Honey Trap: जासूसी में महिलाओं का इस्तेमाल आम बात है. राजामहाराजा रहे हों, मुगल बादशाह हों या फिर अंगरेज शासक, सभी ने जासूसी के लिए महिलाओं का इस्तेमाल किया है. आज भी कई देश अपने प्रतिद्वंदी देशों की जासूसी महिलाओं से ही कराते हैं. ये महिलाएं हनी ट्रैप के माध्यम से अपने टारगेट को फंसाती हैं.

दुनिया के जो देश सुंदर महिलाओं को ‘हनी ट्रैप’ की तरह इस्तेमाल कर के दूसरे देशों की अहम जानकारियां निकालने का काम करते हैं, अगर वही देश इस की शिकायत करने के साथसाथ अपने अफसरों और जनता को इस बारे में सावधानी बरतने को कहें तो आश्चर्य होना स्वाभाविक ही है. ऐसा ही आश्चर्य चीन के एक मामले में हुआ है.

चीन ने इस साल 15 अप्रैल, 2016 को अपने पहले नेशनल सिक्योरिटी एजूकेशन डे पर आम लोगों से हनी ट्रैप से बचने की अपील की है. इस अपील के साथ बाकायदा कार्टूननुमा पोस्टर भी जारी किया गया, जिस में चित्रकथा के माध्यम से सरकारी सेवाओं में कार्यरत महिलाकर्मियों को सचेत किया गया कि सुंदर विदेशी लड़कों से बच कर रहें और उन से डेटिंग न करें. ‘डेंजरस लव’ शीर्षक से प्रकाशित इस पोस्टर में कुल 16 चित्र हैं, जिन के जरिए एक कथा कही गई है.

इस कथा के अनुसार, चीन की एक युवा महिला नौकरशाह जियाओ ली (संभवत: काल्पनिक नाम) एक विदेशी युवक के प्रेम में पड़ जाती है और उसे देश की सुरक्षा से संबंधित जानकारियां दे बैठती है. कार्टून पोस्टर के मुख्य किरदार जियाओ ली के माध्यम में युवा सरकारी कर्मचारियों को भी गोपनीय सूचनाओं का महत्व समझने और उन्हें लीक न करने की आवश्यकता को समझाया गया है. कहानी यह है कि एक पार्टी में जियाओ ली की भेंट विजिटिंग स्कौलर डेविड से होती है. इस के बाद दोनों की कई मुलाकातें होती हैं, जो धीरेधीरे प्रेम और उपहारों के आदानप्रदान में बदल जाती हैं. अपने इस प्रेमसंबंध को माध्यम बना कर डेविड जियाओ ली से तमाम तरह की खुफिया जानकारियां हासिल कर लेता है. लेकिन एक दिन दोनों का भांडा फूट जाता है, दोनों पकड़े जाते हैं और ली को जेल में डाल दिया जाता है.

कार्टूननुमा इस कहानी के माध्यम से सरकारी कर्मचारियों को इस बारे में आगाह किया गया है कि वे सरकारी सूचनाओं के महत्व को समझें और उन्हें यूं ही किसी दूसरे के साथ साझा न करें. यही नहीं, अगर उन्हें किसी हनी ट्रैप की भनक लगे अथवा कोई व्यक्ति जासूसी कर के खुफिया जानकारी जुटाते हुए नजर आए, या फिर उस पर संदेह हो तो वे इस की सूचना देश की सुरक्षा एजेंसियों को दें.

इस पोस्टर को जारी करने से 1-2 दिन पहले ही चीन ने सरकारी तौर पर कहा था कि भारत ऐसा देश है, जो सुंदर महिला बन कर सभी को लुभाना चाहता है. सवाल यह है कि चीन ने ऐसा क्यों किया? कहीं कार्टून पोस्टर जारी कर के चीन ने भारत के जासूसों की ओर से पैदा होने वाले खतरों की तरफ तो इशारा नहीं किया है? यह एक बड़ा सवाल भी है और छानबीन का विषय भी.

