Rebirth Mystery Story. आदमखोर तेंदुए के शिकार की ताक में बैठे तोमर परिवार का बेटा मयंक अंधेरे में नीचे गिर कर तेंदुए का शिकार बन गया था. मृतक की मां सुभाषिनी ने यह केस एक प्राइवेट जासूस को सौंपा तो पता चला, वह गिरा नहीं था बल्कि उस की हत्या की गई थी. साथ ही और भी कई रहस्य खुले.
खबर इतनी चौंकाने वाली थी कि उन की नाक पर अटका हुआ चश्मा गिरतेगिरते बचा. उन्होंने अखबार को कस कर पकड़ते हुए खबर को फिर से पढ़ना शुरू किया.
‘मयंक ने पुनर्जन्म लिया.’ शीर्षक को उन्होंने 2-3 बार पढ़ा. खबर में छपा था, ‘शहर के कपड़ा व्यवसायी मनोहर अग्रवाल का 6 वर्षीय पुत्र रजत अपने आप को पूर्व जन्म का मयंक बताता है. उस का कहना है कि वह पिछले जन्म में नाहरगढ़ निवासी बलराम तोमर का पुत्र मयंक था. सुबूत के तौर पर उस ने कई घटनाएं बयान की हैं. उस का कहना है कि उस का घर नाहरगढ़ में है और उस के मातापिता और पत्नी सुरबाला उस का इंतजार कर रहे होंगे. वह रोजाना नाहरगढ़ जाने की जिद करते हुए अपने मांबाप से कहता है कि अगर उसे उस के असली घर नहीं पहुंचाया गया तो वह खुद ही वहां चला जाएगा.’
तोमर साहब इस के आगे नहीं पढ़ सके. वे अखबार थामे घर के अंदर दौड़े.
‘‘अरे कहां हो तुम…’’ उन्होंने असंयत आवाज में अपनी पत्नी सुभाषिनी को पुकारा, ‘‘जरा यह समाचार पढ़ो.’’ वे ड्राइंगरूम में दाखिल हुए, तो सुभाषिनी टी.वी. देखने में तल्लीन थीं.
‘‘टीवी बाद में देखना, पहले यह खबर पढ़ो.’’ तोमर साहब ने अखबार पत्नी के आगे फैला दिया.
‘‘आप पहले टीवी देखिए…’’ सुभाषिनी ने अखबार पर ध्यान न दे कर कंपकंपाती आवाज में कहा, ‘‘देखिए, क्या आ रहा है.’’
तोमर साहब ने अखबार को भूल कर टीवी की ओर देखा.
‘‘पुनर्जन्म की ऐसी रोमांचक घटना इस के पहले आप ने शायद ही कहीं देखीसुनी होगी.’’ टीवी पर रिपोर्टर की पुरजोर आवाज गूंज रही थी.
‘‘अद्भुत बच्चा है रजत… रजत तुम्हारा नाम क्या है?’’ रिपोर्टर ने पास बैठे बच्चे की ओर माइक बढ़ाया तो टीवी स्क्रीन पर फैले उस के चेहरे का क्लोजअप तैश से भर उठा. वह झुंझलाते हुए बोला, ‘‘कितनी बार बताऊं आप को? मैं ने कहा न, मेरा नाम रजत नहीं, मयंक है. मयंक तोमर.’’
‘‘और आप के मातापिता का नाम?’’ रिपोर्टर ने अगला प्रश्न किया. ‘‘बलराम तोमर और सुभाषिनी.’’ बच्चे ने झटके से जवाब दिया.
‘‘सुना आप ने.’’ सुभाषिनी का गला भर्रा गया, ‘‘हमारा लाडला लौट आया…’’ कहती हुई वे बाहर को भागीं. तोमर साहब स्तब्ध खड़े हुए थे. पूरा माजरा अकल्पनीय सा था.
‘‘बहू… ओ बहू…’’ सुभाषिनी ने उत्तेजित स्वर में पुकारते हुए जोरों से बाथरूम का दरवाजा खटखटाया.
मिनट भर बाद बाथरूम का दरवाजा खुला और अधभीगे कपड़ों में बाहर झांकती सुरबाला ने सुभाषिनी के ऊपर नजरें जमाते हुए पूछा, ‘‘क्या हुआ अम्मां? आप इतनी परेशान क्यों हैं?’’
‘‘चल कर पहले टीवी देखो,’’ वे सुरबाला को लगभग घसीटती हुई ड्राइंगरूम की ओर ले गईं. टीवी पर अभी भी वही समाचार चल रहा था. तोमर साहब पूर्ववत आंखें फाड़े समाचार देख रहे थे.
संवाददाता की आवाज गूंज रही थी, ‘‘विश्वास करना कठिन है, लेकिन सच यह है कि हर तरह से यह साबित हो रहा है कि कल का मयंक ही आज का रजत है…’’
अब तक सुरबाला की भी समझ में सब कुछ आ गया था. इस खबर को देखसुन कर उस का मुंह खुला रह गया और वह खुद को संभलने के लिए अपना हाथ सोफे के किनारे पर टिका कर खड़ी हो गई.
सुभाषिनी बाहर निकल गई थीं. वे वापस लौटीं तो साथ में उन के देवर धुरंधर भी थे.
‘‘भाभी, आप इन टीवी वालों को नहीं जानतीं. विज्ञापन हासिल करने के लिए ये उलटीसीधी खबरें फैलाते रहते हैं. कितने दुख की बात है कि ये अंधविश्वास से लड़ने के बजाय ऐसी बातों को बढ़ावा दे रहे हैं…’’ धुरंधर तोमर भाभी के मुंह से यह खबर सुन कर गुस्से में बोले, ‘‘आप तो पढ़ीलिखी हैं फिर भी…’’
‘‘पहले आप खबर तो देख लीजिए.’’ सुभाषिनी ने उन से बैठक में चलने का आग्रह किया.
‘‘ननकू, हमारा मयंक वापस आ गया.’’ तोमर साहब छोटे भाई को देखते ही खुशी से चिल्ला उठे.
‘‘टीवी वालों की इस बकवास से मैं सहमत नहीं हूं बड़े भैया.’’ धुरंधर बेलाग स्वर में बोले, ‘‘भाभी तो शायद अपनी ममता के चलते अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं कर रहीं, कम से कम आप तो…’’
‘‘तुम कहना क्या चाहते हो ननकू?’’ उन्होंने छोटे भाई को झिड़कने वाले अंदाज में कहा, ‘‘टीवी वाले, अखबार वाले और वहां मौजूद सारे लोग अंधविश्वास फैला रहे हैं? और अगर इसे सच भी मान लिया जाए तो सवाल यह है कि ये बच्चा इस कैसे वो सारी बातें बता रहा है, जो एकदम सच हैं.’’
‘‘मुझे तो ये कोई साजिश लग रही है. जरूर इस के पीछे कोई खतरनाक इरादे वाला शख्स है.’’ धुरंधर बोले.
‘‘पहले ठीक से खबर तो देख लो ननकू. सच्चाई को समझने की कोशिश करो… आखिर वहां हमारा कौन दुश्मन बैठा है, जो साजिश…’’
‘‘इस का पता तो पुलिस ही लगाएगी कि वह शातिर शख्स कौन है, जिस की निगाह हमारी जायदाद पर जमी हुई है.’’
‘‘इस सब से हमारी जायदाद का क्या लेनादेना है?’’ तोमर साहब छोटे भाई की बात सुन कर हैरान हुए.
‘‘आप कितने भोले हैं बड़े भैया.’’ धुरंधर बड़े भाई की बुद्धि पर तरस सा खाते हुए बोले, ‘‘यह लड़का जो मयंक होने का दावा कर रहा है, कल को हमारी संपत्ति का वारिस नहीं बन बैठेगा?’’
तोमर साहब के माथे पर बल पड़ गए, शायद इस पहलू की ओर उन्होंने अभी तक ध्यान नहीं दिया था.
‘‘आप देखिए टीवी, मैं तो कोतवाली जा रहा हूं.’’ कहते हुए धुरंधर बाहर निकल गए.
