Gold Loan Company Robbery. चंद्रशेखर भाऊ राणे ने डकैती की फुलप्रूफ योजना बनाई थी. अपनी योजना के अनुसार वह साढ़े 4 करोड़ रुपए की डकैती डालने में सफल भी रहा, लेकिन उस की नीयत खराब हो गई और उस ने अपने साथियों को उन का सही हिस्सा नहीं दिया.

पहली अक्तूबर, 2013 की बात है. नासिक के बिटको क्षेत्र, नासिक रोड की और्केड बिल्डिंग स्थित मणप्पुरम फाइनेंस कंपनी के नीचे औफिस के सामने एक टवेरा कार आ कर रुकी. कार से 6 लोग उतरे. उन में से 3 पुलिस की वरदी में थे और 2 का चेहरा काले कपड़े से ढंका हुआ था. ढंके चेहरे वालों को दाएंबाएं से 2 वरदीधारी पकड़े हुए थे. वे सब सीढि़यां चढ़ कर मणप्पुरम के औफिस में चले गए. पुलिस को आया देख औफिस के सभी लोग चौंके. अंदर पहुंचते ही एक पुलिस वाले ने पूछा, ‘‘यहां मैनेजर कौन है.’’ तब तक दूसरे पुलिस वाले ने ढंके चेहरे वाले दोनों लोगों की घुटनों के बल फर्श पर बैठा दिया था.

मैनेजर उत्तम दराडे ने अपने केबिन से बाहर आ कर कहा, ‘‘जी, मैं हूं यहां का मैनेजर, बताइए क्या बात है?’’   ‘‘ये दोनों चोर हैं,’’ एक वरदीधारी मुंह पर काला नकाब बंधे व्यक्तियों की ओर इशारा कर के बोला, ‘‘इन्होंने आप के यहां चोरी का सोना गिरवी रख कर पैसा उठाया है. पास आ कर पहचानो इन्हें.’’

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पुलिस का आदेश था. मैनेजर उत्तम दराडे ने आगे बढ़ कर उन में से एक आदमी के चेहरे से काला कपड़ा हटाना चाहा. लेकिन यह क्या, इस से पहले ही उन में से एक पुलिस वाले ने पिस्तौल निकाल कर उत्तम दराडे की पसलियों से सटाते हुए कहा, ‘‘हिलना मत, वरना जान से हाथ धो बैठोगे.’’

उत्तम दराडे और औफिस के बाकी लोग हक्केबक्के रह गए. इस बीच दोनों नकाबपोश भी खड़े हो गए थे. पलभर में उन लोगों ने औफिस के सभी लोगों को धमका कर अपने निशाने पर ले लिया. उन में से एक ने मैनेजर को दीवार की ओर मुंह कर के खड़ा होने को कहा और उन के दोनों हाथ पीछे कर के रस्सी से बांधने लगा. बाकी लोगों ने औफिस स्टाफ को धमकाते हुए सीसीटीवी कैमरों, टेलीफोन और कंप्यूटर के तार तोड़ने शुरू कर दिए. उन में से एक सब के मोबाइल फोन छीनने लगा.

स्टाफ में कुल जमा 5 लोग थे, मैनेजर उत्तम दराडे, सहायक मैनेजर महेंद्र हांगडे, 2 लड़कियां और सुरक्षागार्ड सुनील आव्हाड. इत्तेफाक से उस वक्त सुनील के पास कोई हथियार नहीं था. स्टाफ के सभी लोग बुरी तरह डरे हुए थे. वरदीधारियों ने जरा सी देर में अपना आतंक कायम कर के उन सब को एक जगह एकत्र कर लिया. स्ट्रांगरूम की चाबियां मैनेजर की ड्राअर में थी. उन में से एक ने चाबियां निकाल कर अपने कब्जे में ले लीं. बाकी तीनों ने सब के मुंह पर टेप चिपका कर उन के हाथ पीछे की ओर बांध दिए. 5-7 मिनट में ऐसी स्थिति बन गई कि स्टाफ का कोई भी व्यक्ति विरोध की स्थिति में न बचा. तब तक वे समझ गए थे कि वे लोग डकैत हैं.