लेकिन जो चीन खुद ही हनी ट्रैप जैसे कारनामों से दूसरे देशों की खुफिया जानकारी हासिल करता रहा है, उस के इस नए रवैये से ऐसा लगता है जैसे उसे इस बात का खतरा महसूस हो रहा हो कि जो काम वह खुद दूसरे मुल्कों के साथ करता रहा है, कहीं वही हथकंडे अपना कर दूसरे देश उस के साथ ऐसा न करने लगें. हनी ट्रैप का एक किस्सा है सन 2011 का. इस साल फ्रांस ने चीन पर आरोप लगाया था कि वह फ्रांस में खूबसूरत चीनी महिला जासूसों की तैनाती कर रहा है. फ्रांस के अनुसार, सुंदर चीनी महिलाओं को यह काम सौंपा गया था कि वे बड़े फ्रांसीसी कारोबारियों को हनी ट्रैप यानी अपने प्रेमजाल में फंसा कर उन से कारोबारी खुफिया जानकारी हासिल करें.

इस से पहले ब्रिटेन ने चीन पर अलग ही एक आरोप लगाया था. ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी ‘एमआई-5’ ने चीनी सरकार को आरोपित करते हुए कहा था कि वह ब्रिटिश कारपोरेट कंप्यूटर नेटवर्क में सेंध लगाने के लिए हनी ट्रैप का इस्तेमाल कर रही है. उल्लेखनीय है कि ‘एमआई-5’ ने इस से पहले भी सन 2008 में ‘द थ्रेट फ्राम चाइनीज एस्पीनाज’ शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित कर के देश के सुरक्षा अधिकारियों, बैंकों और बिजनेसमैनों को चीनी हनी ट्रैप से सावधान रहने को कहा था.

‘हनी ट्रैप’ यानी सुंदर महिलाओं या सुंदर पुरुषों को प्रेमजाल में फंसा कर दूसरे देशों की सुरक्षा अथवा कारोबार से संबंधित खुफिया जानकारियां प्राप्त करने का चलन शायद सदियों पुराना है.

खास बात यह कि इस तरीके को अब भी कारगर माना जाता है. समझा जाता है कि इस तरह जो सूचनाएं मिलती हैं, वे बड़े काम की होती हैं. ऐसी कई घटनाएं हमारे देश से भी जुड़ी हैं. इस साल के शुरू में पठानकोट एयर बेस में हुए आतंकवादी हमले से पहले एक खबर मिली थी कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने हनी ट्रैप के माध्यम से भारतीय वायुसेना के एक कर्मचारी को जाल में फंसा लिया है. वायुसेना के इस कर्मचारी रंजीत केके को बाद में गिरफ्तार कर लिया गया था. इस मामले के जो विवरण प्रकाश में आए थे, उन के अनुसार दामिनी मैकनाट नाम की एक महिला ने रंजीत केके को फेसबुक पर हनी ट्रैप बिछा कर अपने जाल में फंसा लिया था.

दामिनी ने फेसबुक पर अपने बारे में दावा किया था कि वह ब्रिटेन की एक मैगजीन में काम करती है. यह मैगजीन सेना से जुड़ी खबरें प्रकाशित करती है. दामिनी ने भारत के कुछ नागरिकों के सामने प्रस्ताव रखा था कि वे कुछ जरूरी सूचनाएं उस से साझा करें. जानकारियां मैगजीन में छापी जाएंगी और इस के बदले में उन्हें अच्छाखासा पैसा दिया जाएगा. असल में यह आईएसआई द्वारा बिछाया गया एक हनी ट्रैप था, जिस के माध्यम से सेना के जवानों को फंसा कर उन से खुफिया जानकारी निकाली जानी थीं. एयरफोर्सकर्मी इसी हनी ट्रैप में फंस गया था.

पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के सीक्रेट मिशन के तहत ‘हनी ट्रैप’ बिछा कर भारतीय सेना में खलबली मचाने वाला एक प्रसंग सन 2014 में भी सामने आया था, सेना के मेरठ सैन्य क्षेत्र में तैनात सैन्यकर्मी सुनीत कुमार फेसबुक के माध्यम से कथित तौर पर आईएसआई एजेंट पूनम प्रकाश और रिया के संपर्क में आया था. उन्हें वह सेना की जरूरी सूचनाएं लीक करने लगा था. सुनीत के बाद मनोहर सिंह नाम के एक अन्य सैन्यकर्मी के बारे में भी कुछ ऐसे ही सुराग मिले थे. यह भी आईएसआई के ‘हनी ट्रैप’ के जरिए पाकिस्तानी एजेंट के संपर्क में आया था. सेना के जवान मनोहर सिंह को तो आईएसआई का ही एजेंट माना गया. ऐसी खबरें प्रकाश में आई थीं कि वह यूपी के बरेली में ठिकाने बदलबदल कर किराए के मकानों में रहता था.

वह खासतौर पर शहरों के अति सुरक्षित वीआईपी इलाकों को अपना अड्डा बनाता था. कुछ वर्ष पूर्व ‘मद्रास कैफे’ नाम की एक फिल्म आई थी, जिस में भारत की खुफिया एजेंसी ‘रा’ के एक अधिकारी की कहानी थी. असल में रा के अधिकारी के.बी. उन्नीकृष्णन को 1987 में गिरफ्तार किया गया था. उन पर आरोप था कि वह अमेरिका की पैनएम एयरलाइंस की एक एयरहोस्टेस (जोकि संभवत: अमेरिकी एजेंट थी) के प्रेम में पड़ गए थे और उसे श्रीलंका में आतंकी संगठन ‘लिट्टे’ के खिलाफ भारत की ओर से चलाए जा रहे अभियान से जुड़ी महत्त्वपूर्ण सूचनाएं दे दी थीं. इसे एक अपराध माना गया था.

भारतीय विदेश सेवा की एक अधिकारी माधुरी गुप्ता को पाकिस्तान के इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग के मीडिया विभाग में अहम पद पर नियुक्त किया गया था. लेकिन माधुरी पर आरोप लगा कि वह पाकिस्तान के लिए जासूसी करती हैं. फलस्वरूप माधुरी को आईएसआई के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था. उन के खिलाफ दाखिल की गई चार्जशीट में दावा किया गया है कि वह पाकिस्तान में अपने 2 हैंडलरों में से एक के हनी ट्रैप में फंस कर कई महत्वपूर्ण सूचनाएं लीक कर बैठी थीं.

1990 के दशक में हनीट्रैप का एक अन्य मामला तब सामने आया था, जब इस्लामाबाद में तैनात भारतीय नौसेना का एक अधिकारी कथित तौर पर कराची में काम करने वाली एक नर्स के प्रेम में पड़ गया था. दरअसल वह नर्स आईएसआई की एजेंट थी, जिसे नौसेना के अधिकारी ने अहम जानकारी दे दी थी. इस अधिकारी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था. इस के बाद उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था. हालांकि उसे जेल की सजा नहीं दी जा सकी, क्योंकि इस अपराध के संबंध में पर्याप्त सबूत नहीं मिल सके थे.

1950 के दशक में एक भारतीय युवा राजदूत के बारे में कहा जाता है कि वह एक रूसी सुंदरी के प्रेमपाश में फंस गया था. उसे रूसी सुंदरी के साथ लिए गए फोटो के आधार पर रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी ने ब्लैकमेल करने की कोशिश की, लेकिन उस ने पूरे घटनाक्रम के बारे में अपने वरिष्ठ अधिकारियों को बता दिया. उस समय जवाहरलाल नेहरू के पास विदेश मंत्रालय भी था. उस ने नेहरूजी के सामने इस पूरे घटनाक्रम की बात कबूल की थी. इस पर उसे महज चेतावनी दे कर छोड़ दिया गया था.

चीन के बीजिंग में तैनात एक भारतीय राजनयिक का वहां की 2 चीनी महिलाओं के साथ प्रेमप्रसंग चला. उन में से एक उन की दुभाषिया थी और दूसरी उन की चीनी नौकरानी. कहा जाता है कि ये दोनों सुंदरियां असल में चीनी जासूस थीं, जिन्हें भारतीय राजनयिक से अहम जानकारियां निकलवाने के लिए तैनात किया गया था. भारत को जब इस हनी ट्रैप की जानकारी मिली तो उस राजनयिक को नौकरी से निकाल दिया गया.

