Murder Mystery. किशोर को पता नहीं था कि घनश्याम उर्फ साहेब उस की पत्नी रिशा का प्रेमी है, जो शादी न होने से उसे ठिकाने लगा कर रिशा को अपनी बनाना चाहता है.
कड़ाके की ठंड में अगर रिमझिम बारिश हो रही हो तो ठंड को अपना विकराल रूप दिखाने का बढि़या मौका मिल जाता है. रोज की तरह ठंड की उस बारिश में दोपहर को साहेब रिशा के घर पहुंचा तो वह रजाई में दुबकी बैठी थी. एकदूसरे को देख कर दोनों मुसकराए. इस के बाद हथेलियों को आपस में रगड़ते हुए साहेब बोला, ‘‘भई, आज तो गजब की ठंड है.’’
‘‘इसीलिए तो रजाई में दुबकी बैठी हूं.’’ रिशा बोली, ‘‘रजाई छोड़ने का मन ही नहीं हो रहा है. लेकिन इस ठंड में तुम यहां कहां घूम रहे हो?’’
‘‘घूम नहीं रहा हूं. सुबह से तुम्हें देखा नहीं था. इसलिए इस ठंड में नहीं रहा गया तो तुम्हें देखने चला आया,’’ साहेब ने रिशा को लगभग घूरते हुए कहा, ‘‘सोचा था, तुम आग जलाए हाथ सेंक रही होओगी तो थोड़ी देर मैं भी उसी में हाथ सेंक लूंगा. लेकिन यहां तो हाल कुछ और ही है. लगता है, मुझ से ज्यादा तुम्हें गरमी की जरूरत है. अब तुम्हारी ठंड कुछ दूसरी ही तरह से दूर करनी पड़ेगी.’’
इतना कह कर साहेब ने रिशा के चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों के बीच ले लिया.
रिशा ने झटके से उस के हाथों को अलग किया और ठंडे हो गए गालों को हथेलियों से मलते हुए बोली, ‘‘तुम्हारे हाथ कितने ठंडे हैं, एकदम बर्फ हो रहे हैं.’’
‘‘रिशा, कुछ चीजें ऊपर से भले ही ठंडी लग रही हों, लेकिन अंदर से बहुत गरम होती हैं.’’ साहेब ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अगर मेरी बात पर विश्वास न हो तो कर के दिखाऊं. अभी मेरे ये ठंडे हाथ तुम्हें पलभर में गरम लगने लगेंगे.’’
साहेब की इस बात से रिशा के गाल शरम से लाल हो गए. उस ने आंखें मटका कर उसे प्यार से डांटते हुए कहा, ‘‘कितनी बार कहा कि इस तरह की बातें मुझ से मत किया करो. तुम्हें तो शरम आती नहीं. अपनी ही तरह दूसरे को भी बेशरम समझते हो.’’
‘‘तो फिर कैसी बातें किया करूं?’’ साहेब ने अपना चेहरा रिशा के चेहरे के एकदम पास ला कर उस की आंखों में आंखें डाल कर पूछा.
‘‘उस तरह की अच्छीअच्छी बातें, जैसी दूसरे लोग किया करते हैं.’’
‘‘भई प्रेम करने वालों की बातें कहीं से भी शुरू हों, अंत में वह वहीं पहुंच जाती हैं.’’
‘‘साहेब, अभी हम सिर्फ प्रेम करते हैं, हमारी शादी नहीं हुई है.’’
‘‘प्रेम हो गया है तो शादी भी हो जाएगी.’’
‘‘जब शादी हो जाएगी तब जो मन में आए, वह कर लेना.’’
‘‘जब प्रेम ही करना है तो चाहे शादी के पहले करो या बाद में, क्या फर्क पड़ता है.’’
रिशा को साहेब की इन बातों में मजा आने लगा था. इसलिए उस ने मुसकरा कर पूछा, ‘‘शादी के बाद कोई दूसरी तरह का प्यार किया जाता है क्या?’’
