Fake Medicine Racket. लोग मैडिकल स्टोर से दवा लाते हैं, जान बचाने के लिए, पर यदि दवा के नाम पर निकले चाक पाउडर तो रिजल्ट क्या होगा? इसे आप खुद समझ सकते हैं. अब तो मिलावटखोर नकली ईनो और कौफी पाउडर भी धड़ल्ले से मार्केट में बेच रहे हैं. यह अब मिलावट का करोड़ों रुपए का काला कारोबार बन चुका है. इन लोगों के लिए आप की जान से ज्यादा प्यारा पैसा है. अब सवाल यह है कि सिर्फ प्रशासन छापा मार कर सिर्फ फोटो ही खिंचवाएगा या इन गुनहगारों के काले धंधे पर लगाम भी लगाएगा?

दिल्ली की भीड़भाड़ वाली गलियों में सब कुछ सामान्य सा दिखता था, लेकिन उस दिन क्राइम ब्रांच की टीम कुछ बड़ा करने जा रही थी. इंसपेक्टर मंजीत कुमार ने सामने चेयर पर बैठे अपने खास मुखबिर की तरफ देखा तो मुखबिर फुसफुसाया, ”सर, पक्की खबर है. यह सिर्फ मैडिकल स्टोर नहीं, मौत का गोदाम है.’’

इस के बाद पुलिस टीम 11 मार्च, 2026 को निर्धारित स्थान पर छापा मारने के लिए निकल गई. पूर्वी दिल्ली के जिला शाहदरा की बिहारी कालोनी में पुलिस की गाड़ी धीरेधीरे रुकी.

”टीम तैयार? आज कोई नहीं बचेगा…’’ इंसपेक्टर मंजीत की आवाज में सख्ती थी.

पुलिस टीम ने दरवाजा तोड़ा और अंदर जो दिखा, उस ने सब को हिला दिया.

”ये तो लाखों गोलियां हैं.’’ एक कांस्टेबल चीख पड़ा.

टेबल पर बिखरी थीं नामी कंपनियों की दवाइयां, लेकिन एक भी असली नहीं. हंड्रेड परसेंट नकली.

”नाम बड़ेबड़े… काम मौत का.’’ मंजीत ने एक पैकेट उठाते हुए कहा.

उसी दौरान पकड़ा गया निखिल अरोड़ा उर्फ सन्नी, जो बाहर से एक साधारण सा मैडिकल होलसेलर था. उसे पुलिस ने हिरासत में लेते हुए पूछा, ”सचसच बता, ये माल कहां से आता है?’’

निखिल ने पहले तो चुप्पी साध ली, फिर पसीना पोंछते हुए बोला, ”सर, ये तो बस शुरुआत है. असली खेल तो बहुत बड़ा है…’’

यह सिर्फ नकली दवाओं का धंधा नहीं था. इस के पीछे था 50 करोड़ का फरजी जीएसटी नेटवर्क.

”फरजी कंपनियां… फरजी बिल… और असली मौत.’’ इंसपेक्टर मंजीत कुमार बुदबुदाए. फिर निखिल के मोबाइल खंगाले गए.

वाट्सऐप और टेलीग्राम पर चल रहा था पूरा भयानक खेल.

”सर, ये देखिए, देश भर में सप्लाई हो रही है.’’ टीम इंचार्ज एसीपी पटेल स्वागत को स्क्रीन दिखाते हुए मंजीत कुमार ने कहा.

यह मामला बहुत बड़ा है. दिल्ली से निकल कर इंटरस्टेट गैंग तक पहुंच चुका है, लेकिन असली झटका अभी बाकी था.

”सर, एक और नाम आया है मोहित शर्मा. और एक फैक्ट्री.’’

क्राइम ब्रांच की पूरी टीम में खलबली मच गई. फिर मंजीत की आंखों में चमक आ गई, ”तो असली अड्डा अभी जिंदा है.’’

टीम के एसआई कंवर पाल व दीपक ने कहा कि सर आगे असली खेल शुरू होने वाला था.

”लोकेशन कंफर्म… मुजफ्फरनगर.

टीम तैयार थी. आज इस जाल की जड़ काटनी है.

क्राइम ब्रांच के एसीपी पटेल स्वागत राजकुमार की सख्त आवाज गूंजी.

