Suspense Story: संविधा कोई साधारण नहीं, बल्कि खूबसूरती की ऐसी मूरत थी कि जो भी उसे देखता तो देखता ही रह जाता था. इस के विपरीत उस ने शादी कुरूप युवक हेमंत जोशी से की थी. दोनों की गृहस्थी हंसीखुशी से चल रही थी कि इसी बीच उन्हीं की सोसायटी में रहने वाले शरद दीवान नाम के व्यक्ति ने संविधा का परफेक्ट तरीके से मर्डर कर दिया. कौन था शरद दीवान और उस ने खूबसूरत अप्सरा संविधा का मर्डर क्यों किया?

अहमदाबाद के थाना नरोडा में तब सन्नाटा सा पसर गया, जब हेमंत जोशी ने एसआई हर्षद जाडेजा के सामने चीखते हुए कहा, ”मैं कल दोपहर से इस थाने के चक्कर काट रहा हूं, एक आप हैं कि मेरी बात पर ध्यान ही नहीं दे रहे. कल सुबह से लापता हुई मेरी पत्नी आज तक नहीं लौटी. प्लीज साहब, कम से कम आप मेरी बात सुन तो लीजिए.’’

थाने में हेमंत की बात कोई सुनने के बजाय पुलिसकर्मी उस का मजाक उड़ा रहे थे. हेमंत ने एक बार फिर विनती करते हुए कहा, ”प्लीज सर, मैं आप से हाथ जोड़ कर रिक्वेस्ट कर रहा हूं. संविधा का पता लगा दीजिए. कहीं वह किसी मुसीबत में न हो?’’

”देखो भाई, पहली बात तो यह है कि अभी तुम्हारी पत्नी को घर से गए 24 घंटे भी नहीं हुए हैं. 24 घंटे पूरे होने के बाद ही हम तुम्हारी रिपोर्ट दर्ज कर के उस की तलाश शुरू करेंगे. कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारी पत्नी तुम से परेशान हो कर किसी के साथ भाग गई हो.’’ एसआई हर्षद जाडेजा ने हैडकांस्टेबल जिग्नेश पटेल की ओर देखते हुए कहा.

”सर, मैं एक बार आप से फिर कह रहा हूं, संविधा मेरे साथ बहुत खुश थी. हम दोनों में आज तक कभी कोई झगड़ा तक नहीं हुआ. ऐसे में वह मुझ से परेशान हो कर किसी के साथ क्यों भागेगी.’’ हेमंत हाथ जोड़ कर थोड़ी ऊंची आवाज में बोला.

”इतनी ऊंची आवाज में क्यों बोल रहा है भाई?’’ थोड़ी दूर पर बैठे एक सिपाही ने कहा.

”सौरी सर, आप लोग वह काम कीजिए, जिस काम के लिए मैं आया हूं. आप लोग हमारे व्यक्तिगत जीवन को बीच में क्यों ला रहे हैं?’’ हेमंत ने कहा.

”ऐसे मामलों में ऐसा ही होता है, जब दोनों में से कोई एक घर छोड़ कर चला जाता है. तुम खुद को देखो और अपनी पत्नी को देखो. ऐसे में वह भागेगी नहीं तो और क्या करेगी.’’ एसआई जाडेजा ने हंसते हुए कहा.

”अगर ऐसी कोई बात होती तो पहली बात तो वह मुझ से शादी ही न करती. फिर किसी कारणवश कर भी लेती तो पहले ही छोड़ कर चली गई होती. अब तो 2 बच्चे भी हो गए हैं.’’ हेमंत जोशी ने कहा.

”थोड़ी देर से अक्ल आई होगी. सर, मेरी तो समझ में यही नहीं आ रहा है कि इतनी खूबसूरत औरत ने 10 साल इस तरह की शक्लसूरत वाले आदमी के साथ कैसे बिता दिए.’’  कह कर हैडकांस्टेबल जोर से हंसा.

”तब न सही, अब मिल गया होगा बेचारी को उसे वह सुख देने लायक होगा, जो पति नहीं दे सका. इसलिए भाग गई.’’ एसआई जाडेजा ने कहा तो हेमंत को इन पुलिस वालों पर गुस्सा तो बहुत आया, पर वह मजबूर था. घर पर उस के 2 छोटेछोटे बच्चे इंतजार कर रहे थे.

