Meerut Crime: महत्त्वाकांक्षी होना बुरी बात नहीं है. बुराई तब आती है जब महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति मेहनत और लगन के बजाय अपराध की डगर पर उतर जाता है. उस स्थिति में इंसान के लिए नातेरिश्ते भी कोई मायने नहीं रखते. प्रतीक और तुषार के साथ भी यही हुआ, जिन्होंने इंजीनियर होने के बावजूद अपना भविष्य अपराध की दलदल में ढूंढने की कोशिश की.

उत्तर प्रदेश, मेरठ शहर के टीपी नगर थानांतर्गत पौश कालोनी पंजाबीपुरा स्थित मयंक जैन की कोठी में 19 फरवरी, 2016 की शाम को अजीब सी हलचल थी. ऐसी हलचल वहां पहले कभी नहीं देखी गई थी. दरअसल इस परिवार का बेटा अतिशय जैन सुबह घर से स्कूल जाने के लिए निकला था. लेकिन शाम तक भी वापस नहीं लौटा था. जैन दंपत्ति के कई नातेरिश्तेदार भी कोठी में मौजूद थे. हर किसी के चेहरे पर चिंता की लकीरें झलक रही थीं. गुरजते वक्त के साथ बीचबीच में सभी की निगाहें दरवाजे की तरफ उठ जाती थीं.

दरअसल, मयंक जैन युवा कारोबारी थे. शहर में ही उन का विवाह मंडप था. उन के परिवार में पत्नी शिखा जैन के अलावा 2 बेटे थे. 13 वर्षीय अतिशय उन का छोटा बेटा था. वह शहर के ही एक स्कूल में कक्षा 6 का छात्र था. वह सुबह को घर से निकल कर करीब 100 मीटर दूर बसस्टाप पर जाता था और वहां से स्कूल बस में बैठ कर स्कूल चला जाता था. उस दिन जब दोपहर में वह वापस नहीं लौटा तो शिखा ने मयंक को फोन कर के बताया. वह तुरंत घर आ गए. पहले उन्होंने सोचा कि अतिशय कहीं किसी दोस्त के पास न चला गया हो. जब घंटों बाद भी वह नहीं आया तो मयंक स्कूल पहुंचे.

स्कूल से पता चला कि वह तो उस दिन स्कूल पहुंचा ही नहीं था. यह सुन कर उन की चिंता बढ़ गई. किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था. अपने स्तर से वह काफी खोजबीन कर चुके थे. शाम तक कई रिश्तेदार उन के घर पर एकत्र हो गए थे. सभी अतिशय को ले कर फिक्रमंद थे. बेटे के गायब होने से शिखा का रोरो कर बुरा हाल था. अतिशय के इस तरह लापता होने से किसी अनहोनी की आशंकाएं जन्म ले रही थीं. लोगों से विचारविमर्श के बाद मयंक ने थाने में बेटे की गुमशुदगी दर्ज करा दी. आशंका अपहरण की थी, सो पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया.

थानाप्रभारी प्रशांत कपिल ने अतिशय के स्कूल जा कर पूछताछ की. स्कूल बस के चालक परिचालक से भी पूछताछ की. पता चला कि उस दिन बसस्टाप पर उन्होंने अतिशय को नहीं देखा था. जो अन्य छात्र बसस्टाप से बस में बैठते थे, उन्होंने भी अतिशय को नहीं देखा था. अतिशय खुद ही नाराज हो कर कहीं न चला गया हो, इस बिंदु पर भी पुलिस ने जांच की. लेकिन इस बात से घर वालों ने साफ इनकार कर दिया. पुलिस ने शहर के बसअड्डों, सिनेमाघरों व शौपिंग सैंटरों के सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग की भी जांच की. लेकिन कोई सफलता नहीं मिली.

अगर अतिशय का अपहरण हुआ था तो हैरानी की बात यह थी कि अपहर्त्ताओं ने उस के घर वालों से कोई संपर्क क्यों नहीं किया था? सीओ रफीक अहमद भी जांच में लग गए थे. एसएसपी डी.सी. दुबे के निर्देश पर कई स्थानों पर अतिशय की गुमशुदगी से संबंधित पोस्टर चस्पा कर दिए गए. आसपास के जिलों में भी इस की सूचना भेज दी गई. 3 दिन होने को आए थे, लेकिन अतिशय का पता नहीं चल सका था. इस बीच मामला तूल पकड़ने लगा था. 22 फरवरी की रात एक अंजान नंबर से मयंक के मोबाइल पर फोन आया तो उन्होंने काल रिसीव की. दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘बेटे को ले कर परेशान हो न?’’

