Haryana Crime News: लोग बैंक को अपने पैसों को सुरक्षित तरीके से रखने की सेफ और उपयुक्त जगह समझते हैं, लेकिन आए दिन होने वाले बैंक घोटालों ने ग्राहकों की चिंता बढ़ा दी है. चंडीगढ़ की आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के अधिकारियों ने भी 590 करोड़ रुपए का ऐसा घोटाला किया कि…
21 फरवरी, 2026 को हरियाणा के आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की चंडीगढ़ शाखा से जुड़े 590 करोड़ रुपए के घोटाले का बड़ा खुलासा हुआ, जिस ने सियासी और प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है. आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की चंडीगढ़ ब्रांच में लगभग 590 करोड़ रुपए के एक संदिग्ध फ्रौड का पता चला, जो हरियाणा सरकार के कुछ अकाउंट्स से जुड़ा था. 21 फरवरी को स्टाक एक्सचेंज में एक रेगुलेटरी फाइलिंग में बैंक ने कहा कि हरियाणा सरकार के एक विभाग से मिली जानकारी के बाद बैंक ने एक शुरुआती आंतरिक जांच की थी.
बैंक ने कहा कि सब से पहले गड़बडिय़ां तब सामने आईं, जब उसे हरियाणा सरकार के एक डिपार्टमेंट से अपना अकाउंट बंद करने और दूसरे बैंक में फंड ट्रांसफर करने की रिक्वेस्ट मिली थी. इस प्रक्रिया में बैंक ने खाते में दिखाए गए बैलेंस और अकाउंट में असल बैलेंस के बीच अंतर देखा. यहीं से जांच शुरू हुई और आगे चल कर कई खामियां सामने आईं.
18 फरवरी, 2026 से हरियाणा सरकार की कुछ और संस्थाएं भी अपने अकाउंट्स को ले कर बैंक के संपर्क में थीं. उस में भी सिस्टम में रिकौर्ड किए गए बैलेंस और संबंधित सरकारी एंट्रीज द्वारा बताए गए बैलेंस के बीच और अंतर देखा गया. शुरुआती जांच के आधार पर बैंक ने पाया कि यह मामला हरियाणा सरकार से जुड़े कुछ खास अकाउंट्स तक ही सीमित है, जिन्हें चंडीगढ़ ब्रांच के जरिए औपरेट किया जा रहा था. बैंक ने यह भी साफ किया कि यह मामला चंडीगढ़ ब्रांच के दूसरे कस्टमर्स से संबंधित नहीं है.

स्वाति सिंगला स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट कंपनी को मालकिन है
बैंक ने अपनी फाइलिंग में कहा कि जांच के दौरान जिन खातों में गड़बडिय़ां सामने आईं, उन में लगभग 590 करोड़ रुपए की रकम रिकंसिलिएशन के दायरे में आई. बैंक ने कहा, ‘इस का असर आगे की जानकारी मिलने, क्लेम के वैलिडेशन, किसी भी तरह की रिकवरी के आधार पर तय किया जा सकता है. कानूनी काररवाई भी इसी पर निर्भर करेगी.’
मामले को गंभीरता से लेते हुए बैंक ने कई कदम उठाए हैं. फ्रौड के मामलों की मौनिटरिंग और फालोअप के लिए 20 फरवरी को बोर्ड की स्पैशल कमिटी की बैठक बुलाई गई. औडिट कमिटी और बोर्ड औफ डायरेक्टर्स को भी 21 फरवरी, 2026 को इस की जानकारी दी गई. 4 संदिग्ध अधिकारियों को जांच पूरी होने तक बरखास्त कर दिया गया.
इस के अलावा बैंक का फोरैंसिक औडिट करने के लिए एक इंडिपेंडेंट बाहरी एजेंसी को अपौइंट करने का भी प्रोसेस शुरू कर दिया. पुलिस में भी शिकायत दर्ज करा दी गई. बैंक ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए जांच एजेंसियों को पूरा सहयोग देने का वादा किया. बैंक ने कुछ लाभार्थी बैंकों से उन खातों में जमा रकम को फ्रीज करने का अनुरोध भी किया, जिन में संदिग्ध लेनदेन हुआ है. बैंक ने मामले की गहराई से जांच के साथ असली दोषियों का पता लगाने और सरकारी पैसों की रिकवरी का काम शुरू कर दिया.
