Bijnor Terrorist Case. आतंकवादी हुस्ना व रईस जैसे लालची लोगों को अपना मकसद पूरा करने के लिए अपने जाल में फंसा लेते हैं, जिन की उन्हें बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है. अगर हुस्ना और रईस ने समय पर पुलिस को सूचना दे दी होती तो उन की जगह आतंकवादी जेल में होते.
पुलिस के उस मीटिंग हौल के बाहर अत्याधुनिक हथियारों से लैस पुलिसकर्मी तैनात थे. किसी भी बाहरी व्यक्ति को अंदर जाने की इजाजत नहीं थी. हौल में खुफिया विभाग, स्पेशल टौस्क फोर्स, एंटी टेरेरिस्ट स्क्वायड और पुलिस विभाग के आला अधिकारी मौजूद थे.
उन के हाथों में जो दस्तावेज थे, आतंकवादियों से संबंधित थे. सभी लोग बारीकी से उन का अवलोकन कर रहे थे. इस के साथ ही उन के पास सवालों की एक लिस्ट भी थी, जिस के जवाब उन्हें आतंकियों की एक महिला एजेंट से लेने थे. तभी एक बुलेटपू्रफ वज्र वाहन बाहर आ कर रुका. वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों और अंदर से आए सुरक्षाकर्मियों ने उस वाहन को सुरक्षा घेरे में ले लिया.
वज्र वाहन का पिछला दरवाजा खोला गया तो कुछ महिला पुलिसकर्मी एक बुर्काधारी महिला के साथ नीचे उतरीं. उस महिला का नाम हुस्ना था. दुबलीपतली दिखने वाली हुस्ना बुरका पहने थी. चेहरे पर उस ने कुछ इस तरह हिजाब डाल रखा था कि सिर्फ आंखें ही नजर आ रही थीं. इस के बावजूद सभी की निगाहें हुस्ना पर टिकी हुई थीं. कड़ी सुरक्षा के बीच वह अंदर दाखिल हुई.
अधिकारियों ने उसे बैठने का इशारा किया. वह आहिस्ताआहिस्ता आगे बढ़ी और कुरसी पर बैठ गई. कुरसी ठीक बीच में ऐसी जगह रखी थी, जहां पूछताछ करने वाले अधिकारी हुस्ना को फोकस कर सकते थे.
‘‘चेहरे से हिजाब हटा कर बैठो.’’ एक महिला पुलिसकर्मी ने तीखे स्वर में कहा तो हुस्ना ने थोड़ा झिझकते हुए चेहरे से हिजाब हटा दिया. उसे देख कर यह अंदाजा लगाना नामुमकिन था कि वह एक खतरनाक औरत हो सकती है. हुस्ना की आंखों में एक अंजाना सा डर और चेहरे पर बेचैनी साफ झलक रही थी. महिला पुलिसकर्मी उस के अगलबगल खड़ी हो गई थीं, हाल के दरवाजों को बंद कर दिया गया. इस के बाद सवालजवाब का सिलसिला शुरू हुआ.
एक अधिकारी ने पूछा, ‘‘तुम ने मुल्क के गद्दारों से वफादारी निभाई, कोई खास वजह?’’
‘‘मुझे माफ कर दीजिए. मुझ से गुनाह हुआ है, मैं उन की बातों में आ गई थी.’’
‘‘हमारे हर सवाल का सीधा जवाब दो हुस्ना. फरार आतंकवादी देश के लिए खतरा हैं, इसलिए उन का पकड़ा जाना जरूरी है. उन्हें नहीं पकड़ा गया तो सैकड़ों बेगुनाह लोग मारे जा सकते हैं, क्या तुम यही चाहती हो?’’
‘‘ऐसा मत कहिए, मैं ऐसा कतई नहीं चाहती. मैं लालच में आ गई थी, मैं अपने गुनाहों के लिए माफी चाहती हूं.’’
‘‘तुम्हारे पास से जो एक लाख रुपए बरामद हुए हैं, वे कहां से आए?’’
‘‘मुझे उन्होंने ही दिए थे.’’
‘‘कुल कितने रुपए दिए उन्होंने?’’ ‘‘10 लाख के आसपास.’’
‘‘क्या उन्होंने कहीं बम प्लांट किया है?’’ ‘‘इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है.’’
‘‘पता नहीं है या छिपा रही हो?’’
‘‘मेरा यकीन मानिए, मुझे वाकई नहीं पता. मैं तो अब बता कर गुनाहों से तौबा कर लेना चाहती हूं.’’ हुस्ना के इस जवाब पर जांच अधिकारियों ने एकदूसरे की तरफ देखा. वह समझ नहीं पा रहे थे कि वह सच बोल रही है या झूठ? कहीं वह शातिर अंदाज अपना कर चकमा देने की कोशिश तो नहीं कर रही. हुस्ना पर सवालों की बौछार सी होती रही. किसी का वह जवाब देती रही, किसी पर खामोश रही तो किसी सवाल से किनारा कर लिया.
दरअसल, हुस्ना नापाक मंसूबा रखने वाले उन आतंकियों का मोहरा थी, जो बम विस्फोटों से जनहानि कर के देश को हिलाने की कोशिश करते हैं. वह चूंकि उन के हाथों की कठपुतली थी, इसलिए वह उस पर लाखों रुपए खर्च कर के उस का मनचाहा इस्तेमाल करते थे.
