Shocking Murder Case. पत्नी की मौत के बाद रुकुमपाल ने एकलोते बेटे शीलेश और बेटी की वजह से दूसरी शादी नहीं की. उसी बेटे ने पत्नी के कहने पर पिता को काट डाला.  

उत्तर प्रदेश के जिला एटा की कोतवाली देहात के गांव नगला समल में रहता था रुकुमपाल. शहर के नजदीक और सड़क के किनारे  बसा होने की वजह से गांव के लोग खुश और संपन्न थे. रुकुमपाल के पास खेती की जमीन ठीकठाक थी और वह मेहनती भी था, इसलिए गांव के हिसाब से उस के परिवार की गिनती खुशहाल परिवारों में होती थी. हंसीखुशी के साथ जिंदगी गुजार रही थी कि एक दिन अचानक रुकुमपाल की पत्नी श्यामश्री की मौत हो गई.

श्यामश्री की मौत हुई थी तो बेटी आशा 6 साल की थी और बेटा शीलेश 4 साल का. छोटेछोटे बच्चों को संभालना मुश्किल था, इसलिए घर वाले ही नहीं, रिश्तेदार भी उस की दूसरी शादी कराना चाहते थे. लेकिन रुकुमपाल ने शादी से तो मना किया ही, खुद को भी संभाला और मां की मदद से बच्चों को भी संभाल लिया.

पत्नी की मौत के बाद बच्चों को मां रामरखी के भरोसे छोड़ कर रुकुमपाल परिवार और जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश करने लगा था. शादी से उस ने मना ही कर दिया था, इसलिए दोनों बच्चों को बाप के साथसाथ वह मां का भी प्यार दे रहा था. इस में उसे परेशानी तो हो रही थी, लेकिन बच्चों के लिए वह इस परेशानी को झेल रहा था. क्योंकि वह बच्चों के लिए सौतेली मां नहीं लाना चाहता था.

समय जितना जालिम होता है, उतना ही दयालु भी होता है. समय के साथ बड़ेबड़े जख्म भर जाते हैं. रुकुमपाल की जिंदगी भी सामान्य हो चली थी. बच्चे भी मां को भूल कर अपनीअपनी जिंदगी संवारने में लग गए थे.

आशा पढ़लिख कर शादी लायक हो गई तो रुकुमपाल ने एटा के ही गांव नगला बेल के रहने वाले विनोद कुमार के साथ उस का विवाह कर दिया. विनोद वन विभाग में नौकरी करता था. नौकरी की वजह से वह एटा में रहता था, इसलिए आशा भी उस के साथ एटा में ही रहने लगी थी.

रुकुमपाल बेटे को पढ़ाना चाहता था, लेकिन शीलेश इंटर से ज्यादा नहीं पढ़ सका. पढ़ाई छोड़ कर वह दिल्ली चला गया और किसी फैक्ट्री में नौकरी करने लगा. हालांकि रुकुमपाल चाहता था कि शीलेश गांव में ही रहे, क्योंकि उस के पास जमीन ठीकठाक थी.

लेकिन शीलेश को जो आजादी दिल्ली में मिल रही थी, शायद वह गांव में नहीं मिल सकती थी, इसलिए उस ने रुकुमपाल से साफ कह दिया था कि वह जहां भी है, वहीं ठीक है.

पत्नी की मौत के बाद रुकुमपाल ने अपना पूरा जीवन यह सोच कर बच्चों के लिए होम कर दिया था कि यही बच्चे बुढ़ापे का सहारा बनेंगे. बेटी तो ससुराल चली गई थी. बचा था शीलेश, वह उस की कल्पना से अलग ही स्वभाव का लग रहा था. उस का सोचना था कि पिता ने अपना फर्ज पूरा किया है, उस के लिए कोई कुर्बानी नहीं दी है.

अपनी इसी सोच की वजह से कभीकभी शीलेष रुकुमपाल को ऐसी बात कह देता था कि उस के मन को गहरी ठेस पहुंचती थी. लेकिन उस के लिए शीलेश अभी भी बच्चा था. इसलिए वह उस की इन बातों को दिल से नहीं लेता था.

रुकुमपाल को अपने फर्ज पूरे करने थे, इसलिए वह शीलेश की शादी के लिए जीजान से जुट गया. आखिर उस की तलाश रंग लाई और एटा के ही गांव निछौली कलां के रहने वाले सोबरन की बेटी ममता उसे पसंद आ गई. फिर उस ने धूमधाम से उस की शादी कर दी.

