Emotional Story Hindi: कहीं रेगिस्तान तो कहीं बर्फ ही बर्फ, कहीं पहाड़ तो कहीं जंगल, ऐसी दुर्गम जगहों पर देश की सुरक्षा में तैनात सैनिकों के जज्बे के बारे में हम कहसुन या पढ़ तो सकते हैं, लेकिन उन की हिम्मत और परेशानियों को सही मायनों में माप नहीं सकते. शहीद लांसनायक हनुमंथप्पा और उन के साथियों की शहादत से लोगों को यह पता चल गया है कि हमारे सैनिकों में मौत से लड़ने का अद्भुत जज्बा होता है.

एवरेस्ट से थोड़ी कम ऊंचाई पर बर्फ की एक ऐसी बेजान दुनिया बसी है, जहां का आसमान तो क्या, जमीन भी इंसानी जिंदगी की दुश्मन है. यह जमीन तो क्या हिम का ऐसा सैलाब है, जिस पर प्रशिक्षित हिमयोद्धा ही चलनेफिरने की हिम्मत कर सकते हैं. 3 फरवरी, 2016 की सुबह ऐसे ही 10 योद्धाओं की एक टीम के सभी सदस्य इग्लूनुमा फाइबर प्लास्टिक के बने शिविर में अपनेअपने आर्कटिक स्लीपिंग बैगों में घुसे यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि खतरा टल गया है या नहीं?

दरअसल, इस टीम को पहली फरवरी को सूचना मिली थी कि एवलांच (बर्फीला तूफान) आने वाला है. तब यह टीम 19,500 फुट की ऊंचाई पर स्थित सोनम पोस्ट पर थी, जो माउंट एवरेस्ट के कैंप-2 के बराबर ऊंचा है. यहां पर एवलांच के खतरे के बारे में दिन में 3 बार सूचना फ्लैश की जाती है. फरवरी की पहली तारीख शांति से गुजर गई थी. वही स्थिति 2 फरवरी की भी रही.

सोनम चौकी पर तैनात भारतीय सेना के जवानों में थे हवलदार एलुमलाई एम., लांस हवलदार एस. कुमार, लांसनायक हनुमंथप्पा कोप्पड़, सुधीश बी, सिपाही मुश्ताक, ए. सूर्यवंशी, महेश पी.एन., रामामूर्ति एन. और गणेशन. इन 9 हिमयोद्धाओं के ऊपर ट्रुप लीडर के रूप में जेसीओ सूबेदार नागेशा टी.टी. थे. इन सभी का संबंध 19 मद्रास बटालियन से था. जहां पर इन की तैनाती थी, वह सोनम पोस्ट चर्चित बानाटौप के दाईं ओर थोड़ा नीचे की ओर है. चेतावनी के बावजूद इन सैनिकों को खतरे का सामना करने की नौबत नहीं आई थी. इन लोगों ने 2 और 3 फरवरी की रातें बातें करते हुए गुजारीं. अन्य पोस्टों के रेडियो सैट पर भी औपरेटरों से इन की बातें होती रहीं. बातों के दौरान वे उन्हें अपने बारे में बताते भी रहे.

3 फरवरी का सूरज निकलने में बस घंटे भर की देरी थी, वक्त 5 और 6 बजे के बीच का रहा होगा, तभी एक बर्फीला तूफान उठा और देखतेदेखते इस इलाके को गहराई तक अपनी चपेट में ले लिया. बर्फीले तूफान के रूप में 800×600 मीटर की बर्फीली दीवार ने 1000×800 मीटर के क्षेत्र को पूरी तरह से ढक लिया, जिस से सोनम पोस्ट के ऊपर अच्छीखासी ऊंचाई वाली बर्फ की परत जम गई. साढ़े 5 घंटे तक इस हादसे की किसी को कोई खबर नहीं लगी. दिन के साढ़े 10 बजे काजीरंगा पोस्ट का रेडियोसेट घनघनाया तो उस पर लांसनायक हनुमंथप्पा की आवाज उभरी कि उन की पूरी टुकड़ी बर्फ के नीचे दब गई है. यह संदेश मिलते ही काजीरंगा पोस्ट पर मौजूद अधिकारी ने एवलांच रिकवरी टीम को सोनम की ओर रवाना कर दिया.

