Crime Fiction Story in Hindi. अंधविश्वास जब वासना, अहंकार और सत्ता के दुरुपयोग से जुड़ जाता है तो उस का परिणाम बहुत खतरनाक होता है. यही राजाराम गुप्ता के साथ हुआ. अपनी मेहनत के बूते वह फर्श से उठ कर अर्श तक पहुंच गया था, लेकिन वासना में अंधा हो कर वह अपना अतीत भूल गया था. जिस से उस के हाथ गुनाह तक पहुंच गए थे. इस गुनाह की उसे ऐसी सजा मिली कि

यह कहानी है लखनऊ के राजाराम गुप्ता की. लखनऊहरदोई रोड पर लखनऊ से करीब 20 किलोमीटर दूर एक छोटे से गांव में बीड़ीतंबाकू की दुकान चलाने वाले और लोगों के यहां मजदूरी करने वाले गरीब मजदूर दीनानाथ गुप्ता का बेटा था राजाराम गुप्ता. बेटे ने बाप को तनतोड़ मेहनत करते, फिर भी गरीबी में जिंदगी जीते देखा था, इसलिए उस का इस तरह गरीबी में अटक कर मरने का कोई इरादा नहीं था.

8वीं पास करने के बाद राजाराम ने पढ़ाई छोड़ दी थी. लखनऊ शहर आ कर वह चौक के एक साउथ इंडियन रेस्टोरेंट में टेबल साफ करने का काम करने लगा था. जवान होने पर उस ने रेस्टोरेंट की नौकरी छोड़ दी और लखनऊ के फेमस इलाके हजरतगंज के एक कोने में एक छोटी सी किराने की दुकान खोल ली.

लगभग 12 साल तक उस ने वह दुकान चलाई. दुकान ठीकठाक चल रही थी, यह भी कह सकते हैं कि घर चल रहा था, परंतु अच्छे दिन आ जाएं, इस तरह का कोई आसार नजर नहीं आ रहा था.

एक दिन उस की दुकान पर एक ज्योतिषी आया. यहीं से राजाराम के जीवन के टर्निंग पौइंट की शुरुआत हुई. दूसरा यह भी कि अंधविश्वास और वहम में वह किसी भी हद तक जा सकता था, इस की भी शुरुआत हुई.

दुकान पर आए ज्योतिषी ने उस से कहा कि कब तक वह इस किराने की दुकान में बैठ कर दालचावल के पैकेट बांध कर गुमास्तागिरी करता रहेगा? इस के बजाय वह एक रेस्टोरेंट खोल ले, उसी में उस की बरकत दिखाई दे रही है. लोगों को कम कीमत में पौष्टिक भोजन कराएगा तो उसी में उस का भाग्य बदल जाएगा.

ज्योतिषी की बात मान कर राजाराम ने किराने की दुकान बंद कर दी और उसी जगह पर एक छोटा सा रेस्टोरेंट शुरू कर दिया. रेस्टोरेंट का नाम रखा ‘राजा राम रेस्टोरेंट. उत्तर प्रदेश में भगवान राम को अधिक पूजा जाता है, दूसरे उस का खुद का नाम भी राजाराम था, इसलिए उस ने अपने नाम को 2 भागों में बांट कर भगवान राम के नाम पर तथा अपने नाम पर रेस्टोरेंट का नाम रखा था.

यह उस समय की बात है, जब ज्यादातर भारतीय बाहर यानी रेस्टोरेंट में खाने के बारे में नहीं सोचते थे. पर राजाराम ने रिस्क उठाया. उस ने अपने रेस्टोरेंट में दक्षिण भारतीय व्यंजन इडली, डोसा, वड़ा और पूरी बेचना शुरू किया. वह दक्षिण भारतीय टेस्ट के अनुसार नारियल के तेल में सभी चीजें तैयार करता था.

दाल, सागसब्जी और मसाला आदि सभी चीजें शुद्ध उपयोग में लाता था. यही नहीं, उस ने कीमत रखी एक रुपए. इसलिए कोई भी जेब में एक रुपए ले कर आता और ‘राजा राम रेस्टोरेंट’ में पेट भर खाता.

फिर भी राजाराम का रेस्टोरेंट नहीं चला. पहले ही महीने में 10 हजार रुपए का भारी नुकसान हुआ. यह 1980 के आसपास की बात है. उस समय रुपए की बहुत कीमत थी. इतना बड़ा नुकसान होने के बावजूद राजाराम ने हिम्मत नहीं हारी और बढिय़ा और शुद्ध चीजें लोगों को खिलाता रहा.

