Family Crime. यूपी पुलिस की कांस्टेबल लता सिंह जानती थी कि टैक्सी ड्राइवर दान सिंह की पहली पत्नी मर चुकी है और अपनी एक बेटी को वह पालपोस रहा है, इस के बावजूद वह दान सिंह को दिल दे बैठी. इतना ही नहीं, दोनों ने शादी भी कर ली. एक बेटे की मां बनने के बाद लता सिंह पर पति के जुल्मोसितम बढ़ते गए. फिर एक दिन ऐसा आया कि…
एक दिन दान सिंह ने रवि से कहा, ”रवि तू तो मेरा भाई है. मैं इस वक्त बहुत उलझन में हूं. मैं अपनी पत्नी लता सिंह को ठिकाने लगाना चाहता हूं. साथ में ही बेटे लड्डू को भी. क्योंकि मैं उस की ये निशानी भी रखना नहीं चाहता. इस योजना में तू मेरी मदद कर.’’
”बताओ भाई दान सिंह, तमंचा, छुरी, चाकू क्या ला कर दूं. कहां पर कैसे मारना है. मैं भी साथ चलूंगा, लेकिन सोच ले वो सिपाही है. उस की हत्या होते ही पूरा महकमा लोटपोट हो जाएगा. सात समंदर पार भाग जाएं या पाताल में भी छिप जाएं, तब भी पुलिस हमें ढूंढ लेगी और हमारा बचना मुश्किल होगा.’’ दान सिंह बोला.
”मेरे दिमाग में एक आइडिया है. मैं अपनी पहली पत्नी के साथ बाइक से कहीं जा रहा था. बस से एक्सीडेंट हो गया था. मेरी पत्नी की मौत हो गई थी और मैं भी थोड़ाबहुत घायल हुआ था. पूरा दोष बस वाले पर ही आया था. मुझ पर किसी ने कोई शक नहीं किया और न ही मेरा उस में हाथ था, लेकिन अब अगर मैं इस चुड़ैल को इसी तरह एक्सीडेंट दिखा कर ठिकाने लगा दूं तो मैं साफ बच सकता हूं.
”इस में मुझे तुम्हारी मदद की जरूरत पड़ेगी. और लोगों से भी मेरी बात हो गई है. पूरी टीम बन गई है. पूरा प्लान तैयार कर लिया गया है. नूर हसन और प्रदीप कुमार को भी पैसे दे कर इस डबल मर्डर की प्लानिंग में शामिल कर लिया है.
”नूर हसन और प्रदीप कुमार दूसरी कार में हमारे आसपास साथसाथ चलते रहेंगे. उन की कार में एक हथौड़ा, एक 5 लीटर की कैन में पेट्रोल भी होगा. एक अपना साथी सलमान है, वो डंपर की व्यवस्था देखेगा.’’
पूरी योजना बनाने के बाद दान सिंह ने अपनी पत्नी को फोन किया. यह फरवरी, 2026 के दूसरे सप्ताह की बात है. उस ने पत्नी से कहा कि मैं ने मारुति सुजुकी स्विफ्ट नई गाड़ी बुक करा दी थी. उस की डिलीवरी मिलने वाली है. एक काम करो, तुम छुट्टी ले कर घर आ जाओ. हम लोग साथसाथ गाड़ी लेने के लिए चलेंगे.
दान सिंह की पत्नी लता सिंह उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल थी. पुलिस में वैसे भी छुट्टियों का बड़ा टोटा रहता है. लता ने कहा कि मैं ने छुट्टी के लिए अप्लाई कर दिया है. अगर छुट्टी मिल जाती है तो मैं पहुंच जाऊंगी और नहीं मिलती है तो फिर तुम खुद से ही कार को ले कर आ जाना.
लता अपने प्रेमी के साथ रंगरेलियां मनाने के साथ अपने पति को भी साध कर चल रही थी, जिस से कि पति से पैदा हुए बेटे की परवरिश ठीकठाक होती रहे. लता को उस दिन छुट्टी नहीं मिली. किसी तरह का कोई विवाद नहीं हुआ. छुट्टी न मिलना एक सामान्य सी बात थी. दान सिंह कार घर ले आया.
लता छुट्टी के लिए प्रयासरत थी. फलस्वरूप 17 फरवरी, 2026 को 10 दिनों की छुट्टी पर वह अपने घर आ गई.
तभी पतिपत्नी ने एक फैसला किया कि नई कार खरीदने की खुशी में एक दिन के लिए नैनीताल के टूर पर चलेंगे. दान सिंह ने उस दिन सिर्फ एक सफर की योजना नहीं बनाई थी, बल्कि उस ने इंसानियत से अपने आखिरी रिश्ते को भी खत्म करने की ठान ली थी.
20 फरवरी, 2026 को नैनीताल टूर निर्धारित किया गया. उस दिन लता सिंह के प्रेमी ने एक विशेष मुलाकात का दिन फिक्स कर लिया था, अत: लता सिंह ने किसी तरह से 20 फरवरी का कार्यक्रम निरस्त कर दिया. लता सिंह ने पति को यह अहसास नहीं होने दिया कि वह किसी और के साथ किसी और टूर पर है. बहाना बनाया कि विभाग की एक महिला सिपाही के बच्चे का जन्मदिन है.
सब कुछ जानते हुए भी दान सिंह ने उसे सहज ही स्वीकार कर लिया. इन छुट्टियों का फायदा उठाते हुए लता सिंह ने अपने प्रेमी के साथ कई दिन मौजमस्ती में बिताए थे. यह सब कुछ जानने के कारण दान सिंह के दिल में आक्रोश का ज्वालामुखी अंदरअंदर धधक रहा था. उस के बाद घूमने के लिए 25 फरवरी, 2026 का दिन तय हो गया.
25 जनवरी, 2026 को नैनीताल के टूर की तैयारियां मुकम्मल थीं. सुबह का वक्त था. लता अपने ढाई साल के बेटे को ले कर गाड़ी में पीछे बैठ गई. ड्राइविंग सीट पर दान सिंह और बराबर में एक रिश्ते का भाई रवि कुमार बैठ गया.
