Mathura Violence Case. धर्म और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नाम की आड़ में स्वयंभू देशभक्ति का चोला पहन कर अपना साम्राज्य कायम करने का सपना देखने वाला सनकी रामवृक्ष यादव राजनीति व धर्म के साए में इतना मजबूत हो गया था कि उस ने अरबों के सरकारी जवाहर बाग पर कब्जा जमा लिया. 2 पुलिस अफसरों की शहादत और 29 लोगों की मौत के साथ बाग से कब्जा तो हट गया, लेकिन अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया. अराजक सोच वाले रामवृक्ष की चौंकाने वाली कहानी.

देश की राजधानी दिल्ली से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश की प्रमुख धार्मिक नगरी मथुरा के थाना सदर में स्थित है जवाहर बाग. करीब

300 एकड़ में फैला यह बाग हरियाली से लबरेज है. इसी जवाहर बाग के बाहर 2 जून, 2016 की शाम करीब साढ़े 4 बजे भारी पुलिस फोर्स पहुंचने लगी थी. यह बाग एक सरकारी उद्यान है, जो जिलाधिकारी औफिस के ठीक बराबर में है. जिलाधिकारी औफिस और इस बाग की बाउंड्री वाल के दरमियान महज 12 फीट चौड़ा एक रास्ता है. इस रास्ते पर भी पुलिस ने अपने वाहन लगा कर नाकेबंदी कर दी थी. अचानक बढ़ रही पुलिस की हलचल को स्थानीय लोग कौतूहल भरी निगाहों से देख कर कानाफूसी कर रहे थे.

दरअसल, पुलिस वहां एक बड़े मकसद के साथ जमा हो रही थी. वह जवाहर बाग को अपने कब्जे में लेना चाहती थी. उस सरकारी बाग पर पिछले 2 सालों से सैकड़ों लोगों ने कब्जा कर रखा था. कब्जाधारी खुद को कथित देशभक्त सत्याग्रही बताते थे. उन कब्जाधारियों की असली ताकत और मुखिया था 60 वर्षीय बाबा रामवृक्ष यादव. दुबलेपतले दरमियाने कद के इस रसूखदार शख्स का दिमाग बेहद शातिर था.

अपने भड़काऊ भाषणों से लोगों को अपने इशारों पर नचाने वाला रामवृक्ष यादव खुद को तो देशभक्त बताता ही था, साथ ही भारतीय संविधान, लोकतंत्र और सरकार को अवैध और अंगरेजों वाली बताता था. उस की देशभक्ति का अपना अलग अंदाज था. वह भारतीय कानून और उस के शासकों के खिलाफ जहर उगलता था.

रामवृक्ष खुद को नेताजी सुभाषचंद्र बोस का अनुयायी बताता और आजाद हिंद फौज के नायक के रूप में पेश कर के अपना कानून, मुद्रा और सरकार चाहता था. इस के लिए उस ने अपना एक संगठन बना रखा था, जिस से देश भर के हजारों लोग जुड़े थे. जब वह चलता था, उस के इर्दगिर्द लठैतों के अलावा ऐसे कई लोगों का साया होता था, जो अपने हाथों में हथियार व कंधों पर कारतूसों की पेटियां लटकाए रहते थे. लग्जरी गाडि़यों का काफिला भी उस के पास था.

उस के जिंदगी जीने का अंदाज पूरी तरह तानाशाहों वाला था. उस के पास दौलत, ताकत व ऊंची पहुंच सब कुछ थी. बाग के अंदर उस का बनाया हुआ बाजार, स्कूल, मिनी बैंक भी था. इतनी बड़ी रसोई भी थी, जहां रोजाना सैंकड़ों लोगों का खाना बनता था. जब वहां बड़ा आयोजन होता तो हजारों लोगों के खाने व ठहरने का इंतजाम वहीं होता था. उस ने जवाहर बाग को एक छोटे नगर में तब्दील कर दिया था. एक तरह से वहां सिर्फ उस की ही हुकूमत चलती थी.

उस के अनुयायियों के अलावा बाग में किसी और के जाने की इजाजत नहीं थी. उस के अंधभक्तों में बड़ेबूढ़े, महिलाएं, युवक व बच्चे शामिल थे. इतना ही नहीं, वे उस के एक इशारे पर कुछ भी करने को तैयार रहते थे. उस वक्त भी उस के सैकड़ों अनुयायी वहां जमा थे. इस बाग में कब्जा जमाए इन लोगों को पहले भी कई बार वहां से हटाने की कोशिशें की जा चुकी थीं. यह बात अलग है कि कामयाबी नहीं मिल सकी थी.

