Fake Police Officer. पुलिस अधिकारी बन कर रौब झाडऩे वाला करणवीर शर्मा पूरे देश में चर्चा में आ गया, क्योंकि वह कई सालों से वरदी पहन कर फरजी डीएसपी बन खुलेआम घूमफिर रहा था. अदालत से भगोड़ा घोषित हो चुका फरजी डीएसपी करणवीर शर्मा आखिर पुलिस के शिकंजे में कैसे चढ़ा?
श्रीनगर की डल झील की खूबसूरत वादियों में जब ढलते सूरज की सुनहरी किरणें पानी पर बिखर रही थीं, तब पर्यटकों को शायद इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि उन के बीच घूम रहा एक कथित पुलिस अधिकारी वास्तव में एक फरजी पहचान के सहारे रौब गांठ रहा है. सफेद रंग की टोयोटा फौच्र्युनर, छत पर लगी लाल बत्ती, सायरन और पुलिस की वरदी, यह पूरा लावलश्कर पहली नजर में किसी रसूखदार पुलिस अधिकारी का आभास कराता था, लेकिन इस दिखावे के पीछे छिपे सच ने जल्द ही सब को चौंका दिया. वह कोई और नहीं, बल्कि पंजाब निवासी करणवीर शर्मा था.
वह कथित तौर पर पुलिस अधिकारी का रूप धारण कर लंबे समय तक लोगों के बीच अपनी धाक जमाता रहा.
नेहरू पार्क जैसे पर्यटन स्थल पर बाहरी राज्य से आए किसी पुलिस अधिकारी की मौजूदगी अपने आप में असामान्य नहीं थी, मगर जब उस के व्यवहार में पेशेवर पुलिस अधिकारी जैसी गंभीरता के बजाए दिखावा और धौंस दिखाई देने लगी तो लोगों के मन में संदेह पैदा होने लगा.
कुछ स्थानीय लोगों ने इस बारे में पुलिस को जानकारी दी. उन्होंने बताया कि पंजाब पुलिस का एक कथित अधिकारी अपने साथी के साथ इलाके में घूम रहा है. दोनों का व्यवहार संदिग्ध लग रहा है और ऐसा प्रतीत नहीं होता कि वे किसी नियमित सरकारी ड्यूटी पर हैं.
उस समय एसआई आरिफ खान अपनी गश्ती टीम के साथ नेहरू पार्क जेटी के आसपास मौजूद थे. जम्मूकश्मीर की संवेदनशील सुरक्षा परिस्थितियों को देखते हुए पुलिसकर्मी पर्यटन स्थलों और सार्वजनिक स्थानों पर विशेष सतर्कता बरतते थे. ऐसे में स्थानीय लोगों की शिकायत को नजरअंदाज करना उचित नहीं था.
आरिफ खान ने शिकायत सुनी और अपनी टीम के साथ उस स्थान की ओर बढ़े, जहां दोनों संदिग्ध युवक मौजूद थे.
पुलिस टीम ने दूर से ही उन की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू कर दी. सामने 2 युवक थे. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की वरदी में और दूसरा कांस्टेबल जैसी वरदी में. उन के पास ऐसी गाड़ी थी, जिस पर लाल बत्ती और सायरन लगे थे. पूरा दृश्य ऐसा था, मानो किसी वरिष्ठ अधिकारी का काफिला इलाके में निरीक्षण करने आया हो, लेकिन आरिफ खान को कुछ बातें खटक रही थीं.
पुलिस विभाग में काम करने वाले अनुभवी अधिकारी केवल वरदी देख कर किसी व्यक्ति की पहचान तय नहीं करते. वरदी पर लगे बैज, नेमप्लेट, कंधे पर लगे स्टार, बोलने का ढंग, दूसरे पुलिसकर्मियों के साथ व्यवहार और विभागीय प्रक्रिया की जानकारी, ये सभी बातें किसी अधिकारी की वास्तविक पहचान का संकेत देती हैं.
आरिफ खान ने गौर किया कि कथित डीएसपी का व्यवहार और उस के हावभाव किसी नियमित ड्यूटी पर तैनात प्रशिक्षित पुलिस अधिकारी से मेल नहीं खा रहे थे. वह अपने साथी के साथ घूमते हुए लोगों पर अनावश्यक धौंस जमाने की कोशिश कर रहा था. उस के व्यवहार में वह सहज अनुशासन दिखाई नहीं दे रहा था, जिस की अपेक्षा पुलिस महकमे के किसी जिम्मेदार अधिकारी से की जाती है.
