Emotional Story: इंसान की मृत्यु पर किसी का वश नहीं चलता, किंतु युवा हरीश राणा को 13 साल कोमा में जीवनमौत से संघर्ष करते हुए देखना उस के पेरेंट्स के लिए कितना असहनीय और असाधारण था…इस की केवल कल्पना ही की जा सकती है. उन्होंने जब इस से छुटकारा पाने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तब लंबी कानूनी जंग के बाद ही बेटे की अंतिम विदाई हो पाई. पढ़ें, हरीश राणा की दुर्घटना से इच्छामृत्यु तक की पूरी कहानी.
नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के पैलिएटिव डिपार्टमेंट में 24 मार्च, 2026 की शाम के समय नि:शब्द शांति थी. जबकि वहीं एडमिट विशेष मरीज हरीश राणा के बैड के पास वार्डबौय से ले कर नर्सों और डौक्टरों तक के बीच चहलकदमी तेज बनी हुई थी.
शाम के सवा 4 बजने वाले थे. उस के पेरेंट्स भी बैड के एक किनारे चुपचाप खड़े थे. दोनों अपने बेटे हरीश के सामने हाथ जोड़े थे. वे सिर कभी ऊपर तो कभी सामने नीचे झुका रहे थे. भावशून्य चेहरे पर उदासी और निश्चिंतता के भाव बने हुए थे. वार्ड में मौजूद तमाम चिकित्साकर्मी अपनेअपने काम में व्यस्त थे. उन में से ही एक डौक्टर हरीश राणा के पेरेंट्स के पास एक परची ले कर आया और वह उन की ओर बढ़ा दी.
डौक्टर के कुछ बोले बिना ही वे समझ गए कि परची में क्या लिखा होगा. उन की आंखों की कोर से आंसू बह निकले. डौक्टर के साथ आई नर्स ने उन की आंखों से आंसू पोंछ डाले. वह 3 शब्द बोली, ”मुक्ति मिल गई.’’
उन्होंने ‘हां’ में सिर हिला दिया और दोनों जोड़े हुए हाथ सिर के साथ ऊपर की उठा लिए. मानो वे कोई प्रार्थना कर रहे हों. दरअसल, यह सब भारत के सब से पहले पैसिव यूथिनेशिया की मंजूरी पाने वाले 31 वर्षीय हरीश राणा के बैड के सामने हो रहा था, जो 2013 से ही कोमा में था. उसे 11 मार्च, 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने ‘पैसिव यूथेनेशिया’ अर्थात ‘इलाज बंद कर के मौत को स्वीकार करना’ की वैधता को मान्यता दी थी.
परची मृत्यु का प्रमाण पत्र थी, जिस के अनुसार उन की मृत्यु शाम 4 बज कर 10 मिनट पर हुई थी. यानी उस की इच्छामृत्यु एक प्राकृतिक मृत्यु में बदल गई थी.
इसी के साथ एम्स की मीडिया सेल द्वारा एक आधिकारिक बयान जारी किया गया. उस में कहा गया, ‘श्री हरीश राणा का निधन 24 मार्च, 2026 को शाम 4.10 बजे एम्स, नई दिल्ली में हुआ. वह डौक्टरों की एक समर्पित टीम की देखरेख में थे और उन्हें डा. (प्रो.) सीमा मिश्रा (एचओडी— औंको एनेस्थीसिया के नेतृत्व वाली पैलिएटिव औंकोलौजी यूनिट आईआरसीएच) में भरती कराया गया था. एम्स इस मुश्किल समय में उन के परिवार और प्रियजनों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना व्यक्त करता है.’
कौन थे हरीश राणा
हरीश राणा की उम्र तब 20 वर्ष थी, जब वह चंडीगढ़ में चौथी मंजिल की बालकनी से गिर कर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. उन दिनों वह बीटेक की पढ़ाई कर रहा था. उस के बाद सालों तक उस का इलाज चलता रहा, लेकिन ठीक नहीं हो पाया. वह एक ऐसी हालत में पहुंच गया था, जिस में शरीर तो जिंदा रहता है, लेकिन दिमाग काम नहीं करता. इसे ही आमतौर पर ‘कोमा’ कहा जाता है. इस हालत में उसे एक फीडिंग ट्यूब के जरिए कृत्रिम पोषण दिया जाता था. कभीकभी औक्सीजन सपोर्ट भी दिया जाता था.