इंस्पेक्टर अनिल कार्तिकेय ने एसपी के औफिस में प्रवेश किया तो एस.पी. साहब बड़े गौर से एक फाइल देख रहे थे, जिस में अखबारों की कतरनें लगी हुई थीं.
‘‘सर, आप ने मुझे बुलाया?’’ इंसपेक्टर की आवाज से उन का ध्यान भंग हो गया.
‘‘ये त्रिलोचन कौन है? और उस का असली कामधंधा क्या है?’’ एसपी ने नजरें उठा कर अनिल की ओर देखते हुए पूछा.
‘‘त्रिलोचन…?’’ ‘‘वही जो अपने आप को जासूस कहता है…’’
‘‘अच्छा, आप त्रिलोचनजी की बात कर रहे हैं, वो तो बहुत सम्मानित व्यक्ति हैं सर.’’
‘‘आप का ये सम्मानित व्यक्ति एक रईस आदमी के खिलाफ साजिश कर रहा है.’’ ‘‘जी?’’ इंस्पेक्टर अनिल चौंके.
‘‘ऐसा क्या किया है चाचाजी ने?’’ ‘‘अच्छा, तो त्रिलोचन आप के चाचा हैं?’’ एस.पी. की सख्त नजर इंसपेक्टर अनिल के चेहरे पर जम गई.
‘‘नहीं सर, मेरा मतलब वो…’’
‘‘सुनो इंस्पेक्टर, पुलिस की वर्दी पहनने के बाद सारे रिश्तेनाते भूल जाना चाहिए. हमारा काम है कानून तोड़ने वालों को सलाखों के पीछे भेजना.’’ एसपी का स्वर काफी सख्त था.
‘‘उन्होंने कानून तोड़ा है?’’
‘‘तोड़ने वाला है.’’ एसपी साहब इंस्पेक्टर को कतरन वाली फाइल थमाते हुए बोले, ‘‘लगता है आप को न तो अखबार पढ़ने का वक्त मिलता है, न ही टीवी देखने का.’’
‘‘जी हां सर, ड्यूटी के चलते कभीकभी…’’
‘‘आई सी. तो कल आप को ये ड्यूटी नाहरगढ़ में करनी है, जहां त्रिलोचन पूरे तामझाम के साथ रजत नाम के लड़के को ले कर पहुंचने वाला है. वो ये साबित करने की कोशिश कर रहा है कि रजत नाहरगढ़ के जानेमाने व्यक्ति बलराम तोमर का पुत्र मयंक है, वो मयंक जो सालों पहले मर चुका है.’’
‘‘लेकिन सर, हमारे पास ऐसी कोई शिकायत…’’
‘‘शिकायत इसी फाइल में है.’’ पुलिस अधीक्षक ने फाइल अनिल के हाथ में थमाते हुए कहा, ‘‘बलराम तोमर के छोटे भाई धुरंधर तोमर ने लिखित में शिकायत की है.’’
गाडि़यों का काफिला नाहरगढ़ पहुंचा तो लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी. आसपास के गांवों के भी हजारों लोग आ गए थे. सभी रजत की एक झलक पाने को बेताब थे.
आगे वाली गाड़ी रुकी और रजत, उस के मातापिता तथा त्रिलोचन के उतरते ही उन्हें पत्रकारों और टीवी चैनलों के रिपोर्टरों और फोटोग्राफर्स ने घेर लिया. लगातार चमकते फ्लैशों के बीच लाइव रिपोर्टिंग शुरू हो गई. रजत के ‘दर्शनार्थियों’ की भीड़ पत्रकारों से भी ज्यादा बेताब थी जिस के शोर में कुछ भी ठीकठीक समझ पाना संभव नहीं था. तभी पुलिस की जीप आ पहुंची. जीप के रुकते ही कई सिपाही फुर्ती से नीचे उतरे और लोगों को धकियाते हुए रास्ता बनाने लगे.
‘‘चाचाजी, मुझे माफ करिएगा.’’ इंसपेक्टर अनिल ने आगे बढ़ कर त्रिलोचन का रास्ता लगभग रोकते हुए कहा, ‘‘मैं आप को यह सब नहीं करने दूंगा.’’
‘‘क्या नहीं करने देंगे इंस्पेक्टर साहब?’’ त्रिलोचन हैरान रह गए.
‘‘इस तरह से किसी के घर में घुसना गलत है, अतिक्रमण है ये…’’
‘‘इन लोगों को गिरफ्तार कर लीजिए दरोगाजी, ये हमारे खिलाफ साजिश करने आए हैं…’’ अचानक एक तेज आवाज गूंज उठी. त्रिलोचन ने मुड़ कर देखा, सफेद कुर्ता धोती पहने एक ऊंचातगड़ा एक आदमी भीड़ को चीर कर उन के सामने आ खड़ा हुआ. उस ने कंधे पर दोनाली बंदूक टांग रखी थी.
त्रिलोचन और अनिल कुछ कहने ही वाले थे कि रजत अपनी मां से हाथ छुड़ा कर दौड़ा और उस व्यक्ति से जा कर लिपट गया.
‘‘चाचा, मैं आ गया…’’ रजत की आवाज में खुशी उमड़ी पड़ रही थी. वह व्यक्ति कुछ कहता या पूछता, इस के पहले ही रजत अपने मातापिता से मुखातिब हुआ, ‘‘मम्मी… पापा… ये मेरे चाचा हैं. धुरंधर चाचा.’’
धुरंधर तोमर के चेहरे पर हैरानगी उभर आई. वे चाह कर भी बच्चे को झिड़क नहीं सके.
‘‘आप ने इस बच्चे को आज से पहले कभी देखा है?’’ इंसपेक्टर अनिल ने पूछा. ‘‘नहीं, कभी नहीं.’’ धुरंधर के मुंह से निकला.
‘‘इस के मांबाप को जानते हैं?’’ ‘‘नहीं.’’
‘‘तो फिर ये आप को कैसे जानता है?’’ धुरंधर कुछ कह पाते, इस के पहले ही एक महिला टीवी रिपोर्टर की आवाज गूंज उठी, ‘‘देखा आप ने, रजत यानी मयंक ने अपने पिछले जन्म के चाचा को पहचान लिया… उन्हें पहचान लिया, जिन से वह इस जन्म में पहली बार मिला है…’’
‘‘जाहिर है, आप मुझे भी नहीं जानते?’’ त्रिलोचन धुरंधर की ओर उन्मुख हुए. ‘‘बिलकुल नहीं.’’
‘‘तो फिर आप किस आधार पर कह रहे हैं तोमर साहब कि आप के खिलाफ ये लोग साजिश कर रहे हैं?’’ इंसपेक्टर अनिल से नहीं रहा गया.
‘‘ये तमाशा साजिश नहीं तो और क्या है?’’ धुरंधर को गुस्सा आ गया.
‘‘तो फिर आप इस का पर्दाफाश क्यों नहीं कर देते?’’ त्रिलोचन के स्वर में चुनौती थी.
‘‘मैं ने पुलिस को इसीलिए यहां बुलाया है.’’
‘‘तो फिर ठीक है, पुलिस के सामने सारी जांचपड़ताल हो जाने दीजिए, सच्चाई सामने आ जाएगी.’’ कहते हुए त्रिलोचन अनिल की ओर मुड़े, ‘‘अगर यह सचमुच पूर्वजन्म का मयंक है, तो यह इस अंजान गांव में हम सब को अपने पिछले जन्म के घर जरूर ले चलेगा.’’
अनिल ने मौन सहमति दी.
‘‘मयंक, अपने घर चलो.’’ त्रिलोचन का इशारा पाते ही रजत बेधड़क एक ओर बढ़ गया. उस के पीछे विशाल जनसमुदाय था, साथ में शोर मचाते हुए दौड़ रही थी टीवी रिपोर्टरों की टोली.
सचमुच कमाल ही हो गया. रजत बेखौफ अपने पूर्व जन्म के घर में जा घुसा. उस ने अपने मातापिता यानी बलराम तोमर और सुभाषिनी को न केवल पहचाना, बल्कि उन से लिपट कर खूब रोया भी. उस ने अपनी चाची यानी धुरंधर तोमर की पत्नी सुखदेवी और दूसरे परिजनों को भी आसानी से पहचान लिया.