आरिफ खान के साथ चल रहे एक पुलिसकर्मी ने धीमे स्वर में कहा, ”सर, कुछ गड़बड़ लग रही है. इन की गतिविधियां सामान्य नहीं हैं.’’
आरिफ खान ने भी संदेह जताते हुए कहा, ”पहले इन से बात करते हैं. अगर ये वास्तव में पुलिस अधिकारी हैं तो अपनी तैनाती और पहचान के बारे में स्पष्ट जानकारी दे देंगे.’’
उन्होंने जल्दबाजी में कोई कदम उठाने के बजाय पहले दोनों की गतिविधियों को समझने और उन की पहचान की पुष्टि करने का फैसला किया.
कुछ ही देर बाद आरिफ खान अपनी टीम के साथ दोनों युवकों के सामने पहुंच गए. पुलिस टीम को अपनी ओर आता देख कर वरदी पहने युवक एक पल के लिए असहज दिखाई दिया. हालांकि उस ने जल्द ही खुद को संभाल लिया और चेहरे पर सामान्य भाव लाने की कोशिश की. उसे शायद उम्मीद थी कि वरदी और रुतबे का प्रदर्शन देख कर स्थानीय पुलिसकर्मी भी उसे कोई वरिष्ठ अधिकारी समझ कर औपचारिकता निभाएंगे.
आरिफ खान ने उस की वरदी पर नजर डालते हुए पूछा, ”आप पंजाब पुलिस में डीएसपी हैं? किस जिले में तैनात हैं?’’
सवाल सीधा था, लेकिन उस का जवाब देना कथित अधिकारी के लिए आसान नहीं था. उस ने खुद को पुलिस विभाग का अधिकारी बताया और वहां अपनी मौजूदगी को ड्यूटी से जोडऩे की कोशिश की.
आरिफ खान ने अगला सवाल किया, ”आप का बैच कौन सा है? विभागीय पहचानपत्र कहां है? आप की तैनाती किस कार्यालय में है?’’ अब बातचीत का रुख बदल चुका था.
कुछ देर पहले तक जिस व्यक्ति का व्यवहार एक रसूखदार पुलिस अधिकारी जैसा दिखाई दे रहा था, वह अब स्पष्ट जवाब देने में कठिनाई महसूस कर रहा था.
जब उस से विभागीय पहचान पत्र दिखाने के लिए कहा गया तो वह संतोषजनक जवाब नहीं दे सका. उस ने कथित तौर पर यह बहाना बनाया कि पहचान पत्र उस के कमरे पर रह गया है.
आरिफ खान का संदेह अब और गहरा गया.
पुलिस की वरदी पहन लेना और खुद को अधिकारी बता देना एक बात है, लेकिन किसी वास्तविक पुलिस अधिकारी की तरह अपनी तैनाती, विभागीय पहचान और सेवा संबंधी विवरण बताना दूसरी बात. ऐसे बुनियादी सवालों पर स्पष्ट जवाब न मिलना संदेह को और मजबूत कर रहा था.
आरिफ खान ने दोनों युवकों को वहीं रोक कर उन की पहचान की गहन जांच कराने का निर्णय लिया.
श्रीनगर जैसे संवेदनशील शहर में किसी व्यक्ति का पुलिस अधिकारी बन कर घूमना सामान्य मामला नहीं माना जा सकता था. विशेषकर तब, जब उस के पास लालबत्ती और सायरन लगी गाड़ी हो तथा वह लोगों के सामने अपनी कथित सरकारी हैसियत का प्रदर्शन कर रहा हो.
आरिफ खान ने बिना देर किए संबंधित पुलिस अधिकारियों को सूचना दी. इस के बाद पुलिस की अतिरिक्त टीम मौके पर पहुंची और दोनों संदिग्धों को पूछताछ के लिए थाने ले जाया गया.
थाने में उन की पहचान, वरदी, गाड़ी और उपलब्ध दस्तावेजों की जांच शुरू हुई. पुलिस ने यह पता लगाने की कोशिश की कि दोनों वास्तव में किसी पुलिस विभाग में तैनात हैं या केवल वरदी और फरजी पहचान के सहारे लोगों को प्रभावित कर रहे थे.
