Express Train Robbery. मुंबई क्राइम ब्रांच टीम निकली तो थी रेप के एक अभियुक्त की तलाश में लेकिन ट्रेन में उस का सामना हो गया लुटेरों से. फिर क्या था चलती ट्रेन में पुलिस और बदमाशों में गुत्थमगुत्था शुरू हो गई. बाद में पुलिस ने उन्हें काबू किया वे एक्सप्रेस ट्रेनों के बहुत बड़े लुटेरे निकले.

6 सितंबर, 2013 को मुंबई के बहुचर्चित शक्ति काटन मिल कंपाउंड में फोटो जर्नलिस्ट के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की घटना ने पूरे मुंबई को हिला दिया था. 16 दिसंबर, 2012

को चूंकि दिल्ली में इस से भी भयानक घटना घटी थी जिसे ले कर दिल्ली सहित देशभर में खूबधरने प्रदर्शन हुए. मुंबई की घटना में भी जब यही होने लगा, महाराष्ट्र सरकार के साथसाथ मुंबई पुलिस भी हिल गई. फलस्वरूप इस सामूहिक बलात्कार के दोषियों को जल्दी से जल्दी पकड़ने के लिए पूरा जोर लगा दिया गया. इतना ही नहीं शक्ति काटन मिल कंपाउंड में इस से पहले हुए बलात्कारों के दोषियों पर भी शिकंजा कसा जाने लगा.

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बहरहाल मुंबई पुलिस की कवायद कामयाब रही और फोटो जर्नलिस्ट सामूहिक बलात्कार कांड के सभी दोषी सलाखों के पीछे पहुंच गए. लेकिन इस के बाद भी ऐसे कई कुख्यात दोषी रह गए थे जो पहले मामलों में वांछित थे. ऐसे ही आरोपियों में था अशफाक शोज उर्फ बाबा.

मुंबई क्राइम ब्रांच यूनिट 3 के अधिकारियों को सूचना मिली कि अशफाक उर्फ बाबा अजमेर से सूरत होते हुए मुंबई आएगा. उस का सूरत तक आने का प्रोग्राम तो पक्का था, लेकिन वह मुंबई आएगा या नहीं कहा नहीं जा सकता था. इसी के मद्देनजर क्राइम ब्रांच अधिकारियों ने उसे सूरत में ही घेरने का निश्चय किया. इस के लिए क्राइम ब्रांच के एडीशनल पुलिस कमिश्नर निकेत कौशल, डिप्टी पुलिस कमिश्नर सत्य नारायण चौधरी और असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर यशवंत व्हटकर ने विचारविमर्श के बाद अशफाक की गिरफ्तारी की जिम्मेदारी वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक अरविंद सांवत को सौंपी.

अरविंद सावंत ने इस के लिए अपनी यूनिट की एक टीम गठित की जिस में सबइंसपेक्टर दत्तात्रय मसवेकर, अविनाश वलवी, सिपाही अख्तर शेख और प्रकाश कुंडालकर को शामिल किया. वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर दत्तात्रय मसवेकर अपने सहायकों के साथ उसी शाम लगभग 5 बजे दादर भुज (सौराष्ट्र) एक्सप्रेस पकड़ कर सूरत के लिए रवाना हो गए.

गाड़ी मुसाफिरों से खचाखच भरी हुई थी. बड़ी मुश्किल से उन्हें जनरल डिब्बे के बाथरूम के पास सीटें मिल गईं. ऊपर की एक सीट पर सबइंसपेक्टर दत्तात्रय मासवेकर, नीचे की सीट पर अविनाश वलवी, सिपाही प्रकाश कुंडालकर और खिड़की के पास की एक सीट पर अख्तर शेख बैठ गए. थोड़ी ही देर में गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली. धीरेधीरे रात गहरा गई और लोग बैठेबैठे ही सोने की कोशिश करने लगे.

रात के 3 बजे का समय रहा होगा. टे्रन को बलसाड स्टेशन छोड़े अभी आधा घंटा भी नहीं हुआ था कि एक हट्टाकट्टा युवक हाथ में खुला चाकू थामे खिड़की के पास बैठे सिपाही अख्तर शेख के पास आया और उस के गले पर चाकू रख दिया. गले पर किसी चीज का स्पर्श महसूस कर के अख्तर शेख की आंखें खुलीं तो कलेजा उन के मुंह को आ गया. अख्तर शेख कुछ बोल पाते उस के पहले ही चाकू वाला कड़कदार आवाज में बोला, ‘‘तुम्हारे पास जो कुछ है चुपचाप निकाल कर मुझे दे दो और चुपचाप बैठे रहो. अगर जरा भी चालाकी दिखाई तो गरदन कटकर नीचे गिर जाएगी.’’