हुस्ना के कारनामे शायद राज ही बने रहते, अगर आतंकियों की एक गलती से हुए विस्फोट ने खुफिया टीमों को सक्रिय न कर दिया होता. अचानक धोखे से हुए विस्फोट आतंकियों के खतरनाक मंसूबे तो परवान चढ़ने से पहले ही ध्वस्त हुए ही, साथ ही उन का मोहरा बनी हुस्ना भी पुलिस के शिकंजे में आ गई थी.
हुस्ना ने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन जिंदगी उसे इस मुकाम पर ला कर खड़ा कर देगी कि किसी के लिए पहेली बनेगी तो किसी के लिए देश की दुश्मन. गिरफ्तारी के चंद घंटों बाद ही हुस्ना को पूरे देश की खुफिया एजेंसियां जान चुकी थीं और उस के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी जुटा लेना चाहती थीं, ताकि आतंकवाद की जड़ तक पहुंचा जा सके. कभी गांव की भोलीभाली लड़की रही हुस्ना के इस मुकाम तक पहुंचने के पीछे एक दिलचस्प कहानी थी.
बिजनौर के मोहल्ला जाटान में 80 वर्षीया लीलावती अकेली रहती थीं. उन के पति की कई साल पहले मौत हो गई थी. चार बेटे थे, जो बाहर रह कर नौकरी करते थे. लीलावती का मकान 2 हिस्सों में बंटा था. इस में से एक हिस्से का दरवाजा एक गली में खुलता था. यह मकान का मुख्य द्वार था. जबकि दूसरे हिस्से का छोटा द्वार दूसरी गली में था. मुख्य द्वार वाले हिस्से में लीलावती रहती थीं, जबकि दूसरा खाली था.
लीलावती उस हिस्से को किराए पर देना चाहती थीं. यह बात लोगों को भी पता चल गई. मई, 2014 में मोहल्ले में ही प्रोविजन स्टोर चलाने वाले जगदीश के माध्यम से 3 युवकों को 15 सौ रुपए प्रति माह के हिसाब से मकान का एक भाग किराए पर दे दिया. तीनों युवक नौजवान थे. युवक कौन थे, कहां के रहने वाले थे और क्या करते थे? इन सब बातों के बारे में लीलावती को ज्यादा जानकारी नहीं थी. अलबत्ता उन्होंने जो बताया, उस के अनुसार वे तीनों एक खाद फैक्ट्री में नौकरी करते थे.
किसी अनहोनी से बचने के लिए यूं तो कानूनी दृष्टि से किराएदारों का पुलिस द्वारा सत्यापन जरूरी है, लेकिन महानगरों या अग्रणी शहरों की बात छोड़ दें तो देश के बाकी हिस्सों में इस का पालन कम ही होता है. ऐसी जगहों पर सामाजिक व्यवस्था कुछ ऐसी है कि थोड़ीबहुत जानकारी दे कर ही लोग काम चला लेते हैं. ऐसे इलाकों में पुलिस भी सत्यापन को अतिरिक्त काम समझ कर जिम्मेदारी से कतराती है.
बहरहाल, तीनों युवकों ने लीलावती के मकान में रहना शुरू कर दिया. स्वभाव से तीनों मिलनसार थे, लेकिन किसी से ज्यादा मतलब नहीं रखते थे. तीनों मोटरसाइकिल पर सवार हो कर सुबह निकलते थे और शाम को वापस आते थे. मोहल्ले का कोई बच्चा मिल जाता था तो वे उस के साथ खूब प्यार से बातें करते थे. 3 महीने बीत गए, लीलावती को किराया समय से मिल रहा था. मोहल्ले का कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं था, जिसे उन युवकों से कोई परेशानी रही हो.
12 सितंबर, 2014 को अचानक लीलावती का घर चर्चाओं में आ गया. शुक्रवार के दिन तकरीबन 11 बजे थे, तभी लीलावती के घर से आई तेज धमाके की आवाज ने लोगों को दहला दिया. धमाके की आवाज सुन कर लोग बाहर निकल आए. धमाके की आवाज उन्हीं तीनों युवकों के कमरे से आई थी. लोग उस तरफ दौड़े तो एक युवक अपने कपड़ों की आग बुझाता हुआ बाहर की तरफ भागा. उस के पीछे अन्य दो युवक भी थे. तीनों काफी घबराए हुए थे.
एक व्यक्ति ने उत्सुकता से पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’
‘‘कुछ नहीं चाचा, खाना बनाते वक्त स्टोव फट गया है. हम डाक्टर के पास जा रहे हैं.’’ कहने के साथ तीनों मोटरसाइकिल पर सवार हो कर चले गए. उन के जाने के बाद कुछ लोगों ने उत्सुकतावश अंदर देखने की कोशिश की तो वहां जो दिखाई दिया, उसे देख कर चौंके. कमरे के अंदर स्टोव का नामोनिशान नहीं था. अलबत्ता लाल रंग का छोटा गैस सिलेंडर वहां जरूर रखा था. उस के अदंर से दो तार भी निकले हुए थे. कमरे का सारा सामान बिखरा पड़ा था.
लोगों को संदेह हुआ तो उन्होंने इस की सूचना पुलिस को दे दी. सूचना पा कर थाना प्रभारी राकेश पालीवाल पुलिस टीम के साथ आ पहुंचे. सीओ राजेश कुमार और एएसपी कल्पना सक्सेना भी मौके पर आ गईं.