परंतु इस बार अदालत ने दखल दे कर इन कब्जाधारियों से बाग को कब्जामुक्त कराने के निर्देश दिए तो एसपी मुकुल द्विवेदी के निर्देशन में पुलिस फोर्स वहां पहुंच गई थी. अदालत के आदेशों से कब्जाधारी भी अनजान नहीं थे. बाग के बाहर पुलिस की बढ़ती गतिविधियों को देख कर कथित सत्याग्रही भी सतर्क हो गए थे. पुलिस चारदीवारी के अंदर की हकीकत से पूरी तरह अनजान थी.

पुलिस ने मुख्य दरवाजे से दाखिल होने की कोशिश की तो उसे सैकड़ों की भीड़ ने अंदर नहीं घुसने दिया. पुलिस अपने उस परंपरागत गुमान का शिकार थी कि वरदी की हनक और डंडे के डर से अनुयायी कब्जा छोड़ देंगे. पुलिस उन्हें डराना भर चाहती थी. पुलिस का मकसद उन लोगों से कोई सख्ती दिखाना नहीं था. वह तो अदालती आदेशों के अनुपालन में कब्जाधारियों को समझाने के मूड में थी.

जब पुलिस गेट से जाने में नाकाम रही तो अफसरों के नेतृत्व में दल पीछे की तरफ पहुंचा. वहां थोड़ी बाउंड्री टूटी हुई थी. नगर पालिका की जेसीबी मशीन से कुछ और बाउंड्री तोड़ कर अंदर जाने लायक रास्ता बनाया गया. रास्ता बन जाने पर वहां से पुलिस बल अंदर दाखिल हो गया. लेकिन वहां का नजारा चौंकाने वाला था. कुछ ऐसा कि जैसे वहां आजादी की जंग होने वाली हो.

पुलिस के सामने सैकड़ों महिलाएं व बच्चे खड़े थे. उन के हाथों में लाठियां थीं. उन महिलाओं और बच्चों के पीछे तरहतरह के हथियारों से लैस सैकड़ों लोग मोर्चा संभाले थे. पुलिस को यही लगा कि उस का रास्ता रोकने के लिए जानबूझ कर महिलाओं को आगे किया गया है. विरोधप्रदर्शनों में लोग ऐसा ही करते हैं.

जब महिलाएं आगे से नहीं हटीं तो एक पुलिस अधिकारी ने लाउड हैलर स्पीकर के जरिए चिल्ला कर कहा, ‘‘देखो, आप लोग पीछे हट जाओ.’’ ‘‘हम नहीं हटेंगे…’’ एक साथ सैकड़ों लोग चिल्लाए. ‘‘यह सरकारी संपत्ति है, आप लोगों को इसे खाली करना होगा.’’ उस अधिकारी ने कहा.

‘‘हम सत्याग्रही हैं, पुलिस से डरने वाले नहीं हैं.’’ कब्जाधारियों ने अपने इरादे साफ कर दिए. इस के साथ ही उन्होंने रामवृक्ष के पक्ष में नारेबाजी शुरू कर दी. फिजा में रामवृक्ष के नाम के जयकारे गूंजने लगे. कई बार वास्तविक हालात का आकलन करना कठिन हो जाता है. पुलिस के सामने भी ऐसी ही स्थिति थी.

पुलिस ने इसे सामान्य अंदाज में लिया कि लोगों को समझा दिया जाएगा या लाठियां फटकार कर खदेड़ दिया जाएगा. जबकि उस के पीछे की हकीकत डरावनी थी. उसी दौरान रामवृक्ष के इशारे पर उस के अनेक चेलेचपाटे हथियारों से लैस हो कर पेड़ों पर बनी मचान पर जा बैठे थे. पुलिस को इस का अंदाजा ही नहीं था कि वे सीधे टक्कर लेने के लिए तैयार हैं.

पुलिस विभाग में मुस्तैदी से ड्यूटी को अंजाम देने वाले के रूप में अपनी पहचान बना चुके एसपी मुकुल द्विवेदी के नेतृत्व वाला पुलिस दल आगे बढ़ा. वह लगभग 20 मीटर अंदर ही पहुंचे थे कि तभी रामवृक्ष के अनुयायी हिंसक हो गए. उन्होंने पुलिस पर हमला बोल दिया. मुकुल द्विवेदी उन लोगों से घिर गए. उन्हें घेर लिया गया और उन के ऊपर लाठीडंडों, फरसों व भालों से अप्रत्याशित हमला बोल दिया गया.

जो लोग पेड़ों पर मचान बनाए बैठे थे, उन्होंने पुलिस दल पर फायरिंग शुरू कर दी. इसी के साथ कुछ लोगों ने पुलिस पर देशी व पैट्रोल बमों से हमले के साथसाथ ईंटपत्थर भी बरसाने शुरू कर दिए गए. गोलियों व बमों की आवाज से पूरा इलाका गूंज उठा.