‘‘वह तो शादी के बाद ही पता चलेगा. लेकिन अगर तुम चाहो तो वह मैं प्यार शादी के पहले भी कर सकता हूं.’’ साहेब ने कहा.
‘‘फिर वही बात करने लगे.’’ रिशा ने आंखें तरेर कर नाराजगी व्यक्त की.
‘‘तुम भी तो उसी तरह की बातें कर रही हो.’’
रिशा साहेब की इस बात का जवाब देने ही जा रही थी कि हवा का तेज झोंका कमरे में घुसा तो ठंड से रिशा और साहेब, दोनों ही कांप उठे. रिशा ने रजाई को लपेटते हुए कहा, ‘‘लगता है, आज की ठंड जान ले कर ही मानेगी.’’
‘‘किसी की जान भले ही न जाए, लेकिन मेरी जरूर चली जाएगी.’’
‘‘वह कैसे?’’ ‘‘तुम तो रजाई ओढ़ कर बैठी हो, जबकि में खुले दरवाजे के सामने खड़ा ठंड से कांप रहा हूं.’’ साहेब ने कहा.
‘‘दरवाजा बंद कर के तुम भी रजाई में घुस जाओ.’’ रिशा ने जल्दी से कहा.
साहेब को इसी का तो इंतजार था. रिशा ने दरवाजा बंद करने को कहा था, इसलिए उस ने जल्दी से दरवाजा बंद कर के सिटकनी लगा दी. इस के बाद फुरती से रजाई में घुस गया और रिशा के हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘रिशा, तुम और तुम्हारी रजाई कितनी गरम है. अपनी तरह मुझे भी गरम कर दो न.’’
‘‘मेरी रजाई में तुम क्यों घुस आए?’’ रिशा हड़बड़ा कर बोली, ‘‘कोई आ गया तो बेकार में बात का बतंगड़ बनेगा.’’
‘‘रिशा, शायद तुम्हें पता नहीं कि प्यार में उन्हीं का नाम होता है, जो बदनाम होते हैं.’’
‘‘समझने की कोशिश करो साहेब,’’ रिशा ने कहा, ‘‘तुम लड़के हो, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा. लेकिन मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाऊंगी.’’
‘‘मैं चाहता भी यहीं हूं कि मेरे अलावा तुम्हारा मुंह कोई दूसरा न देखे. तुम्हारा यह मुंह सिर्फ मैं देखूं.’’ साहेब ने रजाई के अंदर ही रिशा को बांहों में भर कर कहा.
साहेब की इस हरकत से रिशा के शरीर में सिहरन सी दौड़ गई. साहेब के इस स्पर्श ने उसे इस तरह रोमांचित किया कि वह भी उस से लिपट गई. उस की पलकें लगभग मुंद सी गई थीं. साहेब ने इस का भरपूर लाभ उठाया और फिर वही हुआ, जो रिशा शादी के बाद करना चाहती थी.
उत्तर प्रदेश के जिला बाराबंकी के थाना रामसनेही घाट के गांव अंगदपुर बुढ़ेला में रहते थे मुंशी रावत. उस का भैंसों का कारोबार था. उस के परिवार में पत्नी राधा के अलावा 2 बेटियां और 2 बेटे थे. बड़ी बेटी आयशा का विवाह हो चुका था. रिशा हाईस्कूल में पढ़ रही थी. जबकि दोनों बेटे कैलाश और विमलेश अभी छोटे थे. वे भी पढ़ रहे थे.
बात उस समय की है, जब रिशा दसवीं में पढ़ रही थी. उस समय उस की उम्र 16 साल थी. जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही रिशा की खूबसूरती में एकदम से निखार आ गया था. उसे चाहने वालों की कमी नहीं थी. लेकिन उसे तो घनश्याम उर्फ साहेब भा गया था.