पुलिस ने कमरे की जांचपड़ताल शुरू की तो वहां जो मिला, उस से पुलिस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. छानबीन में वहां से सिलेंडर बम, 2 अन्य छोटे गैस सिलेंडर, 2 काले बैग से 9 एमएम की एक पिस्टल, 9 कारतूस, एक टाइमर, जिस में साढ़े 10 बजे का समय सैट था, लैपटौप, मोबाइल फोन, कई सिमकार्ड, माचिस के कई डिब्बे, माचिस की तीलियों से निकाल कर एक थैले में एकत्र किया गया बारूद, तीन बेलन, पाकिस्तानी इत्र व वहां का बना अन्य सामान, दो धार्मिक पुस्तकें, जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर के जीवन पर लिखी किताब, एल्बोनुमा पाइप, सलीम, नईम, संतोष व अरविंद नाम के मतदाता पहचान पत्र, जो महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश के उज्जैन के पते पर थे.
सारे सामान को पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. इस के अलावा कमरे में युवकों के पहनने के कपड़े व रोजमर्रा की जरूरत का सामान था. प्रथम दृष्टया यह बात साफ थी कि युवक आतंकवादी थे और विस्फोट की साजिश रच रहे थे. संभवत: बम तैयार करते वक्त गलती से धमाका हो गया था. मामला बेहद गंभीर था, स्थानीय पुलिस ने इस की सूचना आला अधिकारियों को दे दी.
इस से पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया. सूचना पा कर जिलाधिकारी भूपेंद्र एस. चौधरी, डीआईजी गुलाब सिंह और एसपी सत्येंद्र कुमार सिंह भी मौके पर आ गए. यह खबर जंगल में आग की तरह फैली तो सैंकड़ों लोगों की भीड़ लग गई. मोहल्ले वाले यह सोच कर दहशत में थे कि जो युवक सीधेसीधे बन कर उन के बीच रह रहे थे, वे आतंकवादी थे.
पुलिस ने संदिग्ध युवकों के बारे में सूचना प्रसारित कर के सघन चेकिंग के निर्देश दिए. जिला मुख्यालय से इस की सूचना खुफिया विभाग की स्थानीय इकाई समेत महत्त्वपूर्ण विभागों को दे दी गई. एसटीएस व एसटीएफ की टीमें भी आ गईं. फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट की टीम को भी मौके पर बुलवाया गया.
टीम ने दीवारों, दरवाजों व सामान से फिंगरप्रिंट उठाए. बम निरोधक दस्ते ने बरामद बम सिलेंडर की जांच की तो पता चला कि आतंकी बम पूरी तरह बना नहीं पाए थे. टीम ने उस बम को निष्क्रिय कर दिया. फोरेंसिक एक्सपर्ट की टीम ने भी मौके से नमूने ले कर जांच के लिए भेज दिए.
स्थानीय लोगों से भी उन युवाओं के बारे में पूछताछ की गई. दरअसल पुलिस को डर था कि आतंकवादियों ने कहीं शहर में किसी जगह बम फिट न किए हों. पुलिस ने भीड़भाड़ वाले इलाकों में चेकिंग अभियान भी चलाया. साथ ही उन युवकों की तलाश भी की गई. लेकिन वे पुलिस के हाथ नहीं आ सके.
उन में एक आतंकी झुलसने से घायल हो गया था. इस बात की पूरी संभावना थी कि उस ने किसी डाक्टर से इलाज जरूर कराया होगा. यही सोच कर पुलिस ने आसपास के इलाकों में जांचपड़ताल शुरू कर दी.
पूछताछ के दौरान पुलिस डाकखाना चौराहे पर एक ऐसे डाक्टर के पास पहुंच गई जिस के पास आतंकी अपने घायल साथी को ले कर पहुंचे थे. इस डाक्टर का नाम शहजाद शम्सी था. पुलिस ने शहजाद से पूछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘मैं नहीं जानता कि वे कौन थे, लेकिन बहुत घबराए हुए थे. उन में एक युवक जला हुआ था. मैं जले का इलाज नहीं करता, इसलिए मैं ने इलाज से मना कर दिया था. इस के बाद वे कहां गए, मैं नहीं जानता.’’
शहजाद ने इतना जरूर बताया कि युवक लगभग 50 प्रतिशत झुलसा हुआ था. युवक सघन चेकिंग अभियान में हाथ नहीं लगे थे. या तो वे गुपचुप तरीके से जिले से बाहर निकल गए थे या कहीं छिपे हुए थे.
अगले दिन पुलिस ने सभी डाक्टरों को ताकीद कर दिया कि कोई जला हुआ युवक इलाज कराने आए तो पुलिस को इस बारे में तत्काल सूचित कर दिया जाए. पुलिस ने डाकखाने चौराहे पर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज तलाशी तो उस में आतंकियों के डाक्टर शहजाद शम्सी के यहां आने और कुछ देर वापस चले जाने की पुष्टि हुई.
फुटेज से यह भी साफ हुआ कि आतंकियों के 3 अन्य साथी भी वहां मोटरसाइकिल से आए थे. यह भी पता चल गया कि आतंकियों ने वहां की एक दुकान से चादर भी खरीदी थी. अपने झुलसे हुए साथी को चादर ओढ़ाकर वे वहां से फरार हो गए थे.
आतंकियों की उम्र 25 से 35 साल के बीच थी. उन के मतदाता पहचान पत्र चूंकि महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के थे, इसलिए वहां की पुलिस से जांच में सहयोग मांगा गया. दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा से भी संपर्क साधा गया. थाना कोतवाली में सबइंस्पेक्टर प्रमोद कुमार की तरफ से आतंकियों के खिलाफ देशद्रोह की धारा 121ए, 122 आईपीसी, विधि विरुद्ध क्रियाकलाप करने की धारा 18/13/23/25 आर्म्स एक्ट व 4/25 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया गया.