पत्नी लता के पूछने से पहले ही दान सिंह ने बताया कि रवि को लड्डू की वजह से साथ ले लिया है. रवि उसे संभालने और घुमाने में हमारी मदद करता रहेगा.
लता सिंह ने कोई आपत्ति नहीं की, क्योंकि रवि अच्छे देवरों में से एक था.
नैनीताल का कार्यक्रम एक साधारण रूटीन जैसा था. शादी के पहले और शादी के बाद भी ऐसे बहुत से कार्यक्रम बनते रहते थे. दोनों के बीच ऐसा कोई विवाद ओपन नहीं हुआ था, जिस से लता को किसी तरह का कोई शकशुबहा हो. वे पूरे दिन घूमते रहे और मौजमस्ती की.
पहाड़ों की ओर जाती घुमावदार सड़कें जैसे ही ऊंचाई पकडऩे लगती हैं, हवा में एक अलग ही ठंडक घुल जाती है. दान सिंह और उस की पत्नी लता की कार धीरेधीरे नैनीताल की वादियों में प्रवेश कर रही थी. चारों तरफ ऊंचेऊंचे देवदार और चीड़ के पेड़, जिन की खुशबू हवा के साथ मन को सुकून दे रही थी. नीचे गहरी खाइयां और दूरदूर तक फैले बादल, मानो आसमान खुद धरती के करीब आ गया हो.
शहर के बीचोबीच फैली नैनी झील की झलक ने लता का मन मोह लिया. झील का पानी हरेनीले रंग में चमक रहा था और उस में तैरती रंगबिरंगी नावें किसी चित्रकला जैसी लग रही थीं. दान सिंह ने गाड़ी रोकी और दोनों झील के किनारे आ कर खड़े हो गए. लड्डू भी खुशी से समा नहीं रहा था. रवि उसे गोद में लिए पीछेपीछे लगा हुआ था.
कुछ देर बाद वे नाव में बैठे. नाविक धीरेधीरे चप्पू चला रहा था और नाव पानी को चीरते हुए आगे बढ़ रही थी. लता मुसकरा रही थी. शायद लंबे समय बाद उसे ऐसा सुकून मिला था. उस ने पानी को हाथ से छू कर देखा, ठंडा और निर्मल जैसे पहाड़ों का दिल हो.
नाव से उतर कर वे मौल रोड, नैनीताल की ओर बढ़े. सड़क के दोनों ओर सजी छोटीछोटी दुकानों में रंगबिरंगे शौल में से लता ने एक खूबसूरत शौल पसंद की, जो दान सिंह ने बिना मोलभाव किए खरीद ली.
शाम ढलने लगी थी और आसमान नारंगी रंग में रंग गया था. वे दोनों स्नो व्यू पौइंट की ओर निकल पड़े. वहां से हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियां साफ दिखाई दे रही थीं. डूबते सूरज की किरणें जब उन चोटियों पर पड़तीं तो वे सोने की तरह चमकने लगतीं. लता कुछ देर तक बस चुपचाप उस दृश्य को देखती रही.
रात होतेहोते शहर की रोशनी झील में झिलमिलाने लगी. नैनी झील अब तारों की तरह चमक रही थी. यह सफर बाहर से एक खूबसूरत याद जैसा था. प्यार, सुकून और पहाड़ों की मासूमियत से भरा हुआ. लेकिन कहानी की गहराई में कहीं न कहीं एक अनजाना साया भी साथ चल रहा था, जिसे अभी कोई देख नहीं पा रहा था.
रात का भोजन भी एक अच्छे होटल में सभी ने एक साथ खाया. प्लानिंग में शामिल नूर हसन और प्रदीप कुमार एक दूसरी कार में आसपास कुछ दूरी बना कर मौजूद थे. रात के साढ़े 10 बजे के लगभग सभी नैनीताल से रामपुर की ओर चल दिए.
इस से पहले योजना के अनुसार नैनीताल से आते समय जैसे ही कार बाजपुर के पास पहुंची, दान सिंह ने रास्ते में गाड़ी रोकी. उस ने सहजता से कोल्ड ड्रिंक की बोतलें खरीदीं. पहले से पीस कर जेब में रखी नींद की गोलियां दोनों की कोल्ड ड्रिंक में मिला कर घोल दीं.
पत्नी और बेटे को क्या पता था कि इन बोतलों में सिर्फ ठंडक नहीं, बल्कि गहरी नींद का जाल भी घुल चुका है. मुसकराते हुए उस ने दोनों को पेय थमाया. पत्नी ने झूठी मुसकान चेहरे पर लाते हुए पति की ओर देखा. पति के दिल में तो कुछ और ही चल रहा था, लेकिन उस ने भी उसी अंदाज में शरारती मुसकराहट से उस का जवाब दिया.
जब बेटे ने कोल्ड ड्रिंक ली तो वह मासूमियत से मुसकराया. उस ने पापा की गोद में चढऩे के लिए अपनी बाहें फैलाईं. उस समय दान सिंह ने थपथपा कर मम्मी की गोद में ही उसे बैठा दिया. उसे यह आभास भी नहीं था कि उसी पेय में उस की नींद और मौत छिपी हुई है. कुछ ही देर में दोनों की आंखें भारी होने लगीं और फिर वे बेहोशी की गहराई में उतर गए.
कार अब आगे बढ़ रही थी. सुनसान रास्ता देख कर दान सिंह ने अपने अगले कदम की तैयारी की. रामपुर में ही गंज थाना क्षेत्र में एक गांव काशीपुर के आसपास की यह बात है. प्लानिंग में शामिल नूर हसन और प्रदीप कुमार एक दूसरी कार में मौजूद थे. 5 लीटर की कैन में पेट्रोल पहले से भरा हुआ था.
योजना में शामिल बड़ा ट्रक यानी डंपर भी वहीं आसपास खड़ा हो गया. दान सिंह ने पहले से तय योजना के मुताबिक डंपर से हल्की टक्कर करवाई, ताकि पूरी घटना एक सड़क हादसा लगे.