हद तो तब हो गई, जब उस ने सैकड़ों लोगों के बीच बैठी अपनी पत्नी सुरबाला को जा पहचाना. फिर भी सुरबाला को यकीन न हुआ, धुरंधर तोमर की तरह उस के भी मन में अविश्वास के बादल घुमड़ रहे थे.
‘‘मुझे ऐसे विश्वास नहीं होगा. मुझे ऐसी कोई बात बताओ, जिसे मेरे अलावा सिर्फ मेरे पति जानते थे.’’ उस की अविश्वास भरी नजरें रजत के मासूम चेहरे पर ठहर गईं.
वह कई पलों तक कुछ सोचता रहा, फिर अचानक बोला, ‘‘तुम्हारी पीठ पर नीचे की ओर दाहिनी तरफ एक तिल है.’’
सुन कर सुरबाला भौंचक्की सी रह गई. यह सुन कर वहां मौजूद तमाशबीनों के मुंह भी खुले रह गए. फिर न जाने क्या हुआ कि सुरबाला रजत को गोद में उठा कर रो पड़ी.
‘‘तुम मुझे छोड़ कर क्यों चले गए थे…?’’ उस के आंसू उमड़उमड़ कर बहने लगे.
सब से मिलनेमिलाने के बाद रजत उसी शाम अपने मातापिता के साथ शहर लौट गया. वह सुरबाला से वादा कर गया था कि अगले हफ्ते फिर आएगा. उस रात बलराम तोमर के घर में कोई भी नहीं सो पाया. रजत अनेक झंझावात छोड़ गया था, जिन्होंने तोमर परिवार को सारी रात जगाए रखा.
बलराम तोमर खानदानी रईस थे. दोनों भाइयों का संयुक्त परिवार था. तीन सौ एकड़ जमीन के अलावा एक चीनी मिल भी उन की मिल्कियत में शामिल थी. दोनों भाइयों के बीच सिर्फ एक चश्मओचिराग था, धुरंधर तोमर का 6-7 वर्षीय पुत्र सुकुमार. रजत उसे इसलिए नहीं पहचान पाया था, क्योंकि उस का जन्म मयंक की मौत के कई साल बाद हुआ था.
मयंक की मौत की वह रात सुरबाला को आज भी ज्यों की त्यों याद थी.
तोमर परिवार ने एक एडवेंचर प्रोग्राम बनाया था जिस में महिलाओं को भी शामिल किया गया था. उसी के तहत सुरबाला अपने पति, सासससुर व चचिया ससुर धुरंधर के साथ शिकार पर गई थी. यह उस के लिए पहला और आखिरी एडवेंचर था. सुखनई के जंगल में उन दिनों एक आदमखोर तेंदुए ने आतंक मचा रखा था. वह 20 किलोमीटर के दायरे में कई इंसानी जिंदगियां लील चुका था. इसी वजह से सरकार ने तोमर परिवार को उसे मारने की इजाजत दी थी.
तेंदुए को मारने के लिए तोमर परिवार ने जंगल में तीन मचान बनाए थे. अंधेरा घिरतेघिरते सभी लोग मचानों पर चढ़ कर बैठ गए. नीचे चारे के तौर पर एक बकरा बांध दिया गया था, जो बराबर मिमियाए जा रहा था.
जिस मचान पर सुरबाला और मयंक बैठे हुए थे, उस के ठीक सामने वाले मचान पर उस के साससुर यानी बलराम तोमर ओर सुभाषिनी बैठे हुए थे. धुरंधर तोमर का मचान उन से लगभग 20 फुट दूर बाईं ओर था. तीनों मचानों के नीचे बंधा बकरा साफ नजर आ रहा था, लेकिन जैसेजैसे अंधेरा घिरता गया, बकरे का अक्स धूमिल होता गया.
रात गहराने लगी थी, सुरबाला की पलकें नींद से बोझिल हो गई थीं. वह अपने आप को जगाए रखने की भरसक कोशिश कर रही थी. बकरा पता नहीं क्यों खामोश हो गया था. तभी अचानक गोली चलने, तेंदुए के गरजने और मयंक के नीचे गिरने की घटनाएं एक साथ घटीं.
तेंदुआ मयंक को बुरी तरह भंभोड़ने में लगा हुआ था. इतना दिल दहलाने वाला दृश्य था कि सुरबाला के हाथ से टार्च छूट कर नीचे गिर गई. इस के बाद किसी ने गोली नहीं चलाई. तेदुआ मयंक को खींचता हुआ जंगल में गायब हो गया. जब उन लोगों को होश आया तो ताबड़तोड़ हवाई फायरिंग की गई. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. रात भर उन लोगों की नीचे उतरने की भी हिम्मत नहीं हुई.
सुबह को उन लोगों ने मयंक की तलाश में वन विभाग वालों और पुलिस के साथ जंगल छान मारा, लेकिन नाकामी ही हाथ लगी. सुरबाला का रोरो कर बुरा हाल हो गया था. बाद में भी काफी खोजबीन की गई पर मयंक की लाश नहीं मिली.
उस हादसे को कई साल बीत गए थे. लेकिन आज अचानक रजत के रूप में मयंक सुरबाला के सामने आ गया था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि उसे देख कर खुश हो या दुखी.
सुरबाला अभी पुरानी यादों से उबर भी नहीं पाई थी कि उस का मोबाइल बज उठा. उस ने उठने की कोशिश करते हुए मोबाइल कान से लगा लिया.
‘‘सुरबाला जी,’’ उधर से आवाज आई, ‘‘त्रिलोचन बोल रहा हूं, आप सुन रही हैं न?’’ ‘‘जी, जी हां.’’
‘‘आप की जान को खतरा है. अपने कमरे के दरवाजे और खिड़कियां ठीक से बंद कर लीजिए और बाहर मत निकलिएगा.’’ इस के साथ ही संपर्क टूट गया.
सुरबाला चेतावनी को ठीक से समझ भी नहीं पाई थी कि उस ने किसी को अंदर आते देखा. उस काली छाया के हाथ में हथियार जैसी कोई चीज मौजूद थी.
सुरबाला भयभीत हो कर जोर से चीखी और गिरतीपड़ती दूसरे दरवाजे से निकल कर सीढि़यों की ओर भागी. छाया हथियार ताने हुए उस के पीछे झपटी. लेकिन सास के कमरे में चली जाने की वजह से वह बच गई.
त्रिलोचन के 2 बेटे थे, नीरव और विप्लव. उन्होंने उन दोनों को अपने जासूसी के पेशे से जोड़ रखा था. विप्लव और नीरव अपनेअपने तरीके से पिता की मदद करते थे.
नीरव ने अपने सामने बैठे व्यक्ति का गौर से मुआयना किया और अपने शब्दों पर जोर देते हुए बोला, ‘‘मेजर चौहान, आप उस रात कहां थे जिस समय मयंक की हत्या हुई थी?’’
‘‘अपने घर पर, और कहां?’’
‘‘लेकिन हमारी तफ्तीश बताती है कि आप उस रात सुखनई के जंगल में मौजूद थे…’’ नीरव ने देखा, चौहान चौंक गए थे. नीरव ने बिना मौका दिए अगला सवाल दाग दिया, ‘‘क्या करने गए थे वहां?’’
‘‘शिकार…’’ ‘‘जानवर का या इंसान का?’’
‘‘व्हाट डू यू मीन?’’ मेजर तैश में आ कर चिल्ला पड़े, ‘‘ठीक है, आप जासूस हैं. लेकिन इस का मतलब ये नहीं है कि आप मेरे ऊपर कोई भी आरोप लगा दें.’’
नीरव पर उन के चिल्लाने का कोई असर नहीं पड़ा. उस ने अपने बैग में हाथ डाल कर एक रिवाल्वर निकाली और सामने पड़ी मेज पर रख दी. रिवाल्वर बुरी तरह जंग लगी हुई थी. उसे देख मेजर के चेहरे पर विचित्र भाव उभर आए.