इस के बाद डकैतों में से 2 लोग स्ट्रांग रूम में गए और ग्रिल का ताला खोल कर अंदर चले गए. अंदर तिजोरी रखी हुई थी जिस में गहने और नकदी रखी थी. चाबी थी ही, उन लोगों ने तिजोरी खोल कर उस में रखे 15 किलोग्राम सोने के जेवरात और 3 लाख रुपए नकद अपने कब्जे में ले लिए. इस के बाद डकैतों ने स्टाफ के सभी लोगों को स्ट्रांग रूम में बंद कर के धमकी दी कि किसी ने शोर मचाने की कोशिश की तो उसे गोली मार दी जाएगी.

मणप्पुरम फाइनेंस कंपनी के औफिस में डकैती डालने के बाद सभी लोग टवेरा में बैठ कर फरार हो गए. जातेजाते वे औफिस का शटर बाहर से बंद करते गए. यह शाम करीब 5 बजे की बात है.

मणप्पुरम फाइनेंस कंपनी के औफिस में लोग जाते रहते थे. कई ग्राहक गए भी लेकिन औफिस बंद देख कर लौट आए. जब औफिस घंटों नहीं खुला तो कुछ लोगों को शक हुआ कि कहीं कंपनी लोगों का माल ले कर चंपत तो नहीं हो गई. इसी शक में एक व्यक्ति ने फोन कर के पुलिस बुला ली. पुलिस शटर खोल कर अंदर गई तो स्टाफ के सभी लोग स्ट्रांगरूम में बंद मिले.

पुलिस के पूछने पर उन लोगों ने बताया कि उन्हें स्ट्रांगरूम में बंद हुए 2 घंटे हो चुके हैं. डकैत स्ट्रांगरूम की चाबी अपने साथ ले गए थे. दूसरी चाबी कंपनी के मुंबई स्थित एरिया मैनेजर के औफिस में रहती थी. उन लोगों को बाहर निकालने का कोई रास्ता न देख पुलिस ने चाबी बनाने वाले को बुलाया. साथ ही क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम और डौग स्क्वायड को भी बुला लिया.

सब से पहले डौग स्क्वायड की मदद ली गई, लेकिन जासूस कुत्ते घटनास्थल की गंध लेने के बाद नीचे सड़क पर जा कर रुक गए. इस का मतलब लुटेरे वहां से किसी वाहन में बैठ कर भागे थे. क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम ने औफिस में जहांतहां से डकैतों के फिंगर प्रिंट उठाए. चाबी मेकर ने जैसेतैसे स्ट्रांगरूम का दरवाजा खोल दिया तो अंदर बंद लोगों को बाहर निकाल कर उन के हाथपैर खोले गए. इस बीच उन्हें स्ट्रांगरूम में 4 घंटे हो चुके थे.

पूछताछ में मैनेजर उत्तम दराडे और स्टाफ के लोगों ने डकैती की वारदात के बारे में पूरी जानकारी पुलिस को दे दी. साथ ही यह भी बता दिया कि डकैत 15 किलोग्राम सोने के जेवरात और 3 लाख रुपए नकद ले गए हैं. मणप्पुरम फाइनेंस लिमिटेड के कर्मचारियों के बयानों से यह बात साफ हो गई थी कि करोड़ों की यह डकैती सुनियोजित तरीके से की गई थी.

करोड़ों रुपए की डकैती की यह वारदात नासिक के व्यस्ततम इलाके में हुई थी. नासिक के पुलिस कमिश्नर कुलवंत कुमार सारंगल के आदेश पर आननफानन में पुलिस उपायुक्त डी.एस. स्वामी ने पूरे शहर की नाकेबंदी कर दी. डकैतों ने मणप्पुरम फाइनेंस कंपनी के सभी सीसीटीवी कैमरों के तार काट दिए थे इसलिए उन में घटना के समय की फुटेज नहीं थी. पुलिस ने बिल्डिंग की नीचे वाली दुकानों के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली तो एक फुटेज में कुछ लोग टवेरा कार से भागते नजर आए. लेकिन उन्हें पहचाना नहीं जा सका.

