Crime Story in Hindi. देवेंद्र और सविता जानते थे कि वे जो कर रहे हैं, उस का परिणाम एक दिन बुरा ही होगा. इस के बावजूद वे नहीं माने. परिणामस्वरूप विजयपाल का परिवार बरबाद हो गया.
अचानक पूरा गांव स्तब्ध रह गया था. अभी ठीक से सवेरा भी नहीं हुआ था, इसलिए गोली चलने की आवाज सुन कर लोग घबरा गए थे कि कहीं बदमाश तो नहीं आ गए. लोग घरों से निकल कर उस ओर दौड़े, जिधर से आवाज आई थी. अब तक चीखने की भी आवाजें आने लगी थीं.
सब ने देखा, विजयपाल के घर के सामने गली में एक युवक औंधे मुंह पड़ा था. उस की पीठ से खून बह रहा था. गांव वालों ने उसे पहचान लिया, वह देवेंद्र था. देवेंद्र के घर वाले भी आ गए थे, जो चीखचिल्ला रहे थे. लोग पता करने की कोशिश कर रहे थे कि इसे गोली किस ने मारी, तभी 2 गोलियां और चलीं.
इस बार गोलियां विजयपाल के घर में चली थीं. कुछ लोग विजयपाल के घर की ओर भागे. अंदर पहुंचे तो देखा, आंगन में 2 लाशें पड़ी थीं. एक विजयपाल के बड़े बेटे नीलेश की थी तो दूसरी बहू सविता की.
गांव वाले सन्न रह गए. वे समझ गए कि पिछले कुछ महीनों से गांव में जो चर्चा चल रही थी, यह उसी का नतीजा था. गांव में लगभग सभी को पता था कि नीलेश के छोटे भाई सर्वेश की पत्नी सविता का पड़ोसी देवेंद्र से अवैध संबंध था. यह सब उसी की वजह से हुआ था.
दोनों घरों में रोनापीटना मचा था. घटना की सूचना थाना दादो को दे दी गई थी. सूचना देने के थोड़ी देर बाद ही थानाप्रभारी विनोद कुमार, क्षेत्राधिकारी आनंद कुमार पांडेय भारी पुलिस बल के साथ गांव पहुंच गए थे.
देवेंद्र गंभीर रूप से घायल था, लेकिन जीवित था. इसलिए पुलिस ने उसे तुरंत अलीगढ़ मैडिकल कालिज भिजवा दिया. इस के बाद पुलिस विजयपाल के घर गई, जहां 2 लाशें पड़ी थीं. पुलिस ने दोनों लाशें कब्जे में ले कर घटनास्थल की काररवाई पूरी कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दीं. पुलिस को घटनास्थल से 3 खोखे और वह तमंचा भी मिल गया था, जिस से गोलियां चला कर वारदात को अंजाम दिया गया था.
पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में पता चला कि मृतका का नाम सविता था. उसे नीलेश ने गोली मारी थी. इस के बाद उस ने खुद को गोली मार ली थी. सविता से पहले उस ने देवेंद्र को गोली मारी थी. वह उसे जान से मारना चाहता था, लेकिन गोली उस की पीठ में लगी थी, इसलिए वह गिर पड़ा था. इस के बाद नीलेश को समय ही नहीं मिला कि वह देख पाता कि देवेंद्र मर गया या जिंदा है. क्योंकि गोली की आवाज और देवेंद्र की चीखपुकार सुन कर लोग उस की ओर आने लगे थे. तब नीलेश घर में घुस गया था.
पूछताछ में पुलिस को यह भी पता चल गया था कि यह सब अवैध संबंधों की वजह से हुआ था. मृतक नीलेश ने जब घर की इज्जत को दांव पर लगते देखा तो इज्जत से खिलवाड़ करने वाले देवेंद्र और छोटे भाई की पत्नी सविता, जो उस की साली भी थी, को खत्म कर देना चाहा था. इस के बाद कानून से बचने के लिए खुद को भी गोली मार ली थी.