एसपी मुकुल द्विवेदी बुरी तरह लहूलुहान हो गए. वहां के हालात गुरिल्ला युद्ध जैसे थे. किसी को ऐसे हमले की कतई उम्मीद नहीं थी. न ही यह अंदाजा था कि अंदर से इस तरह हथियार गरजेंगे और बम बरसाए जाएंगे.

मुकुल द्विवेदी जमीन पर गिर गए थे. भीड़ थोड़ा पीछे हटी तो हमराही पुलिसकर्मियों ने उन्हें उठाया. इसी बीच फरह थाने के प्रभारी संतोष यादव को भी गोली मार दी गई. गोली उन के सिर में लगी थी. कई और पुलिसकर्मी भी इस हमले में घायल हो गए थे. कुछ पुलिस वाले ऐसे भी थे, जो बहादुरी दिखाने के बजाय मौके से जान बचा कर भाग खड़े हुए.

लहूलुहान एसपी मुकुल द्विवेदी, थानाप्रभारी संतोष यादव व अन्य पुलिसकर्मियों को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने एसपी मुकुल द्विवेदी व थानाप्रभारी संतोष यादव को मृत घोषित कर दिया. पुलिस और आगे न बढ़े, इस के लिए अनुयायियों ने अंदर बने झोपड़ीनुमा घरों और तंबुओं में आग लगा दी. ऐसा करने से आग की भयावह लपटें कहर ढाने लगीं.

इस बीच जिलाधिकारी व एसएसपी भी और पुलिस बल ले कर वहां आ पहुंचे. बेकाबू व भयानक हो चुके हालात देख कर पुलिस ने आंसू गैस के गोले, रबर बुलेट व एंटी रायट गन का प्रयोग किया. तभी हिंसा पर उतारू लोगों ने दर्जनों गैस सिलेंडरों में आग लगा दी. इस से एक के बाद एक दिल दहलाने वाले विस्फोट होने लगे. गोली, बमबारी व आग से उठे गुबार से पूरे इलाके में दहशत फैल गई.

पुलिस लोगों को चेतावनी दे रही थी, लेकिन वे पुलिस की बात मानने को तैयार नहीं थे. उन के लिए यह जैसे जिंदगी और मौत की आखिरी जंग थी. उपद्रवियों की अगुवाई करने वाले कई लोग चिल्लाचिल्ला कर हिंसक हुए लोगों में जोश भर कर पुलिस से डट कर मुकाबला करने को कह रहे थे. नारेबाजी भी हो रही थी. उपद्रवी झोपडि़यों में आग लगा कर उन के व पेड़ों के पीछे से मोर्चा ले रहे थे.

इस अफरातफरी में वे खुद भी आग व बमों की चपेट में आ कर मर रहे थे. दर्जनों पेड़ भी आग की चपेट में आ गए थे. पुलिस ने जब हवाई फायरिंग शुरू की तो उपद्रवियों के पैर उखड़ने लगे. पुलिस बल प्रयोग कर के आगे बढ़ रही थी. इस भगदड़ में दरजनों लोग घायल हो गए. अनुयायी जब बाहर की तरफ भागने लगे तो बाग के बाहर पहले से ही गुस्से में भरे स्थानीय लोगों ने उन्हें जम कर पीटा.

इस में कई लोग घायल हो गए. कुछ को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. घायल पुलिसकर्मियों व हिंसा करने वालों को सरकारी व प्राइवेट अस्पतालों में भरती कराया गया. लेकिन जिस के इशारे पर यह सब हुआ था, वह नदारद था. पुलिस ने 376 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. इस में 58 तो हमलावर थे, जबकि 310 को शांतिभंग के आरोप में गिरफ्तार किया गया.

घंटों चले औपरेशन के बाद आखिर बाग कब्जामुक्त हो गया. पुलिस ने बाग में सर्चिंग औपरेशन चलाया. वहां कई लाशें पड़ी थीं. उन में से अधिकांश जल कर व सिलेंडरों के विस्फोट की चपेट में आ कर मरे थे. पुलिस ने बताया कि उन लाशों में रामवृक्ष यादव की भी लाश थी. पुलिस ने सभी लाशों को मोर्चरी भिजवा दिया.

सर्चिंग अभियान में अंदर से अलगअलग बोर के 47 तमंचे, 6 रायफल, 184 कारतूस, 178 हैंड ग्रेनेड, आधा किलोग्राम लोहे के छर्रे, पैट्रोल बम, गोले व ढाई किलोग्राम गन पाउडर बरामद हुआ. हथियारों के जखीरे की बरामदगी से पुलिस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. हिंसा और बड़ी मात्रा में मिले हथियारों को देख कर लगता था कि वहां पर बाबा रामवृक्ष जैसे आतंक की फैक्ट्री चला रहा था. दरजनों वाहन व जरूरी सामान भी जली हुई हालत में मिले.

