True Crime Story. किरन की हत्या के आरोप में सोनू, बंटी और उस के चाचा विनोद तथा सुनील जेल तो गए ही, 7 सालों से उस का मुकदमा लड़ रहे हैं. उन्हें आजीवन कारावास की सजा भी हो सकती थी. लेकिन अब वह जीवित मिल गई है. सवाल यह है कि इस मामले में फंसे लोगों ने जो कष्ट झेला, उस का जिम्मेदार किसे माना जाए?

उत्तर प्रदेश के जिला अलीगढ़ के थाना लौधा का एक गांव है बुलाक गढ़ी. इसी गांव के रहने वाले पन्नालाल सूर्यवंशी के परिवार में पत्नी लक्ष्मी के अलावा 4 बेटियां और 2 बेटे थे. इन में से 2 बेटियां उस की पहली पत्नी सुखवीरी से पैदा हुई थीं. छोटी बेटी किरन 4 महीने की थी, तभी सुखवीरी की मौत हो गई थी. छोटीछोटी बेटियों को पालने के लिए पन्नालाल ने लक्ष्मी से शादी कर ली थी.

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एक बेटी पैदा होने के बाद लक्ष्मी के पति ने उसे छोड़ दिया था. मांबाप के घर रह कर वह बेटी को पाल रही थी. पत्नी की मौत के बाद पन्नालाल को पत्नी की जरूरत महसूस हुई तो किसी रिश्तेदार से उसे लक्ष्मी के बारे में पता चला. वह उसे ब्याह कर अपने घर ले आया.

लक्ष्मी से पन्नालाल को 2 बेटे बबलू और धर्मेंद्र तथा 2 बेटियां जीतो एवं रेखा हुईं. इस तरह वह 4 बेटियों और 2 बेटों का बाप बन गया. लक्ष्मी के कहने पर पन्नालाल ने गांव छोड़ दिया और अलीगढ़ के थाना बन्नादेवी के न्यूराजेंद्रनगर में मकान बना कर रहने लगा.

लक्ष्मी के अपने बच्चे हुए तो सौत की बेटियों के प्रति उस का व्यवहार बदल गया. संतो और किरन के प्रति उस का प्यार खत्म हो गया. पत्नी के इस व्यवहार को अगर पन्नालाल चाहता तो बदल सकता था, लेकिन न तो उस ने ध्यान दिया और न ही लक्ष्मी ने अपने व्यवहार में बदलाव लाना चाहा. इस सब से संतो और किरन परेशान रहने लगीं.

पन्नालाल ने सोचा कि वह एकएक कर के दोनों बड़ी बेटियों का विवाह कर दे तो यह सारा झंझट अपनेआप खत्म हो जाएगा. इस के बाद उस ने संतो की शादी अलीगढ़ के ही थाना लौधा के गांव विनीपुर बडा गांव में कर दी तो किरन की शादी अलीगढ़ के ही थाना गौंडा के गांव गिंडौरा के रहने वाले नानकचंद के बेटे रामबाबू के साथ कर दी.

दोनों बेटियों का ब्याह कर के पन्नालाल ने सोचा कि वह झंझट से मुक्त हो गया. लेकिन साल भर बाद ही किरन के पति रामबाबू का व्यवहार उस के प्रति बदल गया. उस का ही नहीं, ससुराल में लगभग सभी का व्यवहार उस के प्रति बदल गया था.

इस की वजह यह थी कि किरन को बेटी पैदा हो गई थी. इस के बाद बातबात में पति उस से मारपीट करने लगा था. कभीकभी तो वह उसे इतना पीट देता कि मजबूर हो कर वह बेटी को ले कर पिता के घर अलीगढ़ आ जाती. लेकिन वहां भी वह सौतेली मां के अत्याचारों से परेशान हो कर नहीं टिक पाती.

मजबूर हो कर ससुराल लौटना पड़ता. इसी तरह ढाई, 3 साल बीत गए. बेटी बड़ी हो गई, लेकिन ससुराल वालों के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया. सन 2007 के अगस्त महीने में रक्षाबंधन से पहले रामबाबू ने मारपीट कर किरन को घर से निकाल दिया. किरन बेटी को ले कर खाली हाथ नंगे पैर पिता के घर पहुंची तो उसे देखते ही सौतेली मां लक्ष्मी ने ताना देते हुए कहा, ‘‘क्यों लाली, भगा दिया न खसम ने, तुम कमबख्तों को रखेगा ही कौन?’’