इस घटना से गांव में दहशत फैल गई थी. आगे कोई अनहोनी न हो, गांव में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया था. पोस्टमार्टम के बाद जब दोनों लाशें गांव आईं तो एक बार फिर चीखपुकार से पूरा गांव दहल उठा. मातम के बीच घर वालों ने सविता और नीलेश का अंतिम संस्कार कर दिया.
वैसे तो प्यार बहुत ही प्यारा शब्द है, लेकिन कभीकभी यही शब्द ऐसा तूफान ला देता है कि अनेक जिंदगियां बरबाद हो जाती हैं. ऐसा ही उत्तरप्रदेश के जिला अलीगढ़ के थाना दादो के गांव कासिमपुर कसैर में हुआ था.
इसी गांव में विजयपाल सिंह अपने परिवार के साथ कई पीढि़यों से रहते आ रहे थे. उन के परिवार से पत्नी पुष्पा के अलावा 3 बेटे नीलेश, सर्वेश, मनोज और 2 बेटियां विपिन तथा रीना थीं.
विजयपाल का खातापीता परिवार था. वह अपने बच्चों को पढ़ालिखा कर किसी काबिल बनाना चाहता था. लेकिन ऐसा हो नहीं सका. बड़े बेटे नीलेश ने बारहवीं पास कर के पढ़ाई छोड़ दी और कमाई के लिए घर छोड़ कर चला गया.
विजयपाल का सोचना था कि नीलेश अपने दोस्तों के साथ पंजाब चला गया होगा. लेकिन जब कुछ दिनों बाद अलीगढ़ से कुछ पुलिस वाले नीलेश को खोजते हुए उस के घर पहुंचे तो वह घबरा गया.
पुलिस के अनुसार, नीलेश अलीगढ़ से किसी संध्या नाम की लड़की को ले कर भागा था. विजयपाल को बेटे की यह हरकत पसंद नहीं आई. पुलिस के दबाव की वजह से उस ने रातदिन एक कर के नीलेश को ढूंढ निकाला. इस के बाद संध्या को उस के पिता के हवाले कर के किसी तररह इस मामले को खत्म कराया.
नीलेश ने संध्या से प्यार किया था. लेकिन घर वालों के विरोध की वजह से वह उसे अपनी नहीं बना सका था. इसलिए उस से अलग होने का उसे बहुत दुख था. घर में उस का मन नहीं लगा तो वह अपने दोस्तों के पास पंजाब चला गया, जहां उसे नौकरी मिल गई. इस तरह उस की जिंदगी पटरी पर आ गई.
नीलेश की नौकरी लग गई तो विजयपाल उस की शादी के बारे में सोचने लगा. क्योंकि उसे डर था कि कहीं बेटा फिर न कोई उलटासीधा काम कर बैठे. वह उस के लिए लड़की की तलाश करने लगा. अब तक विजयपाल का छोटा बेटा सर्वेश भी हाईस्कूल पास कर चुका था. वह आगे नहीं पढ़ना चाहता था, इसलिए वह भी अपने दोस्तों के साथ नोएडा चला गया, जहां उसे किसी एक्सपोर्ट कंपनी में नौकरी मिल गई.
विजयपाल नीलेश के लिए लड़की ढूंढ़ रहा था. उसे किसी से जिला एटा के थाना सहावर के गांव फाजलपुर के रहने वाले राजाराम की बेटी निर्मला के बारे में पता चला. उस ने राजाराम से संपर्क किया और अपने बेटे के लिए निर्मला का हाथ मांगा. नीलेश कमाता तो था ही, इसलिए राजाराम ने इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया. इस तरह निर्मला और नीलेश की शादी हो गई. निर्मला दुलहन बन कर विजयपाल के घर आ गई. यह 3 साल पहले की बात है.
निर्मला पारिवारिक लड़की थी, उस ने ससुराल आते ही घर की सारी जिम्मेदारी संभाल ली. इसलिए पति की ही नहीं, पूरे घर की लाडली बन गई. निर्मला के साथ नीलेश के दिन बढि़या गुजर रहे थे. निर्मला चाहती थी कि नीलेश गांव में रह कर खेती करे, लेकिन नीलेश को नौकरी में ज्यादा लाभ दिखाई दे रहा था. उसे गांव की अपेक्षा शहरी जीवन बेहतर लग रहा था. इसलिए उस ने निर्मला को समझा दिया.
