Dark Secret of Marriage. मैं खूबसूरत थी, अच्छे परिवार से थी. फिर भी शादी के बाद मेराज मुझे पत्नी का वह दरजा नहीं दे सके. इस का राज तब खुला जब मेरे देवर ने हमें जबरन नैनीताल घूमने भेजा और मेराज मेरे करीब आए. 

ठंडी बर्फीली हवा के झोंके तन को भिगो रहे थे, मन की उड़ान सातवें आसमान को छू रही थी. पहाड़ों की शीतलता का अहसास, बादलों से आंखमिचौली करती गुनगुनी धूप, सब कुछ बहुत दिलकश था.

चीड़ और देवदार के वृक्षों के इर्दगिर्द चक्कर काटते धुंधभरे बादलों को देख कर हम दिल्ली की तपती गर्मी को भूल गए थे. होटल की लौबी से जब मैं नैनी झील पर तैरती रंगबिरंगी कश्तियां देखती तो सोचती उन पर बैठे हर शख्स की जिंदगी कितनी हसीन है.

क्यारियों में खिले रंगबिरंगे फूल और उन पर मंडराती तितलियां मन को कल्पनालोक की सैर करा रही थीं. लौबी से अंदर आ कर मैं कमरे का जायजा लेने लगी. तभी वेटर चाय और गरमगरम पकौडे़ ले आया. जब हम चाय पी रहे थे तभी मेरी नजर मेराज पर पड़ी. उन की आंखों में मुझे प्यार का सागर लहराता नजर आया. जिस चाहत भरी नजर के लिए मैं सालों से तरसती रही थी, आज वही नजर मुझ पर मेहरबान सी लगी.

सचमुच हम दोनों जिंदगी की भीड़ में गुम हो गए थे. देवर और ननदों को संभालने और बड़ा करने की जिम्मेदारी में शायद हम यह भी भूल गए थे कि हम पतिपत्नी भी हैं. अचानक मेराज उठे और शौल ला कर मेरे कंधों पर डाल दी. मैं ताज्जुब से सिहर सी गई. यह स्वाभाविक भी था क्योंकि जिस ने सालों से मेरी परवाह नहीं की, वह आज मुझे सपनों के शहर में ले आया था. अचानक मेराज मुझ से बोले, ‘‘फ्रेश हो जाओ, नीचे लेक पर चलते हैं, फिर कहीं बाहर डिनर करेंगे.’’

यह एक तरह से मेरे लिए सरप्राइज था. मैं जल्दी से तैयार हो गई.

होटल से लेक तक काफी लंबी ढलान थी, मेरे कदम उखड़ रहे थे. तभी मेराज ने मेरा बर्फ सा ठंडा हाथ थाम लिया. उन की गरम गुदगुदी हथेली में अपना हाथ दे कर मुझे ऐसा लगा जैसे भूल से किसी ने मुझे कतरा भर इज्जत बख्श दी हो.

उस दिन जो हो रहा था, वैसा कभी नहीं हुआ था. मैं और मेराज कश्ती में बैठ कर देर शाम तक नैनी झील में हवा से उठतीबैठती लहरों का आनंद लेते रहे. हां, हमारे बीच बातचीत कोई नहीं हुई. दोनों ही एकदूसरे की जगह दूसरे जोड़ों को देखते रहे.

इस बीच मेराज ने 2-3 बार मुझे कनखियों से जरूर देखा था. हमारा यह नौका विहार रूमानी भले ही नहीं था, फिर भी बहुत अच्छा लगा. जब अंधेरा घिरने लगा तो हम डिनर के लिए एक अच्छे होटल में चले गए.