इच्छामृत्यु की प्रक्रिया के बाद हरीश राणा का शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया.
बात साल 2013 की है. उन दिनों हरीश राणा चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था. 5 अगस्त, 2013 को शाम के करीब 7 बजे उस के फादर अशोक राणा को चंडीगढ़ से एक फोन आया और कहा गया, ‘हरीश राणा गिर गया है और उसे चोट आई है.’
पता चला कि हरीश राणा चंडीगढ़ में जिस पेइंग गेस्ट फैसिलिटी में रह रहा था, वहां की चौथी मंजिल से गिर गया और उसे गहरी चोट आई थी. शुरुआत में उस का इलाज चंडीगढ़ पीजीआई में चला, लेकिन उस के बाद दिल्ली एम्स और कई प्राइवेट अस्पतालों में. इलाज की जगहें बदलती गईं, फिर भी हरीश की हालत में सुधार नहीं हुआ.

मोडिया को बेटे हरीश के बारे में जानकारी देते अशोक राणा
इसी के साथ 63 साल के अशोक राणा और 60 साल की उन की पत्नी निर्मला राणा के सामने उन के युवा बेटे हरीश की जिंदगी एक बिस्तर पर सिमट गई थी. हरीश न कुछ बोल सकता था और न ही कुछ महसूस कर पाता था. मैडिकल साइंस की भाषा में इसे ‘वेजिटेटिव स्टेट’ कहा जाता है. उस की मम्मी को उम्मीद थी कि एक दिन उन का बेटा ठीक हो जाएगा, लेकिन दिन, महीने और साल बीततेबीतते कुल 11 साल बीत गए, लेकिन वह दिन नहीं आया. उस के बाद उन्होंने इस उम्मीद को भी छोड़ दिया और अंतरमन से मान लिया कि ‘उन का बेटा अब शायद कभी ठीक नहीं होगा.’
इलाज के क्रम में ही डौक्टर ने बताया कि इस के दिमाग की नसें पूरी तरह सूख गई हैं, यहां तक कि उन्होंने यह भी कहा कि सीटी स्कैन भी करवाने की जरूरत नहीं. वे किसी चमत्कार के इंतजार में विश्वास पर टिके रहे, लेकिन न दुआओं ने काम किया और न ही दवाओं ने. बेटे के इलाज के लिए उन्हें दिल्ली के द्वारका में स्थित अपना मकान भी बेचना पड़ा. वह मकान, जो साल 1988 से दिल्ली में उन का घर था. उस के बाद वे गाजियाबाद के एक कमरे के फ्लैट में शिफ्ट हो गए थे.
इस परिवार के लिए बेटे का इलाज चला पाना मुश्किल हो गया था. अशोक राणा ने ताज कैटरिंग में नौकरी की थी. वहीं से रिटायर हुए थे. उन्हें हर महीने पेंशन मिलती थी. घर का खर्च और बेटे के इलाज के लिए वह शनिवार और रविवार के दिन गाजियाबाद के क्रिकेट ग्राउंड में सैंडविच और बर्गर बेचते हैं. एक बार तो वह काफी हताश हो गए थे. उन्होंने पत्नी से कहा, ”अब नहीं होगा…हम कहां से लाएं इतने पैसे.’’
शुरुआत में उन्होंने 2 महीने के लिए बेटे की देखभाल के लिए 22 हजार रुपए पर नर्स को रख लिया था. उसे पैसे नहीं दे पाए थे. आखिरकार बेटे की देखभाल की जिम्मेदारी निर्मला राणा पर ही आ गई थी. पेरेंट्स के लिए यह बेहद मुश्किल वाला दौर था. फादर को घर का खर्च भी चलाना था, इलाज के लिए भागदौड़ भी करनी थी. और मम्मी अपने बेटे की हालत देख कर घुली जा रही थी. बारबार उन का गला रुंध जाता था. अपना दुख किस से सुनातीं. जब कोई हालचाल पूछता, तब कहतीं, ”रात को नींद नहीं आती, लेकिन क्या करूं और कब तक कर पाऊंगी पता नहीं?’