जांच के दौरान कथित डीएसपी की पहचान करणवीर शर्मा के रूप में सामने आई. उपलब्ध विवरण के अनुसार, वह अटल शर्मा का पुत्र और पंजाब के लुधियाना जिले के खन्ना क्षेत्र के अंतर्गत गांव कद्दों, तहसील पायल का निवासी बताया गया.
उस के साथ मौजूद दूसरे युवक की पहचान रविंदर सिंह, पुत्र स्वर्गीय सरदार लखवीर सिंह, निवासी भंगर, जिला फिरोजपुर, पंजाब के रूप में बताई गई.
पुलिस के सामने अब सब से बड़ा सवाल यही था कि आखिर ये दोनों युवक किस आधार पर पुलिस की वरदी पहन कर घूम रहे थे? गाड़ी पर लालबत्ती और सायरन लगाने का अधिकार उन्हें किस ने दिया था? क्या वे केवल लोगों पर रौब जमाने के लिए ऐसा कर रहे थे या इस पहचान का इस्तेमाल किसी अन्य उद्देश्य से भी किया जा रहा था?
इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए पुलिस ने मामले को गंभीरता से लिया.
उपलब्ध विवरण के मुताबिक, श्रीनगर के आरएम बाग थाने में उन दोनों के खिलाफ एक रिपोर्ट दर्ज की गई. इस में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 319(2), 49 और 205 का उल्लेख किया गया था. मामले में कथित फरजी पहचान, धोखाधड़ी और पुलिस अधिकारी के रूप में अनुचित ढंग से पेश आने से जुड़े आरोपों की जांच की गई.
पुलिस ने फौच्र्युनर गाड़ी को भी जब्त कर लिया. वर्दी और पहचान से संबंधित दस्तावेजों की जांच की गई, ताकि यह पता लगाया जा सके कि आरोपियों ने किस प्रकार पुलिस अधिकारी का रूप धारण किया था.
उस समय अमरनाथ यात्रा और स्वतंत्रता दिवस नजदीक होने के कारण सुरक्षा एजेंसियां पहले से सतर्क थीं. ऐसे माहौल में किसी व्यक्ति का पुलिस अधिकारी की वरदी पहन कर संवेदनशील पर्यटन क्षेत्र में घूमना सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण था.
पुलिस के सामने यह पता लगाना जरूरी था कि दोनों का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत रौब जमाना था या वे किसी अन्य गतिविधि में भी शामिल थे. हालांकि किसी बड़ी साजिश में शामिल होने का संदेह अपने आप में किसी अपराध का प्रमाण नहीं था, फिर भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए हर पहलू की जांच करना आवश्यक था.
इस घटना ने यह सवाल भी खड़ा किया कि अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक पुलिस अधिकारी का रूप धारण कर के घूमता रहे तो उस की पहचान की पुष्टि करने और उसे रोकने की जिम्मेदारी किस स्तर पर सुनिश्चित की जानी चाहिए.
करणवीर शर्मा का यह मामला इसलिए भी चर्चा में आया, क्योंकि पुलिस की वरदी आम कपड़ों की तरह नहीं होती. उस के साथ सरकारी अधिकार, कानून लागू कराने की जिम्मेदारी और जनता की सुरक्षा का विश्वास जुड़ा होता है.
जब कोई व्यक्ति कथित तौर पर अपनी वास्तविक पहचान छिपा कर फरजी वरदी पहन कर दूसरों पर अनुचित प्रभाव डालने की कोशिश करता है तो उस का असर केवल कुछ लोगों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इस से पुलिस विभाग की छवि, जनता का भरोसा और सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता भी प्रभावित हो सकती है.
वरदी देख कर आम नागरिक स्वाभाविक रूप से किसी व्यक्ति को अधिकारी मान लेते हैं. लालबत्ती और सायरन लगी गाड़ी इस धारणा को और मजबूत कर सकती है. ऐसे में किसी फरजी अधिकारी के लिए लोगों को प्रभावित करना आसान हो जाता है. यही कारण है कि पुलिस की वरदी, सरकारी पहचान और प्रतीकों का अनधिकृत इस्तेमाल गंभीर जांच का विषय बनता है.