”ये कोई छोटीमोटी यूनिट नहीं, पूरा इंडस्ट्रियल सेटअप है.’’

क्राइम ब्रांच की टीम के प्रभारी मंजीत कुमार ने अपने सहयोगी एसआई कंवर पाल को कहा कि टीम के साथ छापा मारो. मशीनें चल रही थीं… मौत.

फैक्ट्री में बनती मौत

टैबलेट प्रैस, कैप्सूल फिलिंग, ब्लिस्टर पैकिंग और हजारों बोतलें, जिन पर नाम था बड़ी कंपनियों का. लेकिन अंदर भरी थी मौत.

करीब 2 हजार किलोग्राम कच्चा माल बरामद हो गया.

”सर, ये तो डायबिटीज और हार्ट के मरीजों को दी जाने वाली दवा है.’’

इंसपेक्टर मंजीत कुमार ने गुस्से में टेबल पर मुक्का मारा, ”यानी ये लोग इलाज नहीं, हत्या कर रहे थे.’’

मुख्य आरोपी अकसद सिद्दीकी फरार था, लेकिन बाकी कडिय़ां जुड़ चुकी थीं.

सप्लायर, जीएसटी गैंग, डिस्ट्रीब्यूटर सब गिरफ्तार हो चुके थे.

पुलिस की पूछताछ में एक आरोपी टूट गया, ”सर, हमें लगा कि बस पैसा कमाना है. बहुत फर्क पड़ता है.’’

केस का भंडाफोड़ होने के बाद प्रैस कौन्फ्रैंस हुई. दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की टीम ने एक बड़े नकली दवा रैकेट का भंडाफोड़ किया है.

लेकिन मंजीत चुप थे. रात को फाइल बंद करते हुए उन्होंने सोचा, ‘पता नहीं कितने लोग इन दवाओं से मर चुके होंगे.’

खिड़की से बाहर देखा, शहर वैसा ही था, लेकिन अब उन्हें पता था कि हर दवा असली नहीं होती. हर बीमारी का इलाज नहीं… कुछ लोग मौत भी देते हैं.

क्राइम ब्रांच की फाइल लगभग बंद हो चुकी थी. सभी आरोपी जेल में थे. फैक्ट्री सील हो चुकी थी.

लेकिन इंसपेक्टर मंजीत कुमार को कुछ खटक रहा था.

एक छोटी गलती… बड़ा राज जब्त किए गए मोबाइल की दोबारा जांच हो रही थी. अचानक एक डिलीटेड चैट की रिकवरी हुई.

”सर, ये देखिए.’’ तकनीकी टीम चौंक गई. स्क्रीन पर लिखा था, ”डौक्टर साहब का माल डिस्पैच करना है.’’

मंजीत की आंखें सिकुड़ गईं.

”डौक्टर… कौन डौक्टर ?’’

पूछताछ के लिए फिर से लाया गया निखिल टूट गया, ”सर, हम सब तो मोहरे थे…’’ उस की आवाज कांप रही थी.

”तो खिलाड़ी कौन है ?’’ मंजीत गरजे. निखिल ने सिर झुका लिया.

”एक बड़ा डौक्टर… दिल्ली का नामी अस्पताल. वही असली बौस है.’’

कमरे में सन्नाटा छा गया. जांच पहुंच गई एक बड़े प्राइवेट अस्पताल तक.

डा. आर्यन मल्होत्रा. समाजसेवी मशहूर सर्जन. टीवी इंटरव्यू में दिखने वाला.

”नहीं सर, ये नहीं हो सकता.’’ मंजीत ने फाइल मेज पर पटकी.

”अपराधी का चेहरा असली नहीं होता…’’

जांच में जो सामने आया, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था.

डौक्टर खुद मरीजों को महंगी दवाएं लिखता था. वही दवाएं नकली फैक्ट्री से बनवाता था. अस्पताल के जरिए सप्लाई करता था.

”मतलब… इलाज भी वही, मौत भी वही.’’ एसआई कंवरपाल हिल गए.

लेकिन एक पुरानी फाइल खुली कई मरीजों की ‘रहस्यमयी मौत’ और उन में से एक नाम था— रीमा शर्मा.