वह तेजी से पलटा और दरवाजे की ओर बढ़ा. तभी एसएचओ मनोहर सिंह झाला ने थाने में प्रवेश किया. हेमंत के चेहरे को ही देख कर उन्होंने भांप लिया था कि इस आदमी के साथ कुछ गड़बड़ है. हेमंत को पीछे आने का इशारा कर वह अपने चैंबर की ओर बढ़े. एसएचओ को देख कर पूरे स्टाफ ने उन्हें सैल्यूट किया. अंदर अपनी कुरसी पर बैठ कर एसएचओ मनोहर सिंह ने हेमंत को सामने पड़ी कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए पूछा, ”कहिए, क्या बात है? आप काफी परेशान लग रहे हैं?’’

”जी सर, मेरी वाइफ कल दोपहर को घर से निकली है तो अभी तक लौट कर नहीं आई है. थाने में गुमशुदगी तो दर्ज कर ली गई है, पर कोई काररवाई नहीं हो रही है. सभी कह रहे हैं कि जो कुछ भी होगा 24 घंटे बाद ही होगा. सर, उसे तलाशने के बजाय यहां पर सभी मेरा और मेरी पत्नी का मजाक ऊपर से उड़ा रहे हैं.’’ बड़ी विनम्रता से हेमंत ने कहा.

”आप का नाम?’’ एसएचओ ने पूछा.

”हेमंत जोशी.’’

”रहते कहां हो?’’

”सर, हरियाली सोसायटी में.’’

”करते क्या हो?’’

”जी, एक मशीन बनाने वाली कंपनी में सुपरवाइजर हूं.’’

”रिपोर्ट तो दर्ज हो ही चुकी है. ऐसा करो, अपनी पत्नी की एक फोटो दे दो. मैं देखता हूं, क्या हो सकता है.’’ थानाप्रभारी ने कहा.

”सर, एक फोटो मैं दरोगाजी को दे चुका हूं,’’ उस ने शर्ट की जेब से पत्नी की एक फोटो निकाल कर एसएचओ को भी दी.

पलभर वह उस फोटो को देखते ही रह गए. फिर उन्होंने पूछा, ”यह तुम्हारी पत्नी की ही फोटो है?’’

”सर, कहीं आप भी तो वही नहीं सोच रहे हैं, जो बाकी लोग सोच रहे हैं कि इस लंगूर के हाथ यह हूर की परी कैसे लग गई.’’ हेमंत ने कहा.

”बात तो तुम ने सही कही, पर मैं ने अभी तक तो यह नहीं सोचा. फिर भी वाकई तुम्हारी पत्नी बहुत सुंदर है. इस के साथ कुछ भी हो सकता है. बहरहाल, मुझ से जो भी हो सकेगा, मैं वह करूंगा. पूरी कोशिश करूंगा कि तुम्हारी पत्नी तुम्हें मिल जाए.’’ कह कर एसएचओ ने हेमंत की पत्नी की फोटो अपने मोबाइल से खींच ली.

हेमंत उठने लगा तो उन्होंने कहा, ”अपना और अपनी पत्नी का मोबाइल नंबर तो लिखवा दो. तुम्हारी पत्नी तो अपना मोबाइल ले कर गई होगी.’’

”जी नहीं, वह अपना मोबाइल फोन घर पर ही छोड़ गई है.’’ कह कर हेमंत ने अपना और संविधा का मोबाइल नंबर एसएचओ को लिखवा दिया. उस के बाद वह उन से अनुमति ले कर बाइक से घर की ओर चल पड़ा.

रास्ते में आते हुए उस के दिमाग में पुरानी बातें घूमने लगीं. पौलीटेक्निक करने के बाद हेमंत जोशी को एक मशीन बनाने वाली कंपनी में नौकरी मिल गई तो उस के लिए रिश्ते आने लगे थे. वैसे तो उस के पास सब कुछ था, पर उस की शक्लसूरत ऐसी थी कि जल्दी कोई उसे पसंद ही नहीं करता था. पर संयोग से हेमंत को ऐसी खूबसूरत पत्नी मिली कि देखने वाले दांतों तले अंगुली दबा लेते थे. उसे शादी वाला दिन याद आ गया था. जब संविधा को देख कर उस के दोस्त हैरान रह गए थे. उस के दोस्तों ने उसे ताना मारते हुए कहा भी था कि उस की तो लौटरी लग गई. कहां कोई लड़की उसे पसंद ही नहीं कर रही थी और अब लंगूर के हाथ हूर की परी लग गई.