वारदात हुए कई घंटे बीत चुके थे, इसलिए इस बात की पूरी संभावना थी कि डकैत अब तक शहर छोड़ कर भाग चुके होंगे. फिर भी पुलिस ने उन्हें खोजने का पूरा प्रयास किया. लेकिन काफी मशक्कत के बाद भी कोई नतीजा हासिल नहीं हुआ. इस बीच मणप्पुरम फाइनेंस लिमिटेड ब्रांच के मैनेजर उत्तम दराडे की ओर से थाना उपनगर में डकैती की रिपोर्ट दर्ज करा दी गई थी.

नासिक पुलिस ने इस मामले को सुलझाने के लिए पुलिस की 20 टीमें बनाईं. इन टीमों ने पूरे महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि आसपास के राज्यों की खाक छानी. कई दरजन संदिग्धों से पूछताछ की, लेकिन महीनों चली इस कवायत से कोई लाभ नहीं हुआ. मणप्पुरम फाइनेंस कंपनी में हुई डकैती के बारे में नासिक पुलिस को कहीं से कोई सुराग नहीं मिला.

जनवरी 2014 के पहले हफ्ते की बात है. मुंबई से सटे जिला थाणे के शहर डोंबीवली के थाना विष्णुनगर के हवलदार अरुण देवरे और सिपाही अनंत गवली शाम के समय जब गस्त पर थे तो उन्होंने कोपर ब्रिज के पास 3 युवकों को आपस में झगड़ते हुए देखा. उनमें से 2 तीसरे को जान से मारने की धमकी दे रहे थे. उन दोनों ने उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने झगड़ना बंद नहीं किया. अरुण देवरे ने उन से झगड़े का कारण पूछा तो उन में से एक युवक बोला, ‘‘साहब, ये लोग मुझ से पैसे मांग रहे हैं और न देने पर जान से मारने की धमकी दे रहे हैं.’’

तीनों युवक शक्लोसूरत और हावभाव से बदमाश नजर आ रहे थे. जब उन्होंने समझाने पर भी झगड़ना बंद नहीं किया तो अरुण देवरे ने अपने मोबाइल से फोन कर के यह बात विष्णुनगर थाने के सीनियर इंसपेक्टर राजेंद्र कुलकर्णी को बता दी. साथ ही अपना शक भी जाहिर कर दिया. कुलकर्णी साहब ने अरुण देवरे से कहा कि वह उन तीनों को बीट में ले जाएं और रोके रखें, वे वहीं पहुंच रहे हैं. अरुण देवरे और अनंत गवली उन तीनों को कोपर ब्रिज बीट में ले आए.

थोड़ी देर में राजेंद्र कुलकर्णी सबइंसपेक्टर अरुण घाटगे को साथ ले कर पुलिस जिप्सी से कोपर ब्रिज बीट पर पहुंच गए. पूछताछ में उन तीनों युवकों ने अपने नाम रूपेश, दीपक और जीवन सिंह बताए. अरुण देवरे ने कुलकर्णी साहब को बताया कि रूपेश और जीवन दीपक को जान से मारने की धमकी दे रहे थे. राजेंद्र कुलकर्णी ने रूपेश से थोड़ी सख्ती से कहा, ‘‘मालूम है, जान से मारने की धमकी देना कितना बड़ा जुर्म है. इस जुर्म में हम तुम्हें जेल भी भेज सकते हैं?’’

‘‘जानता हूं साहब,’’ रूपेश बोला, ‘‘पर क्या करें इस दीपक ने हमारा सिर घुमा रखा है. इस ने हमें पैसे देने का वादा किया था, लेकिन अब दे नहीं रहा. महीनों से हमें टरका रहा है.’’   ‘‘किस बात के पैसे?’’   ‘‘हम ने इस के कहने पर एक बड़ा काम किया था.’’

‘‘क्या काम?’’ कुलकर्णी के पूछने पर रूपेश बगलें झांकने लगा. इस से कुलकर्णी को शक हुआ. उन्होंने सबइंसेक्टर अरुण घाटगे से कहा, ‘‘इसे अलग ले जा कर इस की खातिरदारी करो और पूछो इन लोगों ने दीपक का कौन सा काम किया था.’’ अरुण घाटगे उसे बाहर ले जाते इस से पहले ही वह बोला, ‘‘साहब, मैं यहीं बता देता हूं.’’   ‘‘…तो ठीक है, शुरू हो जाओ.’’