दान सिंह ने अपने साथी प्रदीप और सलमान को पेट्रोल ले कर बुलाया. प्लानिंग के अनुसार दोनों घटनास्थल के आसपास ही थे. वे दोनों एक ही कार में सवार थे. सुनसान जंगल में पहुंच कर दोनों ने दान सिंह की कार पर पेट्रोल छिड़का और लाइटर से उस में आग लगा दी.
उस समय वह यह भी भूल गया कि जिस बच्चे को वह आग के हवाले करा रहा है, उस ने अभी उस की अंगुली पकड़ कर चलना सीखा था.
इस के बाद दान सिंह कार से कूद गया. अपने भाई रवि कुमार को उस ने प्लानिंग का हिस्सा बनाया था कि जब गाड़ी में ज्यादा आग लगेगी, तब तुम्हें निकलना है. आग की लपटों को देख स्वाभाविक है कि घटनास्थल की तरफ लोग जरूर भाग कर आएंगे. थोड़ीबहुत झुलस जाओगे तो कोई बात नहीं. पब्लिक को लगना चाहिए कि ये हादसा है, हत्या नहीं.
कुछ ही देर बाद रवि कुमार भी कार में से कूद कर बाहर निकल आया. इतनी देर में ही कार में आग की ऊंचीऊंची लपटें उठने लगीं. आग लगने के कारण लता होश में आ गई और कार से बाहर निकली तो वह लडख़ड़ा कर बाहर एक पानी भरे गड्ढे में गिर गई.
यह देख कर तीनों के होश उड़ गए. वहां भी दान सिंह ने लता सिंह को बचाने के लिए पूरा नाटक किया. दान सिंह के शातिर दिमाग में फिर एक आइडिया आया. लता सिंह को बचाने के बहाने वह भी पानी से भरे गड्ढे में कूद गया. उस ने लता का मुंह पानी में डुबोने की कोशिश की, जिस से उस की जीवनलीला समाप्त हो जाए.
तब तक काफी लोग घटनास्थल पर पहुंच चुके थे. कुछ लोगों ने अपने मोबाइल की लाइटें लता की तरफ फोकस करनी शुरू कर दी थी. अपना प्लान फेल होता देख दान सिंह ने फिर पैंतरा बदला. लता को पानी के गड्ढे में से निकाल कर बाहर ले आया. भीड़ में किसी की सूचना पर एंबुलेंस भी मौके पर आ चुकी थी.
कुछ सिपाही भी घटनास्थल पर आ गए थे. लोगों ने दोनों घायलों को एंबुलेंस में बैठा कर अस्पताल ले जाने के लिए कोशिश की, लेकिन दान सिंह ने एंबुलेंस में ले जाने से इनकार कर दिया. उस को रोताबिलखता देख कर हर किसी को दान सिंह पर तरस आ रहा था.
दान सिंह लता और अपने भाई को ले कर वहां पहले से मौजूद दूसरी कार में बैठ कर संजीवनी अस्पताल की ओर चल दिया. हौस्पिटल वालों ने भाई रवि का तो इलाज शुरू कर दिया, लेकिन पत्नी की हालत बहुत ज्यादा गंभीर थी, इसलिए उसे बरेली रेफर कर दिया गया.
दान सिंह ने अपनी योजना के अनुसार एक हथौड़ा भी कार में पहले से रख लिया. प्लानिंग यह थी कि बेहोशी की हालत में कार में ही हथौड़े से मार कर शव को डंपर के आगे डाल दिया जाएगा, जिस से साबित हो कि लता की मृत्यु एक्सीडेंट में हुई है.
दूसरे यह कि दान सिंह जानता था कि आग कभीकभी धोखा दे सकती है. अगर लता या बच्चा आग से बच निकले या चीखने लगे तो उन्हें खामोश करने के लिए एक ऐसा हथियार चाहिए, जो बंदूक की तरह शोर न करे. एक ही वार में काम तमाम कर दे और जिसे एक्सीडेंट के दौरान लगी चोट बताया जा सके.
हथौड़ा उस ने इसलिए चुना, ताकि वह पुलिस को कह सके, ‘टक्कर इतनी जोरदार थी कि उस का सिर डैशबोर्ड या पिलर से जा टकराया.’
दान सिंह ने बरेली जाते समय रास्ते में ही हथौड़े से पत्नी के सिर पर वार कर के उसे मौत के घाट उतार दिया. जहां पति का हाथ, जो कभी सहारा था, अब मौत का औजार बन गया. उस की पत्नी की मौके पर ही मौत हो गई.
मृतका को इलाज के लिए ले कर वह अस्पताल पहुंचा तो अस्पताल में मौजूद डौक्टरों ने देखते ही उसे मरा घोषित कर दिया. अधिकतर एक्सीडेंट के मामले में चोट सिर में लगने से मौत होने की रिपोर्ट पोस्टमार्टम में आती है.
इस घटना में सब से गहरी संवेदना बेटे लड्डू की ममता है. ढाई साल का बच्चा, जिसे दुनिया का सब से सुरक्षित ठिकाना अपने पिता की गोद लगती थी, उसी पिता ने उसे मौत की ओर धकेल दिया था.
प्यार, विश्वास और ममता का गला घोंट कर जब इंसान शैतानियत की आग में जलता है तो उस का चेहरा इंसानियत से नहीं, बल्कि क्रूरता से पहचाना जाता है. दान सिंह ने ऐसा क्यों किया, इस के पीछे भी एक बड़ी दिलचस्प कहानी है.
लता सिंह उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर के अटरिया गांव की रहने वाली थी. वह उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही थी. खाकी वरदी पहन कर जब वह ड्यूटी पर निकलती तो उस की आंखों में एक सख्त तेवर होता था, लेकिन उसी वरदी के भीतर एक कोमल मन भी था, जो अपनों के लिए धड़कता था.
लता सिंह वरदी में जितनी सख्त दिखती थी, दिल से उतनी ही मुलायम थी. दिनभर की ड्यूटी, थाने का दबाव, लोगों की शिकायतें, इन सब के बीच उस ने अपने अंदर एक खालीपन भी महसूस करना सीख लिया था. शायद जिंदगी ने उसे मुसकराने के मौके कम दिए थे.