तभी संजय ने कहा, ”कुछ तो गड़बड़ है, तभी तो इतनी सुंदर भाभीजी ने इस लंगूर को गले लगाया है.’’

यह सुन कर हेमंत का खून खौल उठा था, क्योंकि उस ने सीधे उस की पत्नी पर लांछन लगाया था. हेमंत उठ कर संजय का कौलर पकडऩा चाहता था. पर संविधा ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ”छोडि़ए न, जिसे जो कहना है, कहने दीजिए. आप शांति से बैठिए.’’

संविधा के यह कहने पर हेमंत शांति से बैठ गया था. सुहागरात को जब हेमंत कमरे में आया तो उस के दिमाग में दोस्तों द्वारा कही बातें गूंज रही थीं. कमरे में आ कर वह संविधा के पास पलंग पर बैठने के बजाय खिड़की के पास जा कर खड़ा हो गया. उस के इस व्यवहार से संविधा घबरा गई. पलंग से उठ कर वह उस के पास जा कर बोली, ”क्या बात है, आप ठीक तो हैं न? मुझ से कोई गलती हो गई क्या?’’

पलट कर हेमंत ने संविधा की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ”संविधा, अगर तुम बुरा न मानो तो एक बात पूछूं?’’

संविधा ने मुसकराते हुए कहा, ”भला आप की बात का क्यों बुरा मानूंगी. आप को जो पूछना हो, पूछिए.’’

”आप इतनी खूबसूरत हैं. आप को तो कोई भी हैंडसम लड़का मिल सकता था. फिर आप ने मुझ से क्यों शादी की?’’

”आप हैंडसम नहीं हैं क्या?’’ हेमंत के करीब आ कर संविधा ने कहा.

”संविधा, मैं ने जो पूछा है, यह उस का जवाब नहीं है.’’

”खूबसूरती की परिभाषा सभी की अलगअलग होती है. कुछ लोगों को शरीर की खूबसूरती पसंद होती है तो कुछ लोग मन की खूबसूरती देखते हैं. मन की खूबसूरती ही, असली खूबसूरती है. शरीर की खूबसूरती तो सिर्फ देखने के लिए होती है. आप का मन खूबसूरत है, इसलिए मैं ने आप को चुना.

”पिछले साल आप ने अपनी बुआ की बेटी की शादी में जिस तरह मदद की थी, उस के बारे में जान कर लगा कि आप मन से बहुत दयालु हैं. इसलिए जब आप की बुआ ने आप के रिश्ते की बात की तो मैं मना नहीं कर सकी. क्योंकि आप जैसा सुलझा और समझदार पति जिसे मिल जाए, वह भाग्यशाली ही होगा.’’ संविधा बोली.

हेमंत ने गौर से संविधा को देखते हुए पूछा, ”आप पर किसी तरह का दबाव या मजबूरी तो नहीं थी न?’’

”दबाव था तो नहीं, पर अब है कि जिस का मन इतना खूबसूरत है, उस का प्यार करने का अंदाज कितना खूबसूरत है.’’ संविधा ने प्यार से मुसकराते हुए कहा.

हेमंत ने मुसकराते हुए संविधा को सीने से लगा लिया और फिर दोनों एकदूसरे में समा गए.

संविधा ने जैसे हेमंत की जिंदगी ही बदल दी थी. उस के प्यार ने हेमंत को जैसे एक नई दिशा दी थी. हेमंत जो अपनी शक्लसूरत की वजह से लोगों के बीच जाने से बचता था, अब वह बेझिझक लोगों के बीच आताजाता था. हालांकि उस की हंसी उड़ाने वाले अभी मौका नहीं छोड़ते थे. इस की सब से बड़ी वजह थी संविधा की खूबसूरती, जो उस के जाननेपहचानने वालों को अभी भी नहीं पच रही थी. पर अब इस बात को ले कर उस पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था.

समय के साथ उस के घर 2 बच्चे पैदा हुए, बड़ी बेटी निकिता और छोटा बेटा नीतेश. दोनों ही बच्चे अपनी मम्मी पर गए थे, इसलिए वही नहीं, पूरा परिवार खुश था कि अच्छा हुआ कोई बच्चा हेमंत को नहीं पड़ा. दुनिया कुछ भी कहती रही हो, पर संविधा की समझदारी की वजह से सब बढिय़ा चल रहा था. आज भी लोग हेमंत को उस की पत्नी की खूबसूरती को ले कर ताने मारते थे और मजाक उड़ाते थे, पर अब वह खुश रहता था. किसी की बात को दिल पर नहीं लेता था.