करणवीर की कहानी में भी वरदी और रुतबे का यही पहलू सामने आया. वह अपने पहनावे और गाड़ी के सहारे एक प्रभावशाली अधिकारी की छवि प्रस्तुत कर रहा था, लेकिन श्रीनगर में स्थानीय लोगों की सतर्कता और पुलिसकर्मी की सूक्ष्म निगरानी ने उस के इस कथित दिखावे पर सवाल खड़े कर दिए.
डल झील की उस शाम का दृश्य सामान्य पर्यटक गतिविधियों से शुरू हुआ था, लेकिन कुछ ही समय में वह पुलिस जांच का विषय बन गया.
अगर स्थानीय लोगों ने संदिग्ध गतिविधियों पर ध्यान नहीं दिया होता और एसआई आरिफ खान ने उन की शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया होता तो संभव था कि दोनों युवक कुछ और समय तक इसी तरह लोगों के बीच घूमते रहते.
इस घटना का सब से महत्त्वपूर्ण पहलू यही था कि पुलिस ने केवल वरदी देख कर किसी व्यक्ति को अधिकारी मान लेने के बजाय उस की पहचान की पुष्टि करने की जरूरत समझी. अनुभव, सतर्कता और पूछताछ की प्रक्रिया ने उस अंतर को सामने ला दिया, जो वरदी के बाहरी दिखावे और वास्तविक विभागीय पहचान के बीच होता है.
कश्मीर की वादियों में घूमने पहुंचा कथित फरजी डीएसपी शायद यह मान कर चल रहा था कि उस की वरदी, गाड़ी और रौब उसे लोगों की नजरों में एक असली अधिकारी बनाए रखेंगे, लेकिन नेहरू पार्क में उठे कुछ सवालों ने उस के इस भ्रम को तोड़ दिया. कानून का सम्मान वरदी पहन लेने से नहीं, बल्कि वैध अधिकार, जिम्मेदारी और जवाबदेही से मिलता है. पुलिस की वरदी जनता की सुरक्षा और भरोसे का प्रतीक है, निजी रुतबा दिखाने का साधन नहीं.
क्यों बना फरजी अफसर
लुधियाना के गांव कद्दों के रहने वाले करणवीर शर्मा की जुलाई 2020 में शादी खन्ना की एक आईलेट्स पास मोनिका (परिवर्तित नाम) से हुई थी. शादी से पहले करणवीर ने खुद को इंटरनैशनल कबड्डी प्लेयर बताया. उस ने कहा कि शादी के बाद वह मोनिका को विदेश में बसा देगा.
मोनिका के परिवार के मुताबिक, शादी से पहले करणवीर को कबड्डी खिलाड़ी बताया गया था. परिवार को कथित तौर पर यह भी बताया गया था कि वह विदेशों में कबड्डी खेलने जाता है और शादी के बाद मोनिका को भी विदेश ले जाएगा. उस समय करणवीर की बहन आस्ट्रेलिया से अपने भाई की शादी की सिलसिले में पंजाब में स्थित अपने घर आई थी. परिवार की ओर से आईलेट्स (इंटरनैशनल इंग्लिश लैंग्वेज टेस्टिंग सिस्टम) पास लड़की तलाशने की जिम्मेदारी उस की बहन को दी गई थी. आईलेट्स दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाला सब से पापुलर इंग्लिश लैंग्वेज प्रोफिशिएंसी टेस्ट है. इसे 1980 में लांच किया गया था. आज ब्रिटिश काउंसिल, आईडीपी एजुकेशन और कैंब्रिज असेसमेंट इंग्लिश मिल कर ये परीक्षा करवाती हैं.
दुनियाभर में हजारों यूनिवर्सिटीज में एडमिशन के लिए आईलेट्स स्कोर का इस्तेमाल किया जाता है. यही वजह है कि आज अगर किसी को विदेश में पढऩे जाना है तो उसे पहले आईलेट्स एग्जाम क्वालीफाई करना पड़ता है. विदेश में नौकरी पाने के लिए भी इस की महत्त्वपूर्ण भूमिका है. आईलेट्स पास लड़की (मोनिका) के मिलने पर रिश्ता तय हो गया और करणवीर शर्मा की शादी मोनिका से कर दी गई.
शादी के बाद पहली रात यानी सुहागरात को ही करणवीर के मोनिका से किसी बात को ले कर मतभेद हो गए. करणवीर ने कहा कि ‘चलो, ये मसले तो बाद में भी हल हो जाएंगे, पहले शादी जिस उद्देश्य से की जाती है, उस की पहली रात का जो असली मकसद है, उस को पूरा करते हैं.’’
