Kanpur High Profile Murder. अमीर परिवार का पीयूष श्यामदासानी अपनी पत्नी ज्योति को खिलौना समझता था और प्रेमिका मनीषा मखीजा को अनमोल तोहफा. बाप की दौलत के नशे में डूबे पीयूष ने इसी तोहफे के लिए पत्नी रूपी खिलौने को कुछ इस तरह तोड़ने का फैसला किया कि उस का किरचाकिरचा बिखर जाए. इस में वह कामयाब भी रहा, पर उस का पाप उजागर हो ही गया.
27 जुलाई, 2014 की रात साढ़े 12 बजे जब पीयूष श्यामदासानी अपने घर वालों के साथ थाना स्वरूप नगर पहुंचा, तब थानाप्रभारी शिवकुमार राठौर थाने में ही मौजूद थे. पीयूष ने उन्हें बताया कि कुछ लोगों ने उस की पत्नी ज्योति का कार सहित अपहरण कर लिया है. इसलिए तुरंत रिपोर्ट दर्ज कर के उस की खोजबीन में मदद करें.
अपहरण का नाम सुनते ही थानाप्रभारी शिवकुमार राठौर चौंके. पीयूष एक अमीर और सम्मानित परिवार का युवक था. उस के पिता ओमप्रकाश श्यामदासानी शहर के जानेमाने उद्योगपति थे. इस मामले में तत्काल एक्शन लेना जरूरी था, इसलिए शिवकुमार राठौर ने पीयूष से पूरी बात विस्तार से बताने को कहा.
इस पर पीयूष ने बताया कि रात करीब 9 बजे वह अपनी पत्नी ज्योति के साथ अपनी होंडा एकौर्ड कार से घर से निकला और सैरसपाटा करते हुए रैना मार्केट, नवाबगंज के होटल कार्निवाल पहुंचा. वहां दोनों ने साथ खाना खाया. वहां से वापसी के लिए दोनों सवा 11 बजे निकले.
जब वे कंपनी बाग चौराहे से रावतपुर की ओर जा रहे थे तभी 4 मोटरसाइकिलों पर सवार 8 लड़कों ने उन की कार को ओवरटेक किया. इसी बीच उन से हलकीफुलकी बहस हुई तो उन लोगों ने अपनी मोटरसाइकिलें कार के सामने रोक दीं और 3 लड़के उन की ओर लपके. उन में से एक ने कार का दरवाजा खोला और 2 ने उसे कार से नीचे खींच कर 3-4 तमाचे जड़ दिए.
इस के बाद वह कार सहित ज्योति का अपहरण कर फरार हो गए. वह हक्काबक्का सा खड़ा रह गया. इसी बीच वहां से एक बाइक सवार निकला तो वह उस से लिफ्ट मांग कर रावतपुर चौराहा आया. वहां से फोन कर उस ने अपने घर वालों को बुलाया और फिर थाने आ गया.
पीयूष की पूरी बात सुन कर थानाप्रभारी शिवकुमार राठौर ने इस सनसनीखेज अपहरण की जानकारी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दे दी. चूंकि घटना एक बड़े परिवार की बहू से जुड़ी थी इसलिए आईजी आशुतोष पांडेय, डीआईजी आर.के. चतुर्वेदी, एसएसपी के.एस. इमैनुएल, एसपी (क्राइम) एम.पी. वर्मा तथा सीओ (स्वरूप नगर) राकेश नायक थाना स्वरूप नगर आ गए.
आईजी आशुतोष पांडेय के निर्देश पर कानपुर के सभी थानों को इस घटना की सूचना दे कर पूरे शहर में चैकिंग शुरू करा दी गई. पुलिस अधिकारी भी अलगअलग टीमों के साथ कार सहित अपहृत ज्योति की खोज में जुट गए. आईजी आशुतोष पांडेय ने पीयूष को साथ ले कर खुद कार्निवाल होटल से घटना स्थल तक का मुआयना किया. उन्होंने पीयूष से खुद भी पूछताछ की.
पीयूष के पिता ओमप्रकाश श्यामदासानी और चाचा मधुसूदन श्यामदासानी भी ज्योति के अपहरण से हतप्रभ थे. दोनों भाई पूरे परिवार के साथ ज्योति की खोज में जुट गए. श्यामदासानी परिवार के पास 12 लग्जरी गाडि़यां थीं, जो सब की सब ज्योति की खोज में कानपुर की सड़कों पर दौड़ने लगीं. इस बीच ओमप्रकाश श्यामदासानी ने ज्योति के मायके वालों को भी इस घटना की खबर दे दी थी.
अपहरण के समय ज्योति के पास मोबाइल फोन था, जो अभी तक औन था. उस के फोन की लोकेशन पता करने के लिए आईजी आशुतोष पांडेय ने उस के फोन पर 6 तथा डीआईजी आर.के. चतुर्वेदी ने 3 मैसेज भेजे, इस से फोन की लोकेशन पनकी क्षेत्र में मिली. यह पता लगते ही पांडेय ने पनकी पुलिस को निर्देश दिया कि वह अपना सर्च औपरेशन तेज करे.
रात लगभग 2 बजे थाना पनकी की पुलिस ने आईजी आशुतोष पांडेय को बताया कि वांछित होंडा एकौर्ड पनकी के ई ब्लौक की एक गली में खड़ी है. सूचना मिलते ही आईजी आशुतोष पांडेय अपने अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों के साथ वहां पहुंच गए. गाड़ी हालांकि लाक थी, लेकिन उस की चाबी पास ही पड़ी मिल गई. पुलिस ने गाड़ी का दरवाजा खोला तो सब सन्न रह गए. कार की पिछली सीट पर ज्योति की लाश पड़ी थी.