जवाब में अख्तर शेख ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई तो उस ने उस की जांघ में चाकू मार दिया और आगे बढ़ गया. तभी उस के पीछेपीछे एक और बदमाश आ गया. उस ने आते ही अख्तर शेख के गाल पर चाकू रखते हुए कहा, ‘‘तू जानता नहीं मैं कौन हूं. मेरा नाम इस्माइल बंगलौरी है. 2-2 खून किए हैं मैं ने. चुपचाप अपनी जगह पर बैठे रहना, अपनी जगह से हिला तो काट कर नीचे फेंक दूंगा. धमकी देते हुए वह भी डिब्बे के अंदर आ गया.’’

इसी तरह एकएक कर के 3 हथियारबंद युवक डिब्बे के अंदर आ गए. अंदर आते ही उन्होंने हथियारों की नोक पर मुसाफिरों के पैसे और जेवर लूटने शुरू कर दिए. उधर जब वे लोग डिब्बे के अंदर चले गए तो सिपाही अख्तर शेख ने जैसेतैसे उठ कर अपने साथी सबइंसपेक्टर अविनाश वलवी और सिपाही प्रकाश कोडांलकर को जगा कर बताया, ‘‘गाड़ी में डकैती पड़ गई है.’’

इस बीच सबइंसपेक्टर दत्तात्रय मसवेकर की नींद भी टूट गई थी. अविनाश वलवी और सिपाही प्रकाश कुंडालकर उठ गए थे. उन्होंने अख्तर शेख की जांघ और गाल पर जख्म देखे तो घबरा गए. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि डिब्बे में लूटपाट कर रहे हथियार बंद लुटेरों से कैसे निपटें. जल्दबाजी में मामला बिगड़ भी सकता था और इस में उन की या मुसाफिरों की जान तक भी जा सकती थी.’’

लेकिन गाड़ी में जिस तरह तीनों लुटेरों ने आतंक फैलाया था. बच्चों और महिलाओं के साथ मारपीट कर के उन से छीनाझपटी कर रहे थे. वह उन से देखा नहीं गया, तो अपनी जान की परवाह किए बिना वे अपनी जगह से उठ खड़े हुए. उन्हें अपनी तरफ बढ़ते हुए एक लुटेरा तेजी से आगे बढ़ा.

वह उन तक पहुंच पाता. इस के पहले ही अविनाश वलवी ने कड़क दार आवाज में कहा, ‘‘हम लोग मुंबई पुलिस से हैं लेकिन उस लुटेरे पर अविनाश वलवी की चेतावनी का कोई असर नहीं हुआ. उस ने सिपाही प्रकाश कुंडालकर पर हमला बोल दिया. लेकिन पहले से सतर्क अविनाश वलवी ने तेजी से शरीर को झटका दे कर उस का चाकू वाला हाथ पकड़ लिया. इस के साथ ही सिपाही प्रकाश कुंडालकर ने घूम कर उस लुटेरे को पीछे से कस कर पकड़ लिया.

दूसरे लुटेरे ने अपने साथी को फंसे देखा तो वह हथियार लहराते हुए उस की मदद के लिए आगे बढ़ा. लेकिन तभी दत्तात्रय मसवेकर और सिपाही अख्तर शेख बीच में आ गए. उस ने दत्तात्रय मसवेकर पर वार करना चाहा. लेकिन सिपाही अख्तर शेख ने उस के हाथों को कस कर पकड़ लिया. उसे अख्तर शेख की पकड़ में आया देख दत्तात्रय मसवेकर उस का हथियार छीनने की कोशिश करने लगे. लेकिन वह इस में कामयाब नहीं हो पा रहे थे क्योंकि वह काफी मजबूत कदकाठी का युवक था.

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Sarita

एक तरफ ये लोग अपनी जान हथेली पर रख कर उन लुटेरों से संघर्ष कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर यह जानते हुए भी कि लुटेरों से उलझने वाले लोग पुलिस वाले हैं, कोई भी मुसाफिर उन की मदद के लिए आगे नहीं आया. वे सब डरे और सहमे हुए थे.

