Bihar Crime Story: कभी बिहार के सीवान में आतंक की बदौलत अपनी सरकार चलाने वाले शहाबुद्दीन के लिए कहा जाता है कि अपराध उन के लिए धंधा नहीं, मनोरंजन था. शायद इसीलिए वहां के लोग उन का नाम लेने से डरते थे. अगर कभी जरूरत पड़ती थी तो लोग उन्हें साहब कहते थे. आज वही साहब अपने किए की सजा जेल में भुगत रहे हैं.
11 दिसंबर, 2015 को सीवान की जिला जेल की विशेष अदालत के बाहर सुबह से ही काफी गहमागहमी थी. जेल परिसर से 300 मीटर की दूरी तक पुलिस फैली हुई थी. शहर में भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे. इस की वजह यह थी कि उस दिन 11 साल पहले सीवान में दिल दहला देने वाले तेजाब कांड का फैसला आने वाला था. इस दोहरे हत्याकांड में सीवान के बाहुबली शहाबुद्दीन प्रमुख अभियुक्त थे.
पीडि़त चंद्रकेशर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू, उन की पत्नी कलावती, अभियुक्तों के घर वाले, तमाम पत्रकार और फोटोग्राफर जेल के बाहर बेचैनी से टहल रहे थे. इस हत्याकांड में सीवान के बाहुबली सांसद शहाबुद्दीन उर्फ शहाबु उर्फ साहब के अलावा 10 अन्य लोग शामिल थे, जिन में से 7 अभियुक्तों के फैसले सुरक्षित रखे गए थे. साढ़े 11 बजे विशेष अदालत के चतुर्थ अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अजय कुमार श्रीवास्तव जेल पहुंचे. विशेष लोक अभियोजक जयप्रकाश सिंह और बचाव पक्ष के वकील अभय कुमार राजन भी समय से पहुंच गए थे. अभियुक्त शहाबुद्दीन और उन के 3 साथी शेख असलम, शेख आरिफ हुसैन उर्फ मुन्ना मियां उर्फ सोनू और राजकुमार साह, जिन्हें सजा सुनाई जानी थी, अदालत के कटघरे में खड़े थे.
इस मामले की सारी काररवाई पहले ही पूरी हो चुकी थी, सिर्फ फैसला सुनाना बाकी था. इसलिए अदालती काररवाई पूरी कर के न्यायाधीश अजय कुमार श्रीवास्तव ने फैसला सुना दिया. विशेष लोक अभियोजक जयप्रकाश सिंह ने पत्रकारों को फैसले की जानकारी देते हुए बताया कि पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन को भादंवि की धारा 302/364ए/201/120बी का दोषी तथा अन्य अभियुक्तों शेख असलम, शेख आरिफ हुसैन उर्फ मुन्ना मियां उर्फ सोनू और राजकुमार साह को भादंवि की धारा 364ए व 323 (फिरौती के लिए अपहरण व मारपीट) का दोषी मानते हुए सभी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है.
जबकि बाकी बचे सातों अभियुक्तों आफताब मियां, मकसूद मियां, झब्बू मियां, अजमेर मियां, नगेंद्र तिवारी, मदन शर्मा उर्फ छोटेलाल शर्मा और कन्हैयालाल का फैसला सुरक्षित रख लिया गया था. फैसला आते ही अभियुक्तों के घर वालों के चेहरे उतर गए. वहीं पीडि़त चंद्रकेश्वर प्रसाद और कलावती की बूढ़ी आंखों में खुशी के आंसू छलक आए. इस फैसले से वे खुश तो थे, लेकिन अभी उन के एक और बेटे की हत्या का फैसला आना बाकी है, जिसे जेल में बंद मोहम्मद शहाबुद्दीन के इशारे पर गोली मार कर हत्या कर दी गई थी.