उस के शरीर को चाकू से बुरी तरह गोदा गया था, सीट के नीचे तक खून फैला हुआ था. गौर से देखने पर यह बात साफ हो गई कि ज्योति के शरीर से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई थी और न कोई चीज लूटी गई थी. निस्संदेह हत्यारों का इरादा सिर्फ ज्योति के साथ लूटपाट करना नहीं था, बल्कि हत्या करना था. और हत्या भी इस तरह की उस की एक भी सांस बाकी न रहे.
पुलिस ने कार की तलाशी ली तो आधाआधा किलो मैदा और सूजी के बंद पैकेट, एक तौलिया, एक डायरी, और एक पीले रंग का रजिस्टर मिला. छानबीन में ज्योति के ब्लैकबेरी मोबाइल का कवर गीयर बाक्स के पास पड़ा मिला, जबकि उस का मोबाइल डैशबोर्ड पर रखा हुआ था. कार के अंदर एक कंपनी के घरेलू इस्तेमाल के 3 चाकू भी बरामद हुए.
इन चाकुओं की धार बहुत तेज थी और तीनों पर खून के धब्बे थे. लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि हत्या के लिए इन चाकुओं का इस्तेमाल नहीं किया गया था. जिस चाकू या चाकुओं से ज्योति पर वार किए गए थे, बरामद नहीं हो सके. पुलिस ने फौरेंसिक टीम को मौके पर बुला लिया था. इस टीम ने कार और कार के शीशे से पांच प्रिंट लिए, साथ ही जांच के लिए खून का नमूना भी ले कर सुरक्षित रख लिया.
ज्योति की हत्या की खबर पा कर ओमप्रकाश श्यामदासानी और उन की पत्नी पूनम घटना स्थल पर आए और बहू की लाश देख कर फफकफफक कर रोने लगे. इस घटना की जानकारी मिलते ही पूरे श्यामदासानी परिवार में कोहराम मच गया. पत्नी की लाश देख कर पीयूष तो बच्चों की तरह रो रहा था.
पुलिस ने बड़ी मुश्किल से उसे लाश से अलग किया. मौके की प्राथमिक काररवाई निपटातेनिपटाते सुबह हो गई थी. अपना काम खत्म कर के पुलिस ने लाश का पंचनामा भरा और उसे पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भिजवा दिया. तत्पश्चात पुलिस ने अपहरण और हत्या का केस दर्ज कर लिया.
उसी दिन डाक्टरों के पैनल ने ज्योति के शव का पोस्टमार्टम किया. इस पैनल में डा. पुनीत महेश, डा. शंकर अवस्थी, डा. राजेश अग्रवाल, डा. अजीत ओझा, डा. दिव्या द्विवेदी तथा डिप्टी सीएमओ डा. आर.पी. तिवारी शामिल थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ज्योति के शरीर पर 17 घाव पाए गए. जिस में गरदन पर 10-12 सेमी के 11 घाव थे. इस के अलावा 2 घाव पेट पर तथा 2 शरीर के पिछले हिस्से पर थे. जबकि एक घाव सिर के पीछे था और एक अंगुली में कट लगा था.
चूंकि हत्या का यह मामला एक ऐसे करोड़पति व्यवसायी की बहू से संबंधित था, जिस की पैठ सत्तापक्ष के राजनीतिक गलियारे तक थी, इसलिए इसे सुलझाने की जिम्मेदारी आईजी आशुतोष पांडेय ने स्वयं संभाली. इस के लिए उन्होंने एक सशक्त टीम बनाई.
इस टीम में एसएसपी के.एस. इमैनुएल, एसपी (क्राइम) एम.पी. वर्मा, सीओ (स्वरूप नगर) राकेश नायक, सीओ (नजीराबाद) अंकिता सिंह, इंसपेक्टर (स्वरूप नगर) शिव कुमार राठौर, एसओ (कोहना) पूनम अवस्थी, एसओ (काकादेव) शशि भूषण मिश्र, सबइंसपेक्टर रीता सिंह, कपिल दुबे और अनिल दुबे को शामिल किया गया.
आईजी आशुतोष पांडेय ने इस टीम के साथ ज्योति मर्डर केस की जांच शुरू की तो प्रथम दृष्टया ज्योति का पति पीयूष ही शक के दायरे में आया. इस की एक नहीं कई वजह थीं. मसलन अपहरण के समय पीयूष ने ज्योति को बचाने का प्रयास क्यों नहीं किया, अपहरण के बाद वह 100 नंबर पर काल कर सकता था जो उस ने नहीं की, उस ने रावतपुर चौराहे पर तैनात पुलिसकर्मियों को अपहरण की सूचना क्यों नहीं दी, वारदात के एक घंटे बाद वह स्वयं न आ कर घरवालों के साथ थाने क्यों पहुंचा?
पीयूष शक के दायरे में आया तो पुलिस टीम ने कार्निवाल होटल जा कर सीसीटीवी फुटेज को गौर से देखा. फुटेज देख कर लगा जैसे पीयूष वहां शारीरिक रूप से तो मौजूद था, लेकिन उस का दिमाग कहीं और था. वह काफी विचलित नजर आ रहा था. फुटेज में ज्योति तो खाना खाती नजर आ रही थी, लेकिन पीयूष खाना नहीं खा रहा था. इस के बजाए वह हुक्का गुड़गुड़ाने में लगा हुआ था.
