी जुटी जांच में
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उसी शाम को इस दुघर्टना पर स्वत:संज्ञान लेते हुए एक 3 सदस्यीय एसआईटी का गठन कर दिया, जिस की कमान मेरठ जोन के एडीजी (पुलिस) भानु भास्कर को सौंपी गई. एसआईटी में मेरठ मंडल के आयुक्त भानु गोस्वामी को भी शामिल किया गया. सीएम ने एसआईटी को निर्देश दिया कि 5 दिनों में जांच कर यह पता लगाया जाए कि इस में किन सरकारी विभागों की लापरवाही रही, किन अधिकारियों की संवेदनहीनता के कारण युवराज की जान गई.
हालांकि पुलिस ने विशटाउन और लोटस ग्रीन नाम के जिन 2 बिल्डरों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की थी, उस में विशटाउन के बिल्डर अभय कुमार को उसी रात गिरफ्तार कर अपनी पारदर्शिता को स्पष्ट करने की कोशिश की. अगले दिन फरीदाबाद के लोटस ग्रीन बिल्डर से जुड़े डाइरेक्टर रवि बंसल व सचिन कर्णवाल को भी गिरफ्तार कर लिया गया. हादसे के दूसरे ही दिन नोएडा अथौरिटी के सीईओ एम. लोकेश को उन के पद से हटा दिया गया और उन की जगह करुणेश कुमार को नया सीईओ बना दिया गया.
इतना ही नहीं, अथौरिटी के एक जूनियर इंजीनियर गौरव को बरखास्त कर शासन ने डैमेज कंट्रोल करने की भी कोशिश की, लेकिन तब तक इतने सवाल खड़े हो चुके थे कि प्रशासन का कोई भी अंग आरोपों की जद में आए बिना बच नहीं सका. सरकार की तरफ से एसआईटी गठन के बाद मीडिया ने भी युवराज की मौत के मामले में समानांतर जांच शुरू कर दी और आए दिन नए तरह के सवाल उठाए जाने लगे थे.
सब से पहला सवाल तो नोएडा की डीएम मेधा रूपम को ले कर ही खड़ा होने लगा था, जो एसडीआरफ या एनडीआरएफ के काम काज को नियंत्रित करने वाले आपदा प्रबंधन ग्रुप की चेयरमैन होती है. उत्तर प्रदेश के महत्त्वपूर्ण जिले गौतमबुद्ध नगर की कमान संभालने वाली आईएएस अधिकारी मेधा रूपम के बारे में चर्चा होने लगी कि उन्होंने हादसे के बाद न तो कोई संवेदनशीलता दिखाई, न ही किसी की जिम्मेदारी तय की.
चूंकि डीएम मेधा रूपम के फादर ज्ञानेश कुमार वर्तमान में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे संवैधानिक पद पर तैनात हैं, इसलिए उन्हें बचाने की कवायद होने लगी. सोशल मीडिया पर डीएम मेधा रूपम के प्रति नाराजगी जाहिर की जाने लगी. एसआईटी की जांच शुरू होते ही युवराज मेहता की दर्दनाक मौत के मामले ने पूरे प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया. एसआईटी ने अपनी जांच का दायरा बढ़ाते हुए नोएडा अथौरिटी के अधिकारियों से ले कर पुलिस और फायर ब्रिगेड तक को लपेटे में ले लिया. फोरैंसिक टीम ने मौके से अहम सबूत जुटाने शुरू कर दिए. नोएडा पुलिस के साथ नोएडा अथौरिटी के अधिकारी भी एसआईटी के साथ कोऔर्डिनेशन करने लगे.
लोग युवराज मेहता की मौत के मामले में गंभीर सवाल खड़े कर रहे थे. उन का कहना था कि अगर उस ने पुलिस को काल न कर के अपने दोस्तों को बुलाया होता तो शायद युवराज की जान बच सकती थी. घटना के कुछ प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि रात 12:20 बजे पहली पीसीआर मौके पर पहुंची, कुछ देर बाद दूसरी पीसीआर भी आ गई. इस बीच युवराज के पापा भी मौके पर पहुंच गए थे. दोनों पीसीआर में 10 से 12 पुलिसकर्मी मौजूद थे, लेकिन उन के पास न तो रस्सा था और न ही कोई जरूरी रेस्क्यू उपकरण.