किरन तो कुछ नहीं बोली, पर पन्नालाल से रहा नहीं गया. उस ने कहा, ‘‘तुझे मेरी बेटी कमब्ख्त दिखती है, मैं मर गया क्या, जो इस तरह की बात करती रही है?’’ ‘‘नेकबख्त ही होती तो पैदा होते ही मां को न खा गई होती.’’ लक्ष्मी ने हाथ नचाते हुए कहा.

किरन ने पन्नालाल की ओर देखते हुए कहा, ‘‘मैं रक्षाबंधन पर भाइयों को राखी बांधने आई हूं. अगर कोई ऐसीवैसी बात होती तो यहां आने के बजाय मैं कुएंपोखर में डूब कर मर जाना ज्यादा अच्छा समझती. फिर जब तक मेरे बाप जिंदा हैं, मुझे यहां आने से कोई नहीं रोक सकता.’’

‘‘यह ठीक कह रही है. अभी तो मैं जिंदा हूं. जितना हक तुम्हारे बच्चों का है, उतना ही हक इस का भी है. यह जब तक चाहेगी, यहां रहेगी.’’ कह कर पन्नालाल अपने कमरे में चला गया.

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7 अक्तूबर, 2007 को किरन अचानक अपनी बेटी के साथ गायब हो गई. रात को घर आने पर पन्नालाल ने लक्ष्मी से किरन के बारे में पूछा तो पहले से ही इस सवाल का जवाब देने के लिए तैयार बैठी लक्ष्मी ने कहा, ‘‘मुझे क्या पता कहां गई है? अरे जाएगी कहां, कहीं से मुंह काला करा के सुबह तक लौट आएगी.’’

‘‘तुम हमेशा उलटीसीधी बातें ही किया करती हो.’’ पन्नालाल ने कहा. ‘‘तो फिर मुझ से क्यों पूछ रहे हो? जैसे तुम्हारी सतीसावित्री बेटी मुझ से बता कर गई है. अब तक नहीं लौटी तो चली गई होगी अपने खसम के घर.’’

पन्नालाल चुपचाप जा कर अपनी चारपाई पर लेट गया. सुबह उठ कर वह सीधे किरन की ससुराल गिंडौरा पहुंचा. किरन उसे वहां नहीं मिली तो उस की चिंता बढ़ गई. उस ने उसे अपनी सारी रिश्तेदारियों में खोजा.

जब किरन कहीं नहीं मिली तो उस ने थाना बन्नादेवी जा कर थानाप्रभारी घनश्याम सिंह को किरन के गायब होने की बात बता कर उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. उस ने कहा कि उसे शक है कि किरन के गायब होने के पीछे बंटी और सोनू का हाथ है.

सोनू और बंटी को पन्नालाल के साले नेत्रपाल की बेटियां ब्याहीं थीं. एक तरह से दोनों उस के दामाद लगते थे. इस के बावजूद उस ने उन के खिलाफ रिपोर्ट लिखा दी थी. पुलिस ने गुमशुदगी तो दर्ज कर ली थी, लेकिन किरन को ढूंढने की कौन कहे, सोनू और बंटी से पूछताछ तक नहीं की. पन्नालाल जब भी थाने जाता, बहाना बना कर उसे लौटा दिया जाता.

थाना पुलिस से परेशान हो कर पन्नालाल ने प्रदेश स्तर तक के लगभग सभी अधिकारियों को प्रार्थना पत्र भेजे. लेकिन इस का भी उसे कोई लाभ नहीं मिला. इस के बाद उस ने एसएसपी के औफिस जा कर आत्मदाह की धमकी दी, तब कहीं जा कर एसएसपी ने इस मामले को थाना बन्नादेवी से हटा कर थाना सासनी गेट पुलिस को सौंप कर एक महीने में जांच पूरी करने की हिदायत दी.