पर उस की इस खुशी को न जाने किस की नजर लग गई. एक दिन संविधा घर से तैयार हो कर निकली तो लौट कर नहीं आई. दोपहर से ही हेमंत ने उस की तलाश शुरू कर दी, पर कहीं कोई पता नहीं चला. हेमंत ने तुरंत थाने जा कर उस की गुमशुदगी भी दर्ज करा दी थी कि पुलिस भी उस की तलाश में लग जाएगी तो जल्दी उस का पता चल जाएगा. उसे चिंता थी कि संविधा किसी मुसीबत में तो नहीं फंस गई है, क्योंकि समय बहुत खराब चल रहा है.

अब तक हेमंत घर पहुंच गया था. दोनों बच्चे उसी का इंतजार कर रहे थे. पत्नी के गायब होने के बाद उस ने पेरेंट्स को भी फोन कर के बुला लिया था. दूसरी ओर इंसपेक्टर मनोहर सिंह झाला ने संविधा की गुमशुदगी को गंभीरता से लिया था. उन्होंने अपने स्टाफ के उन लोगों को खूब खरीखोटी सुनाई थी, जिन्होंने हेमंत की हंसी उड़ाई थी. औफिस का काम निपटा कर वह महिला सिपाही जयंती मेहता को साथ ले कर संविधा की गुमशुदगी वाले मामले की जांच के लिए निकल पड़े थे.

जब वह कृष्णानगर स्थित हरियाली सोसायटी के गेट पर पहुंचे तो गेट के बगल में स्थित किराने की दुकान के सामने गाड़ी रोक दी. गाड़ी से उतर कर वह जयंती के साथ किराने की दुकान पर पहुंचे तो पुलिस वालों को देख कर दुकानदार थोड़ा घबरा गया. इंसपेक्टर झाला ने मोबाइल में संविधा का फोटो दिखाते हुए पूछा, ”इन्हें पहचानते हो?’’

”जी सर, यह इसी सोसायटी में रहने वाली संविधा मैडम हैं. हेमंत जोशी की पत्नी.’’

”इन्हें आखिरी बार कब देखा था?’’ इंसपेक्टर झाला ने पूछा.

दुकानदार पहले ही घबराया था. इस सवाल पर वह डर गया. माथे पर आए पसीने को पोंछते हुए उस ने कहा, ”परसों सुबह, मैडम दुकान पर सामान लेने आई थीं.’’

”कितने बजे आई थी?’’ इंसपेक्टर ने अगला सवाल किया.

”यही कोई 10 बजे के आसपास. कुछ सामान खरीदना था, जिसे बंधवा कर रख गई थीं. थोड़ी देर बाद ले जाने के लिए कहा था.’’

”इस का मतलब वह कहीं बाहर जा रही थीं. वह अकसर इसी तरह सामान बंधवा कर रख जाती थीं?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.

”सर, ऐसा लगभग सभी करते हैं. सामान बंधवा कर हम से पहुंचाने के लिए कह देते हैं. जब समय मिलता है, हम सामान पहुंचा देते हैं.’’ दुकानदार ने कहा.

दुकानदार के यह कहने पर जयंती ने मुसकराते हुए पूछा, ”क्या आप सभी के घर सामान पहुंचाने जाते हैं?’’

इंसपेक्टर झाला और दुकानदार जयंती की ओर देखने लगे. जयंती की इस बात पर जहां इंसपेक्टर झाला को हंसी आ गई थी, वहीं दुकानदार झेंप गया था. इस की वजह यह थी कि दुकानदार काफी मोटा था. जयंती ने विनम्रता से कहा, ”आप मेरी बात का बुरा मत मानना. मेरे कहने का मतलब यह है कि आप ने सामान पहुंचाने के लिए कोई लड़का रखा है?’’

”जी, एक लड़का है मगन. वह अभी किसी का सामान पहुंचाने गया है, पर देखो तो अभी लौट कर नहीं आया है. इस की बड़ी खराब आदत है, जहां जाता है, वहीं का हो कर रह जाता है. उस की बातें ही नहीं खत्म होतीं.’’ दुकानदार ने घड़ी की ओर देखते हुए कहा.

”उस की उम्र कितनी होगी?’’ जयंती ने पूछा.

”यही कोई 25 साल.’’ दुकानदार ने कहा.

”अच्छा, यह बताओ कि जब संविधा मैडम सामान लेने नहीं आईं तो तुम्हें अजीब नहीं लगा? फिर तुम ने क्या किया?’’ इंसपेक्टर झाला ने पूछा.