मुंशी रावत के मकान के बराबर वाले मकान में परशुराम रावत उर्फ परशू रहते थे. अगलबगल घर होने की वजह से दोनों परिवारों में खूब मेलजोल था. दोनों ही घरों के लोग एकदूसरे के घर बेरोकटोक आतेजाते थे. परशुराम की पत्नी का भतीजा था घनश्याम उर्फ साहेब. वह बाराबंकी के थाना असंद्रा के गांव देवीगंज का रहने वाला था. उस के पिता शंकरलाल रावत खेतीकिसानी करते थे. साहेब अकसर अपनी बुआ के यहां गांव अंगदपुर बुढ़ेला आताजाता रहता था.
इसी आनेजाने में उस की नजर खूबसूरत रिशा पर पड़ी तो पहली ही नजर में वह उसे दिल दे बैठा. जैसी लड़की की चाहत उस के दिल में थी, रिशा ठीक वैसी थी. रिशा का हसीन चेहरा उस की आंखों के रास्ते दिल में उतर गया.
साहेब को रिशा से मिलनेजुलने में वैसे भी कोई दिक्कत नहीं थी, क्योंकि उस की बुआ के घर वाले उस के यहां खूब आतेजाते थे. उन्हीं की वजह से वह भी रिशा के घर आनेजाने लगा. फिर जल्दी ही उस ने रिशा से दोस्ती गांठ ली. दोनों में खूब पटने लगी. वजह यह थी कि रिशा भी साहेब को पसंद करती थी. दोनों ही एकदूसरे को चाहते थे. इसलिए उन्हें इजहार करने में देर नहीं लगी.
दोनों घरों की छतें मिली थीं, इसलिए साहेब छत के रास्ते रिशा के पास पहुंच जाता था. इस के बाद छत पर बने कमरे में बैठ कर दोनों घंटों प्यार की बातें करते रहते. प्रेम के भंवर में डूबतीउतराती रिशा कहती, ‘‘साहेब, मैं ने तुम से प्यार ही नहीं किया, बल्कि तुम्हें अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया है. इस की लाज रखना. कभी मेरा दिल मत तोड़ना.’’
‘‘कैसी बात करती हो रिशा, तुम्हारा दिल अब मेरी जिंदगी है. हर कोई अपनी जिंदगी को संभाल कर रखता है.’’
‘‘इसी भरोसे पर तो मैं ने तुम से प्यार किया है. मन और आत्मा से वरण कर के सात जन्मों के लिए मैं तुम्हारी हो चुकी हूं. अब देखना है कि तुम किस हद तक अपना यह प्यार और वादा निभाते हो.’’
‘‘प्यार निभाने की कोई हद नहीं होती रिशा. प्यार और किया गया वादा निभाने के लिए मैं किसी भी हद तक जा सकता हूं.’’ साहेब ने रिशा को आश्वस्त किया.
‘‘पता नहीं, वह दिन कब आएगा, जब मैं पूरी तरह से तुम्हारी हो जाऊंगी.’’
‘‘विश्वास रखो रिशा, वह दिन जल्दी ही आएगा.’’ रिशा का हाथ अपने हाथों में ले कर साहेब ने कहा, ‘‘क्योंकि हमारी शादी में कोई अड़चन नहीं है. हम एक ही धर्मजाति के हैं. हमारा सामाजिक और आर्थिक स्तर भी एक जैसा है. सब से बड़ी बात तो यह कि हम दोनों एकदूसरे से प्यार करते हैं.’’
साहेब की बातें रिशा को यकीन दिलाती ही थीं, उसे खुद भी पूरा यकीन था कि उस की शादी में कोई अड़चन नहीं आएगी. इसलिए उसे अपने प्यार और भविष्य के प्रति कभी नकारात्मक विचार नहीं आते थे. उसे हर पल साहेब का इंतजार रहता था. उस के आते ही वह खुली आंखों से भविष्य के सपने देखने लगती थी.
तनहाई, 2 जवां दिल और किसी के आने का कोई डर न हो तो बहकने में देर नहीं लगती. कभीकभी रिशा और साहेब के भी दिल बहकने लगते, लेकिन रिशा जल्द ही संभल जाती. इस के बाद वह साहेब को भी बहकने से रोक लेती.