एक दिन उस के परिवार को रिश्तेदारी में जाना था. सफर लंबा था, इसलिए उन्हें एक किराए की टैक्सी की जरूरत थी. इत्तेफाक से उन्होंने किराए पर जो टैक्सी बुक की थी, दान सिंह उस टैक्सी का ड्राइवर था.
दान सिंह पहली ही मुलाकात में कुछ अलग लगा. बोलने का सलीका, आंखों में एक गहराई और चेहरे पर सादा मुसकान. रास्ते भर वह न केवल गाड़ी चला रहा था, बल्कि सब का खयाल भी रख रहा था. कहीं पानी की जरूरत, कहीं चाय के लिए रुकना.
लता चुपचाप उसे देखती रही. दान सिंह, एक शांत और सुलझा हुआ व्यक्ति, जिस की ड्राइविंग में जितनी कुशलता थी, उस की बातों में उतनी ही सादगी. रास्ते भर दान सिंह ने जिस तरह से परिवार के बुजुर्गों का सम्मान किया और बच्चों से बातें कीं, उस ने सब का दिल जीत लिया.
परिवार के लोगों को दान सिंह बहुत पसंद आया. जाते समय उन्होंने उस का मोबाइल नंबर ले लिया. लता के परिजनों ने कहा, ”दान सिंह, अगर हमें कहीं बाहर जाना होगा तो तुम्हें ही बुलाएंगे.’’
दान सिंह पेशेवर टैक्सी ड्राइवर था. मंदी के दौर में कोई परमानेंट ग्राहक मिलता है तो उसे कौन छोड़ता है. दान सिंह ने मुसकरा कर हामी भर दी. धीरेधीरे यह एक सिलसिला बन गया. कभी बाजार जाना हो, कभी किसी शादी में या कभी ड्यूटी से घर आना हो, लता के परिवार की पहली पसंद दान सिंह ही होता. फोन की एक घंटी पर दान सिंह हाजिर हो जाता.
इन यात्राओं के दौरान कार के पिछले शीशे से लता और दान सिंह की नजरें अकसर टकरातीं. धीरेधीरे सफर बढ़ते गए, दान सिंह उन के घर का एक जानापहचाना चेहरा बन गया. जब भी कहीं जाना होता, फोन उसी को किया जाता. हर बार वही सादगी, वही अपनापन. हर बार अपनी सेवा में उस ने कोई कसर नहीं छोड़ी.
एक शाम जब लता ड्यूटी के बाद अकेली दान सिंह की कार से घर लौट रही थी, बातों का रुख निजी जीवन की ओर मुड़ गया. दान सिंह ने एक लंबी सांस ली और बड़ी ईमानदारी से अपने जीवन का सब से गहरा घाव लता के सामने रख दिया. दान सिंह बोला, ”हर इंसान के अंदर कुछ ऐसा होता है जो उसे बदल देता है.’’
उस ने आगे बताया, ”मैडम, मेरी जिंदगी इतनी सहज नहीं रही. मेरी शादी हुई थी, एक प्यारी सी नन्ही बेटी भी है. लेकिन एक सड़क हादसे ने मेरी पत्नी को मुझ से हमेशा के लिए छीन लिया. साल 2015 में उस की मौत हो गई थी. मैं आप को अपने बारे में पहले ही बता रहा हूं. मेरे पास एक बेटी भी है. उस बेटी का पालनपोषण मेरे पेरेंट्स कर रहे हैं. अब मैं बस अपनी बेटी के लिए जी रहा हूं.’’
उस की आवाज में कोई शिकायत नहीं थी, बस एक अकेलापन था, जिस ने लता के दिल को छू लिया. उस की आवाज में दर्द था, लेकिन शिकायत नहीं. लता के दिल में कुछ पिघल गया. उसे लगा जैसे किसी ने उस के अपने खालीपन को शब्द दे दिए हों.
एक सिपाही जो दुनिया भर के अपराधों और दुखों को देखती थी, आज एक पिता और पति के नि:स्वार्थ संघर्ष को देख रही थी. लता को अहसास हुआ कि वह दान सिंह के केवल व्यवहार से नहीं, बल्कि उस की सच्चाई और जिम्मेदारी निभाने के जज्बे से प्रेम करने लगी है.
उस दिन के बाद दोनों के बीच बातचीत बढऩे लगी. पहले सफर तक सीमित बातें अब फोन तक पहुंच गईं. कभी हालचाल, कभी हंसीमजाक, कभी चुप्पी में भी समझ.
लता को दान सिंह की सादगी और जिम्मेदारी पसंद आने लगी. और दान सिंह को लता की सख्ती के पीछे छिपा उस का कोमल दिल. उस समय दोनों युवा थे, उन की आंखों में भविष्य के सपने और एकदूसरे के लिए असीम प्यार था. उन का शरीर और उन का व्यक्तित्व उन की इसी युवावस्था और जोश की कहानी कहता था. दोनों का योग भी फिट बैठ रहा था.
उस समय दान सिंह की काठी सुडौल और गठीली थी. उस की चौड़ी छाती और मजबूत बाजू, उस सुरक्षा और संबल का प्रतीक थे, जो वह अपनी प्रेमिका को देना चाहता था. उस की दाढ़ी और मूंछें उस के मर्दाना रूप को उभार रही थीं, जिस में आत्मविश्वास और जिम्मेदारी का भाव झलकता था.
उस का सीधा, सरल और आत्मविश्वासपूर्ण व्यक्तित्व एक ऐसे युवक का था, जो अपनी मेहनत और ईमानदारी से एक सुखद भविष्य बनाने को आतुर था. उस की नजरें अपनी प्रेमिका की ओर टिकी थीं, जिन में उस के प्रति गहरा लगाव और भरोसा साफ झलक रहा था.
लता का भी व्यक्तित्व उस समय नारीत्व के पूर्ण सौंदर्य और लालित्य का परिचायक था. उस की काया में एक अनोखा खिंचाव था, जो युवावस्था की सजीवता को दर्शाता था. उस की आकर्षक कमर और सुगठित अंग उस के शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन को दर्शा रहे थे.
