Hidden Body Case. शमसुद्दीन ने देह व्यापार करने वाली फरजाना से इस शर्त पर निकाह किया था कि वह निकाह के बाद देह व्यापार हरगिज नहीं करेगी. इस शर्त पर सहमति दिखाने के बाद शमसुद्दीन ने उस से निकाह कर लिया. निकाह के कुछ सालों बाद फरजाना अपना वचन भूल कर फिर से देहधंधे पर उतर आई. तब शमसुद्दीन ने उस की हत्या कर 20 फीट नीचे घर में ही दफन कर दिया. अब 34 साल बाद हत्या का यह जिन्न इस तरह सामने आया कि…

उस दिन अहमदाबाद के वटवा के कुतुबनगर की उस गली में सुबह ही एक बंद पड़े मकान के सामने पुलिस की गाडिय़ां आ कर खड़ी हो गई थीं. कुछ मजदूर फावड़े और कुदाल ले कर पुलिस वालों के साथ थे तो साथ ही एक जेसीबी मशीन भी थी.

पुलिस वालों और उन के साथ आए इस तामझाम को देख कर उत्सुकतावश मोहल्ले वाले इकट्ठा हो गए थे. लोगों की समझ में नहीं आ रहा था कि इस पुराने मकान में ऐसा क्या है कि सुबहसुबह ही पुलिस ने आ कर इसे घेर लिया. जबकि वह मकान कई सालों से बंद पड़ा था.

कुछ लोगों को तो यह भी नहीं मालूम था कि उस में रहता कौन था. पुलिस के साथ आए तामझाम को देख कर लोगों को यह समझते देर नहीं लगी थी कि पुलिस उस मकान की खुदाई कराने आई है. लेकिन वह खुदाई क्यों कराना चाहती है, इस बात से सभी अंजान थे.

मोहल्ले के कुछ पुराने लोगों को बस इतना पता था कि कभी यहां एक महिला रहती थी. बाद में वह यह मकान बेच कर कहीं और रहने चली गई थी. पुलिस की बातचीत से पता चला कि पुलिस को शक है कि इस मकान की जमीन के नीचे 34 साल पुराना एक खौफनाक राज दफन है. एक ऐसा राज, जिसे मिट्टी की कई परतों ने ढक रखा है. एक ऐसा राज, जिसे छिपाने वाला शख्स पिछले 34 सालों से सामान्य जिंदगी जी रहा है.

सब से हैरान करने वाली बात यह थी कि पुलिस के पास न कोई शिकायत थी, न कोई रिकौर्ड था और न ही कोई लाश थी. पुलिस के पास थी तो बस एक अधूरी सूचना कि कुतुबनगर के मकान नंबर 10 में एक युवती की हत्या कर के उस की लाश को मकान में ही दफना दिया गया था. इस बात को 34 साल हो गए थे.

सूचना सही थी या अफवाह? इस का जवाब उस मकान की जमीन ही दे सकती थी.

दरअसल, अहमदाबाद की क्राइम ब्रांच को एक मुखबिर से सूचना मिली थी कि वटवा के कुतुबनगर में एक मकान में 34 साल पहले एक महिला की हत्या कर के लाश उसी मकान में दफना दी गई थी.

पहले तो पुलिस ने यह पता लगाया कि सूचना सही है या गलत? जब मुखबिर ने भरोसा दिलाया कि सूचना सही है, तब क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने इसे गंभीरता से लिया. इंसपेक्टर ए.पी. जेबलिया और उन की टीम ने कुतुबनगर जा कर छानबीन शुरू कर दी थी.

यह भी पता लगाया कि इलाके में कितने मकान हैं? कौन मकान कितने दिन से बंद पड़ा है? कौन लोग सालों पहले यहां रहते थे? किसी महिला के अचानक गायब होने की चर्चा कभी हुई थी? पुलिस ने एकएक सवाल के जवाब तलाशने शुरू किए. मुखबिरों को भी सक्रिय कर दिया गया.

कई दिनों की पूछताछ के बाद एक बात बारबार सामने आ रही थी कि मकान नंबर 10 कई सालों से बंद पड़ा था. लेकिन उस के बारे में एक अजीब बात यह सुनने को मिली कि कभीकभी कोई आदमी वहां आता था और मकान के बाहर दीया जला कर चला जाता था.