दुनिया में हनी ट्रैप बिछा कर दूसरे देशों के महत्वपूर्ण अधिकारियों, नेताओं से जानकारियां निकलवाने में जिन महिलाओं का सब से ज्यादा उल्लेख होता है, उन में से एक हैं डच महिला माताहारी. माताहारी ने कुछ साल तक जावा देश में एक मोहक नर्तकी का काम किया था. माताहारी को फ्रांस ने जर्मनी में जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया था.गिरफ्तारी के बाद माताहारी ने दावा किया था कि वह तो जर्मनी के राजदूत की नौकरानी मात्र थी, लेकिन इसे सही नहीं माना गया. माताहारी को गोली मारने का हुक्म दिया गया. बताते हैं कि माताहारी ने आंखों पर पट्टी बांधने से इनकार कर दिया और आखें खोल कर खुद को गोली मारने वालों के सामने खड़ी हो गई.

एक मशहूर किस्सा रूसी मौडल अन्ना चैपमैन का भी है. अन्ना चैपमैन को ‘कातया’ के नाम से भी जाना जाता है. दावा है कि कातया को पुतिन के आलोचकों और विरोधियों को चुप कराने के मकसद से हनी ट्रैप के रूप में मैदान में उतारा गया था. कातया अपने काम में सफल भी रही. उस ने पुतिन के कई आलोचकों से जुड़े सैक्स टेप और ड्रग्स का इस्तेमाल करने वाले वीडियो मीडिया में जारी कर के उन की बोलती बंद कर दी. कातया के सब से ताजा शिकार रूस के एक नामी पत्रकार और व्यंग्यकार विक्टर शेंद्रोविच हैं.

1960 के दशक की शुरुआत में एक सुंदरी क्रिस्टीन कीलर का नाम काफी चर्चा में आया था, क्योंकि उस ने हनी ट्रैप के रूप में काम करते हुए एक साथ 2 शिकार किए थे. एक तरफ थे सोवियत संघ के राजदूत येवग्री इवानोव और दूसरी तरफ थे ब्रिटेन के जौन प्रोफुमो. प्रोफुमो सेके्रटरी औफ स्टेट फौर वार थे. क्रिस्टीन कीलर के कारनामों का खुलासा ब्रिटिश प्रेस ने किया था, जिस के बाद प्रोफुमो ने पद से इस्तीफा दे दिया था और इवानोव को वापस मास्को बुला लिया गया था.

2 साल पहले अमेरिका के लिए उस वक्त बड़ी समस्या पैदा हो गई थी, जब उसे पता चला कि किसी ने कई अहम एटमी सूचनाएं चीन को पहुंचा दी हैं. जब इस मामले की छानबीन हुई तो पता चला कि यह किस्सा  हनी ट्रैप से जुड़ा है. दरअसल, एक 59 वर्षीय अमेरिकी बेंजामिन बिशप, जोकि असल में अमेरिकी डिफेंस कान्ट्रैक्टर थे, ने चीन से वीजा पर आई 27 साल की एक चीनी सुंदरी को अपने यहां नौकरी पर रखा था. बिशप उस के प्रेम में पड़ गए और कई अहम एटमी सूचनाएं उसे दे बैठे. जब मामले का खुलासा हुआ तो बिशप पर मुकदमा चला और उन्हें सूचनाएं लीक करने का दोषी माना गया.

सन 2014 में भारत की खुफिया एजेंसी सीबीआई ने इंटरनेट सर्च इंजन गूगल के खिलाफ एक प्रारंभिक जांच (पीई) रिपोर्ट दर्ज की थी, जिस में गूगल पर आरोप लगाया गया कि उस ने मैपाथन-2013 नामक प्रतियोगिता करवा कर देश के सैन्य और सामरिक महत्व के ठिकानों के फोटो और नक्शे न सिर्फ हासिल कर लिए हैं, बल्कि उन्हें अपनी वेबसाइट पर अपलोड भी कर दिए हैं, जिस से इन सारी जगहों की सुरक्षा को भारी खतरा पैदा हो गया था.