धीरेधीरे राजा राम रेस्टोरेंट का नाम होने लगा. लोगों में यह मान्यता दृढ़ होती गई कि अगर कहीं बेहतर खाना खाना है तो ‘राजा राम रेस्टोरेंट’ में जाना है. राजाराम अपने यहां काम करने वाले स्टाफ को अच्छा वेतन देने के अलावा मैडिकल सुविधाएं भी देता था.

अगर किसी कर्मचारी की बेटी का विवाह होता तो विवाह के लिए भी वह पैसे देता था. इसलिए कर्मचारियों में भी उस का काफी सम्मान था. स्टाफ के लोग उसे बड़े भैया कहते थे.

राजाराम के दिन लौटे. उस का रेस्टोरेंट ऐसा चल निकला कि उस ने रेस्टोरेंट की एक से अधिक शाखाएं चालू कर दीं. यह सब राजाराम की मेहनत, कम कीमत, पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन मिलने की वजह से था. परंतु राजाराम ने इस का क्रेडिट उस ज्योतिषी को दिया.

उस ज्योतिषी के प्रति उस की श्रद्धा ऐसी बढ़ी कि अपने रेस्टोरेंट में उस ने ज्योतिषी की बड़ी सी फोटो बाकायदा टांग दी. राजाराम ने भी अपना एक स्टैंडर्ड लुक अपनाया. वह सफेद पैंटशर्ट और सफेद पायजामाशर्ट पहनने लगा. माथे पर चंदन का तिलक भी लगाता था. फिर तो लखनऊ में वह इडली और डोसा किंग के नाम से फेमस हो गया.

एक बार राजाराम सिंगापुर गया. वहां उस ने मैकडोनाल्ड के स्टोर में उन की कार्यशैली को ध्यान से औब्जर्व किया. उसे लगा कि यह स्टाइल उस के अपने रेस्टोरेंट में अपनाने जैसी है. यह तरकीब काम कर गई. इस के बाद के 2 दशक में राजाराम ने दुबई, अमेरिका, इंग्लैंड आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, हांगकांग, साउथ अफ्रीका, फ्रांस, जर्मनी सहित 28 देशों में अपनी शाखाएं खोल दीं.

प्रोफेशनल लेवल पर राजाराम का सूरज दोपहर की तरह तप रहा था, परंतु पर्सनल लेवल पर उस के जीवन में पति, पत्नी और ‘वो’ का ड्रामा खेला जा रहा था. विवाह की उम्र होते ही राजाराम ने कुसुमा नाम की लड़की के साथ विवाह कर लिया था. कुसुमा राजाराम के संघर्ष के दिनों की साक्षी थी. जब वह अपनी किराने की दुकान चलाता था, उसे बेच कर रेस्टोरेंट शुरू किया, उस में नुकसान हुआ, फिर भी उसे सफल बनाने में व्यस्त था.

तब कुसुमा ने उस के संसार के रथ में सुकून बनाए रखा था. कुसुमा ने घर, परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी बखूबी निभाई थी. एक के बाद एक रेस्टोरेंट शुरू करने के प्रयास में राजाराम घर का ध्यान बिलकुल नहीं रख पाता था, तब भी कुसुमा ने पूरी शिद्दत से उस का साथ दिया था. परंतु सफलता मिलते ही रेस्टोरेंट का बिजनैस धमाकेदार चलने लगा और पैसे की कमी नहीं रही तो राजाराम की नजर दूसरी महिलाओं पर जमने लगी.

दोस्त ने उसे सलाह दी कि दूसरा विवाह करने से उस की धनसंपत्ति और ख्याति अनेक गुना बढ़ेगी. इसलिए राजाराम ने कावेरी नाम की युवती के साथ बाकायदा दूसरा विवाह कर लिया. मजे की बात यह थी कि उस समय उस ने अपनी पहली पत्नी को कायदे से तलाक तक नहीं दिया था. इसलिए कानूनन उस के दूसरे विवाह को मान्यता नहीं मिल सकती थी.

इस के बावजूद वह कावेरी के रंग में रंग कर उसे अपनी दूसरी पत्नी कहने लगा था. जिस कावेरी से उस ने दूसरा विवाह किया था, वह उस के एक पूर्व कर्मचारी मोहन की पत्नी थी.

पर यहीं पर राजाराम की वासना का अजगर शांत नहीं हुआ. कुछ दिनों बाद उस की वासना के अजगर ने फिर करवट ली. एक दिन एक लड़की उस के रेस्टोरेंट में उस से पैसे उधार मांगने आई. वह लड़की उस के यहां काम करने वाले असिस्टेंट मैनेजर देवराज रावत की बेटी अंजलि थी. वह इस पैसे से एक ट्रैवल एजेंसी शुरू करना चाहती थी.