करीब 10 मिनट तक लुटेरों से जद्दोजहद करने के बाद जब दत्तात्रय मसवेकर को लगा कि लुटेरा आसानी से काबू में नहीं आने वाला है तो उसे डराने के लिए उन्होंने अपनी रिवाल्वर निकाल ली. रिवाल्वर देख कर लुटेरों को इस बात का अहसास हो गया कि वे वाकई पुलिस वाले हैं. इस पर पुलिस वालों के साथ उलझे हुए लुटेरों ने अपने साथी को भाग जाने के लिए कहा. गाड़ी की गति धीमी होते ही वह लुटेरा कूद कर भाग गया.

पुलिस के चंगुल में फंसे दोनों लुटेरे अपने आप को बचाने के लिए पुलिस वालों से डट कर संघर्ष कर रहे थे. इस संघर्ष में दत्तात्रय मसवेकर का रिवाल्वर एक लुटेरे के हाथ में आतेआते बचा. एक पल के लिए दत्तात्रय मसवेकर को लगा कि उन का रिवाल्वर उन के हाथ से छूट जाएगा. अगर ऐसा होता तो पता नहीं क्या कर डालता. दत्तात्रय मसवेकर ने पूरी ताकत से रिवाल्वर की नाल पकड़े रखी. जिसे छुड़ाने के लिए लुटेरे ने चाकू से उन्हें कई जगह जख्मी कर दिया.

इस के पहले कि दत्तात्रय मसवेकर हताश हो जाते और रिवाल्वर उनकी पकड़ से छूट जाता अविनाश वलवी और सिपाही प्रकाश कुंडालकर ने दूसरे लुटेरे को काबू कर लिया था. उसे बाथरूम में बंद कर के वह दत्तात्रय मसवेकर और सिपाही अख्तर शेख की मदद के लिए पहुंच गए. उन्होंने लुटेरे के हाथों में जातेजाते रिवाल्वर को अपने कब्जे में कर के उसे निहत्था कर दिया.

करीब आधा घंटा चले इस संघर्ष में जब दोनों लुटेरे निहत्थे हो गए तब मुसाफिरों की जान में जान आई और वे दोनों लुटेरों पर टूट पड़े. दत्तात्रय की टीम ने लोगों को समझाबुझा कर इन दोनों को जैसेतैसे बचाया.

बाद में अविनाश वलवी ने उन से पूछताछ की तो उन्होंने अपना नाम इस्माइल जबी उल्ला शेख, उर्फ बंगलौरी उर्फ काल्या उर्फ अन्या और दूसरे ने राजकुमार जगधारी यादव बताया. उन्होंने अपने फरार हुए साथी का नाम शराफत अली सैय्यद बताया.

तब तक सुबह के 4.30 बज चुके थे. गाड़ी सूरत रेलवे स्टेशन पर पहुंच गई थी. दत्तात्रय मसवेकर और उन के सहायक दोनों लुटेरों को ले कर सूरत रेलवे जीआरपी थाने के सहायक पुलिस निरीक्षक गजुभाई के पास ले गए और उन्हें पूरी घटना का ब्यौरा दिया. उन्होंने दोनों लुटेरों को लाकअप में डाल दिया. इस के साथ ही वह घायल पुलिस वालों को उपचार के लिए सूरत के सरकारी अस्पताल ले गए. इलाज के बाद मुंबई क्राइम ब्रांच की टीम मुंबई लौट आई.

पुलिस टीम मुंबई तो लौट आई लेकिन उसे इस बात का अफसोस था कि वह जिस अभियान के लिए गई थी वह सफल नहीं हुआ था. शक्ति काटन मिल कंपाउंड के बलात्कारी अशफाक शेख उर्फ बावा तक नहीं पहुंच सके थे.

गनीमत यह रही कि इस के 2-3 दिन बाद ही अशफाक शेख उर्फ बाबा को क्राइम ब्रांच यूनिट 2 के इंसपेक्टर भास्कर कदम और हृदयनाथ मिश्रा की टीम ने मरीन लाइन स्टेशन के पास से गिरफ्तार कर लिया.