इस बीच पुलिस ने अमित, रामपाल, धीरज सिंह, रामवृक्ष, चंदन बोस, वीरेश यादव, राकेश गुप्ता, रिंकू, लक्ष्मण पासी, सुंदरलाल, मुन्नीलाल समेत ढाई हजार अज्ञात लोगों के खिलाफ थाना सदर में थानाप्रभारी प्रदीप कुमार की तरफ से भादंवि की धारा 147, 148, 149, 302, 307, 332, 333, 336, 353, 436, 186, 188 व 7 क्रिमिनल एक्ट के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया.

जिन लोगों को नामजद किया गया था, उन के नाम पुलिस को हिरासत में लिए गए लोगों से पता चले थे. इस मामले की खबर मिलते ही आगरा जोन के आईजी डी.सी. मिश्रा और डीआईजी अजय मोहन शर्मा भी वहां पहुंच गए.

अगले दिन पुलिस ने घायलों व मृतकों का आकलन किया. इस हिंसा में कुल 23 पुलिसकर्मियों समेत 200 से ज्यादा लोग घायल हुए थे, जबकि एसपी मुकुल द्विवेदी, थानाप्रभारी संतोष यादव के अतिरिक्त एक महिला समेत 27 अनुयायी आगजनी व विस्फोटों की चपेट में आ कर मारे गए थे. जो दरजनों बच्चे व किशोर वहां मिले थे, उन्हें सुधार व आश्रय गृहों में शिफ्ट कर दिया गया था.

इस बड़े मामले ने सरकारी तंत्र को हिला कर रख दिया था. मामले की गूंज देशभर में गूंजी. प्रदेश के पुलिस महानिदेशक जावीद अहमद, प्रमुख सचिव (गृह) देवाशीष पंडा, गृह सचिव मणिप्रसाद मिश्र व एडीजी (कानून व्यवस्था) दलजीत सिंह चौधरी भी मथुरा आ गए. बाग को पुलिस ने पूरी तरह अपने कब्जे में ले लिया था.

पुलिस ने शहीद हुए पुलिसकर्मियों के शवों को पोस्टमार्टम के बाद उन के परिजनों के हवाले कर दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक मुकुल द्विवेदी के सिर की कई हड्डियां टूट गई थीं और दिमाग पर गहरी चोट आई थी. उन की मौत ब्रेन हेमरेज व अधिक रक्तस्राव से हुई थी.

संतोष यादव के सिर में 2 गोलियों के निशान मिले थे. इस तरह हुई उन की शहादत से उन के परिवारों में कोहराम मचा था. शहीद हुए एसपी मुकुल द्विवेदी बेहद कर्मठ व मृदुभाषी अधिकारी थे. मूलरूप से वह औरेया जिले के रहने वाले थे.

वहीं संतोष यादव जौनपुर जिले के केवटली गांव के रहने वाले थे. वह अपने परिवार की आजीविका चलाने वाले एकलौते व्यक्ति थे. उन के परिवार में मातापिता के अलावा पत्नी मिथिलेश यादव व 2 बच्चे निखिल (10 वर्ष) व श्रेया (8 वर्ष) थे. उन का एक छोटा भाई रायसाहब सिविल सेवा की तैयारी कर रहा था.

दोनों का पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में सलामी के बाद अंतिम संस्कार कर दिया गया. उधर अगले दिन पुलिस ने हिंसा में मारे गए लोगों की शिनाख्त कराई. उन में से एक शख्स के शव की शिनाख्त रामवृक्ष यादव के रूप में की गई. उस का शरीर झुलसा हुआ था.

जितने लोग मारे गए थे, उन के परिजनों ने पुलिस से संपर्क नहीं किया तो पुलिस ने ही उन का अंतिम संस्कार कर दिया. बाग में पुलिस का तलाशी अभियान थमा नहीं था. वहां जो कुछ मिल रहा था, उस से हर कोई चौंक रहा था. रामवृक्ष के अतीत की पड़ताल की गई. बड़ा सवाल यह था कि रामवृक्ष ऐसा क्यों बना और आखिर पुलिस से मुकाबला करने वाले इतने खतरनाक लोग कौन व किस तरह के तथाकथित देशभक्त थे.

जांच में कई हकीकतों से परदा उठा, जिस से हर कोई चौंकने पर विवश हो गया. प्रशासनिक मशीनरी की नाक के नीचे हथियारों के जखीरे के साथ आतंकी सरीखी सोच वाले कथित देशभक्त रामवृक्ष की निजी फौज तैयार हो रही थी. उस की जड़ें इतनी गहरी होती चली गईं कि इन्हीं जड़ों के जरिए उस की अनीति का वृक्ष विशाल हो गया था.