‘‘आप कौन?’’

‘‘आप का बेटा हमारे कब्जे में है.’’

‘‘कैसा है मेरा बेटा, क्या हुआ उस को?’’ उन्होंने उत्सुकता से पूछा. लेकिन अगले ही पल उन्हें झटका लगा.

‘‘वह बिलकुल ठीक है. हम ने उस का अपहरण कर लिया है.’’ दूसरी ओर से यह कहा गया तो मयंक के पैरों तले से जमीन खिसक गई, चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. उन्होंने सोचा भी नहीं था कि अतिशय का इस तरह अपहरण हो जाएगा.

‘‘कौन बोल रहे हैं आप?’’ मयंक ने सहमते पूछा.

‘‘बता देंगे, इतनी भी क्या जल्दी है. हम ने अपहरण उस की रखवाली करने के लिए नहीं, बल्कि फिरौती के लिए किया है. हमें 2 करोड़ रुपए चाहिए, पूरे 2 करोड़. एक बात और बता दूं आप को, हम अच्छे लोग नहीं हैं. पलक झपकते ही जान भी ले सकते हैं. पुलिस को बीच में ला कर बेटे की जान जोखिम में मत डालना, वरना इस गलती की सजा भुगतनी पड़ेगी. इसे मार कर कहीं भी फेंक देंगे, फिर पुलिस से ही जिंदा करा लेना.’’

‘‘प्लीज तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे.’’ मयंक फोन पर गिड़गिड़ाए.

‘‘बताया न, हम कुछ भी कर सकते हैं. हां, अगर तुम चाहोगे तो उसे कुछ नहीं होगा. फिरौती की मांग पूरी होते ही हम उसे छोड़ देंगे. तुम रुपयों का इंतजाम करो. हम तुम्हें बाद में फोन करेंगे.’’ कहने के साथ ही उस ने फोन काट दिया. फिरौती के लिए फोन आने से जैन परिवार में कोहराम मच गया. उन्होंने इस की सूचना पुलिस को दे दी. बच्चे के अपहरण की सूचना मिलते ही पुलिस विभाग में भागदौड़ शुरू हो गई.

एसएसपी डी.सी. दुबे ने आननफानन में एसपी सिटी ओ.पी. सिंह के निर्देशन में पुलिस की 5 टीमें गठित कर के उन्हें तुरंत काम पर लगा दिया. आला अधिकारियों तक मामला पहुंचा तो आईजी सुजीत पांडेय और डीआईजी लक्ष्मी सिंह भी अतिशय जैन की अविलंब बरामदगी के लिए सक्रिय हो गए. अपहर्त्ताओं का फिर फोन आया तो मयंक ने मजबूरी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘अपना सब कुछ बेच कर भी हम इतनी रकम का इंतजाम नहीं कर सकते.’’ इस पर अपहर्त्ता सौदेबाजी पर उतर आए. मयंक गिड़गिड़ाए, ‘‘मैं जितना भी इंतजाम कर सकता हूं, करूंगा. लेकिन अतिशय को कुछ नहीं होना चहिए’’

‘‘जैन साहब, आप चाहेंगे तो आप के बेटे को कुछ नहीं होगा. लेकिन अपना उसूल है, इस हाथ दो, उस हाथ लो.’’ इतना कह कर अपहर्त्ता ने फोन काट दिया. इस के बाद अपहर्त्ता लगातार मयंक के संपर्क में बने रहे. इस बीच पुलिस ने अपहर्त्ताओं के मोबाइल नंबर की जांच कराई तो वह बदायूं जनपद के एक गलत पते का निकला. फलस्वरूप पुलिस के लिए अपहर्त्ताओं तक पहुंचने का यह माध्यम भी बंद हो गया.