दरअसल, यह धोखाधड़ी तब सामने आई, जब बैंक को 23 फरवरी को हरियाणा सरकार के पंचायत विभाग से एक पत्र मिला था. जिस में विभाग ने गबन की जानकारी देते हुए बैंक से अपना खाता बंद करने और पैसे किसी दूसरे बैंक में ट्रांसफर करने का अनुरोध किया था. इस प्रक्रिया के दौरान, बैंक ने जांच की तो खातों में बताई गई धनराशि और असल जमा राशि के बीच कुछ अंतर व गड़बड़ी दिखी.
बैंक ने साफ किया कि यह धोखाधड़ी सिर्फ चंडीगढ़ ब्रांच में हरियाणा सरकार से जुड़े कुछ खास खातों तक ही सीमित है. इस का असर बैंक के दूसरे ग्राहकों पर नहीं पड़ेगा.
पकड़े गए आरोपी
आईडीएफसी फर्स्ट बैंक चंडीगढ़ में हरियाणा सरकार के विभिन्न खातों में हुए इस हेरफेर की जांच राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) को सौंप दी गई. एसीबी ने शिकायत मिलने के बाद भ्रष्टाचार का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी. पहले ही दिन इस मामले में मास्टरमाइंड एयू स्माल बैंक की जीरकपुर शाखा के पूर्व मैनेजर रिभव ऋषि को गिरफ्तार कर लिया. उस के साथ अभय कुमार को गिरफ्तार किया गया, जो उसी बैंक में रिलेशनशिप मैनेजर था.
दोनों आरोपियों को अदालत में पेश कर रिमांड पर ले लिया गया और पूछताछ शुरू कर दी. इस के बाद एंटी करप्शन ब्यूरो के चीफ ए.एस. चावला ने एक बड़ी टीम का गठन कर दिया, ताकि घोटाले से जुड़े एकएक आरोपी को पकड़ा जा सके. रिभव ऋषि और अभय कुमार मुख्य आरोपी थे. इन दोनों ने ही पूरे घोटाले की प्लानिंग की थी. उन्होंने स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट के खाते में करीब 300 करोड़ रुपए का फंड ट्रांसफर किया था. इस के अलावा उन्होंने एयू स्माल फाइनैंस बैंक में भी पैसा ट्रांसफर किया था. स्वाति सिंगला स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट की मालकिन है और वह अभय की पत्नी है. स्वाति और उस के भाई अभिषेक सिंगला को भी गिरफ्तार कर लिया गया.
रिभव ऋषि पंचकूला के सेक्टर 20 का रहने वाला है. जबकि मोहाली के खरड़ में रहने वाले उस का दोस्त अभय कुमार, चंडीगढ़ निवासी स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट फर्म का निदेशक अभिषेक सिंगला और उस की पत्नी स्वाति सिंगला पर एसीबी को जांच के पहले दिन ही संदेह हो गया था. इसीलिए एसीबी की टीम ने सब से पहले मोहाली, जीरकपुर सहित अन्य ठिकानों पर छापे डाल कर पहले साक्ष्य जुटाए, फिर चारों आरोपियों को गिरफ्तार किया. दरअसल, रिभव ऋषि पहले चंडीगढ़ स्थित आईडीएफसी फर्स्ट बैंक शाखा में बतौर मैनेजर कार्यरत था. इस के बाद वह एयू स्माल फाइनैंस बैंक में मैनेजर बन गया. हरियाणा सरकार के कुछ अधिकारियों से उस की अच्छी जानपहचान थी. उस ने खरड़ निवासी अपने दोस्त अभय कुमार के साथ मिल कर सरकारी पैसों का गबन करने की योजना बनाई.

एसीबी ने इस बैंक घोटाले में अभय कुमार और अभिषेक सिंगला को भी गिरफ्तार किया है
रिभव और अभय जल्द से जल्द बड़ी रकम कमाने के लिए काफी समय से अलगअलग बैंकों में नौकरी करते रहे थे. दोनों की दोस्ती भी इसी चक्कर में हुई थी. दोनों आरोपी बौंबे स्टाक एक्सचेंज के बिग बुल हर्षद मेहता को अपना आदर्श मानते हैं. उन्होंने धोखाधड़ी की योजना में अभय की दीदी स्वाति सिंगला और उस के पति अभिषेक सिंगला को भी शामिल कर लिया था. अभय और स्वाति के नाम पर स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट नामक एक बोगस फर्म बनाई गई. आरोपियों ने इसी फर्म के जरिए हरियाणा सरकार के खातों से धनराशि ट्रांसफर कर के गबन शुरू कर दिया.
