Fake Encounter Case. फरजी एनकाउंटर के मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने उत्तराखंड के 17 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की जो सजा सुनाई है, उस से रविंद्र सिंह के परिजनों ने राहत महसूस की है. लेकिन इस फैसले से झूठी वाहवाही लूटने वाले पुलिसकर्मियों को भी सबक लेना चाहिए. 

6 जून, 2014 को दिल्ली के तीसहजारी कोर्ट में अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत भीड़भाड़ थी. इस की वजह यह थी कि उस दिन सीबीआई के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जे.पी.एस. मलिक की अदालत में एक खास मामले पर फैसला सुनाया जाना था. यह खास मामला था गाजियाबाद के एमबीए के छात्र रणवीर सिंह को उत्तराखंड पुलिस द्वारा तथाकथित मुठभेड़ में मार गिराने का. मृतक रणवीर सिंह के घर वाले इस मुठभेड़ को फरजी बता रहे थे. सीबीसीआईडी के बाद इस मामले की जांच सीबीआई को मिली थी.

मृतक रणवीर सिंह के पिता रविंद्र सिंह अपने बड़े बेटे संदीप सिंह और परिवार के अन्य लोगों के साथ सुबह 10 बजे ही सीबीआई कोर्ट पहुंच गए थे. दूसरी ओर उत्तराखंड पुलिस के जिन 18 पुलिसकर्मियों पर फरजी मुठभेड़ का आरोप लगा था, उन सभी के परिजन भी न्यायालय में मौजूद थे. अनेक मीडियाकर्मी और वकील भी कोर्ट रूम में सुबह से ही जमे हुए थे.

निर्धारित समय पर सीबीआई के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जे.पी.एस. मलिक कोर्ट में बैठे तो वहां मौजूद सभी लोगों की निगाहें उन पर जम गईं. उन के सामने जब इस केस की फाइल पेश की गई तो फाइल देखने के बाद उन्होंने कहा कि फैसला आज दोपहर 2 बजे सुनाया जाएगा.

दोपहर 2 बजे से पहले ही कोर्ट फिर से खचाखच भर गया. कोर्ट ने जब फैसला सुनाने से पहले सभी आरोपी पुलिसकर्मियों को अदालत कक्ष में बुलाया तो मृतक के परिजनों की आंखों में उन के प्रति आक्रोश साफ दिखाई दे रहा था.

न्यायाधीश ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि रणवीर सिंह की हत्या की साजिश उत्तराखंड के 2 थानों डालनवाला व नेहरू कालोनी और स्पैशल औपरेशन ग्रुप ने मिल कर रची थी.

उन्होंने कहा कि इन तीनों के बीच कौन सी सामान्य कडि़यां हैं, इस बात का खुलासा नहीं हो सका. अदालत ने उत्तराखंड पुलिस की कहानी पर सवालिया लहजे में कहा कि जिस लाडपुर जंगल में एनकाउंटर की बात कही गई है, वह देहरादून के रायपुर थाना क्षेत्र में आता है.

तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल 3 जुलाई, 2009 को देहरादून पहुंची थीं. उस दिन शहर में सुरक्षा के लिहाज से हाई अलर्ट था. लेकिन रायपुर थाने के पुलिसकर्मी हाई अलर्ट के बावजूद कहीं मौजूद नहीं थे. निस्संदेह यह एनकाउंटर फरजी था.

कुछ पल रुक कर अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जे.पी.एस. मलिक ने जब फैसला सुनाया तो बचावपक्ष के परिजनों की आंखों में आंसू छलक आए. न्यायाधीश ने 17 पुलिसकर्मियों को हत्या, अपहरण, सुबूत मिटाने और आपराधिक साजिश रचने व उसे अंजाम देने के मामले में दोषी करार दिया.

न्यायालय ने एक आरोपी हेडकांस्टेबल जसपाल सिंह गोसाईं को हत्या, अपहरण व सुबूत मिटाने के मामले में बरी कर दिया. गोसाईं ने भादंवि की धारा 218 के तहत फरजी सरकारी रिकौर्ड तैयार किया था. इस अपराध में 2 साल की सजा का प्रावधान है. जबकि ट्रायल के दौरान वह जेल में इस से ज्यादा सजा काट चुका था. इसलिए न्यायाधीश ने जसपाल सिंह गोसाईं को 50 हजार रुपए का मुचलका भरने के निर्देश दिया.