इसी दौरान पीयूष के मोबाइल पर एक एसएमएस आया. इस के बाद उस ने अपने मोबाइल से एक नंबर डायल किया और बात करते हुए होटल की तीसरी मंजिल से उतर कर सड़क पर जा पहुंचा. इस के बाद वह बातचीत करते हुए अपनी कार के आगे चला गया. फिर वह 15 मिनट बाद वापस होटल लौटा.
सीसीटीवी फुटेज में दिखी गतिविधियों से पुलिस टीम का शक पीयूष पर और गहरा गया. अत: टीम ने पीयूष के दोनों मोबाइल फोन कब्जे में ले कर उन की काल डिटेल्स और एसएमएस डिटेल्स निकलवाई. इस से काफी चौंकाने वाली जानकारियां मिलीं. डिटेल्स से पता चला कि पीयूष ने घटना के दिन यानी 27 जुलाई की शाम 6 बजे से रात एक बजे तक एक नंबर पर करीब 150 एसएमएस किए थे, साथ ही उसी नंबर पर उस की कई बार बात भी हुई थी.
पुलिस ने उस नंबर को ट्रेस किया तो पता चला कि वह एक लड़की का नंबर है. पुलिस टीम ने जांच आगे बढ़ाई तो जानकारी मिली कि उस लड़की से पीयूष के संबंध हैं. वह लड़की गुड़गांव की थी और 2 महीने से पीयूष की फैक्ट्री में बतौर कैमिस्ट के पद पर काम कर रही थी. वह बर्रा में रह रही थी. पीयूष ने ही उसे किराए का मकान दिलवाया था.
काल डिटेल्स से ही पुलिस टीम को एक अन्य लड़की के बारे में पता चला. उस लड़की से भी पीयूष की रोज बात होती थी और पिछले 2 महीने में दोनों ओर से 6 सौ से भी ज्यादा एसएमएस किए गए थे. पुलिस टीम ने उस लड़की के संबंध में छानबीन की तो पता चला कि वह लड़की एक बडे़ व्यापारी हरीश मखीजा की बड़ी बेटी मनीषा मखीजा थी.
मनीषा मखीजा का घर पांडव नगर में पीयूष के घर के पास ही था. दोनों में गहरी दोस्ती थी और दोनों शादी भी करना चाहते थे, लेकिन कुंडली न मिलने के कारण पीयूष के घरवालों ने यह रिश्ता मंजूर नहीं किया था. बाद में पीयूष की शादी तो ज्योति से हो गई थी, लेकिन मनीषा ने शादी नहीं की थी. पीयूष की शादी के बाद भी दोनों के बीच प्रेमिल रिश्ता भी बना रहा.
लड़कियों से पीयूष के नाजायज संबंधों की बात सामने आई तो पुलिस टीम यह सोचने को मजबूर हो गई कि कहीं ज्योति के मर्डर में पीयूष की प्रेमिकाओं का तो हाथ नहीं है. यह संभव था कि किसी प्रेमिका को अपना हमसफर बनाने के लिए पीयूष ने उसी की मदद से अपनी पत्नी की हत्या न कर दी हो और कानून से बचने के लिए अपहरण की कहानी गढ़ी हो. चूंकि पीयूष हर तरफ के शक के दायरे में था, इसलिए पुलिस टीम ने उसे गिरफ्तार कर के उस से कड़ाई से पूछताछ करने का फैसला कर लिया.
अब तक ज्योति के पिता शंकर लाल अपनी पत्नी कंचन के साथ जबलपुर से कानपुर आ गए थे. वह अपने दामाद पीयूष के घर न ठहर कर अपने एक रिश्तेदार बलराम के घर रुके. पुलिस टीम उन के बयान लेने पहुंची तो कंचन फफक कर रो पड़ीं. पुलिस के सांत्वना देने के बाद उन्होंने बताया कि उन की बेटी और दामाद के रिश्ते अच्छे नहीं थे. पीयूष 2-2 घंटे तक बाथरूम में बंद हो कर किसी से बात करता था. ज्योति ऐतराज करती थी तो दोनों में झगड़ा हो जाता था. ज्योति ने यह बात कई बार हम से बताई थी, पर हम ने उसे समझा कर धैर्य रखने को कह दिया था.
शंकर लाल ने पुलिस को बताया कि उन्होंने इस बारे में पीयूष से बात की थी, लेकिन वह कोई उपयुक्त जवाब नहीं दे पाया था. उन्हें शक था कि उन की बेटी का हत्यारा पीयूष ही है.
29 जुलाई को अपराह्न 3 बजे सीओ (स्वरूप नगर) राकेश नायक और थाना प्रभारी शिवकुमार राठौर पुलिस फोर्स के साथ पीयूष के पांडव नगर स्थित बंगले पर पहुंचे. उस समय वहां दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री सुखराम सिंह, सपा विधायक मुनींद्र शुक्ला, विधायक अजय कपूर, उन के भाई कार्पोरेट चेयरमैन विजय कपूर तथा अन्य व्यापारी बैठे थे. रसूखदार लोगों को देख कर पुलिस पीयूष को गिरफ्तार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई और औपचारिकता पूरी कर के वापस लौट आई.
