Aligarh Double Murder Case. एडवोकेट उमर की अपनी कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने शाइस्ता को गोद ले कर जिस उम्मीद के साथ पालापोसा, आखिर वह उस पर खरी क्यों नहीं उतर सकी?

घर में घुसते ही उमर ने आदतन बेटी को आवाज दी, ‘‘बेटी शाइस्ता, कहां हो?’’ बेटी का कोई जवाब नहीं आया तो सामने खड़ी बेगम से पूछा, ‘‘बेगम, शाइस्ता कहां है, दिखाई नहीं दे रही है?’’

‘‘आप ने ही उसे सिर चढ़ा रखा है. आज दोपहर से जिद पर अड़ी है कि नया बैग ले कर ही कल स्कूल जाएगी. अभी 20 दिन पहले ही उसे बैग दिलाया था.’’ बेगम ने कहा. ‘‘पर वह है कहां?’’ जूतेमोजे उतारते हुए उमर ने पूछा.

‘‘आप के ही कमरे में अनशनपाटी ले कर पड़ी है. जा कर बुला लाओ.’’ बेगम ने तंज कसते हुए कहा.

‘‘क्या कहा, दोपहर से नाराज हो कर पड़ी है. तब तो उस ने कुछ खायापीया भी नहीं होगा? इस समय 6 बज रहे हैं. बताओ, तब से मेरी बच्ची भूखी है.’’ उन्होंने कमरे की ओर जाते हुए कहा.

‘‘मैं ने खाना उस के कमरे में पहुंचाया था, नहीं खाया तो मैं क्या करती. 4 बजे जूस भी देने गई थी, वह भी नहीं पिया.’’ बेगम ने कहा.

पर उन की बातों को अनसुनी करते हुए उमर सीधे शाइस्ता के पास जा पहुंचे. 7 साल की शाइस्ता उन्हीं के बैड पर लेटी थी. जैसे ही उमर ने उसे आवाज दी, उस ने नाराजगी प्रकट करने के लिए करवट बदल कर मुंह फेर लिया.

‘‘क्या बात हो गई मेरी रानी बेटी को? आप हम से भी बात नहीं कर रही हैं?’’ उमर ने मासूम शाइस्ता को गोद में उठाते हुए कहा, ‘‘क्या चाहिए आप को?’’ ‘‘अब्बूजान, हमें आज ही नया बैग चाहिए.’’ शाइस्ता ने कहा.

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