रूपेश पल भर सिर झुकाए खड़ा रहा, फिर सहमते हुए बोला, ‘‘साहब, दीपक के कहने पर हम ने नासिक की एक कंपनी के औफिस में हाथ साफ किया था.’’

‘‘कौन सी कंपनी?’’   ‘‘सोना गिरवी रखने वाली कंपनी थी.’’   ‘‘नाम बोलो.’’   ‘‘मणप्पुरम फाइनेंस कंपनी.’’

राजेंद्र कुलकर्णी को अच्छी तरह याद था कि 1 अक्तूबर, 2013 को मणप्पुरम फाइनेंस कंपनी की नासिक ब्रांच में साढ़े 4 करोड़ की डकैती हुई थी. रूपेश की बात सुन कर वह चौंके. अब उन्हें वे तीनों युवक अचानक बड़े अपराधी नजर आने लगे थे. उन से वहां पूछताछ करना ठीक नहीं था, इसलिए वह उन तीनों को थाना विष्णुनगर ले आए.

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थाने में पूछताछ की गई तो पता चला कि रूपेश डोंबीवली (पश्चिम) के सुभाषनगर स्थित वक्रतुंड सोसाइटी के ब्लौक नंबर 5 का रहने वाला था. जबकि जीवन सिंह डोंबीवली (पश्चिम) के ही राजूनगर की लक्ष्मीसागर बिल्डिंग के ब्लौक नंबर 1 में रहता था. रूपेश और जीवन के अनुसार उन दोनों ने यह काम दीपक के कहने पर किया था. इस के बदले में उस ने उन्हें उतनी रकम नहीं दी थी जितनी उन्हें मिलनी चाहिए थी. पैसे देने के नाम पर वह कई महीने से आजकल आजकल कर रहा था. इसी बात को ले कर उस दिन झगड़ा हुआ था और रूपेश ने उसे जान से मारने की धमकी दे दी थी.

रूपेश और जीवन से बात करने के बाद सबइंसपेक्टर अरुण घाटगे ने दीपक को दूसरे कमरे में ले जा कर उस से कहा, ‘‘जब तुम ने इन्हें पैसे देने की बात कही थी तो दिए क्यों नहीं?’’

‘‘साहब, सारे पैसे नासिक के चंद्रशेखर के पास हैं, मेरे पास कुछ भी नहीं है. फिर मैं कहां से दूं इन्हें पैसे.’’   ‘‘और नासिक की मणप्पुरम फाइनेंस कंपनी से जो सोना लूटा गया था वह कहां है?’’   ‘‘वह भी चंद्रशेखर के ही पास है.’’

नासिक की डकैती एक तरह से रहस्य सी बन कर रह गई थी. नासिक पुलिस चाह कर भी इस मामले में कुछ नहीं कर पाई थी. डोंबीवली पुलिस के हाथ एक सूत्र लगा तो उस ने इस मामले की तह तक जाने का फैसला कर लिया. दीपक, रूपेश और जीवन सिंह तीनों ही एक बड़ी डकैती में शामिल हुए थे. संभावना थी कि जरूर उन का कोई न कोई आपराधिक रिकार्ड रहा होगा.

इंसपेक्टर राजेंद्र कुलकर्णी ने अपने सहयोगियों से कहा कि उन की जन्मकुंडली पता करें. सबइंसपेक्टर मोहन खंदारे ने क्राइम रिकौर्ड चेक किया तो पता चला कि दीपक दलवी, रूपेश और जीवन सिंह 2013 में हुई एक डकैती के मामले में फरार चल रहे थे. यह जानकारी मिलते ही पुलिस ने उन तीनों को हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू की.