अगले दिन जांच के लिए भोपाल एटीएस के इंसपेक्टर राहुल शर्मा बिजनौर आ गए. विभिन्न टीमें आतंकियों का स्थानीय नेटवर्क खंगालने में जुट गईं. भोपाल के आईजी योगेश चौधरी और डीआईजी श्रीनिवास वर्मा ने भी इस मामले की विस्तृत जानकारी ली.
मध्य प्रदेश पुलिस के रिकार्ड से पता चला कि 1 अक्टूबर, 2013 को मध्य प्रदेश की खंडवा जेल से 7 आतंकवादी फरार हुए थे. आशंका जाहिर की जा रही थी कि वे बिजनौर में हो सकते थे. स्थानीय व बाहर से आई विशेष टीमों ने सीसीटीवी से आतंकियों के फोटो निकलवा कर खंडवा से फरार आतंकियों से मिलान किया तो सभी चौंके. क्योंकि ये लोग वही फरार आतंकवादी थे. इन आतंकियों का ताल्लुक प्रतिबंधित संगठन सिमी से था.
इन आतंकियों में अमजद रमजान उर्फ उमर, शेख महबूब उर्फ गुड्डू उर्फ मलिक, एजाजुद्दीन उर्फ रियाज उर्फ राहुल, असलम उर्फ सोहेब उर्फ बिलाल उर्फ संतोष, जाकिर हुसैन उर्फ विक्की डौन उर्फ विनय और सालिक उर्फ अबू फैजल उर्फ सल्लू शामिल थे. आग में झुलसने वाला आतंकवादी महबूब था.
इन सभी आतंकियों का अच्छाभला आपराधिक इतिहास था. वर्ष 2001 में इन लोगों ने खंडवा में एटीएस के जवान सीताराम यादव, बैंककर्मी रविशंकर व अधिवक्ता संजय पाल की हत्या की थी. वर्ष 2010 में इन लोगों ने एटीएस के एक जवान शिवशंकर की हत्या की थी. वर्ष 2011 में मध्य प्रदेश में ही इन्होंने भाजपा नेता प्रमोद तिवारी व चार आरएसएस कार्यकर्ताओं को गोली मार कर घायल कर दिया था.
इतना ही नहीं, इन लोगों ने भोपाल के एक बड़े आभूषण कारोबारी के यहां डकैती को अंजाम दे कर लाखों रुपए का सोना भी लूटा था. इन लोगों पर एक निजी नर्सिंग होम में बम ब्लास्ट करने का भी आरोप था. जेल से फरार होते वक्त इन आतंकियों ने सुरक्षाकर्मियों पर चाकू से हमला कर दिया था और बाइक व सर्विस रिवाल्वर लूट कर फरार हो गए थे.
इस के बाद इन का कुछ पता नहीं चला था. सभी आतंकी बेहद खतरनाक थे. पुलिस ने सीसीटीवी से मिले फोटो और मध्य प्रदेश पुलिस से प्राप्त पुराने फोटो के आधार पर आतंकियों के पोस्टर तैयार करा कर पूरे जिले में लगवा दिए. साथ ही उन की गिरफ्तारी पर 5 लाख रुपए का इनाम भी घोषित कर दिया गया.
आतंकियों की तलाश में पुलिस का जाल बिछा हुआ था. उन्हें तलाश करने के लिए 48 टीमें लगाई गई थीं. हर टीम में 25-25 पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया था. पुलिस ने पोस्टर ले कर सभी संभावित स्थानों पर घरघर चेकिंग का अभियान चलाया. सैंकड़ों लोगों से पूछताछ की गई, पर आतंकियों का कोई सुराग नहीं मिला.
घटनास्थल से बरामद सिमकार्ड व इंटरनेट डिवाइस आदि की जांच की गई. पता चला कि सिम और डिवाइस फर्जी पतों पर हासिल किए गए थे. पुलिस ने फर्जी पते पर सिमकार्ड व इंटरनेट कनेक्शन देने के आरोप में स्थानीय दुकानदार जसपाल सेठी और उस के 2 कर्मचारियों आशीष व गौरव को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया.
कमरे से बरामद लैपटौप की जांच की गई तो पता चला कि वह मेरठ जनपद के एक दुकानदार से 23 अगस्त को 25 हजार रुपए में खरीदा गया था. दुकान में चूंकि सीसीटीवी कैमरा लगा था, इसलिए उस से स्पष्ट हो गया कि खरीदार ऐजाज व जाकिर थे. उन्होंने 5-5 सौ के बिलकुल नए नोट दुकानदार को दिए थे. पुलिस ने लैपटौप से भी आतंकियों की कई जानकारी जुटाईं और अधिक जानकारी हासिल करने के लिए लैपटौप को जांच के लिए प्रयोगशाला भिजवा दिया गया.
यह एक बड़ा मामला था. गृह मंत्रालय के निर्देश पर नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी (एनआईए) की एक टीम ने भी बिजनौर आ कर जांच शुरू कर दी थी. एटीएस के आईजी राजीव सब्बरवाल भी बिजनौर आ गए थे. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आतंकी गतिविधियों के प्रकाश में आने के बाद मेरठ स्थित सेना के सब एरिया मुख्यालय के लेफ्टिनेंट जनरल राजन बख्शी ने सुरक्षा कार्यों की समीक्षा कर के सभी को सतर्क रहने के निर्देश दिए.