जिन 17 पुलिसकर्मियों को दोषी करार दिया गया, उन में एक इंसपेक्टर, 5 सबइंसपेक्टर, 9 कांस्टेबल और 2 ड्राइवर (कांस्टेबल) थे.

अदालत ने कहा कि सीबीआई आरोप साबित करने में कामयाब रही है. कोर्ट ने अभियुक्तों की सजा पर जिरह करने के लिए अगला दिन यानी 7 जून मुकर्रर किया, साथ ही पुलिस को आदेश दिया कि अभियुक्तों को जेल से कोर्ट तक लाने और ले जाने के लिए उन्हें हाई सिक्योरिटी प्रदान की जाए.

फैसला सुनाए जाने पर सीबीआई के विशेष लोक अभियोजक बृजेश कुमार शुक्ला और पीडि़त पक्ष के वकील ए.टी. राव ने खुशी जाहिर की और दोषियों को सख्त से सख्त सजा दिए जाने की उम्मीद जताई.

अदालत का फैसला सुनते ही रविंद्र सिंह और उन के बेटे संदीप सिंह की आंखें छलछला गईं. दोनों बाहर आए और रणवीर की याद में खूब रोए. तब उन के वकील ए.टी. राव ने उन्हें ढांढस बंधाया.

7 जून को दोनों पक्षों की जिरह देखनेसुनने के लिए भी अदालत खचाखच भरी थी. अदालती काररवाई शुरू हुई तो सीबीआई के विशेष लोक अभियोजक बृजेश कुमार शुक्ला ने कहा कि एमबीए स्टूडेंट रणवीर सिंह की साजिश रच कर अपहरण करने के बाद जिस नृशंस तरीके से हत्या की गई, वह रेयरेस्ट औफ रेयर की श्रेणी में आता है इसलिए दोषी पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा दी जानी चाहिए.

शुक्ला ने अपनी दलील को मजबूत करने के लिए फरजी एनकाउंटर से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे मामले जिन में फरजी एनकाउंटर होने की बात साबित हो जाती है, दोषियों को मौत की सजा दी जानी चाहिए.

उन्होंने कहा कि चूंकि ऐसे सरकारी नुमाइंदों ने घटना को अंजाम दिया जिन पर पब्लिक की सुरक्षा की जिम्मेवारी थी. पब्लिक के पैसों से उन्हें जो हथियार खरीद कर दिए गए थे, उन का उपयोग उन्होंने एक बेकुसूर छात्र की हत्या करने में किया.

इसलिए अदालत को ऐसी सजा सुनानी चाहिए जिस से कोई भी सरकारी मुलाजिम भविष्य में ऐसा अपराध करने के बारे में सोचे भी नहीं. जिन परिस्थितियों में रणवीर सिंह को मारा गया था, उस के लिए मौत की सजा से कम कुछ भी नहीं होना चाहिए.

पीडि़त पक्ष के वकील ए.टी. राव ने सुप्रीम कोर्ट के एक और फैसले का हवाला देते हुए कहा कि राज्य के डीजीपी की तरफ से पुलिसकर्मियों के व्यवहार से संबंधित दिशानिर्देशों के बारे में पहले ही सरकुलर जारी किए जा चुके हैं लेकिन उन पर सख्ती से अमल नहीं होता. थानों में उन दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया जाता.

रणवीर सिंह के शरीर पर गोलियां बहुत नजदीक से चलाई गई थीं. इस से पता चलता है कि उस की हत्या सोचीसमझी साजिश के तहत की गई थी.

उन्होंने आगे कहा कि पुलिस वाले ही जब ऐसा करेंगे तो आम जनता की हिफाजत कौन करेगा. ए.टी. राव ने अदालत से अपील की कि दोषियों पर भारी जुरमाना भी लगाया जाए और वह धनराशि पीडि़त के घर वालों को दी जाए.

बचाव पक्ष की तरफ से एडवोकेट आर.एन. तुफैल, अनवर अहमद और एस.पी. सिंह राठौर मौजूद थे. एडवोकेट तुफैल ने इस केस को रेयरेस्ट औफ रेयर की श्रेणी में न लेने की अपील की. उन्होंने पुलिसकर्मियों को दी जाने वाली सजा में नरमी बरते जाने की गुहार लगाते हुए कहा कि ये लोग कोई पेशेवर अपराधी नहीं हैं और न ही ये कोई प्रोफेशनल किलर हैं. इसलिए इन्हें सुधरने का मौका मिलना चाहिए.