सालों से वही अपने बेटे की देखभाल कर रही थीं. एक बार की बात है, दोपहर के एक बज रहे थे और उन्होंने सुबह से भोजन का एक निवाला तक नहीं खाया था, क्योंकि बेटे का बिस्तर बदलने से ले कर उस के कपड़े धोने और सालों तक बिस्तर पर पड़े रहने से उस की पीठ पर बने घाव (बैडसोल) साफ करने, उन की पट्टी करने में ही आधा दिन बीत गया था. जब कोई उन से बेटे की देखभाल के बारे में सवाल करता था, तब वह अपने हलके गुलाबी दुपट्टे के कोर से आंसू पोंछते हुए कहतीं, ”जो हमारे साथ हो रहा है वो किसी के साथ न हो. मैं थक गई हूं. मुझे कुछ हो जाए तो कौन इस की सेवा करेगा. हम इस के अंगों को दान करना चाहते हैं. इस के जो अंग अब इस के काम नहीं आ रहे वो लोगों को मिलें, हम उन में अपने बेटे को देख लेंगे, लेकिन इसे मुक्ति मिल जाए.’’
हरीश के अंदर खाना फूड पाइप के जरिए जाता था. ये पाइप भी इंडोस्कोपी के जरिए उन के पेट में डाली जाती थी, जिस का खर्चा 15 हजार तक आता था. हरीश के एक महीने का मैडिकल खर्च कम से कम 25-30 हजार रुपए था. निर्मला अपने बेटे को भोजन देने के लिए कोई कोरकसर नहीं छोड़ती थीं. स्वाद के लिए व्यंजन बदलती रहती थीं. हालांकि वह अकसर मूंग दाल और सब्जियों का एक मिश्रण तैयार करतीं, जो हरीश को फूड पाइप के जरिए दिया जाता था. इस मिश्रण में वह काली मिर्च और घी मिला देती थीं, ताकि थोड़ा स्वाद आ जाए.
जबकि सच्चाई तो यह थी कि हरीश को स्वाद का अहसास होना तो सालों पहले बंद हो चुका था. वह एक मां थी और जानती थी कि बेटे को तो पाइप से यह खाना दिया जाना है, फिर भी अपनी ममता उड़ेलने में कोई कमी नहीं आने देती थीं. इस के बाद चेहरे पर मुरझाई सी मुसकान आ जाती थी. आखिरकार हरीश की मम्मी निर्मला ने सब से पहले कोर्ट में इच्छामृत्यु यानी यूथेनेशिया की अपील करने की इच्छा जाहिर की थी. हालांकि एक मां के लिए बेटे की इच्छामृत्यु मांगना बेहद मुश्किल था.
जब यह भरोसा टूटा, तब उन्होंने अपने ही बेटे की मौत की गुहार लगा दी. उन की अथाह नाउम्मीदी और निराशा को समझ पाना या उसे लिख पाना हर किसी के लिए बहुत मुश्किल था. निर्मला राणा और अशोक राणा ने बेटे की हालत देख कर बीते साल दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की कि उन के बेटे को यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की इजाजत दी जाए. एक साल तक चली कानूनी काररवाई के बाद बीती 2 जुलाई, 2025 को कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि हरीश राणा को किसी ‘मशीन’ के सहारे जिंदा नहीं रखा जा रहा है, वह बिना किसी मदद के खुद से सांस ले सकते हैं और किसी लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर नहीं हैं.