आखिर 11 साल पहले ऐसा क्या हुआ था, जिस की वजह से सीवान के सांसद शहाबुद्दीन और उन के सहयोगियों को चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू के बेटों की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. छपरा जिले के नटवर सेमरिया में रहते थे चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू. वहां उन का छोटामोटा व्यवसाय था. अपनी छोटी सी गृहस्थी में वह खुश थे. उन के परिवार में पत्नी कलावती के अलावा 6 बच्चे थे, जिन में 2 बेटियां मंजरीरानी, प्रीति और 4 बेटे राजीव रोशन, गिरीशराज उर्फ निक्कू, सतीशराज उर्फ सोनू तथा नितीशराज उर्फ मोनू थे. इन में नितीशराज विकलांग था.
चंद्रकेश्वर प्रसाद ने परिवार सहित छपरा के उस छोटे से गांव से निकल कर सीवान में रहने का मन बना लिया था. इस की वजह यह थी कि सीवान के दरौली थानाक्षेत्र के कुमटी भिटौली के रहने वाले जिन रमाशंकर प्रसाद के यहां उन की ससुराल थी, उन की सिर्फ 3 बेटियां ही थीं. रमाशंकर प्रसाद सीवान में पेशकार थे. रिटायर होने के बाद उन्होंने अपने दूसरे नंबर की बेटी कलावती और उस के पति चंद्रकेश्वर प्रसाद को अपने पास रहने के लिए कुमटी भटौली बुला लिया था. वजह यह थी कि उन की देखभाल के लिए किसी का पास रहना जरूरी था. चंद्रकेश्वर प्रसाद सीवान आए तो उन के ससुर ने उन के लिए वहां के नया बाजार की गल्ला पट्टी में एक दुकान खरीद दी.
उसी में उन्होंने किराना की दुकान खोल ली थी. धीरेधीरे दुकान चल निकली तो चंद्रकेश्वर प्रसाद की गृहस्थी फिर से जम गई. बात सन 1996 की है. चंद्रकेश्वर प्रसाद के पास रुपए इकट्ठा हुए तो उन्होंने सीवान शहर में डहरिया स्टैंड के पास रामनाथ गौड़ से एक कट्ठा 9 धूर जमीन खरीद ली. यह रामनाथ गौड़ का पुराना कटरा था. इस में 7 दुकानें थीं, जो किराए पर उठी हुई थीं. रामनाथ गौड़ ने अपनी यह जमीन और दुकानें इसलिए बेच दी थीं, क्योंकि किराएदार उन्हें समय पर किराया नहीं दे रहे थे. उन में से एक किराएदार नागेंद्र तिवारी ने तो एक दुकान पर कब्जा ही कर रखा था. उन्होंने उस के खिलाफ न्यायालय में मुकदमा भी दायर कर रखा था.
चंद्रकेश्वर प्रसाद ने कटरा खरीदा तो उन्होंने सभी दुकानदारों से दुकानें खाली करने को कहा. 5 दुकानदानों ने तो दुकानें खाली कर दीं, लेकिन नागेंद्र तिवारी ने दुकान खाली नहीं की. चंद्रकेश्वर प्रसाद ने वहां एक और दुकान खोली, बाकी में गोदाम बना दिए. इस दुकान का कामधाम उन का बड़ा बेटा गिरीशराज उर्फ निक्कू देखने लगा. इस दुकान का उद्घाटन उन्होंने सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन और मंत्री अवधबिहारी चौधरी से कराया था. उस समय शहर की और भी बड़ीबड़ी हस्तियां वहां मौजूद थीं.
इस के करीब 4 साल बाद चंद्रकेश्वर ने उस जमीन पर नए सिरे से निर्माण कराने का फैसला किया, लेकिन नागेंद्र तिवारी का कब्जा उन के रास्ते का रोड़ा बन गया. उन्होंने उस से कई बार दुकान खाली करने को कहा, लेकिन वह उन की बात सुन ही नहीं रहा था. नागेंद्र को डर सता रहा था कि कहीं दुकान उस के कब्जे से निकल न जाए. इसी डर की वजह से उस ने साजिश रच कर फरजी कागजात तैयार कराए और वह विवादित दुकान मदन शर्मा को बेच दी. इस से वह दुकान मदन शर्मा के कब्जे में आ गई.