आतंकियों की तलाश कर रही टीमों ने ग्रामीण क्षेत्रों में भी जांच शुरू कर दी थी. मुखबिरों का जाल भी हर तरफ फैला दिया गया था. सर्च अभियान को आगे बढ़ाने के लिए अर्द्धसैनिक बलों की टुकडि़यों को भी बुलवा लिया गया था. मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ था, इसलिए केंद्रीय खुफिया एजेंसी और गृह मंत्रालय भी इस बारे में जानकारी एकत्र कर रहे थे.
जांचपड़ताल में पुलिस को 2 तीन आतंकियों का ठिकाना मिल गया. वे मोहल्ला भाटान स्थित टेलर रईस के मकान की तीसरी मंजिल पर रहते थे. जबकि उस मकान की दूसरी मंजिल पर गांव उमरीकला निवासी एक विवाहित रहती थी. उस का पति सऊदी अरब में नौकरी करता था. तीसरी मंजिल पर रहने वाले वही तीनों आतंकवादी थे, जो इलाज के लिए गए आतंकियों से जा कर मिले थे. पुलिस ने पूछताछ के लिए मकान मालिक रईस व उस के बेटे अब्दुल्ला को तत्काल हिरासत में ले लिया.
पुलिस ने उन से पूछताछ की तो उन्होंने उन आतंकवादियों के नाम अमजद, असलम और सालिक बताए. उन लोगों का कहना था कि डर की वजह से वे आतंकवादियों के बारे में पुलिस को सूचना नहीं दे सके थे. दूसरी मंजिल पर रहने वाली महिला का नाम उन्होंने हुस्ना बताया, जो गांव ऊमरीकला की रहने वाली थी. हुस्ना और आतंकवादियों का क्या रिश्ता था, इस बारे में रईस और अब्दुल्ला कुछ नहीं बता पाए.
पूछताछ में पता चला कि आतंकियों ने मकान किराए पर लेते समय खुद को छात्र बताया था. बतौर किराया वे लोग 3 हजार रुपए देते थे. पुलिस ने ताला तोड़ कर कमरे की तलाशी ली, लेकिन वहां से कोई खास सामान बरामद नहीं हो सका. पुलिस मुतमईन हो गई कि रईस ने जो बताया है, वही सच है और आतंकियों से उस का कोई नाता नहीं है.
इस के बाद 19 सितंबर को पुलिस की कई टीमों ने सीधे उमरीकला गांव का रुख किया. पुलिस को शक था कि आतंकवादी वहां छिपे हो सकते हैं. यह भी जानना जरूरी था कि आतंकियों का हुस्ना के साथ आखिर क्या रिश्ता था. गांव पहुंच कर पुलिस ने हुस्ना उर्फ हुसैना उर्फ असमाउल पत्नी मोहम्मद जौहर को गिरफ्तार कर लिया. उस के पास से एक लाख अस्सी हजार रुपए, एक विस्फोटक डेटोनेटर व एक मोबाइल बरामद हुआ.
हुस्ना की इस तरह गिरफ्तारी से गांव का हर आदमी भौचक्का रह गया. आतंकियों के छिपे होने की आशंका में गांव को सील कर के घरघर में सर्च औपरेशन चलाया गया, लेकिन आतंकी हाथ नहीं लग सके. पुलिस ने जंगलों में भी तलाश की. पूछताछ में हुस्ना ने बताया कि रईस के पास भी आतंकियों ने कुछ सामान छोड़ा है. पुलिस हुस्ना को गिरफ्तार कर के बिजनौर ले आई.
वापस लौट कर पुलिस रईस के साथ सख्ती से पेश आई तो वह टूट गया. आतंकियों के साथ उस का गहरा संबंध था. उस की निशानदेही पर पुलिस ने उस के घर में बेड में छिपाया गया एक डेटोनेटर, बम के लिए लाई गई 3 ड्राई बैट्री, तार व 2 मोबाइल फोन बरामद किए. आतंकियों की एक पिस्टल को उस ने पुलिस के डर से ईदगाह रोड पर एक गन्ने के खेत में फेंक दिया था. कोतवाली थाने में हुस्ना, रईस व अब्दुल्ला के खिलाफ धारा 121 ए, 122, 120बी, 216, 4/5 विस्फोटक अधिनियम की धारा 12/18/23 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया गया.
पूछताछ में स्पष्ट हो गया कि आतंकी अमजद, रमजान उर्फ उमर, असलम उर्फ सेहेब उर्फ बिलाल उर्फ संतोष व सालिक उर्फ अबू फैजल उर्फ सल्लू रईस के मकान में रह रहे थे, जबकि शेख महबूब उर्फ गुड्डू उर्फ मलिक, एजाजुद्दीन उर्फ रियाज उर्फ राहुल, जाकिर हुसैन उर्फ विक्की डौन उर्फ विनय लीलावती के मकान में. पूरे मामले के खुलासे पर पुलिस ने हुस्ना को हौल में बैठा कर लंबी पूछताछ शुरू की. गहन पूछताछ व जांचपड़ताल में आतंकियों और हुस्ना की चौंकाने वाली कहानी सामने आई.