दूसरी तरफ मयंक जैन ने जैसेतैसे 23 लाख रुपए का इंतजाम कर लिया. उन्होंने अपहर्त्ताओं से साफ कह दिया कि वह इस से ज्यादा रकम नहीं दे पाएंगे. अपहर्त्ता इतनी ही रकम ले कर अतिशय को लौटाने को तैयार हो गए. अलबत्ता उन्होंने मयंक को एक बार फिर धमकाया, ‘‘अगर तुम ने पुलिस को हमारे पीछे लगाया या चालाकी दिखाई तो बेटे की लाश भी सहीसलामत देखने को नहीं मिलेगी. यह तुम्हें तय करना है कि बेटा जिंदा चाहिए या नहीं?’’ अतिशय उन के कब्जे में है, यह बात साबित करने के लिए अपहर्त्ताओं ने मयंक से उस की बात भी कराई.

‘‘मेरी तरफ से ऐसा नहीं होगा.’’ मयंक ने उन्हें आश्वस्त कर दिया. मयंक जैन को बेटे की चिंता थी, इसलिए उन्होंने अपहर्त्ताओं की बात मान कर पुलिस से दूरी बना ली. उन्होंने पैसा दे कर बेटे को छुड़ाने का फैसला कर लिया. दूसरी ओर पुलिस अपनी जांच में लगी रही. अपहर्त्ताओं ने मयंक जैन से 24 फरवरी की रात गाजियाबाद के वैशाली मैट्रो स्टेशन के बाहर रुपए ले कर पहुंचने को कहा. मयंक वहां पहुंचे भी, लेकिन घंटों इंतजार के बाद भी कोई रुपए लेने नहीं आया.

अपहर्त्ता अपनी बात कहने के बाद मोबाइल फोन बंद कर देते थे. अगले दिन उन्होंने मयंक को रुपए ले कर दिल्ली के कनाट प्लेस बुलाया. पर वहां भी कोई रुपए लेने नहीं आया. मयंक परेशान थे. अगले दिन अपहर्त्ताओं ने कहा कि पैसा ले कर वह गुड़गांव आएं. मयंक वहां भी पहुंचे, लेकिन अपहर्त्ता पैसा लेने नहीं आए. पुलिस ने सर्विलांस का सहारा भी लिया, लेकिन गच्चा खा गई. क्योंकि अपहर्त्ताओं के मोबाइल की लोकेशन उत्तर प्रदेश के अलावा कभी दिल्ली तो कभी हरियाणा तो कभी बिहार आती थी. पुलिस समझ नहीं पा रही थी कि अपहर्त्ता आखिर इतने प्रोफेशनल कैसे हो सकते हैं.

इस बीच पुलिस की समझ में यह बात आ गई कि मयंक जानबूझ कर पुलिस से दूरी बनाए हुए हैं और अपहर्त्ताओं से फिरौती का लेनदेन तय हो गया है. पुलिस अधिकारियों ने जैसेतैसे मयंक जैन को इस वादे के साथ विश्वास में लिया कि वह उन के बेटे को कुछ नहीं होने देंगे. इस से पुलिस को पता चला कि 27-28 फरवरी की मध्यरात्रि में अपहर्त्ता फिरौती की रकम लेने के लिए दिल्लीजयपुर हाईवे पर आएंगे.

यह पता चलते ही केस की मौनीटरिंग कर रहे आईजी सुजीत पांडेय और डीआईजी लक्ष्मी सिंह ने आननफानन में एसपी सिटी ओ.पी. सिंह व एसपी (क्राइम) अजय सहदेव के नेतृत्व में पुलिस की 5 टीमों का गठन कर के उन्हें निगरानी पर लगा दिया. इस के साथ ही 2 दर्जन से अधिक पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में भी लगाए गए. पुलिस किसी भी स्थिति में अपहर्त्ताओं को पकड़ कर अतिशय को सकुशल बरामद करना चाहती थी.

पुलिस की टीमें संभावित ठिकानों पर लग गईं. रात करीब 1 बजे अपहर्त्ताओं ने मयंक को एक स्थान पर सड़क किनारे बैग छोड़ कर चले जाने को कहा. उन्होंने ऐसा ही किया. लेकिन पुलिस के वहां पहुंचने से पहले ही एक आईटैन कार में सवार अपहर्त्ता बैग उठा कर चले गए. यह सब इतनी तेजी से हुआ कि पुलिस देखती ही रह गई. लेकिन पुलिस इस मामले में बेफिक्र थी, क्योंकि उस ने मयंक जैन की सहमति से अपहर्त्ताओं तक पहुंचने के लिए रुपयों वाले बैग में जीपीएस टै्रकिंग सिस्टम लगा दिया था. भागते वक्त अपहर्त्ताओं की कार का रुख दिल्ली की तरफ था. जीपीएस से लोकेट हुआ कि अपहर्त्ता एक स्थान पर ठहर गए हैं. पुलिस पीछा करते हुए वहां पहुंच भी गई, लेकिन पुलिस को तब झटका लगा, जब सड़क किनारे सिर्फ खाली बैग पड़ा मिला.