इंसपेक्टर मंजीत के हाथ कांप गए. ये … ये तो मेरी बहन का नाम है. सालों पहले रीमा की मौत अचानक दवा रिएक्शन से हुई थी.

”तो ये हादसा नहीं हत्या थी.’’ मंजीत बुदबुदाए. अब यह केस सिर्फ ड्यूटी नहीं, बदला बन चुका था.

रात 2 बजे के करीब डा. आर्यन के घर दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच की रेड पड़ी.

”डा. आर्यन, आप गिरफ्तार हैं…’’ इंसपेक्टर मंजीत ने हथकड़ी दिखाते हुए कहा तो डौक्टर हंस पड़ा, ” इंसपेक्टर, तुम देर कर चुके हो.’’

”क्या मतलब ?’’ ”मैं सिर्फ दवा नहीं, सिस्टम भी बनाता हूं. मेरे जैसे और भी हैं.’’ कमरे में खामोशी छा गई.

होलसेलर हुआ अरेस्ट

क्राइम ब्रांच के डीसीपी आदित्य गौतम के आदेश पर छापा मरा गया. दिल्ली पुलिस टीम ने बिहारी कालोनी शाहदरा (पूर्वी दिल्ली) में छापा मारा, जहां से करीब 1.2 लाख की नकली टैबलेट और कैप्सूल बरामद हुए.

ये दवाएं डायबिटीज, ब्लडप्रेशर, इंफेक्शन जैसी गंभीर बीमारियों में इस्तेमाल होती थीं. छापे के दौरान निखिल अरोड़ा उर्फ सन्नी गिरफ्तार किया, जो बाबा श्याम मैडिकोज नाम से मैडिकल होलसेलर का काम कर रहा था.

क्राइम ब्रांच के साइबर सेल के तेजतर्रार एसआई कंवर पाल व दीपक के साथ टीम फ्लैट नंबर 2878 टौप फ्लोर पर टीम धीरेधीरे सीढिय़ां चढऩे लगी. इसे चढ़ते ही दरवाजा बंद मिला.

एसआई कंवर पाल ने इशारा किया. दरवाजा तोड़ दो. जोरदार लात पड़ी. दरवाजा खुल गया.

कमरे के अंदर जो दृश्य था, उस ने पूरी टीम को हिला कर रख दिया. चारों तरफ कार्टन के ढेर पड़े थे. मशीनें चल रही थीं. बड़ेबड़े डिब्बों में हजारों की दवा भरी थी. कुछ लड़के तेजी से पैकिंग कर रहे थे. चारों तरफ गंध फैली हुई थी.

”कोई भागने न पाए.’’

एसआई कंवर पाल गरजे. अचानक पीछे की खिड़की से एक युवक कूद कर भागने लगा, लेकिन क्राइम

ब्रांच की टीम नीचे तैनात थी. उस ने उस को पकड़ लिया.

वह था निखिल अरोड़ा उर्फ सन्नी. दिल्ली के नकली दवाओं के सब से बड़े गिरोह का सरगना.

पूछताछ में निखिल अपने को निर्दोष बताता रहा, लेकिन पुलिस ने कमरे से बरामद दवाओं के कार्टन खोले तो उस के चेहरे का रंग उड़ गया.

हर कार्टन पर बड़ेबड़े नाम छपे थे. Rabemac-DSR, Sporolac-DS, and Ursocol-300H Signoflam, Chymoral Forte, Ketorol-DT, Gluconorm series, Jalra-50, Telma-AM ¥æñÚU Glycomet, Amlovas-AT. देश की नामी कंपनियों के नाम.

लेकिन असली कंपनियों का इन दवाओं से कोई लेनादेना नहीं था. ये सब नकली थीं.

”तुम जानते हो, ये दवाएं कितने लोगों की जान ले सकती हैं?’’ एसआई कंवर पाल ने गुस्से में कहा.

निखिल चुप रहा.

एक पुलिसकर्मी ने धीरे से कहा, ”यहां तो पूरा गोदाम है…’’

वास्तव में वह गोदाम नहीं, मौत की फैक्ट्री थी.

करीब 6 महीने पहले से दिल्ली पुलिस को शिकायतें मिल रही थीं. कुछ मरीजों पर दवाओं का असर नहीं हो रहा था. कई अस्पतालों में मरीजों की अचानक तबियत बिगड़ रही थी.