उस के चेहरे पर फैली मुसकान और आंखों में चमक, उस की खुशी और संतुष्टि को बयां कर रही थी. उस ने माथे पर बिंदी लगाई थी, वह उस के भारतीय मूल्यों और परंपराओं के प्रति जुड़ाव के साथसाथ उस की गरिमा को भी बढ़ा रही थी.
एक दिन वे दोनों नौका विहार पर निकले थे. नारंगी रंग की जीवनरक्षक जैकेटों में लिपटे हुए, वे एकदूसरे के करीब बैठे थे, जैसे वे दुनिया की सारी चिंताओं से बेखबर हों. उन के शरीर का तालमेल, उन की मुसकान और उन की नजरें, सब कुछ उन के बीच के अटूट रिश्ते की कहानी कह रहे थे.
दान सिंह ने धीरे से कहा, ”लताजी, जिंदगी ने बहुत कुछ छीन लिया है, पर क्या हम उसे एक नया मौका दे सकते हैं?’’
लता ने उस की तरफ देखा. उस की आंखों में सच्चाई थी, कोई बनावट नहीं. लता के होंठों पर हलकी मुसकान आई, ”शायद हम दोनों को एकदूसरे की जरूरत है.’’
उस दिन से उन का सफर सिर्फ रास्तों तक सीमित नहीं रहा. वह दिलों का सफर बन गया. दो अधूरी जिंदगियां, एकदूसरे का सहारा बन कर पूरी होने लगीं. दोनों के परिवार वाले उन के इस मिलन से खुश थे.
दोनों परिवारों की तरफ से विवाह से पहले की रस्म निभाई गई. धार्मिक परंपरा के अनुसार दोनों का विवाह हुआ, जो एक अफेयर के बाद एक अरेंज मैरिज थी.
यह बात 15 जून, 2022 की है. इस तरह उन दोनों की धूमधाम से शादी हो गई.
लता और दान सिंह की कहानी अब संघर्ष से निकल कर सफलता और पूर्णता के एक ऐसे पड़ाव पर पहुंच चुकी थी, जहां उन के सपनों ने हकीकत का रूप लेना शुरू कर दिया.
समय का पहिया घूमा और लता व दान सिंह का वह छोटा सा संसार अब एक समृद्ध और खुशहाल उपवन बन चुका था. जिस रिश्ते की शुरुआत एक किराए की कार से हुई थी.
दान सिंह ने कभी अपनी सादगी और मेहनत का साथ नहीं छोड़ा. लता का सिपाही के रूप में होने वाली आमदनी एक ढाल बनी रही, जिस ने दान सिंह को अपने काम में जोखिम लेने और आगे बढऩे का हौसला दिया. दान सिंह ने दिनरात एक कर दिए. जो व्यक्ति कभी दूसरों की गाडिय़ां चलाता था, अपनी ईमानदारी, व्यवहार कुशलता और पत्नी के पूर्ण सहयोग के कारण अब वह खुद मालिक बनने की राह पर था.
धीरेधीरे दान सिंह ने एक से 2, और 2 से कई गाडिय़ां कर लीं. आज उस के पास अपनी गाडिय़ों का एक छोटा सा काफिला था. उस की तरक्की केवल पैसों की नहीं थी, बल्कि उस सम्मान की थी जो उस ने अपनी मेहनत से कमाया था.
इस व्यावसायिक सफलता के बीच उस के जीवन में सब से बड़ी खुशी तब आई, जब उस के घर एक बेटे का जन्म हुआ.
दोनों ने उस का प्यार का घरेलू नाम लड्डू रख दिया. धार्मिक संस्कारों के बाद उस का असली नाम अयांश रखा गया.
अब लता को ड्यूटी से लौटते समय इस बात की चिंता नहीं होती थी कि घर कैसे चलेगा. दान सिंह का बढ़ता कारोबार और लता की वरदी का सम्मान, दोनों ने मिल कर परिवार को समाज में एक नई पहचान दी थी. जहां पहले हर छोटी चीज के लिए हिसाब लगाना पड़ता था, अब जिंदगी आराम से गुजर रही थी.
शाम को जब पूरा परिवार साथ बैठता तो दान सिंह अकसर मुसकरा कर लता से कहता, ”अगर उस दिन तुम ने मेरा मोबाइल नंबर न लिया होता तो आज ये गाडिय़ां और ये खुशियां शायद मेरे पास नहीं होतीं.’’
अचानक उन दोनों की प्रेम कहानी में एक खतरनाक मोड़ आ गया. जिस घर में कभी हंसी की आवाजें गूंजती थीं, वहीं अब खामोशी ने धीरेधीरे अपना डेरा जमाना शुरू कर दिया था. दान सिंह और लता सिंह का वह खुशहाल परिवार, जो कभी एक मिसाल लगता था, जैसे अचानक किसी की नजर का शिकार हो गया.
सब कुछ ठीक चल रहा था. गाडिय़ां, घर, बच्चे, सुकून, लेकिन जिंदगी हमेशा एक सी कहां रहती है. लता अब पहले जैसी नहीं रही थी. उस की बातें बदलने लगी थीं, साथ में उस का व्यवहार भी. वह अकसर फोन पर व्यस्त रहने लगी, कभीकभी बिना वजह देर तक घर से बाहर रहने लगी.
दान सिंह ने शुरू में इसे काम का दबाव समझ कर नजरअंदाज किया, लेकिन दिल के किसी कोने में एक हलकी सी बेचैनी घर करने लगी थी. एक दिन हिम्मत कर के उस ने पूछ ही लिया, ”लता, सब ठीक है न? तुम कुछ बदलीबदली सी लग रही हो.’’
लता ने नजरें चुराईं, फिर ठंडी आवाज में बोली, ”तुम हर बात में शक क्यों ढूंढते हो? मैं जैसी हूं, ठीक हूं.’’
लेकिन सच ज्यादा दिन छिप नहीं पाया. दान सिंह को अहसास हो गया कि लता की जिंदगी में कोई और आ चुका है. यह बात उस के दिल पर जैसे किसी भारी पत्थर की तरह गिरी. उस ने फिर बात करने की कोशिश की, ”लता, हम ने मिल कर ये घर बनाया है. अगर कोई परेशानी है तो मिल कर सुलझाते हैं.’’