नईनवेली दुलहन इस बात को तैयार नहीं हुई. इस को ले कर दोनों में काफी कहासुनी होती रही.
मोनिका की मम्मी ने आरोप लगाया है कि शादी की पहली रात ही करणवीर ने उन की बेटी के साथ जबरदस्ती की. बलपूर्वक सुहागरात मनाने और साथ ही अप्राकृतिक रूप से सैक्स करने को ले कर बात और भी ज्यादा बिगड़ गई. परिवार ने अगले दिन कार की मांग किए जाने का आरोप भी लगाया था.
परिजनों के मुताबिक, शादी के समय करणवीर को डीएसपी के रूप में पेश किया गया था. शादी के तीसरे दिन मोनिका के मायके वाले उसे अपने घर ले आए. इस के बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई.
शिकायत के आधार पर 8 अगस्त, 2020 को सिटी थाना-2 खन्ना में एफआईआर नंबर 123 दर्ज की गई. मामले में आईपीसी की धारा 376, 377 और 506 लगाई गई थीं. बाद में केस अदालत में पहुंचा. अदालत द्वारा सम्मन जारी किए गए. अदालत में हाजिर न होने पर करणवीर के खिलाफ वारंट जारी किए गए. तब भी अभियुक्त को हाजिर करने में पुलिस नाकाम रही. नियम के अनुसार लंबे समय तक अदालत में पेश नहीं होने के कारण करणवीर को जनवरी 2026 में भगोड़ा घोषित कर दिया गया था.
करणवीर पर आरोप है कि वह खुद को कभी पंजाब पुलिस का डीएसपी बताता था. वह पीएपी जालंधर में पोस्टिंग बताता था. वरदी के साथ वह पुलिस का बैच व डिस्क भी यूज करता. कभी कबड्डी खिलाड़ी के रूप में अपनी पहचान पेश करता था.
करणवीर शर्मा कोई आम ठग नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कबड्डी प्लेयर परिवार से है, खुद भी कबड्डी खेलता है. वह पुलिस की वरदी पहन कर विभिन्न कार्यक्रमों और खेल आयोजनों में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाता था. यदि कहीं आमंत्रित नहीं भी किया जाता था तो उस के कुछ गुर्गे उसे आमंत्रित कर लेते थे और खेल आयोजनों में मान न मान मैं तेरा मेहमान वाली कहावत के अनुसार विशेष कर कबड्डी के खेलों के टूर्नामेंट में विशेष अतिथि बन जाता था.
दोनों टीमों के खिलाडिय़ों से मुख्य अतिथि का परिचय कराया जाता. वह खिलाडिय़ों से हाथ मिला था.
कबड्डी के एक सीनियर खिलाड़ी और पंजाब पुलिस के डीएसपी की वरदी में होने के कारण उस से हाथ मिलाने में खिलाड़ी बड़ा गर्व महसूस करते थे. मुख्य अतिथि के रूप में करणवीर सिंह खेल भावनाओं पर भाषण भी देता. कभीकभी कबड्डी के गुर पर भी व्याख्यान कर दिया करता था.
बताया जाता है कि कुछ आयोजनों में स्थानीय पुलिसकर्मी भी मौजूद रहते थे. इस के बावजूद उस की पहचान को ले कर सवाल क्यों नहीं उठे, यह जांच का विषय है. यह भी दावा किया गया है कि उस ने अपने साथ गनमैन रखा हुआ था.
मामला अदालत में पहुंचने के बाद भी करणवीर शर्मा की मुश्किलें तुरंत नहीं बढ़ीं. अदालत में सुनवाई के दौरान उसे पेश होने के लिए सम्मन जारी किए गए, लेकिन वह हाजिर नहीं हुआ. इस के बाद अदालत ने उस के खिलाफ वारंट जारी किए. इस के बावजूद पुलिस उसे अदालत के सामने पेश करने में नाकाम रही.
जब लंबे समय तक फरार रहने और अदालत में पेश नहीं होने के कारण कानूनी काररवाई आगे बढ़ी तो करणवीर को नियमानुसार भगोड़ा घोषित कर दिया गया. हालात इस कदर बिगड़ गए कि अदालत को पुलिस अधिकारियों को भी पत्र लिखना पड़ा, ताकि अभियुक्त की गिरफ्तारी सुनिश्चित की जा सके.