अभियोजन पक्ष की फांसी दिए जाने की मांग का विरोध करते हुए बचाव पक्ष के वकील अनवर अहमद ने कहा कि उम्रकैद नियम है और फांसी अपवाद. उन्होंने अदालत से अपील की कि जिन लोगों को सजा सुनाई गई है, उन की उम्र कम है. कई की शादी तो 5 साल पहले ही हुई थी. उन्होंने मांग की कि सजा सुनाते वक्त दोषियों की कम उम्र और उन के परिवार का भी ध्यान रखना चाहिए.

अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने 9 जून, 2014 को सजा सुनाने का दिन मुकर्रर किया.

9 जून, सोमवार को मृतक रणवीर सिंह के पिता रविंद्र सिंह, भाई संदीप सिंह, बहन मीनाक्षी, मां सुदेश देवी के अलावा कई रिश्तेदार तीसहजारी कोर्ट में सीबीआई की विशेष अदालत में पहुंच गए थे.

बचाव पक्ष के परिजन भी अदालत में आ चुके थे. उन की महिलाएं अपने छोटेछोटे बच्चों को ले कर आई थीं. वे सभी खामोश और आशंकित थीं. रविंद्र सिंह और उन के परिवार के लोगों को उम्मीद थी कि हत्यारे पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा सुनाई जाएगी.

सुबह 11 बजे के करीब न्यायाधीश जे.पी.एस. मलिक ने अभियुक्तों को जो सजा सुनाई, उसे सुन कर अदालत कक्ष में मौजूद कई महिलाएं चीखनेचिल्लाने और रोने लगीं. साथ ही अभियुक्तों की आंखों से भी आंसू टपकने लगे.

न्यायाधीश महोदय ने अपने 18 पेज के फैसले में 7 पुलिसकर्मियों इंसपेक्टर संतोष कुमार जायसवाल, सबइंसपेक्टर नितिन चौहान, गोपाल दत्त भट्ट, नीरज कुमार, चंद्रमोहन सिंह रावत, राजेश बिष्ट और कांस्टेबल अजीत सिंह को उम्रकैद की सजा के साथ 50-50 हजार रुपए का जुरमाना भरने का आदेश दिया.

इस के अलावा जिन 10 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा के साथ 10-10 हजार का जुरमाना भरने की सजा सुनाई, उन के नाम थे कांस्टेबल सतवीर सिंह, नागेंद्र राठी, सुनील सैनी, चंद्रपाल, सौरभ नौटियाल, विकास चंद बलूनी, संजय रावत, मनोज कुमार, मोहन चंद राणा और इंद्रभान सिंह.

अदालत ने कहा कि दोषियों पर लगाए गए जुरमाने की राशि मुआवजे के तौर पर पीडि़त परिवार को दी जाए. कोर्ट ने कहा कि हालांकि यह मुआवजा राशि पर्याप्त नहीं है लेकिन यह उन के पुनर्वास के लिए जरूरी है.

कोर्ट ने मामले को दिल्ली विधिक सेवा प्राधिकरण को स्थांतरित कर दिया और पीडि़त परिवार को मुआवजा दिए जाने की अनुशंसा की.

कोर्ट का फैसला सुनते ही दोषी पुलिसकर्मियों की पत्नियां कोर्ट रूम में ही फफकफफक कर रोने लगीं. वे कहने लगीं, ‘‘जज साहब, हमें भी सजा दे दीजिए. अपने छोटेछोटे बच्चों को ले कर हम कहां जाएंगे. उन का तो एक लड़का मरा है, लेकिन इस सजा से हमारे 18 परिवार उजड़ जाएंगे.’’

जिस समय जज साहब फैसला सुना रहे थे, रणवीर के पिता और भाई शांत हो कर सुनते रहे. उन के चेहरे भावहीन थे. जज साहब ने 18 पेज के सजा के आदेश की प्रति सीबीआई के विशेष लोक अभियोजक बृजेश कुमार शुक्ला को दे दी.

रणवीर के पिता व अन्य परिजन एडवोकेट बृजेश कुमार शुक्ला के पास कुरसी पर जा कर बैठ गए. सीबीआई के वकील ने उन्हें पूरा आदेश समझाया.