हिंसा का खेल खेलने वाला सनकी मिजाज का रामवृक्ष यादव मूलरूप से उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के मरदह थाने के रायपुरबाघपुर गांव का रहने वाला था. इंटरमीडिएट पास रामवृक्ष उग्र स्वभाव का था. सन 1976 में इमरजेंसी के दौरान वह जेल भी गया था.

जेल से छूटने के बाद वह मथुरा के बाबा जय गुरुदेव का शिष्य बन गया. उस ने अपना पैंतरा राजनीति में भी आजमाया. 1974 में उस ने लोकसभा का निर्दलीय चुनाव लड़ा, जिस में उसे 3277 वोट मिले थे. उस के परिवार में पत्नी कलावती के अलावा 2 बेटे राजनारायण, विवेक व एक बेटी गुडि़या थी.

सन 2009 में उस ने कुशीनगर से फिर लोकसभा का चुनाव लड़ा. इस चुनाव में भी वह हार गया. रामवृक्ष का एक भाई फौज में था. बाद में रामवृक्ष ने खुद को जय गुरुदेव को समर्पित कर दिया और परिवार समेत अपना ठिकाना मथुरा को बना लिया.

रामवृक्ष उन लोगों में से था, जिन के ख्वाब बेहद ऊंचे होते हैं. वह खुद को उस ऊंचाई पर देखना चाहता था, जहां उस की एक आवाज पर हजारों लोग खड़े हो जाएं. उस की अपनी सल्तनत हो और उसे नायक की तरह पूजा जाए. उस की नजर जय गुरुदेव की विरासत पर थी. मथुरा में उन के नाम पर बने इस ट्रस्ट की बड़ी विरासत है.

आगरादिल्ली राजमार्ग पर उन का करीब डेढ़ सौ एकड़ का आश्रम है. उन के करोड़ों अनुयायी हैं. रामवृक्ष खुद को उन का खास शिष्य बताता था. मूलत: इटावा के रहने वाले बाबा जय गुरुदेव का 18 मई, 2012 को देहांत हो गया तो उन की विरासत को ले कर विवाद शुरू हो गया. इन्हीं विवादों के बीच उन के चालक पंकज यादव को 12 सौ करोड़ के ट्रस्ट का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया.

पंकज यादव को उत्तराधिकारी घोषित करने पर बाबा के अन्य चेले नाराज हो गए. वे गुटों में बंट गए. सूत्र बताते हैं कि रामवृक्ष चूंकि खुद भी उत्तराधिकारी का दावेदार था, लिहाजा वह भी पंकज यादव का विरोध  करने लगा. इस के बाद वह जय गुरुदेव के मृत्यु प्रमाण पत्र की मांग करने लगा था. रामवृक्ष आरोप लगाता था कि उस के गुरु की मृत्यु नहीं हुई है, बल्कि उन्हें गायब किया गया है.

वह खामोश नहीं बैठना चाहता था. इसी जुनून के चलते उस ने खुद को नेताजी सुभाष चंद्र बोस का अनुयायी बताते हुए एक संगठन खड़ा कर लिया. उस ने उस संगठन को नाम दिया ‘आजाद भारत विधिक वैचारिक क्रांति सत्याग्रही समूह’. उस ने नीले रंग के झंडे भी बनवा लिए. उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य प्रांतों के सैकड़ों लोगों को उस ने अपने साथ जोड़ लिया.

21 सितंबर, 2013 को बरेली के रामलीला मैदान में जय गुरुदेव का जन्म या मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने की मांग को ले कर उस ने अपने समर्थकों के साथ आम सभा करने की कोशिश की. प्रशासन ने उसे इस की अनुमति नहीं दी तो वह लाठीडंडे ले कर भीड़ के साथ थाने में घुस गया और हंगामा किया. समझाने पर भी वह नहीं माना तो पुलिस ने उसे लठिया कर भगा दिया.

जनवरी, 2014 में वह ठाणे गया. वहां भी उस ने अपना नेटवर्क बनाने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो सका. उस ने खुद को स्वाधीन भारत का मुखिया घोषित कर रखा था. वह मध्य प्रदेश के सागर भी गया और वहां से 200 समर्थकों के साथ कूच कर के 15 मार्च, 2014 को मथुरा पहुंचा.

उस ने मथुरा प्रशासन से जवाहर बाग में 2 दिन रुकने की अनुमति ले ली. मथुरा आने के पीछे भी उस का मकसद जय गुरुदेव के उत्तराधिकारियों के खिलाफ आवाज उठाना था, जिस से वह उन की संपत्ति के दावेदारों से अपनी लड़ाई आसानी से लड़ सके. उस का मकसद उन के आश्रम पर हमला बोल कर संपत्ति को कब्जाना था.