एक औफिसर की निगरानी में 10 सदस्यों वाली यह टीम जब निर्धारित स्थान पर पहुंची तो उन्हें वहां बर्फ के ऊंचेऊंचे टीलों के सिवाय और कुछ दिखाई नहीं दिया. जाहिर था कि सोनम पोस्ट बर्फ के नीचे दब गई थी. खतरे की बात यह थी कि हिमनद पर गिरने की वजह से बर्फ कंक्रीट से भी ज्यादा सख्त होती जा रही थी. स्थिति देख कर एआरटी (एवलांच रिकवरी टीम) के अधिकारी ने तत्काल कुमार पोस्ट पर मौजूद अपने कमांडिंग औफिसर को इस हादसे की सूचना दी. अपने बौस 102 ब्रिगेड के कमांडर को सूचित करने के बाद अविलंब वह भी घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. इस के बाद तो आसपास की अन्य तमाम पोस्टों के एआरटी के अधिकारी अपनीअपनी टीमों और जरूरी सामान के साथ उस ओर चल पड़े.

सियाचिन पर तैनात हर फौजी के पास एवलांच ट्रैकर होता है. इस छोटे से यंत्र में भगवा रंग की फ्लोरोसेंट तार लगी होती है, जो एक बटन के दबाने से इस तरह की तीखी रोशनी फेंकती है कि बर्फ के ऊपर काफी दूर तक वह अपनी झलक दे जाती है. इस से यह पता चल जाता है कि बर्फ के नीचे दबा आदमी किस दिशा में और कितनी गइराई पर है. लेकिन यहां इस की भी झलक नहीं मिल रही थी. इसी वजह से यह पता लगाना कठिन हो रहा था कि सैनिक कहां दबे हैं. लांसनायक हनुमंथप्पा ने भी न तो दोबारा रेडियो तरंगों के जरिए संपर्क किया था और न ही काफी प्रयासों के बाद उन से संपर्क हो पा रहा था. समय अधिक होने के साथ बर्फ में दबे जवानों की जिंदगी खतरे में थी.

रिकवरी टीम के सदस्यों ने मशीनों से बर्फ काटनी शुरू कर दी थी. बर्फ काटतेकाटते दिन के साढ़े 3 बजे बचाव दल के हाथ टेलीफोन की एक तार लगी. टैक्निकल एक्सपर्ट्स को बुलवा कर उस तार में बिजली का करंट प्रवाहित कर के पीडि़तों तक पहुंचने की कोशिश की गई. लेकिन इस से भी कोई सफलता नहीं मिली. हादसा हुए करीब 10 घंटे हो गए थे. ऐसे में किसी जवान के जीवित बचे होने की उम्मीद किसी को नहीं रह गई थी. लेकिन यह सोच कर खुदाई का काम जारी था कि जवानों की लाशें ही बरामद हो जाएं.

आखिर शाम 6 बजे जैसे चमत्कार सा हुआ. एक रेडियो सेट पर एक बार फिर लांसनायक हनुमंथप्पा की आवाज उभरी. टैक्निकल विशेषज्ञों ने बताया कि आवाज 35 फुट की गहराई से आई थी. लेकिन हनुमंथप्पा ने अपना नाम बताने के अलावा और जो कुछ भी कहा था, वह किसी की समझ में नहीं आया था. बचाव टीम ने बचाव कार्य और तेजी शुरू किया. इस काम में 150 लोग तो लगे ही थे, 2 स्निफर डौग्स मीशा एवं डौट भी इधरउधर घूम कर खोज में लगे थे. अब तक शाम का धुंधलका छाने लगा था.

उस स्थिति में सर्च अभियान चलाना कठिन हो जाता, जबकि इसे लगातार जारी रखना जरूरी था. इस के लिए मशाल जला कर रोशनी की व्यवस्था करने के लिए चेतक हेलीकौप्टर से भारी मात्रा में कैरोसिन मंगवा लिया गया. सर्च अभियान दिनरात लगातार चलता रहा. बचाव टीम में 50 लोगों को और बढ़ा दिया गया. देखतेदेखते दुर्घटना को 5 दिन गुजर गए. 8 फरवरी, 2016 को यानी दुर्घटना के छठवें दिन शाम के 5 बजे अचानक रेडियो सेट पर हलकी सी एक मानवीय सिसकारी उभरी. तेजी से खुदाई शुरू कर दी गई. करीब 2 घंटे की लगातार खुदाई के बाद शाम करीब साढ़े 7 बजे हनुमंथप्पा जीवित अवस्था में बचाव टीम के हाथ लग गए.