निर्मला जब भी मायके जाती, उस की मां सोनवती उसे खुश देख कर काफी सुकून महसूस करती. उसी बीच निर्मला के पिता राजाराम की मौत हो गई. बाकी जो कुछ था, वह तो था ही, अभी निर्मला की बहन सविता अविवाहित थी, इसलिए सोनवती को पति की मौत से ज्यादा चिंता उस की थी.
निर्मला अकसर अपनी सास से सविता के बारे में बातें करती रहती थी. संयोग से उसी बीच सविता किसी काम से निर्मला की ससुराल आई तो निर्मला ने उसे रोक लिया. सविता हाईस्कूल तक पढ़ी भी थी और हर काम में होशियार भी थी. यही नहीं, वह काफी खूबसूरत और चंचल भी थी. शायद इसीलिए सविता निर्मला की सास पुष्पा को भा गई. वह उस की शादी सर्वेश से कराने के बारे में सोचने लगी.
पुष्पा ने पति से सलाह करने के बाद मन की बात निर्मला से कही तो उस ने इस बात को गंभीरता से लिया. उसे भी लगा कि अगर बहन की शादी देवर से हो जाए तो अच्छा ही रहेगा. दोनों बहनें साथसाथ रहेंगी. इसलिए अगली बार वह मायके गई तो उस ने अपनी मां से यह बात कही.
पति की मौत के बाद घर की आर्थिक स्थिति डगमगा गई थी, इसलिए सोनवती को लगा कि अगर सविता की शादी निर्मला के देवर सर्वेश से हो जाती है तो एक तरह से उस का बोझ उतर जाएगा. उस ने बेटे से भी बात कर ली. मानपाल को भी यह रिश्ता ठीक लगा. लेकिन जब इस बात की जानकारी सविता को हुई तो उस ने सर्वेश से शादी करने से साफ मना कर दिया.
सविता भले ही ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी. लेकिन उस की महत्त्वाकांक्षाओं का आकाश काफी फैला था. उस ने अपने जीवनसाथी को ले कर जो सपने देखे थे, सर्वेश उस में कहीं भी फिट नहीं होता था. सविता ने सर्वेश को अच्छी तरह देखा हुआ था. वह सीधासादा युवक था. जबकि जिंदगी की दौड़ में सविता काफी तेज चल रही थी.
सविता के विरोध के बावजूद घर वालों ने अपनी मजबूरियों को देखते हुए सर्वेश के साथ उस की शादी कर दी. शादी के समय सर्वेश की उम्र मात्र 18 साल थी. कदकाठी में भी वह काफी हलका था. एक मर्द में जो आकर्षण होना चाहिए, वह उस में कहीं से भी नहीं था. मजबूरी में ही सही, सविता बहन की देवरानी बन कर आ गई.
सविता के मन में क्या है, इस की किसी को चिंता नहीं थी. जबकि सर्वेश उसे पा कर फूला नहीं समा रहा था. दिन, हफ्ता और महीने बीतने लगे. सविता अपने संबंधों को भले निभा रही थी, लेकिन सर्वेश के लिए उस के मन में जरा भी प्यार नहीं जागा, क्योंकि दिल कुछ और ही मांग रहा था. सर्वेश नौकरी की वजह से नोएडा में रहता था. सविता उस के साथ रहना चाहती थी, लेकिन अपनी कुछ मजबूरियों की वजह से सर्वेश उसे साथ नहीं रख पा रहा था.
सविता हमेशा यही सोचती रहती थी कि जो आदमी उसे पसंद नहीं, उस के साथ यह जीवन कैसे कटेगा. कोई भी उस के इस दर्द को समझ नहीं रहा था. वह उदास रहने लगी तो घर वालों ने उसे सर्वेश के पास नोएडा भेज दिया. कुछ दिन पति के साथ रह कर सविता फिर वापस आ गई.