रणवीर के पिता और परिजनों के चेहरों पर फैसले को ले कर असंतोष के भाव साफ दिख रहे थे. उन्होंने कहा कि जब तक रणवीर के हत्यारों को फांसी नहीं हो जाएगी, तब तक वे चैन से नहीं बैठेंगे.

22 साल के रणवीर के फरजी एनकाउंटर की कहानी एक सोचीसमझी साजिश के तहत देहरादून के ही एक थाने में रची गई थी. कहानी की जो पटकथा सामने आई, वह पुलिस की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाने वाली निकली.

रणवीर सिंह गाजियाबाद के शालीमार गार्डन के रहने वाले रविंद्र सिंह का बेटा था. भारतीय सेना से सूबेदार पद से रिटायर्ड रविंद्र सिंह के परिवार में रणवीर सिंह के अलावा 2 और बच्चे थे बेटा संदीप सिंह और बेटी मीनाक्षी. बताया जाता है कि रणवीर के फरजी एनकाउंटर की कड़ी एक अफेयर से जुड़ी हुई थी और इस कांड के अंजाम के पीछे एक जूनियर इंजीनियर का हाथ था.

बताया जाता है कि रणवीर सिंह जब मेरठ के एक इंस्टीट्यूट से एमबीए कर रहा था तब वह एक जेई की लड़की सानिया के संपर्क में आया. दोनों के बीच दोस्ती हुई जो बाद में प्यार में तब्दील हो गई. अप्रैल 2009 में दोनों कुछ दिनों के लिए अपने घरों से लापता हो गए थे. बेटी के गायब होने पर जेई परेशान हो गया. वह अपने स्तर से बेटी को ढूंढने लगा. उस की पहुंच भी अच्छी थी.

अपने सूत्रों से उस ने बेटी और रणवीर को ढूंढ निकाला. उस समय उस ने रणवीर के खिलाफ कोई कानूनी काररवाई करने के बजाय उसे केवल धमकी दे कर छोड़ दिया था. रणवीर और सानिया एकदूसरे को दिलोजान से चाहते थे.  सानिया के पिता ने बेटी से दूरी बनाने के लिए रणवीर को जो धमकी दी थी, उस का असर उस के प्यार पर नहीं पड़ा. वे दोनों पहले की तरह ही मिलते रहे.

रणवीर जब एमबीए के आखिरी सेमेस्टर में था, तभी कैंपस प्लेसमेंट में उसे एक अच्छी बैंक में नौकरी मिल गई. जून के अंतिम सप्ताह में उस ने नौकरी जौइन कर ली. नौकरी पा कर वह और उस के घर वाले बहुत खुश थे. सानिया से उस की बात लगातार होती रहती थी.

नौकरी जौइन किए उसे एक सप्ताह ही हुआ था कि उस का तबादला देहरादून हो गया. जुलाई के पहले हफ्ते में उसे देहरादून में जौइनिंग करनी थी. सानिया का जेई पिता प्रौपर्टी के धंधे में भी लगा हुआ था. देहरादून में उस की पहचान एक भूमाफिया के रूप में थी. उस का प्रौपर्टी का धंधा अच्छा जमा हुआ था. क्योंकि वह देहरादून में प्रौपर्टी का धंधा करता था इसलिए स्थानीय पुलिस के साथ उस के अच्छे संबंध थे. बताया जाता है कि अपने संपर्कों के जरिए वह रणवीर पर नजर रखे हुए था.

रणवीर का जब देहरादून ट्रांसफर हो गया तो वह परेशान हो उठा क्योंकि वहां उस का कोई भी रिश्तेदार नहीं था. उसे इस बात की चिंता हो रही थी कि वह देहरादून में रहेगा कहां?

रणवीर का एक दोस्त था रामकुमार. उस ने रामकुमार को अपनी परेशानी बताई. देहरादून में रामकुमार का एक दोस्त अशोक रहता था. रामकुमार ने रणवीर को भरोसा दिलाया कि वह अशोक की हेल्प से वहां रहने की व्यवस्था करा देगा. 2 जुलाई को रणवीर रामकुमार को साथ ले कर अपनी मोटरसाइकिल से देहरादून चला गया.

कमरा ढूंढने में उसे 1-2 दिन लग सकते थे इसलिए देहरादून पहुंच कर रणवीर ने दिगंबर जैन धर्मशाला में एक कमरा ले लिया. पहली मंजिल पर कमरा नंबर-9 में सामान वगैरह रखने के बाद वे दोनों बाइक से घूमने निकल गए. रामकुमार ने फोन कर के अशोक को भी धर्मशाला में बुला लिया.