सोबरन की 4 बेटियों में ममता सब से छोटी थी. उस का एक ही भाई था किशोरी. अंतिम बेटी होने की वजह से सोबरन ने ममता की शादी खूब धूमधाम से की थी.

ममता के आने से सब से ज्यादा खुशी दादी रामरखी को हुई थी. क्योंकि घर में दुलहन के आ जाने से उसे एक सहारा मिल गया था. कुछ दिन गांव में रह कर ममता शीलेश के साथ दिल्ली चली गई थी. ममता गर्भवती हुई तो शीलेश उसे गांव छोड़ गया.

कुछ दिनों बाद ममता ने एक बेटी को जन्म दिया. बेटी पैदा होने के बाद भी ममता दिल्ली नहीं गई. अब महीने, 2 महीने में शीलेश ही पत्नी और बिटिया से मिलने गांव आ जाता था.

बेटी 2 साल की हुई तो ममता एक बार फिर गर्भवती हुई. इस बार उस ने बेटे को जन्म दिया. ममता दिल्ली जाना तो नहीं चाहती थी, लेकिन रुकुमपाल और रामरखी ने उसे जबरदस्ती दिल्ली भेज दिया.

दिल्ली आने के बाद कुछ दिनों में ममता को लगा कि पति की कमाई से घर ठीक से नहीं चल सकता तो वह गांव लौट आई और रुकुमपाल से साफ कह दिया कि अब वह दिल्ली नहीं जाएगी.

ममता मजबूरी में गांव में रह रही थी, क्योंकि एक तो पति की कमाई में गुजर नहीं होता था, दूसरे उस के छोटे से कमरे में उसे घुटन सी होती थी.

गांव में दिन तो कामधाम में कट जाता था, लेकिन पति के बिना रात काटना मुश्किल हो जाता था. जिस्म की भूख और अकेलापन काटने को दौड़ता था.

ममता ने शीलेश से कई बार कहा कि वह आ कर गांव में रहे, लेकिन शीलेश को शहर का जो चस्का लग चुका था, वह उसे गांव वापस नहीं आने दे रहा था.

पति की इस उपेक्षा से नाराज हो कर ममता मायके चली गई थी. लेकिन अब मायके में तो जिंदगी कट नहीं सकती थी, इसलिए मजबूर हो कर उसे ससुराल आना पड़ा. फिर मांबाप ने भी कह दिया था कि वह जैसी भी ससुराल में है, उसे उसी में खुश रहना चाहिए.

ममता को ससुराल में कोई भी परेशानी नहीं थी. परेशानी थी तो सिर्फ यह कि पति का साथ नहीं मिल पा रहा था. इस परेशानी का भी वह हल ढूंढने लगी. ऐसे में ही एक दिन वह मायके जा रही थी तो एटा में उस की मुलाकात हरीश से हो गई.

हरीश और ममता एकदूसरे को शादी के पहले से ही जानते थे. हरीश उस के गांव के पास का ही रहने वाला था. दोनों एकदूसरे को तब से पसंद करते थे, जब साथसाथ पढ़ रहे थे. बसअड्डे पर हरीश मिला तो ममता ने पूछा, ‘‘हरीश गांव चल रहे हो क्या?’’

‘‘अब शाम हो गई है तो गांव ही जाऊंगा न. तुम्हें देख कर तो यही लग रहा है कि तुम भी मायके जा रही हो?’’ हरीश ने पूछा.

‘‘हां, मायके ही जा रही हूं. अब तुम मिल गए हो तो कोई परेशानी नहीं होगी. बाकी बच्चों को ले कर आनेजाने में बड़ी परेशानी होती है.’’

‘‘किसी को साथ ले लिया करो.’’ हरीश ने कहा तो ममता तुनक कर बोली, ‘‘किसे साथ ले लूं. वह तो दिल्ली में रहते हैं. घर में बूढ़े ससुर हैं, उन्हें खेती के कामों से ही फुरसत नहीं है.’’

‘‘तुम्हारे पति तुम से इतनी दूर दिल्ली में रहते हैं और तुम यहां गांव में रहती हो?’’

‘‘क्या करूं, उन के साथ वहां छोटी सी कोठरी में मेरा दम घुटता है, इसलिए मैं यहां गांव में रहती हूं.’’

‘‘तो उन से कहो, वह भी यहां गांव में आ कर रहें. पति के बिना तुम अकेली कैसे रह लेती हो?’’ हरीश ने कहा तो ममता निराश हो कर बोली, ‘‘उन्हें गांव में अच्छा ही नहीं लगता.’’

