Kanpur Tragic Love Story. इमरान और शालू अलगअलग धर्मों के थे, इसलिए उन की मोहब्बत को उन के घर वालों ने स्वीकार नहीं किया, लिहाजा शादी कर के वे अकेले पड़ गए. अकेले जीना आसान है क्या, वे भी नहीं जी सके.     

उत्तर प्रदेश के महानगर कानपुर (दक्षिण) में एक बड़ी आबादी वाला मोहल्ला है संजयनगर. यह थाना गोविंदनगर के अंतर्गत आता है. इस मोहल्ले में मध्यमवर्गीय परिवारों की संख्या अधिक है. जो छोटामोटा व्यवसाय या नौकरी कर के अपने परिवारों का भरणपोषण करते हैं. इसी मोहल्ले में किशनगोपाल भी अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी कुसुमा के अलावा एक बेटी शालिनी उर्फ शालू तथा एक बेटा राजू था.

शालू गोरी, तीखे नाकनक्श और बड़ीबड़ी आंखों वाली सुशील एवं विनम्र स्वभाव वाली लड़की थी. जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही उस की शोखियां एवं चंचलता और बढ़ गई थी. वह जितनी सुंदर थी, पढ़नेलिखने में उतनी ही तेज थी. खालसा गर्ल्स इंटर कालेज से इंटरमीडियट की परीक्षा पास करने के बाद वह आगे पढ़ना चाहती थी, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने की वजह से मांबाप ने इजाजत नहीं दी.

बेटी जवान हो चुकी थी, इसलिए किशनगोपाल और उन की पत्नी कुसुमा को उस की शादी की चिंता सताने लगी. वह उस के लिए घर और वर ढूंढने लगे. कहीं से उन्हें गांव अरौल के रहने वाले राजन गौतम के बेटे मालवीय गौतम के बारे में पता चला. राजन गौतम के पास अच्छीखासी खेती की जमीन थी. मालवीय गौतम पिता के साथ ही खेतीकिसानी करता था.

किशनगोपाल को लड़का पसंद आ गया. बातचीत के बाद उन्होंने शालू की शादी मालवीय गौतम से कर दी. पढ़ीलिखी और खूबसूरत पत्नी पा कर मालवीय अपने भाग्य पर इतरा उठा. सास फूलमती भी फूली न समाई थी.

सब खुश थे, लेकिन शालू खुश नहीं थी. इस की वजह यह थी कि मालवीय सांवला और नाटे कद का था. उस ने पति के रूप में जिस तरह के सुदर्शन युवक का सपना संजोया था, वह सपना मालवीय के साथ शादी होने पर टूट गया था. इस के अलावा उसे ससुरालियों का बात करने का तरीका और रहनसहन भी पसंद नहीं था.

शालू जैसेतैसे एक सप्ताह ससुराल में रही. जब वह मायके आई तो खोईखोई और उदास सी थी. मां कुसुमा ने उस से इस की वजह पूछी तो शालू का दर्द आंसुओं के रास्ते छलक पड़ा. उस ने बताया कि मालवीय उस के लायक नहीं है. वह उस की भावनाओं को नहीं समझता. ससुराल के अन्य लोग भी ठेठ देहाती हैं. उन लोगों के साथ वह नहीं रह पाएगी. इसलिए अब वह ससुराल नहीं जाना चाहती.

बेटी की बात सुन कर कुसुमा स्तब्ध रह गई. उस ने उसे बहुत समझाया, लेकिन शालू ससुराल जाने को राजी नहीं हुई. करीब महीने भर बाद शालू का पति मालवीय उसे लिवाने आया, लेकिन शालू ने ससुराल जाने से साफ मना कर दिया. राजन गौतम ने बहू को ले जाने के लिए नातेरिश्तेदारों से भी दबाव डलवाया, पर शालू टस से मस न हुई. वह मायके में ही रही.