अंजलि को देखते ही राजाराम की नीयत खराब हो गई. उसे लगा कि यह लड़की तो उस के बगल में होनी चाहिए. जबकि उस समय अंजलि लगभग उस की बेटी की उम्र की थी, लेकिन उसे पाने में दिक्कत यह थी कि अंजलि का विवाह साधुराम नाम के एक साइंस के अध्यापक के साथ हो चुका था. दोनों ने प्रेम विवाह किया था.

राजाराम एक बार फिर ज्योतिषी के पास गया. उस ने ज्योतिषी से बाकायदा अंजलि की कुंडली बनवाई और अपनी कुंडली से मिलवाई. ज्योतिषी ने भी वही सलाह दी, जो वह चाहता था. उस ने कहा कि ग्रह कहते हैं कि उस का विवाह अंजलि के साथ होगा.

इस के बाद अंजलि को पाने के लिए राजाराम ने जाल बिछाना शुरू किया. पहले तो उस ने अंजलि को बिना मतलब के कारण बता कर फोन करना शुरू किया. इस के बाद वह उसे पैसे और गिफ्ट देने लगा. गिफ्ट में भी सोने के महंगे गहने होते थे.

राजाराम किसी भी कीमत पर अंजलि को पाना चाहता था. इसलिए वह हर कोशिश कर रहा था. अब वह खुलेआम उस से दिल की बात कहने के साथ पतिपत्नी के बीच दरार पैदा करने की कोशिश करने लगा था. उस ने अंजलि के मन में यह वहम भी पैदा करने का प्रयास किया कि उस का पति साधुराम साधु नहीं, शैतान है. उस के अनेक महिलाओं से संबंध हैं. वह उस से शारीरिक संबंध बनाना बंद कर दे, क्योंकि उस के पति को एड्स है.

अंजलि अपने पति से नफरत करने लगे और उसे छोड़ दे, इस के लिए राजाराम इस हद तक गया कि उस ने एक तांत्रिक कहे जाने वाले व्यक्ति को खोज कर कालाजादू और तंत्रमंत्र की विधि कराई. पर दृढ़ मन वाली और पति से प्यार करने वाली अंजलि पर उस की कोई भी विधि सफल नहीं हुई. उलटा उस से परेशान हुई अंजलि ने उस के खिलाफ पुलिस से शिकायत करने की धमकी दी. पर राजाराम पर कोई फर्क नहीं पड़ा.

क्योंकि उस की पहुंच प्रशासन में ही नहीं, राजनीति में भी थी. उस के संबंध अनेक बड़ेबड़े नेताओं से थे. तब अंजलि और उस के पति ने लखनऊ छोड़ कर कहीं और रहने का फैसला कर लिया. साधुराम ने अपने ट्रांसफर के लिए अरजी भी दे दी.

अंजलि के लिए पागल बन चुका राजाराम एक दिन उस के घर पहुंच गया. उस ने सीधेसीधे बात की कि वह 2 दिनों में अपने पति से सारे संबंध तोड़ ले, वरना वह उस के लिए कुछ भी कर सकता है, पर अंजलि चट्टान की तरह अडिग थी.

अंजलि के लिए बेचैन और गुस्साया राजाराम एक दिन 5 लोगों के साथ अंजलि के यहां आ धमका और साधुराम को उठवा ले गया. लखनऊ में ही गोमतीनगर में उस का एक गोडाउन था, साधुराम को उस ने वहीं कैद करा दिया. अंजलि पति के अपहरण की रिपोर्ट लिखाने थाने गई, पर जब उस ने पुलिस के सामने राजाराम का नाम लिया तो पुलिस ने रिपोर्ट लिखने से साफ मना कर दिया.

इस दौरान साधुराम को कई दिनों तक कैद रखा गया. एक दिन साधुराम किसी तरह राजाराम के गुंडों के चंगुल से छूट कर भाग निकला. वह सीधे डीआईजी के यहां पहुंचा. उन के हस्तक्षेप पर पुलिस ने शिकायत दर्ज की.

लेकिन परिस्थिति में कोई बदलाव नहीं आया. एक सप्ताह बाद फिर से साधुराम का अपहरण हो गया. राजाराम ने एक बार फिर अंजलि के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा, लेकिन अंजलि टस से मस नहीं हुई. इस बीच जो घटनाएं घटीं, वे फिल्मों में जैसा गुंडे करते हैं, ठीक वैसी ही थीं.