”सर, अजीब तो लगा था. क्योंकि वह जितनी देर में आने को कह कर जाती थीं, उस से पहले ही आ जाती थीं. पर जब कल वह नहीं आईं तो मैं ने सामान उन के पति हेमंतभाई को पकड़ा दिया था.’’

”इस का मतलब सामान हेमंत ले गए. क्या वह रोज दोपहर को घर आते हैं?’’ इंसपेक्टर झाला ने पूछा.

”नहीं सर, कल संविधा मैडम नहीं आई, इसलिए हेमंत सर घर आए होंगे.’’ दुकानदार ने बताया.

”मैडम नहीं आईं तो तुम ने उन्हें बताया था?’’

”नहीं सर, शायद मोनिका मैडम ने बता कर बुलाया होगा.’’ दुकानदार ने कहा.

”यह मोनिका कौन हैं?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.

”सर, उन्हीं की लाइन में 2 घर छोड़ कर रहती हैं. दोनों परिवारों में खूब पटती है.’’

”ठीक है, और कुछ पूछना होगा तो फिर तुम्हारे पास आऊंगा.’’ कह कर इंसपेक्टर झाला सोसायटी के गेट की ओर बढ़ गए. 5 मिनट बाद वह हेमंत के घर के सामने खड़े थे.

घंटी बजाई तो दरवाजा हेमंत ने ही खोला. हेमंत का घर काफी सुंदर और सजा हुआ था. हर चीज बहुत व्यवस्थित ढंग से रखी थी. जयंती ने तारीफ करते हुए कहा, ”संविधा ने घर को बड़ी खूबसूरती से सजाया है.’’

”संविधा को इन चीजों का बहुत शौक था,’’ हेमंत ने कहा.

”हेमंतजी, आप को किस ने बताया कि संविधा घर लौट कर नहीं आई है, जिस की वजह से तुम्हें दोपहर को घर आना पड़ा?’’ इंसपेक्टर झाला ने पूछा.

”पड़ोस में रहने वाले मोनिका और शरद से हमारे बहुत अच्छे संबंध हैं. हमारे और उन के बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ते हैं, इसलिए मोनिका और संविधा साथ ही बच्चों को लेने स्कूल जाती हैं. उस दिन घर पर ताला लगा देख कर मोनिकाजी अकेली ही चली गईं. स्कूल की छुट्टी हुए घंटों बीत गए और संविधा नहीं आई तो मोनिकाजी ने मुझे फोन किया.’’ हेमंत ने उस दिन जो हुआ था, जानकारी दी.

”हेमंत क्या हम मोनिका और शरद से मिल सकते हैं?’’ इंसपेक्टर झाला ने कहा तो हेमंत ने तुरंत मोनिका और शरद को बुलाने के लिए बेटी को भेज दिया.

घर में तमाम फोटो लगे थे. जयंती वे फोटो देख रही थी. संविधा सचमुच बहुत खूबसूरत थी. हर फोटो में उस का चेहरा कुछ अलग ही चमक रहा था. फोटो से ही लग रहा था कि वह एक जिंदादिल महिला थी. जयंती ने थोड़ीबहुत पूछताछ हेमंत के बच्चों से की. उन से पूछताछ करने की वजह यह थी कि हेमंत पत्नी पर शक तो नहीं करता था और इस बात को ले कर दोनों में झगड़ा होता रहा हो. पर बच्चों ने उस के सवालों के जो जवाब दिए, उस से उसे लगा कि ऐसा कुछ भी नहीं था.

शरद और मोनिका आ गए थे. उन के साथ उन के बच्चे भी थे. मोनिका सामान्य कदकाठी वाली महिला थी. सांवला रंग, तीखे नैननक्श, लंबे बाल और वजन भी शरीर के हिसाब से ठीक ही लग रहा था. न वह मोटी थी और न ही छरहरी. उस का पति शरद दीवान लंबातगड़ा, सुगठित शरीर और साफ रंग का काफी हैंडसम था. उसे देख कर लग रहा था कि वह कहीं जाने की तैयारी में था. मोनिका और शरद के आते ही हेमंत ने कहा, ”सर, यह हमारे पड़ोसी शरद दीवान और यह उन की पत्नी मोनिकाजी हैं.’’