थाना सासनी गेट पुलिस को इस मामले की जांच मिली ही थी कि 16 फरवरी, 2008 को थाना बन्नादेवी पुलिस ने नगला महताब स्थित तालाब के पास से एक महिला की अधजली लाश बरामद की. लाश अधजली जरूर थी, लेकिन उस का चेहरा सहीसलामत था. बन्नादेवी पुलिस के पास किरन का फोटो था. उस की शक्ल किरन से मेल खा रही थी, इसलिए पुलिस ने पन्नालाल को बुला लिया.

थोड़ी ही देर में पन्नालाल पत्नी लक्ष्मी और बेटे बबलू के साथ घटनास्थल पर पहुंच गया. लाश को देख कर सभी ने उस की शिनाख्त किरन की लाश के रूप में कर दी. कहीं कोई गलती न हो जाए, पन्नालाल ने पहचान भी बता दी. बचपन में किरन के एक हाथ की अंगुली में चोट लग गई थी, जिस से वह टेढ़ी हो गई थी. लाश के भी एक हाथ की एक अंगुली टेढ़ी थी. इस से साफ हो गया कि लाश किरन की ही थी.

इस के बाद पुलिस ने इस मामले को भादंवि की धारा 366, 302/34 व 201/34 के अंतर्गत बंटी, सोनू, विनोद और सुनील के खिलाफ दर्ज कर चारों को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. 3 महीने बाद बड़ी मुश्किल से अभियुक्तों की जमानतें हो सकीं. उस के बाद से हत्या का यह मुकदमा एडीजे 7 की अदालत में चल रहा था. एक अभियुक्त सुनील की 01 अगस्त, 2012 को एक्सीडेंट में मौत भी हो चुकी है.

लेकिन दिसंबर, 2015 को इस मुकदमे में उस समय नया मोड़ आ गया, जब एक फेरी लगालगा कर सामान बेचने वाले ने अभियुक्तों के परिवार वालों को बताया कि जिस किरन की हत्या के मामले का वे लोग मुकदमा लड़ रहे हैं, वह जिंदा है.

दरअसल, गांवगांव, गलीकूचों में फेरी लगा कर औरतों का सामान बेचने वाला वह आदमी जिला हाथरस की तहसील सिकंदराराऊ के गांव सूसामई में सामान बेचने के लिए फेरी लगा रहा था, तभी उस की नजर एक घर में घुस रही जिस युवती पर पड़ी, उसे लगा कि यह तो पन्नालाल की बेटी किरन है.

शंका के समाधान के लिए उस ने दरवाजे के बाहर से उस का नाम ले कर आवाज लगाई तो उस ने दरवाजे पर आ कर पूछा, ‘‘क्या बात है ताऊ, आप ने आवाज क्यों लगाई?’’ ‘‘बेटी तू किरन ही है न? अलीगढ़ के न्यूराजेंद्रनगर के रहने वाले पन्नालाल की बेटी?’’

किरन ने हां कहा तो वह सोच में पड़ गया कि जब किरन जिंदा है तो वह लाश किस की थी, जिस की शिनाख्त इस के मातापिता और भाई ने की थी. इस की हत्या के आरोप में कुछ लोग जेल भी गए थे, जिन में बंटी और सोनू तो उस के रिश्तेदार थे. ‘‘क्या सोच रहे हो ताऊ?’’ किरन ने पूछा.

फेरी वाला कोई जवाब दिए बगैर आगे बढ़ गया. उस ने यही बात सोनू और बंटी के घर वालों को बताई तो पहले किसी को विश्वास ही नहीं हुआ. लेकिन जब इस बात की जानकारी बंटी की मौसी को हुई तो उन्होंने कहा कि चोरीछिपे जा कर इस बात का पता लगाने में बुराई क्या है?

इस पर भी बंटी राजी नहीं हुआ तो उस की मौसी उसे अपने गांव के एक समाजसेवी डा. सत्यदेव रावत के पास ले गई और उन्हें पूरी बात बताई. जिस गांव में किरन के जीवित होने की बात बताई गई थी, उसी गांव में डा. सत्यदेव रावत के गांव की 2 लड़कियां ब्याही थीं.

सब लोग पहले उन्हीं के घर पहुंचे. वहां से पता चला कि 8-9 साल पहले चंडीगढ़ में नौकरी करने वाला महेशचंद्र कहीं से किरन नाम की एक औरत को गांव ले आया था. जिस समय वह गांव आई थी, उस के साथ ढाई, 3 साल की एक बेटी भी थी, जिसे वह भावना कहती थी, बाद में वह बीमारी से मर गई थी.

