Medical Admission Scam. सत्ता के गलियारों में पहुंच रखने वाले सुधीर शर्मा ने डाक्टरी और कई महत्त्वपूर्ण परीक्षाओं में नाकाबिल छात्रों को पास कराने के लिए एक बड़ा रैकेट खड़ा कर लिया. करोड़ों के इस महाघोटाले में अब अफसरों से ले कर मंत्रियों तक के नाम सामने आ रहे हैं. 

संकल्प श्रीवास्तव एक नवोदित फिल्मकार हैं, जो इन दिनों गंगा प्रोडक्शन हाउस इंदौर के बैनर तले एक फिल्म बनाने में व्यस्त हैं. इस फिल्म का शीर्षक काउंसलिंग है, जिसे इंडियन मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन में पंजीकृत कराया जा चुका है.

इस फिल्म की पटकथा मध्यप्रदेश के चर्चित व्यावसायिक परीक्षा मंडल यानी व्यापम महाघोटाले पर लिखी जा रही है और जल्द ही कलाकारों का चयन शुरू होने वाला है. संकल्प और उन की टीम फिल्म की सफलता को ले कर उत्साहित है. इस के लिए वह ऐसे कलाकारों का चयन कर रहे हैं, जिन की सूरत और हावभाव घोटालेबाजों से मिलतेजुलते हों.

काउंसलिंग का निर्माण शुरुआती दौर में है. इस की टीम और बैनर बहुत जानामाना नहीं है, लिहाजा कहा नहीं जा सकता कि फिल्म की प्रजेंटेशन कैसी होगी. लेकिन यह तय है कि इस महाघोटाले को बडे़ परदे पर उतार पाना एक चुनौतीपूर्ण काम है. क्योंकि इस घोटाले से संबंधित खबरों और रिपोर्टों से रोजाना अखबार रंगे पड़े रहते हैं.

यह घोटाला यूं ही आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा नहीं बन गया है, इस के पीछे खुराफाती दिमाग तो है ही. मध्यम वर्ग के महत्त्वाकांक्षी लोगों की पैसा कमाऊ मानसिकता है. शिक्षा माफियाओं के इस चक्रव्यूह से हजारों युवाओं का कैरियर चौपट हो चुका है. आइए, पहले यह जान लेते हैं कि इस घोटाले की शुरुआत कैसे हुई.

मध्यप्रदेश के निमाड़ अंचल के आदिवासी बाहुल्य जिले झाबुआ का रहने वाला सुधीर शर्मा दूध बेचने का धंधा करता था. यह करीब 20 साल पहले की बात है. सुधीर शर्मा गरीब परिवार का युवक था, लेकिन वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से खासा प्रभावित था. धंधे के अलावा वह अपनी पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान देता था. काम से फारिग होने के बाद वह मार्क्स, अरस्तू, पिकासो, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, हेडगेवार आदि व्यक्तित्व के बारे में पढ़ता था. उसे जासूसी उपन्यास पढ़ने का भी शौक था.

काम की तलाश में सन 2000 में वह विदिशा गया और वहां के सम्राट अशोक इंजीनियरिंग कालेज में उसे अनुबंध के आधार पर रसायन शास्त्र विभाग में प्रयोगशाला सहायक के पद पर नौकरी मिल गई.

ड्यूटी के बाद वह अपना अधिकांश समय स्थानीय हिंदूवादी नेताओं के साथ बिताता था. अस्पताल रोड पर दिग्गज भाजपाई नेता और पूर्व सांसद राघवजी रहते थे. सुबह के समय वह उन के यहां जाता और शाम को माधोगंज चौराहे पर स्थित विधायक ठाकुर मोहर सिंह के यहां.

स्वर्ण कालोनी में सुधीर शर्मा के साढ़ू श्यामसुंदर शर्मा अपनी प्रिंटिंग प्रेस चलाते थे. कभीकभी वह अपने साढ़ू के पास भी चला जाता था. कद्दावर नेताओं से संबंध बनने के बाद सुधीर अपनी ड्यूटी पर कभीकभार ही जाता था.

सरस्वती स्कूल में लगने वाली संघ की शाखाओं में वह जरूर जाता था. संघ के कार्यक्रमों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने पर उस की तमाम ऐसे रसूखदार लोगों से जानपहचान हो गई, जो कार्यक्रमों में आते थे. धीरेधीरे विदिशा के लोग उसे जाननेपहचानने लगे.

कालेज से मिलने वाली मामूली पगार से सुधीर शर्मा का खर्च चल जाता था. हां, जिस महीने समय पर तनख्वाह नहीं मिलती थी, तब उसे आर्थिक समस्या जरूर हो जाती थी. इस के बावजूद उस ने संघ को नहीं छोड़ा.

इसी दौरान उस की मुलाकात लक्ष्मीकांत शर्मा से हुई, जो विदिशा की तहसील सिरोंज का रहने वाला था. लक्ष्मीकांत भी संघ का एक निष्ठावान स्वयंसेवक था. वह भी अभावों से जूझ रहा था. पंडिताई के सहारे उस का जीवनयापन हो रहा था.

सन 2003 के विधानसभा चुनाव हुए. चुनाव परिणाम में भाजपा ने बाजी मार ली. 10 साल सत्ता पर काबिज रहे दिग्विजय सिंह को इन चुनावों में बाहर का रास्ता देखना पड़ा. चुनाव में लक्ष्मीकांत शर्मा भी भाजपा के निशान पर चुनाव लड़े थे, वह भी जीत गए.

भाजपा सत्तारूढ़ हुई तो उमा भारती प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. लक्ष्मीकांत शर्मा को मंत्रिमंडल में शामिल कर उन्हें खनिज जैसा महत्त्वपूर्ण विभाग सौंपा गया. उमा भारती ने कुरसी संभालते ही प्रदेश को भ्रष्टाचार मुक्त करने का अपना वादा दोहराया.

इसी बीच हुबली कांड हो गया, जिस के चलते वह भाजपा से बाहर हुईं तो बाबूलाल गौर सशर्त मुख्यमंत्री बनाए गए कि उमा बरी हो कर वापस आएंगी, तब उन्हें ससम्मान कुरसी वापस कर दी जाएगी.

उमा भारती को जब भाजपा ने ठेंगा दिखा दिया तो वह बिफर उठीं और अपनी अलग भारतीय जनशक्ति पार्टी बना डाली. उमा भारती को उम्मीद थी कि वफादारी दिखाते हुए लक्ष्मीकांत शर्मा उन के साथ चले जाएंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. सत्ता सुख छोड़ना उन्होंने मुनासिब नहीं समझा. शिवराज सिंह चौहान उस समय विदिशा से सांसद थे. लेकिन वह प्रदेश के मामलों में दखल नहीं देते थे.

सुधीर शर्मा की लक्ष्मीकांत शर्मा से बहुत नजदीकी थी. उसे अब अपनी नौकरी से कोई सरोकार नहीं था. वह अक्सर मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के बंगले पर ही रहता था. बंगले पर आनेजाने वाले लोग भी यह जान गए थे कि यही वह आदमी है, जिस के जरिए मंत्रीजी से काम करवाया जा सकता है. सुधीर शर्मा की लगन और वफादारी के पुरस्कार के रूप में लक्ष्मीकांत ने उसे झाबुआ की खदानों का पट्टा दे दिया, जिन्हें उस का छोटा भाई देखता था.

इस के बाद तो सुधीर शर्मा के रंगढंग, रहनसहन, तेवर सब बदलने लगे. मुफ्त के भाव मिली खदानें सोना उगल रही थीं. जल्द ही सुधीर शर्मा ने एक कंपनी बना डाली.

कल तक झाबुआ में साइकिल पर घूमने वाला सुधीर अब औडी जैसी महंगी कार में सैर करने लगा.

विदिशा के दुर्गानगर में किराए पर रहने वाले सुधीर ने भोपाल में आलीशान बंगला भी बनवा लिया. उस ने अंधाधुंध पैसे कमाए और एक इंजीनियरिंग कालेज में भी भागीदार बन बैठा. चंद सालों में ही वह अरबपति बन गया. यह उस के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था.

सन 2008 के विधानसभा चुनाव में शिवराज सिंह के नेतृत्व में भाजपा फिर जीती. इस बार लक्ष्मीकांत शर्मा को मंत्री बना कर 4 अहम विभाग उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, जनसंपर्क और धर्मस्थल न्यास दिए गए.

सब कुछ पहले जैसा था, बस मंत्रीजी के यहां आने वालों का वर्ग बदल गया था. पहले खदानों में ठेका लेने वाले आते थे, अब प्रोफेसर्स, इंजीनियरिंग कालेजों के मालिक, तबादले, नियुक्ति और संस्थान की मान्यता प्राप्ति के लिए आने वालों का तांता लगा रहता था. सरकारी विज्ञापन झटकने के लिए तमाम पत्रकार और प्रकाशक भी उन के बंगले के चक्कर लगाते रहते थे.

अब तक खदानों और दलाली से बेहिसाब पैसा बना चुके सुधीर शर्मा की नजर अब उन अभिभावकों पर जा टिकी, जो मंत्रीजी के पास यह आस ले कर आते थे कि उन की संतान को मैडिकल और इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला मिल जाए. चूंकि यह सब मंत्रीजी के हाथ में नहीं था, इसलिए ब्रीफकेस में लाखों रुपए ले कर आने वाले लोग मंत्रीजी की असमर्थता देख निराश हो कर वापस लौट जाते थे.

नजरों से जेबें टटोलने में माहिर हो चुके सुधीर की समझ में आ गया कि इंजीनियरिंग कालेजों में तो ठीक है, लेकिन मैडिकल कालेज में किसी को सिफारिश या फोन पर दाखिला दिलाना मंत्रीजी के अधिकार क्षेत्र की बात नहीं. क्योंकि इस की प्रवेश परीक्षा व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) से होती है.

अभिभावकों द्वारा लाखों रुपए वापस ले जाना सुधीर शर्मा को अच्छा नहीं लगता था. वह चाहता था कि नोटों से भरे वे ब्रीफकेस किसी तरह उसे मिल जाएं.

उन के पैसे हासिल करने की वह तरकीब खोजने लगा. उस ने मैडिकल कालेजों में दाखिले के लिए प्रवेश परीक्षा का आयोजन कराने वाले व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) की पेचीदगियां और कमजोरियां पता करनी शुरू कीं. व्यापम द्वारा परीक्षा कराने के तरीके को समझ कर वह कमजोरियों का फायदा उठा कर मुन्नाभाई बनाने की फैक्ट्री चलाने के उपाय खोजने लगा.

व्यापम का गठन पहले सिर्फ मैडिकल कालेजों में दाखिले के लिए प्रतियोगी परीक्षा पीएमटी आयोजित कराने के लिए हुआ था. लेकिन धीरेधीरे सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के भी अधिकार इस को मिल गए. पुलिस के सिपाही से ले कर तमाम विभागों में इंसपेक्टर पद के लिए व्यापम परीक्षाएं कराने लगा.

पीएमटी और नौकरी दिलाऊ परीक्षाओं में भारी अंतर था. नौकरी तो मंत्री और उन के दलालों की सिफारिश से मिल जाती थी, लेकिन मैडिकल में दाखिला आसान नहीं था.

सुधीर समझ गया था कि अगर मैडिकल में दाखिले बड़े पैमाने पर शुरू कर दिए जाएं तो अरबों के वारेन्यारे हो जाएंगे. पैसे कमाने के लिए अधिकारी, कर्मचारी बदले जा सकते थे, लेकिन परीक्षा का तरीका नहीं बदला जा सकता था. इसलिए सुधीर ने जल्द ही व्यापम के दफ्तर को अड्डा बना डाला, जहां उस की आवभगत दामादों की तरह होने लगी थी.

भोपाल के कारोबारी इलाके एमपीनगर और शिवाजीनगर के बीचोबीच घाटी पर बनी व्यापम की इमारत में फर्जीवाड़े की पटकथा लिख डाली गई. सुधीर शर्मा के खुराफाती दिमाग में आइडियों की भरमार थी, पर इस फर्जीवाड़े को अंजाम देने के लिए उसे कुछ लोगों के सहयोग की जरूरत थी.

सब से पहले उस ने पंकज त्रिवेदी को पटाया. पंकज त्रिवेदी व्यापम का परीक्षा नियंत्रक और डाइरैक्टर था. परीक्षा नियंत्रक के हाथ में सारे अधिकार होते हैं. लेकिन व्यापम का सारा काम चूंकि कंप्यूटर के जरिए होता था, इसलिए असिस्टैंट प्रोग्रामर सी.के. मिश्रा को भी साथ मिलाना जरूरी था. पैसों के लालच में सी.के. मिश्रा भी इन के साथ मिल गया.

जल्द ही पंकज त्रिवेदी ने नितिन महिंद्रा को भी अपने साथ ले लिया. व्यापम का चीफ सिस्टम एनालिस्ट नितिन महिंद्रा भी बेईमानी करने को तैयार हो गया तो काम चल निकला. पंकज त्रिवेदी और सी.के. मिश्रा के मुकाबले नितिन महिंद्रा बेहद चालाक था. उस के संबंध अधिकारियों और नेताओं से भी थे. वह अपनी कुरसी पर कम बैठता था, साहबों के बंगलों के चक्कर ज्यादा लगाता था. नितिन महिंद्रा पीएमटी और व्यापम की दूसरी परीक्षाओं से जुड़े लोगों के बीच एक पुल का काम कर रहा था.

सुधीर, पंकज, सी.के. मिश्रा और नितिन महिंद्रा की चौकड़ी ने पीएमटी परीक्षा के पेंच ढूंढ निकाले. जिस छात्र को पास करवाना होता था, उस के पास किसी होनहार छात्र को रोल नंबर आवंटित किया जाता था. ऐसे परीक्षार्थियों को स्कोरर कहा जाता था. अधिकांश स्कोरर उत्तर प्रदेश और बिहार से बुलाए जाते थे, जिन्हें बताए गए छात्र को नकल कराने के एवज में 1 से 2 लाख रुपए तक दिए जाते थे.

स्कोरर के जरिए छात्रों को पास कराना मुश्किल लगने लगा तो इन्होंने नया तरीका ढूंढ निकाला. जिस छात्र को पीएमटी की परीक्षा पास करानी होती थी, उसे अपनी उत्तर पुस्तिका कोरी रखने को कह दिया जाता था.

पीएमटी की परीक्षा में सवाल के जवाब वैकल्पिक होते थे. सही उत्तर पर पेंसिल से गोले का निशान बनाना होता है. परीक्षा समाप्ति के बाद उत्तर पुस्तिका व्यापम की संपत्ति हो जाती थी.

बाद में ये लोग सही उत्तरों पर निशान लगा देते थे. इस बाबत ग्राहक से उस की हैसियत के मुताबिक लगभग 20 लाख रुपए वसूले जाते थे.

वे होनहार और मेहनती छात्र जो 90-95 फीसदी सही उत्तरों पर निशान लगा कर पास होने की उम्मीद में बाहर निकलते थे, एमबीबीएस में प्रवेश से वंचित रह जाते थे, क्योंकि पैसे के बूते नाकाबिल उम्मीदवारों की उत्तर पुस्तिका पर सौ फीसदी सही निशान लग जाते थे.

इस फर्जीवाड़े से वे करोड़ों रुपए कमा रहे थे. इस के बावजूद भी इन की पैसों की भूख खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी. नाकाबिल उम्मीदवार को पास कराने का यह एक और तरीका अख्तियार करते थे. ये किसी और का फोटो लगे प्रवेश पत्र भी जारी करने लगे.

मसलन अगर सुनील को पास कराना होता था तो प्रवेश पत्र पर वे सुनील की जगह उस स्कोरर का फोटो लगा देते थे, जिसे सुनील की परीक्षा देनी होती थी. स्कोरर के द्वारा प्रवेश परीक्षा देने पर सुनील पास हो जाता और उस का मैडिकल में दाखिला हो जाता.

यह चौकड़ी ज्यादा से ज्यादा ग्राहक ढूंढने लगी. क्योंकि ज्यादा दाखिले कराने में इन का ज्यादा फायदा था. अब तक ये अरबों रुपए कमा चुके थे. इस खेल में लक्ष्मीकांत शर्मा तो परोक्ष रूप से शामिल थे ही, उन का ओएसडी ओ.पी. शुक्ला तो खुले तौर पर इन से जुड़ा था.

अंदरूनी तौर पर इस अनूठे फर्जीवाड़े की खबर फैल चुकी थी, लिहाजा धन की बहती गंगा में हाथ धोने के लिए कई दलाल, कोचिंग संचालक और प्राइवेट मैडिकल कालेजों के मालिक भी शामिल हो गए. ये लोग अपनेअपने ग्राहकों की सूची नितिन महिंद्रा और पंकज त्रिवेदी को मय फीस के दे देते थे. उस में से ये अपना हिस्सा पहले ही रख लेते थे.

अरविंदो मैडिकल कालेज का चेयरमैन किशोर भंडारी, पेशे से डाक्टर जगदीश सागर, तरंग शर्मा, कांग्रेसी नेता संजीव सक्सेना भी इस गिरोह के सदस्य बन गए. तरंग शर्मा टै्रवलिंग कारोबार चलाता था और वह एक आईपीएस अधिकारी का रिश्तेदार भी था. किसी मामले में इसे एसटीएफ ने 2 बार गिरफ्तार भी किया था.

संजीव सक्सेना खुद का इंजीनियरिंग कालेज चलाता था और 2 बार भोपाल दक्षिण विधानसभा सीट से चुनाव हार चुका था. संजीव सक्सेना की सुधीर शर्मा से गहरी दोस्ती थी और किसी समय यह बसपा प्रमुख मायावती का बेहद करीबी था.

चूंकि फर्जीवाड़े से अच्छी आमदनी हो रही थी, इसलिए संजीव सक्सेना जैसे आधा दर्जन दलाल भी ग्राहक ढूंढ कर लाने लगे थे और लाखोंकरोड़ों की थैली नितिन महिंद्रा और पंकज त्रिवेदी को भेंट करने लगे थे. ऐसा नहीं था कि मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा को इस गोरखधंधे की जानकारी नहीं थी. धंधे से अनजान बने रहने के लिए उन्हें आमदनी का एकचौथाई हिस्सा दे दिया जाता था. जो दलाल ग्राहक लाता था, उसे 25 फीसदी दिया जाता था, 50 फीसदी को ये चारों आपस में बराबरबराबर बांट लेते थे.

सत्ता इन की थी, मंत्री इन के साथ था, अधिकारी भी फर्जीवाड़े में भागीदार थे, इसलिए इन्हें किसी का डर नहीं था.

पीएमटी के अलावा कोई 2 दर्जन परीक्षाओं से भी इन्होंने अरबों रुपए बनाए. आरक्षक भरती परीक्षा, दुग्ध संघ परीक्षा, संविदा शिक्षक परीक्षा, वन आरक्षक जैसी नौकरी दिलाऊ परीक्षाओं में घूस खा कर लोगों को नौकरियां दी गईं, पर हैरत की बात यह थी कि बेईमानी की चर्चा होते हुए भी किसी ने इन के खिलाफ बोलना मुनासिब नहीं समझा.

जुलाई, 2012 में पंकज त्रिवेदी की प्रतिनियुक्ति की अवधि खत्म हो रही थी. उस के स्थान पर जो नया परीक्षा नियंत्रक आता, उस से फर्जीवाड़े पर असर पड़ सकता था. सुधीर शर्मा ने इस बारे में मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा से बात की. फिर मंत्रीजी के आदेश पर पंकज त्रिवेदी की प्रतिनियुक्ति की अवधि को नियम विरुद्ध बढ़ा दिया गया.

पेशे से प्राध्यापक पंकज त्रिवेदी को उच्चशिक्षा विभाग से खासतौर से व्यापम लाया गया था. उस में परीक्षा नियंत्रक बनने की कौन सी योग्यता थी, इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था. इसी तरह अपना हित साधने के लिए और भी कई नियम बदले गए और चहेतों को उपकृत किया गया.

लेकिन जुलाई, 2013 में इस एजुकेशन माफिया के पापों का घड़ा उस समय दरक गया, जब इंदौर में एक छात्र की शिकायत पर डा. जगदीश सागर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. आरोप फरजी तरीके से पीएमटी में पैसे वाले छात्रों को पास कराने का था.

शुरुआती पूछताछ में ही यह हैरतअंगेज बात उजागर हुई कि डा. जगदीश सागर ने 20-25 नहीं, बल्कि एक हजार से भी ज्यादा छात्रों को मुन्नाभाई बनाया है तो राज्य में हाहाकार मच गया, जिस के चलते सरकार ने जांच स्पैशल टास्क फोर्स यानी एसटीएफ को करने के आदेश दिए.

एसटीएफ ने इस मामले में तेजी से काररवाई करते हुए पूरे गिरोह का परदाफाश कर दिया. जुलाई, 2013 से ले कर जुलाई, 2014 तक एसटीएफ ने व्यापम फर्जीवाड़े की अनेक मछलियों और मगरमच्छों को गिरफ्तार कर लिया.

अब तक साफ हो गया था कि लक्ष्मीकांत शर्मा भी इस में शामिल थे, पर एसटीएफ ने एफआईआर दर्ज होने के बाद भी उन पर हाथ नहीं डाला. इस की वजह विधानसभा चुनाव थे. अगर चुनाव के वक्त रसूखदार मंत्री, जिसे अगला मुख्यमंत्री तक कहा जाने लगा था, गिरफ्तार होता तो भाजपा सरकार की छवि बिगड़ती. लिहाजा ऊपर से मिले निर्देश और दबाव की वजह से एसटीएफ के अधिकारी कसमसा कर रह गए.

लेकिन सिरोंज विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं ने लक्ष्मीकांत शर्मा को फर्जीवाड़े का दोषी मानते हुए हरा दिया. किसी को उम्मीद नहीं थी कि लक्ष्मीकांत शर्मा जैसे लोकप्रिय और जमीनी नेता अपनी परंपरागत सीट से भाजपा और शिवराज लहर में हार सकते हैं.

चुनाव परिणाम के बाद लक्ष्मीकांत शर्मा भी गिरफ्तार कर लिए गए. लक्ष्मीकांत शर्मा ने एसटीएफ को बताया कि मैं कुछ उम्मीदवारों को जानता जरूर था, लेकिन मैं ने किसी की सिफारिश नहीं की थी.

फरार सुधीर शर्मा पर दबाव बनाने के लिए पुलिस ने उस की जायदाद को कुर्क करने की अदालत में काररवाई शुरू कर दी. इस की भनक सुधीर शर्मा को लगी तो उस ने न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया.

इसी दौरान शिवराज सिंह चौहान, उमा भारती का नाम भी सामने आया और मध्यप्रदेश के राज्यपाल रामनरेश यादव पर भी अंगुलियां उठीं, क्योंकि उन का ओएसडी धनराज यादव भी गिरफ्तार हो चुका था.

अब सैकड़ों मुकदमे अदालतों में चल रहे हैं. गलत तरीके से पैसे देने वाले छात्रों और उन के अभिभावकों को भी गिरफ्तार किया जा रहा है. इस महाघोटाले के विरोध में साल भर भोपाल में धरनेप्रदर्शन होते रहे.

इसी बीच मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में भी फर्जीवाड़ा उजागर हुआ तो शिवराज सिंह को सुरक्षात्मक रवैया अख्तियार करते हुए मानना पड़ा कि व्यापम घोटाला वाकई बड़ा और गंभीर था. उन्होंने कहा कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा. केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने भी माना कि चारा घोटाले के बाद देश का यह दूसरा बड़ा घोटाला है.

शिवराज सिंह चौहान खुद के दामन पर लगे दाग आसानी से धो पाएंगे, ऐसा नहीं लग रहा. वजह उन की भतीजी रितु चौहान के चयन पर उठे सवाल और एक परीक्षा में थोक में महाराष्ट्र के गोंदिया जिले के लोगों की भरती है. गोंदिया में शिवराज सिंह चौहान की ससुराल है और उन के दोनों साले भोपाल में रह कर जायदाद की खरीदफरोख्त का कारोबार करते हैं. इस लिहाज से वे भी शक के दायरे में हैं.

इस महाघोटाले का अंत अब अदालत से होगा. लेकिन सवाल कई हैं, जिन के जवाब मिलना जरूरी है कि क्या 8-10 लोगों को इतने अधिकार दिए जाने चाहिए कि वे हेरफेर कर के लाखों छात्रों का भविष्य चौपट कर दें. मध्यप्रदेश में नौकरियां बेची जा रही थीं तो किस के इशारे और शह पर?

क्या यह महाघोटाला शिवराज सिंह चौहान की कमजोर राजनैतिक इच्छाशक्ति की एक वजह नहीं, जिन के विदिशा स्थित वेयरहाउस और बैस गांव के फार्महाउस में अकसर सुधीर शर्मा को उन के साथ भी देखा जाता था.

सरकार द्वारा जिन छात्रों से फीस के नाम पर कोई 300 करोड़ रुपए वसूले गए, परीक्षा रद्द होने के बाद भी वे पैसे वापस क्यों नहीं किए जा रहे हैं. अहम बात यह है एसटीएफ ने लक्ष्मीकांत शर्मा की गिरफ्तारी में इतना वक्त क्यों लगाया?

कई छात्र ऐसे भी हैं, जो पैसे के बल पर एमबीबीएस कर के डाक्टर बन गए और मरीजों का इलाज भी कर रहे हैं, क्या वे काबिल माने जाएंगे? जवाब हां में हो या ना में, पीएमटी की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान तो लगता ही है, जिस की आड़ में रसूखदारों और दलालों ने खरबों रुपए बनाए.

इस महाघोटाले पर बन रही फिल्म में दर्शकों को जोड़ने के लिए थोड़ा ग्लैमर का तड़का लगा दिया जाए तो फिल्म दर्शकों के दिलों को छू सकती है. Medical Admission Scam

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