होटल रंगीन रोशनियों से दमक रहा था, इत्र की खुशबू से सराबोर. आसमानी लिबास और पुराने डिजाइन के गहनों में मैं बहुत दिलकश लग रही थी. डिनर के दौरान मेराज एकटक मुझे देखे जा रहे थे. उन की आंखों की गहराइयों में न जाने ऐसा क्या था कि मैं अंदर तक पिघलती जा रही थी. मेरे जीवन से जो खुशी विदा ले चुकी थी, वह दोबारा दस्तक देती सी लग रही थी.

‘‘तुम बहुत प्यारी हो सलमा’’ मेराज के थरथराते होंठों से निकले शब्दों को सुन कर मुझे लगा जैसे मैं किसी और ही लोक में हूं. जिन अल्फाजों को सुनने के लिए मैं सालों से तरस रही थी, वह मेरे कानों में शहद घोल रहे थे.

जीने के लिए खुशी के दो पल भी काफी होते हैं. मुझे लग रहा था जैसे मेराज के शब्द पहाडि़यों से टकरा बारबार मेरे कानों तक आ रहे हों. जिस तरह तितलियां मौन रह कर भी संगीत पैदा करती हैं, वैसे ही मेराज के हावभाव मेरे इर्दगिर्द संगीतमय माहौल पैदा कर रहे थे.

जब से हमारा निकाह हुआ, मैं ने मेराज को गुस्से में ही पाया था. बातबात पर मुझे बेइज्जत करना, मेरे घर वालों को उलटासीधा कहना, मेरी तरफ घूर कर देखना, मुझ पर मालिक की तरह हुक्म चलाना, उन की आदत में शामिल था. मैं ने उन्हें कभी हंसते हुए नहीं देखा था. उन के साथ मैं ने कई साल बड़ी खामोशी के साथ गुजारे थे.

मेराज सभी से ठीक से पेश आते थे लेकिन जैसे ही मुझ से निगाह मिलती, एक संजीदगी भरी उदासी उन के चेहरे पर उतर आती थी.  फिर हमारे बीच एक सर्द धुआं सा फैल जाता था और यह आपे से बाहर हो जाते थे. अपने लिए उन की आंखों में छाई नफरत मुझ से बरदाश्त नहीं होती थी. कई बार तो मैं रोने बैठ जाती थी.

वक्त गुजरते देर नहीं लगती. वह आ कर कब चला जाता है, पता नहीं चलता. हां, वक्त अपने पीछे ढेरों कहानियां जरूर छोड़ जाता है. मेरे देवर मोहम्मद रजा सैफ ने शायद मेरे दर्द को समझ लिया था. जब वह किशोर थे तभी से मेरी उदासी और नम आंखों के दर्द को पढ़ने लगे थे. जब वह जवान हो गए और बिजनैस संभालने लगे तो उन्होंने अपनी प्यारी भाभी यानी मुझे कुछ सुकून पहुंचाना चाहा. इसीलिए उन्होंने जबरन टैक्सी करवा कर हमें यहां भेज दिया था. होटल की बुकिंग भी रजा ने कराई थी.

डिनर के बाद मेराज के मन में न जाने क्या आया कि मेरा हाथ थाम कर बोले, ‘‘अभी और घूमने का मन है, चलो फिर से झील में चलते हैं. रोशनी और अंधेरे के समीकरण में कश्तियों में घूमने का अलग ही मजा है.’’

मैं भला क्यों मना करती. मेरा मन तो चाह रहा था कि वह रात भर मेरे साथ घूमते रहें.

हम लेक किनारे खड़ी बोट पर बैठ गए. कुछ ही देर पहले बारिश हुई थी. हवा अब भी चल रही थी, जिस के वेग से बोट हिल रही थी. लहरें इतनी ऊपर तक आ रही थीं कि उन का आक्रामक रूप देख कर डर लग रहा था. एक जगह रोशनी देख मैं ने झील में झांका तो अपना ही अक्स डरावना सा लगा.