नाम भी किरन था, उस की बेटी का नाम भी भावना था. सब कुछ मिल रहा था. यह सब संयोगवश नहीं हो सकता था. इस के बाद सभी लोग ग्रामप्रधान नारायण हरि के घर गए और उन्हें सारी बात बता कर किरन से मिलने की इच्छा जाहिर की. ग्रामप्रधान ने किरन से मुलाकात कराई तो पता चला कि वह वही किरन थी, जिस की हत्या के आरोप में सोनू, बंटी, विनोद और सुनील जेल जा चुके थे और अभी भी मुकदमा लड़ रहे थे.

फिर क्या था, 3 फरवरी, 2016 को मुकदमे की तारीख पर अभियुक्तों के वकील मूलचंद शर्मा ने अदालत को किरन के जिंदा होने की जानकारी देते हुए उस का आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र, जिस पर उस की फोटो थी, पेश कर दिए.

इस के बाद विद्वान न्यायाधीश ने थाना बन्नादेवी पुलिस को अगली तारीख 23 फरवरी, 2016 को आख्या प्रस्तुत करने का आदेश दिया. थाना बन्नादेवी की सबइंसपेक्टर सुरभि ने अपनी आख्या प्रस्तुत करते हुए अदालत को बताया कि किरन ने महेशचंद्र से 8 साल पहले प्रेमविवाह किया था, महेश चंडीगढ़ में पेंटर का काम करता था.

न्यायाधीश ने पुलिस द्वारा दी गई अधूरी जानकारी से नाराज होते हुए कहा कि महेश के पिता तिलक सिंह से महेश का वर्तमान पता और मोबाइल नंबर लिया जा सकता था, लेकिन थाना बन्नादेवी पुलिस ने इस के लिए कोई प्रयास नहीं किया. इसलिए थाना बन्नादेवी के थानाप्रभारी को आदेश दिया जाता है कि वह तिलक सिंह से महेश का वर्तमान पता, मोबाइल नंबर लेने के साथ 18 मार्च, 2016 को किरन को न्यायालय में पेश करें.

18 मार्च, 2016 को एसआई सुबोध कुमार और हैडकांस्टेबल आराम सिंह यादव ने महिला पुलिस की मदद से किरन को अदालत में पेश कर के महेश का पता, मोबाइल नंबर के अलावा गांव सूसामई के ग्रामप्रधान नारायण हरि एवं ग्राम गिंडौरा के ग्रामप्रधान अजयवीर द्वारा लिखे गए पत्र भी पेश किए.

किरन के जीवित होने की पुष्टि उस के घर वाले ही कर सकते थे. इसलिए न्यायाधीश ने अगली तारीख 26 मार्च, 2016 देते हुए उस दिन उस के घर वालों को अदालत में पेश करने का आदेश दिया. चूंकि वह किरन ही थी, इसलिए घर वालों ने भी उस की पहचान किरन के रूप में कर दी. उस दिन अदालत में उस ने अपनी जो दुखभरी कहानी सुनाई थी, वह इस प्रकार थी.

7 अक्तूबर, 2007 की वह तारीख थी, जब किरन को उस की सौतेली मां लक्ष्मी ने बिना वजह बेल्टों से पीटा था. पिता के आने पर जब उस ने बदन पर बेल्टों की मार के पड़े निशान दिखाते हुए मां की शिकायत की तो पिता ने भी उसे ही डांटा. इस के बाद दुखी मन से किरन चुपचाप बेटी को ले कर घर से निकली और जीटी रोड पर जा कर एक बस में सवार हो गई, जो सिकंदराराऊ तक जा रही थी.

सिकंदराराऊ पहुंचने तक दिन ढल चुका था. उस की बगल में जो आदमी बैठा था, उस का नाम महेशचंद्र था. वह चंडीगढ़ में पेंटरी का काम करता था. उस दिन वह चंडीगढ़ से अपने गांव सूसामई जा रहा था. सिकंदराराऊ बसस्टैंड पर बस रुकते ही सारी सवारियां नीचे उतरने लगीं तो किरन भी उठी.