मदन शर्मा मोटर मैकेनिक था. लेकिन उस के संबंध शहर के बड़ेबड़े दबंगों से थे. शहाबुद्दीन का तो वह खास चेला था. चंद्रकेश्वर प्रसाद को जब पता चला कि नागेंद्र तिवारी ने दुकान मदन शर्मा को बेच दी है और उस ने दुकान पर कब्जा कर लिया है तो उन्होंने दुकान पर अपना ताला लगा दिया. मदन को यह बात बहुत खराब लगी. अगस्त, 2004 के पहले सप्ताह में चंद्रकेश्वर प्रसाद के पास फोन आया कि वह दुकान का ताला खोल दें, वरना अंजाम बहुत बुरा होगा. धमकी के अगले दिन इस का नतीजा भी सामने आ गया. मदन शर्मा करीब आधा दरजन लोगों को साथ ले कर चंद्रकेश्वर प्रसाद की दुकान पहुंच ॒या और चाबी मांगने लगा.
चंद्रकेश्वर प्रसाद ने चाबी देने से मना किया तो उस ने जबरदस्ती चाबी छीन ली और जा कर दुकान खोल ली. मदन शर्मा ने कहा कि अगर दुकान नहीं देना चाहते तो उसे 2 लाख रुपए दें. यह साहब (सांसद शहाबुद्दीन) का हुक्म है. साहब यानी शहाबुद्दीन का नाम सामने आया तो चंद्रकेश्वर प्रसाद को लगा, अब उन का काम आसान हो गया, क्योंकि उन्होंने ही उन की दुकान का उद्घाटन किया था. उन दिनों शहाबुद्दीन सीवान जेल में बंद थे. 12 अगस्त, 2004 को चंद्रकेश्वर प्रसाद शहाबुद्दीन से मिलने सीवान जेल पहुंचे और पूरी बात बता कर कहा कि वह न दुकान छोड़ेंगे और न 2 लाख रुपए देंगे. दुकान किराए पर दे सकते हैं, इस पर शहाबुद्दीन ने नाराज हो कर उन्हें भगा दिया.
चंद्रकेश्वर प्रसाद शहाबुद्दीन के पास से अपना सा मुंह ले कर वापस आ गए. घर में तय हुआ कि वह न रुपए देंगे और न दुकान छोड़ेंगे. 2 दिनों बाद 14 अगस्त की सुबह पता चला कि चंद्रकेश्वर प्रसाद के पटना वाले भाई के यहां बेटा पैदा हुआ है. घर में पत्नी और बेटे थे ही, वह भाई के पास पटना चले गए. तब क्या पता था कि उन के लौटने तक यहां कयामत आ जाएगी. उन के जाने के 2 दिनों बाद यानी 16 अगस्त की सुबह करीब 10 बजे मदन शर्मा आफताब, झब्बू मियां, राजकुमार साह, शेख असलम, मोनू उर्फ आरिश हुसैन, मसकूद मियां को साथ ले कर चंद्रकेश्वर प्रसाद की दुकान पर पहुंचा. दुकान पर उस समय राजीव रोशन उर्फ बंटू और सतीश राज उर्फ सोनू मौजूद थे. राजीव ने सभी को इज्जत के साथ बैठा कर चायपानी पिलाया.
चायपानी के बाद जब इन लोगों ने 2 लाख रुपए मांगे तो राजीव को लगा बात बिगड़ सकती है. चालाकी से उस ने मामले को निपटाने की गरज से कहा कि इस समय वह ज्यादा से ज्यादा 25 हजार रुपए दे सकता है. उस के पास इस से ज्यादा पैसे नहीं हैं. उस ने इतना ही कहा था कि आफताब ने उसे ऐसा थप्पड़ मारा कि राजीव की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. इस के बाद तो उस की लाठीडंडों, लातजूते से पिटाई होने लगी.