लेकिन संभलतेसंभलते भी उस रोज ठंड में न चाहते हुए भी रिशा बहक गई थी. इस के बाद तो रिशा को इस आनंद का चस्का सा लग गया था. उस आनंद को पाने के लिए वह हर वक्त उतावली रहने लगी थी. साहेब भी यही चाहता था.
जब दोनों तनहाई का ज्यादा ही फायदा उठाने लगे तो उन के इस मिलन की खुशबू फैलने लगी. पहले यह खुशबू पड़ोस वालों तक पहुंची. इस के बाद उन्होंने ही इसे मुंशी रावत तक पहुंचा दिया. वह तो सन्न रह गए.
मुंशी रावत दोनों पर नजर रखने लगे तो एक दिन उन्हें प्यार भरी बातें करते हुए रंगेहाथों पकड़ लिया. उन्हें देख कर साहेब तो चुपचाप खिसक गया, लेकिन रिशा की जम कर पिटाई हुई. मारपीट कर मुंशी ने उसे सख्त हिदायत दी, ‘‘आज के बाद साहेब अगर इस घर में आया या तू ने उस से कोई वास्ता रखा तो मैं तेरी जान ले लूंगा.’’
मुंशी की क्रोध से जलती आंखों को देख कर रिशा कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा सकी थी. डर के मारे उस ने अपनी आंखें मूंद ली थीं. मुंशी पैर पटकता हुआ चला गया था. बाप के जाने के बाद ही रिशा की जान में जान आई थी. अब उस पर कड़ी नजर रखी जाने लगी थी. जिस की वजह से रिशा और साहेब का मिलना असंभव हो गया था.
मुंशी रिशा की शादी साहेब से बिलकुल नहीं करना चाहता, इसलिए उस के लिए लड़के की तलाश में लग गया. क्योंकि अब इस के अलावा उस के पास कोई दूसरा उपाय नहीं था.
बाराबंकी के ही थाना रामसनेही घाट के गांव मुरारपुर के रहने वाला बालकराम रावत लखनऊ के थाना गाजीपुर के इंदिरानगर के बी ब्लाक में सपरिवार रहता था. वह लखनऊ विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय पर्यावरण केंद्र में चपरासी था. उस के परिवार में पत्नी, 3 बेटियां और 2 बेटे किशोर कुमार तथा सुमित कुमार थे.
किशोर विद्यांत कालेज से बीकौम की पढ़ाई कर रहा था. किशोर भले ही अभी पढ़ रहा था, लेकिन बालकराम उस की शादी कर देना चाहते थे. उस के लिए रिश्ते भी आ रहे थे. जब उस के बारे में मुंशी रावत को पता चला तो रिशा की शादी के लिए वह भी बालकराम के यहां जा पहुंचा. रिशा सुंदर तो थी ही, बालकराम को पसंद आ गई. उस ने शादी के लिए हामी भर दी.
4 फरवरी, 2014 को रिशा और किशोर कुमार का विवाह धूमधाम से हो गया. कुछ दिन ससुराल में रह कर रिशा मायके आ गई. अब उस की विदाई अप्रैल में नवरात्र में होनी थी. पिता के डर से रिशा शादी का विरोध नहीं कर पाई थी, और किशोर से शादी कर ली थी. लेकिन अभी भी उस के मन में साहेब ही था.
वैसे भी वह मात्र 3 दिन ही ससुराल में रही थी. इतने दिनों में वह पति को जितना समझ पाई थी, उस से उस ने यही अंदाजा लगाया था कि वह बहुत ही सीधासादा है. इसलिए रिशा को लगा कि पति से उसे कोई परेशानी नहीं होगी.
18 मार्च की शाम साढ़े 5 बजे के करीब बालकराम रावत के मोबाइल पर किसी अनजान ने फोन कर के कहा, ‘‘तुम अपने बेटे किशोर को ढूंढ रहे हो न? तुम्हारे बेटे की लाश चिनहट में मल्हौर रेलवे क्रासिंग के पास एक खाली प्लौट में पड़ी है, जा कर उसे ले आओ.’’