मेरी कहानी एक औरत के अपमान की कहानी थी. ऐसी औरत की कहानी जो सालों से अपने ही हमसफर के हाथों अपमान की शिकार होती रही थी. पुरुष कभी पिता बन कर, कभी पति बन कर, कभी भाई बन कर तो कभी बेटा बन कर औरत को अपमान की भट्ठी में जलाता रहा है. मेराज ने मुझे मेरा ही हमनवा बन कर अपमान की आग में जलाया था.

झील के हिलते हुए पानी में अपना बदसूरत सा अक्स देख कर मेरी आंखें भर आईं. मेरी आंसुओं भरी आंखों से मेराज कभी नहीं पसीजे थे. लेकिन उस तनहाई में अचानक बोले, ‘‘सलमा, मैं ने तुम्हारे साथ जो सुलूक किया, उस के लिए मैं ताउम्र शर्मिंदा रहूंगा.’’

फिर अचानक उन्होंने मेरी कमर में हाथ डाल कर मुझे अपने सीने में छिपा लिया. मेराज का गला भर आया था, आंखें नम थीं. कुछ ठहर कर उन्होंने फिर कहा, ‘‘सालों से मेरे दिल पर एक बोझ है, जिसे मैं आज सुकून भरे इन लम्हों में मन से उतार देना चाहता हूं. मैं जानता हूं तुम बेहद खूबसूरत हो, जहीन हो. फिर भी शादी के बाद से आज तक मैं तुम्हें वैसा प्यार नहीं कर सका, जैसा मुझे करना चाहिए था. तुम्हें देखते ही मेरे मन में नफरत की एक सर्द लहर सी दौड़ जाती थी. इसी वजह से मैं तुम्हारे दामन में चाहत का कोई फूल नहीं डाल सका.’’

‘‘आप को खुश रखूं, आप के लिए दुआएं मांगू, मेरे जीने का तो बस यही एक मकसद है. फिर भी मैं उस वजह को जानने के लिए बेताब हूं, जिस की मुझे इतनी लंबी सजा मिली.’’ कह कर मैं हैरानी से मेराज को देखने लगी. मेरे सवाल के जवाब में मेराज ने जो कुछ बताया, उसे सुन कर मैं सन्न रह गई. सर्दी के बावजूद मेरा बदन पसीनेपसीने हो गया.

मेरी और मेराज की शादी भी इत्तफाक ही थी. सच कहूं तो 2 बड़े परिवारों के बीच अचानक बना एक खोखला संबंध भर. यह संबंध भी इसलिए बना था क्योंकि मेरे अब्बूअम्मी को मेरी शादी की जल्दी थी. उन की चाहत पूरी हुई और सब कुछ जल्दीजल्दी में हो गया. इस के पीछे भी एक रहस्य था जिस के लिए जिम्मेदार मैं ही थी.

बात उन दिनों की है जब मैं लखनऊ यूनिवर्सिटी में पढ़ा करती थी. एक दिन जब मैं अपनी फाइल उठा कर यूनिवर्सिटी जाने के लिए निकली तो अब्बू बोले, ‘‘सलमा, इन से मिलो, यह हैं मेरे जिगरी दोस्त जुबैर. इन के साहबजादे अनवर मियां भी लखनऊ यूनिवर्सिटी से फिजिक्स में एमएससी करने आए हैं. उन्हें हौस्टल में जगह नहीं मिल पा रही है इसलिए कुछ दिन हमारे यहां ही रहेंगे. तुम शाम तक कोठी की ऊपरी मंजिल के दोनों कमरे साफ करवा देना. अनवर शाम को आ जाएगा.’’

‘‘आदाब चचाजान’’ कह कर मैं अब्बू की तरफ मुखातिब हो कर बोली, ‘‘अब्बू, मैं शाम तक कमरे तैयार करवा दूंगी. अभी जा रही हूं, देर हुई तो मेरी क्लास छूट जाएगी.’’