मोनिका और शरद ने हाथ जोड़ कर इंसपेक्टर मनोहर सिंह झाला और जयंती चौधरी को नमस्ते किया. इंसपेक्टर झाला ने दोनों को गौर से देखते हुए कहा, ”मैं आप लोगों का थोड़ा समय लूंगा. संविधा के गायब होने के सिलसिले में.’’

”सर, पहले से पता होता तो मैं आज मीटिंग का कार्यक्रम ही न बनाता. पर अब तो जाना ही पड़ेगा. फिर भी आप जो पूछना चाहते हैं, पूछ लीजिए.’’ शरद ने अपनी समस्या बताते हुए कहा.

”जिस दिन संविधा गायब हुई थी, आप कितने बजे घर आए थे?’’ इंसपेक्टर झाला ने पूछा.

”सर, इन लोगों ने मुझे शाम 5 बजे फोन किया था. उस के तुरंत बाद मैं औफिस से निकल गया था और पौने 6 बजे घर आ गया था.’’ शरद ने कहा.

”घर आ कर आप ने क्या किया?’’

”घर आते ही मैं हेमंत के साथ संविधा की तलाश में लग गया था. इन्होंने अपने सारे रिश्तेदारों और संविधा के परिचितों तथा सहेलियों को फोन कर ही लिया था. इसलिए हम दोनों पहले थाने गए. वहां संविधा के गायब होने की सूचना दे कर उस की तलाश में लग गए. पूरी रात हम दोनों इधरउधर दौड़ते रहे.’’ शरद ने कह कर हेमंत की ओर देखा तो उस ने हां में सिर हिलाते हुए कहा, ”जी सर, शरद और मोनिका ने मेरी मदद ही नहीं की, बल्कि मुझे और बच्चों को संभाला भी.’’

”ठीक है शरदजी, अब आप जा सकते हैं,’’ इंसपेक्टर झाला ने कहा.

”मोनिकाजी, पता चला है कि आप संविधा की बहुत अच्छी सहेली थीं?’’ इस बार सवाल कांस्टेबल जयंती मेहता ने किया था.

”जी, हम दोनों का रिश्ता बहन जैसा था. इसीलिए हम दोनों एकदूसरे के पति को जीजू कहते थे. हम दोनों हर त्योहार एक साथ मनाते थे. कहीं बाहर जाना होता था तो साथ ही जाते थे,’’ मोनिका ने कहा.

”तब तो शौपिंग भी साथसाथ करती रही होंगीं?’’

”जी हां, हम शौपिंग भी साथ ही करते थे,’’ मोनिका ने कहा.

”यह बात मैं ने इसलिए पूछी थी कि आप के कानों में जो झुमके हैं, वे संविधा की फोटो वाले झुमके से हूबहू मिलते हैं.’’ जयंती ने कहा तो मोनिका थोड़ा झेंप गई.

मोनिका के झुमकों को देख कर जयंती की नजरें ठिठक गईं. उस ने सहज स्वर में कहा, ”आप कह रही थीं कि ये झुमके आप ने बाजार से खरीदे हैं?’’

मोनिका ने मुसकराते हुए कहा, ”जी हां, बस यूं ही पसंद आ गए थे.’’

”कब खरीदे?’’

”यही… 2-3 दिन पहले.’’

इंसपेक्टर मनोहर सिंह झाला ने हलकी मुसकान के साथ जयंती की ओर देखा. दोनों को अब यह समझ में आ गया था कि कुछ न कुछ तो छिपाया जा रहा है.

”ठीक है,’’ इंसपेक्टर बोले, ”अगर कुछ और याद आए तो बताइएगा. वैसे आप दोनों को चिंता करने की जरूरत नहीं है, संविधा जरूर मिल जाएगी.’’

जयंती ने शरद और मोनिका के बच्चों से भी बातचीत करतेकरते थोड़ीबहुत जानकारी ले ली थी. मोनिका के बच्चों ने बताया था कि संविधा आंटी और उन के पापा में खूब पटती थी. संविधा जब भी उन के घर आती थीं, पापा उन के पास ही बैठे रहते थे. उन से खूस हंसहंस कर बातें करते थे. मोनिका ने राहत की सांस ली. पर उस की आंखों में एक पल के लिए जो डर झलका था, उसे जयंती ने साफ भांप लिया था.