चूंकि तीनों में दीपक ही प्रमुख था. अत: उसी से पूछताछ की गई. दीपक भी डोंबीवली का ही रहने वाला था. उस से चंद्रशेखर के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि चंद्रशेखर भी पहले डोंबीवली में ही रहता था, बाद में वह नासिक चला गया था. उन दोनों की अच्छी जानपहचान थी. चंद्रशेखर को 3-4 ऐसे युवकों की जरूरत थी जिन का डीलडौल पुलिस वालों जैसा हो. उस ने इस बारे में दीपक दलवी से बात की तो उस ने काम के बारे में पूछा. चंद्रशेखर ने उसे बता दिया कि नासिक की एक गोल्ड लोन कंपनी में डकैती डालनी है. इस के लिए उस ने 50 हजार रुपए पेशगी और काम हो जाने के बाद 5 लाख रुपए देने की बात कही.

दीपक दलवी तो अच्छे डीलडौल का था ही, उस के परिचित रूपेश रणपिसे और जीवन सिंह भी शरीर से हट्टेकट्ठे थे. दीपक ने रूपेश और जीवन को पूरी बात बताई तो 5 लाख रुपए के लालच में वे भी तैयार हो गए. उन से बात कर के दीपक ने उन्हें चंद्रशेखर से मिलवा दिया.

इस के बाद चारों ने मिल कर नासिक स्थित मणप्पुरम फाइनेंस कंपनी की ब्रांच में डकैती की योजना बनाई. इतनी बड़ी डकैती के लिए इतने लोग कम थे. इसलिए दीपक दलवी ने डोंबीवली में ही रहने वाले अपने 2 दोस्तों एकनाथ कोष्टी और कार्तिक देवेंद्र से बात की. वे दोनों भी इस काम में उस का साथ देने के लिए तैयार हो गए.

एकनाथ कोष्टी और कार्तिक देवेंद्र का नाम सामने आने पर पुलिस ने उन दोनों को भी हिरासत में ले लिया. इन पांचों से विस्तार से पूछताछ की गई तो नासिक की मणप्पुरम फाइनेंस कंपनी में हुई डकैती की पूरी हकीकत सामने आ गई.

नासिक में हुई साढ़े 4 करोड़ रुपए की डकैती के मुल्जिमोें के पकड़े जाने की जानकारी थाणे के पुलिस कमिश्नर के.पी. रघुवंशी को मिली तो उन्होंने सहायक पुलिस आयुक्त पराग मनेरे को निर्देश दिए कि वह पुलिस की अलगअलग टीमें बना कर इस मामले को सुलझाएं. मनेरे तत्काल सहायक पुलिस आयुक्त राजन धुले को इस काम पर लगा दिया.

दरअसल, चंद्रशेखर मणप्पुरम फाइनेंस कंपनी में कंप्यूटर वगैरह ठीक करने का काम करता था. वहां काम करतेकरते उसे सारी बातें पता चल गई थीं कि सोना और नकदी कहां रखे जाते हैं. वहां कितना स्टाफ है. सुरक्षाकर्मियों की क्या स्थित है. वहां की पूरी जानकारी एकत्र करने के बाद उस ने वहां डकैती की योजना बनाई. इस योजना में उस ने सब से पहले अपने दोस्त दीपक दलवी को शामिल किया. उस ने ही डकैती के लिए अन्य साथियों को एकत्र करने की जिम्मेदारी ली.

अगस्त 2013 में योजना बनाने के बाद चंद्रशेखर ने नासिक रोड पर किराए का एक मकान ले लिया ताकि डकैती का माल वहां रखा जा सके. साथ ही उस ने वक्त जरूरत के लिए एक नैनो कार भी खरीद ली. इस के साथ ही उस ने दीपक दलवी से कह दिया कि वह 5-6 युवकों का इंतजाम कर ले. दीपक रूपेश, जीवन, कार्तिक देवेंद्र और एकनाथ कोष्टी से संपर्क बनाने में जुट गया.

नासिक रोड की मणप्पुरम फाइनेंस कंपनी की ब्रांच में एक ही सुरक्षा गार्ड था, सुनील आव्हाड. उस के पास हथियार रहता था और उस के होते डकैती डालना मुश्किल था. चंद्रशेखर अपनी योजना को अंजाम देने के मंसूबे बना ही रहा था कि सितंबर 2013 के अंतिम सप्ताह में उसे पता चला कि सुरक्षाकर्मी सुनील आव्हाड का रिवाल्वर खराब हो गया है और उसे मरम्मत के लिए भेजा गया है. यह पता चलते ही चंद्रशेखर ने अपनी योजना को अंजाम देने का फैसला कर लिया. इस के लिए उस ने तारीख तय की 1 अक्तूबर, 2013. तारीख तय कर के उस ने यह बात दीपक को बता दी और दीपक ने अपने साथियों को.