कुसुमा दादानगर स्थित एक जूता फैक्ट्री में काम करती थी, जबकि उस का पति किशनगोपाल पैतृक गांव पनकी में रह कर खेतीकिसानी करता था. शालू कुछ दिनों मां के साथ तो कुछ दिन पिता के साथ रहती थी. वह पढ़ीलिखी थी, इसलिए वह मांबाप पर बोझ नहीं बनना चाहती थी. अपना खर्च चलाने के लिए वह दादानगर स्थित ज्वैलरी बौक्स बनाने वाली एक फैक्ट्री में नौकरी करने लगी.

जिस फैक्ट्री में वह काम करती थी, उसी फैक्ट्री में इमरान भी काम करता था. वह शास्त्रीनगर में सेंट्रल पार्क के पास अपने मातापिता के साथ रहता था.

उस के पिता बरकत अली की कबाड़ की दुकान थी. उन्होंने उस से वह दुकान संभालने को कहा, लेकिन इमरान यह काम करने को राजी नहीं हुआ और ज्वैलरी बौक्स बनाने वाली फैक्ट्री में नौकरी करने लगा था. वह जो कमाता था, उसे अपनी ठाठबाट की जिंदगी जीने में खर्च कर देता था.

शालू भी बनसंवर कर फैक्ट्री में आती थी. इमरान तिरछी नजरों से उसे रोज देखा करता था. उस की नजरों से ही पता चलता था कि वह उसे चाहता है. आंखों के रास्ते शालू उस के दिल में समा चुकी थी. शालू भी नादान नहीं थी, जो इमरान की नजरों के भावों को न समझ पाती.

इमरान का निहारना उसे अच्छा लगता था. जब कभी इमरान से उस की नजरें टकरा जातीं, वह झट से नजरें फेर कर होंठों ही होंठों में मुसकराती और आगे बढ़ जाती. इस से इमरान समझ गया था कि शालू ने उस के मन की बात जान ली है.

इमरान के प्यार का अहसास शालू के दिल को छू गया था. शालू ने इमरान के बारे में सोचना शुरू किया तो उस के मन में भी विचारों का मंथन होने लगा. वह सोचने लगी कि हिंदू हो कर वह किसी मुसलमान लड़के से प्यार कैसे कर सकती है, मुसलमानों के रीतिरिवाज और इबादत के तरीके अलग हैं. दोनों को साथ निभाना कठिन हो जाएगा.

लेकिन मन की सोच उस के दिल में हो रही उथलपुथल के विपरीत थी. वैसे भी मोहब्बत के रास्ते में कोई जातिधर्म आड़े नहीं आता. वह तो कुदरत की बख्शी हुई अनमोल नेमत है. इस तरह दिल की आवाज मन की सोच पर भारी पड़ गई. शालू ने तय कर लिया कि वह इमरान से दोस्ती करेगी.

एक शाम शालू फैक्ट्री से घर जा रही थी, तभी सीटीआई चौराहे के पास इमरान मिल गया. औपचारिक बातचीत के बाद इमरान ने कहा, ‘‘शालू मेरे मन में बहुत दिनों से एक बात घूम रही है. मौका न मिलने की वजह से वह बात मैं तुम से कह नहीं सका. आज मैं तुम से वह बात कह देना चाहता हूं. तुम्हें उस पुल के नीचे चलना होगा. वहीं मैं वह बात बता दूंगा.’’

उस की बात सुन कर शालू समझ रही थी कि यह क्या कहना चाहता है. फिर भी वह नासमझ बनते हुए बोली, ‘‘ऐसी क्या बात है इमरान, जो तुम मुझे अलग में बताना चाहते हो? फिर भी तुम कहते हो तो मैं तुम्हारे साथ उस पुल के नीचे चली चलती हूं.’’

इमरान के कहने पर शालू वहां स्थित ओवर ब्रिज के नीचे चली गई. वहां उन दोनों के अलावा कोई नहीं था. इस के बाद भी इमरान की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह अपने मन की बात उस से कहे. तभी शालू बोली, ‘‘इमरान, तुम कुछ कहने के लिए मुझे यहां लाए थे, बताओ क्या बात है?’’