‘‘यह हथियार हमें उसी जंगल में मिला है और मुझे यकीन है कि यह आप का वही लाइसेंसी रिवाल्वर है, जिस की गुमशुदगी की रिपोर्ट आप ने जीतपुर थाने में दर्ज कराई थी. इस के चैंबर में अभी भी 2 खाली कारतूस मौजूद हैं. निस्संदेह आप को इस बात की जानकारी होगी कि उस रात उस जंगल में एक इंसान की जान चली गई थी.’’
मेजर के चेहरे का रंग उड़ गया, वह कुर्सी पर गिर से पड़े. नीरव ने उन से पूछताछ जारी रखी.
त्रिलोचन कहीं जाने के लिए तैयार हो चुके थे और बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे. तभी उन्होंने सामने बैठी पत्नी से पूछा, ‘‘विप्लव कहां है?’’ ‘‘साहबजादे सो रहे हैं.’’
‘‘आप उसे बिगाड़ रही हैं, यह कोई सोने का वक्त है?’’ त्रिलोचन को गुस्सा आ गया. वह चाय का प्याला थामे विप्लव के कमरे में जा पहुंचे. उन्होंने झटके से बेटे के ऊपर से चादर खींच ली. उसी वक्त गर्म चाय की कुछ बूंदें छलक कर विप्लव की पीठ पर गिर गईं.
‘‘आ…’’ विप्लव बौखला कर उठ बैठा और अपनी पीठ सहलाने लगा. ‘‘मैं ने तुम्हें एक काम दिया था?’’
‘‘डैड, आज आप का काम हो जाएगा. लेकिन रिमाइंड करवाने का आप का ये तरीका कुछकुछ पुलिसवालों की थर्ड डिग्री जैसा है. प्लीज, आगे से ऐसा मत करिएगा.’’
त्रिलोचन मुसकुराते हुए बाहर निकल गए. चाय का प्याला उन्होंने मेज पर रखा और अपना बैग ले कर चले गए. उन का रुख बर्नेट अस्पताल की ओर था.
अस्पताल में त्रिलोचन को अपने टारगेट तक पहुंचने में देर नहीं लगी.
‘‘बड़े मियां, मैं ने सुना है कि आप शायरी बहुत अच्छी करते हैं.’’ त्रिलोचन ने बर्नेट अस्पताल के उस बूढ़े क्लर्क की तारीफ की. साथ ही वह बारीकी से उस रजिस्टर के पन्ने भी निहार रहे थे, जिस के आधे से ज्यादा पृष्ठ जर्जर हो गए थे.
‘‘अमां लानत भेजिए हुजूर.’’ वह रद्दी की टोकरी में पीक थूकता हुआ बोला, ‘‘कम्बख्त ये भी कोई करने लायक काम है.’’
त्रिलोचन समझ गए कि जश्न अली बहुत काइयां है और उन के ऊपर निगाह जमाए हुए है. उस के रहते कुछ संभव नहीं होगा.
‘‘मुआफ करिएगा, एक जरूरी फोन आ रहा है.’’ त्रिलोचन मोबाइल कान से लगाते हुए बाहर की ओर निकल गए. बाहर आ कर उन्होंने अपने घर का नंबर डायल किया. मिनट भर बाद शैलजा ने फोन उठाया तो वह धीरे से बोले, ‘‘एक लैंडलाइन नंबर लिख लो और इस नंबर पर फोन कर के फोन उठाने वाले को कुछ देर उलझाए रखो.’’
पलभर बाद ही अंदर के कमरे में रखा टेलीफोन बज उठा. घंटी की आवाज सुन कर जश्न अली बुदबुदाया, ‘‘लीजिए, ये कम्बख्त भी घनघनाने लगा.’’ फिर वह भुनभुनाता हुआ फोन वाले कमरे की ओर बढ़ गया.
त्रिलोचन इसी मौके की ताक में थे, उन्होंने साथ लाए कैमरे से उस खास पेज का फोटो ले लिया.
विप्लव धुरंधर के सामने बैठा था. धुरंधर के चेहरे पर नागवारी के भाव थे. उन्होंने विप्लव को घूर कर देखा और नाराजगी भरे स्वर में बोले, ‘‘आप का पूरा परिवार ही हमारे पीछे पड़ गया है. पहले आप के पिताजी ने अच्छीखासी नौटंकी की, अब आप आ गए.’’
‘‘नौटंकी कौन कर रहा है, यह जल्दी ही पता चल जाएगा. फिलहाल तो यह बताइए कि आप अपनी भाभी सुभाषिनीजी को कब से जानते हैं?’’
‘‘जब से बड़े भैया से उन की शादी हुई.’’ धुरंधर ने बेलाग जवाब दिया.
‘‘पक्का?’’ ‘‘आप कहना क्या चाहते हैं?’’
‘‘मैं ये कहना चाहता हूं…’’ विप्लव ने धुरंधर के चेहरे पर नजर जमा दी, ‘‘कि आप दोनों उस से भी काफी पहले से एकदूसरे को जानते हैं.’’
‘‘ये आप के दिमाग की उपज है?’’
‘‘नहीं जी, मेरा दिमाग इतना उपजाऊ कहां है. ये तो लखनऊ के उस कालेज की पत्रिका की उपज है, जहां आप दोनों साथसाथ पढ़ते थे.’’ विप्लव ने हाथ में थामी हुई पत्रिका खोल कर धुरंधर के आगे रख दी. बीच के पन्ने पर एक समूह फोटो छपी थीं, जिस में सुभाषिनी और धुरंधर पासपास खड़े थे.
फोटो देख कर धुरंधर की निगाह झुक गई. विप्लव ने धुरंधर से कई बातें पूछीं और लौट आया.
हफ्ता भर बाद की बात है. उस दिन बलराम तोमर ने अपने हवेलीनुमा घर में शानदार दावत का आयोजन किया था. जिस बड़े हाल में आयोजन था, उस के बीचोंबीच एक बड़ा सा बैनर लगा था, जिस लिखा था, ‘मयंक तुम्हारे आने की खुशी में आज पूरा घर खुश है.’
रजत अपने मातापिता के साथ बैठा मुसकरा रहा था. उस ने धुरंधर के बेटे सुकुमार से दोस्ती कर ली थी और उस से बतिया रहा था. सुरबाला की नजर त्रिलोचन पर पड़ी तो वह तुरंत उन के पास आ पहुंची. उस के हाथ में प्लास्टर बंधा हुआ था.
‘‘उस दिन आप की मेहरबानी से बच गई, सीढि़यों से गिरने पर हाथ जरूर टूटा… लेकिन जान…’’
‘‘खतरा अभी टला नहीं है.’’ त्रिलोचन के स्वर में उस के लिए चेतावनी थी. ‘‘मैं उस दिन से सासू मां के साथ ही सोती हूं.’’
रात के 10 बजतेबजते खानापीना खत्म हो गया.
‘‘आज सब को यहीं विश्राम करना है.’’ बलराम तोमर ने मेहमानों से कहा तो त्रिलोचन बोले, ‘‘हम आप से माफी चाहते हैं, एक जरूरी काम है, जिसे रात में खत्म करना है, वरना हम ठहर जाते.’’
त्रिलोचन ने तोमर साहब से अनुमति ली तो नीरव और विप्लव भी उठ खड़े हुए.
‘‘और हां, आप सब के लिए एक आवश्यक सूचना है.’’ त्रिलोचन ने पलटते हुए घोषणा की, ‘‘रजत को अपने पिछले जन्म की वे तमाम बातें भी याद आ गई हैं, जिन पर अभी तक परदा पड़ा हुआ था. इस सब पर हम कल चर्चा करेंगे. मेहरबानी कर के इस बारे में रजत को अभी तंग न करें.’’
त्रिलोचन अपने दोनों बेटों विप्लव और नीरव के साथ चले गए.
रात आधी से ज्यादा गुजर गई थी. इंस्पेक्टर अनिल कार्तिकेय आरामकुर्सी पर जरूर बैठे थे, किंतु उन की आंखों में नींद नहीं थी. त्रिलोचन की हिदायत के अनुसार उन्होंने रजत के कमरे के बाहर 2 सिपाहियों को पहरे पर लगा दिया था और स्वयं भी उस कमरे के दरवाजे पर निगाहें जमाए हुए थे. कमरे के अंदर जीरो पावर के बल्ब की रोशनी थी लेकिन बेहद कम. कमरे में लेटे रजत और सुकुमार सो चुके थे.