घटना वाले दिन यानि 1 अक्तूबर को दीपक ने डोंबीवली से एक टवेरा कार किराए पर ली. रूपेश, जीवन, कार्तिक देवेंद्र, एकनाथ कोष्टी और दीपक दलवी उसी टवेरा में सवार हो कर नासिक के लिए रवाना हो गए. टवेरा के ड्राइवर को साथ ले जाना ठीक नहीं था, इसलिए इन लोगों ने घोटी गांव के पास उसे मार पीट कर गाड़ी से उतार दिया. डकैती में इन लोगों की योजना उसी गाड़ी को इस्तेमाल करने की थी. इस के बाद ये लोग उसी टवेरा से नासिक पहुंचे.

चंद्रशेखर से दीपक की फोन पर बराबर बात हो रही थी. योजना के अनुसार चंद्रशेखर भाऊ राणे और उस का भाई राजदत्त राणे नासिक के बाहर ही मिल गए. वे लोग पुलिस की वरदियां, एक नकली पिस्तौल और 2 काले नकाब साथ ले कर आए थे. उन लोगों को कार में बैठाने के बाद दीपक दलवी, जीवन सिंह और रूपेश ने पुलिस की वरदियां पहन लीं.

जबकि दोनों काले नकाब चंद्रशेखर और उस के भाई राजदत्त के चेहरों पर चढ़ा दिए गए. उन की सिर्फ आंखें चमक रही थीं. कार्तिक को यूं ही रहने दिया गया.

पूरी तैयारी के बाद ये लोग नासिक रोड स्थित बिटको क्षेत्र में जा पहुंचे. मणप्पुरम फाइनेंस कंपनी की ब्रांच इसी इलाके की और्केड बिल्डिंग की दूसरी मंजिल पर थी. सारे लोग टवेरा नीचे खड़ी कर के सेकेंड फ्लोर पर पहुंच गए. बाहर की हलचल और आनेजाने वालों पर नजर रखने के लिए कार्तिक को बाहर छोड़ कर बाकी लोग अंदर चले गए.

उस वक्त मैनेजर उत्तम दराडे, सहायक मैनेजर महेंद्र हांगडे के अलावा 2 महिला कर्मचारी वैशाली गोसावी और रूपाली गोतीसे ही ब्रांच में थे. सुरक्षागार्ड सुनील आव्हाड गेट पर खड़ा था. पुलिस की वरदी पहने रूपेश, जीवन और दीपक दलवी नकाब पहने चंद्रशेखर और राजदत्त को ले कर अंदर चले गए. अंदर जा कर उन्होंने नकाब पहने चंद्रशेखर और राजदत्त को घुटनों के बल बैठा दिया. इस के बाद उन्होंने मैनेजर उत्तम दराडे से कहा, ‘‘ये दोनों चोर हैं, इन्होंने आप के यहां सोने के जेवर गिरवी रखे हैं. आ कर पहचानो इन्हें.’’

मैनेजर उत्तम दराडे उठे तो गेट पर खड़ा सिक्योरिटी गार्ड सुनील आव्हाड भी अंदर आ गया. वैसे भी उस के पास कोई हथियार नहीं था. यह देख दरवाजे के बाहर खड़े कार्तिक ने बाहर से शटर बंद कर दिया. शटर बंद होते ही दीपक ने नकली पिस्तौल निकाल कर जान से मारने की धमकी देते हुए उत्तम दराडे को अपने कब्जे में ले लिया. पलक झपकते ही उस के साथियों ने रस्सी से दराडे के हाथ बांध कर मुंह पर टेप चिपका दिया. यह देख सहायक मैनेजर महेंद्र हांगडे सिक्योरिटी गार्ड सुनील आव्हाड और दोनों लड़कियां बुरी तरह डर गईं.