इमरान ने हिम्मत कर के उस की नजरों से नजरें मिला कर कहा, ‘‘शालू, तुम मेरे दिल में रचबस गई हो. तुम्हारा यह सुंदरसलोना चेहरा हमेशा मेरी आंखों के सामने नाचा करता है. अब तुम्हारे बिना नहीं रहा जाता.’’

इमरान की बातें सुन कर शालू चहक कर बोली, ‘‘इमरान मैं भी तुम से प्यार करती हूं. लेकिन शरम के मारे मन की बात कह नहीं पा रही थी. मन यही करता है कि मैं तुम्हारे पास बैठ कर घंटों बातें करती रहूं.’’

शालू के मन की बात जान कर इमरान बहुत खुश हुआ. प्यार का इजहार करने के बाद दोनों वहीं बैठे काफी देर तक बातें करते रहे. इस के बाद जब भी मन होता, दोनों फोन पर बतिया लेते और मौका मिलने पर मिल भी लेते.

मेलमुलाकातों के बाद दोनों का प्यार गहराता गया. जब भी समय मिलता, दोनों अपनी ड्यूटी से नदारद हो कर शहर में घूमते, फिल्म देखते. इमरान शालू के प्यार में इतना दीवाना हो गया कि उस पर दिल खोल कर पैसे खर्च करने लगा. शालू जो कहती, वह खरीद कर दे देता.

मन मिल जाए तो तन के मिलने की ख्वाहिश अपनेआप जागने लगती है. प्रेमालाप के क्षणों में किए जाने वाले चुंबन तथा आलिंगन ने शालू की ख्वाहिश को हवा दी. दोनों ही हसरतें पूरी करने के लिए बेकरार हो रहे थे, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिल रहा था.

एक रोज शालू मां के फैक्ट्री जाने के बाद घर में अकेली थी. इमरान को देखे बिना उसे चैन नहीं पड़ रहा था. वह उस दिन फैक्ट्री नहीं आई तो इमरान का भी मन नहीं लग रहा था. उस दिन इमरान ने उसे फोन नहीं किया, बल्कि वह उस से मिलने उस के घर पहुंच गया. अचानक अपने घर प्रेमी को देख कर शालू खुश हो गई. इमरान के कमरे में दाखिल होते ही शालू ने दरवाजा भीतर से बंद कर लिया.

कुछ देर बातचीत के बाद बंद कमरा और तनहाई में वे अपने ऊपर काबू नहीं रख सके. इमरान ने अपनी बांहों में भर कर उस के चेहरे पर चुंबनों की झड़ी लगा दी. शालू ने भी इमरान के गले में बांहों का हार डाल दिया. इस के बाद दोनों ही एकदूसरे में समा गए.

वासना का तूफान शांत हुआ तो दोनों के ही चेहरों पर खुशी दिखाई दे रही थी. 1-2 घंटे बाद इमरान वहां से चला गया. इस के बाद शालू को जब भी मौका मिलता, वह इमरान को अपने घर बुला लेती और मौजमस्ती करती.

आए दिन इमरान के वहां आने पर पड़ोसियों को शक होने लगा. वे सोचने लगे कि शालू के अकेले होने पर ही यह लड़का यहां क्यों आता है? आखिर बंद कमरे में ये दोनों करते क्या हैं?

कुछ दिनों बाद शालू और इमरान को ले कर मसालेदार चर्चाएं मोहल्ले में फैलनी शुरू हो गईं तो किसी तरह ये शालू की मां कुसुमा के कानों तक जा पहुंचीं. उस ने इस बाबत शालू से पूछा तो उस ने मां को सच्चाई बता दी. वह बोली, ‘‘मां, इमरान हमारी फैक्ट्री में काम करता है. वह बहुत अच्छा लड़का है. हम दोनों एकदूसरे से मोहब्बत करते हैं.’’

गैर धर्म के लड़के से इश्क लड़ाने की बात सुन कर कुसुमा हक्कीबक्की रह गई. उस ने प्यार से उसे समझाया, ‘‘बेटी, हम हिंदू हैं और इमरान मुसलमान. लोगों को जब तुम्हारे संबंधों के बारे में पता चलेगा तो क्या कहेंगे? हमारी तो नाक ही कट जाएगी. बेटी अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, इमरान को भूल जा और उस से मिलनाजुलना बंद कर दे.’’