युवराज मेहता की मौत के मामले की जांच कर रही एसआईटी टीम ने कई बार घटनास्थल का मुआयना किया और दरजनों लोगों के साथ संबंधित विभागों के अधिकारियों व कर्मचारियों से पूछताछ कर उन के बयान दर्ज किए. जिस के बाद संबंधित प्लौट के दोनों बिल्डर अभय कुमार और निर्मल सिंह के कारपोरेट औफिस को पुलिस ने सील कर दिया. एसआईटी को यह भी पता चला कि जिस प्लौट पर इस बेसमेंट की खुदाई कर पानी भरा छोड़ दिया गया था, वह स्पोट्र्स सिटी घोटाले का हिस्सा है. इसी प्लौट को विशटाउन बिल्डर ने खरीदा था और सीबीआई स्पोट्र्स सिटी घोटाले की पहले से जांच कर रही है.
दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले साल नोएडा स्पोट्र्स सिटी घोटाले की जांच सीबीआई और ईडी को सौंपने का आदेश दिया था. इस केस में सीबीआई ने लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की थी, जिस की जांच सीबीआई कर रही है. इसी प्रकार कंपनी के निदेशक निर्मल सिंह, विदुर भारद्वाज, सुरप्रीत सिंह सूरी, नोएडा प्राधिकरण के अज्ञात अधिकारी और एक अन्य व्यक्ति के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया गया था. इस में लोटस ग्रीन के साथसाथ इस की लगभग 24 सब लीज वाली कंपनियों को भी जोड़ा गया है.
जिस निर्माणाधीन साइट पर भरे पानी में डूब कर युवराज की मौत हुई, वह स्पोट्र्स सिटी के प्लौट नंबर-2 (ए-3) का हिस्सा है. वह भूखंड लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड ने नोएडा प्राधिकरण से प्राप्त किया था. वर्ष 2020 में विशटाउन प्लानर्स ने इसे लोटस ग्रीन से खरीदा, जिस में लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन की भी शेयर होल्डिंग है. इस में विशटाउन के बिल्डर अभय कुमार की 32.20 फीसदी, संजय कुमार की 27.30 फीसदी, मनीष कुमार, आंचल बोहरा की 3.5 फीसदी और निर्मल कुमार (लोटस ग्रीन) की 30 फीसदी है.
वास्तव में, यह प्लौट एक कंसोर्टियम का हिस्सा है. सेक्टर 150 का प्लौट नंबर 2 (ए 3) कुल 27,185 वर्गमीटर क्षेत्र का है, जिस का भू उपयोग स्पोट्र्स सिटी लेआउट में व्यावसायिक निर्धारित है. हिस्सेदारी के हिसाब से सभी लोग इस मामले के आरोपी हैं.
इस प्लौट को लीड डेवलपर लोटस ग्रीन ने विज टाउन प्लानर्स नामक बिल्डर कंपनी को सबडिवीजन करा कर सौंपा था. वर्ष 2017 में इस के लिए एक नक्शा भी प्राधिकरण से स्वीकृत करवाया गया था. बिल्डर ने इसे मौल जैसा शौपिंग कौंप्लेक्स बनाने की योजना बनाई और फिर बेसमेंट के लिए खुदाई भी शुरू कर दी. बाद में संशोधित नक्शे का आवेदन दिया गया, लेकिन प्राधिकरण ने मई 2022 में इसे खारिज कर दिया. कारण बताया कि भूमि पर प्रो शौप्स (खेल सामग्री दुकानें) और फूड बेवरेज की दुकानों की अनुमति है, न कि पूर्ण शौपिंग कौंप्लेक्स की. इस के बाद बिल्डर ने साइट पर कोई आगे काम नहीं किया.
नोएडा प्राधिकरण ने एसआईटी को बताया कि बिल्डर अपने लेआउट के मुताबिक एक मौल जैसी संरचना बनाना चाहता था. एसआईटी के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि अखिर किस वजह से बेसमेंट के लिए गहरा गड्ढा खोद कर उसे भरा नहीं गया? जांचपड़ताल में इस का भी जवाब मिल गया.