सीबीआई के पास यह शिकायत सर्वेयर जनरल औफ इंडिया ने दर्ज कराई थी, जिस में बताया गया था कि गूगल ने कानूनन वर्जित देश के संवेदनशील प्रतिष्ठानों के नक्शे व फोटो प्रदर्शित करने के लिए देश की आधिकारिक मानचित्र एजेंसी भारतीय सर्वेक्षण विभाग से कोई इजाजत नहीं ली थी. राष्ट्रीय मानचित्र नीति 2005 के अनुसार, भारतीय सर्वेक्षण विभाग के अलावा किसी अन्य व्यक्ति, संस्था या एजेंसी को प्रतिबंधित क्षेत्रों का सर्वे करने और नक्शा उतारने की अनुमति नहीं है.

उल्लेखनीय है कि गूगल ने फरवरी-मार्च 2013 में मैपाथन प्रतियोगिता का आयोजन करवाया था, जिस में दुनिया भर के प्रतियोगियों को अपने आसपड़ोस खासतौर से अस्पतालों और रेस्तरां आदि के फोटो, नक्शे साझा करने को कहा था. लेकिन लोगों ने अति उत्साह में सामरिक महत्व के संवेदनशील प्रतिष्ठानों के फोटो, नक्शे आदि भी प्रतियोगिता में भेज दिए थे.

इस तरह गूगल ने 3 अपराध किए. एक तो उस ने इस संबंध में संबंधित विभागों से कोई इजाजत नहीं ली, दूसरे ऐसे संवेदनशील नक्शे आदि हासिल किए, जिन्हें कानूनन उस के पास नहीं होना चाहिए था और तीसरे, उस ने ये चित्र व नक्शे अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक कर दिए. कहा गया कि ये महत्वपूर्ण सामग्रियां गूगल के मार्फत ऐसे लोगों के हाथ लग गईं, जिन से हमारे देश की संप्रभुता एवं सुरक्षा को खतरा हो सकता है.

एकडेढ़ दशक से इंटरनेट पर लोगों की सक्रियता बढ़ने से जासूसी के मामलों में इजाफा हुआ है. सन 2013 में जब अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए और एनएसए के पूर्व कर्मचारी एडवर्ड स्नोडेन ने यह खुलासा किया था कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियां ‘प्रिज्म’ नामक खुफिया निगरानी कार्यक्रम के तहत दुनिया भर के इंटरनेट यूजर्स के संदेशों और सूचनाओं को खंगाल रही हैं, तभी से कई देशों में ऐसी साइबर खुफियागीरी से बचने की कोशिशें शुरू की गईं.

मार्च, 2013 में स्नोडेन द्वारा जारी सूचना के मुताबिक, बाहर बैठे हैकरों ने भारतीयों की 6.3 अरब खुफिया सूचनाएं एक्सेस की थीं. स्नोडेन के दूसरे खुलासे के अनुसार, एनएसए ने अमेरिका में जिन 38 दूतावासों की जासूसी की, उन में भारतीय दूतावास भी शामिल था. हमारे प्रधानमंत्री कार्यालय से ले कर रक्षा व विदेश मंत्रालय, भारतीय दूतावासों, मिसाइल प्रणालियों, एनआईसी, यहां तक कि खुफिया एजेंसी सीबीआई के कंप्यूटरों पर भी साइबर हमले कर के उन की जासूसी हो चुकी है.

यह तथ्य भी प्रकाश में आया है कि विशुद्ध कारोबारी उद्देश्य से भी हमारी संचार सेवाओं को निशाना बनाया गया है. 6 साल पहले जुलाई, 2010 में इनसेट-4बी की बिजली प्रणाली में गड़बड़ी के कारण उस के एक सोलर पैनल ने काम करना बंद कर दिया था, जिस से उस के 24 में से 12 ट्रांसपोंडर ठप हो गए थे. बाद में पता चला कि यह काम व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के तहत किया गया था. किसी ने उस में ‘स्टक्सनेट’ नामक वायरस पहुंचा दिया था, ताकि इनसेट से जुड़े टीवी चैनल चीनी उपग्रह पर चले जाएं. ये घटनाएं साबित करती हैं कि अगर कभी दुनिया में ‘साइबर जासूसी’ के कारण युद्ध के हालात पैदा हुए तो भारत को निशाना बनाना कितना आसान होगा.