ऐसे में किसी भी फिजिशियन को इजाजत नहीं है कि वह उन्हें कोई दवा दे कर मारे, भले ही यह मौत उन्हें कष्ट से बाहर निकालने के इरादे से ही क्यों न हो. तब परिवार ने 2018 में सुप्रीम कोर्ट में बेटे की इच्छामृत्यु की अपील की. सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने राणा फेमिली की अपील पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया. उस फैसले में गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (इलाज बंद कर के मौत को स्वीकार करना) की वैधता को मान्यता दी गई थी.
सांस से होती थी आस
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 14 मार्च, 2026 को हरीश राणा को गाजियाबाद स्थित उन के घर से एम्स के डा. बी.आर. अंबेडकर इंस्टीट्यूट रोटरी कैंसर हौस्पिटल की पैलिएटिव केयर यूनिट में शिफ्ट किया गया था. एक दशक से भी ज्यादा समय तक राणा परिवार का पूरा दिन अपने घर के एक ही कमरे में बीतता था. वहां हरीश बेसुध पड़ा रहता था. उस में जिंदगी के बस 2 ही निशान दिखते थे— कभीकभार खांसी आना और उस की छाती का धीरेधीरे ऊपरनीचे होना.
उस की देखभाल लगातार और बहुत बारीकी से की जाती थी. दिन में 4 बार गैस्ट्रोस्टामी ट्यूब से खाना खिलाना, बैडसोल के जख्मों पर मरहमपट्टी करना, फिजियोथैरेपी करवाना और उसे और चोट न लगे, इस के लिए उस के शरीर को बहुत सावधानी से पलटना. इस सिलसिले में उन का संघर्ष कृतज्ञता और गहरी देखभाल से भरा रहा. उन्हें हमेशा विश्वास था कि कुछ अच्छा होगा. उन्होंने हरीश के लिए सब कुछ किया, अस्पताल जाने से ले कर रोजमर्रा की देखभाल तक. उन्होंने पूरी लगन से सब कुछ संभाला और अपने बेटे के लिए हर काम पूरे दिल से किया.

निराश भाव से बेटे को निहारते हरीश राणा के पेरेंट्स
उन्होंने कभी भी किसी के सामने खुद को गरीब या बेबस के तौर पर पेश नहीं किया. उन्होंने कभी नहीं कहा कि ‘हम गरीब हैं’ या किसी से हमदर्दी नहीं मांगी. वे इस बात को ले कर बिलकुल दृढ़निश्चयी थे कि उन का फर्ज अपने बच्चे की सेवा करना है. उन्होंने कभी भी कोई दान या चंदा स्वीकार नहीं किया. हादसे के शुरुआती सालों में परिवार हरीश को दिल्ली के अलगअलग अस्पतालों में ले जाता रहा. इलाज और उम्मीद की तलाश निरंतर जारी रही.
आखिरकार राणा परिवार का संघर्ष भी हरीश की मृत्यु के साथ खत्म हो गया. जबकि उन्होंने अपनी नजरों के सामने से वह सब कुछ देखा, जो हरीश को कुदरती मौत की ओर ले जाने के लिए किए जा रहे थे. जैसे ट्यूब के जरिए दी जाने वाली पोषण सहायता को हटा लेना. जैसेजैसे हरीश के शरीर की हालत बिगड़ती गई, उसे लगातार आराम देने वाला इलाज जारी रखा. अब पेरेंट्स हादसे से पहले की यादों को संजोए हुए हैं. हरीश सिविल इंजीनियरिंग का छात्र था, जिसे फुटबौल, वीडियो गेम्स और वेटलिफ्टिंग मुकाबले बहुत पसंद थे.
कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
भारतीय कानून और चिकित्सा विज्ञान के लिए बुधवार, 11 मार्च 2026 एक ऐतिहासिक दिन था. सुप्रीम कोर्ट जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने हरीश राणा को सालों से मिल रहे डौक्टरी इलाज को बंद करने की अनुमति दे दी थी. कोर्ट ने चौंकाने वाले अपने फैसले में खासकर हरीश के परिवार को संबोधित करते हुए कहा था—
‘हमें इस बात का अहसास है कि यह फैसला भावनात्मक रूप से कितना मुश्किल है. यह कभीकभी समर्पण या हार मानने जैसा लग सकता है, लेकिन हमारे मुताबिक, असल में यह गहरी करुणा और साहस भरा कदम है…
‘आप अपने बेटे को छोड़ नहीं रहे हैं. आप उसे गरिमा के साथ विदा होने की इजाजत दे रहे हैं. यह आप के नि:स्वार्थ प्रेम और उस के प्रति आप की गहरी निष्ठा दिखाता है.