एक कैंसर पीडि़त महिला की मौत ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया था. जांच में पता चला कि उसे जो दवाएं दी गई थीं, वे असली नहीं थीं. यह मामला मामला सीधे क्राइम ब्रांच पहुंचा.

एसआई को जांच सौंपी गई. उन्होंने साइबर टीम के साथ मिल कर दवाओं की सप्लाई चेन खंगालनी शुरू की. कुछ मोबाइल नंबर बारबार सामने आ रहे थे. उन नंबरों की लोकेशन शाहदरा, गाजियाबाद और हरिद्वार में घूम रही थी.

फिर एक दिन पुलिस को टेलीग्राम के एक गुप्त ग्रुप का पता चला. ग्रुप का नाम था मैडिको किंग. यहां पर दवाओं के और्डर लिए जाते थे.

जांच आगे बढ़ी तो पुलिस दंग रह गई. निखिल अकेला नहीं था. उस के साथ शिवम त्यागी, मयंक अग्रवाल, मोहित शर्मा और राहुल जैसे कई लोग जुड़े हुए थे.

इन लोगों ने फरजी जीएसटी नंबरों पर दर्ज शेल कंपनियां बना रखी थीं. फरजी बिलिंग के जरिए करोड़ों रुपए का कारोबार हो रहा था.

असली जैसी थी पैकिंग

पुलिस रिकौर्ड के अनुसार, 50 करोड़ रुपए के फरजी जीएसटी इनवायस मिले.

निखिल असली दवा कंपनी की तरह पैकिंग तैयार करवाता था. डिब्बे, होलोग्राम, बैच नंबर सब कुछ हूबहू असली जैसा. फिर सस्ती और घटिया कैमिकल पाउडर से गोलियां बनतीं.

उन दवाओं को छोटे मैडिकल स्टोरों तक आधे दाम में पहुंचाया जाता था. लालच में आ कर कई दुकानदार बिना जांच किए माल खरीद लेते थे. उन्हें क्या पता था कि वे दवा नहीं, मौत बेच रहे हैं.

उस से आगे की पूछताछ में निखिल टूट गया. उस ने पुलिस को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में स्थित एक बड़ी फैक्ट्री के बारे में बताया.

अगले ही दिन क्राइम ब्रांच की टीम वहां पहुंची. करीब एक हजार गज में स्थित फैक्ट्री बाहर से बंद पड़ी थी, लेकिन अंदर मशीनों की आवाजें आ रही थीं. दरवाजा तोड़ा गया. अंदर का दृश्य किसी फार्मास्युटिकल कंपनी से कम नहीं था. बड़ीबड़ी टैबलेट प्रैस मशीनें, कैप्सूल फिलिंग यूनिट, प्रिंटिंग मशीनें, नकली रैपर, सब कुछ मौजूद था.

ड्रग इंसपेक्टर आयुष ठाकुर को बुलाया गया. उन्होंने दवाओं की जांच करते हुए कहा, ”ये सारी दवाइयां नहीं हैं. इस में असली दवा का नाम तक नहीं है.’’

जांच के दौरान पुलिस को कई चौंकाने वाले तथ्य मिले. कुछ दवाओं में सिर्फ चाक पाउडर मिला था. कुछ में खतरनाक कैमिकल.

एक डौक्टर ने बताया, ”अगर हार्ट या डायबिटीज का मरीज ऐसी नकली दवा खा ले तो उस की जान भी जा सकती है.’’

पुलिस के सामने अब यह सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं था, यह मानवता के खिलाफ था. पुलिस की जांच जैसेजैसे आगे बढ़ी, गिरोह के सदस्य घबराने लगे.

एक रात को धमकी भरा फोन आया, ”ज्यादा ईमानदारी ठीक नहीं, केस बंद कर दो.’’

लेकिन एसआई शबनम सैफी डरने वालों में नहीं थी. उन्होंने सीधा जवाब दिया, ”अब तुम लोग सीधे जेल जाओगे.’’

कुछ दिनों बाद पुलिस टीम पर हमला भी हुआ. गाजियाबाद में छापेमारी के दौरान बदमाशों ने पत्थरबाजी की, लेकिन पुलिस ने जवाबी काररवाई करते हुए 2 बदमाशों को पकड़ लिया.