लगभग आधे घंटे बाद पुलिस पुन: पीयूष के घर पहुंची. सीओ राकेश नायक ने ओम प्रकाश श्यामादासानी को अपने विश्वास में ले कर उन से कहा, ‘‘पीयूष जैसे आप का बेटा है, वैसा ही हमारा भी है. हम उसे जैसे ले जाएंगे वैसे ही घर छोड़ जाएंगे.’’ ओमप्रकाश ने उन की इन बातों पर विश्वास कर लिया. इस के बाद नायक पीयूष को जीप में बिठा कर अपने औफिस ले आए. उन्होंने पीयूष को अपने कमरे में बैठा कर कमरा बंद कर लिया ताकि कोई भी पूछताछ में व्यवधान न खड़ा कर सके.
उधर पीयूष पुलिस के साथ सीओ औफिस गया तो चेयरमैन विजय कपूर कई रसूखदार लोगों के साथ वहां पहुंच गए. उन लोगों ने सीओ राकेश नायक के कमरे में जाने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें सख्ती से रोक दिया गया. इस से उन लोगों को शक हुआ कि पीयूष के साथ सख्ती की जाएगी.
फलस्वरूप उसे बचाने के लिए राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गईं. स्थिति यहां तक पहुंच गई कि यह मामला मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तक जा पहुंचा. लेकिन पुलिस भी फूंक कर कदम रख रही थी, उस ने सुबूतों के साथ पूरी जानकारी मुख्यमंत्री तक पहुंचा दी, जिस से नेताओं के हौसले पस्त हो गए.
इधर बंद कमरे में पुलिस टीम ने पीयूष से पूछताछ शुरू की तो वह हर बात पर नहीं में गरदन हिलाता और रोने लगता. जब काफी देर तक यही क्रम चला तो पुलिस टीम ने उसे होटल की वीडियो क्लिप दिखाई और घटना वाले दिन की मोबाइल सीडीआर सामने रख कर उस से संबंधित सवाल पूछे.
इस पर उस की हिम्मत जवाब दे गई और वह टूट गया. उस ने बताया कि उस ने अपनी प्रेमिका मनीषा मखीजा के साथ मिल कर ज्योति की हत्या की योजना बनाई थी. इस के लिए उस ने मनीषा के ड्राइवर अवधेश को 50 हजार की सुपारी दी थी. अवधेश ने ही अपने साथियों के साथ ज्योति की हत्या की थी.
हत्या का राज खुला तो पुलिस टीम ने ताबड़तोड़ छापा मार कर पीयूष की प्रेमिका मनीषा मखीजा और उस के ड्राइवर अवधेश के साथसाथ अवधेश के साथी सोनू, रेनू व आशीष को भी गोल चौराहा से गिरफ्तार कर लिया.
पकड़े गए आरोपियों ने षडयंत्र रचने, ज्योति का अपहरण करने और हत्या का जुर्म कुबूलते हुए लूटी गई ज्वैलरी, चाबी तथा खून से सने कपड़े तथा चाकू बरामद करा दिया. पुलिस ने उस मौल से भी सीसीटीवी फुटेज और रसीद हासिल कर ली, जहां से इन लोगों ने एक कंपनी के 3 चाकू खरीदे थे. इस के बाद आईजी आशुतोष पांडेय ने प्रेसवार्ता बुला कर हत्यारों को पत्रकारों के सामने पेश किया.
संदेह के आधार पर पुलिस ने पीयूष की एक अन्य प्रेमिका अंजू (काल्पनिक नाम) को भी पूछताछ के लिए हिरासत में लिया था, जो पीयूष की फैक्ट्री में काम करती थी. पूछताछ में उस ने बताया कि उसे पीयूष की पत्नी की हत्या के बारे मे कोई जानकारी नहीं थी.
पीयूष उसे इमोशनली ब्लैकमेल करता था और प्यार भरे मैसेज भेजता था. वह भी जवाब में उसे मैसेज भेजती थी. घटना वाले दिन पीयूष ने उसे ऐसे ही तमाम मैसेज भेजे थे. अंजू ने यह भी बताया कि पीयूष ने उस से सोमवार को मिलने और शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा जताई थी. इस के पहले कि वह उस से मिल पाती, ज्योति की हत्या हो गई. उस का ज्योति की हत्या से कोई संबंध नहीं है. अंजू निर्दोष थी, इसलिए पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे छोड़ दिया.
चूंकि आरोपियों ने षडयंत्र रचने, अपहरण करने व हत्या करने का जुर्म कुबूल कर लिया था, इसलिए थानाप्रभारी शिवकुमार राठौर ने अपनी ओर से भादंवि की धारा 364/302/201/120 बी के तहत पीयूष श्यामदासानी, अवधेश, सोनू, रेनू, आशीष तथा मनीषा मखीजा के विरूद्ध रिपोर्ट दर्ज की और उन्हें विधिवत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस पूछताछ में ज्योति मर्डर केस की सनसनीखेज कहानी कुछ इस तरह प्रकाश में आई.
कानपुर महानगर का एक पौश इलाका है पांडव नगर. यहां ज्यादातर धनाढ्य और रसूखदार लोगों के बंगले हैं. इसी पांडव नगर इलाके में धनाढ्य व्यवसायी ओमप्रकाश श्यामदासानी का भी आलीशान बंगला है. उन के परिवार में पत्नी पूनम श्यामदासानी के अलावा 2 बेटे मुकेश उर्फ मुक्की तथा पीयूष श्यामदासानी हैं. ओम प्रकाश के साथ ही उन के बड़े भाई राजमोहन श्यामदासानी भी रहते हैं.