उस की मंशा ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपने साथ जोड़ कर एक दिन हथियारों के बल पर जय गुरुदेव की प्रौपर्टी कब्जाने की थी. वह सुभाषचंद्र बोस के नाम की आड़ में अपने मंसूबों को मजबूत करने लगा. उस ने बाग को अपना स्थायी डेरा बना लिया. धीरेधीरे वहां उस ने कई झोपडि़यां बना दीं और अपनी सत्ता चलाने लगा.

इतना ही नहीं, बाग की नालियों व खडं़जों को उखाड़ कर उस ने झोपडि़यों की दीवारें व शौचालयों का निर्माण करा लिया. ईंधन के लिए उस ने बाग के तमाम पेड़ों को कटवा दिया. पानी की आपूर्ति के लिए वह अंदर बने सरकारी नलकूपों का इस्तेमाल करता था.

प्रशासन आंखें तरेरता तो वह ताकत के साथ टकराने लगता और वहां सत्संग आदि का आयोजन कर दिया करता था. धर्म और कथित देशभक्ति उस के मजबूत हथियार बन गए. कोई उद्यानकर्मी या सुबह की सैर करने वाले लोग वहां जाते तो उन्हें मारपीट कर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता था.

उद्यान विभाग के कर्मचारी उस के उत्पात से डरने लगे थे. वह उद्यान को अपनी जागीर समझ बैठा. उस के यहां लग्जरी गाडि़यों के काफिले आते थे. रामवृक्ष खुद उन में चलता था और अपने साथ हर वक्त वैध, अवैध हथियारों वाले लोगों और लठैतों को रखता था. खुद को सत्याग्रही व अलग किस्म का कथित देशभक्त बताने वाले रामवृक्ष यादव की मांगें बेहद अजीब थीं.

वह न सिर्फ अपनी मांगों को दोहराता था, बल्कि उन का प्रचार भी मथुरा शहर में तमाम दीवारों पर लिखवा कर करता था. वह मांग करता था कि एक रुपए में 40 लीटर पैट्रोल और एक रुपए में 60 लीटर डीजल दिया जाए. इतना ही नहीं, वह रिजर्व बैंक को अंगरेजों का अड्डा बताता था और प्रचलित मुद्रा को राष्ट्रविरोधी बता कर उसे बंद करने की मांग कर के आजाद हिंद फौज बैंक बनाने व उस की करेंसी शुरू करने की मांग करता था.

रामवृक्ष चाहता था कि संविधान से गठित मौजूदा गणराज्य अवैध घोषित हो और आजाद हिंद फौज का कानून और उस की सरकार बने. राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री का चुनाव अवैध घोषित करने के साथ ही वह देश में सोनेचांदी के सिक्कों को प्रचलन में लाने की मांग करता था. इस के पीछे उस का तर्क था कि सोनेचांदी के सिक्के लागू होंगे तो भ्रष्टाचार अपने आप खत्म हो जाएगा.

वह अंगरेजों के जमाने के सभी कानून खत्म कर के अपने संगठन के बनाए कानून लागू करना चाहता था. अपनी मांगों के समर्थन में वह धरनाप्रदर्शन आदि भी करता रहता था. रामवृक्ष यूं तो खुद को तथाकथित देशभक्त बताता था, लेकिन उस की देशभक्ति का अपना अंदाजा था.  वह भारतीय संविधान को नहीं मानता था. जवाहर बाग को उस ने अपने कथित आंदोलन का मुख्यालय घोषित कर दिया था. अकसर होने वाले विभिन्न आयोजनों में उस के यहां हजारों लोग जुटते थे. सभी के खानेपीने और रहने का इंतजाम बाग में ही होता था. आयोजनों के अलावा 2-4 सौ लोग वहां हर वक्त रहते थे. वह उग्र हो कर जोश में कूदकूद कर भाषण देता था.

रामवृक्ष यादव ने अपने संगठन और इरादों को मजबूती देने के लिए सोशल मीडिया को भी अड्डा बना लिया था. अपने यहां होने वाली गतिविधियों को भी वह सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर शेयर किया करता था. उस के संगठन के फेसबुक पेज पर अनेक लोग जुडे़ हुए थे. फेसबुक पर वह जवाहर बाग में होने वाले धार्मिक आयोजनों और अपनी मांगों का बखान करता था. ऐसे आयोजनों को वह सत्याग्रह फ्लैग मार्च का नाम देता था.

अपनी मांगों पर वह लोगों की राय मांगता था. भारतीय मुद्रा के रूप में प्रचलित 20 व 500 के नोटों के ऊपर उस ने लिखा हुआ है कि भारतीय रुपया फ्रौड है. रिजर्व बैंक का बहिष्कार करो. रामवृक्ष के अंधभक्तों की कमी नहीं थी. उस के सामने बैठ कर हजारों स्त्रीपुरुष तालियां बजाते थे. धर्म व देशभक्ति के नाम पर बरगलाए गए लोग कामधंधा छोड़ कर उस के यहां चले आते थे.