जब मामला अदालत पहुंचा तो सरकारी वकील ने कहा, ”ये लोग सिर्फ नकली दवाई नहीं बेच रहे थे, ये लोगों की जिंदगी से खेल रहे थे.’’

अदालत में जब उन दवाओं की रिपोर्ट पेश हुई तो पूरा कोर्ट सन्न रह गया. करीब 1.2 लाख नकली टैबलेट और कैप्सूल बरामद हुए थे.

जज ने कड़ी काररवाई करते हुए कहा, ”ऐसे अपराधी समाज के लिए खतरनाक हैं.’’

जांच अभी खत्म नहीं हुई थी. निखिल ने पूछताछ में बताया कि इस नेटवर्क के तार दूसरे राज्यों तक फैले हैं. कई बड़े सप्लायर अभी भी फरार हैं.

क्राइम ब्रांच ने अब पूरे देश में अलर्ट जारी कर दिया. लेकिन इस कहानी का सब से भयावह सवाल अब भी बाकी था, आखिर कितने लोग इन नकली दवाओं का शिकार हो चुके थे? कितने मरीजों की मौत के पीछे यह गिरोह जिम्मेदार था? क्या हमारे मैडिकल स्टोरों तक पहुंचने वाली हर दवा सचमुच असली होती है?

ईनो, कौफी भी नकली

दिल्ली की तंग गलियों में हर रोज हजारों कहानियां जन्म लेती हैं. कुछ उम्मीद की, कुछ संघर्ष की और कुछ ऐसी जिन में छिपा होता है मौत का कारोबार.

दिल्ली के मधु विहार की गलियों में भी एक ऐसी ही कहानी पनप रही थी, जो बाहर से बिलकुल साधारण दिखती थी, लेकिन उस के अंदर का चेहरा बेहद खौफनाक था.

दिल्ली के लक्ष्मीनगर इलाके में रहने वाले 42 वर्षीय संजीव गुप्ता को मार्च 2026 में अचानक पेट में दर्द और उल्टियों की शिकायत हुई. परिवार वालों ने सोचा शायद बदहजमी हो गई होगी.

उन्होंने घर में रखी ईनो पाउडर पानी में घोल कर दिया, लेकिन हालत बिगड़ती चली गई.

कुछ ही घंटों में संजीव कुमार की मौत हो गई. पुलिस ने शव को मोर्चरी में भेज दिया. उस के बाद पोस्टमार्टम हुआ.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने डाक्टरों को भी हैरान कर दिया कि शरीर में किसी अज्ञात रसायन के निशान थे. यह सामान्य फूड पौइजनिंग नहीं थी.

इसी तरह के 2 और मामले सामने आए. एक शाहदरा में और दूसरा गाजियाबाद में. तीनों में एक जैसे थे, मौत से पहले सभी ने एक ही ब्रांड का ईनो या कौफी पेय इस्तेमाल किया था.

अब मामला साधारण नहीं रहा था. यह एक पैटर्न बन रहा था. इस मामले को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की यूनिट के सुपुर्द किया गया.

क्राइम ब्रांच के डीसीपी आदित्य गौतम ने एक टीम गठित करने के निर्देश दिए, जिस में क्राइम ब्रांच के एसीपी स्वागत की टीम के इंसपेक्टर मंजीत कुमार और इंसपेक्टर प्रदीप सिंह जांच के प्रमुख अधिकारी बनाए गए.

इंसपेक्टर मंजीत कुमार अपने सटीक दिमाग और शांत स्वभाव के लिए जाने जाते थे, जबकि प्रदीप सिंह अपने आक्रामक अंदाज के लिए मशहूर थे.

”कुछ गड़बड़ है और गड़बड़ बहुत बड़ी है.’’ मंजीत कुमार ने केस फाइल देखते हुए कहा.

”और ये कोई छोटा खिलाड़ी नहीं है.’’ प्रदीप सिंह ने बात आगे बढ़ाई.

दोनों जांच अधिकारी मंजीत कुमार और प्रदीप सिंह ने अपने सहयोगी एसआई कंवर पाल व दीपक को जांच संबंधी कुछ इनपुट दिए थे.