मां की बात सुन कर शालू के चेहरे का रंग उड़ गया. वह मां को समझाते हुए बोली, ‘‘मां अब जमाना बहुत बदल गया है. जातिधर्म की बातें अब बहुत पुरानी हो चुकी हैं. हम दोनों एकदूसरे को दिलोजान से चाहते हैं. इसलिए अब दूर नहीं हो सकते.’’

‘‘तो फिर तुझे मुझ से नाता तोड़ना होगा.’’ कुसुमा ने फरमान सुना दिया.

मां का फरमान सुन कर शालू असमंजस में पड़ गई. एक तरफ प्रेमी था तो दूसरी तरफ मां.

काफी सोचनेविचारने के बाद शालू ने तय कर लिया कि वह इमरान को नहीं छोड़ेगी, भले ही इस के लिए उसे कुछ भी त्यागना पड़े. अपने मन की बात उस ने मां से कही तो कुसुमा ने साफ कह दिया, ‘‘जब तू उस के साथ रहना चाहती है तो तेरा आज से हम से वास्ता खत्म.’’

मां के इतना कहने पर वह सोच रही थी कि मां ने ऐसा गुस्से में कहा होगा. उस के घर से निकलते ही मां उसे आवाज दे कर बुला लेंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. वह घर से निकली तो कुसुमा ने उसे नहीं बुलाया.

वहां से निकल कर शालू पिता के पास पनकी गांव जा पहुंची. किशनगोपाल ने जब बेटी को अचानक आया देखा तो वह चौंका. बेटी का उदास चेहरा देख कर वह समझ गया कि मां ने डांट दिया होगा. फिर भी उस ने पूछा, ‘‘बेटी सब ठीक तो है?’’

‘‘नहीं पिताजी, कुछ भी ठीक नहीं है.’’ शालू ने जवाब दिया.

‘‘क्यों क्या हुआ? क्या मां से झगड़ा हुआ है?’’

‘‘हां,’’ कहते हुए शालू ने इमरान और अपने प्यार की दास्तां तथा मां से झड़प होने की पूरी बात पिता से बता दी.

बेटी के दूसरे धर्म के लड़के से रिश्ते की बात सुन कर किशनगोपाल के पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई. उस ने भी बेटी को इज्जत की दुहाई देते हुए ऊंचनीच की बात समझाई और इमरान से नाता तोड़ने को कहा.

लेकिन शालू तो इमरान के प्रेमरंग में डूब चुकी थी. इसलिए उस ने पिता की बात भी नहीं मानी और उन के पास से भी चली आई. इस के बाद उस ने इमरान को फोन किया और उस से मिली, ‘‘इमरान, तुम्हारा प्यार पाने के लिए मैं ने अपने मातापिता को ठुकरा दिया है. अब मैं यह जानना चाहती हूं कि तुम मुझे धोखा तो नहीं दोगे?’’

‘‘कैसी बात करती हो शालू. तुम तो मेरी आत्मा हो. मैं ने तुम्हें सच्चे दिल से प्यार किया है. तुम्हें धोखा देने की तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता.’’

यह बात 3 जुलाई, 2014 की है. उसी समय इमरान, शालू को साथ ले कर शास्त्रीनगर स्थित अपने घर पहुंचा. इमरान के साथ एक अजनबी लड़की को देख कर इमरान की मां आशमा बेगम ने पूछा, ‘‘इमरान, यह लड़की कौन है, इसे अपने साथ क्यों लाया है?’’

इमरान बोला, ‘‘अम्मी, यह शालू है. हमारी फैक्ट्री में ही काम करती है. हम दोनों एकदूसरे से मोहब्बत करते हैं. अब यह हमारे साथ ही रहेगी. आप इसे अपनी बहू के रूप में स्वीकार करें.’’