‘…हरीश राणा साल 2013 से ‘वेजिटेटिव’ हालत में है. यानी वह जिंदा है, लेकिन उस में चेतना नहीं है और वह अपने शरीर पर किसी तरह काबू नहीं कर सकता. इस फैसले में कोर्ट ने खबरों में ‘पैसिव यूथिनेशिया’ यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु कहने के बजाय कहा कि ‘पैसिव यूथेनेशिया’ की जगह अब ‘चिकित्सीय उपचार को रोकना या हटा देना’ शब्द इस्तेमाल किया जाएगा.
इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस सिलसिले में व्यापक कानून बनाने पर विचार करने को भी कहा. इस तरह से भारत में अदालती मंजूरी के साथ जीवन रक्षक उपचार वापस लेने या रोकने वाला यह पहला मामला बन गया. कोर्ट ने बड़े ही संयम और शालीनता के साथ भावपूर्ण शैली में फैसला न केवल हरीश के पेरेंट्स की भावना और भारत सरकार की भूमिका को ध्यान में रख कर दिया, बल्कि दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को भी आवश्यक तरीका अपनाने का निर्देश दिया.
कोर्ट में कहा कि ‘हरीश के लाइफ सपोर्ट को हटाने के लिए एक खास योजना तैयार की जाए. ताकि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मरीज की गरिमा और उस का सम्मान बना रहे.’
इस फैसले के बाद हरीश के फादर अशोक राणा का कहना था, ”यह उन के लिए बहुत कठिन फैसला है, लेकिन वह हरीश के सब से बेहतर हित में यह फैसला कर रहे हैं.’’
इस संबंध में हरीश के फादर ने उस के उपचार के बारे में भी बताया था, ‘डौक्टर ने हमें कहा कि इस के दिमाग की नसें पूरी तरह सूख गई हैं. यहां तक कि उन्होंने यह भी कहा कि सीटी स्कैन भी करवाने की जरूरत नहीं. हम कई जगह ले गए, लेकिन कुछ नहीं हुआ. हम सुनते हैं, अखबारों में पढ़ते हैं, चमत्कार के बारे में. हमारे साथ न दुआओं ने काम किया और न ही दवाओं ने.’
गाइडलाइन का पालन
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला भावनात्मक पीड़ादायक तर्क और इलाज के तथ्यों के आधार पर एक फादर की भावना और उन की आंतरिक पीड़ा को ध्यान में रख कर सुनाते हुए माना कि 13 सालों तक हरीश की तबीयत में कोई सुधार नहीं आया था. कोर्ट ने यह भी कहा कि मैडिकल रिपोर्ट और परिजनों के बयानों के मुताबिक, हरीश की हालत में सुधार की कोई उम्मीद नहीं दिखती, ऐसे में उस इलाज को जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है, जो सिर्फ बिना वजह उस की तकलीफ और लंबी करे.
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही दिया गया एक महत्त्वपूर्ण दिशानिर्देश काम आया, जो 2018 में कौमन काज बनाम भारत सरकार के केस में सुप्रीम कोर्ट ने किसी मरीज के चिकित्सीय इलाज रोकने के लिए कुछ दिशानिर्देश दिए थे. बोलचाल में इन्हें ‘कौमन काज गाइडलाइन’ कहा जाता है. इस गाइडलाइन के हिसाब से किसी मरीज का इलाज रोकने का फैसला लेने के लिए अस्पताल में प्राइमरी मैडिकल बोर्ड और सेकेंडरी बोर्ड गठित किए जाएंगे. इस बोर्ड में शामिल डौक्टर और विशेषज्ञ मरीज की हालत के बारे में अपनी रिपोर्ट देंगे.