पुलिस के लिए यह छोटी सी बात भी महत्त्वपूर्ण थी. इंसपेक्टर ए.पी. जेबलिया ने आसपास के लोगों से पूछताछ की. इस पूछताछ में एक व्यक्ति ने बताया कि काफी साल पहले उस मकान में एक महिला रहती थी. बाद में उस ने इस मकान को किसी दूसरे व्यक्ति को बेच दिया था.

पुलिस के सामने 2 बातें थीं. एक मुखबिर की सूचना और दूसरी बंद पड़ा मकान. मकान किस का था, यह भी पता नहीं था. बिना अनुमति के खुदाई भी नहीं की जा सकती थी. अनुमति किस से ली जाए. मुखबिर की बात पर कितना भरोसा किया जाए? केवल शक के आधार पर किसी का घर खोद डालना कहां तक ठीक था?

फिर भी इंसपेक्टर एपी जेबलिया ने वरिष्ठ अधिकारियों से अनुमति ली. वरिष्ठ अधिकारियों ने अनुमति तो दे दी, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि परिणाम चाहिए. उस के बाद मजिस्ट्रैट की मौजूदगी में मकान की तलाशी और खुदाई कराने का फैसला लिया गया.

28 मार्च, 2025, दिन शनिवार को सुबह क्राइम ब्रांच पुलिस की एक टीम, जिस में इंसपेक्टर ए.पी. जेबलिया, एसआई आर.सी. शर्मा और 10 सिपाही 2 वाहनों में कुतुबनगर जा पहुंची. साथ में खुदाई के लिए फावड़े और कुदाल लिए मजदूरों के अलावा एक जेसीबी मशीन भी थी.

सुबह करीब पौने 9 बजे पुलिस और मजिस्ट्रैट पूरे तामझाम के साथ उस मकान पर पहुंच गए थे. पुलिस को देख कर आसपास के लोग जमा होने लगे. पुलिस ने मजदूरों को समझाया कि खुदाई ध्यान से करनी है. अगर हड्डी या कोई संदिग्ध चीज मिले तो हाथ मत लगाना. तुरंत पुलिस को बताना.

सुबह 9 बजे से खुदाई शुरू हुई. कुछ देर बाद जेसीबी भी चली. आसपास के लोग आपस में पूछ रहे थे कि क्या हुआ, जो इस घर की खुदाई की जा रही है? कोई क्या जवाब देता, क्योंकि किसी को कुछ पता नहीं था.

पुलिस भीड़ को हटा रही थी, मगर भीड़ की नजरें खुदाई वाली जगह पर ही टिकी थीं. 5 फुट, फिर 7 फुट, लेकिन कुछ नहीं मिला. केवल मिट्टी निकलती रही.

फोरैंसिक टीम भी वहां आ गई थी. वह निकलने वाली मिट्टी को बारीकी से देख रही थी. कोई हड्डी, कपड़े का टुकड़ा या कोई धातु वगैरह? कोई ऐसी चीज, जो 34 साल पुराने अपराध की ओर इशारा कर सके?

लेकिन अब तक कुछ भी हाथ नहीं लगा था. इंसपेक्टर जेबलिया के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. अगर कुछ नहीं मिला तो वह क्या जवाब देंगे? क्या मुखबिर की खबर गलत थी? कहीं पुलिस गलत मकान पर तो नहीं पहुंच गई?

दोपहर हो आई. गरमी भी तेज हो गई थी. मजदूर भी थकने लगे थे. कुछ देर के लिए काम रोक दिया गया. मजदूरों को खाना खिलाया गया. लोग तरहतरह की बातें कर रहे थे, लेकिन इंसपेक्टर जेबलिया के दिमाग में एक ही बात घूम रही थी कि अगर यहां कुछ नहीं है तो मुखबिर ने इतने विश्वास के साथ यह जानकारी कैसे दी कि यहां लाश है. लाश जरूर मिलेगी.

उन्होंने उस सिपाही को बुलाया, जिस ने मुखबिर से संपर्क किया था. उन्होंने उस से पूछा, ”तुम्हें पूरा भरोसा है कि लाश यहीं है?’’

सिपाही ने मुखबिर से फोन कर के बात की. उस के बाद उस ने कहा, ”सर, मुखबिर कह रहा है कि लाश जरूर मिलेगी. आप खुदाई बंद मत करवाइए.’’