करोड़ों का हुआ खनन
दरअसल, नोएडा सेक्टर 150 के इस बेसमेंट से अरबों रुपए का अवैध खनन कर रोजाना 200 डंपर रेत निकाली गई थी. अवैध खनन पर निगरानी की सीधी जिम्मेदारी खनन विभाग की है, जबकि नोएडा अथौरिटी की यह जिम्मेदारी बनती है कि उस के आवंटित प्लौट पर निर्माण कार्य बिल्डिंग बायलौज के अनुसार हो. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी देखना होता है कि पर्यावरण नियमों के तहत काम हो रहा हो. अवैध जलदोहन को भी रोकना होता है.

बेसमेंट के लिए जमीन के अंदर से करीब 2 साल तक पानी निकाल कर सीवर में बहाया गया. लिहाजा इस प्रोजेक्ट के एक तरफ यमुना और दूसरी तरफ हिंडन नदी होने के बावजूद जमीन का जलस्तर नीचे चला गया और आसपास मौत के कुएं बना कर छोड़ दिए गए. इस के बावजूद किसी ने समय रहते काररवाई नहीं की. बेसमेंट के नाम पर जमीन को इतना खोखला कर दिया गया कि बाद में वहां निर्माण कार्य भी नहीं हुआ. न तो सुरक्षा घेरा लगाया गया, न चेतावनी बोर्ड.
यही गड्ढा 16 जनवरी, 2026 की रात युवराज मेहता की मौत का कारण बना, जब उन की कार पानी से भरे गहरे गड्ïढे में गिर गई. हादसे के बाद अब अधिकारियों की लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. सेक्टर 150 ही नहीं, बल्कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा के कई इलाकों में सैकड़ों ऐसे प्लौट हैं, जहां इसी तरह बेसमेंट के नाम पर खनन कर गड्ïढे छोड़ दिए गए हैं. इन में से कई गड्ïढे आबादी और सड़कों के बेहद करीब हैं, जहां कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है. यह प्लौट नोएडा अथौरिटी ने लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन को आवंटित किया था, जिसे बाद में अन्य डेवलपर्स को बेच दिया गया.
हालांकि नियमों के तहत यहां सीमित खुदाई की अनुमति होती है, लेकिन इस से कहीं अधिक गहराई तक खनन किया गया. यहां बेहतरीन गुणवत्ता की बालू निकली, जिसे खुलेआम बेचा गया. लोगों का कहना है कि रोजाना करीब 200 डंपर रेत इस प्रोजेक्ट से बाहर भेजी जाती थी. उस समय एक डंपर की कीमत करीब 15 हजार रुपए थी, जिसे बाजार में लगभग दोगुने दाम पर बेचा जाता था. यह सिलसिला एक से डेढ़ साल तक चला और करीब 70 फीट तक जमीन खोद दी गई.
युवराज की मौत के मामले की जांच कर रही एसआईटी को 5 दिन की जांच के दौरान नोएडा अथौरिटी और पुलिस ने अपने जवाब सौंप दिए. अथौरिटी ने करीब 150 और पुलिस ने 450 पेज की रिपोर्ट में सारे फैक्ट शामिल किए. इस जवाब में घटनाक्रम, काररवाई, ड्यूटी रोस्टर, कंट्रोल रूम रिकौर्ड, काल डिटेल, रेस्पांस टाइम को रखा गया है. चश्मदीद मुनेंद्र व उस के परिवार के बयान भी लिए गए.
युवराज की गड्ढे में डूबने से हुई मौत के मामले में कई पेंचीदे पहलू हैं. एसआइटी ने जांच पूरी करने के बाद अपनी रिपोर्ट शासन को सौंप दी है, जिस में एसडीआरएफ, नोएडा अथौरिटी, नोएडा पुलिस, दमकल विभाग, जलकल विभाग, प्रदूषण विभाग और परियोजना विभाग जैसे कई महकमे निशाने पर आए, जिन की लापरवाही से मौत का ये गड्ढा खुदा था. लेकिन देखना होगा कि शासन इस रिपोर्ट पर संज्ञान ले कर क्या काररवाई करता है.
डेथ जोन हैं खुले नाले
सेक्टर 150 में हाल ही में एक इंजीनियर की खुले तालाब में डूबने से हुई मौत ने न केवल सुरक्षा दावों की पोल खोली है, बल्कि स्पोट्र्स सिटी परियोजना के नाम पर चल रहे अरबों के खेल को भी फिर से चर्चा में ला दिया है. यह हादसा उस स्थान पर हुआ है, जिसे कागजों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर का स्पोट्र्स हब बनना था, लेकिन असलियत में वह प्रशासनिक लापरवाही और बिल्डर की धोखाधड़ी का खूनी दलदल बन चुका है. 300 एकड़ में फैली इस स्पोट्र्स सिटी की कहानी 3सी ग्रुप के मुखिया निर्मल सिंह से शुरू होती है. आरोप है कि निर्मल सिंह ने कौडिय़ों के भाव जमीन आवंटित कराई और फिर उसे 24 अन्य बिल्डरों (सबलेसी) को बेच कर गायब हो गया.