चंद्रशेखर, दीपक, रूपेश, जीवन और राजदत्त ने पलभर में टेलीफोन, सीसीटीवी कैमरे और कंप्यूटरों के तार काट कर सब के मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिए. दोनों लड़कियों, सुनील आव्हाड और सहायक मैनेजर महेंद्र हांगडे के भी हाथ बांध कर उन के मुंह पर सेलोटेप चिपका दिया गया. इस बीच चंद्रशेखर ने मैनेजर की ड्राअर से चाबियां निकाल ली थीं. सब लोगों को जान से मारने की धमकी दे कर चंद्रशेखर, राजदत्त और दीपक स्ट्रांगरूम के ग्रिल का ताला खोल कर अंदर गए और तिजोरी में रखे सोने के 15 किलोग्राम जेवरात और नकद 3 लाख रुपए अपने कब्जे में ले लिए.

इस के बाद मैनेजर, सहायक मैनेजर, दोनों लड़कियां और सुरक्षा गार्ड को स्ट्रांगरूम में ले जा कर बंद कर दिया गया. उन्हें शोर न मचाने की धमकी दे कर चंद्रशेखर ने बाहर से स्ट्रांगरूम का दरवाजा बंद कर के ताला लगा दिया.

काम हो चुका था. सारा माल समेट कर सब लोग शटर खोल कर बाहर आ गए. कार्तिक बाहर ही खड़ा था. उन के बाहर आते ही उस ने शटर फिर से बंद कर दिया. फिर ये लोग नीचे खड़ी टवेरा में बैठ कर फरार हो गए. टवेरा कार चूंकि ड्राइवर को मारपीट कर छीनी गई थी इसलिए इस बात की पूरी उम्मीद थी कि उस ने पुलिस में शिकायत कर दी होगी. पुलिस इस संबंध में दूसरे थानों को वायरलैस मैसेज दे कर अलर्ट कर सकती थी. उस स्थिति में गाड़ी को कहीं भी रोके जाने का खतरा था.

इस खतरे को देखते हुए चंद्रशेखर ने नासिक के मलखाबाद के एक नुक्कड़ के पास अपनी नैनो कार खड़ी कर रखी थी. डकैती के बाद ये लोग सीधे मलखाबाद पहुंचे और टवेरा से सारा सामान निकाल कर नैनो में भर लिया. टवेरा उन्होंने वहीं छोड़ दी. वहां से ये लोग चंद्रशेखर के नासिक रोड स्थित किराए के मकान पर पहुंचे. उस रात सब वहीं रुके.

2 अक्तूबर को चंद्रशेखर ने सब से कहा, ‘‘तुम लोग डोंबीवली चलो, मैं पैसे ले कर आता हूं. उस की बात मान कर रूपेश, जीवन, दीपक और कार्तिक डोंबीवली चले गए. एक हफ्ता बाद चंद्रशेखर डोंबीवली आया और उस ने कार्तिक को डेढ़ लाख, जीवन को 5 लाख, रूपेश को 7 लाख और दीपक को 3 लाख रुपए दिए.

ये लोग इतने ही पैसे से संतुष्ट भी थे, लेकिन जब टीवी पर नासिक में हुई मणप्पुरम फाइनेंस कंपनी में हुई डकैती की न्यूज आई तो इन्हें पता चला कि डकैती में साढ़े 4 करोड़ का माल हाथ लगा था. इस हिसाब से सब को 50-50 लाख रुपए मिलने चाहिए थे.

यह पता चलने के बाद ये लोग दीपक से अपने हिस्से के पैसे मांगने लगे थे. क्योंकि उन्हें शक था कि चंद्रशेखर ने दीपक को आधा माल दे दिया होगा और वह उन का हिस्सा दबाए हुए है. उस दिन भी जब रूपेश, जीवन और दीपक के बीच इसी बात को ले कर झगड़ा हो रहा था तो हवलदार अरुण देवरे और सिपाही अनंत गवली वहां पहुंच गए थे और तीनों को पकड़ कर बीट में ले आए थे.