इस बार लता का लहजा सख्त था, ”परेशानी? परेशानी ये है कि तुम मेरी जिंदगी को अपने हिसाब से चलाना चाहते हो. ये जो घर है, ये जो गाडिय़ां हैं, ये सब मेरी कमाई से है. मैं ने तुम्हें आगे बढ़ाया है, वरना तुम वहीं के वहीं होते. सिर्फ एक टैक्सी ड्राइवर.’’
दान सिंह जैसे सन्न रह गया. यह वही लता थी, जिस ने कभी उस का दर्द समझा था, जो उस के हर संघर्ष में साथ खड़ी रही थी. लता आगे बोली, ”और सुन लो, मेरी बाकी जिंदगी के फैसलों में दखल मत दो. जो मैं कर रही हूं, अपने लिए कर रही हूं. उसी में तुम्हारी भलाई है.’’
कमरे में सन्नाटा छा गया. दीवारों पर टंगी तसवीरें जैसे इस बदलते रिश्ते की गवाही दे रही थीं. जहां कभी मुसकान थी, वहां अब दरारें साफ नजर आने लगी थीं. दान सिंह ने कुछ कहना चाहा, पर शब्द जैसे गले में ही अटक गए. उस ने सिर्फ इतना महसूस किया कि जिस हाथ को उस ने थाम कर अपनी दुनिया बसाई थी, वही हाथ अब धीरेधीरे उस से छूटता जा रहा है.
उस रात के बाद सब कुछ जैसे बदल गया था. दान सिंह के मन में तरहतरह के विचार आने लगे. बाहर से देखने पर सब पहले जैसा ही लगता था. वही घर, वही लोग, वही दिनचर्या, लेकिन अंदर ही अंदर बहुत कुछ टूट चुका था.
दान सिंह अब भी लता के सामने वैसा ही व्यवहार करता, हलकी मुसकान, सामान्य बातें, बच्चों के सामने हंसीमजाक. जैसे कुछ हुआ ही न हो. वह उस के लिए चाय भी बना देता, कभी उस के लौटने पर दरवाजा भी खोलता और कभीकभी पुराने दिनों की तरह हालचाल भी पूछ लेता.
लेकिन यह सब अब दिल से नहीं था. यह सिर्फ एक दिखावा था. उस के भीतर एक अजीब सी खामोशी जन्म ले चुकी थी. वह लता की बातों को भूल नहीं पा रहा था, ”ये सब मेरी कमाई से है.’’ यह वाक्य उस के दिल में कहीं गहराई तक चुभ गया था.
धीरेधीरे उस ने भी अपने आप को बदलना शुरू कर दिया.
अब वह पहले की तरह घर में ज्यादा समय नहीं बिताता. काम के बहाने देर तक बाहर रहने लगा. नई गाडिय़ों का काम, नए ड्राइवरों की जिम्मेदारी. यह सब एक बहाना भी था और एक रास्ता भी, खुद को उस सच्चाई से दूर रखने का, जो उसे हर रोज अंदर से तोड़ रही थी. इसी बीच उस की जिंदगी में एक और मोड़ आया.
उसी दौरान एक दिन उस की गाड़ी बुक हुई एक महिला सिपाही के लिए. जिस ड्राइवर को गाड़ी ले कर जाना था, वह अचानक बीमार पड़ गया. हालात ऐसे बने कि दान सिंह को खुद ही स्टीयरिंग संभालनी पड़ी. महिला सिपाही को वाराणसी ड्यूटी पर छोडऩे का सफर अब उस के हाथ में था.
रास्ता लंबा था. पहला सवाल सिपाही ने ही पूछा, ”आप खुद गाड़ी के मालिक हैं या ड्राइवर?’’
बस यहीं से बातों का सिलसिला शुरू हुआ. रास्ते में एक ढाबे पर चाय पी गई. सिपाही ने अपनी ट्रेनिंग के दिनों के किस्से सुनाए. कैसे उस ने हर मुश्किल को हंस कर पार किया.
दान सिंह सुनता रहा. जैसेजैसे गाड़ी आगे बढ़ी, दूरी कम होती गई. सिर्फ शहरों की नहीं, दिलों की भी. वाराणसी करीब आ रही थी, पर दान सिंह के भीतर कुछ और ही करीब आ रहा था. एक अहसास, जिसे वह रोकना चाहता था, पर रोक नहीं पा रहा था.
उस ने अपनी पहली पत्नी की दर्दभरी दास्तान सुना दी और यह भी बताया कि एक्सीडेंट में उस के भी फ्रैक्चर हुआ था. एक बच्ची है, जिसे उस के पेरेंट्स पाल रहे हैं. पहले वाले अंदाज में ही यह प्यार भी परवान चढऩे लगा.
महिला की बातों में एक अपनापन था, एक सुकून था, जो दान सिंह को लंबे समय से नहीं मिला था. वह उस की बातों को ध्यान से सुनती, उस के दर्द को समझती और सब से बड़ी बात वह उसे इज्जत के साथ देखती थी. धीरेधीरे दोनों की मुलाकातें बढऩे लगीं. दान सिंह को महसूस हुआ कि वह फिर से किसी के सामने खुल कर बोल पा रहा है. बिना किसी डर, बिना किसी ताने के.
अब दान सिंह भी 2 जिंदगियां जी रहा था. एक घर के अंदर, जहां सब कुछ दिखावा था और एक बाहर, जहां उसे सुकून मिलता था, लेकिन वह जानता था कि यह रास्ता आसान नहीं है. घर की दीवारों में दरारें अब दोनों तरफ से पड़ चुकी थीं. बस गिरना बाकी था.
वह नहीं चाहता था कि उस की पत्नी अपने नए प्रेमी के साथ चैनओसुकून से जीवन गुजारे. पत्नी तो उस के हाथ से जा ही रही थी किंतु यह नई प्रेमिका जो उस के दिल में उतर चुकी थी. अब वह उस के साथ जिंदगी गुजारने के सपने देख रहा था.