भाई को पिटता देख कर सतीश डर गया और रोने लगा. भाई को कैसे बचाए, उस की समझ में नहीं आ रहा था. वह भाग कर गोदाम में गया तो वहां बोतल में भर कर रखे टौयलेट साफ करने वाले तेजाब पर उस की नजर पड़ी. एक बोतल तेजाब ले कर वह वापस लौटा और उसे प्लास्टिक के एक मग में डाल कर भाई को पीट रहे बदमाशों को लक्ष्य बना कर हवा में उछाल दिया. इस के छींटें बदमाशों पर भी पड़े और राजीव पर भी. तेजाब की जलन से बदमाशों की पकड़ ढीली पड़ी तो वह भाग कर एक मकान के पीछे छिप गया. इस के बाद बदमाशों ने सतीश को पकड़ लिया और बोलेरो में डाल कर गए.
इस बात की जानकारी जेल में बंद सांसद शहाबुद्दीन को हुई तो उन्होंने फरमान जारी कर दिया कि सभी को उठा लो. अब तेजाब का बदला तेजाब से ही लिया जाएगा. शहाबुद्दीन का फरमान जारी होते ही उन के गुर्गों ने राजीब की तलाश शुरू कर दी. राजीव जब नहीं मिला तो चंद्रकेश्वर प्रसाद का बड़हरिया स्थित गोदाम लूट लिया गया और पूरे कटरे में आग लगा दी गई. इस के बाद वे चंद्रकेश्वर की दुकान पर पहुंचे. जहां गिरीश बैठा मिल गया. गिरीश कुछ समझ पाता, इस से पहले ही शहाबुद्दीन के लोगों ने उसे खींच कर मोटरसाइकिल पर बैठाया और ले कर चले गए.
शहाबुद्दीन के आदमी सतीश और गिरीश का अपहरण कर के ले जा रहे थे तो संयोग से रामराज मोड़ के पास राजीव भी मिल गया. उन लोगों ने उसे भी पकड़ लिया और तीनों को शहाबुद्दीन के गांव प्रतापपुर ले गए. तीनों भाइयों को एक कमरे में बंद कर दिया गया. रात को जेल में बंद शहाबुद्दीन प्रतापपुर पहुंचे तो राजीव, गिरीश और सतीश को उन के सामने पेश किया गया. शहाबुद्दीन ने राजीव को एक किनारे खड़ा कर दिया. उन्होंने गिरीश और सतीश को एक साथ खड़ा कराया. इस के बाद तेजाब से भरे 2 बड़े गैलन ला कर वहां रख दिए गए. राजीव की आंखों के सामने ही शहाबुद्दीन के कहने पर दोनों गैलन का तेजाब गिरीश और सतीश के ऊपर उड़ेल दिया गया. तेजाब की जलन से तड़पतड़प कर दोनों भाइयों ने दम तोड़ दिया.
शहाबुद्दीन ने राजीव को इसलिए जिंदा रखा कि जब उस का बाप आएगा और बड़हरिया वाली जमीन की रजिस्ट्री करेगा, तब उसे छोड़ा जाएगा. गिरीश और सतीश की लाशों को ईंटभट्ठे की चिमनी के हवाले कर दिया गया, जिस में वे जल कर स्वाहा हो गईं. शहाबुद्दीन वापस जेल चले गए. राजीव के दोनों हाथ बांध कर उसे कमरे में बंद कर के उन के आदमी वापस चले गए. रात को बेटे घर नहीं आए तो कलावती परेशान हुईं. चंद्रकेश्वर प्रसाद भी नहीं थे जो पता करते कि बच्चे घर क्यों नहीं आए. अगले दिन जब चंद्रकेश्वर प्रसाद के बेटों की निर्मम हत्या की दबी जुबान से चर्चा होने लगी तो मुसाफिर चौधरी खुल कर शहाबुद्दीन के विरोध में उतर आए. इस पर शहाबुद्दीन के गुरगों ने गोली मार कर उन की हत्या कर दी.
