UP Crime Story. पति से अलग रह रही गुडि़या ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की अपनी ही बेटी उस के प्यार पर डाका डालेगी. लेकिन जब ऐसा हो गया तो उस का जो परिणाम आया, वह कई जिंदगियां बरबाद करने वाला था.
रात 9 बजे के आसपास मारुति वैन के आने की घरघराहट ने लोगों का ध्यान अपनी ओर इसलिए खींचा था, क्योंकि उतनी रात को गांव घोंघी रऊतापुर के असुरक्षित जंगली इलाके के उस सुनसान रास्ते पर कोई भी गाड़ी जल्दी नहीं आतीजाती थी. उतनी रात तक गांवों में वैसे भी सन्नाटा पसर जाता है. ठंड का मौसम हो तो आदमी तो क्या, कुत्ते भी दुबक जाते हैं. ऐसा ही कुछ हाल गांव घोंघी रऊतापुर का भी था. ज्यादातर लोग खापी कर रजाइयों में दुबक गए थे. गांव के 2-4 घरों के लेग ही आग जला कर उसी के पास बैठे बतिया रहे थे.
मारुति वैन के आने की आवाज जाग रहे लोगों के कानों में पड़ी तो अपने आप ही उन का ध्यान उस की ओर चला गया. वैन गांव से कुछ दूरी पर जंगली लोध के खेत के पास रुक गई. वैन के रुकते ही उस की हेडलाइट बुझ गई. अगर वैन गांव के अंदर आ जाती तो शायद उस के बारे में जानने की उतनी उत्सुकता न होती. लेकिन वह गांव के बाहर ही सुनसान जगह पर रुक गई थी, इसलिए लोगों को उस के बारे में जानने की उत्सुकता हुई. उतसुकतावश लोग उस के बारे में जानने की कोशिश करने लगे. सभी उसी के बारे में सोच रहे थे कि तभी वैन के पास आग की ऊंचीऊंची लपटें इस तरह उठने लगीं, जैसे कोई ज्वलनशील पदार्थ डाल कर कोई चीज जलाई जा रही हो.
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उस तरह आग की लपटों को उठते देख गांव वालों को लगा कि किसी ने फसल में आग लगा दी है. इसलिए वे चीखचीख कर शोर मचाने लगे, ‘‘अरे दौड़ो भाई, किसी ने फसल में आग लगा दी है.’’
चीखपुकार सुन कर गांव वाले लाठीडंडे ले कर खेतों की ओर दौड़ पड़े. गांव वालों को शोर मचाते हुए अपनी ओर आते देख मारुति वैन से आए लोग जल्दी से वैन में बैठ कर दूसरे रास्ते से होते हुए कानपुरलखनऊ हाईवे की ओर भाग निकले. गांव वाले जब जंगली लोध के खेत के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा आग फसल में नहीं लगी थी, बल्कि वहां एक महिला की लाश जल रही थी. वहां एक जोड़ी चप्पलें एवं पेट्रोल की एक केन पड़ी थी. चप्पलें लेडीज थीं, इसलिए अंदाजा लगाया कि ये मृतका की ही होंगी.
गांव के ही शत्रुघ्न ने अपने मोबाइल फोन से इस घटना की सूचना थाना गंगाघाट पुलिस को दे दी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी मनोज सिंह सिपायिहों के साथ रवाना हो गए. घटनास्थल पर पहुंच कर थानाप्रभारी ने लाश का निरीक्षण किया. शव लगभग 95 प्रतिशत जल चुका था. वह इतना वीभत्स हो चुका था कि उस की शिनाख्त करना मुश्किल था.
पुलिस ने घटनास्थल की कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर के लाश को पोस्मार्टम के लिए जिला संयुक्त चिकित्सालय उन्नाव भेज दिया. इस के बाद थाने लौट कर पुलिस अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच को आगे बढ़ाने की राह तलाश करने लगी. यह 14 नवंबर, 2013 की बात है.