खुदा हाफिज कह कर मैं सीढि़यां उतर कर चली गई. चचाजान और अब्बू हाथ हिलाते रहे. वापस आते ही मैं ने सब से पहले कमरे साफ करवाए. फूलों वाली नई चादर बिछाई, गुलदानों में नए फूल सजाए. टेबल पर अपने हाथ का कढ़ा हुआ मेजपोश बिछाया, उस पर पानी से भरा जग और नक्काशीदार ग्लास रखा.

नीचे आई तो लगा कोई दरवाजे पर दस्तक दे रहा है. मेरे कपड़े और मलिन सा चेहरा धूल से भरे हुए थे. पर मैं करती भी तो क्या, दस्तक तेज होती जा रही थी. मैं ने फाटक खोल दिया.

बाहर एक युवक खड़ा था. वह अपना परिचय देते हुए बोला, ‘‘मैं अनवर.’’

कसरती जिस्म, स्याह घुंघराले बाल, उसे देख मैं तो पलक झपकना ही भूल गई. लगा जैसे किसी ने सम्मोहन सा कर दिया हो. ‘‘आइए तशरीफ लाइए.’’ कह कर मैं ने चुन्नी सर पर डाल ली. फिर उसे कमरे में ले गई.

कमरे की सजावट देख कर वह मुसकराते हुए बोला, ‘‘ओह, तो आप कमरे की सफाई कर रही थीं, बहुत सुंदर सजाया है.’’

‘‘सुबह चचाजान से मुलाकात हुई, पता चला आप को हौस्टल में जगह नहीं मिली.’’ मैं ने कहा, ‘‘इसी बहाने हमें आप की खिदमत का मौका मिल जाएगा.’’

‘‘नाहक ही आप को परेशान किया, माफ कीजिएगा. जैसे ही वहां कमरा मिलेगा, मैं चला जाऊंगा.’’ अनवर ने कहा तो मैं बोली, ‘‘यह क्या कह रहे हैं आप? यह तो हमारी खुशकिस्मती है कि आप हमारे गरीबखाने पर तशरीफ लाए.’’

‘‘आप को एक तकलीफ और दूंगा, अगर एक कप चाय मिल जाए तो बड़ी मेहरबानी होगी.’’

‘‘ओह श्योर.’’ कह कर मैं तेजी से जीना उतरने लगी, उस वक्त मेरा दिल मेरे ही बस में नहीं था.

मैं ने उसे चाय ला कर दे दी. उस दिन बात वहीं खत्म हो गई. फिर भी न जाने क्यों मैं उसे ले कर खुश थी.

अनवर को हमारे यहां रहते लंबा वक्त गुजर गया. मैं उस का और उस की हर चीज का ध्यान रखती. उस की गैरहाजरी में उस का कमरा सजाती. अपनी ड्रैसेज पर भी खूब ध्यान देती. उस के सामने बनसंवर कर जाना, मुझे अच्छा लगता था. वह भी ऐसी ही कोशिश करता था.

मुझ में आए बदलाव पर अम्मी ने कभी भी ध्यान नहीं दिया. इस की वजह थी अब्बू का देर से घर आना. भाईभाभी अमेरिका में थे, जबकि अम्मी का ज्यादातर वक्त किटी पार्टियों में गुजरता था. घूमनेफिरने की शौकीन अम्मी को मुझ पर नजर रखने का वक्त ही नहीं मिलता था.

मैं और अनवर यूनिवर्सिटी में आतेजाते अकसर आमनेसामने पड़ जाते थे. कभी टैगोर लायब्रेरी में, कभी बौटेनिकल गार्डन में. वह जब भी मुझे देखता, उस की प्यासी नजरें कुछ पैगाम सा देती नजर आतीं. एक दिन सुबहसुबह जब मैं उस के कमरे में चाय देने गई, तो उस ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला, ‘‘सलमा, क्या हम दोस्ती के लायक भी नहीं हैं?’’