उधर पीडि़ता मोनिका के परिवार ने पुलिस से संपर्क किया और उसे भगोड़ा घोषित कर दिया. आखिरकार, मामले में काररवाई तेज हुई.
पुलिस अधिकारी विनोद कुमार के अनुसार, एसएसपी के दिशानिर्देशों पर करणवीर की गिरफ्तारी के लिए विशेष टीम गठित की गई. टीम की कमान एसएचओ तरनवीर बेदी को सौंपी गई. उन्हें तकनीकी सहायता के साथ अतिरिक्त पुलिस बल भी उपलब्ध कराया गया. इस के बाद एसएचओ तरनवीर बेदी के नेतृत्व में पुलिस टीम ने थाना सिटी-2 की टीम के साथ मिल कर काररवाई की.
इस के बाद खन्ना स्पैशल ब्रांच की टीम ने एसआई जरनैल सिंह के नेतृत्व में आरोपी को 26 सितंबर, 2026 को गिरफ्तार किया. पुलिस के अनुसार, उस ने भागने की कोशिश की, लेकिन पुलिस के चंगुल से बच नहीं पाया. करणवीर को 27 सितंबर को अदालत में पेश किया गया. अदालत ने उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया.
लंबे समय से अदालत में पेश नहीं हो रहे अभियुक्त की गिरफ्तारी के साथ ही पुराने मामले में आगे की कानूनी काररवाई का रास्ता खुला.
पुलिस का कहना है कि पुराने दुष्कर्म मामले में गिरफ्तारी के बाद आरोपी से पूछताछ के दौरान उस के द्वारा कथित रूप से फरजी डीएसपी बन कर घूमने, पुलिस की वरदी का इस्तेमाल करने, सामाजिक कार्यक्रमों में अधिकारी के रूप में शामिल होने तथा गनमैन हासिल करने के लिए कथित तौर पर रची गई धमकी की घटना से जुड़े तथ्यों को भी जांच में शामिल किया जा रहा है.
आरोपी की जांच से जुड़े पुलिस अफसरों के मुताबिक, करणवीर करीब 2 साल पहले खुद को पंजाब पुलिस का डीएसपी बताने लगा था. वह स्पोट्र्स कोटे के जरिए पुलिस में भरती होने का दावा करता था और अपनी तैनाती पीएपी जालंधर बताता था. वह डीएसपी की वरदी पहनता और उस पर पुलिस के बैज व डिस्क का इस्तेमाल करता था.
यह भी पता चला है कि वह सामाजिक और खेल कार्यक्रमों में भी बतौर पुलिस अधिकारी चीफ गेस्ट के तौर पर शामिल होता रहा. कुछ कार्यक्रमों में उस के साथ असली पुलिसकर्मी भी नजर आए. अब पुलिस यह जांच कर रही है कि उस ने फरजी पुलिस अधिकारी की पहचान का इस्तेमाल किनकिन मौकों पर किया और क्या इस पहचान के जरिए किसी अन्य व्यक्ति को प्रभावित किया या ठगा.
करणवीर शर्मा की जिंदगी में पुलिस अधिकारी होने का दिखावा केवल वरदी पहनने और लोगों पर रौब जमाने तक सीमित नहीं रहा. पुलिस जांच के दौरान उस के खिलाफ पंजाब के दोराहा थाना क्षेत्र से जुड़े एक अन्य मामले की जानकारी भी सामने आई.
इस मामले में आरोप था कि उस ने पुलिस सुरक्षा और गनमैन हासिल करने के लिए खुद को धमकी दिलवाने की कथित साजिश रची थी.
कहानी का यह पहलू और भी दिलचस्प था, क्योंकि यहां सवाल केवल फरजी पुलिस अधिकारी बनने का नहीं था, बल्कि ऐसी परिस्थितियां पैदा करने के आरोप का भी था, जिन के आधार पर उसे सरकारी सुरक्षा मिल सकती थी.
पुलिस के सामने यह जानना जरूरी था कि आखिर धमकी देने वाला कौन था, धमकी किस माध्यम से दी गई थी और क्या इस के पीछे कोई वास्तविक खतरा था या फिर पूरे घटनाक्रम को किसी खास उद्देश्य से अंजाम दिया गया था.