दोनों अधिकारियों ने जांच के दौरान मृतकों के घरों से ईनो और कौफी के पैकेट बरामद किए. उन को पहली नजर में सब कुछ असली लग रहा था, ब्रांड पैकिंग, सील सब कुछ. लेकिन जब फोरैंसिक जांच हुई तो सच्चाई सामने आई.

पैकेट नकली थे. उन में मौजूद पाउडर में कोई औषधीय गुण नहीं था, बल्कि उस में मिलाए गए रसायन धीरेधीरे शरीर को नुकसान पहुंचा रहे थे.

”ये सिर्फ धोखा ही नहीं, हत्या है.’’ प्रदीप सिंह ने गुस्से में कहा.

इसी दौरान पुलिस को एक गोपनीय सूचना मिली. मधु विहार के फ्लैट नंबर ई-25 और एफ-46/बी में कुछ संदिग्ध गतिविधियां चल रही हैं.

रात के 2 बजे के करीब वहां मशीनों की आवाज आती थी.

”सर, छापा मारना होगा.’’ इंसपेक्टर मंजीत ने फैसला ले लिया.

अगली सुबह करीब 5-6 बजे क्राइम ब्रांच की टीम ने फ्लैट पर छापा मारा. दरवाजा तोड़ते ही जो नजारा सामने आया, उस ने सब को स्तब्ध कर दिया था.

2 छोटे फ्लैटों को पूरी तरह फैक्ट्री में बदल दिया गया था. मशीनें चल रही थीं. दरजनों लोग पैकिंग में लगे थे. हजारों की संख्या में ईनो और कौफी के नकली पाउच तैयार हो रहे थे.

”हाथ ऊपर,’’ मंजीत जोर से चिल्लाए. घबराए हुए 2 युवक उत्तम दास और पाई दास वहीं पकड़े गए.

दोनों से मास्टरमाइंड का नाम पूछा उन्होंने कहा, ”हम लोग तो लेबर हैं. असली मालिक नितिन भारद्वाज है. वही सब कुछ संभालता है. सप्लाई, पैसा, नेटवर्क… सब कुछ.’’ उत्तम ने डरते हुए कहा.

छापे के दौरान फैक्ट्री का मालिक नितिन भारद्वाज वहां से फरार होने में सफल रहा. पुलिस द्वारा उस की लोकेशन ट्रेस की गई. वह देहरादून में कहीं छिपा था.

क्राइम ब्रांच की टीम देहरादून पहुंची. सहस्त्रधारा की पहाडिय़ों के एक रिसौर्ट से नितिन को गिरफ्तार कर लिया गया.

”ये लोग इंसान नहीं, हैवान हैं.’’ मंजीत कुमार ने कहा.

देश के कई शहरों में यह नकली सामान पहुंचाया जा रहा था. दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान छोटे दुकानदारों को सस्ते भाव पर दिया जाता था और वे अनजाने में इसे बेच देते थे.

एक पीडि़त परिवार संजय गुप्ता की पत्नी सीमा आज भी उस पल को याद कर के कांप जाती है.

”संजय गुप्ता ने एक गिलास पानी पीया था और उन का सब कुछ खत्म हो गया,’’ वह रोते हुए बोली, ”मेरा 12 साल का बेटा अब हर बार दवा लेने में बहुत ही डरता है.’’

पूछताछ में आरोपी नितिन ने जो बताया, वह और भी चौंकाने वाला था, ”लोग सस्ता चाहते हैं, हम उन्हें वही देते हैं. मरते हैं तो हमारी गलती नहीं, उन की किस्मत ही खराब है.’’

उस की इस बेरुखी ने पुलिस को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था. सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया गया.

सरकारी वकील ने कड़ी सजा की मांग की.

”यह सिर्फ अपराध नहीं है… यह मानवता के खिलाफ एक संगीन अपराध है.’’

इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया, ”क्या हम सस्ते के चक्कर में अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं?’’

पुलिस ने इस गिरोह का भंडाफोड़ तो कर दिया, लेकिन जांच अभी भी बाकी है.

”क्या यह नेटवर्क पूरी तरह खत्म हो गया है या अभी भी कहीं मौत की फैक्ट्री चल रही है?’’

यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि एक चेतावनी है. आप की एक छोटी सी लापरवाही आप की जिंदगी की सब से बड़ी भूल बन सकती है. Fake Medicine Racket

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