‘‘लगता है, वहां उन्हें कोई और मिल गई है. तुम यहां उन के नाम की माला जप रही हो और वह वहां मौज कर रहे हैं.’’

‘‘भई वह मर्द हैं, कुछ भी कर सकते हैं.’’

‘‘तो औरतों को किस ने मना किया है. वह वहां मौज कर रहे हैं, तुम यहां मौज करो. तुम्हारे लिए मर्दों की कमी है क्या.’’

वैसे तो हरीश ने यह बात मजाक में कही थी, लेकिन ममता ने इसे गंभीरता से ले लिया. उस ने कहा, ‘‘मैं 2 बच्चों की मां हूं, मुझे कौन पूछेगा?’’

‘‘तुम हाथ बढ़ाओ,सब से पहले मैं ही पकड़ूंगा.’’ हरीश ने हंसते हुए कहा, ‘‘ममता, मैं तुम्हें तब से प्यार करता हूं, जब हम साथ पढ़ते थे. लेकिन मैं अपने मन की बात कह पाता, उस के पहले ही तुम किसी और की हो गई.’’

जब ममता ने भी उस से मन की बात कह दी तो दोनों चोरीछिपे मिलने ही नहीं लगे, बल्कि संबंध भी बना लिए. ममता मौका निकाल कर हरीश से मिलने लगी. हरीश से संबंध बनने के बाद ममता को शीलेश की कोई परवाह नहीं रह गई.

शीलेश महीने, 2 महीने में घर आता और 1-2 दिन रह कर दिल्ली वापस चला जाता. उस के बाद ममता को जब भी हरीश से मिलना होता, किसी न किसी बहाने एटा चली जाती और उस से मिल लेती. मोबाइल फोन इस काम में उन की पूरी मदद कर रहा था. अब वह खुश थी.

ममता का बारबार एटा जाना रामरखी को अच्छा नहीं लगता था. उस ने रोका भी, लेकिन ममता के बहाने ऐसे होते थे कि वह रोक नहीं पाती थी. फिर उस पर उस का इतना जोर भी नहीं चलता था, इसलिए ममता आराम से हरीश से मिल रही थी.

लेकिन एक दिन गांव के किसी आदमी ने ममता को हरीश के साथ देख लिया तो उस ने रुकुमपाल को बता दिया कि उस की बहू शहर में किसी लड़के के साथ घूम रही थी. बात चिंता वाली थी. लेकिन रुकुमपाल ने अपनी आंखों से नहीं देखा था, इसलिए वह बहू से कुछ कह नहीं सकता था.

रुकुमपाल को पता था कि उस का बेटा उस से ज्यादा पत्नी पर विश्वास करता था, इसलिए उस से कुछ कहने से कोई फायदा नहीं था.

उसी बीच रामरखी कुछ दिनों के लिए आशा के यहां चली गई तो ममता को हरीश से घर में ही मिलने का मौका मिल गया. रुकुमपाल दिनभर खेतों पर रहता था, इसलिए ममता हरीश को घर में बुलाने लगी. संयोग से एक दिन रुकुमपाल की तबीयत खराब हो गई तो वह दोपहर को ही घर आ गया. घर में अनजान युवक को देख कर उस ने ममता से पूछा, ‘‘यह कौन है?’’

‘‘मेरे मामा का बेटा है.’’ ममता ने कहा.

‘‘आज से पहले तो इसे कभी नहीं देखा.’’

‘‘पापा, यह पहली बार मेरे यहां आया है.’’

ममता और रुकुमपाल बातचीत कर रहे थे, तभी हरीश चुपके से खिसक गया. इस से रुकुमपाल को पूरा शक हो गया कि यह वही लड़का है, जिसे ममता के साथ एटा में देखा गया था.

अब रुकुमपाल ममता पर नजर रखने लगा. बाहर आनेजाने के लिए भी वह उसे मना करने लगा. परेशान हो कर आखिर एक दिन ममता ने कह दिया, ‘‘मैं इस घर की बहू हूं, नौकरानी नहीं कि 24 घंटे घर में कोल्हू के बैल की तरह जुटी रहूं. मेरी भी कुछ इच्छाएं हैं. जब देखो तब आप रोकतेटोकते रहते हैं. यह मुझे अच्छा नहीं लगता.’’