एसीबी ने आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की चंडीगढ़ सेक्टर-32 ब्रांच की डीलिंग हैड प्रियंका और पूर्व डीलिंग हैड अनुज कौशल को भी गिरफ्तार कर लिया. पहले आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के पूर्व कर्मचारी अनुज कौशल को एसीबी ने गिरफ्तार किया. उस ने हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद, हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, हरियाणा ग्रामीण विकास निधि प्रशासन बोर्ड और एचजीपीसीएल कर्मचारी पेंशन फंड ट्रस्ट सहित सरकारी निकायों से जुड़े खातों में ‘मेकर’ के रूप में अनधिकृत लेनदेन किया था.
उस ने महत्त्वपूर्ण विवरणों में विसंगतियों के बावजूद जाली ज्ञापन और रसीदें तैयार कीं और उन्हें संशोधित किया. अनुज कौशल के बाद एसीबी ने प्रियंका भाटोआ को गिरफ्तार किया, जो बैंक की जीरकपुर शाखा में उस समय ग्राहक अनुभव प्रबंधक (कैशियर/मेकर) के रूप में कार्यरत थी, उस ने रिकौर्ड में हेराफेरी की, फरजी सावधि जमा (एफडी) बनाईं और उन्हें ईमेल के माध्यम से प्रसारित किया. उस ने वैध मेमो के बिना सरकारी खातों से अनधिकृत डेबिट लेनदेन किया और अन्य आरोपियों के साथ मिलीभगत कर के दस्तावेजों में हेराफेरी की.
जांच में एयू स्माल फाइनैंस बैंक के तत्कालीन क्षेत्रीय प्रमुख अरुण शर्मा की भूमिका का भी खुलासा हुआ है, जिसे 6 मार्च, 2026 को गिरफ्तार किया गया था. उस पर आरोप है कि उस ने जाली बैंक स्टेटमेंट भेजे और अवैध गतिविधियों में सहयोग देने के लिए लगभग 10 करोड़ रुपए प्राप्त किए. इस के अलावा उस के बैंक खाते में 2 करोड़ रुपए जमा किए गए थे. उसी दिन, आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की औथराइजर सीमा धीमान को भी रिभव ऋषि और अभय कुमार को धोखाधड़ी वाले लेनदेन करने और बैंक रिकौर्ड में हेराफेरी करने में मदद करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया.
हो रहे नएनए खुलासे
एसीबी की जांच जैसेजैसे आगे बढ़ती जा रही थी, नए खुलासे हो रहे थे. हरियाणा सरकार से जुड़े विभागों के फंड में गड़बड़ी और करोड़ों के हेरफेर के मामले में एसीबी अंकुर शर्मा, निवासी शिवालिक विहार, नयागांव (पंजाब) को भी गिरफ्तार कर लिया. जांच में पता चला कि अंकुर शर्मा जुलाई, 2024 में बनाई गई कंपनी एस.आर.आर. प्लानिंग गुरु प्रा. लि. में पार्टनर था. इस कंपनी में उस की 50 फीसदी हिस्सेदारी थी, जबकि बाकी 50 फीसदी की हिस्सेदारी रिभव की मम्मी के नाम थी. दरअसल, इस फर्म के खातों में हरियाणा सरकार के विभिन्न विभागों से करीब 45 करोड़ रुपए डायवर्ट किए गए थे.
अंकुर शर्मा ने इस पूरे मामले में रिभव ऋषि की मदद करते हुए सरकारी फंड को अवैध तरीके से अन्य खातों में ट्रांसफर करने में सक्रिय भूमिका निभाई थी. पुलिस ने अंकुर शर्मा से गहन पूछताछ के लिए उसे 5 दिन की पुलिस रिमांड पर लिया. जांच के दौरान पता चला है कि आरोपियों के नाम से आईडीएफसी फर्स्ट बैंक और एयू स्माल बैंक में खोले गए खातों में करोड़ों रुपए के सरकारी फंड डायवर्ट किए. बाद में इन खातों के जरिए फरजी लेनदेन कर रकम को अलगअलग खातों में ट्रांसफर किया गया.