बहरहाल, पूछताछ के बाद डोंबीवली पुलिस ने दीपक से कहा कि वह अपने मोबाइल से फोन कर के चंद्रशेखर से तुरंत मिलने को कहे. पुलिस के दबाव में दीपक दलवी ने चंद्रशेखर को फोन कर के मिलने को कहा तो वह तैयार हो गया. मिलने की जगह तय हुई नासिक रोड.

चंद्रशेखर और दीपक दलवी के मिलने की बात तय होते ही एक विशेष पुलिस टीम तैयार की गई जिस में इंसपेक्टर राजेंद्र कुलकर्णी, सबइंसपेक्टर मोहन खंदारे, आबासाहेब पाटिल, अरुण घाटगे, हवलदार अरुण देवरे, मछींद्र अनंतकवली, बापूराव जाधव और सिपाही ज्ञानेश्वर मोरे को शामिल किया गया.

यह पुलिस टीम दीपक दलवी को ले कर नासिक पहुंची. दीपक और चंद्रशेखर के मिलने की बात तय थी ही सो उस की गिरफ्तारी में कोई परेशानी नहीं हुई. उस का भाई राजदत्त राणे भी गिरफ्तार हो गया. पूछताछ में पता चला कि घटना वाले दिन इन लोगों ने टवेरा से सारा माल नैनो कार में रख कर नैनो नासिक के चेहड़ी सिवान पर खड़ी कर दी थी. बाद में जब पुलिस ने नाकाबंदी हटा ली तो ये लोग वहां से कार अपने घर ले आए थे.

4 दिन बाद चंद्रशेखर और दीपक सारा माल ले कर डोंबीवली गए जहां इन्होंने सारे जेवरात पिघलवा कर उन की छड़ें बनवा लीं. छड़ें ले कर चंद्रशेखर नासिक चला गया. उस ने दीपक से कहा कि उन छड़ों को बेच कर सब का पैसा दे देगा. यह सोना बेचने के बाद ही उस ने रूपेश को 7 लाख, जीवन को 5 लाख, कार्तिक को डेढ़ लाख और दीपक को 3 लाख रुपए दिए थे.

डकैती का वही सोना बेच कर राणे भाइयों ने 10 लाख की शेवरलेट क्रूज कार खरीदी थी. साथ ही नासिक के गंगापुर रोड पर बसी सिरीन मेडीज कालोनी में एक प्लौट खरीद कर उन्होंने उस पर मकान बनवा लिया था. किराए का मकान छोड़ कर दोनों भाई अपने नए मकान में रह रहे थे. राजदत्त राणे पिछले कई सालों से डीजे म्युजिक का काम कर रहा था. जबकि चंद्रशेखर राणे का कंप्यूटर ठीक करने का काम था. अपना काम बढ़ाने के लिए उस ने बैंक से कर्ज भी लिया था. पुलिस ने राणे भाइयों के पास से 4 करोड़ 20 लाख रुपए का सोना और 26 लाख 40 हजार रुपए नकद बरामद किए.

साथ ही इन के पास से नकली पिस्तौल, 2 चापर, एक पक्कड़, टाटा नैनो और शेवरलेट क्रूज कार भी बरामद हुईं. इस पूरी काररवाई के बाद डोंबीवली पुलिस ने सभी अभियुक्तों को अदालत पर पेश कर के नासिक के थाना उपनगर की पुलिस के हवाले कर दिया. वहां इन लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 395, 342, 343, 170 (डी) और आर्म्स एक्ट की धारा 325 के तहत केस दर्ज था. नासिक पुलिस ने अदालत से इन लोगों का रिमांड ले कर विस्तार से पूछताछ की.

इस के बाद सभी को अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया गया. फिलहाल इस मामले की जांच नासिक रोड थाना के वरिष्ठ पुलिस इंसपेक्टर कोंडीराम आर पोपरे कर रहे हैं.

नासिक स्थित मणप्पुरम फाइनेंस कंपनी की ब्रांच में यह पहली डकैती नहीं थी. इस से पहले इस कंपनी की महाराष्ट्र, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और पंजाब की ब्रांचों में 12 डकैतियां पड़ चुकी हैं.      Gold Loan Company Robbery.

— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.

— 2014 में प्रकाशित

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