अगले दिन यानी 15 नवंबर, 2013 को थानाप्रभारी मनोज सिंह ने एक सिपाही को गांव गजियाखेड़ा भेज कर गुडि़या को बुलाया. दरअसल 13 नवंबर को उस ने अपनी 18 वर्षीया बेटी कंचन की गुमशुदगी दर्ज कराई थी. मनोज सिंह ने गुडि़या को जले हुए शव का फोटो और उस के पास से बरामद चप्पलें दिखाईं तो गुडि़या शव को तो नहीं पहचान सकी, लेकिन चप्पलों के बारे में उस ने कहा कि ये तो मेरी बेटी की ही जैसी हैं.
उन चप्पलों को देख कर गुडि़या सिसकते हुए बोली, ‘‘लगता है साहब, मेरी बेटी पिता की साजिश का शिकार हो गई.’’
गुडि़या की इस बात से थानाप्रभारी मनोज सिंह का माथा ठनका. उन्होंने कहा, ‘‘पिता की साजिश का शिकार, तुम्हारे कहने का मतलब क्या है? पूरी बात विस्तार से बताओ?’’
इस के बाद गुडि़या ने थानाप्रभारी मनोज कुमार को अपने पति श्यामबाबू और बेटी कंचन के गायब होने की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.
उत्तर प्रदेश के जिला उन्नाव के थाना गंगाघाट के गांव गजियाखेड़ा की रहने वाली 38 वर्षीया गुडि़या की शादी 22 साल पहले कानपुर के मोहल्ला बर्रा के रहने वाले रामदास के बेटे श्यामबाबू के साथ हुई थी. श्यामबाबू की शराब पीने की आदत थी. एक तो गुडि़या खास सुंदर नहीं थी, दूसरे वह मनचाहा दहेज नहीं लाई थी, इसलिए श्यामबाबू शराब पी कर लगभग रोज ही गुडि़या के साथ मारपीट करता था. भविष्य की चिंता में गुडि़या पति की मारपीट सहती रही. उसी बीच गुडि़या सोनम, कंचन और मोना, लगातार 3 बेटियों की मां बन गई.
लगातार 3 बेटियों के पैदा होने से श्यामबाबू गुडि़या से नफरत करने लगा. बेटियां पैदा करने का दोष गुडि़या पर लगाते हुए वह उस पर और अत्याचार करने लगा. उस ने गुडि़या का घर से बाहर जाना तो पहले ही बंद कर दिया था, अब वह उसे किसी से बात भी नहीं करने देता था. जब गुडि़या की सहनशक्ति खत्म हो गई तो उस ने किसी के माध्यम से अपने भाइयों को अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों की खबर भिजवाई.
खबर पा कर गुडि़या का भाई रज्जन उसे ले जाने आया तो श्यामबाबू ने गुडि़या को उस के साथ भेजने से साफ मना कर दिया. तब रज्जन पुलिस की मदद से गुडि़या और उस की तीनों बेटियों को श्यामबाबू के चंगुल से मुक्त करा कर अपने घर ले गया.
गुडि़या तीनों बेटियों के साथ मायके में रहने लगी. 8-10 महीने ही बीते होंगे कि एक दिन चुपके से श्यामबाबू तीनों बेटियों को बहलाफुसला कर अपने साथ लिवा ले गया. बेटियों के अलग होने का दुख गुडि़या को हुआ जरूर, लेकिन उस का अपना ही कोई भविष्य नहीं था, इसलिए उस ने बेटियों की ओर से संतोष कर लिया. गुजरबसर के लिए वह मातापिता की अनुमति ले कर कोई कामधंधा तलाशने लगी.
मातापिता को गुडि़या की चिंता कुछ ज्यादा ही रहती थी, इसलिए वे उस का खयाल बेटों से ज्यादा रखते थे. इस बात को ले कर घर में कलह होने लगी. स्थिति खराब होते देख मां ने एक खेत लाखों रुपए में बेच कर पूरी रकम गुडि़या को दे दी. इस बात से नाराज भाइयों ने गुडि़या और मातापिता को मारपीट कर घर से भगा दिया. घर से निकाले गए मातापिता को ले कर गुडि़या शुक्लागंज में किराए का कमरा ले कर रहने लगी. गुजरबसर के लिए वह एक ब्यूटीपार्लर में काम करने लगी.