लेकिन दत्तात्रय मसवेकर की टीम को इस बात का कोई दुख नहीं था. उन्हें खुशी थी कि उन्होंने एक बड़ा काम कर के टे्रन में पड़ी डकैती को नाकाम कर के मुसाफिरों के जानमाल की हिफाजत की और 2 लुटेरों को पकड़ लिया था. इस के लिए उन के वरिष्ठ अधिकारियों ने उन की सराहना भी की थी.

उधर सूरत जीआरपी पुलिस ने गाड़ी के डिब्बे में सफर कर रहे मुसाफिर विपिन सावालिया की शिकायत पर इस मामले को वलसाड जीआरपी थाने के सबइंसपेक्टर ए.आर. पलास को सौंप दिया था क्योंकि लूट की यह घटना वलसाड जीआरपी पुलिस थाने के सीमा क्षेत्र में घटी थी.

वलसाड जीआरपी के सबइंसपेक्टर ए.आर. पलास ने इस मामले को भादंवि की धारा 374, 34 जीआरपी एक्ट 135 के तहत दर्ज करा कर अपनी तफ्तीश शुरू कर दी. घटना के 4 दिन बाद गाड़ी से कूद कर फरार हुए अभियुक्त शराफत अली सैय्यद को भी गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तार किए गए तीनों लुटेरों से जब विस्तृत पूछताछ की गई तो एक्सपे्रस टे्रनों में हुई लूटपाट के कई मामले खुले.

44 वर्षीय इस्माइल जबी उल्ला शेख गांव कुंचर तालुका खनाली, जनपद वेल्लारी प्रांत कर्नाटक का रहने वाला था. 1978 में वह सिर्फ 9 साल की उम्र में मुंबई भाग आया था. पेट भरने के लिए वह छोटीछोटी चोरी किया करता था.

1982 में इस्माइल शेख चोरी के एक मामले में गिरफ्तार हुआ. चूंकि वह उस समय नाबालिग था, इसलिए पुलिस ने उसे डोगरी के बाल सुधार घर भेज दिया. वहां वह लगभग डेढ़ साल तक रहा. इस के बाद किसी तरह जब इस्माइल शेख के मातापिता को पता चल गया तो वे मुंबई आ कर उसे अपने साथ गांव ले गए. अगले 5 सालों तक वह गांव में अपने मातापिता के साथ रहा.

1987 में वह वापस मुंबई भाग आया. इस बार उस ने अपना ठिकाना मुंबई सेंट्रल स्टेशन को बनाया. यहां वह कुली का काम करता था. दिन में वह कुलीगीरी करता था और रात को स्टेशन पर सोए मुसाफिरों की जेबें और छोटेमोटे समान पर हाथ साफ करता था. जब वह इस काम में माहिर हो गया तो उस ने गांव जा कर आरिफा से शादी कर ली.

इस के बाद इस्माइल शेख ने अहमदाबाद रेलवे स्टेशन पर एक बड़ी चोरी की और वहीं रहने लगा लेकिन इसी बीच उसे मुंबई पुलिस गिरफ्तार कर के उसे मुंबई ले आई.

इस्माइल शेख 1997 में जब जेल से बाहर आया तो पत्नी आरिफा के साथ मुंबई से सटे मीरा रोड़ के नरेंद्र पार्क, आधार भवन के ए विंग में रहने लगा. दिखाने के लिए वह चमड़े की बेल्ट बनाने का काम करने लगा था. दिन में व्यवसाय और रात में चोरी.

इसी सब के चलते उस की जानपहचान फारिदा नाम की एक युवती से हुई. धीरेधीरे दोनों एकदूसरे को प्रेम करने लगे. फिर इस्माइल शेख ने फारिदा से प्रेमविवाह कर लिया. दोनों साथसाथ रहने लगे. अपना और अपनी दोनों पत्नियों का खर्च चलाने के लिए इस्माइल शेख 3 साल तक बांद्रा और अहमदाबाद के बीच चलने वाली मेल एक्सप्रेस टे्रनों में लूटपाट करने लगा.

2000 के शुरुआत में गांधीधाम एक्सप्रेस में इस्माइल शेख के हाथों एक मुसाफिर की हत्या हो गई थी. अंकलेश्वर रेलवे पुलिस ने यह मामला उस के विरूद्ध भादंवि की धारा 302 के तहत दर्ज किया था. साल भर भूमिगत रहने के बाद उसे 2001 में मुंबई रेलवे क्राइम ब्रांच (एल.सी.वी.) ने गिरफ्तार किया था. इस मामले में उसे 7 साल की सजा हुई थी.