अचानक ही कमरे के अंदर से किसी की चीख उभरी. अनिल उछल कर कमरे की ओर भागे. दोनों सिपाही भी हड़बड़ा कर अंदर की ओर दौड़े. एक सिपाही ने लाइट जला दी. अंदर लोमहर्षक दृश्य था. रजत सफेद चादर ओढ़े हुए करवट के बल लेटा था, उस की पीठ में चाकू घुसा हुआ था.
‘‘रजत…’’ इंसपेक्टर की लगभग चीत्कार सी निकल गई.
‘‘मैं यहां हूं अंकल…’’ दूसरे पलंग से दबीदबी सी आवाज सुनाई दी. अनिल ने देखा चादर के नीचे दुबका रजत सहमी हुई आंखों से उन की ओर ही ताक रहा था.
‘‘माइ गौड, तो क्या यह सुकुमार है?’’ अनिल के मुंह से निकला.
तभी बाहर गोली चलने की आवाज सुनाई दी, साथ ही 2 आदमियों के दौड़ने की पदचाप भी. त्रिलोचन हांफते हुए अंदर दाखिल हुए.
‘‘गजब हो गया चाचाजी,’’ अनिल की असहज आवाज उभरी, ‘‘किसी ने सुकुमार को…’’
‘‘सुकुमार को?’’ त्रिलोचन के मुंह से हैरत से निकला. वह सुकुमार की नब्ज टटोलते हुए बोले, ‘‘इंस्पेक्टर, जल्दी करो. इसे तुरंत अस्पताल पहुंचाना होगा.’’
आननफानन में सुकुमार को अस्पताल पहुंचा दिया गया.
सुखनई के जंगल में भीड़ जमा थी. त्रिलोचन के दल में कुछ पुलिस वाले भी थे, साथ ही एक क्रेन भी.
‘‘इंस्पेक्टर साहब,’’ त्रिलोचन ने अनिल को संबोधित किया, ‘‘आप की ड्यूटी क्रेन ड्राइवर की बगल में रहेगी. जैसे ही आप का मोबाइल बजे, आप क्रेन को ऊपर खींचने का इशारा कर दीजिएगा.’’
‘‘आप खतरा क्यों मोल ले रहे हैं चाचाजी, आप कहें तो किसी सिपाही को खाई में उतार देता हूं.’’
‘‘धन्यवाद, मैं यह काम खुद करना चाहता हूं. और नीरव, जब तुम्हारा मोबाइल बजे तो समझना कि क्रेन को रोकना है, विप्लव के मोबाइल के बजने का मतलब होगा क्रेन को नीचे जाना है.’’ त्रिलोचन ने दोनों बेटों के ऊपर गहरी नजर डाली. इस के बाद उन्होंने मास्क पहना और क्रेन की रस्सी के सहारे सुखनई नदी के कगार पर उगे घने जंगल के अंदर झूल गए.
कगार की दीवार पर लंबवत उगे पेड़ पतले लेकिन काफी घने थे. त्रिलोचन कुछ ही देर में उस अबूझ खाई में अदृश्य हो गए. त्रिलोचन को लगभग 2 घंटे मशक्कत करनी पड़ी. इस बीच नीरव और विप्लव के मोबाइल कई बार बजे. अंतत: अनिल का मोबाइल बजा और त्रिलोचन को धीरेधीरे ऊपर खींचा गया. लोगों की नजर उन पर पड़ी तो रोंगटे खड़े हो गए. त्रिलोचन के हाथों में एक कंकाल था.
कंकाल पर फटे हुए चिथड़ाचिथड़ा कपड़े झूल रहे थे. आंखों की जगह 2 गड्ढे नजर आ रहे थे. बड़ा ही भयावह दृश्य था.
दूसरे दिन सारे लोग हाल में जमा थे, त्रिलोचन अंदर आए तो सब की नजरें उन की ओर उठ गईं, उन्होंने बड़ा सा एक काला बैग थाम रखा था. त्रिलोचन ने वहां मौजूद लोगों के सामने अपना स्थान ग्रहण किया ही था कि उन्हें धुरंधर और उन की पत्नी सुखदेवी ने आ घेरा.
‘‘त्रिलोचनजी, हमारा बेटा कैसा है? कहां है वो…? उसे किस अस्पताल में रखा गया है?’’ दोनों ने अधीर हो कर कई सवाल कर डाले. सुखदेवी की आंखों से आंसू छलक पड़े.
त्रिलोचन ने एक पर्ची पर कुछ लिख कर सुखदेवी को थमा दी. पतिपत्नी ने पर्ची पर नजर डाली, फिर नासमझों की तरह अपनी जगह पर जा बैठे.
‘‘लेडीज ऐंड जेटलमेन,’’ त्रिलोचन उठ कर खड़े होते हुए बोले, ‘‘आज सच्चाई सब के सामने आ जाएगी. मयंक की हत्या हुई थी या उस की मौत एक हादसा थी, इस रहस्य पर से परदा उठने वाला है,’’ वह इतना ही बोल पाए थे कि एक व्यक्ति हाल में दाखिल हुआ.
‘‘मेजर चौहान, आप आगे आ जाइए.’’ त्रिलोचन का इशारा पा कर मेजर चौहान अगली पंक्ति में जा बैठे. वह वहां मौजूद ज्यादातर लोगों के लिए अपरिचित थे, पर उन्हें देख कर सुभाषिनी के चेहरे का रंग उड़ गया था.
‘‘जस दिन मयंक की मौत हुई, उस शाम को एक शिकार पार्टी सुखनई के जंगल में आदमखोर तेंदुए को मारने के लिए पहुंची थी.’’ त्रिलोचन ने कहना शुरू किया तो लोगों के बीच चल रही बातचीत पर विराम लग गया.
‘‘जहां मचान बनाए गए थे, वहां पर ज्यादातर पतले पेड़ थे, अत: एक पेड़ पर एक आदमी के बैठने के लिए मचान बनाया गया था. बलराम तोमर और उन की पत्नी सुभाषिनी के मचान पासपास के पेड़ों पर थे, उन से कुछ दूरी पर लगभग उसी स्थिति में मयंक और सुरबाला के मचान थे. धुरंधर तोमर का मचान मयंक के बाईं ओर वहां से लगभग 20 फिट दूर था.’’ सब की निगाहें त्रिलोचन के चेहरे पर जमी हुई थीं. उन्होंने आगे कहना शुरू किया.
‘‘बलराम तोमर के पास मैनलिकर सूनर राइफल थी, धुरंधरजी चेक राइफल से लैस थे, मयंक डी.बी. गन लिए हुए था और सुभाषिनीजी के पास माउजर व सुरबाला के पास प्वाइंट 32 बोर का रिवाल्वर था. ये इन लोगों के पारिवारिक हथियार थे.’’
त्रिलोचन ने सामने बैठे लोगों पर एक नजर डाली, फिर उन की निगाह बलराम तोमर के ऊपर जा ठहरी. ‘‘मैं ने ठीक कहा न तोमर साहब?’’
‘‘बिलकुल ठीक.’’ तोमर साहब ने सहमति व्यक्त की.
‘‘शिकारियों की इस टोली के अलावा वहां एक और शिकारी भी मौजूद था.’’
कहते हुए त्रिलोचन की नजर मेजर चौहान के ऊपर जा ठहरी, ‘‘एम आई राइट मेजर?’’
मेजर की निगाहें झुक गईं. त्रिलोचन आगे बोले, ‘‘मेजर ने अपनी जीप जंगल में काफी पीछे छोड़ दी थी और वहां से पैदल चलते हुए घटना स्थल पर पहुंच गए थे. इस के बाद ये मचानों से कुछ दूरी पर मौजूद एक झुरमुट में छिप कर अंधेरा होने का इंतजार करने लगे.’’
‘‘आप ने काफी हिम्मत दिखाई थी मेजर, आप झाडि़यों में छिप कर आदमखोर का इंतजार कर रहे थे?’’ अनिल के स्वर में तारीफ थी.