अकेली औरत की परेशानियों को देख कर गुडि़या ने श्यामबाबू से माफी मांगते हुए अपने साथ रखने को कहा. तब श्यामबाबू ने उसे साथ रखने से मना करते हुए कहा, ‘‘साथ रखना तो दूर, अब मैं तुम्हें देखना भी नहीं चाहता. मैं तुम्हें अब कभी साथ नहीं रखूंगा.’’
गुडि़या समझ गई कि अब श्यामबाबू उसे कभी अपने साथ नहीं रखेगा. उस की जिंदगी एक कटी पतंग की तरह हो कर रह गई थी. उसी निराशा के बीच गुडि़या की मुलाकात गोलू श्रीवास्तव उर्फ अशोक कुमार से हुई. वह अमेठी का रहने वाला था. उस की शादी नहीं हुई थी. पहली ही मुलाकात में दोनों एकदूसरे के प्रति कुछ ऐसा आकर्षित हुए कि फिर मिलने का वादा कर लिया.
मिलते रहने की वजह से गुडि़या और गोलू में प्रेम हो गया तो गुडि़या गोलू को अपने साथ रखने के बारे में सोचने लगी. इस के लिए उस ने मातापिता से अनुमति लेने के लिए कहा, ‘‘अभी तो मेरी पूरी जिंदगी पड़ी है. जब तक आप दोनों जिंदा हैं, कोई कुछ न कहेगा. लेकिन आप लोगों के बाद लोग मुझे जीने नहीं देंगे. इसलिए मैं चाहती हूं कि गोलू को अपने साथ रख लूं.’’
गुडि़या के पिता तैयार नहीं थे. लेकिन गुडि़या ने उन्हें ऊंचनीच समझाई तो वह भी तैयार हो गए. उस के बाद गुडि़या ने गोलू को अपने साथ रख लिया. गोलू गुडि़या के साथ उस के पति की हैसियत से रहने लगा. समय अपनी गति से बीतता रहा. पिछले साल गुडि़या के मातापिता की मौत हो गई तो गुडि़या और गोलू ही रह गए.
गोलू को पा कर गुडि़या के जीवन में एक बार फिर रौनक आ गई थी. गुडि़या के पास पैसा था ही, गांव नयाखेड़ा में एक छोटा सा प्लौट ले कर उस ने अपना छोटा सा मकान बनवा लिया. लेकिन वह उस में रहती नहीं थी. रहने के लिए उस ने गजियाखेड़ा में एक मकान किराए पर ले रखा था.
पिछले साल जनवरी महीने में गुडि़या की बड़ी बेटी सोनम अपने पति दीपक वर्मा के साथ गुडि़या के घर पहुंची. उस ने मां को बताया कि पिता ने उस की तो शादी कर दी है, लेकिन दोनों छोटी बहनों पर वह बहुत अत्याचार करते हैं. बेटियों पर अत्याचार करने की बात सुन कर गुडि़या ने सोनम को एक मोबाइल फोन देते हुए कहा, ‘‘गोलू के साथ होने से मैं हर तरह से मजबूत हो गई हूं. किसी तरह तुम यह मोबाइल फोन कंचन तक पहुंचा दो. मैं उस से अपने साथ रहने की बात करूंगी. अगर वह मेरे साथ रहने को तैयार हो जाती है तो मैं उसे ला कर अपने पास रख लूंगी.’’
सोनम ने मां द्वारा दिया गया मोबाइल फोन ले जा कर कंचन को दे दिया. इस के बाद कंचन अपनी मां गुडि़या से बातें करने लगी. पिता द्वारा किए गए अत्याचारों के बारे में वह मां को बताती रहती थी. उस ने यह भी बताया कि नई मां भी जुल्म करने में पीछे नहीं है. उस का कहना था कि किसी भी तरह वह उसे पिता के चंगुल से मुक्त कराए, वरना वह आत्महत्या कर लेगी.
श्यामबाबू को कहीं से पता चल गया कि कंचन उस की शिकायत गुडि़या से करती है. इस के बाद वह कंचन को और परेशान करने लगा. तब कंचन ने मां से कहा, ‘‘मां, अब मुझ से पिता के अत्याचार सहे नहीं जा रहे हैं. आप मुझे यहां से किसी तरह निकालिए, वरना मैं आत्महत्या कर लूंगी.’’