हुस्ना उमरीकला गांव निवासी अब्दुल अजीज की बड़ी बेटी थी. अब्दुल के 3 बच्चे थे. बड़ी हुस्ना, उस से छोटा नदीम और सब से छोटी बेटी रूबीना उर्फ रूबी. अब्दुल अजीज मेहनतमजदूरी कर के किसी तरह परिवार की गाड़ी चलाता था. अब्दुल तीनों बच्चों की शादी कर चुका था.
हुस्ना का निकाह 8 साल पहले मोहम्मद जौहर के साथ हुआ था. मोहम्मद जौहर सऊदी अरब में नौकरी करता था. वक्त के साथ हुस्ना 2 बच्चों की मां बन गई. पति चूंकि बाहर रहता था, इसलिए हुस्ना मायके में ही रहने लगी.
करीब एक साल पहले हुस्ना काम की तलाश में बिजनौर आ गई थी और रईस के मकान में किराए पर रहने लगी थी. इसी बीच आतंकी अमजद, असलम व सालिक रईस के यहां किराए पर रहने के लिए आ गए. उन्होंने 3 हजार रुपए महीना किराए पर कमरा लिया था.
आतंकियों ने हुस्ना को अकेली देख कर उस पर डोरे डालने शुरू कर दिए. हुस्ना नादान नहीं थी. बहुत जल्द वह युवकों से घुलमिल गई. हुस्ना ने गरीबी देखी थी. उसे पैसों की चाह थी. आतंकियों ने उस की कमजोरी को जान लिया था. दूसरे उन्हें हुस्ना जैसे मोहरे की जरूरत थी, जो उन के कामों में आसानी से मदद कर सके.
अमजद हुस्ना में ज्यादा ही रुचि लेता था. बाद में हुस्ना की मुलाकात उन्होंने लीलावती के यहां रह रहे अपने अन्य साथियों से भी करा दी. आतंकवादी एकदूसरे के यहां आतेजाते रहते थे. आतंकियों ने एक दिन हुस्ना से बात की, ‘‘हुस्ना हम तुम्हारी मदद करना चाहते हैं.’’
‘‘कैसे?’’
‘‘लाखों रुपयों से.’’ कहने के साथ ही आजाद ने अपनी जेब से 5-5 सौ की 2 गड्डियां निकाल कर उस की आंखों के सामने लहरा दीं. हुस्ना को एकाएक कुछ समझ नहीं आया और वह सोच में पड़ गई. हुस्ना तेजतर्रार औरत थी. उस ने सवाल दागा, ‘‘बदले में मुझ से क्या चाहते हो?’’
‘‘बस तुम्हें हमारी हमराज बनना होगा.’’ ‘‘मतलब?’’
‘‘हम जो काम कहें, उस में मदद करनी होगी और हमारे राज हमेशा राज ही रखने होंगे.’’
‘‘मैं समझी नहीं, तुम क्या कहना चाहते हो.’’
‘‘वक्त आने पर सब समझ जाओगी.’’ अमजद ने एक लाख रुपए उसे दे दिए. हुस्ना को भी एक साथ इतनी रकम हाथ लगी तो वह खुश हो गई. इस के बाद वह आतंकियों के साथ घंटों बतियाने लगी. समय के साथ उस के रिश्ते बहुत मधुर हो गए.
बाद में उन के राज भी हुस्ना जान गई, लेकिन रुपयों के लालच ने उसे अंधा कर दिया. कभी वह आतंकियों के लिए खाना बना देती तो कभी उन के बताए सामान बाजार से लाया करती. एक दिन हुस्ना ने उन्हें अपने भाई नदीम से भी मिलवा दिया. आतंकियों ने उस के घर का रास्ता भी देख लिया. आतंकियों से समझौते से हुस्ना भी खुश थी और वह भी.
रुपए आए तो हुसना ने गरीबी को अलविदा कहना शुरू कर दिया. उस ने अपने गांव में परिवार के लिए जरूरत की सभी चीजें जुटा लीं. आतंकियों से मिले रुपयों से हुस्ना ने नदीम को गांव में लोहे व सीमेंट आदि की दुकान खुलवा दी. आतंकियों की वह अपने पति से भी बातचीत कराने लगी.
यह बात अलग थी कि उस ने अपने हकीकत के रिश्ते पति से छिपा लिए थे. उधर रईस को आतंकियों की गतिविधियों पर शक तो बहुत पहले हो गया था, लेकिन वह वक्तवक्त पर रुपयों से रईस की मदद कर दिया करते थे, इसलिए उस ने उन्हें सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझ कर अपनी जुबान पर ताला लगा लिया.
आतंकियों के मंसूबे खतरनाक थे. उन के पास हथियार भी थे और बारूद भी. महबूब बम बनाने का एक्सपर्ट था. वह और उस के साथी सामान जुटा कर अपने काम में लगे रहते थे. वे इंटरनेट के जरिए अपने आकाओं के संपर्क में रह कर कार्ययोजना बनाते थे.
लीलावती के यहां रहने वाले आतंकवादी कोशिश करते थे कि लोग उन्हें हिंदू समझें. इस के लिए जब भी कोई त्योहार आता था, वे तिलक लगाने के साथसाथ हाथों में कलावा भी बांधते थे. अपना परिचय भी वह हिंदू नाम से ही देते थे. सब लोग यही समझते थे कि वे हिंदू हैं. अपने मजहब की किताबें वे गुपचुप पढ़ते थे.
उन की योजना दिल्ली सहित उत्तर प्रदेश के कई शहरों में विस्फोट करने की थी. उन के निशाने पर नरेंद्र मोदी भी थे, काशी भी था और मथुरा शहर भी. काशी इसलिए निशाने पर था, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वहां से चुनाव जीते थे. विस्फोट कर के आतंकी देश में अराजकता का माहौल कायम करना चाहते थे.