उस का आर्थिक तंत्र भी मजबूत था. सरकार से उसे 15 हजार रुपए पेंशन इसलिए मिलती थी, क्योंकि वह इमरजेंसी में जेल गया था. वह लोगों से चंदा एकत्र करता था. धार्मिक आयोजनों में भी मोटा चढ़ावा आता था. बाग को चूंकि वह आश्रम बनाना चाहता था, इसलिए कई बिल्डर भी उस की मदद करते थे. उन्हें आशा थी कि आश्रम बनेगा तो रामवृक्ष वहां उन के लिए भी कौंपलैक्स व दुकानें बनवा देगा.

यूपी, पंजाब के अलावा नक्सलग्रस्त झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा से भी उसे लाखों का चंदा हर महीने मिलता था. चंदे की रकम से ही वह तमाम संसाधन जुटाता था. उद्यान को भी उस ने कमाई का जरिया बना लिया था. वहां लगने वाले कई प्रजातियों के फलों को बेच कर वह लाखों की कमाई करता था. अंदर खेती कर के गेहूं व सब्जियां उगाता था.

बाग को उस ने नगर के रूप में तब्दील कर दिया था. उस का अपना बाजार था. वह बाहर से थोक में सामान खरीद कर कम रेट में बाग में बनी दुकान पर बिकवाता था. इस से अनुयायी खुश हो जाते थे. इस बहाने वह ज्यादा लोगों को जोड़ लेना चाहता था. रामवृक्ष विभिन्न राज्यों के अभावग्रस्त इलाकों के लोगों को अपने साथ जोड़ता था, जो या तो भुखमरी के शिकार होते थे या अनपढ़.

बाग के अंदर ही नाई, मोची सब थे. सोलर पैनल सिस्टम, इनवर्टर, जनरेटर, ट्रैक्टर, टीवी, फ्रिज, कूलर, खेती के यंत्र जैसे संसाधन वह जमा कर चुका था. हजारों लोगों के खाने का इंतजाम वहां होता था. वहां एक बड़ा भंडारण गृह था, जिस में सैकड़ों गैस सिलेंडर, राशन सामग्री व बरतन होते थे.

वहां रहने वाले लोगों के खानेपीने व कपड़ों का खर्च वह खुद उठाता था. उस ने सब लोगों के काम बांट रखे थे. रामवृक्ष के अंधभक्त भले ही झोपडि़यों, टैंटों में रह रहे थे, लेकिन वह खुद अत्याधुनिक सुविधाओं के बीच शानदार जिंदगी जी रहा था. अपने लिए उस ने उद्यान विभाग के अधिकारी के कब्जाए गए आवास में एसी से ले कर सभी लग्जरी सामान की व्यवस्था कर रखी थी. उस ने स्विमिंग पूल तक बनवा रखा था.

उस की पत्नी और बेटाबहू साथ रहते थे. उस का अपना जिम था. वह मुफ्त की सरकारी बिजली व पानी इस्तेमाल करता था. रामवृक्ष खुद नायक बना था. अनुयायियों को वह गुरिल्ला अंदाज में लड़ने की ट्रेनिंग देता था. इस के पीछे वजह यह थी कि उसे लगता था कि पुलिस जब भी बाग खाली कराने की जबरदस्ती करेगी, उस से निपट लिया जाएगा.

वह उन से कहता था कि अपनी सत्ता लागू होते ही वह उन की गरीबी दूर कर देगा. जो लोग उस का साथ दे रहे हैं, उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिया जाएगा. मुफ्त जमीन के साथ उन्हें तमाम सुविधाएं दी जाएंगी. नए संविधान में उन का नाम होगा. आने वाली देश की पीढि़यां उन्हें पूजेंगी.

सुबहशाम उस की लड़ाका क्लास चलती थी. बच्चों व किशोरों के मन में अपनी जगह बनाने के लिए उन के हाथों में झंडे थमा कर उन्हें आजाद हिंद फौज का सिपाही बता कर नारे लगवाए जाते थे. उन्हें पेड़ पर चढ़ना व लाठीडंडे चलाना सिखाया जाता था. छोटे बच्चों के लिए उस ने वहीं पर स्कूल खुलवा दिया. इस पीढ़ी को वह अपने ढंग से ढाल रहा था. हकीकत में वह लड़ाके तैयार कर रहा था.

रामवृक्ष के तार नक्सलियों से ले कर अपराधियों तक से जुड़े थे. बाग के अंदर सभी अवैध काम होते थे. तरहतरह के हथियार बनाए जाते थे. धार्मिक आयोजनों की आड़ में हथियारों का आदानप्रदान होता था. अवैध शराब की भट्ठियां भी वहां चलने लगी थीं. वह हिंसक सोच पैदा कर रहा था. वक्त के साथ रामवृक्ष की हिम्मत बहुत बढ़ गई थी.