‘‘हरगिज नहीं,’’ आशमा बेगम की त्योरियां चढ़ गईं, ‘‘हम गैरमजहब की लड़की को अपनी बहू के रूप में नहीं स्वीकार कर सकते. जिद की तो तुम्हें घर से बेदखल कर दूंगी.’’

‘‘अम्मीजान, यह आप का आखिरी फैसला है?’’

‘‘हां, यह हम दोनों का फैसला है.’’ इमरान के पिता बरकत अली बीच में बोल पड़े.

‘‘तो ठीक है अम्मी. शालू अगर प्यार की खातिर अपने मांबाप का घर छोड़ सकती है तो मैं भी उस के लिए अपने मांबाप का घर छोड़ दूंगा.’’ कह कर इमरान उसी समय शालू के साथ अपने घर से निकल गया. उस ने और शालू ने तय कर लिया कि वे अलग रह कर अपनी जिंदगी की नई शुरुआत करेंगे.

इस के बाद इमरान ने रावतपुर में रामलला स्कूल के पास एक कमरा किराए पर ले लिया और वहीं पर दोनों लिवइन रिलेशन में रहने लगे. वहां से दोनों साथसाथ फैक्ट्री आतेजाते थे. पड़ोसियों के पूछने पर इमरान ने शालू को अपनी पत्नी बताया था. शालू पढ़ीलिखी व व्यवहारकुशल थी, इसलिए उस ने जल्द ही मकान मालिक की पत्नी रेशमा से अच्छे संबंध बना लिए.

इधर फैक्ट्री में भी इमरान व शालू का प्रेम संबंध चर्चा का विषय बन गया था. फैक्ट्री मालिक राजीव मनमानी को जब पता चला कि उन की वजह से फैक्ट्री का माहौल खराब हो रहा है तो उन्होंने दोनों को नौकरी से निकाल दिया.

नौकरी छूटने के बाद दोनों बेरोजगार हो गए. उन के सामने आर्थिक परेशानी खड़ी हो गई तो इमरान रंगाईपुताई का काम करने लगा.

मेहनतमजदूरी कर के वह जैसेतैसे घर का खर्च चला रहा था. मजदूरी से लौटने के बाद इमरान थक जाता था. इस थकान को मिटाने के लिए वह शराब पीने लगा. धीरेधीरे वह शराब का आदी बन गया. शालू ने शराब न पीने के लिए उसे काफी समझाया, लेकिन इमरान ने शराब नहीं छोड़ी. अपनी मजदूरी का आधा पैसा वह शराब पर खर्च कर देता, बाकी बचे पैसों से शालू को घर चलाना मुश्किल हो जाता था. शराब पीने को ले कर इमरान व शालू में कलह होने लगी. मोहब्बत का नशा धीरेधीरे उतरने लगा.

अगस्त, 2014 के अंतिम सप्ताह में इमरान बीमार पड़ गया तो उस ने काम पर जाना बंद कर दिया. जिस से उस के सामने भूखों मरने जैसी स्थिति आ गई. मकान का किराया व किराना दुकानदार के पैसे भी चढ़ गए. ऐसे में इमरान को फिर घर की याद आई.

उस ने फोन कर अपने अब्बू व अम्मी से बात कर अपनी परेशानी बताई तो उन्होंने उसे व शालू को घर बुला लिया. हालांकि आशमा बेगम शालू को रखने के लिए राजी नहीं थी, लेकिन बरकत अली के समझाने पर वह राजी हो गई.

इस के बाद इमरान शालू के साथ अपने मांबाप के घर रहने लगा. लेकिन तनाव के चलते इमरान की शराब की लत नहीं छूटी. अब इमरान अकेला ही खोयाखोया सा रहता. वह न तो मांबाप से ज्यादा बात करता और न ही शालू से. वह जो कमाता, सब शराब पर ही खर्च कर देता.