राजमोहन और ओमप्रकाश के पिता कोड़ामल गन्नामल सन 60 के दशक में सिंध प्रांत से कानपुर आए थे. दोनों भाई पहले प्रेमनगर मोहल्ले के म.नं. 105/736 में किराए पर रहते थे और परचून की दुकान चलाते थे. परचून की दुकान में घाटा हुआ, तो उन्होंने दुकान बंद कर के गुजर बसर के लिए पंक्चर बनाने की दुकान खोल ली. पर इस काम से गुजरबसर नहीं हो पाती थी.
एक ओर दोनों भाइयों की माली हालत बिगड़ती जा रही थी, तो दूसरी ओर घर के खर्च बढ़ते जा रहे थे. ऐसे में दोनों भाइयों ने खादी ग्रामोद्योग बोर्ड से किसी तरह 10 हजार रुपए का लोन पास कराया और संगीत सिनेमा के सामने हाता में हौजरी के डिब्बे बनाने का कारखाना खोल लिया. धीरेधीरे काम बढ़ा, तो आर्थिक स्थिति सुधरने लगी.
तब तक राजमोहन 3 बेटों के पिता बन चुके थे. लेकिन ओमप्रकाश की पत्नी की गोद अभी तक सूनी थी. ओमप्रकाश और उन की पत्नी पूनम ने तमाम प्रयास किए लेकिन उन के यहां औलाद नहीं हुई. हर तरफ से निराश हो कर ओमप्रकाश श्यामदासानी ने जरूरी लिखापढ़ी के बाद अपनी बहन के बेटे मुकेश उर्फ मुक्की को गोद ले लिया.
इसे इत्तेफाक कहें या कुछ और कि मुकेश को गोद लेने के बाद ओमप्रकाश और पूनम की जिंदगी में खुशहाली आ गई. कुछ सालों के बाद पूनम पीयूष की मां भी बन गई. पीयूष के जन्म से पूनम की जिंदगी में बहार आ गई.
इसी बीच राजमोहन व ओमप्रकाश ने साझेदारी में मेसर्स हिमांगी फूड्स प्रा.लि. के नाम से सचेंडी में फैक्ट्री बना ली. यह फैक्ट्री सोना उगलने लगी तो श्यामदासानी परिवार का रसूख भी बढ़ने लगा.
इस के बाद श्यामदासानी परिवार ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. उन के यहां चारों तरफ से पैसा ही पैसा बरसने लगा. इसी बीच ओमप्रकाश और राजमोहन ने मुंबई दौड़भाग कर के कानपुर के लिए ‘पारले-जी’ की फ्रैंचाइजी मंजूर करवा ली. इस के साथ ही श्यामदासानी बंधुओं ने पनकी में ‘मेसर्स स्वाति बिस्कुट मैन्युफैक्चरिंग कंपनी’ खोल ली. स्वाति बिस्कुट के साथसाथ ये लोग पारले-जी बिस्कुट भी बनाने लगे.
श्यामदासानी परिवार के पास पैसा आया और रसूख बढ़ा तो दोनों भाइयों ने कानपुर के पौश इलाके पांडव नगर में एक आलीशान बंगला बनवाया और उसी में सपरिवार रहने लगे. अब उन की गिनती बड़े उद्यमियों में होने लगी थी. इस परिवार के पास लगभग एक दरजन लग्जरी गाडि़यां थीं, जो उन की शानओशौकत को बयां करती थीं.
कहावत है कि पैसा, पावर और पालिटिक्स तीनों ही एकदूसरे के बिना अधूरे हैं. इंसान के पास इन में से कोई एक भी हो तो बाकी 2 खुदबखुद खिंचे चले आते हैं. राजमोहन व ओमप्रकाश श्यामदासानी के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ. बिजनैस में बढ़ोत्तरी के दौरान ही ओमप्रकाश ने फ्लोर मिल में भी हाथ आजमाया.
किस्मत के धनी ओमप्रकाश को यहां भी जम कर मुनाफा हुआ. पैसा आया तो उन्हें पालिटिक्स और पावर का भी चस्का लग गया. बिजनैसमैन तो संपर्क में थे ही, कुछ ही समय में उन्होंने नेताओं से ले कर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ भी उठनाबैठना शुरू कर दिया. ऊंचे रसूखदार लोगों के संपर्क का भी उन्होंने खूब फायदा उठाया. देखते ही देखते श्यामदासानी परिवार की गिनती कानपुर शहर के अरबपति लोगों में होने लगी.
इसी अरबपति व्यवसायी ओमप्रकाश श्यामदासानी का बेटा था पीयूष श्यामदासानी. पीयूष बचपन से ही हठी था. वह जिस चीज की जिद करता, उसे हासिल कर के रहता था. पीयूष कानपुर के मशहूर ‘सर पदमपति सिंहानिया’ स्कूल में पढ़ा था.
पढ़ाई में वह भले ही कमजोर था, लेकिन उस के बचपन से शौक महंगे थे. उसे लड़कियों से दोस्ती करना, उन्हें महंगे गिफ्ट देना तथा उन के साथ घूमनाफिरना अच्छा लगता था. बड़ी मुश्किल से पीयूष इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर पाया. उस के बाद प्रोफेशनल डिप्लोमा कर के वह अपने परिवार के बिजनैस में हाथ बटाने लगा. इसी दरम्यान उस ने बीयर, शराब पीना और हुक्का बारों में जा कर हुक्का गुड़गुड़ाना सीख लिया था.