इंसपेक्टर जेबलिया कुछ क्षण चुप रहे. उस के बाद बोले, ”ठीक है, खुदाई जारी रखो.’’

जेसीबी फिर चलने लगी. मजदूर फिर मिट्टी हटाने लगे. खुदाई जरूर हो रही थी, पर जेबलिया साहब काफी तनाव महसूस कर रहे थे. उन का सोचना था कि अगर मुखबिर की खबर गलत निकली तो उन की बड़ी बदनामी होगी. थोड़ी देर बाद पता चला कि जमीन के नीचे पुराने समय का एक सेप्टिक टैंक था. अब मामला और पेचीदा हो गया.

मिट्टी के साथ छोटेछोटे सख्त टुकड़े मिलने लगे थे. उन्हें पानी से धो कर देखा गया. कुछ टुकड़े हड्डियों के जैसे लग रहे थे.

सवाल यह उठा कि क्या वे इंसानी हड्डियां थीं या किसी जानवर की? सेप्टिक टैंक होने के कारण पुलिस के सामने यह भी संभावना थी कि हो सकता है कि पहले किसी ने मांसाहार का बचा हुआ हिस्सा यहां फेंका हो.

फिर भी फोरैंसिक टीम ने हर संदिग्ध टुकड़े को अलगअलग जिप बैग में सुरक्षित रखना शुरू कर दिया. समय तेजी से बीत रहा थी. उसी के साथ जेबलिया साहब की चिंता बढ़ती जा रही थी. शाम के 4 बज गए. अब तक पुलिस के हाथ कोई ऐसा सबूत नहीं लगा था कि यह साबित हो सके कि यहां लाश दबाई गई थी.

इतनी खुदाई के बाद पता चला कि सेप्टिक टैंक का आधा हिस्सा पड़ोसी के मकान के नीचे है. अब वहां की खुदाई कैसे की जाए. पुलिस ने पूरी बात पड़ोसी को बताई. उस मकान के पीछे फ्लैट बने थे. खुदाई वहां भी करनी पड़ती.

इंसपेक्टर जेबलिया ने फ्लैट के लोगों से भी बात की. उन्हें समझाया गया कि वह किसी पुराने गंभीर अपराध की जांच कर रहे हैं, इसलिए खुदाई करना जरूरी है. पड़ोसी खुदाई कराने के लिए तैयार हो गया और फ्लैट वाले भी. जेसीबी मशीन ने फिर से अपना काम शुरू कर दिया.

शाम होने लगी थी. अब तक करीब 15 फुट गहराई तक खुदाई हो चुकी थी, लेकिन अभी तक पुलिस के हाथ कोई बड़ा सुराग नहीं लगा था. कुछ पुलिस वाले तो थक कर एक किनारे बैठ गए थे.

मशीन और मजदूर लगातार अपना काम कर रहे थे. तभी शाम के करीब सवा 6 बजे एक मजदूर की नजर मिट्टी में पड़ी किसी चीज पर गई. उस ने फावड़ा रोक दिया और कुछ देर तक उस चीज को ध्यान से देखता रहा. फिर जोर से बोला, ”साहब, यहां कुछ है.’’

ए.पी. जेबलिया दौड़ कर वहां पहुंचे. मिट्टी हटाई गई और वहां जो दिखाई दिया, उसे देख कर वहां मौजूद हर व्यक्ति सन्न रह गया. वह कोई पत्थर नहीं था.

वह मानव शरीर की एक बड़ी हड्डी थी. इंसपेक्टर जेबलिया ने उत्साह से मजदूरों से कहा, ”और तेजी से खोदो.’’

मजदूरों में भी अचानक जोश आ गया था. फावड़े तेजी से लेकिन संभाल कर चलाने लगे. मिट्टी हटती गई. फिर एक हड्डी के बाद दूसरी हड्डी. और फिर खोपड़ी दिखाई दे गई. हाथों की हड्डियां, पैरों की हड्डियां. इस तरह मानव शरीर की हड्डियां निकलने लगीं.

अब किसी को किसी तरह का संदेह नहीं रहा कि मुखबिर ने जो बताया था, वह झूठ था. पुलिस की कई घंटे की मेहनत आखिरकार रंग लाई और पुलिस जो चाहती थी, वह सामने था.