अगले दिन तीनों दोस्त बाइक से कहीं जा रहे थे. दोपहर बाद 3 बजे के करीब जब वे मोहिनी रोड पर पहुंचे तो वाहनों की चैकिंग कर रहे एक सबइंसपेक्टर गोपालदत्त भट्ट ने उन्हें रोक लिया. उस दिन तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को जौलीग्रांट से मसूरी जाना था. हाई अलर्ट होने की वजह से उन के रूट पर वाहनों की सघन चैकिंग चल रही थी.

किसी बात पर रणवीर व उस के दोस्तों की उस सबइंसपेक्टर से नोकझोंक हो गई. बात इतनी बढ़ी कि उन के बीच हाथापाई तक हो गई. इसी दौरान उक्त दरोगा ने बदमाशों द्वारा खुद पर हमला करने की खबर थाना डालनवाला को दे दी.

डालनवाला के थानाप्रभारी संतोष कुमार जायसवाल खबर मिलते ही भारी पुलिस बल के साथ मोहिनी रोड पहुंच गए. पुलिस को देख कर रामकुमार और अशोक वहां से भाग गए लेकिन रणवीर पुलिस के हत्थे चढ़ गया.

पुलिस रणवीर को जीप में डाल कर थाना डालनवाला ले गई. उसे हिरासत में लेते ही थाना पुलिस ने वायरलैस से यह खबर पूरे जिले में प्रसारित कर दी कि मोहिनी रोड पर जिन बदमाशों ने पुलिस पर हमला कर के सरकारी रिवाल्वर छीनी थी, उन बदमाशों में से एक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है.

सूचना मिलते ही तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अमित सिन्हा थाना डालनवाला पहुंच गए. लेकिन थाने के बाहर ही उन्हें मीडियाकर्मियों ने घेर लिया. वे उन से पकड़े गए बदमाश के बारे में पूछने लगे. उसी दौरान थानाप्रभारी ने एसएसपी को बताया कि जिस आदमी को पुलिस बदमाश समझ रही थी, वह उत्तराखंड पुलिस का कांस्टेबल निकला. उसे पहचानने में गलती हो गई थी. यही बात एसएसपी ने पत्रकारों को बता दी.

यानी रणवीर को हिरासत में लेने की बात थाना पुलिस ने एसएसपी से भी छिपा ली थी. थाना पुलिस को रणवीर से अपना हिसाब पूरा करना था इसलिए एसएसपी के थाने में घुसने से पहले ही पुलिस वाले उसे थाने के पीछे के रास्ते से नेहरू कालोनी थाने की तरफ ले कर चले गए.

वे लोग रणवीर के दोस्तों की तलाश में उसे उस धर्मशाला में ले गए, जहां वह ठहरा हुआ था. उस के दोनों दोस्त रामकुमार और अशोक वहां नहीं मिले. पुलिसकर्मियों ने रणवीर की जीप में ही पिटाई शुरू कर दी. फिर नेहरू कालोनी थाने में बंद कर के उस की जम कर पिटाई की गई. उस की आवाज बाहर न निकले, इसलिए उस के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया गया था.

इस के बाद पुलिस ने उसे देहरादून के ही थाना रायपुर के गांव लाडपुर के जंगलों में ले जा कर फरजी एनकाउंटर में मार दिया. बेकुसूर रणवीर की हत्या करने के बाद पुलिस ने यह झूठी कहानी गढ़ दी कि मोहिनी रोड पर चैकिंग के दौरान सबइंसपेक्टर गोपालदत्त भट्ट ने उन की तरफ आ रही काले रंग की मोटरसाइकिल को रुकने का इशारा किया. उस मोटरसाइकिल पर चालक के अलावा 2 लोग बैठे थे.

सबइंसपेक्टर गोपालदत्त भट्ट ने बाइक रुकने पर चालक से जब गाड़ी के कागजात दिखाने को कहा तो वे उलटे सबइंसपेक्टर से ही झगड़ने लगे और मौका मिलते ही उस की सर्विस रिवाल्वर छीन कर भाग गए. सूचना मिलने पर वहां थाना डालनवाला, नेहरू कालोनी के अलावा एसओजी की टीम भी पहुंच गई.