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बेटी की तकलीफों के बारे में सुन कर गुडि़या तड़प उठी. उस ने कंचन और मोना को श्यामबाबू के चंगुल से मुक्त कराने के लिए 6 अगस्त, 2013 को कानपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, जिलाधिकारी, उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग, थाना बर्रा के थानाप्रभारी से लिखित शिकायत तो की ही, पुलिस अधिकारियों को बेटी से बातचीत की काल डिटेल्स देते हुए फोन पर रिकौर्ड की गई बातचीत भी सुनाई. इस के बावजूद पुलिस ने उस की कोई मदद नहीं की.
तब गुडि़या ने 8 अगस्त, 2013 को महिला थाना में शिकायत करते हुए अपनी और कंचन की रिकौर्ड की गई बातचीत तो महिला थाना की थानाप्रभारी को सुनाई तो वह द्रवित हो उठीं. उन्होंने बर्रा स्थित श्यामबाबू के घर छापा मार कर कंचन और मोना को मुक्त करा कर उस की मां गुडि़या के हवाले कर दिया. गुडि़या दोनों बेटियों को ले कर अपने घर आ गई. इस के बाद गुडि़या ने उन्नाव की अदालत में कंचन और मोना के गुजारेभत्ते के लिए श्यामबाबू के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया.
इस मुकदमें से श्यामबाबू की परेशानी बढ़ गई. मुकदमें की तारीखों पर आनेजाने से दुखी हो कर एक दिन उस ने अदालत से लौटते समय गुडि़या को जान से मारने के लिए उस पर देसी पिस्तौल से गोली चला दी. संयोग से कंचन की नजर उस पर पड़ गई तो उस ने नाल पर हाथ मार दिया, जिस से उस का निशाना चूक गया. गुडि़या ने उसी दिन उन्नाव कोतवाली में धारा 307 के अंतर्गत श्यामबाबू के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया. जब इस बात की जानकारी श्यामबाबू को हुई तो उस ने मांबेटी को मुकदमा वापस लेने को कहा. लेकिन गुडि़या और कंचन ने उस की बात पर ध्यान नहीं दिया.
इस के बाद सोनम ने फोन कर के मां को बताया कि पापा एक पुलिस अधिकारी के साथ मिल कर उस के खिलाफ कोई षड्यंत्र रच रहे हैं. इसलिए वह कंचन और मोना पर कड़ी नजर रखे, वरना वह दोनों को उठवा कर उन के साथ कुछ भी कर सकते हैं. क्योंकि उन्हीं की वजह से उन्हें जलालत झेलनी पड़ रही थी.
गुडि़या सतर्क हो गई. वह दोनों बेटियों पर नजर रखने लगी. 12 नवंबर, 2013 की सुबह कंचन आजादनगर राजमार्ग पर टहलने गई थी. काफी देर तक वह घर नहीं लौटी तो गुडि़या ने उस की तलाश शुरू की. लेकिन वह कहीं नहीं मिली. तब गुडि़या को लगा, कहीं उसे श्यामबाबू तो नहीं उठा ले गया. उस ने सोनम को फोन कर के कंचन के गायब होने की जानकारी दे कर उस के बारे में पता लगाने को कहा.
थोड़ी देर बाद ही सोनम का फोन आ गया. उस ने गुडि़या को बताया कि कंचन पापा के घर नहीं है. पापा भी अपनी ड्यूटी पर महोबा गए हुए हैं. गुडि़या ने एक बार फिर सभी जगह कंचन की तलाश की. जब उस का कही पता नही ंचला तो उस ने 13 नवंबर, 2013 को थाना गंगाघाट में कंचन वर्मा की गुमशुदगी दर्ज करा दी. लेकिन पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की.
गांव घोंघी रऊतापुर में जो लाश मिली थी, गुडि़या उस की शिनाख्त तो नहीं कर पाई, लेकिन चप्पलों के बारे में कहा था कि ये उसी की जैसी हैं. अगर वह लाश कंचन की थी तो उस की हत्या उस के पिता श्यामबाबू ने ही योजना बना कर की थी.