पुलिस समझ गई कि अपहर्त्ता बेहद शातिर हैं और पुलिस की सर्विलांस की काररवाई के अच्छे जानकार भी. यही वजह थी कि उन्होंने फिरौती की रकम वाले बैग को रास्ते में ही फेंक दिया था. पुलिस ने अपहर्त्ता के मोबाइल को सर्विलांस पर लगाया हुआ था. सर्विलांस के हिसाब से अब तक कार का रुख दिल्ली से निकल कर देहरादून हाईवे की तरफ हो गया था. मुखबिरों के जरिए चूंकि आईटैन कार चिह्नित हो चुकी थी, इसलिए मेरठ में भी पुलिस टीम को अलर्ट कर दिया गया. मेरठ में वेदव्यासपुरी के पास पुलिस ने घेराबंदी कर के संदिग्ध कार की तलाशी ली तो उस में न केवल अतिशय सकुशल मिल गया, बल्कि उस में सवार 2 युवक व एक युवती भी कब्जे में आ गए. अतिशय बेहद डरासहमा था.

पुलिस सब को थाने ले आई और आला अधिकारियों को खबर कर दी. पुलिस ने उन से पूछताछ की. गिरफ्तार किए गए अपहर्त्ताओं में प्रतीक जैन उर्फ मोनू, तुषार जैन उर्फ नीशू और आस्था विश्वास शामिल थे. पुलिस के लिए नि:संदेह यह बड़ी सफलता थी. उस दिन यानी 28 फरवरी को प्रदेश के पुलिस महानिदेशक जावीद अहमद को नोएडा आना था. तय हुआ कि अपहरण का खुलासा उन्हीं के द्वारा हो. डीआईजी लक्ष्मी सिंह, एसएसपी डी.सी. दुबे व एसपी (सिटी) ओ.पी. सिंह नोएडा पहुंच गए. जावीद अहमद ने प्रैसवार्ता में पूरे केस से पर्दा उठाया. अतिशय के अपहरण में शामिल युवक युवती न केवल हाईप्रोफाइल थे, बल्कि उन में से एक अतिशय के पिता मयंक जैन का रिश्तेदार भी था.

दरअसल, गिरफ्तार अपहर्त्ता तुषार जैन मेरठ शहर की हनी गोल्फ कालोनी की कोठी नंबर-70 में रहता था. उस के पिता सिंचाई विभाग में अधिकारी थे. सन 2012 में उस ने गाजियाबाद के एक इंजीनियरिंग कालेज से बीटेक किया था. इस के बाद उस ने 2 साल का साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट का डिप्लोमा भी किया था. डिग्रीधारी हो कर भी जब उसे नौकरी नहीं मिली तो उस ने स्वतंत्र एक्सपर्ट के तौर पर काम करना शुरू कर दिया.

उस ने पुलिस विभाग के लिए भी कई काम किए. बड़ेबड़े केस खोलने में इंटरनेट के जरिए उस ने पुलिस की मदद की. एक तरह से वह साइबर मामलों में पुलिस का एडवाइजर था. समयसमय पर पुलिस उस की मदद लेती रहती थी. साइबर के जो सेमिनार आयोजित किए जाते थे, उन में वह लैक्चर देता था. इस के बाजवूद वह गुजारे लायक ही कमा पाता था. बाद में वह अपनी मौसी के लड़के प्रतीक जैन के पास चला गया था. प्रतीक जैन हरियाणा, गुड़गांव के सेक्टर-82 स्थित प्रथम तल के फ्लैट नंबर-31 में किराए पर रहता था. प्रतीक ने कंप्यूटर साइंस से बीटेक करने के साथ ही लंदन की एक यूनिवर्सिटी से भी इंजीनियरिंग का डिप्लोमा किया था. प्रतीक जयपुर, राजस्थान के जवाहर नगर निवासी कपड़ों के बड़े कारोबारी संजय जैन का बेटा था. प्रतीक के दादा सेवानिवृत्त आईएएस औफिसर थे. पढ़ाई के बाद वह गुड़गांव आ गया था.