जमीन गिरवी रख कर करोड़ों का कर्ज लिया गया, जिसे चुकाने के बजाय डकार लिया गया. हालत यह है कि बैंक का कर्ज, फ्लैट खरीदारों का पैसा और प्राधिकरण का बकाया सब कुछ मुकदमों के जाल में फंसा है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद बिल्डरों ने एक बार फिर स्पोट्र्स सिटी का संशोधित मास्टर प्लान नोएडा अथौरिटी को सौंपा है. अब इसे बोर्ड बैठक में निर्णय के लिए रखा जाएगा. हालांकि, इस हादसे के बाद इस योजना को मंजूरी मिलना कई गंभीर सवाल खड़े करता है. स्पोट्र्स सिटी में व्यावसायिक लाभ को प्राथमिकता देने की कोशिशें नई नहीं है. साल 2022 में नोएडा अथौरिटी ने विशटाउन प्लानर्स के संशोधित लेआउट को सिरे से खारिज कर दिया था.
कंपनी ने खेल सुविधाओं के बजाय दुकानें और फूड आउटलेट्स के लिए भारीभरकम एफएआर का प्रस्ताव रखा था, जो स्वीकृत सीमा से कहीं अधिक था. स्पोट्र्स सिटी के मूल ब्रोशर के अनुसार, व्यावसायिक गतिविधियों के लिए केवल 0.5 प्रतिशत क्षेत्र ही आवंटित था, लेकिन बिल्डरों ने खेल को दरकिनार कर इस प्रोजेक्ट को शौपिंग कौंप्लेक्स बनाने की हर मुमकिन कोशिश की. इतना ही नहीं, शहर को स्मार्ट सिटी बनाने के बड़ेबड़े दावों के बीच एक ऐसी डरावनी हकीकत सामने आई है, जो किसी के भी रोंगटे खड़े कर सकती है.
जनपद में खुले नाले और असुरक्षित तालाब भी अब लोगों के लिए डेथ जोन साबित हो रहे हैं. पुलिस रेकौर्ड के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि पिछले 2 सालों में 11 मौतें सीधे तौर पर खुले नालों में गिरने और डूबने की वजह से हुई है. हैरानी की बात यह है कि सड़कों के किनारे बहते ये नाले खुलेआम मौत को दावत दे रहे है, लेकिन संबंधित विभाग गहरी नींद में सोए हुए हैं. न तो इन नालों को ढका गया है और न ही इन के किनारों पर सुरक्षा के लिए रेलिंग लगाई गई है.
जांच में सामने आया है कि कई हादसों में लोग बाइक चलाते समय संतुलन बिगडऩे या मोबाइल पर बात करते वक्त पैर फिसलने से इन गहरे नालों में जा गिरे हैं. नोएडा के सेक्टर-150 में युवराज मेहता की मौत के बाद नोएडा प्राधिकरण ने सड़क सुरक्षा को मजबूत करने के लिए जब जांच शुरू की तो 65 ब्लैक स्पाट्स की पहचान की गई. इन में 50 ब्लैक स्पाट्स बिल्डरों को 5 दिनों के अंदर सुधारने होंगे, वरना उन पर भारी जुरमाना किया जाएगा. बाकी 15 ब्लैक स्पाट्स प्राधिकरण खुद 15 दिनों में ठीक करेगा. अब इन पर कितना अमल होगा, ये देखने वाली बात है या फिर किसी नए हादसे का इंतजार होगा.
इस के अलावा जलभराव की समस्या रोकने को 20 गांवों में ड्रेनेज व्यवस्था बेहतर की जाएगी और पूरे नोएडा का विस्तृत सर्वेक्षण होगा. इस का आदेश नोएडा प्राधिकरण के नए सीईओ कृष्णा करुणेश ने जारी किया है. बता दें कि कि युवराज की मौत से पहले भी गड्ढों व नालों में गिरने से कई लोगों की मौत हो चुकी है. 18 दिसंबर, 2024 को सेक्टर 73 सर्फाबाद गांव में एक व्यक्ति बाइक सहित नाले में जा गिरा, जहां नाले में भरे पानी में डूबने की वजह से उस की मौत हो गई थी.