वे अपने पाकिस्तानी आकाओं के संपर्क में भी बने रहते थे. आतंकियों का मकसद ऐसे बम बनाने का था, जिस से ज्यादा से ज्यादा तबाही हो. उधर लीलावती के घर में रह रहे आतंकवादियों ने किसी को अपने ऊपर जरा भी शक नहीं होने दिया. वे धर्म बदल कर आराम से रहते रहे. उन के लिए सब से बड़ी राहत की बात यह थी कि पुलिस से उन का सत्यापन नहीं कराया गया था. इस से उन के हौसलों में और भी इजाफा हो गया था.
उन की कोशिश विस्फोटों के जरिए देश को दहलाने की थी. उन्होंने पहले बम बनाने का सामान जुटाया, फिर उस की तैयारी करने लगे. वे बम में माचिस की तीलियों पर लगे मसाले का प्रयोग करना चाहते थे, इसलिए माचिसों के डिब्बे लाते और उन से मसाला छुड़ा कर उसे बेलन के जरिए बारीक पीसते थे. मसाले को छोटे गैस सिलेंडरों में गैस भरने वाले स्थान से पीतल की नौब हटा कर आरडीएक्स के साथ भरा जाना था.
बम बनाने के लिए वे आरडीएक्स का प्रयोग कर रहे थे. विस्फोट को और अधिक घातक बनाने के लिए पोटैशियम व फासफोरस के यौगिक अंश से मिल कर बने माचिस की तीली के मसाले को चारों ओर भरना चाहते थे. विस्फोट के समय घातक तत्त्व तो फट जाता, लेकिन मसाला हवा में बिखर कर विस्फोट से निकली चिंगारियों से आग पकड़ कर दूर तक फैल कर आग लगाता.
12 सितंबर की सुबह भी महबूब गुपचुप तरीके से बेलने से तीलियों के मसाले को पीस कर बारीक कर रहा था कि तभी दबाव व आपस में रगड़ के चलते अचानक आग लग गई विस्फोट हो गया. जिस से वह संभल नहीं पाया और झुलस गया. विस्फोट होते ही वे तीनों जल्दी से बाहर की तरफ भागे. आवाज सुन कर अचानक आ गए लोगों ने पूछा, तो उन्होंने स्टोव का फटना बताया और वहां से निकल गए. वहां से निकलते ही उन्होंने मोबाइल के जरिए यह खबर अमजद व अन्य साथियों को दी तो वे भी डाकखाना चौराहे पर पहुंच गए. महबूब का इलाज करने से डाक्टर ने इनकार कर दिया था. इस के बाद अमजद एक चादर खरीद कर लाया और अपने साथी को ओढ़ा दी.
‘‘इसे हम अपने साथ ले जाते हैं, तुम लोग तुरंत शहर छोड़ दो. असलम मेरे साथ ही रहेगा.’’ अमजद ने कहा तो बाकी साथी मोटरसाइकिल पर बैठ कर तुरंत वहां से चले गए. वे तीनों रईस के घर पहुंच गए. कई घंटे वह रईस के घर पर ही रुके रहे. रईस व उस का बेटा अब्दुल सब समझ गए थे. शहर में बम विस्फोट की चर्चा फैल गई थी. लेकिन डर व लालच की वजह से वे खामोश रहे.
पुलिस कभी भी उन तक पहुंच सकती थी. हुस्ना उन की बदौलत लाखों में खेल रही थी. वह भी उन के साथ शिद्दत से वफा करना चाहती थी. इस मुद्दे पर बात हुई तो वह बोली, ‘‘फिक्र न करो, अभी मैं जिंदा हूं. मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगी. मेरी वफा इतनी कमजोर नहीं है. तुम मेरे गांव के खेतों में छिप जाओ. मैं खाना पहुंचा दिया करूंगी. शायद महबूब के इलाज का इंतजाम भी वहीं हो जाए.’’
आतंकियों को उस की बात ठीक लगी. देहात ज्यादा सुरक्षित था और वहां तक पहुंचना भी आसान था. दोपहर के वक्त हुस्ना वहां से गांव चली गई. उस के जाते ही अमजद ने बिजनौर में अन्य कोई सुरक्षित ठिकाना तलाश करना शुरू कर दिया. उस ने पहले से अपने संपर्क में आ चुके मोहल्ला झालू निवासी फुरकान से खुद जा कर संपर्क किया. फुरकान उन की गुपचुप तरीके से मदद करता रहता था.
उस दिन अमजद ने फुरकान को एक लाख रुपए दिए, बाद में और भी पैसे देने का लालच दे कर किराए पर कोई सुरक्षित कमरा दिलाने को कहा. उस ने तत्काल कोशिश भी शुरू कर दी, लेकिन इस प्रयास में वह सफल नहीं हुआ. फुरकान को भी रुपयों का लालच था, अत: चाहता था कि किसी भी सूरत में अमजद निराश न हो. इसलिए उस ने धर्म का वास्ता दे कर एक मदरसा संचालक खालिद से पनाह देने की बात की, लेकिन उस ने मिन्नतें करने के बाद भी किसी अंजान को अपने यहां पनाह देने से साफ इंकार कर दिया.