महेश ने उस की बेटी को गोद में ले कर नीचे उतारते हुए पूछ लिया कि उसे कहां जाना है? उस के इस सवाल से किरन की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली. किरन को रोता देख महेश ने जब उस से रोने की वजह पूछी तो सीधीसादी किरन ने सारी सच्चाई बता कर उसे अपने साथ घर ले चलने को कहा.

महेश अविवाहित था, फिर भी उसे साथ ले जाने को तैयार नहीं हुआ. किसी पराई औरत को इस तरह वह कैसे अपने घर ले जा सकता था. लेकिन किरन की जिद के आगे मजबूर हो कर उसे इस शर्त पर अपने घर ले गया कि अगर उस के घर वाले उसे अपने घर में रखने को तैयार नहीं हुए तो वह उसे यहीं छोड़ जाएगा.

किरन अपनी बेटी को ले कर महेश के साथ उस के घर पहुंची तो सभी के पूछने पर महेश ने उस के साथ घटी घटना बता दी. महेश का सीधासादा परिवार था. पूछने पर किरन ने कह दिया कि अगर महेश उसे पत्नी बना कर रखता है तो वह तैयार है.

महेश के पिता ने गांव वालों के सामने महेश और किरन की शादी करा दी. इस के बाद किरन महेश की पत्नी बन कर उस के घर रहने लगी. तब से अब तक वह महेश की पत्नी बन कर रह रही थी. इन 8 सालों में महेश और किरन के 3 बच्चे हुए. जिन में सब से बड़ा बेटा नागेश 6 साल का है. किरन अपनी ससुराल में हर तरह से खुश थी. वह भूल चुकी थी कि उस का महेश और उस के घर वालों के अलावा और भी कोई है.

किरन का कहना था कि उसे पता नहीं था कि उस के मांबाप ने उस की हत्या के आरोप में उस के मामा के दोनों दामादों के अलावा उन के चाचा विनोद तथा सुनील को जेल भिजवा दिया है. भला हो उस फेरी वाले का, जिस की नजर उस पर पड़ गई. उसी की वजह से जो बेगुनाह लोग सजा भुगत रहे थे, छूट जाएंगे.

दरअसल, बंटी और सोनू का दोष सिर्फ यह था कि वे किरन का पक्ष लेते थे. उस के लिए वे पन्नालाल तथा लक्ष्मी से लड़ाई कर बैठते थे. उन्होंने उन लोगों को ही नहीं, किरन की ससुराल वालों को भी धमकी दी थी कि अगर किरन को कुछ हुआ तो वे सभी को देख लेंगे. वे उन का कुछ कर न सकें, शायद इसीलिए जब किरन गायब हुई तो पन्नालाल और लक्ष्मी ने पहले उन्हीं पर उस के गायब होने का आरोप लगाया, बाद में लाश मिली तो हत्या के आरोप में फंसा दिया.

विनोद और सुनील को इसलिए फंसाया गया था कि ये दोनों होमगार्ड थे. पन्नालाल ने सोचा कि अगर इन दोनों को भी फंसा दिया जाएगा तो सोनू और बंटी की कोई पैरवी करने वाला नहीं रहेगा.

जिस दिन किरन अदालत में आई थी, उस से मिलने उस के मामा की दोनों बेटियां, जो बंटी और सोनू को ब्याही थीं, चाची तथा कुछ अन्य रिश्तेदार भी आए थे. किरन की मामा की बेटियों के लिए यह एक तरह से चमत्कार था कि उन की बहन तो मिली ही, अब उन के पति भी छूट जाएंगे.

अदालत क्या निर्णय लेगी, यह जानने में अभी समय लगेगा. लेकिन 4 अप्रैल को किरन के पिता पन्नालाल, भाई बबलू, पूर्व पति रामबाबू और सास ओमवती ने शपथ पत्र दे कर स्वीकार किया है कि यही वह किरन है, जिसे उन्होंने मृत मान लिया था.

आजीवन कारावास की सजा की ओर बढ़ रहे बंटी, सोनू और विनोद का कहना है कि शायद उन्होंने किसी का बुरा नहीं किया था, इसीलिए सजा होने से पहले ही किरन जीवित मिल गई. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों और किरन के बयान पर आधारि

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