इस से पहले पहली अक्तूबर, 2024 को सेक्टर 126 के पास एक्सप्रैसवे सर्विस रोड पर एक तेज रफ्तार बुलेट नाली में जा गिरी, जिस से बाइक पर सवार 3 युवकों में से एक की मौत हो गई. 28 सितंबर, 2024 को भी सेक्टर 52 स्थित खुले नाले में टहलने निकले एक युवक की अचानक गिर कर डूबने से मौत हो गई थी.
मेरे बेटे को बेबस छोड़ दिया गया— पिता राजकुमार मेहता
ग्रेटर नोएडा के सेक्टर-150 में बेसमेंट के लिए खोदे गए पानी से भरे गड्ढे में गिरने के बाद मेरा बेटा दो घंटे तक संघर्ष करता रहा. उसे बचाने का पर्याप्त समय था लेकिन बचाव दल ने लापरवाही दिखाई. मेरे बेटे को भगवान भरोसे छोड़ दिया. अगर ठीक से प्रयास किया जाता तो उसे आसानी से बचाया जा सकता था. सेक्टर-150 के टाटा यूरेका पार्क सोसाइटी में आयोजित हुई शोक सभा में सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता के पिता राज कुमार मेहता ने भीगी आंखों और टूटे दिल से मनोहर कहानियां के समक्ष अपनी ये व्यथा व्यक्त की. उनकी आवाज में दर्द और आक्रोश दोनों थे.
उन्होंने कहा कि हम युवराज को न्याय नहीं दिला सकते क्योंकि वह अब वापस नहीं आ सकता. अब वे यह चाहते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम में लापरवाही बतरने वालों पर कठोर कार्रवाई की जाए. यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में कोई दूसरा युवराज इस तरह की त्रासदी का शिकार न हो. राज कुमार बोले, ‘प्रशासनिक लापरवाही ने मेरे बेटे की जान ले ली. मैं उन सभी का आभारी हूं जिन्होंने हमारी आवाज बुलंद की, हमें ताकत दी और इस विषय को सही दिशा दी. बेटे की मौत ने मुझे तोड़ दिया, लेकिन समाज, मीडिया और जनता ने मुझे संभाला. सभी ने मिलकर इस लापरवाही को देश और सरकार तक पहुंचाया.’
उन्होंने डिलीवरी बॉय मोनिंदर का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि उसने किसी की परवाह किए बगैर नाले में छलांग लगाई. मेरे बेटे को बचाने की कोशिश की. उन्होंने घटना का संज्ञान लेते हुए एसआईटी गठित करने पर यूपी सरकार का भी आभार जताया. इस शोकसभा के दौरान सांसद डॉ. महेश शर्मा, दादरी विधायक तेजपाल नागर, भाजपा जिलाध्यक्ष अभिषेक शर्मा और एडीसीपी ग्रेनो सुधीर कुमार समेत बड़ी संख्या में सोसाइटी निवासी मौजूद थे. ग्रेटर नोएडा में सोसाइटी के क्लब हाउस में आयोजित सभा की युवराज की शोक सभा के दौरान परिजन, युवराज के दोस्त, पड़ोसी भी पहुंचे. इस दौरान सभी की आंखें नम दिखी.
शोक सभा के दौरान लोगों ने सवाल किया कि जिले में पुलिस के अधीन ही डायल-112, पीसीआर, दमकल, ट्रैफिक पुलिस आदि की टीम आती है. इसी तरह प्राधिकरण के वर्क सर्किल प्रबंधक, ट्रैफिक सेल के जिम्मेदारों और जिला प्रशासन के अधीन आने वाले खनन विभाग, आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य विभाग, परिवहन विभाग आदि के जिम्मेदार भी युवराज की मौत पर खामोश है.
जिला प्रशासन भी ये स्पष्ट नहीं कर पाया कि एनडीआरएफ और एसडीआरएफ से संपर्क करने में देरी क्यों हुई. शोक सभा में गुस्से में भरे लोगों के सवाल थे कि अगर सभी विभाग मिलकर काम करते तो शायद युवराज जिंदा होगा. शोक सभा में आए लोगों ने प्रशासन के रेस्क्यू औपरेशन और समय-समय पर आपदा प्रबंधन के लिए होने वाली मॉकड्रिल को भी दिखावटी और नाटक बताया.