उस समय उन की सांसें पूरी तरह से उखड़ी हुई थीं. लग रहा था कि उन के शरीर का पानी खत्म हो चुका है. लेकिन बचाव टीम को देखते ही जैसे उन की आंखों में चमक आ गई थी. हिम स्खलन के चलते कंक्रीट जैसी जमी बर्फ में 6 दिनों तक दबे रहने के बाद लांसनायक हनुमंथप्पा का उस समय तक जीवित रहना किसी चमत्कार से कम नहीं था. अन्य 9 जवानों की तलाश जारी रखते हुए हनुमंथप्पा को वहां उपलब्ध प्राथमिक चिकित्सा देने के बाद विशेष मैडिकल सुविधाओं वाले विमान से दिल्ली स्थित रिसर्च एंड रेफरल आर्मी अस्पताल में भरती करवा दिया गया. तब तक वह कोमा में चले गए थे, जिस की वजह से उन्हें वैंटीलेटर पर रखा गया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अस्पताल पहुंच कर उन का हालचाल जाना और डाक्टरों को विशेष निर्देश दिए कि उन के इलाज में कहीं कोई कमी नहीं रहनी चाहिए. हनुमंथप्पा के अन्य 9 साथी जीवित नहीं निकल सके थे. उन के जिंदा मिलने के कुछ समय बाद उन सभी के शव बरामद कर लिए गए थे. दिल्ली में 9 फरवरी को आर्मी अस्पताल की ओर से बताया गया कि लांसनायक हनुमंथप्पा की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है. लांसनायक हनुमंथप्पा का एक ऐसा अनोखा मामला था, जिस ने सभी देशवासियों को झकझोर कर तो रख ही दिया था, उन से भावनात्मक रूप से जुड़ कर सभी उन के लिए प्रार्थना कर रहे थे.

लेकिन अगले दिन हनुमंथप्पा के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया. इस खबर के बाहर आते ही लोग उन की सलामती के लिए दुआएं मांगने लगे. तमाम शहरों में प्रार्थना सभाएं की जाने लगीं. इलाहाबाद में छात्रों ने हाथों में मोमबत्तियां ले कर प्रार्थनाएं कीं. लेकिन न किसी की कोई दुआ काम आई और न डाक्टरों की कोशिश. एक अद्भुत इतिहास रच कर 11 फरवरी, 2016 को दिन के पौने 12 बजे 33 वर्षीय यह महान सैनिक दिल्ली के सैन्य अस्पताल में जिंदगी की जंग हार गया. इस दर्दनाक खबर से हनुमंथप्पा के गांव में शोक की लहर दौड़ गई. हर तरफ गमगीन माहौल बन गया. हनुमंथप्पा के घर पर उन के रिश्तेदारों, परिचितों, गांववासियों और मीडियाकर्मियों का जमावड़ा लग गया.

उत्तरी कर्नाटक के धारवाड़ जिले के गांव बेतादुर निवासी हनुमंथप्पा का बचपन निहायत गरीबी में बीता था. वह पढ़ने के लिए रोजाना 6 किलोमीटर पैदल चल कर स्कूल जाते थे. पढ़ाई के साथ उन्हें खेलकूद का भी शौक था, खासकर लंबी और तेज दौड़ लगाने का. गांव के कई युवक सेना में नौकरी करते थे. वे छुट्टी पर घर आते तो फौजी जीवन के रोमांचक किस्से सुनाया करते, जिन्हें सुन कर हनुमंथप्पा का मन भी सेना में भरती होने को होता. हाईस्कूल पास करने के बाद उन्होंने सेना में भरती होने की कोशिश शुरू की. 3 कोशिशों में वह असफल रहे, फिर भी हार नहीं मानी. आखिर चौथे प्रयास में उन्हें सफलता मिल गई. सेना में सिपाही के रूप में भरती हो कर हनुमंथप्पा ने 25 अक्तूबर, 2002 को मद्रास रेजीमेंट की 19वीं बटालियन जौइन कर ली.

शुरुआत से ही उन्होंने चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में जाना पसंद किया. सन 2003 से 2006 तक वह जम्मूकश्मीर के माहौर इलाके में तैनात रहे, जहां उन्होंने आतंकवादियों के खिलाफ चलाए गए विभिन्न अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई. इस के बाद 54 राष्ट्रीय राइफल्स (मद्रास) में जाने को तरजीह दी, जहां वह सन 2010 तक रहे. यहां भी उन्होंने आतंकियों के विरुद्ध अपने अद्भुत साहस और अनूठी वीरता का परिचय दिया. सन 2010 से 2012 के मध्य डैमोक्रेटिक फ्रंट औफ बोडोलैंड एवं यूनाइटेड लिबरेशन औफ असम के खिलाफ छिड़े अभियान में हिस्सा लिया. दिसंबर, 2015 से वह सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात रहे.