इस समस्या से निजात पाने के लिए दान सिंह ने एक खतरनाक साजिश रच डाली. ऐसा प्लान तैयार किया कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.
उत्तर प्रदेश का जनपद रामपुर पिछले कई वर्षों से ज्यादा ही चर्चा में है. रामपुर यूं तो अपनी ऐतिहासिक विरासत, नवाबी दौर की इमारतों और सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है. रामपुर नवाबों की नगरी और तहजीब का केंद्र कहा जाता है.
अपने विशाल द्वारों, पुस्तकालयों और रजा लाइब्रेरी जैसी ऐतिहासिक धरोहरों के कारण यह जिला हमेशा से पर्यटकों और इतिहासकारों के आकर्षण का केंद्र रहा है.
यहां के चाकू जितने मशहूर हैं, उतनी ही मशहूर यहां की नफासत भी है. रामपुर की फिजाओं में इन दिनों केवल नवाबों की कहानियां ही नहीं, बल्कि सियासी तल्खियों की गूंज भी है.
पूर्व मंत्री आजम खान और उन के परिवार पर हुई कानूनी काररवाइयों, जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े विवादों और आए दिन होने वाले सियासी उलटफेर ने इस शांत जिले को देश की नजरों में एक ‘चर्चित हौटस्पौट’ बना दिया है. यहां की मिट्टी ने सत्ता का रसूख भी देखा है और सलाखों के पीछे की बेबसी भी.
रामपुर वह शहर जिसे दुनिया नवाबों के राजसी ठाट के लिए जानती थी, कभी सत्ता के गलियारों में गूंजने वाला यह जिला, पूर्व मंत्री आजम खान से जुड़े कानूनी घटनाक्रमों और सियासी उठापटक के कारण देश भर के समाचार पत्रों की सुर्खियों में बना रहता है.
25 फरवरी, 2026 की बात है. उस सर्द रात को, राजनीति के इन शोरशराबे से दूर, जिला रामपुर के गंज थाना क्षेत्र के गांव काशीपुर के पास एक ऐसी खौफनाक वारदात हुई, जिस ने रामपुर की तहजीब और रिश्तों की बुनियाद को ही हिला कर रख दिया.
जहां एक ओर शहर अपनी सियासी पहचान की लड़ाई लड़ रहा था, वहीं दूसरी ओर एक अपराधी पति ने इस ऐतिहासिक जनपद के दामन पर अपनों के ही खून से एक ऐसा दाग लगा दिया, जिसे धो पाना नामुमकिन है.
रात का सन्नाटा गहराता जा रहा था. हवा में हलकी ठंडक थी और सड़क लगभग सुनसान पड़ी थी. 25 फरवरी की वह रात सामान्य सर्दी से थोड़ी अलग थी. फरवरी का अंतिम सप्ताह होने के कारण पहाड़ों से उतरने वाली बर्फीली हवाओं का असर अभी भी तराई के इलाकों में बाकी था.
स्वार बाजपुर रोड के किनारे खड़े ऊंचे पेड़ों के बीच हलका कोहरा (धुंध) तैर रहा था. काशीपुर गांव के पास का वह इलाका, जो दिन में शोर से भरा रहता है, रात के 11 बजे के बाद पूरी तरह सन्नाटे में डूब चुका था. सड़क पर पीली रोशनी वाली एकाध लाइटें ही जल रही थीं, जो कोहरे को चीरने में नाकाम साबित हो रही थीं.
उसी अंधेरे को चीरती हुई एक नई कार नैनीताल से लौट रही थी. कार में सिपाही लता सिंह, उस का पति दान सिंह, गोद में मासूम ढाई वर्षीय बेटा लड्डू और साथ में रिश्ते का देवर रवि सवार था. नैनीताल की ठंडी वादियों से लौट रहे इस परिवार के लिए तराई की यह नमी वाली ठंड और भी तीखी लग रही थी.
वह रात इतनी काली थी कि चंद कदम की दूरी पर भी देख पाना मुश्किल था. बाहर ठंडी हवाएं सांयसांय कर रही थीं और सड़क के दोनों ओर फैला अंधेरा किसी अनहोनी का संकेत दे रहा था.
कार के भीतर सिपाही लता अपने कलेजे के टुकड़े को सीने से लगाए घर पहुंचने के सपने देख रही थी, जबकि बाहर का मौसम उस खौफनाक मंजर की गवाही देने की तैयारी कर रहा था, जिसे देख कर आने वाले समय में रूह कांपने वाली थी.
कार के शीशे पूरी तरह बंद थे और अंदर हीटर की गरमाहट थी. लता और मासूम बच्चा गहरी नींद में सोए हुए थे. उन्हें इस बात का इल्म भी नहीं था कि कार के बाहर की कड़ाके की ठंड से ज्यादा खतरनाक साजिश कार के भीतर ही रची जा रही है. इसी अंधेरे और एकांत का फायदा उठा कर उस ‘हादसे’ को अंजाम दिया गया, जिस ने कुछ ही मिनटों में रात के सन्नाटे को चीखों और आग की लपटों में बदल दिया.
एसपी सोमेंद्र मीणा के अनुसार पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण सिर पर चोट आई थी. रिपोर्ट में चेहरे और गले की हलकी खाल का जलना भी था. चोट बीच सिर में लगी थी. उस की वजह से सिपाही लता की मौत हुई थी.
अब पुलिस ने इस मामले में उच्च अधिकारियों के साथ बैठ कर आपस में बातचीत करनी शुरू की. 2-3 चीजें ऐसी थीं, जो पुलिस को परेशान कर रही थीं. महिला सिपाही के सिर के बीच वाले हिस्से में चोट लगी थी. एक्सीडेंट के मामलों में अकसर सिर में चोट लगने के कारण अधिकांश मौतें होती हैं, लेकिन इस तरह से ऊपर जो सिर में चोट लगी है, यहां से कुछ न कुछ झोल नजर आता है.
एसपी सोमेंद्र मीणा ने एएसपी अनुराग सिंह की निगरानी में गंज के कोतवाल पवन कुमार शर्मा को मामले की गहन जांच करने का आदेश दिया.