अगले दिन सुबहसुबह थाना नरोडा पुलिस को फोन द्वारा सूचना मिली थी कि शहर के बाहर बहने वाले नाले के किनारे की झाडिय़ों में किसी महिला का शव पड़ा है. वह इलाका थाना नरोडा के अंतर्गत ही आता था.  इंसपेक्टर झाला महिला सिपाही जयंती एवं कुछ अन्य सिपाहियों को साथ ले कर फौरन मौके पर जा पहुंचे थे. शव की हालत देख कर ही लग रहा था कि इस की मौत लगभग 3 दिन पहले हुई थी. चेहरा सूजा हुआ था, पर पहचान में आ रहा था. वह संविधा की लाश थी.

हेमंत को जब यह खबर दी गई तो वह बेहोश हो कर जमीन पर गिर पड़ा. दोनों बच्चे फूटफूट कर रोने लगे थे. पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर हेमंत और उस के बच्चों को सांत्वना दे कर घर भेजा. फोरैंसिक टीम ने भी घटनास्थल की जांच कर के जरूरी सबूत जुटा लिए थे. फोरैंसिक टीम को घटनास्थल पर जूतों के निशान के अलावा कार के पहियों के भी निशान मिले थे. इंसपेक्टर झाला को अब यह मामला मिसिंग का नहीं, बल्कि हत्या का लग रहा था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आया था कि संविधा की मौत गला दबाने से हुई थी. जब उसे मारा गया था, समय दोपहर के 2 से 3 बजे के बीच का था. मजे की बात यह थी कि उस के शरीर पर किसी भी तरह के संघर्ष का कोई निशान नहीं था.

इस का मतलब था कि संविधा उस व्यक्ति को जानती थी, जिस ने उसे गला दबा कर मारा था. पुलिस की जांच शुरू हुई. संविधा का मोबाइल घर पर ही मिला था. इस के अलावा हेमंत के घर एक बटन वाला मोबाइल भी मिला था. इंसपेक्टर झाला ने संविधा के दोनों मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि संविधा के उस छोटे वाले मोबाइल से सिर्फ एक ही नंबर पर बात होती थी. इंसपेक्टर झाला ने जब उस नंबर के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि वह नंबर शरद का था. इस के बाद उन्हें संविधा की हत्या का रहस्य खुलता नजर आया.

उन्होंने शरद के मोबाइल की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई. जांच में पता चला कि वह नंबर शरद के नाम पर नहीं, बल्कि उस की पत्नी मोनिका के भाई विक्रम के नाम पर था, लेकिन उस का उपयोग शरद ही कर रहा था.

अब शक की सुई सीधे मोनिका और शरद की ओर घूम गई. इंसपेक्टर झाला ने दोनों को थाने बुलाया. उन्होंने शरद से पूछा, ”शरदजी, आप के दोस्त की पत्नी की हत्या हो गई है. आप ने बताया था कि आप उस की तलाश में रात भर हेमंत के साथ थे?’’

”जी हां सर, मैं उन के साथ ही था.’’

”तो फिर आप यह बताइए कि आप की लोकेशन उस दिन दोपहर सवा 2 बजे शहर के बाहर बहने वाले नाले के पास की क्यों थी?’’

शरद के चेहरे का रंग उड़ गया था. उस ने हकलाते हुए कहा, ”वह तो बस ऐसे ही. मैं उधर से गुजर रहा था तो मैं वहां पान खाने के लिए रुक गया था.’’

”पान खाने के लिए नहीं रुके थे शरद, आप के जूतों के निशान भी लाश के पास मिले हैं. यही नहीं, आप की कार के टायरों के निशान भी वहां मिले हैं.’’

शरद के पसीने छूट गए. जयंती ने हाथ में थामी फाइल बंद करते हुए कहा, ”आप का झूठ बोलना बेकार है. जो भी है, सचसच बता दो.’’

फिर पूछताछ शुरू हुई. शुरू में शरद ने कुछ नहीं कहा. लेकिन जब पुलिस ने मोनिका के झुमके, विक्रम का मोबाइल नंबर और गली के एक बच्चे का बयान (जिस ने देखा था कि मनीष की गाड़ी उसी दिशा में गई थी). इस के अलावा एक सबूत और था.

दरअसल, जयंती जब संविधा के फोटो देख रही थी, तभी उस ने उस के कानों में जो झुमके देखे थे, उन में सामने की एक लटकन टूटी थी. मोनिका से बात करते समय वही झुमका उस ने उस के कान में देखा था. जबकि मोनिका उस समय वे झुमके नहीं पहने थी. ये सारे सबूत इंसपेक्टर झाला ने शरद दीवान के सामने रखे तो वह टूट गया. उस ने कहा, ”हां, मैं ने ही संविधा की हत्या की थी.’’