सर्वेश के चले जाने से विजयपाल को परेशानी होने लगी थी, इसलिए उन्होंने नीलेश को गांव बुला लिया था. नीलेश की पड़ोस में रहने वाले देवेंद्र से खूब पटती थी. उस का घर नीलेश के घर के ठीक सामने था. देवेंद्र की भूसा रखने वाली कोठरी उस के घर के पास ही थी. वह जब भी भूसा निकालने आता, उस की नजरें सविता की नजरों से टकरा जातीं. वैसे तो देवेंद्र शादीशुदा ही नहीं, एक बेटी का बाप था. इस के बावजूद नजरें मिलने की वजह से वह सविता के करीब पहुंचने के उपाय सोचने लगा. जल्दी ही सविता ने उस के मन की बात भांप भी ली.
देवेंद्र भी सविता को अच्छा लगता था. लेकिन वह अपने मन की बात उस से कह नहीं सकती थी, क्योंकि वह उस का जेठ लगता था. लेकिन देवेंद्र तो उस के आकर्षण में इस कदर डूब चुका था कि रिश्तेनाते सब भूल चुका था.
जब उस से नहीं रहा गया तो एक दोपहर वह उस समय विजयपाल के घर पहुंच गया, जब सविता घर में अकेली थी. उस ने दरवाजा खटखटाया तो सविता ने दरवाजा खोला. उसे देख कर वह घबरा गई. उस ने कहा, ‘‘घर में कोई नहीं है.’’
‘‘पता है, तभी तो आया हूं.’’ देवेंद्र ने कहा, ‘‘मुझे किसी और से नहीं, तुम से बात करनी है.’’
‘‘कहो, क्या कहना है?’’ सकुचाते हुए सविता बोली. ‘‘मैं तुम से प्यार करता हूं. बस यही कहने आया था.’’
‘‘यह कैसे हो सकता है?’’ ‘‘कैसे हो सकता है, यह तुम जानो. मैं ने अपने मन की बात कह दी.’’
इस तरह अपनी बात कह कर देवेंद्र ने सविता के तनमन में आग लगा दी. अब वह हर वक्त इसी सोच में डूबी रहने लगी कि देवेंद्र के प्यार को वह स्वीकार करे या ठुकरा दे? मन ने मना किया, लेकिन तन नहीं माना और वह देवेंद्र की बांहों में समा गई.
सविता चोरीछिपे देवेंद्र से मिलने लगी. शुरूशुरू में तो सब ठीकठाक रहा. लेकिन किसी ने देवेंद्र को दोपहर में विजयपाल के घर से निकलते देख लिया तो उस ने यह बात नीलेश को बता दी. नीलेश की समझ मे नहीं आया कि देवेंद्र दोपहर में उस के घर क्यों गया था? लेकिन जब बात उस की समझ में आई तो उस के तनबदन में आग लग गई. उस ने देवेंद्र को चेतावनी दे दी कि वह अपनी औकात में रहे.
‘‘मैं ने क्या किया है, जो तुम मुझे धमकी दे रहे हो?’’ देवेंद्र ने पूछा. ‘‘तुम्हें अच्छी तरह पता है कि मैं तुम्हें क्यों धमकी दे रहा हूं.’’
नीलेश के तेवर देख कर देवेंद्र डर गया. बस उसी दिन से बचपन की दोस्ती खत्म हो गई. वह सविता को छोड़ने को तैयार नहीं था. नीलेश ने सविता को भी फटकारा था, लेकिन सविता जिस रास्ते पर चल पड़ी थी, उस से लौटना आसान नहीं था.
नीलेश परेशान रहने लगा था. हालांकि उस ने अपनी आंखों से कुछ नहीं देखा था. फिर भी वह महसूस कर रहा था कि जब भी वह घर से निकलता है, लोग उसे अजीब नजरों से देखते हुए आपस में खुसुरफुसुर करते हैं.