पीयूष के बंगले के पास ही एक जर्दा व्यापारी का बंगला है. मनीषा उन्हीं की बेटी है. यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही मनीषा की खूबसूरती में और ज्यादा निखार आ गया था. वह जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही पढ़नेलिखने में भी तेज थी. उस ने अंगरेजी माध्यम से शिक्षा ग्रहण की थी, इसलिए फर्राटेदार अंगरेजी बोलती थी. बड़ी बेटी होने के नाते मातापिता उसे बहुत चाहते थे और उस की हर जिद, हर शौक पूरा करते थे. मांबाप के इसी लाड़प्यार ने उसे बिगाड़ दिया था. वह होटलों और क्लबों में जाने लगी थी. वह लेटनाइट पार्टियों से लौटती तो शैंपेन के नशे में होती थी.
एक रोज पीयूष और मनीषा की मुलाकात कानपुर क्लब में हुई. पहली ही नजर में दोनों एकदूसरे के दिल में उतर गए. उस रोज दोनों एक ही पार्टी में आए थे. देर रात तक दोनों पार्टी में एंजौय करते हुए हंसतेबतियाते रहे. जाते समय पीयूष बोला, ‘‘मनीषा, आई लव यू.’’ जवाब में मनीषा खिलखिला कर हंसी और उस ने भी कह दिया, ‘‘आई लव यू टू.’’
इस के बाद मनीषा और पीयूष का प्यार परवान चढ़ने लगा. दोनों कभी रेस्टोरेंट में, तो कभी क्लब में मिलने लगे. मनीषा पीयूष से मिलने अपनी कार से जाती थी. उस का ड्राइवर अवधेश उन दोनों के प्यार से वाकिफ था. इसलिए दोनों उसे टिप दे कर खुश रखते थे. अवधेश कभीकभी कार से दोनों को हाइवे पर ले जाता था, जहां वह कार से निकल कर बाहर चला जाता था और मनीषा और पीयूष कार में ही रोमांस करते थे. कुछ ही समय में दोनों के बीच की सारी दूरियां मिट गईं. उन के बीच दिल और देह दोनों का नाता बन गया.
आंतरिक संबंध बने तो पीयूष चोरीछिपे मनीषा के बंगले पर भी जाने लगा. जरूरत पड़ने पर कभीकभी अवधेश भी बंगले में घुसने के लिए पीयूष की मदद करता था. मनीषा तो पीयूष की दीवानी थी ही, उस के पहुंचते ही वह उस के गले का हार बन जाती थी.
मनीषा और पीयूष के घर वालों को जब उन के प्यार की भनक लगी, तो उन्होंने दोनों से बात की. इस पर दोनों ने घर वालों से कह दिया कि वे एकदूसरे से प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं. घर वालों ने उन की बात मान ली और शादी करने को राजी हो गए.
लेकिन जब दोनों की कुंडली मिलवाई गई, तो गुण आपस में नहीं मिले. फलस्वरूप पीयूष के घर वालों ने इस शादी से इनकार कर दिया. शादी की बात न बनने के बाद भी पीयूष और मनीषा का प्यार कम नहीं हुआ, उन के बीच संबंध पूर्ववत ही बने रहे.
नवंबर 2012 के द्वितीय सप्ताह में जबलपुर निवासी प्लास्टिक व्यापारी शंकर लाल अपनी बेटी ज्योति का रिश्ता ले कर ओमप्रकाश श्यामदासानी के पास आए. उन्होंने पीयूष और ज्योति की शादी की बात की तो ओमप्रकाश रिश्ता करने को राजी हो गए. लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि शादी कानपुर में ही होगी.
बेटी के लिए धनाढ्य और रसूखदार परिवार मिल रहा था, इसलिए शंकर लाल राजी हो गए. श्यामदासानी परिवार ज्याति को पसंद करने जबलपुर गया. खूबसूरत ज्योति को देख कर श्यामदासानी परिवार ने उसे बहू के रूप में पसंद कर लिया. इस के बाद जोरशोर से शादी की तैयारियां शुरू हो गईं.
शंकर लाल अपनी पत्नी कंचन के साथ शादी के एक सप्ताह पहले ही कानपुर आ गए. उन्हें पूरे परिवार सहित होटल रायल क्लिफ में ठहराया गया. उन्हें किसी चीज की कमी न हो, इस का खास खयाल रखा गया. अंतत: 28 नवंबर, 2012 को धूमधाम से स्टेट्स क्लब में ज्योति और पीयूष का विवाह संपन्न हो गया.
इस विवाह समारोह में पालिटिशियंस और ब्यूरोके्रटस से ले कर शहर के रसूखदार लोग शामिल हुए. शादी का समारोह इतना भव्य था कि जिस ने भी इस में शिरकत की वह दंग रह गया. समारोह में जितने भी मेहमानों की फोटोग्राफ्स खींची गई थीं, समारोह के बाद उन्हें वह फोटोग्राफ्स बतौर उपहार दी गई थी, जिस के पीछे पीयूष और ज्योति का नाम और विवाह समारोह की तारीख लिखी थी.