‘‘नहीं इंसपेक्टर साहब,’’ त्रिलोचन ने अनिल की ओर गर्दन घुमाई.
‘‘मेजर वहां तेंदुए का नहीं, एक इंसान का शिकार करने पहुंचे थे.’’
त्रिलोचन की बात सुन कर हाल में मौजूद हर शख्स चौंक गया. ‘‘ये किस की हत्या करना चाहते थे डैड?’’ विप्लव ने पूछा.
‘‘अपनी पूर्व पत्नी सुभाषिनी की.’’
त्रिलोचन के इस रहस्योद्घाटन पर कई लोगों के मुंह खुले रह गए.
सुरबाला की समझ में कुछ नहीं आया. वह चौंकते हुए बुदबुदाई, ‘‘अम्मा और इन की पूर्व पत्नी…?’’
‘‘मैं स्पष्ट करता हूं.’’ त्रिलोचन सुरबाला के चेहरे के भावों से ही समझ गए कि वह क्या बुदबुदा रही है. इसलिए उन्होंने उस की ओर मुखातिब हो कर कहा, ‘‘सुभाषिनी की पहली शादी मेजर चौहान से हुई थी. शादी के कुछ ही दिनों बाद मेजर को कश्मीर जाने का अर्जेंट आदेश मिला. फलस्वरूप इन्हें कश्मीर में अपनी नई तैनाती पर जाना पड़ा. वहां शत्रु सेना बारबार घुसपैठ करने की कोशिश कर रही थी. इन्हें वहां गए कुछ ही दिन हुए थे कि एक दिन अचानक इन की चौकी पर हमला हुआ. मेजर के कई साथी शहीद हो गए. दुश्मन मेजर को जबरन बंधक बना कर अपने साथ ले गए.’’
हाल में एकदम सन्नाटा छा गया था. त्रिलोचन पलभर रुक कर आगे बोले, ‘‘मेजर के लापता होने की खबर पा कर सुभाषिनी बेहाल हो गईं. सब से बड़ा झटका इन के मांबाप को लगा. मेजर के जिंदा होने की संभावना न के बराबर थी. इधर एक दूसरी समस्या उठ खड़ी हुई थी, अत: सुभाषिनी के मातापिता को उन के पुनर्विवाह का निर्णय लेना पड़ा.’’
त्रिलोचन ने देखा, सुभाषिनी ने अपनी गर्दन झुका ली थी. उन पर एक नजर डाल कर वह आगे बोले, ‘‘फिर सुभाषिनी की बलराम तोमर से शादी कर दी गई, तोमर साहब विधुर थे. उन की पहली पत्नी का देहांत हो चुका था. शादी के 2-3 हफ्ते बाद तोमर साहब को दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा, वहां इन के चाचाजी गुजर गए थे और उन्हें उन की जमीनजायदाद का प्रबंध करना था.’’ त्रिलोचन ने देखा, तोमर साहब एकटक उन्हीं की ओर देख रहे थे.
‘‘आप कुछ कहना चाहते हैं?’’ त्रिलोचन उन से मुखातिब हुए. ‘‘आप की जानकारी जबर्दस्त है.’’
‘‘धन्यवाद, हां तो, मैं बता रहा था कि तोमर साहब को विदेश में कई महीने गुजारने पड़े. जब मयंक का जन्म हुआ और सुभाषिनी जी ने फोन पर उन्हें खबर दी तो उन की खुशी का ठिकाना न रहा. वे वापस लौट आए.’’
त्रिलोचन ने बैग से एक पुरानी पत्रिका निकाली. उन्होंने देखा, विप्लव आतुरता से उन की ओर देख रहा था. उन्होंने पूछा, ‘‘हां, बोलो विप्लव.’’
‘‘डैड, मेरी पड़ताल से साबित हुआ है कि धुरंधर और सुभाषिनी कालेज में सहपाठी थे और दोनों के बीच रोमानी रिश्ते थे और बाद में भी…’’ वह कुछ कहतेकहते रुक गया.
सुभाषिनी का चेहरा रंगहीन हो गया और धुरंधर तोमर दांत पीसते हुए उठ खड़े हुए.
‘‘विप्लव, डोंट जंप टू द कन्क्लूजन. मेरी नजर में ये दोनों पाक दामन हैं.’’ त्रिलोचन के इस कथन का धुरंधर पर खासा असर हुआ और वे शांत हो कर अपनी कुर्सी पर बैठ गए.
‘‘मेरी बात अधूरी रह गई थी, मैं आप को बताना चाहता हूं कि कुछ समय बाद मेजर चौहान दुश्मन की गिरफ्त से छूट आए थे. लेकिन जब तक वह आए तब तक सुभाषिनी और तोमर साहब की शादी हो चुकी थी. इस का नतीजा यह निकला कि मेजर चौहान ने सुभाषिनी को बेवफा समझा, क्योंकि इन्होंने मेजर का इंतजार नहीं किया था और गर्भवती होने की वजह से दूसरी शादी के लिए राजी हो गई थीं. हालांकि ऐसा इन्होंने मजबूरी में किया था, लेकिन मेजर की नजरों में ये कुसूरवार थीं. इसलिए इन्होंने अपनी पूर्व पत्नी से बदला लेने का फैसला कर लिया.
कई सालों तक तो मेजर को सुभाषिनी के बारे में कोई जानकारी ही नहीं मिली. लेकिन ये भी जिद्दी स्वभाव के थे. जैसेतैसे इन्होंने सुभाषिनी की नई ससुराल का पता लगा ही लिया. तब तक वह मयंक की मां बन चुकी थी. वह काफी बड़ा हो गया था.
मेजर चौहान बदला लेने के लिए सालों तक सुभाषिनी और तोमर परिवार पर नजर रखे रहे. लंबी अवधि गुजर जाने के बाद भी इन के बदले की आग ठंडी नहीं हुई. इस की वजह यह भी थी कि सुभाषिनी की वजह से इन का बेटा किसी और का हो गया था और ये चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते थे. बेटे की वजह से ही इन्होंने शादी तक नहीं की. इन्हें बदले का मौका तब मिला, जब तोमर परिवार ने शिकार का प्रोग्राम बनाया.’’
‘‘फिर क्या हुआ चाचाजी?’’ इंस्पेक्टर अनिल अपनी जिज्ञासा दबाए नहीं रख सके.
‘‘अंधेरा होने पर मेजर ने अपने रिवाल्वर से गोली चला दी, लेकिन गोली सुभाषिनी को नहीं…’’
‘‘बल्कि मयंक को लगी और वे नीचे गिर गए.’’ नीरव बोल उठा.
‘‘मेजर चौहान ने भी यही समझा था, क्योंकि इन के गोली चलाने के तुरंत बाद ही सुरबाला की चीखपुकार गूंज उठी थी. उसी वक्त मेजर ने दूसरा फायर किया, ये हवाई फायर था, जो इन्होंने मयंक को तेंदुए से बचाने के लिए किया था. दूसरे लोगों ने भी कुछ हवाई फायर किए थे.’’
‘‘इस का मतलब ये हुआ डैड कि मेजर चौहान ने मयंक की हत्या नहीं की थी, बल्कि वे नींद के झोंके में मचान से गिर कर तेंदुए का शिकार बन गए थे.’’ नीरव बोला.
‘‘सच्चाई का खुलासा तो रजत ही कर सकता है.’’ त्रिलोचन ने रजत पर निगाह डाली तो मातापिता के बीच में बैठा रजत मुसकराने लगा.
‘‘एक्जैक्टली डैड,’’ विप्लव ने कुर्सी के हत्थे पर हाथ मारा, ‘‘आखिर रजत, मयंक का ही तो पुनर्जन्म है, इसे तो पूरी सच्चाई मालूम होगी.’’