सुबह से खुदाई कर रहे मजदूरों के चेहरे पर अब थकान नहीं, उत्साह था, क्योंकि उन की मेहनत सार्थक हो गई थी. रात करीब 8 बजे तक 20 फुट से ज्यादा गहरा गड्ढा खोद कर मानव शरीर की अधिकांश हड्डियां बाहर निकाल ली गई थीं.

इंसपेक्टर जेबलिया ने तुरंत वरिष्ट अधिकारियों को सूचना दी. गड्ïढे से निकली हड्डियों को व्यवस्थित किया गया. वीडियोग्राफी कराई गई. उस के बाद पंचनामा किया गया. फिर सारी हड्डियों को फोरैंसिक जांच के लिए फोरैंसिक लैब भेज दिए गया.

इस तरह पुलिस ने एक बड़ी चुनौती पार कर ली, लेकिन अब असली सवाल यह था कि ये हड्डियां किस की थीं? पुलिस ने पुराने रिकौर्ड और मुखबिरों से मिली जानकारी को फिर खंगालना शुरू किया.

काफी खोजबीन के बाद एक परिवार के बारे में जानकारी मिली, जिस में सालों पहले हत्या की चर्चा हुई थी, लेकिन उस समय उस के बारे में न तो किसी ने शिकायत की थी, न ज्यादा चर्चा ही हुई थी. इसलिए बात दब कर रह गई थी.

खोजतेखोजते पुलिस उस परिवार तक पहुंची. पूछताछ में एक व्यक्ति का नाम सामने आया, बिलाल. बिलाल को पुलिस ने क्राइम ब्रांच के औफिस बुलाया. उस ने पुलिस को जो बताया, उस से 34 साल पुरानी एक कहानी सामने आई.

बिलाल ने पुलिस को बताया कि उस ने सालों पहले एक युवती की हत्या होते अपनी आंखों से देखी थी. जिस मकान से मानव हड्डियां मिली थीं, वह उस की सास सालिया बीबी का मकान था. उस हत्या में वह भी शामिल थी. पुलिस ने जब बिलाल से सालिया बीबी के बारे में पूछा तो पता चला कि उस की मौत कई साल पहले हो चुकी थी.

पुलिस ने जब बिलाल से हत्या में शामिल होने वालों के नाम पूछे तो उस ने बताया कि वह हत्या अब्दुल करीम, इकबाल खेडावाला और शमसुद्दीन खेडावाला ने की थी. इस के बाद पुलिस ने अब्दुल करीम के बारे में पता किया. पता चला वह तो मर चुका है.

इस के बाद इकबाल और शमसुद्दीन के बारे में पता किया गया. शमसुद्दीन अहमदाबाद के जमालपुर में पत्नी और बच्चों के साथ रहता था और आटा चक्की चलाता था. 34 साल पहले हत्या करने वाले शमसुद्दीन की जिंदगी आराम से चल रही थी. उसे पूरा यकीन था कि अतीत हमेशा के लिए दफन हो चुका है, लेकिन एक दिन पुलिस उस के घर के सामने आ पहुंची थी. पुलिस ने हत्या के मामले में शमसुद्दीन को गिरफ्तार कर लिया. इस गिरफ्तारी से वह हैरान था. वही ही नहीं, जिस ने भी सुना वही हैरान था.

शमसुद्दीन को क्राइम ब्रांच के औफिस ला कर पूछताछ शुरू हुई. वह बचने की कोशिश करता रहा. पुलिस सवाल पर सवाल करती रही. मामला भले ही 34 साल पुराना था, लेकिन पुलिस के पास चश्मदीद गवाह था.

आखिरकार शमसुद्दीन का आत्मविश्वास टूटने लगा. फिर उस ने वह राज खोल दिया, जिसे उस ने 3 दशक से अपने अंदर दबा रखा था. उस ने बताया कि जिस औरत की हत्या कर के लाश उस घर के सेप्टिक टैंक में दबाई गई थी, वह उस की पत्नी फरजाना थी.

इतनी जद्दोजहद और मेहनत के बाद हत्यारे का भी पता चल गया था और जिस की हत्या हुई थी, उस का भी, लेकिन इतने से काम नहीं चल सकता था. आरोपी को अदालत तक ले जाने के लिए सबूत चाहिए.