गुड़गांव में चूंकि कई नामी कंपनियां थीं, इसलिए उसे उम्मीद थी कि मोटी तनख्वाह की नौकरी मिल जाएगी. लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो उस ने कौंटे्रक्ट पर सौफ्टवेयर बनाने शुरू कर दिए थे. वह अच्छा सौफ्टवेयर डेवलपर था. उस ने चूंकि लंदन में पढ़ाई की थी, इसलिए कंपनियां उसे महत्त्व और रकम दोनों देती थी. प्रतीक अपनी कमाई का हिस्सा अपने परिवार को भी भेजता था.

प्रतीक यूं तो हर महीने 5-6 लाख रुपए कमाता था. तुषार भी लाख 2 लाख कमा लेता था. यह बात अलग थी कि इतनी कमाई भी उस के लिए कम पड़ जाती थी. इस की भी एक बड़ी वजह थी. तुषार व प्रतीक दोनों ही लग्जरी लाइफ जीने के आदी थे. इस के अलावा वह अय्याशी भी करते थे. ये लोग अक्सर महंगे होटलों में जा कर मौजमस्ती करते थे. उन की साथी आस्था विश्वास मूलत: कोलकाता, पश्चिमी बंगाल के थाना धानतल क्षेत्र के अंतर्गत कलामपुर की रहने वाली थी. वह एक कंपनी में बतौर एडवाइजर नौकरी करती थी. एक साल पहले प्रतीक से मुलाकात के बाद दोनों की नजदीकियां बढ़ गई थीं.

धीरेधीरे दोनों के बीच प्रेमिल रिश्ते बन गए थे. दोनों ने एकदूसरे से विवाह का वादा भी कर लिया था. आस्था चूंकि परिवार से दूर थी, इसलिए वह प्रतीक के साथ ही लिवइन रिलेशन में रहने लगी थी. बात यहीं तक होती तो भी ठीक थी. प्रतीक व तुषार होटलों में हाईप्रोफाइल कौलगर्ल के साथ रातें रंगीन किया करते थे.

एकएक रात में वे 50 हजार रुपए से ज्यादा की रकम अपने अय्याशी के शौक पर लुटा देते थे. इंसान यदि बुरी लतों का शिकार हो कर अपनापशनाप खर्च करे तो बड़ी से बड़ी दौलत भी कम पड़ जाती है. इन दोनों के साथ भी ऐसा ही हुआ. प्रतीक और तुषार दोनों ही आर्थिक रूप से परेशान रहने लगे. जब पैसा होता मौज करते और जब पैसा खत्म हो जाता तो परेशान रहने लगते. मयंक जैन रिश्ते में प्रतीक का चाचा था. उन से मिलने के लिए कभीकभी वह मेरठ जाता रहता था.

दोनों महत्त्वाकांक्षी युवक थे. उन के सपने ऊंचे थे और खर्चे बेशुमार. अच्छी नौकरी उन्हें मिल नहीं रही थी. महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उन्होंने कोई शौर्टकट रास्ता अख्तियार करने का मन बनाया. यह अलग बात थी कि काफी विचारविमर्श के बाद भी वे किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाए. कहते हैं कि दिलओदिमाग में कोई खुराफाती विचार पनप जाए और इंसान उस के बारे में लगातार सोचता रहे तो वह अपने हिसाब से कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेता है.

फरवरी, 2016 के पहले सप्ताह में तुषार अपने घर मेरठ आया तो वह अपने साथ प्रतीक को भी ले आया. एक शाम दोनों बैठे तो तुषार ने उस की मुलाकात अपने 2 दोस्तों सोनू और राहुल से कराई. वे भी बीटेक किए हुए थे और उन के जैसी महत्त्वाकांक्षी सोच के शिकार थे. चारों ने बैठ कर अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने पर चर्चा की. सभी ने पैसे का रोना रोया. इसी दौरान प्रतीक ने कहा, ‘‘तुम लोग यदि साथ दो तो मेरे पास रातोंरात करोड़पति बनने का एक सुपर आइडिया है.’’

‘‘क्या?’’ सभी ने जिज्ञासावश पूछा तो उस ने राजदाराना अंदाज में बताया, ‘‘मेरे रिश्ते के चाचा मयंक जैन काफी पैसे वाले हैं.’’