कोर्ट के न्यायाधीशों की पीठ के लिए यह फैसला सुनाना आसान नहीं था. इस केस के वकील के मुताबिक हरीश का केस काफी पेचीदा था. वह किसी अस्पताल में नहीं थे. घर पर ही कोमा में थे और वहीं उन्हें इलाज मिल रहा था. इसलिए उन की हालत की जांचपड़ताल और उस पर नजर रखने के लिए परिवार ने 2024 में मैडिकल बोर्ड के गठन की मांग को ले कर दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. तब हाईकोर्ट ने उन की इस अरजी को खारिज कर दिया था. उस के बाद ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की थी, लेकिन इस पर भी उन्हें वहां से भी कोई राहत नहीं मिल सकी.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें यह इजाजत दी कि जरूरत पडऩे पर वे दोबारा कोर्ट आ सकते हैं. इस के बाद परिवार ने पिछले साल 2025 में एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. साल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में गाजियाबाद में एक प्राइमरी मैडिकल बोर्ड और एम्स में सेकेंडरी मैडिकल बोर्ड गठित किए. दोनों बोर्डों का मानना था कि हरीश अब स्थाई रूप से ‘वेजिटेटिव’ हालत में हैं. उन्हें मिल रहा इलाज उन्हें जिंदा रखने के लिए तो जरूरी है, लेकिन उन की हालत में सुधार लाने में शायद वे नाकामयाब रहेंगे.
यही रिपोर्ट और हरीश के परिजनों के बयान सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का एक अहम आधार बन गए. हरीश राणा के मामले में यह पहली बार था, जब गाइडलाइंस को व्यवहारिक तौर से एक असल केस में इस्तेमाल किया गया था. जबकि यह बिना किसी असल जिंदगी के केस के मद्देनजर बनाई गई थी.
हरीश राणा के फादर अशोक राणा ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया. अपनी भावना व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि हम ने न्यायालय का रुख तब किया, जब हमें अहसास हुआ कि हमारे बेटे की स्थिति असाध्य और लाइलाज है. इस से पहले, कौमन काज बनाम यूनियन औफ इंडिया मामले में न्यायालय ने चिकित्सा उपचार विशेष रूप से जीवनरक्षक उपचार बंद करने के लिए दिशानिर्देश और शर्तें निर्धारित की थीं.
हम केवल यही चाहते थे कि ये दिशानिर्देश हमारे बेटे के मामले में भी लागू हों. सुप्रीम कोर्ट ने ठीक यही किया है. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया है कि इसे किसी भी तरह से ‘सक्रिय इच्छामृत्यु’ नहीं कहा जाना चाहिए. सक्रिय इच्छामृत्यु किसी व्यक्ति के जीवन को समाप्त करने के लिए घातक इंजेक्शन देना है. जब यह फैसला आया, उस वक्त तक हरीश को पीईजी ट्यूब के रूप में जो जीवनरक्षक उपचार मिल रहा था. कोर्ट ने डौक्टरी उपचार के तहत उसे ही बंद करने का निर्देश दिया था. साथ ही उसे उचित दर्दनिवारक दवाएं और आरामदेह देखभाल करने की सलाह दी गई थी, ताकि हरीश कुदरती मृत्यु हासिल कर सके.
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को न केवल कई मायनों में ऐतिहासिक बना दिया, बल्कि ‘एक्टिव और पैसिव यूथेनेशिया’ अर्थात सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु में भी फर्क साफ कर दिया. ‘पैसिव यूथेनेशिया’ आमतौर पर तब होता है, जब कोई मरीज लाइलाज हालत में हो या उस के ठीक होने की कोई उम्मीद न बची हो. ऐसी सूरत में उसे जिंदा रखने वाले इलाज या ‘लाइफ सपोर्ट’ जीवन रक्षक तरीकों को रोक दिया जाए या हटा लिया जाए को तर्क बनाया जाता है. इस के विपरीत, ‘एक्टिव यूथेनेशिया’ में जानबूझ कर ऐसा कदम उठाया जाता है, जिस से मरीज की मौत हो जाए. जैसे कि जानलेवा इंजेक्शन देना.