बेटों की हत्या की खबर पटना गए चंद्रकेश्वर प्रसाद को मिली तो वह सन्न रह गए. वह सीवान लौटे तो सचमुच उन की दुनिया उजड़ चुकी थी. कलावती की ओर से थाना मुफस्सिल में नागेंद्र तिवारी और मदन शर्मा के खिलाफ तहरीर दी गई. इस पर अपराध संख्या 131/2004, पर भादंवि की धारा 341, 323, 380, 435, 364/34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. पुलिस ने जब इस मामले की जांच की तो इस कांड में मदन शर्मा और नागेंद्र तिवारी के साथसाथ सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन, राजकुमार साह, शेख असलम, मोनू उर्फ सोनू उर्फ आरिफ हुसैन, आफताब मियां, मकसूद मियां, झब्बू मियां और अजमेर मियां शामिल पाए गए. घटना को सांसद शहाबुद्दीन की शह पर अंजाम दिया गया था.
मदन शर्मा और नागेंद्र तिवारी के साथ मुकदमे में इन नामों को भी जोड़ दिया गया. 6 सालों बाद अचानक राजीव घर लौटा, तो उसे जिंदा देख कर घर वाले दंग रह गए. उस ने मांबाप को बताया कि वह शहाबुद्दीन और उस के गुरगों के डर से छिप कर रह रहा था. यही नहीं, उस ने दोनों भाइयों की सांसद शहाबुद्दीन की शह पर अपने सामने दर्दनाक मौत देने की बात बताई तो मांबाप का कलेजा कांप उठा.
राजीव राज को अदालत में पेश कर के बयान दिलाया गया तो साफ हो गया कि दिल दहला देने वाली इस घटना को शहाबुद्दीन की शह पर अंजाम दिया गया था. राजीव के बयान के आधार पर विशेष अदालत ने इस मुकदमे में 4 जून, 2010 को भादंवि की धारा 120बी और 364ए भी जोड़ दी. बाद में पटना हाईकोर्ट के आदेश पर 1 मई, 2014 को इस मामले में भादंवि की धारा 302, 201 और 120बी के अंतर्गत मुकदमा चलाए जाने का आदेश हुआ.
राजीव ही एकमात्र पूरी घटना का चश्मदीद गवाह था. उस के इस तरह जिंदा वापस आने और बयान देने से शहाबुद्दीन की नींद उड़ी हुई थी. आखिरकार वही हुआ, जिस का सभी को डर था. 16 जून, 2014 को राजीव की गोली मार कर हत्या कर के रास्ते का कांटा साफ कर दिया गया. मोहम्मद शहाबुद्दीन, उस के बेटे ओसामा और अज्ञात के खिलाफ थाना सीवान नगर में राजीव की हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया. आगे क्या हुआ, यह जानने से पहले आइए थोड़ा पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन के बारे में जान लें, जिसे कभी बिहार के मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव एके 47 कहते थे और अपना दाहिना हाथ बताते थे.
48 वर्षीय मोहम्मद शहाबुद्दीन मूलरूप से सीवान के थाना हुसैनगंज के गांव प्रतापपुर के रहने वाले हैं. उन के पिता का नाम मोहम्मद हसीबुल्लाह था. शरारती और उद्दंड शहाबुद्दीन में बचपन से ही किसी चीज को पाने की सनक पैदा हो जाती तो वह उसे पा कर ही दम लेता था. शहाबुद्दीन के पिता हसीबुल्लाह एक वेंडर थे. परिवार बड़ा था, जबकि घर में कमाने वाला सिर्फ एक था. इसलिए सब की जरूरतें पूरी नहीं होती थीं. अपनी जरूरतों को पूरी करने के लिए छोटेमोटे अपराध करते हुए शहाबुद्दीन बड़ा हुआ, लेकिन पढ़ाई में वह ठीक था. उस ने राजनीति विज्ञान में एमए और पीएचडी की. इस के बाद हिना शहाब से उस का निकाह हुआ. इस समय उन के मोहम्मद ओसामा नाम का एक बेटा और 2 बेटियां हैं.