इतना कह कर उस आदमी ने फोन काट दिया था.
उस ने बालकराम को कुछ कहने का मौका नहीं दिया था, इसलिए उस ने कई बार वह नंबर मिलाया. लेकिन फोन बंद होने की वजह से फोन नहीं मिला.
किशोर के बारे में बालकराम को कुछ पता नहीं था, इसलिए उस ने तुरंत बेटे को फोन किया. लेकिन उस का फोन बंद था. फोन बंद होने से वह घबरा गया. उस ने पत्नी से पूछा कि किशोर कहां है तो पत्नी ने कहा, ‘‘किशोर एक बजे के करीब अपने किसी दोस्त घनश्याम से मिलने की बात कह कर घर से निकला था. उस के बाद से उस का कुछ पता नहीं है.’’
किसी अनहोनी की आशंका से बालकराम का दिल धड़क उठा. किशोर का फोन भी नहीं मिल रहा था कि वह उस से संपर्क करता. कोई रास्ता न देख वह तुरंत थाना कोतवाली चिनहट जा पहुंचा. इंसपेक्टर विजयमल सिंह यादव को पूरी बात बताई तो वह एसएसआई राजेश दीक्षित और कुछ सिपाहियों को साथ ले कर किशोर की तलाश में निकल पड़े.
मल्हौर क्रासिंग के पास एक खाली प्लौट में सचमुच किशोर की लाश पड़ी थी. किशोर का चेहरा बुरी तरह कुचला हुआ था. पास ही खून से सना एक भारी पत्थर पड़ा था. हत्यारे ने उसी पत्थर से उस के चेहरे पर प्रहार कर के उस की हत्या की थी. लाश के पास ही शराब और बीयर की बोतलें एवं प्लास्टिक के 2 गिलास पड़े थे. इस का मतलब था कि हत्यारे ने पहले किशोर को शराब पिलाई थी, साथ में खुद बीयर पी थी.
किशोर नशे में बेसुध हो गया होगा तो हत्यारे ने उसी भारी पत्थर से किशोर की हत्या कर दी थी. जवान बेटे की लाश देख कर बालकराम का बुरा हाल था. पुलिस वालों ने किसी तरह उन्हें संभाला और अपनी काररवाई आगे बढ़ाई.
निरीक्षण के बाद पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए लखनऊ मैडिकल कालेज भिजवा दिया. रंक्तरंजित पत्थर ही नहीं, वहां पड़ी सारी सामग्री पुलिस ने कब्जे में ले ली थी. इस के बाद कोतवाली चिनहट में बालकराम की ओर से अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया था.
इंसपेक्टर विजयमल सिंह यादव ने उस नंबर को सर्विलांस पर लगवा दिया, जिस से बालकराम को फोन कर के किशोर की लाश पड़ी होने की सूचना दी गई थी. इस के साथ ही उस की काल डिटेल्स और लोकेशन भी निकलवाई गई. उस फोन की आईडी निकलवाई गई तो पता चला कि वह फोन बाराबंकी के थाना असंद्रा के गांव देवीगंज सूरजपुर के रहने वाले एक नाई का था.
पुलिस ने वहां जा कर नाई से पूछताछ की तो उस ने बताया कि जिस दिन की घटना है, उसी दिन उस का मोबाइल चोरी हो गया था. पुलिस ने आसपास वालों से पूछताछ की तो उन लोगों ने बताया कि नाई सच बोल रहा है. मोबाइल चोरी होने के बाद उस ने तमाम लोगों से यह बात बताई थी. फिर वह दुकान छोड़ कर कहीं गया भी नहीं था.
अब तक यह साफ हो चुका था कि किशोर की हत्या उसी आदमी ने की थी, जिस ने नाई का मोबाइल फोन चुराया था. यह निश्चित था कि नाई का मोबाइल वहीं के किसी आदमी ने चुराया होगा. पुलिस ने नाई से पूछताछ की तो उस ने कई नामों पर शक व्यक्त किया. उन्हीं में एक नाम घनश्याम उर्फ साहेब का भी था.