जांच में पता चल रहा था कि इस पूरे नेटवर्क में बैंक अधिकारियों, निजी व्यक्तियों और सरकारी कर्मचारियों की भूमिका बेहद संदिग्ध रही. जिस वक्त एसीबी इस मामले की जांच कर रही थी, उसी वक्त इस मामले में ईडी की एंट्री हुई, क्योंकि इस मामले में न सिर्फ बड़ी रकम की धोखाधड़ी के लिए बोगस कंपनियां बनाई गईं, बल्कि गलत नीयत से फंड का ट्रांसफर हुआ. ईडी ने मामला दर्ज करने के बाद न सिर्फ जांच शुरू कर दी, बल्कि सभी आरोपियों को वैधानिक रूप से गिरफ्तार भी कर लिया.
ईडी ने मनी ट्रेल और अपराध से अर्जित संपत्ति (प्रोसीड्स औफ क्राइम) का पता लगाने के लिए यह तलाशी अभियान भी शुरू कर दिया. जांच में जो सब से दिलचस्प बात सामने आई, उस के अनुसार हरियाणा सरकार की विभिन्न एजेंसियों द्वारा करीब 590 करोड़ रुपए की जो राशि आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में जमा कराई गई थी, वह राशि फिक्स्ड डिपौजिट (एफडी) में जमा की जानी थी, लेकिन सभी आरोपियों ने सोचीसमझी साजिश के साथ इन पैसों को एफडी में जमा करने के बजाय अपने निजी उपयोग के लिए दूसरी जगह डायवर्ट कर दिया.
इसीलिए ईडी की टीमों ने चंडीगढ़ में अलगअलग स्थानों पर छापे मार कर दस्तावेज और डिजिटल रिकौर्ड एकत्र कर के उन की जांच शुरू कर दी, ताकि इस पूरे घोटाले में शामिल लोगों की भूमिका और पैसे के इस्तेमाल का पूरा पता लगाया जा सके. पुलिस किसी घोटाले की जांच करे और उस की गहराई में न जाए, ऐसा तो मुमकिन ही नहीं है. जांच की कड़ी में 14 मार्च, 2026 को एसीबी ने भी चंडीगढ़ स्थित सावन ज्वैलर्स के मालिक राजन कटोडिय़ा को 590 करोड़ रुपए के धोखाधड़ी मामले में गिरफ्तार कर लिया. दरअसल, आईडीएफसी फर्स्ट बैंक धोखाधड़ी के आरोप से जुड़ी कंपनियों से 250 करोड़ रुपए से अधिक की रकम उस की फर्म के खाते में भेजी गई थी.
जांच में पता चला था कि सावन ज्वैलर्स को आरोपी रिभव ऋषि, अभय कुमार, अभिषेक सिंगला और स्वाति सिंगला से जुड़ी विभिन्न कंपनियों और फर्मों से 250 करोड़ रुपए से अधिक की रकम मिली थी. जांच में यह भी पता चला कि कटोडिय़ा ने कथित तौर पर मुख्य आरोपी के लिए नकदी रूपांतरण सेवाओं की सुविधा प्रदान की और बदले में भारी कमीशन प्राप्त किया.
आरोपी ने इन फर्मों/कंपनियों को सोने की वस्तुओं की बिक्री को अपने बहीखातों में गलत तरीके से दर्ज किया. आरोपी राजन ने धोखाधड़ी की साजिश रचने में शुरू से ही अहम भूमिका निभाई और एक सुनियोजित योजना के तहत अपराध को अंजाम देने में सक्रिय रूप से योगदान दिया. जांच में यह भी पता चला कि सावन ज्वैलर्स को कैपको फिनटेक सर्विसेज, एसआरआर प्लानिंग गुरुस प्राइवेट लिमिटेड और स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट जैसी संस्थाओं से अनधिकृत चैनलों के माध्यम से धनराशि प्राप्त हुई थी.