जिस साइड में बदमाश भागे थे, पुलिस ने उधर जा कर उन्हें तलाशना शुरू कर दिया. पुलिस उन्हें खोजती हुई लाडपुर के जंगलों में पहुंची तो अचानक जंगल की तरफ से पुलिस पर फायरिंग शुरू हो गई. अपना बचाव करते हुए पुलिस ने भी बदमाशों को ललकारते हुए फायरिंग जारी रखी.

कुछ देर की मुठभेड़ के बाद एक बदमाश ढेर हो गया और 2 वहां से भागने में सफल हो गए. मारे गए बदमाश के पास से एक देशी तमंचा और एक रिवाल्वर बरामद हुआ.

उत्तराखंड पुलिस ने अपने इस तथाकथित कारनामे को मीडिया के सामने बयान किया. पुलिस अधिकारियों ने तथाकथित मुठभेड़ में शामिल पुलिसकर्मियों की प्रशंसा की. राज्य सरकार ने भी बिना किसी जांचपड़ताल के इस ‘बहादुरी भरी मुठभेड़’ में शामिल पुलिसकर्मियों को सम्मानित करने की घोषणा कर दी. लेकिन 24 घंटे बाद ही उत्तराखंड पुलिस बैकफुट पर आ गई. रणवीर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने सारी सच्चाई उगल दी. लोगों को यह पता नहीं था कि वह फरजी मुठभेड़ थी.

खुन्नस में एक बेकुसूर युवक की हत्या कर के पुलिस को शायद कुछ तसल्ली जरूर हो गई होगी लेकिन यह खुन्नस उन्हें कितनी महंगी साबित होगी, उन्होंने सोचा भी नहीं होगा. बताया जाता है कि सानिया के भूमाफिया पिता ने ही अपनी पहुंच का फायदा उठा कर रणवीर को रास्ते से हटवाया था.

बहरहाल, अज्ञात बदमाश बताते हुए पुलिस ने रणवीर की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम कराने के बाद पुलिस उस की लाश का जल्द से जल्द अंतिम संस्कार कराना चाहती थी. इसी बीच एक पत्रकार को पोस्टमार्टम हाउस के बाहर कूड़े के ढेर से एक ड्राइविंग लाइसेंस मिला.

उस लाइसेंस पर जो फोटो लगी थी, वह मुठभेड़ में मारे गए व्यक्ति की लग रही थी. उस पर पता लिखा था— मकान नंबर-707, शालीमार गार्डन एक्सटेंशन, गाजियाबाद. यह देखते ही पत्रकार के दिमाग में शक का कीड़ा कुलबुला उठा. उस ने उसी समय अपने अखबार के औफिस में फोन कर के पूरी बात बता दी.

अखबार के औफिस से गाजियाबाद के रिपोर्टर को फोन कर के शालीमार गार्डन वाले पते पर जा कर मामले की तसदीक करने को कहा गया. वह पत्रकार जब उक्त पते पर पहुंचा तो वहां रविंद्र सिंह मिले. पत्रकार ने उन से रणवीर सिंह के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि रणवीर उन का बेटा है और वह देहरादून गया हुआ है. उस पत्रकार ने देहरादून पुलिस द्वारा मुठभेड़ में एक व्यक्ति को मारे जाने की जानकारी दे दी.

इतना सुनते ही रविंद्र सिंह घबरा गए. उन्होंने उसी समय अपने बेटे रणवीर को फोन किया. लेकिन उस का फोन नहीं मिला. बेटे की चिंता में रविंद्र सिंह की बेचैनी इतनी बढ़ गई कि वह अपने बड़े बेटे संदीप सिंह को साथ ले कर उसी समय देहरादून के लिए निकल गए.

रात 2 बजे वह देहरादून पहुंच गए. पोस्टमार्टम हाउस जा कर जब उन्होंने मृतक की लाश देखी तो उन की चीख निकल गई. वह लाश उन के बेटे रणवीर सिंह की ही थी.

इस के बाद इस तथाकथित मुठभेड़ को ले कर हंगामा शुरू हो गया. रविंद्र सिंह ने पुलिस अधिकारियों से मिल कर लाख सफाई दी कि उन का बेटा कोई बदमाश नहीं था, लेकिन पुलिस ने उन की एक न सुनी. इस के बाद मीडिया ने भी पुलिस की मुठभेड़ पर सवाल उठाने शुरू कर दिए.