ज्योति दुलहन बन कर ससुराल आई तो सभी ने उस के रूपसौंदर्य की तारीफ की. चांद जैसी बहू पा कर पूनम तो अपने भाग्य को सराह रही थीं. ज्योति भी अच्छा घर व पति पा कर खुश थी. लेकिन पीयूष इस शादी से खुश नहीं था. उस के मन में उथलपुथल मची हुई थी. शादी के बाद पीयूष और ज्योति हनीमून के लिए स्विटजरलैंड गए, जहां वे 12 दिन रहे.
कुछ माह तक पीयूष नईनवेली दुलहन ज्योति के रूपजाल में उलझा रहा. फिर धीरेधीरे वह उस से कटने लगा. दरअसल वह शादी के बाद भी अपने पहले प्यार को नहीं भुला पाया था और उस ने पुन: मनीषा से संबंध बना लिए थे. मनीषा बेलगाम लड़की थी, उसे घूमने और पार्टियों में जाने का शौक था.
पार्टियों में वह शैंपेन के नशे में हो जाती थी, जिस के बाद पीयूष ही उसे घर ले कर आता था. अब तक ड्राइवर अवधेश ने मनीषा की कार चलाना छोड़ दिया था. लेकिन वह पीयूष और मनीषा के संपर्क में बराबर रहता था. उसे जब भी पैसों की जरूरत होती थी, वह दोनों को ब्लैकमेल कर के पैसा ले लेता था.
दूसरी ओर ज्योति को पति पर शक होने लगा था. क्योंकि वह उस से नजर बचा कर फोन पर बात करता था. कभीकभी तो वह बाथरूम में घुस कर घंटों बातें करता रहता था. बात कर के वह नंबर डिलीट कर देता था. इसी तरह वह रात में मैसेज करता था और उन्हें डिलीट कर देता था.
ज्योति मोबाइल फोन उठाती, तो वह उस से फोन छीन लेता और झगड़े पर उतारू हो जाता. ज्योति ने इस रहस्य का गुप्त रूप से पता लगाया तो उसे पता चला कि उस का पति रसिया स्वभाव का है. उस के पड़ोस में रहने वाली लड़की मनीषा से नाजायज संबंध हैं.
वह उसी से घंटों बातें करता है. ज्योति ने पति की इस हरकत की जानकारी अपने मातापिता को दी, तो मां कंचन ने उसे समझाया कि सब ठीक हो जाएगा. ज्योति ने अपनी सास पूनम से पति के नाजायज रिश्तों की बात बताई, लेकिन उन्होंने यह बात नहीं मानी.
एक रोज पीयूष मनीषा से मिला तो उस ने मनीषा को बताया कि ज्योति को उन दोनों के संबंधों के बारे में पता चल गया है और वह विरोध करने लगी है. इस पर मनीषा बोली, ‘‘पीयूष, एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं. अगर तुम मुझ से प्यार करते हो और शादी करना चाहते हो तो ज्योति को रास्ते से हटाना होगा.’’
‘‘ज्योति को रास्ते से कैसे हटाया जा सकता है?’’ अवधेश के पूछने पर ज्योति बोली, ‘‘ड्राइवर अवधेश के मार्फत. वह भरोसेमंद है, पैसों के लालच में आसानी से राजी हो जाएगा. वैसे भी उसे हम दोनों के संबंधों के बारे में सब कुछ पता है.’’
बात पीयूष की समझ में आ गई. उसी दिन से दोनों ने मिल कर ज्योति की हत्या का तानाबाना बुनना शुरू कर दिया. इसी के बाद पीयूष ने मोबाइल की 5 सिम खरीदीं. 2 सिम अपनी आईडी से और 3 सिम फरजी आईडी से. फरजी आईडी वाली 2 सिम उस ने मनीषा को दे दीं. इन्हीं फरजी सिमों पर दोनों के बीच हर रोज बातचीत और मैसेजबाजी होती थी. बाद में वे दोनों नंबर और मैसेज डिलीट कर देते थे.
इसी बीच पीयूष एक अन्य लड़की अंजू के संपर्क में आया. अंजू गुड़गांव की रहने वाली थी और पीयूष की फैक्ट्री में बतौर कैमिस्ट तैनात थी. उस के मोबाइल फोन पर मैसेज भेज कर और बात कर के वह अंजू से प्यार की पींग बढ़ाने लगा. वह अंजू को हर रोज 40-50 मैसेज भेजता था. अंजू भी उस के मैसेज का जवाब देती थी. पीयूष उसे इमोशनल मैसेज भेज कर शारीरिक संबंध बनाने को कहता था. धीरेधीरे अंजू पीयूष के प्यार के जाल में फंसने लगी थी.
2 जुलाई, 2014 को पीयूष ने अवधेश को देवकी टाकीज के पास बुलाया और उस से बात कर के 50 हजार रुपए में ज्योति की हत्या की सुपारी दे दी. उस ने अवधेश को 30 हजार रुपए की पेशगी दी और शेष पैसे काम हो जाने के बाद देने को कहा. हत्या की सुपारी देने की बात उस ने मनीषा को भी बता दी.
इस के बाद अवधेश मनीषा और पीयूष के संपर्क में रहने लगा. अवधेश ने हत्या की सुपारी लेने के बाद अपनी योजना में सोनू, रेनू और आशीष को भी शामिल कर लिया. ये तीनों अवधेश के पड़ोस में ही कच्ची मड़ैया, पांडव नगर में रहते थे. सोनू परचून की दुकान चलाता था. जबकि रेनू कनौजिया ड्राइवर था. तीनों मुकर न जाएं इसलिए अवधेश ने उन्हें 10-10 हजार रुपए एडवांस में दे दिए.
सब कुछ तय हो जाने के बाद पीयूष, मनीषा और अवधेश ने मिल कर ज्योति के अपहरण और हत्या की योजना बनाई. योजना को अंजाम देने से पहले इन लोगों ने रिहर्सल भी किया. मसलन कहां से ज्योति का अपहरण करना है, कहां उस की हत्या की जानी है और फिर कार को लाश सहित कहां खड़ा करना है. ज्योति की हत्या की पूरी स्क्रिप्ट तैयार करने के बाद अंजाम देने की तारीख तय हुई 27 जुलाई, 2014.
योजना के तहत 27 जुलाई, 2014 को पीयूष ने ज्योति के साथ अच्छा बर्ताव कर के उसे घुमाने और होटल में खाना खाने के लिए राजी कर लिया. उसी रात साढ़े 9 बजे वह ज्योति के साथ रैना मार्केट स्थित होटल कार्निवाल पहुंच गया. होटल में खाना खाते वक्त ज्योति तो सामान्य थी, लेकिन पीयूष बेचैन था. वह कभी किसी को मैसेज करता तो कभी किसी को. उस के हावभावों की सारी तसवीरें होटल में लगे सीसीटीवी कैमरों में कैद हो रही थीं. उस के मोबाइल पर कभी मनीषा का मैसेज आ रहा था, तो कभी उस की दूसरी प्रेमिका का.
रात साढ़े 10 बजे पीयूष के मोबाइल पर एक काल आई. यह अवधेश की काल थी. वह बात करते हुए होटल के तीसरे माले से उतर कर नीचे आया. वहां अवधेश उस का इंतजार कर रहा था. उस ने छिप कर अवधेश से बात की और उसे 5 सौ रुपए दिए.
इस के बाद वह वापस होटल में चला गया. अवधेश अपने साथियों के साथ रैना मार्केट गया. वहां सब ने बीयर पी तथा मैगी खाई, फिर तीनों रावतपुर जाने वाली रोड पर चल पड़े.
योजना के तहत पीयूष रात सवा 11 बजे ज्योति को कार में बिठा कर रावतपुर जाने वाली रोड पर चल दिया. कुछ दूर आगे जा कर उसे अवधेश अपने साथियों सहित खड़ा दिखा.
पीयूष ने अवधेश के पास पहुंच कर गाड़ी रोक दी और खुद कार से नीचे उतर गया. उस वक्त ज्योति आगे की सीट पर बैठी थी. उस के उतरते ही अवधेश ड्राइविंग सीट पर बैठ गया और रेनू तथा सोनू पीछे वाली सीट पर. ज्योति खतरा भांप कर चिल्लाई, ‘‘पीयूष, तुम अच्छा नहीं कर रहे हो.’’
ज्योति की चीख सुन कर सोनू व रेनू ने उस के बाल पकड़ कर उसे पीछे की सीट पर खींच लिया, तब तक अवधेश ने कार आगे बढ़ा दी थी. ज्योति के चीखने की आवाज बाहर जा पाए. इस के लिए सोनू ने ज्योति का सिर सीट के नीचे किया और रेनू ने उस पर चाकू से वार करने शुरू कर दिए. तेज धार वाले चाकू के ताबड़तोड़ वारों से कार के अंदर खून ही खून फैल गया और कुछ ही देर में ज्योति की चीखें बंद हो गईं.
योजना के अनुसार अवधेश कार को पनकी के ई ब्लौक में ले गया और कार एक गली में खड़ी कर दी. इस बीच सोनू और रेनू ने ज्योति के गहने उतार लिए थे.
गहनों को उन दोनों ने वहीं लोहे के एंगलों के बीच छिपा दिया. अवधेश ने गाड़ी बंद कर के चाबी वहीं फेंक दी और फरार हो गया. जबकि रेनू व सोनू पैदलपैदल भाटिया होटल तक आए. वहां पर आशीष मोटरसाइकिल लिए खड़ा था. सोनू व रेनू उसी मोटरसाइकिल से घर लौट आए. उधर अवधेश ने मैसेज भेज कर काम हो जाने की जानकारी पीयूष को दे दी.
मैसेज मिलने के बाद पीयूष मनीषा से मिला. उस ने यह कह कर अपना सिम मनीषा को दे दिया कि वह उस का और अपना सिम तोड़ दे, ताकि किसी को कुछ पता न चल सके. इस के बाद वह अपने घर गया और शर्ट बदल कर घर वालों के साथ थाना स्वरूप नगर जा पहुंचा. वहां उस ने ज्योति के अपहरण की झूठी कहानी सुना कर उस के अपहरण की रिपोर्ट लिखा दी.
31 जुलाई, 2014 को थाना स्वरूप नगर पुलिस ने अभियुक्त पीयूष, अवधेश, सोनू, रेनू आशीष तथा मनीषा मखीजा को कानपुर कोर्ट में सीएमएम सत्यदेव गुप्ता की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला कारागार भेज दिया गया. पेशी के दौरान आक्रोशित वकीलों ने पीयूष को लातघूंसों से पीटा.
कथा संकलन तक किसी भी अभियुक्त की जमानत नहीं हो सकी थी. श्यामदासानी परिवार कानपुर का सम्मानित परिवार है. इस पूरी घटना के बाद इस परिवार का दुखी होना स्वाभाविक ही है. Kanpur High Profile Murder
— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.
— मनोहर कहानियां, 2014 में प्रकाशित