अब तक प्रोन्नति पा कर वह लांसनायक बन चुके थे. विशेषज्ञों की राय के अनुसार, एवलांच का शिकार हुए शख्स को 15 मिनट के भीतर बर्फ से निकाल कर गरम जगह पर पहुंचा कर उस का उपचार शुरू कर दिया जाता है. तब उन में से 92 प्रतिशत लोगों के बच जाने की संभावना होती है, जबकि 35 मिनट बाद निकाले गए लोगों में 27 प्रतिशत जीवित बचते देखे गए हैं. इस के बाद किसी के बच पाने की संभावना बहुत ही कम हो जाती है और मौत से ठीक 10 मिनट पहले दिमाग पूरी तरह काम करना बंद कर देता है. लांसनायक हनुमंथप्पा का 35 फुट बर्फ के नीचे से 5 दिनों बाद जिंदा निकल आना सब को हैरान करने के साथ जीवटता का एक अलग इतिहास रच गया है.

6 हजार मीटर की ऊंचाई पर माइनस 45 डिग्री के तापमान में 8 मीटर बर्फ के नीचे 6 दिनों तक दबे रहने के बाद किसी इंसान के जीवित निकल आने वाले इस मामले ने पूरी दुनिया को न केवल हैरान कर दिया है, बल्कि यह सोचने को मजबूर कर दिया है कि क्या ऐसा भी हो सकता है? इस बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि यह कोई चमत्कार ही है. लेकिन उस स्थिति में इतने दिनों तक जिंदा रहना मानवीय विज्ञान के लिए एक चुनौती जरूर है, इसलिए यह घटना शोध का विषय भी हो सकती है.

मद्रास रेजीमेंट के लांसनायक हनुमंथप्पा कोप्पड़ को भले ही बचाया नहीं जा सका, लेकिन इस अप्रत्याशित घटना ने उन्हें पूरे देश का नायक बना दिया है. समूचा देश इस महान फौजी के परिवार के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ गया है. हनुमंथप्पा की पत्नी महादेवी अपने कुछ रिश्तेदारों और 2 साल की बेटी के साथ पहले ही दिल्ली आ गई थीं. कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को जब यह समाचार मिला तो वह बंगलुरू में एक रैली को संबोधित कर रहे थे. अपना संबोधन बीच में रोक कर उन्होंने 2 मिनट का मौन रख कर अपने क्षेत्र के इस बहादुर सैनिक को श्रद्धांजलि अर्पित की.

बाद में उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह दिल्ली में कर्नाटक भवन के अधिकारियों को निर्देश देंगे कि वे हनुमंथप्पा परिवार के सदस्यों की हर तरह से मदद कर इस साहसिक सैनिक के पार्थिव शरीर को उन के गांव तक पहुंचाने के लिए विशेष विमान का बंदोबस्त करें. देश के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित अनेक मंत्रियों व उच्चाधिकारियों ने हनुमंथप्पा की मौत पर गहरा शोक प्रकट किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर के जरिए भिजवाए संदेश में कहा कि वह (हनुमंथप्पा) हमें दुखी और अकेला छोड़ गए हैं. उन्होंने लांसनायक की आत्मा की शांति की दुआ मांगते हुए कहा कि ‘आप जैसे शहीदों की सेवा पर भारत को फख्र है.’