शहाबुद्दीन 18 साल का था, तभी से अपराध की राह पर चल पड़ा था. थाना सीवान में 6 मई, 1985 को उस के नाम पहला मुकदमा दर्ज हुआ. इस के 4 दिनों बाद ही हत्या के प्रयास, आर्म्स एक्ट और अन्य कई मामले भी दर्ज हुए. एक बार अपराध की डगर पर पांव पड़ा, तो फिर उस ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. अपराध की दुनिया में शहाबुद्दीन नाम का सिक्का चला तो वह अपराधियों की आंखों का तारा बन गया. धनबाद के कोयला माफिया और तत्कालीन बाहुबली विधायक सूर्यदेव सिंह ने उसे अपने यहां पनाह दी. सूर्यदेव सिंह का साथ छोड़ने के बाद लोजपा के विधायक रामा सिंह के साथ जुगसलाई थानाक्षेत्र में तिहरा हत्याकांड में उस का नाम आया तो वह सुर्खियों में आ गया.
सन 1987 से 1990 तक शहाबुद्दीन ने झारखंड के कोयलांचल में काम किया. उस के बाद सीवान लौट कर अपना एक गैंग बनाया. इस के बाद तो शहाबुद्दीन के नाम से सीवान की जनता कांपने लगी. जब हद हो गई तो शहाबुद्दीन को गिरफ्तार कर लिया गया. जेल में रहते हुए उन्होंने 1989 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीते. अब वह अपराधी से माननीय बन गए. इस के बाद तो उन की ताकत दोगुनी हो गई. सन 1995 में वह जनता दल के टिकट से जीरादेई से विधानसभा का चुनाव जीते. हत्या और अपराध के क्षेत्र में नाम कमा कर 1996 में वह सांसद चुने गए. इस के बाद लालूप्रसाद यादव ने उन्हें अपनी पार्टी में शामिल किया. लेकिन उसी बीच मुन्ना चौधरी के अपहरण से पूरा सीवान इलाका हिल गया.
सीवान के थाना मुफस्सिल में सांसद शहाबुद्दीन सहित कई लोगों के खिलाफ अवध चौधरी ने अपने बेटे मुन्ना चौधरी के अपहरण और हत्या का मुकदमा दर्ज कराया था. उन्होंने हिम्मत कर के सांसद शहाबुद्दीन के खिलाफ मुकदमा तो दर्ज करा दिया, लेकिन हुआ वही, जिस का डर था. अंत में शहाबुद्दीन के डर से वह वही करने को तैयार हो गए, जो वह चाहते थे. अवध चौधरी और उन की पत्नी चंबा देवी ने दिल पर पत्थर रख कर सांसद शहाबुद्दीन के पक्ष में गवाही दी. इस तरह मांबाप की गवाही से मुन्ना के अपहरण और हत्या का मुकदमा कमजोर हो गया.
लेकिन यह भी सच है कि पाप का घड़ा एक न एक दिन भर कर फूट जाता है. शहाबुद्दीन के पापों का भी घड़ा भर गया था. आखिर उन्हें सीवान के छोटेलाल साह के अपहरण के मामले में आजीवन करावास की सजा हुई. वह जेल भेज दिए गए. शहाबुद्दीन के जेल जाते ही उन के सताए लोग सीना तान कर पुलिस के सामने आ गए. मुन्ना चौधरी के मांबाप और गवाह शहाबुद्दीन के खिलाफ गवाही देने को तैयार हो गए शहाबुद्दीन के खिलाफ गवाहों को दोबारा गवाही देने की हिम्मत राजकुमार शर्मा ने दिखाई. राजकुमार शर्मा मुन्ना चौधरी का अजीज दोस्त था. वह उसी के गांव में रहता था. जिस समय मुन्ना का अपहरण हुआ था, उस समय वह भी उस के साथ था. शहाबुद्दीन के गुरगों ने उसे भी पकड़ना चाहा था, लेकिन वह भागने में कामयाब हो गया था.