रुकुमपाल समझ गया कि बहू उस के हाथ से निकल चुकी है. अब इसे संभालना उस के वश का नहीं है. इसलिए उस ने शीलेश को फोन किया कि वह आ कर अपनी बीवीबच्चों को ले जाए. क्योंकि अब उन्हें संभालना उस के वश में नहीं है.

‘‘ऐसा क्या हो गया पापा?’’ शीलेश ने पूछा.

रुकुमपाल ने सच्चाई छिपा ली, क्योंकि वह जानता था कि सच्चाई बताने पर बेटे का घर टूट सकता है. उस ने कहा, ‘‘मुझे लगता है, तुम्हारे बिना ममता उदास रहती है. बच्चे भी तुम्हें बहुत याद करते हैं.’’

‘‘ठीक है पापा, मैं कुछ दिनों की छुट्टी ले कर घर आ रहा हूं.’’

ममता को जब पता चला कि रुकुमपाल उसे दिल्ली भेजना चाहता है तो वह बेचैन हो उठी. उस ने तुरंत शीलेश को फोन किया, ‘‘तुम अपने काम में मन लगाओ. अगर मैं दिल्ली आ गई तो यहां दादी और पापा को कौन देखेगा. तुम मेरी और बच्चों की चिंता बिलकुल मत करो. मेरी तो अब तुम्हारे बिना रहने की आदत सी पड़ गई है.’’

रामरखी के न रहने से ममता आजाद थी. उस ने एक दिन फोन कर के फिर हरीश को बुला लिया.

रुकुमपाल ममता पर बराबर नजर रख रहा था. इसलिए हरीश के आने की खबर उसे लग गई. संयोग से उस दिन ममता ने दरवाजा बंद नहीं किया था, इसलिए रुकुमपाल ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया.

रुकुमपाल को देख कर हरीश तो भाग खड़ा हुआ, जबकि ममता डर से कांपने लगी. रुकुमपाल ने पहले तो उसे खूब फटकारा. इस के बाद कहा, ‘‘अब तुम्हें गांव में रहने की जरूरत नहीं है. मैं सब कुछ बता कर शीलेश को बुलाता हूं और तुम्हें उस के साथ दिल्ली भेज देता हूं.’’

ममता बुरी तरह डर गई. क्योंकि अगर उस के और हरीश के संबंधों की जानकारी शीलेश को हो जाती तो वह उस की नजरों में गिर जाती. दूसरी ओर वह दिल्ली बिलकुल नहीं जाना चाहती थी. इसलिए सोचने लगी कि वह ऐसा क्या करे कि शीलेश को बाप की बात पर विश्वास न हो.

रुकुमपाल ने ममता को भले ही धमकी दे दी थी, लेकिन शीलेश को वह यह सब बताना नहीं चाहता था. क्योंकि वह बेटे की गृहस्थी बरबाद नहीं करना चाहता था. ममता ने हरीश से कह दिया था कि कुछ दिनों तक वह इधर बिलकुल न आए.

इस के बाद उस ने पूरी योजना बना कर जो ड्रामा रचा, उस में सचमुच उस ने रुकुमपाल को चारों खाने चित कर दिया.

उस ने शीलेश को फोन किया, ‘‘तुम जल्दी से गांव आ जाओ. मैं यहां बहुत परेशान हूं.’’

‘‘तुम्हें जो भी परेशानी हो, पापा से बता दो. मैं अभी नहीं आ सकता, क्योंकि मुझे छुट्टी नहीं मिलेगी.’’ शीलेश ने कहा.

‘‘उन से क्या बताऊं परेशानी, परेशानी की वजह ही वही हैं. तुम्हें अपनी नौकरी की पड़ी है और मैं यहां उन की हरकतों से परेशान हूं.’’

‘‘क्या… पापा की हरकतों से परेशान हो?’’ शीलेश हैरानी से बोला.

‘‘एक ही बात को कितनी बार कहूं?’’ ममता गुस्से में बोली.

ममता ने ऐसी बात कह दी थी कि मजबूरन शीलेश को छुट्टी ले कर घर आना पड़ा. बेटे को देख कर रुकुमपाल ने राहत की सांस ली. उस ने सोचा था कि बेटा आ गया है तो वह बहू को उस के साथ भेज देगा. उस के बाद सारा झंझट खत्म हो जाएगा.

रुकुमपाल कुछ दूसरा सोच रहा था, जबकि ममता कुछ और ही सोचे बैठी थी. रात में उस ने रोते हुए शीलेश से कहा, ‘‘तुम तो दिल्ली में रहते हो, यहां मुझे इज्जत बचाना मुश्किल हो गया है.’’