‘‘इस से क्या होगा भाई, क्या वह हमें मालामाल कर देंगे?’’ तुषार के सवाल पर प्रतीक हंस दिया, ‘‘बिलकुल, इतना मालामाल कर देंगे कि सभी के दिन बदल जाएंगे और कभी पैसे की दिक्कत नहीं आएगी.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘अगर हम उन के बेटे का अपहरण कर लें तो वह मुंहमांगी रकम देंगे.’’

‘‘यह काम इतना आसान नहीं है. पुलिस जमीनआसमान एक कर देगी.’’ राहुल ने आशंका जाहिर की तो प्रतीक तुषार की तरफ इशारा कर के बोला, ‘‘इस सब की जरा भी फिक्र मत करो. अपना तुषार साइबर एक्सपर्ट है. सारे हथकंडे जानता है कि पुलिस ऐसे मामलों में कैसे काररवाई करती है. हम पुलिस को बहुत आसानी से नाच नचा देंगे. वह हम तक कभी नहीं पहुंच पाएगी.’’

तुषार ने भी उस की बात का समर्थन किया, ‘‘उस की चिंता तुम छोड़ दो, हम पूरी प्लानिंग से काम करेंगे.’’

काफी विचारविमर्श के बाद उन्होंने मयंक के बेटे अतिशय का अपहरण कर के फिरौती वसूलने की योजना बना ली. प्रतीक ने मयंक को यूं ही टारगेट नहीं बनाया था. इस की एक वजह तो यही थी कि मयंक जैन पैसे वाले थे और प्रतीक को यह बात पता थी. उन्होंने कुछ समय पहले एक महंगी लग्जरी कार भी खरीदी थी. इस से प्रतीक को लगा कि मयंक नोटों में खेल रहे हैं. इसी वजह से उस ने उन के बेटे को निशाने पर ले लिया. अगले कुछ दिनों तक अमीरी के सपने देख कर वह सभी प्लानिंग करते रहे. इस बीच उन्होंने 315 बोर के 2 तमंचों का इंतजाम भी कर लिया. अपनी योजना में उन्होंने आस्था को भी शामिल कर लिया था.

पूरी योजना तैयार कर के 18 फरवरी को वे मेरठ पहुंचे. प्रतीक चूंकि मयंक के घर आताजाता रहता था, इसलिए उसे उन के बेटे अतिशय के आनेजाने का समय और बसस्टाप का पता था. उस दिन अतिशय बसस्टाप पर पहुंचा, लेकिन चूंकि वहां कई बच्चे थे, इसलिए उन्होंने अपहरण का इरादा छोड़ दिया. अगले दिन यानी 19 फरवरी की सुबह तुषार व प्रतीक आईटैन कार संख्या यूपी 12 डब्ल्यू-3273 से फिर मेरठ पहुंच गए. यह कार प्रतीक की थी. तय स्थान पर उन्हें मोनू व राहुल भी मिल गए.

करीब 8 बजे अतिशय रोजाना की तरह स्कूल जाने के लिए बसस्टाप पर पहुंच गया. इत्तेफाक से उस समय अतिशय अकेला था. दूर से निगाह रख रहे वह चारों वहां पहुंचे तो प्रतीक ने अतिशय को बुला कर कहा, ‘‘आओ अतिशय आज मैं तुम्हें स्कूल छोड़ देता हूं.’’

‘‘ओके भैया,’’ कहते हुए अतिशय खुशीख्ुशी कार में बैठ गया. उस के बैठते ही कार नेशनल हाइवे की तरफ जाने लगी तो अतिशय ने उसे टोका, ‘‘आप लोग मुझे कहां ले जा रहे हैं?’’ जवाब में उन लोगों ने उस के  साथ मारपीट कर के उसे डरा दिया और चुप रहने की धमकी दी.