लेकिन शहाबुद्दीन भी राजकुमार शर्मा के पीछे हाथ धो कर पड़ गए थे. उस समय बिहार में राजद यानी लालू प्रसाद की सरकार थी. शहाबुद्दीन को उन का दाहिना हाथ माना जाता था. लालू प्रसाद की सरकार पर दबाव डाल कर उन्होंने राजकुमार शर्मा पर 25 हजार रुपए का ईनाम घोषित करवा दिया. हालांकि विपक्षियों ने इस का घोर विरोध किया, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ. राज्य में जनता दल (युनाइटेड) की सरकार बनी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बने तो शहाबुद्दीन की उलटी गिनती शुरू हो गई, क्योंकि वह उन की आंखों में कांटे की तरह चुभते थे. उन पर पुलिस और अदालत का शिकंजा कसने लगा. मौके का फायदा राजकुमार ने उठाया और सरकारी गवाह बन गया. उसे सरकारी गवाह बनाने में सीवान के अनुमंडल आरक्षी उपाधीक्षक सुधीर कुमार ने अहम भूमिका निभाई.
अवध चौधरी के बयान के बाद शहाबुद्दीन के साथियों रामा चौधरी, मनोजदास, जवाहर चौधरी, मुन्नू चौधरी और पप्पू श्रीवास्तव के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था. यही नहीं, 2 बार बयान दर्ज कराने के बाद अवध चौधरी को धमकी भी मिली थी. यह धमकी सियाड़ी मठिया निवासी मुखिया हरेंद्र चौधरी और गोपालगंज जिले के बरी निवासी अजय चौधरी ने विशुनपुरा निवासी हरेराम चौधरी के जरिए दिलाई थी. हरेराम चौधरी शहाबुद्दीन के खासमखास थे. पुलिस ने धमकी देने पर तीनों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के गिरफ्तार कर लिया था. पूछताछ के बाद तीनों को जेल भेज गया था.
शबाहुद्दीन को जिस छोटेलाल साह के अपहरण में आजीवन कारावास की सजा हुई थी, वह मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माले) का कार्यकर्ता था. सीवान के थाना असंवा के नोनिया टोला निवासी दीनानाथ साह के 35 वर्षीय बेटे छोटेलाल साह को शहाबुद्दीन ने 2 मई, 1999 की शाम साढ़े 3 बजे आंदर ढाला के पास उस समय अगवा कर लिया था, जब वह शीतल पासवान के साथ अपने घर जा रहा था. शहाबुद्दीन उस से इसलिए नाराज था, क्योंकि उस ने लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी के पक्ष में प्रचार तो किया ही, मतगणना केंद्र पर माले एजेंट के रूप में शहाबुद्दीन का विरोध भी किया था. जब इस की जानकारी शहाबुद्दीन को मिली तो उन्होंने उसे सबक सिखाने के लिए उस का अपहरण कर लिया था. आज तक उस का पता नहीं चला है.
छोटेलाल साह के अपहरण के 8 साल बाद जो फैसला आया, उस में सत्र न्यायाधीश ज्ञानेश्वर श्रीवास्तव ने शहाबुद्दीन को आजीवन कारावास के साथ 10 हजार रुपए आर्थिक दंड की सजा भी सुनाई थी. जब बिहार का डीजीपी डी.पी. ओझा को बनाया गया तो उन्होंने शहाबुद्दीन के अपराध की सभी फाइलों को इकट्ठा कर 30 जुलाई, 2003 को गिरफ्तारी का आदेश जारी कर दिया. आदेश होते ही वह फरार हो गए. 12 अगस्त, 2003 को उन्होंने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया लेकिन इस का परिणाम अच्छा नहीं आया. डीजीपी ओझा को पद से हटा दिया गया.
31 मार्च, 2007 को दिनदहाड़े एक ऐसी घटना घटी, जिस ने सीवान को ही नहीं, पूरे बिहार को हिला कर रख दिया था. हुआ यह कि उस दिन सीवान के अति व्यस्त क्षेत्र तीनमुहाने पर स्थित लोकनायक जयप्रकाश की प्रतिमा के ठीक सामने कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी लेनिनवादी (लिबरेशन) के 2 कामरेड युवा नेता चंद्रशेखर और श्यामनारायण बिहार में फैली अराजकता और हिंसा के खिलाफ 2 अप्रैल, 2007 को बिहार बंद के पक्ष में नुक्कड़ सभा कर रहे थे. दोपहर का समय था. वहां हजारों की भीड़ जमा थी.