भारत के संबंध में एक और तथ्य ध्यान देने योग्य है. असल में अभी भी हमारे देश में ज्यादातर कंप्यूटर और मोबाइल उपकरण विदेशों से मंगाए जाते हैं. संचार उपकरणों में प्रयुक्त होने वाली सेमीकंडक्टर चिप्स भी विदेश में बनती हैं. यहां तक कि ज्यादातर सौफ्टवेयर के कोड्स का स्वामित्व भी विदेशी है. यही नहीं, निजी और सरकारी दोनों तरह की साइबर सेवाओं के लिए गूगल, माइक्रोसौफ्ट, याहू, फेसबुक, यूट्यूब, स्काइप, ऐपल, एओएल, पैलटौक आदि जिन अमेरिकी इंटरनेट कंपनियों की सेवाएं ली जाती हैं, वे सारी कंपनियां फौरेन इंटेलिजेंस सर्विलांस एक्ट (फीसा) जैसे अमेरिकी कानूनों के तहत अपने सर्वरों का डाटा एनएसए यानी अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी को देने के लिए बाध्य हैं.

अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसे में आखिर हमारी साइबर सुरक्षा का क्या अंजाम हो सकता है, क्योंकि विदेशों में बैठा कोई साइबर जासूस जब चाहे, हमारी साइबर गोपनीयता का कबाड़ा कर सकता है. बेशक हमारा देश राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति लागू कर इन समस्याओं को सुलझाने की कोशिश कर रहा है, पर यहां यह ध्यान में रखना होगा कि साइबरस्पेस सीमाविहीन है और उस का स्वरूप अंतर्राष्ट्रीय है. किसी भी देश का साइबर स्पेस ग्लोबल साइबर स्पेस का हिस्सा होता है, लिहाजा कोई भी देश अलग से सुरक्षात्मक काररवाई नहीं कर सकता. इसलिए जरूरी है कि जिस तरह साइबर आर्मी बना कर ब्रिटेन अपनी सुरक्षा का प्रबंध कर रहा है, कुछ वैसे ही उपाय भारत में भी किए जाएं.

सन 2014 में ब्रिटेन ने घोषणा की थी कि वह साइबर चुनौतियों से बचने के लिए साइबर आर्मी बनाने जा रहा है. ब्रिटिश रक्षा मंत्री फिलिप हेमंड के अनुसार, अपने सुरक्षा प्रतिष्ठानों को दुनिया भर के साइबर जासूसों से बचाने की मुहिम के तहत ब्रिटेन सैकड़ों आईटी विशेषज्ञों की नियुक्ति कर रहा है. साइबर आर्मी के तहत काम करने वाले इन विशेषज्ञों का काम ब्रिटिश सेना के राडारों, सैटेलाइटों, विमानों और युद्धपोतों की संचार और तकनीकी प्रणालियों को साइबर हमलों से बचाना होगा.

चूंकि सोशल मीडिया में अपनी वास्तविक पहचान छिपाना आसान है, इसलिए साइबर जासूसी की कितनी रोकथाम हो पाती है, यह वक्त ही बताएगा. पहचान छिपाना जासूसी की दुनिया में बहुत ही जरूरी होता है. आतंकवाद की दुनिया आजकल सोशल मीडिया को अपने अहम हथियार के रूप में इस्तेमाल करने लगी है. सोशल मीडिया के जरिए लड़कियों के नाम से एकाउंट बनाना, अपने टारगेट से चैट कर के उन्हें अपने जाल में फंसाना बहुत आसान है. आतंकी संगठन और जासूसी संगठन सोशल मीडिया का ऐसे कामों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. Honey Trap

लेखक – अभिषेक कुमार सिंह 

 

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