नीलेश ने निर्मला को सारी बात बता कर सविता पर नजर रखने को कहा. लेकिन कोई किसी पर कब तक नजर रख सकता है. सविता को देवेंद्र से मिलने का मौका मिल ही जाता था. लेकिन अब सविता भी परेशान रहने लगी थी, क्योंकि उसे भी देवेंद्र से मिलने में परेशानी हो रही थी, जबकि वह उस के बिना रह नहीं सकती थी.
इसलिए सविता ने देवेंद्र से कह दिया, ‘‘जीजा अकसर मुझे डांटते रहते है. मुझ पर नजर भी रखी जाती है, जबकि तुम जानते हो कि मैं तुम्हारे बिना रह नहीं सकती, इसलिए तुम कुछ ऐसा करो कि हमारी यह परेशानी हमेशाहमेशा के लिए खत्म हो जाए. मुझे सर्वेश के पास नोएडा भी भेजा जा सकता है.’’
‘‘मैं तुम्हें जल्दी ही भगा कर कहीं ऐसी जगह ले जाऊंगा, जहां रोकने वाला कोई नहीं होगा.’’ देवेंद्र ने कहा.
‘‘लेकिन कब ले चलोगे?’’
‘‘बहुत जल्दी.’’ कह कर देवेंद्र ने सविता से अपना पीछा छुड़ाया, क्योंकि वह ऐसा कभी नहीं कर सकता था. वह न अपना घर छोड़ सकता था, न परिवार. वह सविता के शरीर से खेलने के लिए उसे सिर्फ उल्लू बना रहा था.
दूसरी ओर नीलेश ने तय कर लिया था कि जिस दिन उस ने देवेंद्र और सविता को रंगेहाथों पकड़ लिया, उसी दिन दोनों को खत्म कर देगा. इस के लिए उस ने देसी तमंचा और कुछ कारतूस भी खरीद लिए थे.
आखिर वह मौका मिल ही गया, जिस का नीलेश को इंतजार था. 4 मार्च को नीलेश खेतों की ओर गया तो उस ने देखा कि सविता कपड़े ठीक करते हुए सरसों के खेत से निकल रही है. उस के पीछे देवेंद्र भी था, जो उसे देखते ही भाग खड़ा हुआ था.
सविता घर आई तो नीलेश ने उस की जम कर पिटाई की. इस के बावजूद उस का गुस्सा कम नहीं हुआ. वह इतने तनाव में था कि उस पूरी रात सो नहीं सका. सुबह नीलेश घर से निकला तो देवेंद्र सामने पड़ गया. उसे देख कर उस ने मुसकरा दिया. बस इसी बात पर नीलेश को गुस्सा आ गया.
वह तेजी से घर में घुसा और तमंचे में कारतूस भर कर बाहर आ गया. उस ने देवेंद्र पर तमंचा ताना तो देवेंद्र बुरी तरह डर गया और भागने के लिए पलटा. तभी नीलेश ने ट्रिगर दबा दिया. गोली देवेंद्र की पीठ में लगी. धमाके के साथ देवेंद्र चीख कर जमीन पर गिर पड़ा. देवेंद्र की चीख सुन कर लोग दौड़े तो नीलेश भाग कर अपने घर में घुस गया.
लोग मामला समझ पाते, तभी धमाके के साथ विजयपाल के घर से चीख की आवाज आई. गांव वालों ने विजयपाल के घर को घेर लिया. पता चला कि नीलेश ने देवेंद्र और सविता को गोली मार दी है. तभी एक और धमाका हुआ. इस बार नीलेश ने खुद को गोली मार ली थी.
विजयपाल के घर वालों पर तो मानो पहाड़ टूट पड़ा. पूरा गांव सन्न रह गया. पुलिस को सूचना दी गई तो पुलिस ने आ कर अपनी काररवाई की.
विजयपाल की ओर से आईपीसी की धारा 302, 307, 309 के तहत मृतक नीलेश के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया. शायद यह बेमेल शादी का नतीजा था कि एक बहन जान से गई तो दूसरी विधवा हो गई. जबकि उस की इज्जत से खिलवाड़ करने वाला देवेंद्र बच गया. Crime Story in Hindi
— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.
— 2014 में प्रकाशित