जिस की हत्या हुई थी, यह तो पता चल गया था, लेकिन सच में उसी की हत्या हुई थी, यह साबित करने के लिए पुलिस को सबूत चाहिए थे. मिली हड्डियां फरजाना की ही थीं, पुलिस को यह भी साबित करना था.

पुलिस के सामने सब से बड़ी चुनौती थी यह साबित करना कि फरजाना वास्तव में समशुद्दीन की पत्नी थी.

पूछताछ में पता चला कि फरजाना धोलका के एक गांव की रहने वाली थी. पुलिस टीम धोलका के उस गांव पहुंची, जहां फरजाना के रहने की जानकारी मिली थी, लेकिन वहां फरजाना नाम की युवती के बारे में ठीक से कुछ पता नहीं चला.

इस के बाद पुलिस ने शिक्षा विभाग के पुराने रिकौर्ड खंगाले. रिकौर्ड में फरजाना नाम की 4 युवतियों के नाम और पते मिले. पुलिस जानकारी जुटाने के लिए एकएक पते पर पहुंचने लगी. पहले पते पर फरजाना नाम की महिला जीवित मिली. जांच टीम आगे बढ़ी.

पुराने दस्तावेज, रिश्तेदारों से मिली जानकारी और अन्य सुराग जोड़े जाने लगे. अंत में उस फरजाना की पहचान सामने आ गई, जिसे साल 1992 में मौत के घाट उतार दिया गया था.

पुलिस को पूछताछ में जो जानकारी मिली थी, उस के अनुसार फरजाना का विवाह सूरत में हुआ था, लेकिन उस का वह वैवाहिक जीवन सफल नहीं रहा. पति से अनबन हुई और तलाक हो गया. वह मायके लौट आई. लेकिन वहां भी परिस्थितियां ठीक नहीं थीं. तब वह अहमदाबाद आ गई.

अहमदाबाद में उसका अपना कोई नहीं था. अकेली महिला का गुजारा करना आसान नहीं होता.

पुलिस के अनुसार, उसी बीच अपना गुजारा करने के लिए वह देह व्यापार करने लगी. देह व्यापार के दौरान ही उस की मुलाकात शमसुद्दीन खेडावाला से हुई. दोनों के बीच परिचय हुआ.

शमसुद्दीन अकसर फरजाना से मिलने लगा. संबंध गहराए तो समशुद्दीन ने फरजाना के सामने निकाह का प्रस्ताव रखा. साथ ही उस ने शर्त रखी कि निकाह के बाद उसे देह व्यापार छोडऩा होगा.

फरजाना ने शमसुद्दीन की यह शर्त स्वीकार कर ली. उस के बाद शमसुद्दीन ने फरजाना से निकाह कर लिया.

कुछ दिनों तक तो सब ठीक चलता रहा, लेकिन उस के बाद स्थिति बदलने लगी. इस की वजह यह थी कि शमसुद्दीन को पड़ोसियों से पता चला कि फरजाना अभी भी देह का धंधा करती है.

इस के बाद शमसुद्दीन ने उस से पूछा तो वह उस से झगडऩे लगी. फिर तो रोज ही घर में झगड़ा होने लगा. शमसुद्दीन ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी. फरजाना नहीं मानी तो नहीं मानी. इस से शमसुद्दीन की बदनामी होती थी कि उस की बेगम धंधा करती है.

परेशान हो कर एक दिन शमसुद्दीन ने फरजाना से स्पष्ट कहा, ”फरजाना, या तो तुम यह काम छोड़ दो या फिर मुझे छोड़ दो.’’

लेकिन फरजाना ने दोनों में से किसी एक को चुनने से इनकार कर दिया. यानी वह न धंधा छोडऩे को तैयार थी और न ही शमसुद्दीन को. यही बात शमसुद्दीन के भीतर गुस्सा भरती गई. इसी बात से उस के दिमाग में एक खतरनाक विचार आया कि अगर फरजाना ही नहीं रहेगी तो सारी समस्या अपनेआप खत्म हो जाएगी.

शमसुद्दीन ने अपने भाई इकबाल को विश्वास में लिया. अपने एक अन्य साथी करीम को भी योजना में शामिल किया. अब उन्हें ऐसी जगह चाहिए थी, जहां वह आसानी से फरजाना की हत्या कर सकें और उस के बाद लाश को छिपा सकें.

इस काम के लिए करीम ने कुतुबनगर में रहने वाली सालिया बीबी के मकान के बारे में बताया.