पूछताछ में बालकराम ने पुलिस को बताया था कि घर से निकलते समय किशोर ने अपने किसी घनश्याम नाम के दोस्त से मिलने की बात कही थी. पुलिस ने तुरंत घनश्याम के बारे में पता किया. पता चला वह घर में नहीं है. पुलिस ने घरवालों से उस का मोबाइल नंबर ले लिया. जब उस के नंबर की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई गई तो पता चला कि उस के फोन की भी लोकेशन उस स्थान की थी, जहां किशोर की हत्या हुई थी.
इस के अलावा जहांजहां की नाई के फोन की लोकेशन थी, वहांवहां घनश्याम उर्फ साहेब के फोन की भी लोकेशन थी. अब शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी. साफ हो गया था कि घनश्याम ही किशोर का हत्यारा है. किशोर की कुछ ही दिनों पहले उस से दोस्ती हुई थी.
अभी जल्दी ही किशोर की शादी बाराबंकी में हुई थी. घनश्याम बाराबंकी का था, इस से पुलिस को लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि किशोर की पत्नी घनश्याम को जानती हो. उस का घनश्याम से प्रेमप्रसंग रहा हो, जिस की वजह से किशोर मारा गया हो.
इंसपेक्टर विजयमल यादव ने किशोर की नवब्याहता रिशा से पूछताछ की तो उस ने घनश्याम से अपने प्रेमप्रसंग की बात स्वीकार कर ली. उस ने यह भी बताया कि घनश्याम ने उस से कहा भी था कि वह किशोर को किसी भी सूरत में नहीं छोड़ेगा.
इस के बाद 21 मार्च को इंसपेक्टर विजयमल यादव ने टीम के साथ बाराबंकी जा कर घनश्याम उर्फ साहेब को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. उस की निशानदेही पर उस के घर से पुलिस ने किशोर का मोबाइल फोन भी बरामद कर लिया था.
कोतवाली ला कर घनश्याम से पूछताछ की गई तो उस ने किशोर की हत्या का अपराध स्वीकार कर के उस की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.
रिशा की शादी हो जाने से घनश्याम उर्फ साहेब काफी बौखलाया हुआ था. क्योंकि वह रिशा से दूरी किसी भी हाल में बरदाश्त नहीं कर पा रहा था. जब साहेब को पता चला कि रिशा मायके आई है तो वह उस से मिलने को बेताब हो उठा. उसे रिशा से अपने सवालों के जवाब लेने के साथ अपना फैसला भी सुनाना था.
रिशा को पता चला तो वह साहेब से मिली. तब साहेब ने उस की आंखों में आंखें डाल कर बेचैनी से पूछा, ‘‘रिशा, जब तुम प्यार मुझ से करती थी तो शादी दूसरे से क्यों कर ली?’’
‘‘मैं एक लड़की हूं, इसलिए घर वालों का विरोध नहीं कर सकी. अगर शादी से मना करती तो पापा मुझे जिंदा नहीं छोड़ते. तब मैं तुम से बहुत दूर चली जाती. हमारे मिलन का सपना अधूरा ही रह जाता.’’
‘‘वैसे भी हमारा मिलन कहां हो रहा है?’’ निराश साहेब ने कहा.
‘‘होगा, जरूर होगा. शादी होने के बावजूद मैं तुम्हारा साथ नहीं छोड़ूंगी. हम दोनों के संबंध पहले की ही तरह चलते रहेंगे.’’ रिशा ने समझाया.
‘‘नहीं रिशा, तुम मेरी हो और सिर्फ मेरी ही रहोगी. मैं तुम्हें किसी और की बांहों में नहीं देख सकता. इसलिए मैं उसे जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’’
‘‘नहीं साहेब, उस के साथ कुछ मत करना. उस का इस में क्या दोष है?’’ रिशा ने कहा.