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने हनुमंथप्पा की मां श्रीमती बासामा कोप्पड़ को भिजवाए शोक संदेश में इस लांसनायक को हीरो की संज्ञा देते हुए कहा कि विपरीत हालात में इस तरह की अनोखी हिम्मत और अनूठे हौसले का जज्बा दिखाने वाले वह एकलौते शख्स के रूप में जाने जाएंगे. उन के इस जज्बे को राष्ट्र हमेशा याद रखेगा. उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने अपने शोक संदेश में कहा था कि सियाचिन के अतिमुश्किल हालात से बचने वाला यह जवान भारतीय फौज के मजबूत, हिम्मती व अजेय हौसले का प्रतीक बन कर आया था.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का कहना था कि हनुमंथप्पा ने आखिरी सांस तक जो बहादुरी और दिलेरी दिखाई, वही हमारी फौजों की असली पहचान है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी ट्विटर पर शोक प्रकट करते हुए कहा कि हनुमंथप्पा की दिलेरी और दृढ़ता सब के लिए एक प्रेरणा है. भारतीय सेना के प्रमुख दलबीर सिंह सुहाग ने हनुमंथप्पा को अपनी श्रद्धांजलि भेंट करते हुए कहा कि उन के जैसे जवान आने वाली कई पीढि़यों को प्रेरित करते रहेंगे. हनुमंथप्पा के पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए बराड़ स्क्वेयर लाया गया, जहां रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर, रक्षा राज्यमंत्री राव इंदरजीत सिंह, सेना प्रमुख दलबीर सिंह सुहाग, नौसेना प्रमुख रौबिन धोवन, वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अरुप राहा, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी समेत अनेक हस्तियों ने उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की.

12 फरवरी को हनुमंथप्पा का शव विशेष विमान से उन के गांव बेतादुर पहुंचाया गया. वहां उन का पार्थिव शरीर ले जा कर पूरे सम्मान से अंतिम दर्शनों के लिए हुबली नेहरू स्टेडियम में रखा गया तो हजारों लोगों ने उन के अंतिम दर्शन कर के उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की. इस के बाद उन के घर तक और फिर वहां से ग्राम पंचायत के पास स्थित जमीन तक जहां उन्हें दफनाया गया, अंतिम यात्रा निकाली गई. लिंगायत समुदाय के रीतिरिवाजों के अनुसार जब उन्हें दफनाया जाने लगा तो ‘हनुमंथप्पा अमर रहे’ के गगनभेदी नारे गूंज उठे. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी बेतादुर पहुंच कर हनुमंथप्पा के परिवार वालों को ढांढस बंधाया.

देश के लिए जान कुरबान करने और बहादुरी की एक अलग मिसाल पेश करने वाले इस जवान के घर वालों को 25 लाख रुपए की सहायता करने के साथ मुख्यमंत्री ने शहीद जवान की पत्नी को जमीन व नौकरी देने और हनुमंथप्पा की याद में सरकारी खर्चे पर स्मारक बनाने की भी घोषणा की. इसी प्रदेश के 2 अन्य जवानों, महेश और नागेशा ने भी इसी दुर्घटना में अपनी जान गंवाई थी. इसी मौके पर मुख्यमंत्री ने उन्हें भी इसी तरह की सहायता देने की घोषणा की. सूबेदार नागेशा टी.टी. पिछले 22 सालों से सेना में सेवारत थे. अपनी नौकरी के 12 साल उन्होंने दुर्गम जगहों की पोस्टिंग में बिताए थे. चर्चित औपरेशन पराक्रम में हिस्सा ले कर उन्होंने दुश्मन की तमाम माइंस चिह्नित की थी.

कर्नाटक के जिला हासन के रहने वाले नागेशा अपनी बहादुरी और हर हाल में मुसकराते रहने के लिए जाने जाते थे. अपने पीछे वह अपनी विधवा के अलावा 6 साल की बेटी और 4 साल के बेटे को छोड़ गए हैं. सिपाही महेश सन 2005 में पी.एन. मद्रास रेजीमेंट की 19वीं बटालियन में भरती हुए थे. अपनी 11 साल की नौकरी में वह 7 सालों तक दुर्गम जगहों पर तैनात रहे. वह अपनी बटालियन की फुटबाल टीम के लिए भी खेला करते थे. पहाड़ों से उन्हें हमेशा से प्यार रहा था. उन पर चढ़ते हुए उन की फुरती देखते ही बनती थी. पहाड़ पर चढ़ने की उन की रफ्तार को देख कर लोग दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर हो जाते थे.

दिसंबर, 2015 से इन की तैनाती सियाचिन में हुई थी. शहीद होने के बाद सिपाही महेश अपने पीछे मां और छोटे भाई को छोड़ गए हैं. सियाचिन त्रासदी में शहीद हुए अन्य जवानों में हवलदार एलुमलाई एम. सन 1996 में मद्रास रेजीमेंट की 19वीं बटालियन में भरती हुए थे. उत्तर, पूर्व व जम्मूकश्मीर की कई अहम चौकियों पर तैनात रह कर उन्होंने फौज के कई महत्त्वपूर्ण औपरेशनों में उल्लेखनीय रूप से हिस्सा लिया था. वह अपने बेहतरीन निशाने के लिए जाने जाते थे. उन के बाद परिवार में उन की विधवा जमुना रानी व 6 व 4 साल के बेटे रह गए हैं.