‘राजा राम रेस्टोरेंट’ के रोहित कुमार नाम के एक मैनेजर ने साधुराम को उतरेटिया के पास स्थित एक फार्महाउस में बुला कर कहा, ”आप के साथ मेरे साहब जो कर रहे हैं, उस का मुझे बहुत दुख है. मैं एक रिपोर्टर को ले कर आ रहा हूं. तुम पूरी बात उसे बताओ. हम साहब की करतूतें मीडिया के सामने खोल कर रख देंगे.’’

उस की बात पर भरोसा कर के साधुराम और अंजलि एक कार में बैठ कर उस से मिलने गए.

परंतु रोहित कुमार झूठा था. उस के बिछाए जाल में मन से निश्छल यह दंपति फंस गया. राजाराम के गुंडों ने दोनों का अपहरण कर लिया था. दूसरी ओर राजाराम ने अंजलि के घर जा कर उस की मां और अन्य फेमिली वालों का अपहरण कर लिया था.

सभी को अलगअलग रखने के बाद अंजलि और उस के परिवार को वे लखनऊ से करीब 200 किलोमीटर दूर एक ज्योतिषी के पास अयोध्या के एक गांव में ले गए. जिस से उन के ऊपर कराए गए तंत्रमंत्र का असर दूर हो सके.

मजे की बात यह थी कि उस समय उन के साथ साधुराम नहीं था. इस के बाद अंजलि और उस के घर वालों को लखनऊ जाने वाली ट्रेन में बैठा दिया गया और उन से कहा गया कि साधुराम कहीं भाग गया है.

2 दिन बाद साधुराम ने किसी अंजान जगह से अंजलि को फोन किया. उस ने डरीसहमी आवाज में कहा, ”राजाराम के लोगों ने मुझ से कहा है कि मुझे मारने के लिए उस ने उन्हें 5 लाख रुपए की सुपारी दी है. उन में से एक आदमी ने जीवित छोड़ कर मुझ से मुंबई भाग जाने के लिए कहा है.’’

यहीं अंजलि ने एक बड़ी गलती की. उस ने पति से लखनऊ वापस आने के लिए कहा. पत्नी की बात मान कर साधुराम लखनऊ वापस आ गया. अगले दिन पतिपत्नी राजाराम से पैर पकड़ कर माफी मांगने गए कि वह उन्हें छोड़ दे और शांति से रहने दे.

परंतु माफ करने के बजाय राजाराम के आदमियों ने मारमार कर साधुराम को अधमरा कर दिया और सादे कागजों पर दस्तखत करा लिए. इस के बाद पुलिस में जो शिकायत की गई थी, उसे वापस करा लिया गया. कुछ दिनों बाद साधुराम को फिर से गायब करा दिया गया.

गायब होने के 3 दिन बाद साधुराम की लाश हरदोई रोड पर स्थित एक आम के बाग से बरामद की गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार साधुराम की मौत गला दबाने तथा सांस रुकने से हुई थी. लाश के पास कुछ कपड़े भी मिले थे, जिन का उपयोग हत्या के दौरान किया गया था.

अब मामला और बढ़ गया. पुलिस का रवैया देख कर अंजलि अदालत पहुंची, जहां से पुलिस को हत्या का मुकदमा दर्ज कर के जांच का आदेश दिया गया. पुलिस ने अपहरण, हत्या की कोशिश और हत्या का मुकदमा दर्ज किया.

अब एक अरबपति सफल रेस्टोरेंट की चेन चलाने वाला व्यवसाई पुलिस से भागता फिरने लगा. पुलिस ने दबाव बढ़ाया तो मजबूर हो कर हत्या होने के एक महीने बाद राजाराम ने लखनऊ पुलिस के आगे आत्मसमर्पण कर दिया. लगभग डेढ़ साल तक जेल में रहने के बाद राजाराम को जमानत मिल गई और वह जेल से बाहर आ गया.

पति के हत्यारे और बिना किसी वजह के जिंदगी नरक बना देने वाले आरोपी सजा भोगे बगैर जेल से बाहर आ जाए तो हो सकता था अब वह और ज्यादा प्रेशर से जिंदगी में दखल दे, यह सोच कर अंजलि फिर कोर्ट पहुंची. तब केस स्पैशल कोर्ट को ट्रांसफर कर दिया गया.

एक साल बाद मुकदमे का फैसला आ गया. अदालत ने अपहरण, हत्या की कोशिश और हत्या जैसे गंभीर अपराध में राजाराम तथा अन्य 5 लोगों को, जिन्होंने इस गंभीर अपराध में उस की मदद की थी, सभी को 10-10 साल की सख्त कैद की सजा सुनाई थी.