गुडि़या के बयान के आधार पर थानाप्रभारी मनोज सिंह ने श्यामबाबू को लाश की शिनाख्त के लिए थाना गंगाघाट बुलाया. उसे फोटो और चप्पलें दिखाई गईं तो उस ने कहा कि न लाश ही उस की बेटी की है और न ही चप्पलें. जब लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस ने इस मामले की जांच को ठंडे बस्ते में डाल दिया. लगभग डेढ़ महीने बाद श्यामबाबू घोंघी रऊतापुर में मिली लाश को अपनी बेटी कंचन की लाश बता कर उन्नाव के पुलिस अधीक्षक को प्रार्थना दिया कि कंचन की हत्या उस की मां गुडि़या ने अपने प्रेमी गोलू श्रीवास्तव के साथ मिल कर की है.
इस के बाद लाश को ठिकाने लगाने में कंचन की बड़ी बहन सोनम ने मां और उस के प्रेमी की मदद की थी. श्यामबाबू ने अपने प्रार्थनापत्र में यह भी आरोप लगाया था कि थाना गंगाघाट पुलिस हत्यारों से मिली है, इसलिए कंचन की हत्या के मामले की जांच ठंडे बस्ते में डाल दी है.
श्यामबाबू की शिकायत पर पुलिस अधीक्षक ने इस मामले की जांच शिकायत प्रकोष्ठ के अधिकारी राजेंद्रपाल सिंह को सौंप दी. उन्होंने घटनास्थल पर जा कर गांव वालों से गहन पूछताछ की. इस पूछताछ में उन्हें पता चला कि गुडि़या ने अपने प्रेमी गोलू श्रीवास्तव के साथ मिल कर कंचन की गला दबा कर हत्या की थी. इस के बाद गोलू पड़ोसी, बाबूराम निषाद और सोनम की मदद से गुडि़या कंचन की लाश को मारुति वैन से घोंघी रऊतापुर के जंगलों में ले गई और पेट्रोल डाल कर आग लगा दी. जिस मारुति वैन से लाश ले जाई गई थी, उसे गंगाघाट की ही मिश्रा कालोनी का रहने वाला रवि पांडेय चला कर ले गया था.
इस जानकारी के बाद राजेंद्रपाल सिंह ने सच्चाई का पता लगाने के लिए रवि पांडेय की तलाश शुरू कर दी. संयोग से जल्दी ही वह उन के हाथ लग गया. थाना गंगाघाट ला कर उस से पूछताछ की गई तो पहले उस ने पुलिस को बरगलाने की कोशिश की. लेकिन पुलिस अपनी पर आ गई तो उसे सच्चाई बतानी ही पड़ी.
रवि के बताए अनुसार, गुडि़या का प्रेमी गोलू श्रीवास्तव उस का गहरा दोस्त था. 14 नवंबर की रात गोलू ने उसे फोन कर के कहा कि उस की बेटी की तबीयत खराब हो गई है, इसलिए उसे डाक्टर को दिखाने के लिए अस्पताल ले जाना है. वह मारुति वैन ले कर उस के घर आ जाए.
गोलू के बुलाने पर रवि मारुति वैन यूपी 78एक्स 2585 ले कर गोलू के घर पहुंचा. गोलू ने सोनम और अपने पड़ोसी बाबूराम निषाद को बुला कर वैन में बैठने को कहा. इस के बाद वह एक लड़की को उठा कर ले आया. देखने से ही लग रहा था कि वह जिंदा नहीं है. गोलू के कहने पर वह वैन ले कर कानपुरलखनऊ हाईवे पर चल पड़ा. रास्ते में उस ने एक पेट्रोल पंप से 2 सौ रुपए में एक केन पेट्रोल खरीदा और आजाद मार्ग पर लौट आया.