पुलिस के दिमाग में मौके की वारदात घूमने लगी. उन्होंने इंसपेक्टर (गंज) को बताया कि दान सिंह ने एंबुलेंस में घायल पत्नी और भाई को ले जाने से इनकार किया था. इस बात को ले कर उस की नोकझोक हुई थी.
मौके पर मौजूद भीड़ भी एंबुलेंस में घायलों को ले जाने की सलाह दे रही थी, लेकिन वहां उस की एक प्राइवेट कार मौजूद थी, उस में ही बैठा कर वह अस्पताल ले गया था.
पुलिस ने इस मामले की गोपनीय रूप से जांचपड़ताल करनी शुरू कर दी. 25 फरवरी, 2026 की रात की घटना थी. जांच करतेकरते लगभग 40 दिन का समय बीत गया.
6 अप्रैल, 2026 को इस घटनाक्रम का खुलासा हो गया. पता चला कि सिपाही लता और ढाई साल के बेटे लड्डू को मौत के घाट उतारने के लिए दान सिंह ने शातिराना पटकथा तैयार की थी. बचने की कोई गुंजाइश न रहे, इस के लिए नैनीताल से रामपुर तक के सफर में उस ने कई बार अपनी साजिश बदली.
इस से पहले पुलिस ने यह पता लगाया कि ये डंपर किस का था, कौनकौन यहां पर थे. किस के फोन नंबर यहां पर चल रहे थे. उस ड्राइवर के मोबाइल की कौल डिटेल्स निकलवाई. कौल डाटा का रिकौर्ड देखा, किसकिस के संपर्क में वह था. भाई रवि कुमार के मोबाइल की लोकेशन, उस के मोबाइल की कौल डिटेल्स, लता सिंह के भी मोबाइल की लोकेशन और उस के मोबाइल की कौल डिटेल्स निकलवाई. ये सब लोग किसकिस के संपर्क में थे? किसकिस से इन्होंने बातचीत की?
इसी बीच में कुछ नए नाम निकल कर सामने आए. कौल डिटेल्स से पता चला कि नूर हसन, सलमान व प्रदीप से दान सिंह व रवि कुमार की बातचीत हुई थी. घटना के समय इन की भी लोकेशन घटनास्थल पर ही पाई गई.
पुलिस ने दान सिंह, नूर हसन और सलमान को हिरासत में ले लिया. इन लोगों से अलगअलग पूछताछ की.
तीनों के बयानों में अंतर स्पष्ट दिखाई दे रहा था. थोड़ा सख्ती करने पर इन लोगों ने डबल मर्डर केस की कहानी साफसाफ पुलिस को बता दी. घटनाक्रम का खुलासा वाकई अपने आप में हैरान करने वाला था.
एसपी ने बताया कि दान सिंह की कांस्टेबल लता के साथ दूसरी शादी थी. इस से पहले उस की शादी रामपुर की तहसील शाहाबाद क्षेत्र के ग्राम पसतौर निवासी रजनी के साथ हुई थी.
दान सिंह इसी गांव का रहने वाला था. रजनी से उसे प्रेम हो गया था. रजनी भी इसे प्यार करने लगी थी. दोनों के परिवारों में सहमति बन गई और रजनी दान सिंह के साथ सात फेरों में बंध गई.
दान सिंह की पहली पत्नी रजनी की भी 8 साल पहले 18 दिसंबर, 2020 को सड़क हादसे में मौत हो गई थी. हादसा मिलक थाना क्षेत्र में रिलायंस पेट्रोल पंप के पास हुआ था. रौंग साइड रोडवेज बस ने उन की बाइक में टक्कर मार दी थी. दान सिंह बाइक से पत्नी के साथ जा रहा था. इस हादसे में रजनी की मौत हो गई थी, जबकि दान सिंह का एक पैर फ्रैक्चर हो गया था.
पुलिस ने दान सिंह, उस के साथी नूर हसन और सलमान को गिरफ्तार कर लिया. एसपी ने बताया कि सिपाही लता के वेतन का खाता बैंक औफ बड़ौदा में था. बैंक के महकमे में एमओयू के मुताबिक हादसे में खातेदार की मौत पर परिवार को डेढ़ करोड़ रुपए तक की आर्थिक मदद दी जाती है. इस के अलावा मौत के बाद सिपाही से जुड़े अन्य सरकारी भुगतान भी पति के हाथ आते.
आरोपी दान सिंह की हत्या की साजिश के पीछे इस मोटी रकम का लालच भी शामिल था. एसपी ने बताया कि इस की नई प्रेमिका महिला सिपाही को भी बयान लेने के लिए बुलाया गया था. जांच की गई, लेकिन वह इस की करतूत में शामिल नहीं थी. इस ने तो उसे दूसरी शादी और बेटे के बारे में कोई बात बताई ही नहीं थी.
पुलिस ने शुक्रवार 10 अप्रैल, 2026 को इस हत्याकांड में शामिल फरार चल रहे अंतिम अपराधी एक प्रशासनिक अधिकारी के ड्राइवर प्रदीप कुमार को गिरफ्तार कर लिया. प्रदीप यादव पनवडिय़ा भमरौआ रोड हाकी स्टेडियम के सामने न्यू शिव विहार कालोनी का निवासी था. इस के ऊपर 25 हजार रुपए का इनाम घोषित किया गया था.
वह 2 लाख रुपए के लालच में हत्याकांड में शामिल हो गया था. घटना से पहले दान सिंह ने एक लाख रुपए भी दे दिए थे और यह भी कहा था कि पत्नी व बेटे की हत्या की घटना हादसा साबित हो जाएगी तो पुलिस विभाग से जो पैसा मिलेगा, उस से तेरी और मदद कर देंगे. पुलिस ने वह रुपए भी बरामद कर लिए.
एसपी सोमेंद्र मीणा ने केस का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को 25 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की है. पुरस्कृत होने वाली टीम में गंज कोतवाल पवन कुमार शर्मा समेत 12 पुलिसकर्मी शामिल थे. इन में महिला एसआई राजवेंद्र कौर भी शामिल है.