यह मेरे लिए अप्रत्याशित जरूर था, लेकिन मेरे मन के किसी कोने में दबी तमन्नाओं को जैसे पंख मिल गए और मैं आसमान में उड़ने लगी. कब से दबा कर रखी चाहत ने जोर मारा तो एक झटके में मन के सभी बंधन टूट गए.

उस दिन आसमान पर कालेकाले बादल छाए थे. इतवार का दिन था, मैं ने हलका मेकअप कर के फिरोजी रंग का गरारा, कुरता और फिरोजी चूडि़यां पहनी. दरअसल उस दिन मेरी खास फ्रैंड नसीमा आने वाली थी.

अम्मी तैयार हो कर निकलते हुए बोलीं, ‘‘सलमा, मैं आज पिक्चर जा रही हूं, सभी किटी मैंबर हैं. बुआ से लंच बनवा दिया है, जल्दी ही आऊंगी. ऊपर भी लंच बुआ दे आएंगीं. वह 2 बजे दोबारा आएंगी.’’

अम्मी के जाते ही मैं यह सोच कर खुशी से उछल पड़ी कि आज नसीमा से खूब दिल की बातें करूंगी.

मैं चाय ले कर ऊपर गई तो अनवर कुछ रोमांटिक मूड में लगा. मैं ने चाय रखी तो वह मेरी तरफ देख कर बोला, ‘‘आज तो आप कयामत लग रही हैं. क्या करूं, मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूं.’’

मैं कुछ सोच पाती, इस से पहले ही अनवर ने मुझे बाहों में भर लिया. उस की बाहों में मुझे जन्नत नजर आ रही थी. लेकिन तभी जैसे जलजला सा आ गया. मेरे पांवों के नीचे से जमीन निकल गई.

सामने अम्मी रौद्र रूप में खड़ी थीं. वह जोर से चीख कर बोलीं, ‘‘भला हुआ जो मैं अपना पर्स भूल गई थी, वरना इस नौटंकी का पता ही नहीं चलता. इसे कहते हैं आस्तीन का सांप. जिसे फ्री में खिलापिला रहे हैं, वही हमें डंस रहा है. हम ने तुम्हें पनाह दी थी और तुम ने ही हमारा गिरेबां चाक कर दिया. जाओ, चले जाओ यहां से. यहां गुंडेमवालियों का कोई काम नहीं है.’’

मैं और अनवर दोनों ही अपराधियों की तरह मुंह लटकाए खड़े थे. अम्मी बहुत गुस्से में थीं. वह अनवर का सामान उठाउठा कर नीचे फेंकने लगीं. जरा सी देर में सारा मोहल्ला इकट्ठा हो गया.

अनवर गुनहगार बना खामोश खड़ा था, उस की आंखों से अंगारे बरस रहे थे. अब जाना ही उस के लिए बेहतर था. उस ने खामोशी से अपना सामान समेटा और टैक्सी स्टैंड की ओर निकल गया.

वह तो चला गया पर मेरी जिंदगी में तूफान बरपा गया. उस के जाने के बाद अम्मी ने मोहल्ले वालों से कह दिया कि किराया नहीं देता था, कब तक रखती.

अम्मी ने मुझे खूब मारा, लेकिन उन की मार मेरे प्यार की आग को बुझा नहीं सकी. एक दिन अनवर मेरे सोशियोलौजी सोशल वर्क डिपार्टमेंट के आगे खड़ा था. रूखे बाल, उदास चेहरा. मैं दौड़ कर उस के पास जा पहुंची और उसे ऊपर से नीचे तक देखते हुए बोली, ‘‘यह क्या हाल बना रखा है अनवर, मैं तुम्हारे बगैर नहीं जी सकती.’’