उत्तराखंड पुलिस द्वारा एक होनहार युवक को फरजी एनकाउंटर में मौत के घाट उतारने की तमाम स्वयंसेवी संगठनों द्वारा निंदा की जाने लगी. गाजियाबाद, मेरठ, बुलंदशहर, बागपत आदि जिलों में पुलिस के खिलाफ छात्र भी सड़कों पर उतर आए.

मीडिया द्वारा मामला पूरे देश में सुर्खी बन गया, जिस से उत्तराखंड सरकार की किरकिरी होने लगी. आखिर 6 जुलाई 2009 को रायपुर थाने में रविंद्र सिंह की तरफ से भादंवि की धारा 147, 148, 149, 302, 506 के तहत उन पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया, जिन के नाम जीडी (मुठभेड़ की टीम) में शामिल थे.

रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद रविंद्र सिंह का अगला कदम बेटे के हत्यारों को सजा के मुकाम तक पहुंचाना था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में रणवीर के शरीर पर चोट के 28 निशान पाए गए थे. उस के शरीर में 12 गोलियां उतारी गई थीं. 4 गोलियां तो उस के सीने पर ही मारी थीं. 1 गोली उस के सिर में और 5 गोलियां उस के बाएं पैर पर लगी थीं. सभी गोलियां एक ही दिशा से चलाई गई थीं. शरीर पर गोलियों के 10 निशानों से यह पता लगा कि वे बेहद नजदीक से चलाई गई थीं जो शरीर के पार निकल गईं. 2 गोलियां शरीर में ही रह गई थीं.

पुलिस दावा कर रही थी कि उस ने 3 बदमाशों में से एक को ढेर कर दिया और 2 भाग गए. लेकिन यह बात समझ में नहीं आ रही थी कि जब पुलिस का निशाना इतना अचूक था कि रणवीर के सीने में 4 और सिर में एक गोली मार दी तो अन्य 2 बदमाशों को एक भी गोली क्यों नहीं लगी. इतनी पुलिस के होते हुए भी वे भागने में सफल कैसे हो गए? बहरहाल, पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद से ही पुलिस की थ्यौरी पर सवाल उठने शुरू हो गए.

तत्कालीन आईजी एम.ए. गणपति ने इस मामले की जांच सीबीसीआईडी से कराने के निर्देश दिए. तत्कालीन एसएसपी विमला गुज्याल के साथ 15 सदस्यीय फोरेंसिक टीम ने मुठभेड़ स्थल का मुआयना कर पुलिस द्वारा बरामद  बाइक, कंट्रोलरूम रिकौर्ड, थाने के दस्तावेज सील कर दिए.

रविंद्र सिंह को उत्तराखंड पुलिस की जांच पर भरोसा नहीं था. वह मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग कर रहे थे. इलाके के तत्कालीन सांसद और अब केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह सहानुभूति जताने पीडि़त के घर गए तो पीडि़त परिवार ने उन से भी केस की सीबीआई जांच कराने की मांग की.

उस समय उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक थे. राजनाथ सिंह ने मुख्यमंत्री से बात की. मुख्यमंत्री की संस्तुति के बाद 29 जुलाई, 2009 को इस मामले की जांच सीबीआई को ट्रांसफर कर दी गई.

सीबीआई ने उत्तराखंड पुलिस के सभी तथ्यों की बारीकी से जांच शुरू कर दी. जिस धर्मशाला में रणवीर व उस के साथी ठहरे थे, सीबीआई ने वहां के 5 लोगों के बयान लिए जिन्होंने रणवीर को पुलिस हिरासत में देखा था.

सीएफएसएल टीम ने अपनी जो रिपोर्ट दी, उस में बताया गया कि रणवीर को सभी गोलियां एक ही दिशा से और बेहद नजदीक से मारी गई थीं. जिस समय रणवीर को गोली मारी गई, उस के शरीर में कोई हलचल नहीं थी. इस का मतलब यह हुआ कि थाना नेहरू कालोनी में पुलिस की पिटाई के दौरान ही रणवीर की मौत हो गई थी. बाद में उस की लाश को जंगल में ले जा कर गोलियों से छलनी किया गया था.

रणवीर के शरीर पर चोटों के गंभीर निशान पाए गए. इस से पता चला कि रणवीर को पहले बेरहमी से पीटा गया था.