अमजद वापस आ गया. इस बीच अमजद को यह खबर मिल गई थी कि विस्फोट की चर्चा न केवल शहर में फैल चुकी है, बलिक पुलिस उन की तलाश में चेकिंग अभियान भी चला रही है. पुलिस की चेकिंग से बचना जरूरी था, इसलिए जाने से पहले उस ने एक बैग रईस को सौंपते हुए कहा, ‘‘हमारा यह सामान तुम्हारे पास ही रहेगा. इसे छिपा कर रख लेना. वक्त आने पर हम बता देंगे कि इसे कहां देना है. इस के बदले तुम्हें पैसा मिलेगा.’’
शाम के वक्त अमजद व असलम ने महबूब को हुस्ना का बुर्का पहना दिया. इस बीच उस के लिए वह मरहम भी ले आया था. वे महबूब को मोटरसाइकिल पर बैठा कर चल दिए. रास्ते में पुलिस चेकिंग कर रही थी, एक महिला चूंकि बुर्के में साथ थी, इसलिए वे संदिग्ध नहीं लगे और पुलिस ने उन्हें जाने दिया. एक घंटे बाद वे उमरीकला गांव के जंगल में पहुंच गए. तब तक धुंधलका फैल चुका था. तीनों गन्ने के एक खेत में छिप गए. अगली सुबह हुस्ना उन के लिए खाना बना कर ले गई. वह आई तो अमजद ने उस से पूछा, ‘‘किसी डाक्टर का इंतजाम हुआ क्या?’’
‘‘नहीं, एक हकीम हैं, लेकिन उसे लाते हुए डर लगता है. मैं कुछ दवाइयां लाई हूं.’’ कहते हुए हुस्ना ने कुछ दर्द निवारक दवाइयां, मरहम पट्टी व रुई उन के हवाले कर दी. उसे यह सामान उस के भाई नदीम ने ला कर दिया था. हुस्ना उन के पास हर सुबह जाती रही. 15 सितंबर की सुबह भी वह खाना ले कर पहुंची तो अमजद खाना खा कर बोला, ‘‘हमें जाना होगा हुस्ना. होशियारी से हमें पुलिस की खबर करती रहना.’’
‘‘तुम लोग भी महबूब का ख्याल रखना.’’ हुस्ना ने समझाने वाले अंदाज में कहा तो अमजद बोला, ‘‘इस की फिक्र न करो, इंशाअल्लाह यह ठीक हो जाएगा और हां, डेटोनेटर का क्या करना है, हम तुम्हें बता देंगे?’’
इस के बाद तीनों वहां से निकल गए. हुस्ना दोबारा रईस के यहां आ कर रहने लगी. इस बीच पुलिस ने घरघर सर्च औपरेशन चलाया. इस अभियान से न रईस डरा, न हुस्ना. पुलिस रईस के घर भी पहुंची तो हुस्ना ने बताया कि इस वक्त वह घर में अकेली है. पुलिस को मामला सामान्य लगा और वह वापस चली गई.
पुलिस को शक न हो, इसलिए बाद में वह गांव जा कर रहने लगी. लेकिन अपने शातिराना अंदाज के बाद भी वह पुलिस के शिकंजे में आ गई. पूछताछ के बाद पुलिस ने हुस्ना, रईस व अब्दुल को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट निकुंज मित्तल की अदालत में पेश किया, जहां से तीनों को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. इस के बाद पुलिस ने आतंकवादियों के मददगार नदीम व फुरकान की तलाश शुरू कर दी.
बाद में पुलिस ने हुस्ना व अन्य को 5 दिनों के रिमांड पर ले कर एक बार फिर विस्तृत पूछताछ की. 28 सितंबर को पुलिस ने नदीम को भी गिरफ्तार कर लिया. उस के कब्जे से आतंकियों द्वारा दिए गए डेढ़ लाख रुपए बरामद हुए. जबकि अगले दिन आतंकियों का दूसरा मददगार फुरकान भी पुलिस की पकड़ में आ गया. उस के पास से भी पुलिस को 36 हजार 6 सौ रुपए मिले. इन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के जेल भेज दिया गया.
फरार आतंकियों की तलाश में कई दिनों तक ऊमरीकला सहित कई गांवों में कांबिग अभियान चलाया गया, लेकिन पुलिस को कोई सफलता नहीं मिली. उन के जंगलों में छिपे होने की आशंका में लखनऊ से एक टीम कैमरे में गतिविधियों को कैद कर के कंप्यूटर पर दिखाने वाले यंत्र अनमेन एरियल हीकल (ड्रोन) को ले कर बिजनौर आई.
कई गांवों में उसे उड़ाया गया, लेकिन तब तक आतंकी चकमा दे कर निकल चुके थे. देश के दुश्मन इन फरार आतंकियों की तलाश अब पूरे देश की पुलिस को है. गनीमत यही रही कि वे अपने नापाक इरादों में कामयाब नहीं हो सके. रईस अब्दुल्ला या हुस्ना ने समय पर पुलिस को सूचना दे दी होती तो यकीनन आतंकवादी पकड़े जाते.
दूसरे हुस्ना लालच में न आई होती, तो आज सलाखों के पीछे नहीं होती. हुस्ना व रईस जैसे लालची लोगों को आतंकवादी अपने मकसद को पूरा करने के लिए आसानी से अपने जाल में फंसा लेते हैं, लेकिन कभीकभी इस की बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ती है. आतंकवादी कब, किस रूप में कहां हों, जानना मुश्किल है. पर सतर्क रहना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. इस में अपना व राष्ट्र दोनों का हित है. Bijnor Terrorist Case
कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.
— 2014 में प्रकाशित