बाग के नजदीक उद्यान कर्मचारियों के आवास बने थे. वह उन लोगों से भी आवास खाली करने को कहने लगा था. लोग बताते हैं कि सैकड़ों लोग चूंकि वहां जमा रहते थे, इसलिए वे हमेशा डर के साए में जीते थे. बाग में कोई जाता था तो उस के साथ मारपीट की जाती थी. ऐसा नहीं है कि आम जनता ने स्थानीय प्रशासन से शिकायतें नहीं कीं, बल्कि तमाम शिकायतों के बावजूद पुलिस प्रशासनिक अधिकारी रामवृक्ष से टकराने से डरते थे.

स्थानीय लोगों का बाग में आनाजाना पूरी तरह बंद हो गया था. लोग परेशान थे. प्रशासन भी उन्हें हटाने में नाकाम साबित हो रहा था. इस पर एक स्थानीय अधिवक्ता विजयपाल सिंह तोमर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में जवाहर बाग को खाली कराने के लिए जनहित याचिका संख्या 28807/2015 दायर कर दी.

अदालत ने याचिका पर सुनवाई की. रामवृक्ष भी कहां चुप बैठने वाला था. इस आदेश के खिलाफ उस ने भी याचिका दायर की, लेकिन अदालत ने न सिर्फ उस की अरजी को खारिज कर दिया, बल्कि उस पर 50 हजार रुपए का जुरमाना भी लगा दिया. इस के साथ ही हाईकोर्ट ने 20 मई को प्रशासन को अवैध कब्जाधारियों से बाग को खाली कराने के आदेश जारी कर दिए.

इस के बाद रामवृक्ष सतर्क हो गया और उस ने भविष्य के प्रशासनिक टकराव से बचने की तैयारियां शुरू कर दीं. अंदर जाने वालों की रजिस्टर में एंट्री होती थी. खुफिया तंत्र भी रामवृक्ष के नेटवर्क के आगे पूरी तरह नाकाम हो गया था. किसी को पता ही नहीं था कि जवाहर बाग में अनुयायियों को युद्ध तक का अभ्यास कराया जाता है.

अंदर की स्थिति का आंकलन करने में अधिकारी चूक गए. अधिकारियों ने अदूरदर्शिता का परिचय दिया और आधीअधूरी तैयारियों के साथ पहुंच गए. जिस का नतीजा बड़ी हिंसा के रूप में सामने आया. इस प्रकरण की जांच मंडल आयुक्त को सौंप दी गई. वह अपनी जांच पूरी कर पाते कि इसी बीच बढ़ते दबाव के चलते सरकार ने जांच के लिए एक न्यायिक आयोग गठित कर दिया है.

कथा लिखे जाने तक मामले की जांच की जा रही थी और बाग के नएनए रहस्य खुल रहे थे. पुलिस आरोपियों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत काररवाई करने की तैयारी कर रही थी. वहीं प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए शहीद हुए पुलिस अधिकारियों के परिजनों को 50-50 लाख रुपए का मुआवजा व एकएक परिजन को नौकरी देने की घोषणा कर दी है.

वैसे मथुरा हिंसा से जुड़े ढेरों सवाल ऐसे हैं, जिन का जवाब किसी के पास नहीं है. अन्य मामलों की तरह इस हिंसा की भी जांच होगी, जांच के नतीजे भी शायद आ जाएं, लेकिन क्या रामवृक्ष वह अंतिम शख्स होगा, जो लोगों को बरगला कर अपना उल्लू सीधा करते हैं. प्रशासन इतने अरसे खामोश रहा या उसे खामोश रहने पर मजबूर किया गया? सड़क किनारे एक ठेले वाले को लठिया कर हटाने वाली पुलिस भी इतने बड़े कब्जे पर क्यों नाकाम हो गई? वह भी तब जब रामवृक्ष के नारे और भाषण आग लगाने वाले थे.

उस की कुपित मानसिकता तो बहुत पहले सामने आ गई थी. क्या उसे धर्म और कथित देशभक्ति के नाम पर कुछ भी करने की छूट मिल गई थी? बिना सियासी संरक्षण के वह कैसे इतना ताकतवर हो गया था? उसे शह देने वाले, बचाने वाले व सैकड़ों लोगों का खर्चा उठाने वाले कौन थे?

सवाल बहुत हैं, लेकिन इन के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं. बहरहाल मथुरा हिंसा के पन्ने जैसेजैसे खुलेंगे, इस में कोई दोराय नहीं कि वे चौंकाते रहेंगे. एक बात साफ है कि शासनप्रशासन ने 2 साल में गंभीरता दिखाई होती तो शायद ऐसी नौबत कतई न आती.Mathura Violence Case

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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