परंतु अंजलि इस फैसले से संतुष्ट नहीं थी. उस ने हाईकोर्ट में अपील की. जबकि राजाराम हाईकोर्ट से जमानत करा कर जेल से बाहर आ गया था. लगभग 5 सालों तक इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में यह मुकदमा चलता रहा.

आखिर हाईकोर्ट ने तमाम आरोपियों की 10 साल की सजा को बढ़ा कर उम्रकैद में बदल दिया. इतना ही नहीं, मानसिक प्रताडऩा के लिए राजाराम गुप्ता पर 55 लाख का जुरमाना भी लगाया, जिस में से 50 लाख रुपए अंजलि को दिए जाने थे.

इस फैसले के खिलाफ राजाराम गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. सुप्रीम कोर्ट कोई निर्णय लेता, तब तक एक दशक बीत गया. अंजलि पति के वियोग में और अपराधी राजाराम अपने महल में अपार वैभव और दूसरी पत्नी के साथ जीवन जीता रहा.

आखिर सुप्रीम कोर्ट ने उस के फैसले में किसी तरह का बदलाव करने से मना कर दिया और लखनऊ हाईकोर्ट के फैसले को जस का तस रखा. यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने ताकीद भी किया कि राजाराम को तुरंत आत्मसमर्पण करना होगा.

अब सजा से बचने के लिए राजाराम ने नया नाटक किया. उस ने कहा कि उस की तबीयत बहुत खराब है, इसलिए वह नहीं आ सकता. तब अदालत ने सख्ती बरतते हुए कहा कि उसे अदालत आना होगा, वह कैसे भी आए. वरना उसे गिरफ्तार कर के लाया जाएगा और अदालत की अवमानना का नया मुकदमा दर्ज किया जाएगा.

अपने नाटक को सच साबित करने के लिए राजाराम एंबुलेंस में स्ट्रेचर पर लेट कर मुंह पर औक्सीजन का मास्क लगा कर अदालत पहुंचा. वहां से उसे लखनऊ के मैडिकल कालेज भेज दिया गया.

सालों तक वासना का यह काला खेल खेलने वाले राजाराम की तबीयत सचमुच में खराब हो गई. अब तक वह 75 साल का हो गया था. उसे अनकंट्रोल्ड डायबिटीज और हाई ब्लडप्रेशर था. एक स्ट्रोक भी आ गया. डायबिटीज इतनी बढ़ गई कि उसे आंखों से दिखाई देना बंद हो गया.

राजाराम के नसीब में अंजलि को पाना भले नहीं था, परंतु अपने अपराध की सजा भोगना भी नहीं था. सुप्रीम कोर्ट द्वारा बहाल की गई अपनी सजा का एक भी दिन भोगे बगैर सजा सुनाए जाने के दसवें दिन अस्पताल में ही उस की मौत हो गई थी.

अगले दिन जब राजाराम की शवयात्रा निकली तो उस में हजारों लोग शामिल हुए थे. उस की काली करतूतों का उन पर कोई असर नहीं था, क्योंकि राजाराम ने किसी न किसी तरह से उन की अच्छीखासी मदद की थी. उस का बिजनैस अरबों में था. उस के रेस्टोरेंट की चेन खूब धूम से चल रही थीं. आज भी उसी तरह धूम से चल रही हैं.

अब उस के बिजनैस को उस के बेटे संभाल रहे हैं. लोगों का कहना है कि उस ने पर्सनल लाइफ में जो किया, उस से उन्हें कोई मतलब नहीं है. जब तक उस के रेस्टोरेंट में वाजिब कीमत में पौष्टिक खाना मिलता रहेगा, वे उस के यहां खाने जाते रहेंगे.

राजाराम तो चल बसा, पर अंजलि अपने पति को बिना वजह खोने और न्याय न मिलने का दुख ले कर जी रही है. जबकि राजाराम का भरापूरा परिवार उस के नाम पर परदा डाल कर मजे कर रहा है.

बेटों ने रेस्टोरेंट से उस के फोटो तक हटा दिए हैं. वेबसाइट पर भी कंपनी की महानता की गाथा देखने को मिलती है, पर राजाराम का नाम कहीं दिखाई नहीं देता. शायद बेटे भी अपने पिता की काली करतूतों की छाया अपने बिजनैस पर नहीं पडऩे देना चाहते.

कथा सत्य घटना पर आधारित है, परंतु पहचान छिपाने के लिए पात्रों के नाम और स्थान बदल दिए गए हैं. Crime Fiction Story in Hindi

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