21 सितंबर, 2014 को इमरान सुबह 9 बजे घर से निकला तो रात 10 बजे घर वापस लौटा. उस समय वह नशे में था. शराब पी कर आने से शालू इमरान से उलझ गई. दोनों में तकरार होने लगी तो बरकत अली ने इमरान को डांट दिया. उसी समय आशमा बेगम खाना ले कर आ गई. गुस्से में तमतमाए इमरान ने खाने की थाली दूर फेंक दी और पैर पटकता हुआ घर से निकल गया.

शालू जानती थी कि इमरान गरम मिजाज का है. गुस्से में वह कुछ गलत न कर बैठे, इसलिए वह उसे मनाने के लिए उस के पीछे दौड़ी. वह इमरान को रुकने की आवाजें लगाती रही, लेकिन वह नहीं रुका. वह दादानगर पुल पर पहुंच गया. पुल पर मरम्मत कार्य चल रहा था.

शालू उसे पुल पर ही मनाती रही और घर चलने को कहती रही, लेकिन इमरान नहीं माना. उस ने शालू से कहा कि वह अपनी जिंदगी से हताश है. अत: अब जीना नहीं चाहता. तब शालू ने कहा कि जिंदगी में परेशानियां आतीजाती रहती हैं. हम दोनों मिल कर परिस्थितियों का सामना करेंगे और नई जिंदगी की शुरुआत करेंगे.

शालू विनती और मनुहार करती रही, लेकिन इमरान पर जैसे उस की बातों का असर नहीं हो रहा था. वह पुल के नीचे से गुजर रही रेलगाडि़यों को गौर से देखता रहा. कई घंटे तक दोनों उसी पुल पर बैठे रहे. सुबह 4 बजे इमरान पुल से नीचे उतर आया और दिल्लीहावड़ा रेलवे ट्रैक पर आ गया.

उस समय मगध एक्सप्रैस आ रही थी. जब ट्रेन कुछ दूर रह गई तो इमरान खुदकुशी करने के लिए लाइनों के बीच में आ गया. शालू उसे बचाने दौड़ी. इस से पहले कि वह अपने प्रेमी को बचा पाती, मगध एक्सप्रैस दोनों प्रेमियों के टुकड़ेटुकड़े करती हुई वहां से गुजर गई.

सवेरा होने पर दादानगर कालोनी के कुछ लोगों ने रेलवे ट्रैक पर क्षतविक्षत 2 लाशें पड़ी देखीं तो कुछ ही देर में वहां भीड़ जुट गई. उसी बीच किसी ने थाना गोविंदनगर पुलिस को सूचना दे दी. कुछ देर बाद थानाप्रभारी पंकज अवस्थी व सीओ ओमप्रकाश सिंह घटनास्थल पर पहुंच गए. युवती की क्षतविक्षत लाश पटरियों के बीच पड़ी थी. जबकि युवक की लाश पटरी के बाहर पड़ी थी.

देखने से ही प्रतीत हो रहा था कि दोनों प्रेमी युगल रहे होंगे. युवक की जामा तलाशी लेने पर पुलिस को एक डायरी मिली, जिस में कुछ मोबाइल नंबर थे. पुलिस ने उन नंबरों पर फोन करने शुरू किए तो एक नंबर पर इब्राहीम नाम के शख्स ने फोन रिसीव किया.

सीओ ओमप्रकाश सिंह ने उसे घटनास्थल पर बुला लिया. इब्राहीम ने शवों को देखते ही पहचान लिया. उस ने बताया कि मृतक उस का दोस्त इमरान है तथा मृतका उस की प्रेमिका शालू है.

इब्राहीम की मदद से ही पुलिस ने इमरान व शालू के परिवार वालों को सूचना दी. सूचना पाते ही शालू की मां कुसुमा तथा इमरान के मातापिता वहां पहुंच गए. सीओ ओमप्रकाश सिंह ने मृतकों के परिजनों से पूछताछ की तो प्रेम कहानी के दुखद अंत का खुलासा हुआ.

पूछताछ के बाद पुलिस ने दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम के बाद दोनों ने अपनेअपने धर्मों के अनुसार उन का अंतिम संस्कार कर दिया. इस तरह एक प्रेमकहानी का दुखद अंत हो गया.    Kanpur Tragic Love Story

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...