‘‘अपराधी इसी बात से तो डर गया था, उसे लगा कि रजत ने सुरबाला को सच्चाई बता दी है, तभी उस ने सुरबाला की जान लेने की कोशिश की थी. जब वह कामयाब नहीं हुआ तो उस ने मौका पा कर रजत की हत्या करनी चाही. हालांकि हम ने रजत की सुरक्षा का पूरा इंतजाम किया था, लेकिन हमलावर तोमर परिवार के पुश्तैनी मकान के चप्पेचप्पे से वाकिफ था. वह गुप्त रास्ते से उस कमरे में दाखिल हुआ और अपनी समझ के हिसाब से रजत को चाकू मार कर उसी रास्ते से गायब भी हो गया. इसे नियति का खेल ही कहेंगे कि रजत और सुकुमार ने सोने के पहले अपने बिस्तर बदल लिए थे. जिस की वजह से हमलावर ने सुकुमार को रजत समझा.’’
‘‘मतलब, कोई घर का ही आदमी है जो पहले मयंक का दुश्मन था और अब रजत का दुश्मन बन बैठा.’’ वहां मौजूद रजत के पिता मनोहर अग्रवाल ने पहली बार मुंह खोला.
‘‘चाचाजी, मेरी तफ्तीश कहती है कि सुरबालाजी के ऊपर हमला करने की कोशिश सुखदेवी ने की थी, आई मीन मिसेज धुरंधर तोमर.’’ इंसपेक्टर अनिल ने पासा फेंका.
‘‘ये आप क्या कह रहे हैं, दरोगाजी…?’’ सुखदेवी उछल कर उठ खड़ी हुई, ‘‘मैं बहू के ऊपर हमला क्यों करूंगी, इस से मुझे क्या मिलेगा…?’’
‘‘जिस तरह से सुलबाला ने रजत को अपनाया, उस से आप के मन में डर बैठ गया था कि अब तक जिस जायदाद का वारिस आप का बेटा था, अब उस का आधा हिस्सा कहीं रजत को न मिल जाए.’’
‘‘इंसपेक्टर साहब,’’ अभी तक चुप बैठे धुरंधर का धैर्य जाता रहा, ‘‘मेरी पत्नी के खिलाफ आप के पास क्या सबूत हैं?’’
‘‘आप की पत्नी ‘संदली एहसास’ नामक टैल्कम पाउडर का इस्तेमाल करती हैं. सुरबालाजी के शयन कक्ष में जो तलवार पाई गई थी. उस पर उस पाउडर के कण मिले हैं.’’
‘‘प्लीज, अब ये मत कहिएगा कि अपने बेटे को छुरा भी हम ने ही मारा है…’’ धुरंधर आजिज आ कर बोले.
‘‘इंस्पेक्टर साहब, आप सुखदेवीजी के ऊपर नाहक आरोप लगा रहे हैं.’’ त्रिलोचन ने दखल दिया, ‘‘हमारा ध्यान भटकाने के लिए अपराधी द्वारा चली गई नायाब चाल थी यह.’’
‘‘तो फिर अपराधी कौन है डैड?’’ नीरव बोला, ‘‘आप ने रजत से तो पूछा ही नहीं कि पिछले जन्म में उस की मृत्यु कैसे हुई थी?’’
प्रत्युत्तर में त्रिलोचन ने अपने बैग से पालिथीन की एक थैली निकाली, जिस में एक नरमुंड रखा हुआ था. पारदर्शी थैली में दिख रहे नरमुंड के माथे की ओर इशारा करते हुए त्रिलोचन बोले, ‘‘यह छेद देख रहे हैं आप लोग, यह मयंक की खोपड़ी है और इस के माथे में यह गोली का निशान. मयंक की मौत गोली लगने से हुई थी.’’ कहते हुए त्रिलोचन ने अपनी जेब से कोई चीज निकाली, ‘‘और ये रही वह गोली.’’ उन्होंने अपनी हथेली सब के सामने कर दी.
‘‘यह तो राइफल की गोली है…’’ मेजर चौहान के मुंह से अनायास निकल गया.
‘‘हां मेजर, अब तो आप उस अपराधबोध से मुक्त हो गए होंगे, जिसे आप पिछले कई सालों से ढोते आ रहे थे?’’
‘‘जी हां सर…’’ मेजर का गला भर्रा गया, ‘‘मैं अपने आप को मयंक का हत्यारा समझता था… और मुझे इतनी ग्लानि हुई थी कि अपना रिवाल्वर उसी जंगल में फेंक आया था.’’
‘‘चाचाजी, घटनास्थल पर उस वक्त 2 राइफलें थीं.’’ अनिल बोला.
‘‘जी हां, और फोरेंसिक रिपोर्ट से साफ हो गया है कि यह गोली जिस राइफल से चली थी. वह थी मैनलिकर सूनर.’’
‘‘लेकिन… मैं ने तो तेंदुए को भगाने के लिए हवाई फायर किए थे ताकि वह नीचे गिरे मयंक को नुकसान न पहुंचाए.’’ बलराम तोमर त्रिलोचन को लक्ष्य करते हुए बोले.
‘‘हवाई फायर हवा में किए जाते हैं तोमर साहब, नाक की सीध में नहीं.’’ त्रिलोचन का स्वर सख्त हो उठा.
‘‘आप कहना क्या चाहते हैं कि मयंक का हत्यारा मैं हूं..?’’ तोमर साहब क्षुब्ध हो कर कांपने लगे.
‘‘जी हां.’’ त्रिलोचन का स्वर दृढ़ था.
‘‘त्रिलोचन तुम सठिया गए हो, तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है…’’ बलराम तोमर दहाड़ उठे, उन के गुस्से का ठिकाना न रहा, ‘‘मैं अपने बेटे की हत्या क्यों करूंगा…?’’ उन की दहकती आंखें त्रिलोचन पर जा टिकीं.
‘‘क्योंकि मयंक आप का बेटा नहीं था.’’
बलराम तोमर अवाक रह गए और वहीं कुर्सी पर ढेर हो गए. बाकी लोगों की नजरें सुभाषिनी पर जा टिकीं, उन के ऊपर घड़ों पानी पड़ चुका था.
‘‘मैं ने तो पहले ही कहा था डैड कि धुरंधर और सुभाषिनी…’’
‘‘शट अप विप्लव.’’ त्रिलोचन आंखें तरेरते हुए बोले, ‘‘मयंक, मेजर चौहान का बेटा था.’’
इस रहस्योद्घाटन ने सब को चौंका दिया.
‘‘डैड, आप इस नतीजे पर कैसे पहुंचे?’’ विप्लव पूछे बिना न रह सका.
‘‘बर्नेट अस्पताल के रजिस्टर में मयंक की जन्मतिथि लिखी हुई है, जिस के हिसाब से बलराम और सुभाषिनी की शादी के सात महीने बाद ही मयंक का जन्म हो गया था. रजिस्टर में इसे नार्मल डिलीवरी के तौर पर दर्ज किया गया था, जिसे बाद में सुभाषिनी ने रिश्वत दे कर ‘प्रीमैच्योर डिलीवरी’ करवा दिया था.’’
‘‘मतलब, सुभाषिनी बलराम तोमर के साथ शादी होने के पहले से गर्भवती थीं?’’ मनोहर अग्रवाल का सवाल था.
‘‘जी हां, इस की सूचना इन्होंने अपने पूर्व पति मेजर चौहान को पत्र के द्वारा भेजी भी थी. उसी दौरान मेजर चौहान लापता हो गए थे और यह पत्र भेजने वाले के पते पर लौट आया था.’’ त्रिलोचन ने बैग में हाथ डाल कर एक अंतर्देशीय पत्र निकाला, जो पीला पड़ चुका था.
‘‘अपने शक के चलते बलराम तोमर ने बर्नेट अस्पताल के रजिस्टर का मुआयना किया और इंक रिमूवर के दाग ने इन के शक को पुख्ता कर दिया. हां, बलराम के शक के दायरे में सुभाषिनीजी के साथ धुरंधर ही थे. इसी वजह से इन्होंने तय कर लिया था कि मौका मिलते ही मयंक को मौत के घाट उतार देंगे और फिर सुभाषिनी और धुरंधर को भी नहीं छोड़ेंगे.