जांच आगे बढ़ी तो कथित धमकी से जुड़े मोबाइल नंबर पुलिस की पड़ताल के दायरे में आए. अधिकारियों ने तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर यह पता लगाने की कोशिश की कि संबंधित नंबरों का इस्तेमाल किस ने किया था और उन के पीछे कौन लोग सक्रिय थे.
इसी क्रम में जिम में करणवीर के संपर्क में रहने वाले एक व्यक्ति की भूमिका भी जांच के दायरे में आने की बात सामने आई. पुलिस ने कथित तौर पर यह जानने की कोशिश की कि उस व्यक्तिका करणवीर से किस तरह का संपर्क था और धमकी से संबंधित घटनाक्रम में उस की कोई भूमिका थी या नहीं.
अब जांच का केंद्र केवल धमकी भरा संदेश या फोन कौल नहीं था. पुलिस यह समझना चाहती थी कि इन संपर्कों के बीच क्या संबंध था, घटनाओं का क्रम क्या रहा और क्या किसी ने जानबूझ कर ऐसा माहौल तैयार करने की कोशिश की थी, जिस से करणवीर को खतरे में घिरा हुआ व्यक्ति दिखाया जा सके.
यदि किसी व्यक्ति को वास्तव में धमकी मिलती है तो पुलिस उस की सुरक्षा का आकलन कर सकती है, लेकिन यदि जांच में यह साबित हो कि धमकी की कहानी खुद ही किसी योजना के तहत तैयार की गई थी तो मामला पूरी तरह अलग हो जाता है.
ऐसी स्थिति में कथित साजिश में शामिल प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच महत्त्वपूर्ण हो जाती है. दोराहा थाना क्षेत्र से जुड़े इस मामले में भी पुलिस ने तकनीकी जांच के सहारे घटनाक्रम की कडिय़ां जोडऩे की कोशिश की. मोबाइल नंबरों से संबंधित जानकारी और आपसी संपर्कों की पड़ताल का उद्देश्य यही था कि कथित धमकी के पीछे की वास्तविकता सामने लाई जा सके.
करणवीर पर लगे इन आरोपों ने उस के व्यक्तित्त्व और काम करने के कथित तौरतरीकों को ले कर कई सवाल खड़े किए. पुलिस अधिकारी का रूप धारण करने से पहले भी वह क्षेत्र का प्रतिष्ठित व्यक्ति बनने की कोशिश में था. जिस से लोग उस की ओर आकर्षित हो सके.
इस घटनाक्रम ने करणवीर से जुड़े मामलों की गंभीरता को और बढ़ा दिया और जांच अधिकारियों के लिए यह जानना जरूरी बना दिया कि उस के दावों, संपर्कों और कथित गतिविधियों के पीछे वास्तविक कहानी क्या थी?
जांच में पता चला कि करणवीर सिंह ने ही अपने जिम में साथ जाने वाले दोस्त से यह कौल कराई थी. करणवीर शर्मा की यह योजना फेल होने के बाद उस के दिमाग में पुलिस अधिकारी बनने का खयाल आया. इस के लिए उस ने काफी जांचपड़ताल की. दारोगा या कोतवाल बनने के लिए उस ने पाया कि बहुत परेशानियां सामने आ सकती हैं. दारोगा को आसानी से पकड़ा जा सकता है, क्योंकि कोतवाली में दारोगा की कोई खास हैसियत नहीं होती. अगर दारोगा बन कर किसी पर रौब गांठा जाएगा तो वह कोतवाल से शिकायत कर सकता है.
इस से जल्दी ही पोल खुल जाएगी. थानेदार का क्षेत्र भी सीमित होता है. एक थाना क्षेत्र से बाहर जाने पर आसानी से भेद खुल सकता है. इस पूरे अध्ययन से उसे डीएसपी बनना सब से आसान दिखाई दिया.
श्रीनगर से जमानत पर आने के बाद भी करणवीर नहीं सुधरा. आखिरकार 26 सितंबर, 2025 को खन्ना पुलिस ने उसे गांव कद्दों से ही गिरफ्तार कर लिया. खन्ना के एसएसपी दरपन अहलूवालिया ने खुद पुष्टि की कि श्रीनगर वाला फरजी डीएसपी यही है.
कथा लिखे जाने तक करणवीर शर्मा जेल में था. पुलिस जांच कर उस को अदालत से सजा दिलाने के लिए पर्याप्त सबूत एकत्र करने में जुटी हुई थी. Fake Police Officer