लेकिन साहेब ने उस की बात पर ध्यान नहीं दिया. क्योंकि उस ने तो ठान लिया था कि वह अपने और रिशा के बीच किसी को नहीं आने देगा. यही वजह थी कि उस ने किशोर की हत्या की योजना बना डाली. उसी योजना के तहत उस ने किशोर से दोस्ती गांठ ली. दोस्ती होने के बाद दोनों की शराब की महफिलें जमने लगीं.
किशोर को घनश्याम के बारे में कुछ पता तो था नहीं, इसलिए वह उस पर एक दोस्त की तरह ही विश्वास करने लगा था.
14 मार्च को साहेब नाई की दुकान पर बाल कटवाने गया तो काउंटर पर रखे नाई के मोबाइल को देख कर उस की नीयत खराब हो गई. उसे इस तरह के एक मोबाइल की जरूरत भी थी, जिस से फोन कर के वह किशोर को कहीं एकांत में बुला सकें.
क्योंकि वह जानता था कि अगर उस ने अपने मोबाइल से फोन किया तो पकड़ा जाएगा. उस ने नाई को कुछ खरीदने के बहाने बाहर भेज दिया और उस के जाते ही उस का मोबाइल ले कर निकल आया. यह मोबाइल किशोर की हत्या की योजना का एक अहम हिस्सा था.
18 मार्च की दोपहर एक बजे साहेब ने चोरी के मोबाइल से किशोर को फोन कर के पौलिटेक्निक चौराहे पर बुलाया. उस से मिलने के लिए घर से निकलते समय किशोर ने मां को बता दिया था कि वह अपने दोस्त घनश्याम से मिलने जा रहा है. वह पौलिटेक्निक चौराहे पर पहुंचा तो घनश्याम वहां उस का इंतजार करता मिला. घनश्याम उसे साथ ले कर सिटी बस से चिनहट आ गया.
घनश्याम ने शराब की एक दुकान से किशोर के लिए शराब और अपने लिए बीयर खरीदी. घनश्याम उसे छोटा भरवारा मल्हौर रेलवे क्रासिंग के पास ले गया और वहां एक खाली पड़े प्लौट में बैठ गया.
घनश्याम ने किशोर को शराब पिलाई, जबकि खुद बीयर पी. शराब पिलाने के बाद उस ने किशोर को साथ लाई भांग भी खिला दी. इस के बाद नशे की अधिकता की वजह से किशोर की आंखें मुंदने लगीं.
घनश्याम ने कहा, ‘‘लगता है, नशा ज्यादा हो गया है. ऐसा करो, लेट कर कुछ देर सो लो. नशा कम हो जाए तो घर चले जाना.’’
किशोर वहीं घास पर लेट गया और कुछ ही देर में बेसुध हो गया. इस के बाद घनश्याम ने वहीं पडे़ भारी पत्थर को उठाया और किशोर के चेहरे पर पटक दिया. इस के बाद उस ने कई बार ऐसा किया. ऐसा करने से किशोर की मौत हो गई. इस तरह किशोर की हत्या कर वह वहां से चला गया.
बाराबंकी जाते हुए घनश्याम ने रास्ते से किशोर के पिता बालकराम को फोन कर के किशोर की लाश के बारे में बता कर उसे वहां से लाने के लिए कह दिया था. इस के बाद उस ने चोरी किए गए मोबाइल से सिम निकाल कर तोड़ दिया और उस के साथ मोबाइल को फेंक दिया.
घनश्याम ने किशोर की हत्या में होशियारी तो बहुत दिखाई, लेकिन उस ने जो होशियारी दिखाई थी, उसी की वजह से पकड़ा गया. उस ने चोरी के मोबाइल के साथ अपना निजी मोबाइल भी साथ रखा था, जिस का उस ने स्विच औफ नहीं किया था. यही गलती उसे भारी पड़ गई.
पूछताछ के बाद पुलिस ने घनश्याम उर्फ साहेब को सीजेएम आनंद कुमार की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Murder Mystery
— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.
— 2014 में प्रकाशित