‘‘तुम्हें भ्रम हुआ होगा. करने की कौन कहे, पापा ऐसा कभी सोच भी नहीं सकते.’’ शीलेश ने कहा.

‘‘उन्हें पता है कि तुम मेरी बात पर विश्वास नहीं करोगे, इसीलिए तो वह मुझे गंदी नजरों से देखते हैं. इस हालत में मैं अपनी इज्जत कैसे बचाऊं?’’

शीलेश को पत्नी की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था. जिस बाप ने उस की खातिर अपनी जवानी होम कर दी थी, वह उस की पत्नी के साथ गलत काम करने की कैसे सोच सकता था. उस ने ममता को समझाना चाहा, लेकिन ममता अपनी जिद पर अड़ी थी. तब उस ने दिल्ली चलने को कहा तो ममता ने वहां जाने से मना करते हुए कहा, ‘‘नहीं जाना मुझे दिल्ली, वहां उस छोटी सी कोठरी में मेरा दम घुटता है.’’

उस रात ममता ने रोधो कर ऐसा त्रियाचरित्र रचा कि शीलेश को पूरा विश्वास हो गया कि ममता सही है और उस के पापा गलत. यही नहीं, उस ने वादा भी कर लिया कि सुबह वह इस बात को ले कर पापा से आरपार की बात करेगा.

सुबह रुकुमपाल शीलेश से ममता के बारे में कुछ कहता, उस से पहले ही शीलेश ने कहा, ‘‘पापा, आप एकदम बेशरम ही हो गए हैं क्या?’’

‘‘क्यों? मैं ने ऐसा क्या किया, जो तुम मुझे बेशरम कह रहे हो?’’ रुकुमपाल ने हैरानी से पूछा.

‘‘बहू पर नीयत खराब किए हो और कह रहे हो कि मैं ने क्या किया है.’’

रुकुमपाल की समझ में सारा माजरा आ गया. उस ने बेटे को समझाने के लिए कहा, ‘‘बेटा अपना पाप छिपाने के लिए तुम्हारी पत्नी मेरे ऊपर यह लांछन लगा रही है. सोचो, जिस आदमी ने अपनी पूरी जिंदगी तुम लोगों के पीछे होम कर दी, अब इस उम्र में वह ऐसी घटिया हरकत करेगा? मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था कि बुढ़ापे में मुझ पर यह कलंक भी लगेगा.’’

‘‘पापा, आप कुछ और कह रहे हैं और ममता कुछ और.’’

ममता ने रोधो कर शीलेश के मन में रुकुमपाल के खिलाफ जो जहर भरा था, उस की वजह से वह बाप की न कोई बात सुनने को तैयार था न कोई तर्क.

दूसरी रुकुमपाल उस से बहुत कुछ कहना चाहता था, जबकि वह उस की कोई भी बात सुनने को तैयार नहीं था.

ममता खुश थी कि वह बापबेटे के बीच दीवार खड़ी करने में कामयाब हो गई थी. शीलेश चारपाई पर लुढ़का तो सुबह ही उठा. उठते ही उस ने कहा, ‘‘ममता, तुम अपना सारा सामान समेटो. हम दिल्ली चलेंगे.’’

ममता घबरा गई. उस का फेंका पासा उलटा पड़ रहा था. क्योंकि इस हालत में अगर वह दिल्ली चली गई तो फिर लौट नहीं सकती थी. हरीश दिल्ली जा नहीं सकता. तब वह उस से कैसे मिल पाती. अब वह इस सोच में डूब गई कि ऐसा क्या करे कि उसे दिल्ली भी न जाना पड़े और बुड्ढे से भी पिंड छूट जाए.

काफी सोचविचार कर उस ने तय किया कि वह दिल्ली जाने के बजाय इस कांटे को ही जड़ से निकलवा फेंकेगी. उस ने कहा, ‘‘तुम्हें पता नहीं, मैं पेट से हूं. इस हालत में मैं दिल्ली नहीं जा सकती. अब तुम्हें सोचना है कि इस हालात में तुम मुझे अपने बाप से कैसे बचा सकते हो? कोई दूसरा होता तो वह ऐसे आदमी को खत्म कर देता, जो उस की पत्नी पर बुरी नजर रखता हो.’’