हरीश राणा के मामले पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ‘पैसिव यूथेनेशिया’ एक पुराना और काफी भ्रमित करने वाला शब्द है. इस फैसले के मुताबिक, हरीश को दिल्ली के एम्स में भरती कराने के कहा गया. साथ ही कोर्ट ने अपने आदेश में एम्स को भरती की प्रक्रिया तय करने की जिम्मेदारी भी दी. उस के बाद उन्हें पैलिएटिव डिपार्टमेंट में भरती करवा दिया गया था.
इस डिपार्टमेंट में ‘पैलिएटिव केयर’ ऐसी चिकित्सा देखभाल होती है, जिस में गंभीर या लाइलाज बीमारी से जूझ रहे मरीज के दर्द, तकलीफ और इस तरह के अन्य लक्षणों को कम करने पर ध्यान दिया जाता है. इस का मकसद मरीज जब तक जिंदा है, उसे जितना मुमकिन हो, उतना आराम और बेहतर जीवन देना होता है. दरअसल, ‘पैलिएटिव केयर’ का सिद्धांत है कि अगर मरीज ठीक नहीं हो सकते तो वहां के डौक्टर की जिम्मेदारी उन का खयाल रखने की होती है, ताकि उन के जीवन का अंत गरिमा के साथ हो. मरीज को जितनी भी समस्याएं होती हैं, जैसे दर्द या अन्य कोई तकलीफ, परेशानी आदि, उस के हर संभव उपाय किए जाते हैं.
हालांकि इस सिलसिले में ऐसा कुछ नहीं किया जाता है, जिस से उन की जिंदगी लंबी हो जाए. जैसे कि आईसीयू का सहारा लेना या वेंटिलेटर पर रखने पर किया जाता है.
इच्छा मृत्यु पर शुरू हुई बहस
भारत में इच्छामृत्यु को ले कर करीब 30 साल पहले 1996 में ही बहस तब छिड़ गई थी, जब ज्ञान कौर बनाम पंजाब सरकार केस सुप्रीम कोर्ट में था. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत गरिमा के साथ ‘जीने का अधिकार’ में ‘मरने का अधिकार’ शामिल नहीं है. साल 2005 में ‘कामन काज’ नाम की संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी. इस याचिका में अनुच्छेद- 21 के तहत ‘गरिमा के साथ मरने के अधिकार’ को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने की मांग की गई थी.
साथ ही कोर्ट से यह भी कहा गया था कि गंभीर रूप से बीमार या इलाज से भी जिन के बचने की उम्मीद न हो, ऐसे मरीजों को ‘लिविंग विल’ बनाने की इजाजत दी जाए, ताकि वे पहले से तय कर सकें कि ऐसी हालत में उन का इलाज कैसे किया जाएगा. ‘लिविंग विल’ एक तरह से इलाज की वसीयत है. इस के तहत कोई बीमार शख्स अपनी जिंदगी के देखभाल से जुड़ी इच्छाएं दर्ज कर सकता है. यह ख़ासकर तब काम आता है, जब कोई शख्स खुद फैसला लेने की हालत में न हो.

इस सिलसिले में जब साल 2011 में मुंबई के अरुणा शानबाग का मामला आया, तब सुप्रीम कोर्ट ने इलाज बंद करने के लिए दिशानिर्देश जारी करते ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) को पहली बार सैद्धांतिक मंजूरी दी थी. हालांकि, तब शानबाग की देखभाल कर रही नर्सें भावनात्मक तौर पर इस के लिए तैयार नहीं हो पाईं. एक तरह से उन्होंने इस फैसले का विरोध कर दिया था. इस वजह से इस की मंजूरी नहीं मिल पाई थी.