कुछ दूर जाने के बाद गोलू ने रवि से वैन को घोंघी रऊतापुर जाने वाली कच्ची सड़क पर ले चलने को कहा. रवि को शक हुआ तो उस ने उस ओर जाने से मना कर दिया. उस का कहना था कि उधर तो खेत हैं, अस्पताल कहां है. तब गोलू ने उसे धमकी दे कर उधर चलने को कहा. मजबूरन रवि को आगे बढ़ना पड़ा. काफी दूर सुनसान में जा कर गोलू ने वैन रुकवाई और लाइट बंद करा दी.
गोलू ने लड़की को नीचे उतारा और खेत के किनारे डाल कर उस पर साथ लाया पेट्रोल उड़ेल कर आग लगा दी. लपटें उठीं तो गांव वालों ने समझा कि खेत में आग लग गई है. वे शोर मचाते हुए दौड़े. स्थिति बिगड़ते देख सभी जल्दीजल्दी वैन में सवार हुए और दूसरे रास्ते से हाईवे की ओर भागे. वापस आ कर उस ने सभी को आजाद मार्ग पर उतार दिया और खुद अपने घर चला गया.
रवि के अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर कंचन की लाश ले जाने वाली वैन बरामद कर ली. अब पुलिस को अन्य लोगों को गिरफ्तार करना था. पुलिस ने गुडि़या के घर छापा मारा, जहां गुडि़या और गोलू तो नहीं मिले, लेकिन सोनम मिल गई. पुलिस ने उसे थाने ला कर पूछताछ की तो पहले सोनम ने यह कह कर इस अपराध में शामिल होने से मना कर दिया कि उसे किसी के इशारे पर फंसाया जा रहा है. लेकिन जब पुलिस ने उस के सामने सुबूत पेश किए तो उस ने कंचन की हत्या में शामिल होने का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद पुलिस ने कंचन की हत्या का मुकदमा दर्ज कर के सोनम और रवि को 14 जनवरी, 2014 को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.
अब पुलिस को गोलू श्रीवास्तव, गुडि़या और बाबूराम निषाद की तलाश थी. लगातार छापे मार कर 17 जनवरी, 2014 को पुलिस ने गोलू और गुडि़या को भी गिरफ्तार कर लिया. थाना गंगाघाट ला कर दोनों से पूछताछ की गई. उन के पास झूठ बोलने का कोई बहाना नहीं था, इसलिए गोलू और गुडि़या ने कंचन की हत्या का अपराध स्वीकार करते हुए पुलिस को बताया कि पहले पति श्यामबाबू से पैदा 3 बेटियों में कंचन और मोना उसी के साथ रहती थीं.
साथ रहते हुए ही कंचन के संबंध गुडि़या के प्रेमी गोलू से हो गए. जब इस बात की जानकारी गुडि़या को हुई तो उस ने कंचन को डांटा. इस के बाद कंचन, गोलू और गुडि़या में खूब लड़ाई हुई. इस बात से नाराज हो कर कंचन ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली.
कंचन के आत्महत्या कर लेने के बाद गुडि़या और गोलू को जेल जाने का डर सताने लगा. उन्होंने सोचा, इस से बचने का एक ही तरीका है कि लाश गायब कर के उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी जाए. जब लाश बरामद होगी तो उस की हत्या का आरोप उस के पिता श्यामबाबू पर लगा दिया जाएगा. यही सोच कर गुडि़या ने अपने पड़ोसी बाबूराम निषाद से सलाह ली. उस ने भी इसे उचित ठहराया. इस के बाद उन्होंने कंचन की लाश को रात के अंधेरे में ले जा कर घोंघी रऊतापुर के जंगल में जला दी.
पुलिस ने गुडि़या और गोलू के बयानों के आधार पर इन्हीं दोनों को कंचन की हत्या का मुख्य आरोपी माना. पूछताछ के बाद उन्हें भी जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक बाबूराम निषाद पुलिस के हाथ नहीं लगा था.
गिरफ्तार अभियुक्तों को जेल भेज कर राजेंद्र पाल सिंह घोंघी रऊतापुर में मिली लाश की शिनाख्त डीएनए जांच से कराना चाहते हैं, जिस से यह साबित हो सके कि मृतका कंचन ही थी. इस के लिए उन्होंने काररवाई भी शुरू कर दी थी. UP Crime Story
— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.
— 2014 में प्रकाशित