सिस्टम से ज्यादा जांबाज तो गरीब मुनेंद्र निकला
नोएडा के सेक्टर 150 में सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की दर्दनाक मौत के मामले में एक तरफ पूरा सिस्टम था, जो एक बेगुनाह की मौत का तमाशा मूकदर्शक बन कर देखता रहा तो वहीं एक गरीब परिवार में जन्मा डिलवरी बौय मुनेंद्र है, जिस ने अपनी जान की बाजी लगा कर युवराज को बचाने का प्रयास किया. मुनेंद्र इस हादसे में चश्मदीद गवाह भी है. सेक्टर 150 स्थित गढ़ी में रहने वाले बिहार के समस्तीपुर निवासी मुनेंद्र ने बताया कि वह डिलीवरी बौय का काम करता है. 16 जनवरी की रात वह करीब पौने 2 बजे घटनास्थल पर पहुंचा. 2 मिनट के अंदर ही उस ने फैसला कर लिया कि वह पानी के अंदर जाएगा. वहां मौजूद टीम से पानी में जाने की बात कही तो वे लोग घबरा गए.

मुनेंद्र बचपन से तैरना जानता है. मौके पर मौजूद टीम ने उसे सेफ्टी जैकेट दी, जिसे पहन कर वह पानी में उतरा. करीब 40 मिनट तक पानी में रहने के दौरान भी वह युवराज को नहीं खोज सका. जबकि बाहर खड़े लोगों और युवराज के पिता को उम्मीद थी कि शायद मुनेंद्र का प्रयास सफल होगा. युवराज को बचाने के लिए वह अपनी जान की बाजी लगा कर पानी में उतरा था. अफसोस कि वह उन की जान नहीं बचा सका. युवराज का कहना है कि अगर वह 5 मिनट पहले आ गया होता या प्रशासन की मौजूद टीम ने लापरवाही न बरती होती तो युवराज हम सब के बीच होते.
युवराज चिल्ला रहे थे और बारबार यही कह रहे थे कि मुझे बचा लो. मुनेंद्र ने बताया कि वह एक बेहद गरीब परिवार से है, लेकिन बावजूद इस के वह अपनी जान की परवाह किए बगैर करीब 40 मिनट तक ठंडे और गहरे पानी में युवराज को खोजने की कोशिश करते रहे. पानी बेहद ठंडा था, वहां पर कोई रोशनी नहीं थी. इस के बावजूद उस ने हिम्मत नहीं हारी. लगातार पुलिस के सामने बारबार युवराज को बचाने की कोशिश कर रहा था.
मुनेंद्र के मुताबिक घटना के अगले दिन पुलिस उसे अपने साथ ले गई. उस के साथ करीब 5 घंटे तक पूछताछ की. फिर उसे यह कह कर छोड़ दिया कि किसी के सामने कोई भी सच बात मत बताना, लेकिन मुनेंद्र ने इंसानियत दिखाते हुए उस रात जो देखा, सब कुछ मीडिया के सामने बता दिया. जब उस ने शासनप्रशासन और पुलिस की पोल खोली तो पुलिस ने उस से कहा कि अपना बयान बदल दो, लेकिन वह लगातार सच बोलता रहा.
इस पूरी घटना में बिल्डर की गिरफ्तारी के बाद मुनेंद्र को इस बात का डर लगने लगा कि कहीं बिल्डर उस के खिलाफ कोई गलत कदम न उठा ले. उसे लगने लगा कि ऐसे लोग जो पहले से ही लापरवाह हैं, अपने को बचाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं. इसीलिए उस ने अपनी और परिवार की सुरक्षा के लिए पुलिस से गुहार लगाई.
वह अपने घर को छोड़ कर कुछ शुभचिंतकों के पास रहने लगा. उस ने नौकरी तक छोड़ दी. उसे देर रात घर से बाहर निकलने में डर लगने लगा. लेकिन मुनेंद्र की बहादुरी और सच का साथ देने के संकल्प से ही शायद युवराज को इंसाफ मिलने का दरवाजा खुल रहा है, क्योंकि एसआईटी के समक्ष उसी की गवाही से जांच दल व्यवस्था की लापरवाही के ठोस नतीजे तक पहुंच सका.