उस के बाद अरुणा शानबाग की मौत साल 2015 में निमोनिया की वजह से हो गई थी. अरुणा गंभीर यौनाचार और जानलेवा हमले के बाद 42 साल तक बिस्तर पर एक ‘वेजिटेटिव’ हालत में पड़ी रही थी. उस की देखभाल अस्पताल की साथी नर्सें करती थीं. यही मामला आगे चल कर साल 2018 में ‘कामन काज’ बनाम भारत सरकार के ऐतिहासिक फैसले तक पहुंचा. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त शर्तों के साथ ‘लिविंग विल’ और ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की इजाजत दी.
कामन काज एक मशहूर संस्था है. यह सरकारी पारदर्शिता और आम आदमी के मौलिक अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ती है. कामन काज बनाम भारत सरकार के केस में साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ का रास्ता साफ कर दिया था. बावजूद इस के ‘यूथेनेशिया’ या सक्रिय इच्छामृत्यु भारत में अभी भी गैरकानूनी है.
जब सेहतमंद महिला को मिली इच्छामृत्यु
कोमा में जिंदगी और मौत के संघर्ष की अनेक दास्तान हैं. ऐसे में 29 साल की हट्टीकट्टी सेहतमंद महिला को दी गई इच्छामृत्यु, हरीश राणा से बिल्कुल अलग थी. उस की दर्द भरी कहानी में बेजान बना शरीर नहीं, बल्कि असहनीय मानसिक पीड़ा है.
उस स्वस्थ दिखने वाली महिला को इच्छामृत्यु (यूथिनेशिया) की इजाजत इसलिए दे दी गई थी, क्योंकि उस की मानसिक पीड़ा ‘असहनीय’ थी. हालांकि इस पर सवाल उठे. उसे मृत्यु वर्ष 2024 में मिली थी. हरीश राणा के विपरीत वह शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ थी. उस ने मानसिक पीड़ा के आधार पर जीवन समाप्त करने की इजाजत मांगी थी. यह केस न केवल कानूनों के अंतर को दर्शाता है, बल्कि ‘जीने का अधिकार’ और ‘मरने का अधिकार’ के बीच दुनियाभर में चल रही बहस को भी उजागर करने वाला है.
नीदरलैंड में 29 साल की जोराया टेर बीक महिला को ‘असहनीय मानसिक पीड़ा’ के आधार पर वर्ष 2024 में इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी गई. उस का कहना था कि वह भले ही शारीरिक दर्द से ग्रसित नहीं है, लेकिन मानसिक तौर पर बेहद तकलीफ में है. सालों से चल रही डिप्रेशन, एंग्जायटी, ट्रामा और आत्मघाती विचारों से घिरी होने के कारण उस की जिंदगी असहनीय बन चुकी है. करीब साढ़े 3 साल की प्रक्रिया के बाद वर्ष 2024 में उसे इच्छामृत्यु की इजाजत मिली थी.
भारत में इच्छामृत्यु एक असहाय, पीडि़त और कोमा में मौत से संघर्ष करने वाले व्यक्ति को दी गई, जबकि नीदरलैंड में मानसिक बीमारियों के आधार पर इच्छामृत्यु दी गई थी. वहां इस तरह के मामलों की संख्या जहां साल 2010 में सिर्फ 2 थी, जो 2023 में बढ़ कर 138 हो गई. इस की काफी आलोचना होती रही है. आलोचकों का कहना है कि मानसिक रूप से पीडि़त व्यक्ति हमेशा पूरी तरह स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकता, जबकि समर्थकों का तर्क है कि हर व्यक्ति को अपनी पीड़ा के अनुसार जीवन और मृत्यु का निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए.
इसं संबंध में जोराया टेर ने खुद कहा था कि ‘मानसिक बीमारी का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति सही सोच नहीं सकता.’ नीदरलैंड्स के अलावा स्विट्जरलैंड उन गिनेचुने देशों में है, जहां गैरघातक बीमारियों, यहां तक कि मानसिक कष्ट के मामलों में भी यूथिनेशिया की अनुमति है. वहां ‘जीवन की गुणवत्ता’ को अहम माना जाता है, न कि सिर्फ शारीरिक बीमारी को.