पुलिस ने जो रिवाल्वर रणवीर के पास से बरामद किया था, वह सबइंसपेक्टर गोपाल दत्त भट्ट से छीनी हुई नहीं थी और उस से व बरामद किए गए दूसरे तमंचे से एक भी गोली नहीं चलाई गई थी. जबकि पुलिस का कहना था कि मारे गए बदमाश ने पुलिस पर पहले एक दरजन से अधिक गोलियां चलाई थीं और दोनों तरफ से काफी देर तक मुठभेड़ हुई थी. सीएफएसएल जांच में पुलिस की यह थ्यौरी भी गलत साबित हुई.

जांच के बाद सीबीआई ने 22 सितंबर, 2009 को देहरादून की विशेष अदालत में 18 पुलिसकर्मियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की. मृतक रणवीर के पिता ने 9 मार्च, 2010 को उच्चतम न्यायालय में अपील कर के केस को देहरादून से दिल्ली के किसी न्यायालय में स्थानांतरित करने की मांग की थी. सीबीआई ने देहरादून की कोर्ट में जिन आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी, बाद में उनमें से कुछ अभियुक्त जमानत पर जेल से बाहर आ गए थे.

उच्चतम न्यायालय ने 29 मार्च, 2011 को सभी आरोपियों की जमानत रद्द करते हुए केस को देहरादून से दिल्ली की तीसहजारी कोर्ट में स्थानांतरित करने के आदेश दिए. इस के बाद 4 मई से इस मामले की सुनवाई तीसहजारी न्यायालय में सीबीआई की विशेष कोर्ट में शुरू हो गई.

चूंकि अभियुक्तों की जमानत सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दी थी इसलिए सीबीआई अभियुक्तों की तलाश में उन के ठिकानों पर दबिशें डालने लगी. दबाव बढ़ने पर सभी आरोपियों को कोर्ट में आत्मसमर्पण के लिए मजबूर होना पड़ा.

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जे.पी.एस. मलिक की कोर्ट में चली सुनवाई के दौरान विशेष लोक अभियोजक बृजेश कुमार शुक्ला, पीडि़त पक्ष के वकील ए.टी. राव के अलावा बचाव पक्ष के वकील आर.एन. तुफैल, अनवर अहमद और एस.पी. सिंह राठौर ने अपनीअपनी दलीलें पेश कीं. अदालत ने 133 गवाहों को सुना. तमाम सुबूतों और गवाहों की गवाही के बाद कोर्ट ने 18 पुलिसकर्मियों को रणवीर सिंह की हत्या, अपहरण, सुबूत मिटाने, आपराधिक साजिश रचने व उसे अंजाम देने के मामले में दोषी ठहराया.

इन में से 17 पुलिसकर्मियों को जज ने उम्रकैद और जुरमाना भरने की सजा सुनाई. जबकि एक अभियुक्त की सजा ट्रायल के दौरान ही पूरी हो जाने पर उसे 50 हजार रुपए के मुचलके पर रिहा कर दिया.

अदालत ने इस मामले को रेयरेस्ट औफ रेयर की श्रेणी में मानने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि मामले में कई पुलिसकर्मी युवा हैं. इसलिए उन्हें फांसी की बजाय उम्रकैद की सजा दी.

रविंद्र सिंह अभियुक्तों को दी गई सजा से संतुष्ट नहीं हैं वह उम्रकैद की सजा को चुनौती देते हुए ऊपरी अदालत से अभियुक्तों को फांसी दिए जाने की अपील करेंगे. वहीं जिन दोषी पुलिसकर्मियों को अदालत ने सजा दी है, उन में से कइयों के घर वालों ने सजा को अपने साथ अन्याय बताया. उन्होंने भी ऊपरी अदालत में जाने का मन बना लिया है.

बहरहाल 5 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद रविंद्र सिंह बेटे की हत्या के कुसूरवारों को सजा दिलाने में कामयाब हो गए. अदालत का यह फैसला उन परिवारों को भी बहुत बड़ा रास्ता दिखाने वाला साबित होगा, जो फरजी मुठभेड़ में अपने स्वजनों को खो कर इंसाफ के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं.

इस फैसले से ऐसे पुलिसकर्मियों को भी नसीहत मिलेगी, जो पदोन्नति और झूठी वाहवाही के लिए किसी बेकुसूर को फरजी मुठभेड़ में मार डालते हैं.    Fake Encounter Case

—कथा में सानिया नाम काल्पनिक है

— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.

— 2014 में प्रकाशित

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