लांस हवलदार एस.कुमार सन 1998 में फौज में भरती हो कर 9 सालों तक मुश्किल जगहों पर रहे. सन 1999 व 2000 में वह सियाचिन में पोस्टेड रहे. सन 2001 व 2002 में जम्मूकश्मीर के आतंकियों के खिलाफ सेना के औपरेशन पराक्रम में भी वह शामिल थे. अपने हंसमुख स्वभाव व चुटकुले सुनाते रहने की वजह से वह अपने दोस्तों में बहुत प्रिय थे. लांसनायक सुधीश बी. नौर्थईस्ट व जम्मूकश्मीर के कई सफल सैनिक औपरेशनों का हिस्सा रहे. दुश्मनों के सामने जितने वह दिलेर थे, खेल के मैदान में भी वह उतने ही माहिर थे. शहीद होने के बाद वह अपनी विधवा सालुपोल पी. को अकेली छोड़ गए हैं.

सन 2004 में सिपाही मुश्ताक ने मद्रास रेजीमेंट की 19वीं बटालियन जौइन की थी. केवल 30 साल की उम्र में यह दिलेर जवान शहीद हो गया. सिपाही ए.सूर्यवंशी का जन्म 25 मई, 1991 को हुआ था. महाराष्ट्र के सतारा जिले का रहने वाला यह नौजवान पढ़ाई पूरी करते ही सेना में भरती हो गया था, जहां वह मैडिकल टीम का हिस्सा बन कर देश की सेवा करने लगे थे. अब वह नहीं रहे. उनके पीछे उन की विधवा व बेटी के अलावा बूढ़े मातापिता रह गए हैं.

सन 2009 में सिपाही राममामूर्ति ने मद्रास रेजीमेंट की 19वीं बटालियन में भरती हो कर अपने 7 सालों के सेवाकाल में ही नौर्थईस्ट सैन्य औपरेशन में गजब की बहादुरी दिखाई. जम्मूकश्मीर में आतंकवादियों से भी यह दिलेरी से लड़े थे. शहीद गणेशन मद्रास रेजीमेंट की 19वीं बटालियन में सन 2010 में भरती हुए थे. उन की शादी अभी नहीं हुई थी. गणेशन के छोटे भाई भी सेना में सिपाही हैं. लांसनायक हनुमंथप्पा कोप्पड़ अपने पीछे विधवा महादेवी, 2 साल की बेटी नेत्रा कोप्पड़ के अलावा एक भाई और बूढ़े मातापिता को छोड़ गए हैं.

हनुमंथप्पा के अलावा अन्य जवानों के शरीर 15 फरवरी, 2016 को दिल्ली लाए जा सके थे. दरअसल खराब मौसम की वजह से इन्हें लाने में देरी हुई. तब तक इन्हें लेह बेसकैंप में रखा गया था. जब इन शहीद जवानों के शव तिरंगे में लपेट कर दिल्ली लाए गए तो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी पालम एयरपोर्ट पहुंचे थे. आर्मी चीफ दलबीर सिंह सुहाग ने इन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ ही स्पैशल प्लेन द्वारा इन के पैतृक स्थानों पर भिजवाने की व्यवस्था की थी. 16 फरवरी की सुबह वायुसेना के एवरो व एएन 32 विमानों में इन के पार्थिक शरीरों को उन के पैतृक स्थानों पर भेज दिया गया. इन शहीदों में एकएक जवान केरल, महाराष्ट्र व आंध्र प्रदेश से, 2 कर्नाटक से व 4 तमिलनाडु से हैं.

बहरहाल, पाकिस्तान की ओर से संदेश आया है कि सियाचिन पर जारी विवाद का हल तुरंत निकालने की जरूरत है, ताकि विपरीत परिस्थितियों में और जानें न जाएं. भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित के अनुसार, इस तरह के हादसे मुद्दे को सुलझाने की वकालत करते हैं. लेकिन इस सच्चाई से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि इस की शुरुआत पाकिस्तान की ओर से ही हुई थी. अगर ईमानदारी से इस मसले को हल करने की ओर कदम बढ़ाया जाता है तो इस में फायदा दोनों ही देशों का है. Emotional Story Hindi

 

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