अनवर मेरी तरफ देख कर बोला, ‘‘यूनिवर्सिटी के पास ही एक कमरा लिया है, अम्मी भी आई हुई हैं. मैं ने उन्हें तुम्हारे बारे में सब कुछ बता रखा है. अम्मी मेरी दुलहन को देखना चाहती हैं. 2 मिनट के लिए चल सकोगी? अम्मी हमारी शादी का कोई रास्ता निकालना चाहती हैं.’’

अनवर की आवाज में जो दर्द था, उसे देख मैं रो पड़ी और उस के पीछेपीछे चल दी.

जिस कमरे में अनवर मुझे ले गया, उस में हलका अंधेरा था. मैं ने देखा, एक कोने में एक लड़का फैल्ट हैट पहने म्यूजिक सुन रहा था. मैं अनवर की अम्मी के सीने से लग कर उन के मुंह से अपने लिए दुलहन शब्द सुनने को बेताब थी.

‘‘अम्मी को जल्दी बुलाइए न,’’ कह कर मैं अनवर को हैरानी से देखने लगी. दिल में तूफान सा छाया हुआ था जो अनवर की अम्मी के दीदार से ही शांत हो सकता था. बाहर अंधेरा स्याह होता जा रहा था.

‘‘अम्मी गुसलखाने में हैं.’’ अनवर ने मुझे कुरसी पर बैठा कर गिलास थमाते हुए कहा, ‘‘तब तक कोक पियो.’’ अनवर की आंखों का बदलता रंग देख कर मैं ने जल्दी से कोक पी लिया. लेकिन यह क्या, मुझे सब कुछ धुआंधुआं सा लगने लगा. मैं होश खोती जा रही थी.

तभी अनवर ने मेरे गाल पर एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया. उस वक्त उस की आंखें बारूद उगल रही थीं. यह इंतकाम की आग थी. वह गुस्से में बोला, ‘‘मैं मवाली हूं, गुंडा हूं, बदचलन हूं. यही कहा था ना तेरी मां ने.’’

धीरेधीरे मैं पूरी तरह बेहोश हो गई, विरोध की कतई क्षमता नहीं थी. अनवर की दुलहन बनने का मेरा ख्वाब टूट चुका था. जब मुझे थोड़ाथोड़ा होश आना शुरू हुआ तो मुझे अनवर और उस के साथी की हंसी सुनाई दी. अनवर का दोस्त थोड़ी दूर गलियारे में उस से कह रहा था, ‘‘अनवर, आज जैसा मजा पहले कभी नहीं आया.’’

अनवर और उस के दोस्त की जहरीली हंसी मेरे दिल में नश्तर की तरह चुभ रही थी. मैं लड़खड़ाते हुए उठी, पूरा बदन दर्द से बेहाल था. मेरे कपड़े, मेरा लहूलुहान जिस्म, मेरी तबाही की कहानी कह रहे थे. मैं चुपचाप बाहर आ गई. बाहर से स्कूटर ले कर मैं घर लौट आई. तब तक पूरा शहर अंधेरे के आगोश में डूब चुका था. गनीमत यह थी कि अब्बू टुअर पर थे. इस काली रात की कहानी जानने वाला मेरे अलावा कोई नहीं था.

मैं ने जब अम्मी को बताया तो वह चीख पड़ीं, मुझे बुरी तरह डांटा, पीटा. मैं सारी रात सिसकती रही. उस के बाद हर रात मेरी सिसकियां अंधेरों में घुटती रहीं. मम्मी भी किटी पार्टियां अटैंड करना, सैरसपाटा, शौपिंग सब भूल गई थीं. मेरी जैसी मांओं के लिए, जिन के पास अपने बच्चों की देखभाल का वक्त न हो, इस से बड़ी सजा और हो भी क्या सकती थी?

अम्मी ने मुझे सख्त हिदायत दी थी कि इस राज को परदे में ही रखूं. फिर जल्दीबाजी में मेरी शादी मेराज से कर दी गई थी. मेरी पसंदनापसंद या मरजी के बारे में पूछना भी मुनासिब नहीं समझा गया था. मैं होमली लड़की थी. शादी की बात आई तो नए अरमान फिर से जेहन में करवट लेने लगे. शौहर के कदमों के नीचे औरत का स्वर्ग होता है. मैं उसी स्वर्ग की कल्पना करने लगी.