करीम का सालिया बीबी पर अहसान था. उस ने पहले उस की मदद की थी, इसलिए वह करीम की बात नहीं टाल सकी. इस तरह जगह की व्यवस्था हो जाने के बाद योजना बन गई. अब सिर्फ मौके का इंतजार था. एक दिन शमसुद्दीन ने फरजाना से सामान्य ढंग से कहा, ”आज एक रिश्तेदार के यहां चलना है.’’

फरजाना उस के साथ चल दी. उसे क्या पता था कि उस रोज उस की जिंदगी की आखिरी रात है. सालिया बीबी के मकान पर पहुंचने के बाद सब कुछ सामान्य था. रात का खाना खा कर सभी लेट गए. फरजाना सो गई. जबकि बाकी के सभी लोग जाग रहे थे. उन्हें इसी पल का इंतजार था.

शमसुद्दीन, इकबाल और करीम ने मिल कर सोई हुई फरजाना का गला दबा दिया. कुछ ही क्षणों में उस की सांसें थम गईं. फरजाना को मौत के घाट उतारने के बाद अब तीनों के सामने लाश को ठिकाने लगाने की चुनौती थी. इस के लिए उन लोगों ने मकान में बने सेप्टिक टैंक को चुना.

जैसे ही वे लोग लाश को ले कर सेप्टिक टैंक के पास पहुंचे, सालिया बीबी का दामाद बिलाल आ गया. उस ने सब कुछ देख लिया. अब वह सब के लिए खतरा बन चुका था. उन्होंने बिलाल को धमकाया कि अगर उस ने किसी को यह बात बताई तो वे उसे भी जिंदा नहीं छोड़ेंगे.

बिलाल डर गया. उस ने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी. उस ने कह दिया कि वह क्यों किसी से हत्या के बारे में बताएगा. उस के बाद फरजाना की लाश को सेप्टिक टैंक में डाल दिया गया. ऊपर से मिट्टी डाल दी गई और सब कुछ पहले जैसा कर दिया गया, जैसे वहां कुछ हुआ ही न हो.

हत्या कर के और लाश को ठिकाने लगा कर तीनों अपनेअपने घर चले गए और सामान्य जीवन जीने लगे. फरजाना का कोई अपना अहमदाबाद में था ही नहीं, जो उस के गायब होने की शिकायत करता. जो अपना था, उसी ने उसे हमेशा के लिए गायब कर दिया था. इसलिए बात पुलिस तक पहुंची नहीं. पड़ोसियों में चर्चा हुई तो शमसुद्दीन ने कह दिया कि धंधे वाली थी, इसलिए उस ने भगा दिया.

कुछ दिनों बाद शमसुद्दीन ने दूसरा निकाह कर लिया. दूसरी पत्नी को उस के अतीत के बारे में कुछ पता नहीं था. उस की अपनी आटा चक्की थी, जिसे वह चलाता रहा. लोगों के बीच उठताबैठता रहा.

बच्चों के साथ मजे की जिंदगी बिताता रहा. और उस के घर से काफी दूर, जमीन के नीचे फरजाना की हड्डियां चुपचाप पड़ी रहीं. देखतेदेखते 34 साल बीत गए.

शमसुद्दीन को लगने लगा था कि उस ने अपने अतीत को हमेशा के लिए दफना दिया है, लेकिन वह गलत था. क्योंकि कोई भी अपराधी लाश को दफना सकता है, सच को नहीं.

मानव हड्डियां मिलने के बाद पुलिस ने फरजाना के भाई को खोज निकाला. उस का ब्लड सैंपल ले कर उन हड्डियों को फोरैंसिक जांच के लिए भेजा गया. अब सब की नजर डीएनए रिपोर्ट पर थी.

रिपोर्ट आई तो वर्षों पुराना रहस्य पूरी तरह साफ हो गया. बरामद हड्डियां फरजाना की ही थीं. अब पुलिस के पास सारे सबूत थे. इस के बाद पुलिस ने शमसुद्दीन और उस के भाई इकबाल को गिरफ्तार कर लिया. दोनों को क्राइम ब्रांच ने थाना कुतुबनगर पुलिस के हवाले कर दिया. थाना कुतुबनगर पुलिस ने मामले की जांच कर के शमसुद्दीन और इकबाल को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.Hidden Body Case

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