राजन से की गई पूछताछ के आधार पर ही एसीबी ने राजेश सांगवान और रणधीर सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया. सांगवान हरियाणा राज्य कृषि विपणन बोर्ड में कंट्रोलर (वित्त और लेखा) के पद पर तैनात है, जबकि रणधीर सिंह हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद में कंट्रोलर (वित्त और लेखा) के रूप में कार्यरत है.
इस अपराध को अंजाम देने में शामिल पाए गए और कथित तौर पर हरियाणा वित्त विभाग द्वारा समयसमय पर जारी निर्देशों का उल्लंघन किया. उस पर अन्य सहआरोपियों के साथ मिल कर सरकारी फंड को हड़पने की आपराधिक साजिश रचने और कथित तौर पर अवैध रिश्वत के रूप में बड़ी रकम स्वीकार करने का आरोप है.
आइडीएफसी फर्स्ट बैंक में हुई धोखाधड़ी का मामला प्रकाश में आने के एक सप्ताह बाद ही आइडीएफसी फर्स्ट बैंक ने हरियाणा सरकार को 645 करोड़ रुपए लौटा कर रकम के हेरफेर का मामला सेटलमेंट कर दिया. बैंक ने 590 करोड़ रुपए के शुरुआती अनुमान के मुकाबले 645 करोड़ रुपए का शुद्ध मूलधन चुका दिया, जो वास्तविक अनुमान से 55 करोड़ रुपए ज्यादा है. बैंक ने सभी जरूरी खातों का मिलान पूरा कर लिया और उसे जब कोई और गड़बड़ी नहीं मिली तो उस ने हरियाणा सरकार के विभिन्न विभागों में यह धनराशि ट्रांसफर की.
हालांकि बैंक ने शुरुआत जांच में 590 करोड़ रुपए के फ्रौड का अनुमान लगाया था, लेकिन बाद में जांच और क्लेम वेरिफिकेशन के बाद टोटल 645 करोड़ की हेराफेरी सामने आई, जिसे बैंक ने चुका दिया. बैंक ने अपनी ‘कस्टमर फर्स्ट’ पौलिसी के तहत जांच पूरी होने का इंतजार किए बिना ही ग्राहकों को उन का पैसा लौटा दिया. दिलचस्प बात यह है कि यह कोई हाईटेक साइबर फ्रौड नहीं था, बल्कि बेहद पारंपरिक तरीके से किया गया घोटाला था. जिसे बैंक के कुछ कर्मचारियों ने बाहरी लोगों के साथ मिल कर फरजी चैक और अनधिकृत ट्रांजैक्शन के जरिए सरकारी खातों से पैसे निकाल कर अन्य खातों में ट्रांसफर कर दिए.
इस पूरे खेल में फरजी कंपनियों का इस्तेमाल किया गया, ताकि पैसे के ट्रेल को छिपाया जा सके. भारतीय रिजर्व बैंक के निर्देश पर केपीएमजी (क्लिनवेल्ड पीट मारविक गोएर्डेलर) से इस घोटाले का फोरैंसिक औडिट किया गया. चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी के फंड में भी हेराफेरी : औफिसर गिरफ्तार चंडीगढ़ में ही आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में वित्तीय धोखाधड़ी का एक और मामला सामने आया है. इस बार शहर के विकास के लिए रखे गए चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी लिमिटेड (सीएचसीएल) के 118 करोड़ रुपए पर जालसाजों ने सेंध लगा दी है.
इस में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की सीएफओ नलिनी मलिक को 2 अप्रैल, 2026 को गिरफ्तार कर लिया गया. यह मामला तब खुला, जब नगर निगम द्वारा फंड ट्रांसफर की प्रक्रिया के दौरान बैंक रसीदों (एफडीआरर्स) की जांच की गई. चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी लिमिटेड से फंड नगर निगम को ट्रांसफर किया जाना था. इस प्रक्रिया के लिए आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में एक विशेष (डेडिकेटिड) खाता खोला गया था. बैंक मैनेजर ने फंड जमा करने के बदले नगर निगम को फिक्स्ड डिपौजिट रसीदें (एफडीआरर्स) जारी कीं.
जब नगर निगम ने इन रसीदों का वेरिफिकेशन कराया तो पता चला कि 118 करोड़ रुपए की ये सभी एफडी पूरी तरह से फरजी थीं. बैंक के रिकौर्ड में इस पैसे का कोई अतापता नहीं था. नगर निगम चंडीगढ़ की शिकायत पर चंडीगढ़ पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने तुरंत संज्ञान लिया और इस मामले में एफआईआर दर्ज कर ली गई है.
पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धाराओं 318(4), 338, 336(3), 340(2), 61(2), 316(5) के तहत मामला दर्ज किया है. पुलिस न केवल बैंक मैनेजर, बल्कि बैंक के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों और नगर निगम के कर्मचारियों की भूमिका की जांच शुरू स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की सीएफओ नलिनी मलिक को गिरफ्तार कर लिया. उस ने आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के पूर्व मैनेजर रिभव ऋषि के जरीए करीब 50 करोड़ रुपए कैश और 2 लाख से ज्यादा की रकम अपने बैंक अकाउंट में ली थी.
घटना के बाद चंडीगढ़ प्रशासन ने अपने अन्य खातों और जमा राशियों का भी औडिट करने का फैसला लिया, क्योंकि यह मामला सरकारी विभागों द्वारा निजी बैंकों में फंड रखने की सुरक्षा पर भी बड़े सवाल खड़े करता है. प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के संबंधित शाखा प्रबंधक ने जाली दस्तावेज तैयार किए और उन पर बैंक की मुहर लगा कर नगर निगम के अधिकारियों को गुमराह किया. पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या यह पैसा किसी अन्य खाते में ट्रांसफर किया गया है या इस का उपयोग कहीं और निवेश के लिए किया गया.
पुलिस को शक है कि इतने बड़े घोटाले को अकेला कोई व्यक्ति अंजाम नहीं दे सकता. इसलिए जांच में बैंक के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों और नगर निगम चंडीगढ़ के कुछ कर्मचारियों की भूमिका भी खंगाली जा रही है. शुरुआती जांच में पता चला है कि बैंक के संबंधित ब्रांच मैनेजर ने जाली दस्तावेज तैयार किए और उन पर बैंक की मुहर लगा कर अधिकारियों को गुमराह किया. अब पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस पूरे फरजीवाड़े के पीछे और कौनकौन लोग शामिल थे.
आंध्रा बैंक के कैशियर को धोखाधड़ी मामले में सजा
विशाखापट्टनम स्थित सीबीआई अदालत ने एक बड़े बैंक धोखाधड़ी मामले में सख्त फैसला सुनाया. अदालत ने फैसला सुनाते हुए आंध्रा बैंक के पूर्व क्लर्क-कम-कैशियर और एक निजी व्यक्ति को दोषी ठहराया है. अदालत ने दोनों आरोपियों को 5 साल की सजा सुनाई है, साथ ही उन पर कुल 1,71,42,000 रुपए का भारी जुरमाना भी लगाया गया है. दोषियों की पहचान वेंपडापु संतोषी रामू और महांथी रमना के रूप में हुई है.
वेंपडापु संतोषी रामू आंध्रा बैंक की चीपुरुपल्ली शाखा (जिला विजयनगरम) में क्लर्क-कम-कैशियर के पद पर कार्यरत था, लेकिन बाद में उसे सेवा से बरखास्त कर दिया गया था. वहीं, महांथी रमना एक निजी व्यक्ति है, जो नदिपैना पेटा क्षेत्र का निवासी बताया गया है.
सीबीआई के अनुसार, इस मामले की जांच 13 जून, 2018 को शुरू की गई थी. जांच में सामने आया कि वेंपडापु संतोषी रामू ने महांथी रमना के साथ मिल कर आपराधिक साजिश रची और सौंपी गई रकम का गबन किया. यह धनराशि कुल 1,71,41,162 रुपए थी, जिसे चीपुरुपल्ली रूरल इलेक्ट्रिक कोऔपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड के खाते में जमा किया जाना था. यह संस्था विजयनगरम जिले के दूरदराज इलाकों में बिजली उपभोक्ताओं से बिल वसूली का काम करती है.
आरोप है कि इस पूरी धनराशि को जमा करने के बजाय आरोपियों ने धोखाधड़ी कर उसे अपने पास रख लिया. जांच पूरी होने के बाद सीबीआई ने 10 जनवरी, 2019 को दोनों आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी. मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने दोनों को दोषी करार देते हुए सजा और जुरमाना सुनाया. Haryana Crime News