मेरा निकाह हो गया. मैं सुहागसेज पर बैठी अपने शौहर के आने का बेताबी से इंतजार कर रही थी, मेरी आंखों में भावी जीवन के गुलाबी सपने तैर रहे थे. तभी किसी के कदमों की आहट पास आती सुनाई दी तो मैं खुद में सिमट गई. मैं ने घूंघट की ओट से देखा तो मेराज की सुनहरी शेरवानी से सजा फूलों सा महकता व्यक्तित्व नजर आया. उन्होंने धीरे से करीब आ कर मेरा घूंघट पलटा तो ऐसे चौंके जैसे किसी नागिन को देख लिया हो.

मुझे पर टेढ़ी नजर डाल कर मेराज बाहर चले गए. बस, उस दिन के बाद हम दोनों के बीच एक अदृश्य सी दीवार बन गई. हम ने सालों साथ गुजारे तो सिर्फ इसलिए क्योंकि दो बड़े परिवारों की इज्जत का मामला था. हम साथ रह कर भी नदी के दो किनारे बने रहे. मैं देवर और ननदों को पालने, बड़ा करने में लगी रही और मेराज बिजनैस में. मैं चाह कर भी नहीं जान पाई कि मेराज को मुझ से क्या शिकायत थी, वह मुझ से क्यों दूर रहना चाहते थे. अब तक यही स्थिति थी.

रात गहरा रही थी. नैनी झील के किनारे लगी लाइटों की रोशनी पानी की लहरों पर लहराती हुई बड़ी अच्छी लग रही थी, लेकिन अब उसे देखने का मन नहीं था. मैं मेराज के सीने से लिपटी उन में अपने हिस्से का प्यार खोज रही थी. मन चाह रहा था, सालों की चाह आज ही पूरी कर लूं.

तभी मेराज गंभीर स्वर में बोले, ‘‘क्या तुम किसी अनवर को जानती हो?’’

अनवर का नाम सुन कर मैं एक ही झटके में खयालों से बाहर आ गई. मैं ने डर कर कांपती आवाज में पूछा, ‘‘क्यों, आप उसे कैसे जानते हैं?’’

‘‘क्योंकि वह मेरा जिगरी दोस्त था. जिस रोज तुम उस के पास आई थीं, मैं ही कैप लगाए म्यूजिक सुन रहा था. अंधेरे की वजह से तुम मुझे पहचान नहीं सकी थीं. आगे क्या हुआ, तुम जानती ही हो. जब हमारा निकाह हुआ, मुझे भी मालूम नहीं था कि जिसे मेरा जीवनसाथी बनाया जा रहा है, वह तुम हो. यही वजह थी कि सुहागरात में घूंघट उठाते वक्त मैं चौंक गया था. गलती अनवर की थी और मैं उस में भागीदार था. इस के बावजूद मेरे मन में तुम्हें ले कर दुर्भावना बनी रही कि तुम्हें मेरी बीवी नहीं होना चाहिए था. लेकिन अब मेरी सोच बदल गई है. गलत मैं था, तुम नहीं.’’

लंबी खामोशी जब टूटती है तो उस की गूंज भी देर तक सुनाई देती है. डाल से बिछड़े पत्ते की तरह मैं बद्हवास थी, तभी इन का कोमल स्वर सुनाई दिया, ‘‘तुम ने वहां आ कर जो भूल की थी, उस में मैं भी तो बराबर का गुनहगार हूं.’’ इन के सीने से लगी मैं कांप रही थी. हम दोनों ही शर्मसार थे और एकदूसरे की चाहत में बेताब भी.  Dark Secret of Marriage

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...