ममता ने यह चाल बहुत सोचसमझ कर चली थी. उस का सोचना था कि शीलेश अगर अपने बाप को मार देता है तो बाप की हत्या के आरोप में वह जेल चला जाएगा. उस के बाद वह पूरी तरह से आजाद हो जाएगी. फिर वह आराम से हरीश से मिल सकेगी.

रुकुमपाल यह तो जान गया था कि पत्नी के कहने में आ कर बेटा उस के खिलाफ हो गया है. लेकिन उसे यह विश्वास नहीं था कि बेटा उस की जान का ही दुश्मन बन जाएगा. उस का सोचना था कि जब शीलेश को सच्चाई का पता चलेगा तो अपने आप सब ठीक हो जाएगा.

19 मार्च की शाम को शीलेश ने रुकुमपाल से खेतों से भूसा लाने को कहा. रुकुमपाल भूसा लाने के लिए खेतों की ओर चला तो शीलेश भी फावड़ा ले कर उस के पीछेपीछे वहां जा पहुंचा. उस के साथ ममता भी थी.

रुकुमपाल झुक कर भूसा निकालने लगा तो शीलेश ने पीछे से उस पर फावड़े से वार कर दिया. रुकुमपाल चीख कर गिर पड़ा. उस की चीख सुन कर आसपास के खेतों में काम कर रहे लोग उस की ओर दौड़े.

वे रुकुमपाल के पास तक पहुंच पाते, इस से पहले शीलेश ने बाप पर फावड़े से कई वार किए और भाग निकला. लेकिन गांव वालों ने उसे ही नहीं, ममता को भी उस के साथ भागते हुए देख लिया था.

गांव वालों ने घटना की सूचना कोतवाली देहात पुलिस को दी. सूचना पा कर कोतवाली प्रभारी पदम सिंह पुलिस बल के साथ गांव नगला समल पहुंच कर रुकुमपाल के खेत पर गए. पहुंचते ही उन्होंने लाश को कब्जे में ले लिया.

गांव वालों ने पूछताछ में बताया कि जब वे रुकुमपाल की चीख सुन कर उस की ओर दौड़े थे तो उन्हें मृतक का बेटा शीलेश और बहू ममता भागते ही दिखाई दिए थे.

पुलिस को लगा कि उन्हीं लोगों ने यह काम किया है, तभी भाग रहे थे अन्यथा बाप की चीख सुन कर वह बचाने दौड़तेभागते नहीं. कोतवाली प्रभारी ने 2 सिपाहियों को घटनास्थल पर छोड़ा और खुद बाकी सिपाहियों को ले कर रुकुमपाल के घर जा पहुंचे.

शीलेश भागने की तैयारी कर रहा था. ममता भी उस के साथ थी. पुलिस ने दोनों को पकड़ लिया. पुलिस ने मृतक की बेटी आशा को घटना की सूचना दी तो वह दादी रामरखी को साथ ले कर आ गई. रुकुमपाल की लाश देख कर रामरखी बेहोश हो गई तो आशा भी फूटफूट कर रोने लगी.

रामरखी को होश में लाया गया तो वह रोते हुए कहने लगी, ‘‘ममता ने ही अपने यार से मिलने के लिए मेरे बेटे को मरवाया है, क्योंकि मेरा बेटा उसे उस से मिलने से रोकता था.’’

जब आशा को पता चला कि शीलेश ने ही उस के पिता की हत्या की है तो उस का दुख और बढ़ गया. पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद शीलेश और ममता को ले कर थाने आ गई.

थाने में शीलेश और ममता ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. इस के बाद ममता ने ससुर की हत्या करवाने के पीछे की अपने अवैध संबंधों की जो कहानी सुनाई, उसे सुन कर शीलेश ने अपना सिर पीट लिया.

लेकिन अब क्या हो सकता था. पत्नी के कहने में आ कर उस ने अपने बच्चों को तो अनाथ किया ही, उस बाप के खून से हाथ रंग लिए, जिस ने उसे बाप का ही नहीं, मां का भी प्यार दिया था. उस ने दादी के बुढ़ापे का सहारा छीनने के साथ भरापूरा परिवार बरबाद कर दिया.

पूछताछ के बाद पुलिस ने शीलेश और ममता को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. रुकुमपाल का भी कैसा दुर्भाग्य था कि जिस बेटे से उस ने उम्मीद लगा रखी थी कि मरने पर उस का अंतिम संस्कार करेगा. उसी ने उसे मौत के घाट उतार दिया.  Shocking Murder Case

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...