‘‘धुरंधर मयंक को बहुत प्यार करते थे और मयंक भी अकसर उन के साथ ही रहता था, रात को वह सोता भी उन के साथ ही था. इस से बलराम के शक की जड़ें और गहरी होती गईं, हालांकि यह 20 साल तक अपनी कोशिशों के बावजूद मयंक की जान लेने में नाकाम रहे. आखिर इन्होंने शिकार का प्रोग्राम बनाया और उस में घर की औरतों को भी शामिल किया ताकि किसी को शक न हो. इस तरह उस रात इन्हें मौका मिल ही गया और सुभाषिनीजी को सोती पा कर इन्होंने मयंक के ऊपर गोली चला दी.
‘‘शक्तिशाली राइफल की गोली मयंक के माथे को चीरती हुई दूसरी ओर निकल कर कुछ दूर मौजूद एक पेड़ के तने में जा घुसी. मयंक के मुंह से चीख निकली और वह बेजान हो कर नीचे जा गिरा, जहां घात में बैठा हुआ तेंदुआ उस पर टूट पड़ा.
‘‘फिर हवाई फायरों और सुरबाला तथा सुभाषिनी की चीखपुकारों से डर कर तेंदुआ भागा तो सही पर साथ में मयंक की लाश को भी घसीट ले गया. उस ने मयंक की अधखाई लाश सुखनई की कगार पर तिरछे खड़े छतनार पेड़ों में छिपा दी थी, जहां वह कई साल लटकी रही और कल मैं ने उसे वहां से निकाला.’’
‘‘ताज्जुब है कि सुभाषिनी बलराम के पास ही मौजूद थीं, फिर भी इन्होंने बलराम को मयंक पर गोली चलाते नहीं देखा था?’’ नीरव ने आश्चर्य व्यक्त किया.
‘‘ये नींद में थीं, इस के अलावा घुप्प अंधेरा छाया हुआ था, साथ ही यह एक विचित्र संयोग था कि उसी वक्त मेजर चौहान ने भी फायर किया था और सुभाषिनी भ्रमित हो गई थीं.’’
उसी समय वहां एक एंबुलेंस आई और स्ट्रेचर पर लेटे सुकुमार को अंदर लाया गया, वह होश में था. उसे देखते ही धुरंधर और सुखदेवी दौड़ कर उस से जा लिपटे.
‘‘यह भाई नहीं कसाई है.’’ धुरंधर ने घृणा भरी निगाह बलराम के ऊपर डाली, ‘‘इस ने तो हमारे वंश का ही नाश कर दिया था…’’
‘‘मैं बहुत शर्मिंदा हूं त्रिलोचनजी, यह मेरे पाप की सजा है. मैं ने न तो ठीक से मेजर साहब की वापसी का ही इंतजार किया था, न ही इस आदमी को सच बताया था…’’ सुभाषिनी ने एक नजर बलराम पर डाली, ‘‘शायद इसीलिए मेरा बेटा…’’
उन की आवाज आंसुओं में डूब गई.
‘‘अब आप का बेटा लौट भी तो आया है.’’ विप्लव ने रजत की ओर इशारा किया.
‘‘हां त्रिलोचन जी.’’ धुरंधर तोमर त्रिलोचन के पास आ पहुंचे, ‘‘अब तो मुझे भी पुनर्जन्म पर विश्वास हो गया है. आखिर रजत ने ही तो पूर्वजन्म में हुई अपनी हत्या की सच्चाई से आप को अवगत कराया है.’’
‘‘यह पुनर्जन्म का मामला नहीं है, तोमर साहब.’’ त्रिलोचन सपाट स्वर में बोले.
‘‘क्या…? आप का मतलब रजत पिछले जन्म में मयंक नहीं था? ये मयंक का पुनर्जन्म नहीं है?’’
‘‘जी हां, मेरा मतलब यही है.’’ त्रिलोचन की इस स्वीकारोक्ति पर कई लोग चौंक उठे.
‘‘आप क्या कह रहे हैं डैड?’’ नीरव और विप्लव ने एकसाथ सवाल किया, ‘‘अगर यह सच है तो फिर रजत ने मयंक के परिजनों को कैसे पहचाना?’’
‘‘हां चाचाजी, रजत ने तो यह भी बताया था कि सुरबालाजी की पीठ पर…’’ अनिल को अपना वाक्य अधूरा छोड़ना पड़ा, भौचक्की खड़ी सुरबाला और सुखदेवी उसी तरफ देख रही थीं.
‘‘यह सब एक नाटक था. सारी जानकारी और सभी घरवालों के फोटोग्राफ्स सुभाषिनीजी ने उपलब्ध कराए थे और उसी आधार पर मैं ने रजत को प्रशिक्षित किया था.’’
‘‘तो क्या आप को इस मामले को सुलझाने के लिए सुभाषिनीजी ने नियुक्त किया था?’’ अनिल ने हैरान हो कर पूछा.
‘‘जी हां, सुभाषिनीजी को शुरू से ही शक था कि उन के बेटे की हत्या हुई है. और उन के शक के दायरे में कई लोग थे. इसीलिए मैं ने ये जाल रचा. मैं जानता था कि मयंक का हत्यारा रजत की हत्या करने की कोशिश करेगा और हम उसे रंगे हाथ पकड़ लेंगे. आगे की घटनाएं आप सब को मालूम ही हैं.’’
‘‘कमाल हो गया.’’ धुरंधर की अचरज भरी निगाह रजत के ऊपर जा टिकी, ‘‘ये छुटकू तो बेजोड़ एक्टर है.’’
‘‘इस में कोई शक नहीं. मैं रजत को आशीर्वाद देता हूं कि ये बड़ा हो कर फिल्मों में हीरो बने और सारी दुनिया में इस का नाम हो.’’ त्रिलोचन बोले.
रजत के चेहरे पर मुसकान फैलते देर न लगी, उस के मातापिता उस से ज्यादा खुश थे, शेष लोगों के चेहरों पर आश्चर्य छाया था, उन में से एक अनिल भी थे, जो अब हथकड़ी लिए बलराम तोमर की ओर बढ़ रहे थे.
त्रिलोचन अपना सामान समेट ही रहे थे कि सुभाषिनी उन के पास आ कर बोलीं, ‘‘मुझे समझ में नहीं आ रहा कि कैसे आप का आभार व्यक्त करूं.’’
‘‘इस की जरूरत नहीं है.’’ त्रिलोचन का स्वर कुछ अधिक ही गंभीर हो उठा.
‘‘दाई से पेट छिपाने की कोशिश फिर कभी मत करिएगा.’’ त्रिलोचन ने कहा तो वे अहमकों की तरह उन की ओर ताकने लगीं.
‘‘मयंक का असली पिता कौन है, यह बात आप ने मुझ से भी छिपा ली थी.’’ त्रिलोचन ने स्पष्ट किया तो सुभाषिनी के चेहरे पर शर्म, अपराधबोध और अवसाद का मिलाजुला भाव उभर आया.
‘‘मेरा चरित्र शक के घेरे में कैसे आ गया था त्रिलोचनजी?’’ धुरंधर तोमर पूछे बिना न रह सके.
‘‘जिस तरह से विप्लव को इस पत्रिका में आप दोनों का फोटो देख कर शक हुआ, ठीक वैसे ही बलराम के भी मन में शुबहा हुआ और जब उस ने बर्नेट अस्पताल के प्रसूति रजिस्टर का अवलोकन किया तो उस का शक यकीन में बदल गया.’’
‘‘आप बुरा न मानें तो कुछ मैं भी पूछूं?’’ सुखदेवी अपनी जगह से उठ कर त्रिलोचन के पास आ पहुंचीं.
‘‘जरूर पूछिए.’’ ‘‘रजत तो पहली बार यहां आया था, वह सड़क से सीधे हमारे घर तक कैसे पहुंचा?’’
‘‘आसान काम था मिसेज तोमर. हम ने रात में सड़क से ले कर आप के घर तक गेहूं के दाने गिरवा दिए थे, रजत उन्हें देखते हुए आप के घर तक पहुंच गया और किसी को संदेह भी नहीं हुआ, क्योंकि गांवों में अनाज की ढुलाई के दौरान ऐसा होता रहता है.’’
‘‘क्या दिमाग पाया है आप ने.’’ सुखदेवी के मुंह से बरबस निकल गया और अपनी तारीफ सुन कर त्रिलोचन खुश हुए बिना न रह सके. Rebirth Mystery Story