2008 में जब वह अपनी सजा पूरी कर बाहर आया तो उस की पहली पत्नी आरिफा शेख की मौत हो चुकी थी. कुछ दिन बाद वह फिर अपने धंधे में लग गया. अब वह अपने एक साथी इलियास शेख के साथ मिल कर अवंतिका एक्सप्रेस में लोगों को लूटने लगा. कुछ दिन बाद इलियास शेख रंगे हाथ पकड़ लिया गया. जेल से बाहर आने के बाद वह अपने दोस्त शराफत अली सैयद के साथ मिल कर सौराष्ट्र एक्सप्रेस में बोरीवली से लेकर वापी तक लूटपाट करने लगा.

लूटपाट के इसी धंधे के दौरान दोनों की जानपहचान जगदीश राठौर से हुई. जगदीश राठौर सूरत में रहता था. इस्माइल शेख भी उसी के साथ रहने लगा. इस्माइल शेख के गिरोह में आया जगदीश राठौर सीधेसादे सरल स्वभाव का आदमी था. उस का अपना भरापूरा परिवार था. लेकिन हालात कुछ ऐसे बदले कि उसे अपराधी बनना पड़ा. इस के पहले वह सूरत की एक कंपनी में हीरे तराशने का काम करता था. लेकिन 2006 में जब हीरा बाजार में मंदी आई तो उस ने इसे कही का नहीं छोड़ा.

वह बेरोजगार हो गया. जिस से उस की पारिवारिक स्थिति बिगड़ने लगी. अपनी बिगड़ती पारिवारिक स्थिति को संभालने के लिए वह आटो रिक्शा चलाने लगा. लेकिन इस से उस की बिगड़ती परिवारिक आर्थिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया था. इस पर वह आटो रिक्शा बेच कर पावभाजी का ठेला लगाने लगा. लेकिन उस की पारिवारिक आर्थिक स्थिति सुधरने के बजाय और बिगड़ गई.

वह 40 हजार का कर्जदार हो गया. इस कर्ज को उतारने के लिए वह दमन जा कर गाड़ी से शराब ला कर सूरत में चोरीछिपे बेचने लगा. इसी दौरान उस की मुलाकात राजकुमार यादव उर्फ चौबे से हुई. राजकुमार यादव उर्फ चौबे इस्माइल शेख उर्फ काल्या की बदौलत वह गिरोह में शामिल हो गया.

इस्माइल शेख, राजकुमार यादव और शराफत अली सैयद शातिर अपराधी थे. ये लोग कई बार जेल की हवा खा चुके थे. उन की जानपहचान जेलों में ही हुई थी. इन लोगों के ऊपर मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन से ले कर अहमदाबाद रेलवे स्टेशन के बीच सैकड़ों लूटपाट, मारपीट हत्या की कोशिश और हत्या के मामले जीआरपी पुलिस थानों में दर्ज थे. यह हमेशा की तरह मेल एक्सप्रेस में वैसे ही लूटपाट करते थे और लूटपाट का सारा धन वह बीयर बार और बार बालाओं के साथ मौजमस्ती करने उन्हें महंगे गिफ्ट देने पर खर्च कर देते थे.

घटना वाली रात भी इस्माइल शेख अपने 2 साथियों राजकुमार यादव और शराफत अली सैयद के साथ हथियारों के साथ बलसाड रेलवे स्टेशन से दादरभुज (सौराष्ट्र) एक्सप्रेस में लूटपाट के लिए चढ़ा था. और हमेशा की तरह इन्होंने अपना काम शुरू कर दिया था. लेकिन उस रात वह अपने इरादों में सफल नहीं हो पाए. क्योंकि उस रात उस गाड़ी में सफर कर रहे मुंबई क्राइम ब्रांच यूनिट 3 के पुलिसकर्मियों से उन की मुठभेड़ हो गई थी.

मुंबई क्राइम ब्रांच युनिट 3 के द्वारा मुठभेड़ के बाद पकड़े गए मेलगाडि़यों के लुटेरे जेल में हैं. इस मामले की तफ्तीश बलसाड जीआरपी पुलिस थाने के पुलिस उपनिरीक्षक ए.आर. पलास कर रहे हैं.  Express Train Robbery

इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.

– 2014 में प्रकाशित

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