उसी समय अत्याधुनिक हथियारों से लैस गाडि़यों से कुछ बदमाश आए और चंद्रशेखर तथा श्यामनारायण को गोलियों से छलनी कर दिया. बदमाशों के भागते समय एक रिक्शाचालक भूटाली मियां सामने आ गया, तो बदमाशों ने उसे भी गोलियों से भून दिया. इस के बाद भाकपा माले लिबरेशन के सीवान जिला प्रभारी रमेश सिंह कुशवाहा ने शहाबुद्दीन और उन के साथियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया. इस मामले में भी शहाबुद्दीन को उम्रकैद की सजा हुई है. सत्ता बदलते ही शहाबुद्दीन का आतंक खत्म होता गया. सजा होने की वजह से वह सन 2009 का चुनाव भी नहीं लड़ पाए. अपनी जगह उन्होंने पत्नी हिना शहाब को चुनाव लड़ाया, लेकिन लोगों ने उसे नकार दिया और नतीजा यह निकला कि हिना चुनाव हार गईं.
तेजाब हत्याकांड में काल डिटेल्स, शहाबुद्दीन के अपराधों और राजीवराज रोशन की गवाही पर शहाबुद्दीन को भादंसं की धारा 302, 201, 364ए व 120बी का दोषी पाया गया था. अन्य अभियुक्तों राजकुमार साह, आरिफ और शेख असलम को भादंसं की धारा 302 व 201 से मुक्त करते हुए अपहरण का दोषी माना गया था. इस के अलावा इस मामले के बाकी 7 अभियुक्तों का फैसला सुरक्षित रखा गया है. उन का फैसला आगामी दिनों में सुनाया जाएगा.
सजा पाए शहाबुद्दीन के अधिवक्ता अभय कुमार राजन का कहना है कि हम इस फैसले के खिलाफ पटना हाईकोर्ट में अपील करेंगे. हमें उम्मीद है कि वहां से हमें न्याय मिलेगा. इस मामले में सच्चाई यह है कि शहाबुद्दीन 13 अगस्त, 2003 से जेल में बंद थे. घटना वाले दिन वह बाहर कैसे आ गए. अगर इस मामले में शहाबुद्दीन दोषी हैं तो जेल प्रशासन भी बराबर का दोषी है. जबकि जेल प्रशासन का कहना है कि शहाबुद्दीन जेल से बाहर नहीं गए थे. ऐसे में उन्होंने घटना को अंजाम कैसे दिया? इस के साथ पैसे मांगने वाली काल डिटेल्स भी पूरी नहीं है.
अपने 3 बेटों को खोने वाले चंद्रकेश्वर प्रसाद का कहना है कि उन का तो वैसे भी सब कुछ लुट चुका है. अब उन के पास बरबाद होने को बचा ही क्या है. लेकिन शहाबुद्दीन और उन के साथियों को सजा मिलने से सुकून जरूर मिला है.
कहा जाता है कि शहाबुद्दीन के लिए अपराध धंधा नहीं, बल्कि मनोरंजन भी था. किसी की हत्या करने में उन्हें मजा आता था. बिहार के सीवान में आतंक की बदौलत उन की अपनी सरकार चलती थी. आतंक इतना था कि लोग उन का नाम लेने में डरते थे. पहली बात तो कोई उन का नाम लेना ही नहीं चाहता था. अगर जरूरत भी पड़ती तो नाम लेने के बजाय साहब कहता था. आज वही साहब अपनी करनी की सजा जेल की सलाखों के पीछे भुगत रहा है. कानून को अपनी जागीर समझने वालों का अंत में यही हश्र होता है. Bihar Crime Story
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित






