Indore Crime Story. मिली ने नंदकिशोर से छुटकारा पाने के लिए जो योजना बनाई, उस में मारा गया सतीश, जिस का दोष सिर्फ यह था कि कभीकभी वह मिली के साथ मौज करने उस के फ्लैट पर चला जाता था. 

इंदौर के निपानिया स्थित ‘सैटिसफैक्शन फर्नीचर’ बहुत बड़ा फर्नीचर शोरूम है. इंदौर के ही लोटस विला, सुपर सिटी निवासी सतीश ततवादी इसी फर्नीचर शोरूम में बतौर प्रोडक्शन मैनेजर तैनात थे, मृदुभाषी और मिलनसार स्वभाव का होने की वजह से उन के साथ के कर्मचारी उन की बड़ी इज्जत करते थे. उन के परिवार में मातापिता और 2 भाइयों के अलावा पत्नी श्रेया और 14 साल की बेटी ईशा को मिलाकर 7 सदस्य थे. उन का पूरा परिवार एक साथ रहता था.

20 अगस्त को सतीश ततवादी घर पर लंच कर के अपनी कार से शोरूम पर जाने के लिए निकले. जातेजाते उन्होंने पत्नी श्रेया से कहा, ‘‘आज फैक्ट्री में एक मीटिंग है, लौटने में थोड़ी देर हो जाएगी. हो सकता है 10, साढ़े 10 बज जाएं.’’

रात को साढ़े 10 बजे तक सतीश घर नहीं लौटे तो श्रेया ने फोन किया, लेकिन फोन पति के बजाय किसी और ने रिसीव किया. श्रेया की आवाज सुन कर उस ने कहा, ‘‘मैं साहब का पीए मुकाती बोल रहा हूं. साहब अभी बिजी हैं. हम लोग इस वक्त उज्जैन में हैं, बाद में बात करना.’’

श्रेया की बात सुने बिना ही दूसरी ओर से फोन काट दिया गया. यह बात श्रेया को इसलिए अजीब लगी, क्योंकि सतीश का कोई पीए नहीं था. उन्होंने दोबारा फोन मिलाया तो वह स्विच्ड औफ मिला. इस के बाद घर वालों ने दर्जनों बार सतीश का नंबर मिलाया, पर वह लगातार स्विच्ड औफ जाता रहा.

इस से परिवार के सभी लोगों के मन में तरहतरह की शंकाए सिर उठाने लगीं. वजह यह कि न तो सतीश ने उज्जैन जाने के बारे में कुछ बताया था और न कभी वह अपना मोबाइल बंद रखते थे.

रात भर फोन मिलाते रहने के बावजूद सतीश से किसी की बात नहीं हुई. ततवादी परिवार की वह रात आंखोंआंखों में कटी. जैसेतैसे रात गुजरी. सुबह होते ही सतीश के पिता रामकृष्ण ततवादी अपने दोनों बेटों संतोष और संजय को साथ ले कर अपने क्षेत्र के थाना लसूडि़या जा पहुंचे. वहां उन्होंने थानाप्रभारी कुंवर नरेंद्र सिंह गहरवार को सारी बात बता कर सतीश की गुमशुदगी दर्ज करा दी. उन्होंने रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र किया था कि सतीश फैक्ट्री में होने वाली किसी मीटिंग में शामिल होने की बात कह कर घर से निकले थे.

थानाप्रभारी श्री गहरवार ने उन लोगों को यह आश्वासन दे कर घर लौटा दिया कि वह इस मामले की जांच पूरी तत्परता से करेंगे. श्री गहरवार छानबीन के लिए अपनी टीम के साथ फर्नीचर की उस फैक्ट्री में गए. वहां के कर्मचारियों से उन्हें पता चला कि वहां ऐसी कोई मीटिंग थी ही नहीं, साथ ही यह भी कि उस दिन सतीश वहां आए ही नहीं थे. इस का मतलब सतीश झूठ बोल कर घर से निकले थे और उन के साथ कोई घटना घट गई थी.

थानाप्रभारी कुंवर नरेंद्र सिंह गहरवार ने थाने लौट कर सतीश ततवादी के हुलिए सहित यह सूचना जिले के सभी थानों को भेज दी.

21 अगस्त, 2014 की सुबह थाना बिरलाग्राम के गांव डाबरी का एक आदमी जंगल की ओर गया तो उस ने पुलिया के पास एक लाश पड़ी देखी. लाश कंबल में लिपटी हुई थी. वह व्यक्ति दौड़ादौड़ा थाना बिरलाग्राम गया और यह बात थानाप्रभारी नरेंद्र यादव को बताई.

नरेंद्र यादव अपनी टीम के साथ जिस समय घटनास्थल पर पहुंचे, उस समय साढ़े 11 बजे थे. सूचना सही थी. मृतक 40-41 साल का हट्टाकट्टा व्यक्ति था. पुलिस ने लाश के आसपास का सारा इलाका छान मारा, लेकिन कहीं कुछ नहीं मिला. पुलिस ने लाश का पंचनामा बना कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

मृतक के शव से पुलिस को ऐसी कोई चीज नहीं मिली थी, जिस से उस की पहचान हो पाती. अलबत्ता पहचान के लिए पुलिस ने लाश के फोटो जरूर करा लिए थे. इस के बाद थानाप्रभारी नरेंद्र यादव ने अन्य थानों में पहचान के लिए लाश के फोटो वाट्सएप पर भिजवा दिए.

थाना लसूडि़या के थानाप्रभारी नरेंद्र सिंह गहरवार ने वाट्सएप पर आया लाश का फोटो देखा तो सतीश के भाई संजय और संतोष को थाने बुला लिया. दोनों भाइयों ने थानाप्रभारी के मोबाइल पर आया लाश का फोटो देखा तो चीखचीख कर रोने लगे. वह उन के भाई सतीश की लाश का फोटो था. थानाप्रभारी ने उन्हें बताया कि वह फोटो जिला नागदा जंक्शन के थाना बिरलाग्राम से आया है. अत: लाश की शिनाख्त के लिए उन्हें वहीं जाना होगा.

सतीश के पिता रामकृष्ण अपने दोनों बेटों संजय और संतोष को साथ ले कर किराए की कार से थाना बिरलाग्राम जा पहुंचे. वहां से वह पुलिस के साथ नागदा जंक्शन गए. तब तक लाश का पोस्टमार्टम हो चुका था. बापबेटों ने शव को पहचान लिया. लाश सतीश की ही थी. लिखापढ़ी के बाद लाश रामकृष्ण ततवादी को सौंप दी गई. इस के बाद सतीश की हत्या का केस थाना बिरलाग्राम में दर्ज हो गया था.

सतीश के शव को इंदौर लाया गया तो उस के घर वालों का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था. पूरे सेक्टर में सन्नाटा छाया था. सतीश की पत्नी श्रेया और बेटी ईशा अर्द्धबेहोशी के आलम में थीं. बहरहाल, उसी दिन सतीश का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

सतीश की हत्या की खबर मिलने के बाद थाना बिरलाग्राम और थाना लसूडि़या की पुलिस मिल कर जांचपड़ताल में लग गई. इस के लिए पुलिस ने सतीश के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवा ली थी. सतीश ने आखिरी बार जिस नंबर पर बात की थी, उस की लोकेशन इंदौर जिले के गांव छोटा धर्मपुरी, उज्जैन, नीमच और नागदा की आ रही थी. यानी घटना के दिन वह नंबर कई जगहों पर रहा था. चूंकि सतीश अपनी वैगनआर कार से गए थे, इसलिए पुलिस ने टोल नाकों से फुटेज निकलवा कर चेक की. लेकिन रात के अंधेरे की वजह से फुटेज में कुछ भी साफ नजर नहीं आया.

सतीश की काल डिटेल्स में 2 आखिरी नंबर संदिग्ध थे. नागदा पुलिस ने साइबर क्राइम सेल उज्जैन से उन नंबरों की जांच कराई तो उन में एक नंबर छोटी ग्वालटोली इंदौर में रहने वाली मिली उर्फ एंजल राय का निकला. थाना लसूडि़या के थानाप्रभारी नरेंद्र सिंह गहरवार ने मिली उर्फ एंजल राय के पते पर छानबीन की तो वह लापता मिली. मतलब उस ने अपना ठिकाना बदल लिया था. नरेंद्र सिंह ने यह सूचना नागदा पुलिस को दे दी.

नागदा पुलिस की जांच में यह बात सामने आई कि इंदौर से धर्मपुरी, उज्जैन और नीमच हो कर नागदा जंक्शन तक कई टोल नाके पड़ते थे. इन नाकों पर सतीश की वैगनआर का नंबर तो दर्ज था, पर फुटेज साफ नहीं थी. इस इलाके में काफी अफीम पैदा होती है, इसलिए यहां स्मग्लर सक्रिय रहते हैं. ये लोग टोल नाके से बचने के लिए जंगल के रास्तों से निकल जाते हैं. अगर सतीश की कार ऐसे किसी रास्ते से गई होती तो टोल नाके पर उस का नंबर दर्ज नहीं होता.

पुलिस की सब से बड़ी परेशानी यह थी कि उसे सतीश की वैगनआर नहीं मिल रही थी. जबकि इस बात की पूरी संभावना थी कि हत्या के बाद हत्यारों ने उसे कहीं न कहीं जरूर छोड़ा होगा. दूसरे सतीश की हत्या का कारण भी पुलिस की समझ में नहीं आ रहा था.

29 अगस्त को गणेश चतुर्थी थी. त्योहार की वजह से उस दिन इंदौर के बाजारों में कुछ ज्यादा ही भीड़भाड़ थी. त्योहार की ही वजह से पुलिस ने जगहजगह चैकिंग नाके लगा रखे थे. एक नाके से एक वैगनआर गुजरी तो पुलिस ने उसे चैकिंग के लिए रोक लिया. कार में 30 साल के आसपास का एक युवक और 24-25 साल की एक युवती बैठी थी. पुलिस देख कर दोनों सकपका गए. जांच में पता चला कि चालक के पास ड्राइविंग लाइसेंस नहीं है. ऊपर से कार की आगे और पीछे की दोनों नबर प्लेटें भी गायब थीं.

पूछताछ में जब दोनों ठीक से जवाब नहीं दे सके तो उन्हें थाने ले आया गया. थाने ला कर दोनों से पूछताछ की गई तो युवक ने अपना नाम नंदकिशोर और युवती ने अपना नाम मिली उर्फ एंजल राय बताया. वैगनआर कार के गायब होने की जानकारी सभी थानों की पुलिस को थी, इसलिए बिना नंबर की वैगनआर पर सवार नंदकिशोर और मिली से थाना लसूडि़या के थानाप्रभारी कुंवर नरेंद्र सिंह गहरवार ने जब उस कार के बारे में पूछा तो उन्होंने बिना किसी हीलाहवाली के बता दिया कि यह कार सतीश ततवादी की है, जिस की हत्या हो चुकी है.

इस के बाद कुंवर नरेंद्र सिंह गहरवार ने सतीश ततवादी की वैगनआर मिलने की सूचना थाना नागदा पुलिस को दी तो थाना नागदा की एक पुलिस टीम थाना लसूडि़या पहुंची और नंदकिशोर तथा मिली उर्फ एंजल राय को हिरासत में ले कर थाना नागदा ले गई. थाना नागदा में पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में नंदकिशोर और मिली से सतीश ततवादी की हत्या के बारे में पूछताछ शुरू हुई तो नंदकिशोर ने तो पुलिस को बरगलाने की कोशिश की, लेकिन मिली ने मुसकराते हुए अपना अपराध स्वीकार कर के सतीश की हत्या की पूरी कहानी सुना दी. मिली द्वारा सुनाई गई सतीश ततवादी की हत्या की कहानी कुछ इस प्रकार थी.

मध्य प्रदेश के बैतूल की रहने वाली मिली के 11 साल की होतेहोते उस के मातापिता एकएक कर के गुजर गए थे. मातापिता की मौत के बाद उस का ऐसा कोई रिश्तेदार भी नहीं था, जो उसे सहारा देता. इसलिए उसे किसी ने अनाथाश्रम पहुंचा दिया, वहां से वह भोपाल के चाइल्ड केयर सेंटर आ गई.

वहीं से मिली ने पढ़ाई की और डांस सीखा. डांस में उस ने अच्छी तरह महारत हासिल कर ली तो उस ने इसे ही रोजीरोटी का जरिया बनाना चाहा. वह टीवी देखती ही रहती थी. उन दिनों सोनी चैनल पर डांस का रियलटी शो बूगीवूगी आता था. डांस सीखने वालों के बीच यह कार्यक्रम काफी लोकप्रिय था. इस के अलावा अन्य लोग भी इस कार्यक्रम में काफी रुचि लेते थे. खास कर बच्चे इसे बहुत पसंद करते थे. मिली भी डांस सीख रही थी. इसलिए वह भी इस कार्यक्रम को देखती थी.

मिली खूबसूरत और आकर्षक तो थी ही, चंचल और तेजतर्रार भी थी. उस की भी इच्छा बूगीवूगी में भाग लेने की होती थी. यही वजह थी कि उस ने अपने नृत्य के कुछ चित्रों के साथ फार्म भर कर बूगीवूगी में भेज दिया. वह सुंदर भी थी और डांस में पारंगत भी, बूगीबूगी में उस का चयन हो गया. अब तक मिली 18 साल की हो चुकी थी.

वह मुंबई पहुंच गई. बूगीवूगी में उस ने अपना ऐसा जौहर दिखाया कि उस साल की वह ‘विनर’ घोषित की गई.

मिली मुंबई में ही रह कर काम तलाश करने लगी. लेकिन उसे कहीं चांस नहीं मिला. धीरेधीरे पैसे खत्म हो गए और कहीं काम नहीं मिला तो वह इंदौर वापस आ गई. बूगीबूगी का विनर होने पर उसे जो पैसे इनाम में मिले थे, वह मुंबई में ही काम की तलाश में खर्च हो गए थे. अब वह बच्ची भी नहीं रही थी कि चाइल्ड केयर सेंटर में रह लेती. इसलिए इंदौर आ कर सब से पहले उस ने ग्वालटोली मोहल्ले में किराए पर मकान ले कर रहने की व्यवस्था की. इस के बाद गुजरबसर के लिए वह बच्चों तथा लड़कियों को डांस सिखाने लगी. इस काम से उस की ठीकठाक कमाई होने लगी, जिस से वह ठाठ से रहने लगी.

मिली अब तक जवान हो चुकी थी. लेकिन उस का कोई ऐसा अपना नहीं था, जिस से वह अपना सुखदुख बांट सकती. अकेली होने की वजह से कभीकभी उसे घुटन सी होने लगती थी. अब उसे एक ऐसे साथी की जरूरत महसूस हो रही थी, जो उस की भावनाओं को समझे और उस की हर तरह से मदद भी करे. उस की यह तलाश जल्दी ही पूरी हुई. उसे साथी के रूप में बलवंत सिंह तोमर मिल गया. बलवंत अच्छा आदमी था. इसलिए मिली ने उस से प्यार ही नहीं किया, बल्कि उसे जीवनसाथी भी बना लिया.

लेकिन ज्यादा दिनों तक बलवंत सिंह तोमर की मिली से निभ नहीं पाई. इस की वजह यह थी कि मिली की महत्वाकांक्षाएं बहुत ऊंची थीं. डांस कार्यक्रम में भाग लेने की वजह से उस की सोच तो बदल ही गई थी, रहनसहन भी बदल गया था. इसलिए उस के खर्च भी अनापशनाप हो गए थे, जो अब डांस सिखाने से पूरे नहीं हो रहे थे. ऐसे में पैसे कमाने के उस ने अन्य रास्ते खोज लिए. निश्चित था, वे रास्ते ठीक नहीं रहे होंगे, इसलिए बलवंत ने उस से किनारा कर लिया.

बलवंत के अलग होते ही मिली उर्फ एंजल राय पूरी तरह से आजाद हो गई. वह इंदौर के बड़ेबड़े मौल में जाती और वहां बड़े घरों के लड़कों को फांस कर उन्हें खुश करती. बदले में उन से मोटी रकम ऐंठती. इस तरह वह हाईप्रोफाइल कालगर्ल बन गई. धीरेधीरे तमाम लड़के उस के परमानेंट ग्राहक बन गए, जिस से अब उसे मौल के भी चक्कर नहीं लगाने पड़ते थे.

लेकिन छोटी ग्वालटोली में जहां वह रहती थी, वहां उस के ग्राहकों को आनेजाने में असुविधा होती थी, इसलिए उस ने सुखलिया के वीड़ानगर, प्राइम सिटी में एक बढि़या फ्लैट किराए पर ले लिया. अब वह अपने ग्राहकों को अय्याशी के लिए इसी फ्लैट पर बुलाने लगी.

अकेली औरत पर लोग वैसे भी तरहतरह की शंकाएं करते हैं. अगर उस के यहां आनेजाने वालों का तांता लगा हो तो आसपास वालों को अंगुली उठाते देर नहीं लगती. यह बात मिली को पता थी, इसलिए उसे एक ऐसे साथी की जरूरत थी, जो उस के साथ रह सके. उस ने तलाश की तो जल्दी ही उसे एक ऐसा साथी मिल गया. नीमच से नौकरी की तलाश में इंदौर आए नंदकिशोर से उस की मुलाकात हुई तो उस ने उसे अपने साथ रख लिया. इस तरह उसे एक साथी मिल गया.

इस के बाद मिली ने इंदौर के अरबिट मौल में चलने वाले पब में डांसर की नौकरी कर ली. वहां से उसे वेतन तो मिलता ही था, ग्राहक भी आसानी से मिल जाते थे. सतीश ततवादी से भी उस की मुलाकात इसी पब में हुई थी. सतीश इस पब में अक्सर शराब पीने आता था.

मिली के अनुसार सतीश शराब का ही नहीं, शबाब का भी शौकीन था, इसलिए उस की नजरें मिली पर जम गई थीं. मिली को ऐसे लोगों की जरूरत ही रहती थी, इसलिए उस ने उस की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया. इस के बाद सतीश अकसर मिली के फ्लैट पर जाने लगा, जहां वह मोटी रकम खर्च कर के शराब और शबाब का आनंद लेने लगा.

मूलरूप से जबलपुर के रहने वाले सतीश ततवादी एमबीए कर के नौकरी की तलाश में इंदौर आया तो वहां उसे सैटिसफैक्शन फर्नीचर कंपनी में सुपरवाइजर की नौकरी मिल गई थी. सूझबूझ और मेहनत से काम करने की बदौलत सतीश को जल्दी ही ठीकठाक वेतन तो मिलने ही लगा था, कंपनी ने तमाम सुविधाएं भी दे दी थीं.

सतीश को ठीकइाक वेतन मिलने लगा तो सतीश ने इंदौर की सिंगापुर सुपरसिटी जैसी पौश कालोनी में घर खरीद लिया और पूरे परिवार के साथ उसी में रहने लगा.

मधुभाषी और मिलनसार होने की वजह से सतीश जल्दी ही मालिकों का ही नहीं, साथ काम करने वाले कर्मचारियों का भी चहेता बन गया था.

सतीश मिली के रूपजाल और अदाओं में कुछ इस तरह उलझा कि अक्सर शाम को उस के फ्लैट पर जाने लगा. यह बात मिली के साथ रहने वाले नंदकिशोर को अच्छी नहीं लगती थी, क्योंकि मिली अब उसे सोने का अंडा देने वाली मुर्गी नजर आ रही थी. वह उस से शादी करना चाहता था. यही वजह थी कि सतीश अब उसे फूटी आंख नहीं सुहाता था. इसलिए वह उस से छुटकारा पाने के उपाय सोचने लगा.

दूसरी ओर मिली को भी नंदकिशोर की सच्चाई का पता चल गया था. इसलिए वह उस से छुटकारा पाना चाहती थी. मिली को कहीं से पता चल गया था कि नंदकिशोर शादीशुदा ही नहीं है, बल्कि 3 बच्चों का बाप भी है. भला ऐसे आदमी से वह कैसे शादी करती. लेकिन उस से पीछा छुड़ाना मिली के लिए इतना आसान भी नहीं था, क्योंकि वह उस की सारी पोलपट्टी जानता था.

नंदकिशोर को सतीश से छुटकारा पाने का कोई उपाय नहीं सूझा तो उस ने उस की हत्या का इरादा बना लिया. लेकिन यह काम मिली की मदद के बिना नहीं हो सकता था. इसलिए उस ने अपने मन की बात मिली से कही. इस अपराध  में नंदकिशोर का साथ देने के लिए मिली तैयार हो गई, क्योंकि वह नंदकिशोर से छुटकारा पाना चाहती थी.

उस का सोचना था कि सतीश की हत्या के आरोप में नंदकिशोर जेल चला जाएगा तो उसे अपने आप नंदकिशोर से छुटकारा मिल जाएगा. यही सोच कर उस ने नंदकिशोर के साथ मिल कर सतीश की हत्या की योजना बना डाली.

योजना के अनुसार, 20 अगस्त, 2014 को मिली ने सतीश को फोन कर के अपने घर बुला लिया. सतीश को ऐसे मौके की हमेशा तलाश रहती थी, इसलिए मिली की ओर से दावत मिलते ही वह शराब की बोतल और खानेपीने का सामान ले कर घर में मीटिंग की बात बता कर मिली के घर अय्याशी करने पहुंच गया.

नंदकिशोर को वह पहचानता ही था. मिली ने सतीश को उसे अपना भाई बता रखा था. सतीश के पहुंचते ही शराब की बोतल खुल गई और पीनापिलाना शुरू हो गया. सतीश को नशा चढ़ा तो उस के अंदर का शैतान जाग उठा. उस शैतान को शांत करने के लिए वह मिली से छेड़छाड़ करने लगा.

नंदकिशोर सतीश से वैसे ही नफरत करता था. उस दिन वह उसे खत्म करने की योजना बनाए बैठा था. इसलिए उस ने सतीश को दबोच लिया. योजना के अनुसार उस ने सतीश को ज्यादा शराब पिला कर नशे में धुत कर दिया था, इसलिए वह विरोध करने की स्थिति में भी नहीं था. उस ने पायजामे का नाड़ा सतीश के गले में लपेट कर कसना शुरू कर दिया.

नंदकिशोर सतीश का गला घोंट रहा था तो शातिर मिली अपनी योजना के अनुसार मोबाइल से उस की वीडियो रिकौर्डिंग कर रही थी. सतीश की मौत हो गई तो लाश को ठिकाने लगाने के लिए नंदकिशोर ने उसे कंबल में लेपट कर रस्सी से बांध दिया. इस के बाद लाश को उठा कर नीचे लाने के बजाय उस ने उसे सीढि़यों के पास रख कर पैर से लुढ़का दिया.

मिली ने नंदकिशोर की इस हरकत की भी वीडियो रिकौर्डिंग कर ली थी. मिली ने यह वीडियो रिकौर्डिंग इसलिए की थी कि वह इसे पुलिस को दिखा कर नंदकिशोर को जेल भिजवा देगी.

इस के बाद उन्होंने सतीश की लाश को उसी की वैगनआर कार में रखा और धर्मपुरी (सांवरे क्षेत्र) उज्जैन होते हुए आगे बढ़ गए. लाश उन्होंने नागदा जंक्शन के थाना बिरमाग्राम के गांव डाबरी में एक पुलिया के पास फेंक दी थी. एक टोल नाके पर टैक्स देने की वजह से उन की कार का नंबर नोट हो गया था. इस के बाद उन्होंने कार की दोनों नंबर प्लेटें तोड़ कर फेंक दी थीं.

बिना नंबर की कार से वे सड़क से नहीं जा सकते थे. इसलिए वे जंगल के रास्ते से नीमच पहुंचे. सतीश का पर्स उन्होंने पहले ही निकाल लिया था. पैसे नंदकिशोर ने अपनी जेब में रख लिए. एटीएम तथा पेनकार्ड इंद्रानगर स्थित अपने घर में रख दिए. बाकी के कागज, खाली पर्स, घड़ी और मोबाइल फोन रास्ते में एक नदी में फेंक दिए.

रिमांड के दौरान पुलिस ने नीमच स्थित नंदकिशोर के घर से सतीश का एटीएम और पेनकार्ड बरामद कर लिया था. मिली ने सतीश की हत्या का जो वीडियो रिकौर्डिंग की थी, सुबूत के लिए पुलिस ने उस की सीडी बनवा ली थी. दूसरे को फंसाने के लिए अपराध में साथ देने वाली मिली को शायद यह पता नहीं था कि अपराध में साथ देने वाला भी अपराधी माना जाता है.

पुलिससिया काररवाई पर नजर रखने के लिए नंदकिशोर और मिली रोज अखबार पढ़ते थे. धीरेधीरे उन के पैसे खत्म हो गए तो वे इंदौर पैसे लेने जा रहे थे, तभी पकड़े गए. रिमांड अवधि खत्म होने पर दोनों को दोबारा अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

सतीश के घर वाले उस की मौत से दुखी तो हैं ही, जिस तरह से वह मारा गया, उस से शर्मिंदा भी हैं. सभी अंदर ही अंदर घुट रहे हैं कि आसपड़ोस वालों को कैसे मुंह दिखाएं.  Indore Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

— 2014 में प्रकाशित

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