”क्यों?’’ इंसपेक्टर झाला ने पूछा.

”क्योंकि वह मुझे छोडऩा चाहती थी. कालेज के समय से हमारा रिश्ता था. हम दोनों विवाह करना चाहते थे, पर हम दोनों के ही घर वाले नहीं माने. हम दोनों ने अलगअलग विवाह तो कर लिया, पर एकदूसरे को भुला नहीं सके. संविधा ने हेमंत से इसलिए विवाह किया था, ताकि उसे पति से कभी प्यार न हो.

”उसे हेमंत से कभी प्यार नहीं रहा, पर वह प्यार करने का ऐसा दिखावा करती रही कि हेमंत को कभी उस पर शक नहीं हुआ. हेमंत यही समझता रहा कि उस के कुरूप होने के बावजूद वह उस से बहुत प्यार करती है.

”हम दोनों को मिलने में परेशानी न हो, इसलिए मैं ने हेमंत के घर के पास ही हरियाली सोसायटी में अपने लिए घर खरीदा था. हमें मिलने में परेशानी न हो, इसलिए मैं ने मोनिका से संविधा की दोस्ती करा दी थी.

”लेकिन इधर वह मिलने से कतराने लगी थी. जबकि मैं उस के बगैर अब रह नहीं सकता था. मैं उस से कहने लगा था कि वह हेमंत को छोड़ दे. जबकि उस का कहना था कि बच्चों के लिए वह हेमंत को नहीं छोड़ सकती.

”उस दिन सोसायटी से निकलने के बाद मैं संविधा को अपने नए फ्लैट पर ले गया. हम दोनों वहीं मिलते थे. वहां जब मैं ने उस से साथ आने के लिए कहा तो उस ने मना करते हुए कहा, ‘शरद, अब बहुत हो गया. तुम अपनी पत्नी के पास लौट जाओ.’

”उस की इस बात पर मुझे गुस्सा आ गया. मैं ने उसे बांहों में भर लिया. वह खुद को छुड़ाने लगी. जबकि उस समय मेरी इच्छा उस के साथ सैक्स करने की थी. जिस के लिए वह राजी नहीं थी.

”मैं ने उस के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की. इसी कोशिश में उस का गला दब गया और उस की मौत हो गई. उस के बाद उस की लाश को ले जा कर वहां फेंक दिया, क्योंकि वह जगह सुनसान थी.

”हत्या जैसा अपराध मैं ने कभी किया नहीं, इसलिए मुझे बहुत डर लग रहा था. मैं जल्दी से जल्दी लाश से छुटकारा पाना चाहता था, इसलिए उस के शरीर के सारे गहने उतार कर शहर के बाहर बहने वाले नाले की किनारे की झाडिय़ों में फेंक दिए थे. उस समय वहां बनी झोपडिय़ों में रहने वाले मजदूर काम पर होते हैं. झोपडिय़ों में केवल बच्चे ही रहते हैं.’’

मोनिका, जो अब तक चुप बैठी थी, यह सब सुन कर फूट पड़ी, ”मैं सब जानती थी. पर मैं अपने बच्चों की खातिर चुप रही. संविधा ने मेरा घर तोड़ा, मेरा पति छीना… कुदरत का न्याय देखो, वही मारी गई.’’

इंसपेक्टर झाला ने दोनों को हिरासत में ले लिया. क्योंकि मोनिका ने संविधा की हत्या वाली बात छिपाई थी. थाने से लौटते समय झाला ने कहा, ”हेमंत जोशी को सबूत चाहिए था कि उस की पत्नी उसे छोड़ कर नहीं गई, बल्कि मारी गई. पर शायद यह सच्चाई उस के लिए और ज्यादा दर्दनाक होगी.’’

जयंती ने धीरे से कहा, ”सर, परफेक्ट मर्डर कोई नहीं होता. झूठ चाहे कितना भी सुंदर हो, सच की एक किरण उसे चीर ही देती है.’’

2 हफ्ते बाद हेमंत अपने बच्चों के साथ घर के बाहर खड़ा था. संविधा की तसवीर के आगे दीया जल रहा था. उस की आंखों में आंसू थे, पर चेहरे पर सुकून था. अब उसे किसी जवाब की तलाश नहीं थी, क्योंकि वह जान चुका था कि सच चाहे जितना भयानक हो, सत्य ही सब से बड़ा न्याय है. Suspense Story

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