व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है शासन को सौंपी गई एसआईटी जांच रिपोर्ट
नोएडा के सेक्टर 150 में बिल्डर के निर्माणाधीन इमारत के कई फुट गहरे गड्ïढे में सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की कार डूबने से हुई मौत के मामले में गठित विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने अपनी अंतिम रिपोर्ट शासन को सौंप दी है. यह गहन जांच 7 दिन तक चली है, जिस में सैकड़ों दस्तावेजों की पड़ताल और लगभग 30 अधिकारियों और कर्मचारियों से पूछताछ की गई. इस के बाद यह अंतिम रिपोर्ट तैयार की गई.

यह रिपोर्ट प्रशासनिक सिस्टम की गंभीर चूक की तरफ इशारा करती है. रिपोर्ट में बचाव दल की चूक को स्वीकार करते हुए प्राधिकरण, एसडीआरएफ, दमकल, पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया गया है. अब प्रदेश सरकार के निर्णय का इंतजार है. अगर सब कुछ ईमानदारी से हुआ तो रिपोर्ट के आधार पर बड़े स्तर पर सख्त काररवाई हो सकती है.
योगी सरकार द्वारा युवराज की मौत के बाद स्वत:संज्ञान लेते हुए गठित की गई 3 सदस्यीय एसआईटी का नेतृत्व मेरठ जोन के अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी) भानु भास्कर को सौंपा था. टीम में मेरठ मंडल के मंडलायुक्त भानुचंद्र गोस्वामी और लोक निर्माण विभाग के चीफ इंजीनियर अशोक कुमार द्विवेदी बतौर सदस्य एसआईटी में शामिल रहे.

नोएडा प्राधिकरण, पुलिस और जिला प्रशासन ने एसआईटी को करीब 550 पन्नों का विस्तृत लिखित बयान सौंपा था. इस में जलभराव की पहले से मिली सूचना, स्टार्म वाटर ड्रेनेज की योजना, कंट्रोल रूम का संचालन, ड्यूटी चार्ट, कौल रिकौर्डिंग्स, बचाव कार्यों का प्रतिक्रिया समय और घटनास्थल पर तैनात अधिकारियों की भूमिकाओं का पूरा ब्यौरा दर्ज है. टीम ने सभी दस्तावेजों की जांचपड़ताल कर उन्हें अपनी रिपोर्ट में शामिल किया. जांच के दौरान सब से बड़ा सवाल यह उठा कि युवराज को बाहर निकालने में करीब 4 घंटे क्यों लगे.
एसआईटी को पता चला कि हादसे के तुरंत बाद शुरुआत के समय में बचाव तंत्र पूरी तरह से सक्रिय नहीं हुआ. एसडीआरएफ, पुलिस और स्थानीय प्रशासन के बीच तालमेल की गंभीर कमी बनी रही. कंट्रोल रूम से समय रहते निर्देश जारी नहीं हुए और घटनास्थल पर मौजूद टीमें स्थिति की गंभीरता न समझ सकीं. रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि हादसे वाले प्लौट पर जल निकासी की स्थाई व्यवस्था पहले ही प्रस्तावित थी, मगर वह केवल कागजों पर रह गई.
प्लौट आवंटन से ले कर हादसे तक ड्रेनेज सिस्टम पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. एसआईटी ने उस दौरान तैनात वरिष्ठ अधिकारियों, जूनियर इंजीनियरों और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी को जांच के केंद्र में रखा है. एसआईटी रिपोर्ट में लापरवाही करने वाले करीब 20 अधिकारियों व कर्मचारियों के नाम साफतौर पर दर्ज हैं. रिपोर्ट मिलते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद इस का गहन अध्ययन करेंगे. अनुमान है कि दोषियों के खिलाफ निलंबन, विभागीय जांच के अलावा आपराधिक केस दर्ज करने के आदेश जारी हो सकते हैं. युवराज मेहता की मौत अब केवल हादसा नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बन गई है.
एसआईटी रिपोर्ट से स्पष्ट हो गया कि सही समय पर योजना, निगरानी और रेस्क्यू सिस्टम सक्रिय होता तो यह मौत टाली जा सकती थी. फिलहाल सभी की नजर अब प्रदेश सरकार के निर्णय पर टिकी है. UP News