बाद में उन्होंने नशीला पदार्थ सुंघा कर उसे बेहोश कर दिया. गाजियाबाद पहुंच कर सड़क पर उन्होंने एक रिक्शेवाले को मोबाइल पर बात करते देखा. प्रतीक व तुषार कार रोक कर उस के नजदीक पहुंचे और एक अर्जेंट काल करने के लिए उस से मोबाइल मांगा. उन्होंने उसे बताया कि उन के मोबाइल रास्ते में एक होटल में चोरी हो गए हैं. एक काल करने के बदले में उन्होंने रिक्शा वाले को 5 सौ रुपए का नोट निकाल कर दे दिया. रिक्शे वाले ने खुश हो कर उन्हें अपना मोबाइल दे दिया. मोबाइल ले कर दोनों कार से भाग निकले. यह उन की योजना का एक हिस्सा था. कुछ घंटों के सफर में वे अतिशय को गुड़गांव वाले फ्लैट पर ले गए और उस के हाथपैर बांध कर मुंह पर टेप लगा दी. उस की निगरानी का जिम्मा आस्था को सौंप दिया गया. फिरौती के लिए फोन करने में उन्होंने जल्दी नहीं की, बल्कि अखबारों के जरिए हालात पर नजर रखे रहे.

3 दिनों बाद 22 फरवरी को तुषार ने आवाज बदल कर रिक्शेवाले से छीने गए मोबाइल से मयंक को फोन कर के 2 करोड़ की फिरौती मांगी. कई दौर की बातचीत के बाद सौदा 23 लाख रुपए में तय हो गया. प्रतीक ने भी आवाज बदल कर मयंक को फोन किया. 24, 25 व 26 फरवरी को उन्होंने मयंक को रकम ले कर बुलाया. दूर से वह उस पर नजर रखते रहे, परंतु फिरौती नहीं ली.

वे नजर रख कर पूरी चालाकी बरतते हुए आश्वस्त हो जाना चाहते थे कि मयंक के साथ पुलिस तो नहीं है. पुलिस ने मोबाइल का पता निकलवाया तो वह बदायूं का निकला, लेकिन उस का सिम फर्जी पते पर लिया गया था. तुषार व प्रतीक टैक्नीकली मजबूत थे. वह काल करने में लोकेशन बदलने के लिए एक खास सौफ्टवेयर का इस्तेमाल करते थे. 27-28 फरवरी की रात फिरौती की रकम वसूलने के लिए प्रतीक, तुषार और आस्था कार से अतिशय को साथ ले कर निकले. पहले से तय जगह से रकम का बैग उठा कर उन्होंने कार में रखा. तुषार साइबर एक्सपर्ट था. उस ने सब से पहले रुपए निकाल कर दूसरे बैग में रखे. उसी वक्त उस ने बैग को चैक किया तो पाया कि उस में जीपीएस डिवाइस लगी है. उस ने बैग रास्ते में फेंक दिया.

इस बीच प्रतीक बोला, ‘‘हम लोगों का काम हो गया है. अब वक्त आ गया है, जब अतिशय से पीछा छुड़ा लिया जाए. यह जिंदा रहेगा तो हम सब पकड़े जाएंगे. हम हरिद्वार की तरफ चलते हैं. रास्ते में इसे मार कर कहीं फेंक देंगे और हरिद्वार में गंगा नहा कर इस मामले की इतिश्री कर देंगे.’’ लेकिन वह अपने घृणित मकसद में कामयाब हो पाते, उस से पहले ही पुलिस की गिरफ्त में आ गए.

पुलिस ने उन के कब्जे से फिरौती के 23 लाख रुपए, 315 बोर के 2 तमंचे, अपहरण में प्रयुक्त कार, नायलौन की रस्सी व सेलो टेप आदि चीजें बरामद कीं. पुलिस ने उन के साथी अपहर्त्ताओं मोनू व राहुल की तलाश की, परंतु वे हाथ नहीं आ सके. पुलिस ने अपहर्त्ताओं पर धारा-364ए, 307, 25 आर्म्स एक्ट व 7/8 पोक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया. विस्तृत पूछताछ के बाद अगले दिन मेरठ पुलिस ने भी प्रैसवार्ता की और तीनों आरोपियों को अपर जिला जज की विशेष अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक किसी की भी जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस बाकी आरोपियों की तलाश कर रही थी.

प्रतीक, तुषार  और उन के साथियों के पास अच्छी डिग्रियां थीं, वे थोड़ा सब्र से काम लेते तो अच्छी नौकरियां पा कर अपना कैरियर बना सकते थे, लेकिन उन की महत्वाकांक्षाओं, शौर्टकट से दौलत कमाने की ललक और खुराफाती दिमाग ने उन का भविष्य चौपट कर दिया. दूसरी ओर केस के खुलासे पर डीजीपी जावीद अहमद ने अधिकारियों को प्रशस्ति पत्र और पुलिस की टीम को 50 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की. Meerut Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

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