विचित्र संयोग : चक्रव्यूह का भयंकर परिणाम – भाग 1

रविवार के सुबह सात बजे के लगभग धनवानों का इलाका सेक्टर-15ए अभी सोया पड़ा था. चारों ओर शांति फैली थी. वीआईपी इलाका होने के कारण यहां सवेरा यों भी जरा देर से उतरता है, क्योंकि यहां रात का आलम ही कुछ और होता है. चहलपहल थी तो सिर्फ सेक्टर-2 के पीछे के इलाके में. सवेरे 4 बजे से ही यहां मछलियों का बाजार लग जाता है. ट्रौली रिक्शे और टैंपो रुक रहे थे और उन के साथ ही मछलियों के ढेर लग रहे थे. मछलियां लाने के लिए यहां टैंपो और ट्रौली रिक्शों की लाइन लगी थी.

इसी बाजार के पास फाइन चिकन एंड मीट शौप है, जहां सवेरे 4 बजे से ही बकरों को काटने और उन्हें टांगने का काम शुरू हो जाता है. इस इलाके के लोग इसी दुकान से गोश्त खरीदना पसंद करते थे. सामने स्थित डीटीसी बस डिपो से बसें बाहर निकलने लगी थीं. डिपो के एक ओर नया बास गांव है, जिस में स्थानीय लोगों के मकान हैं. डिपो के सामने पुलिस चौकी है, जिस के बाहर 2-3 सिपाही बेंच पर बैठ कर गप्पें मार रहे थे और चौकी के अंदर बैठे सबइंसपेक्टर आशीष शर्मा झपकियां ले रहे थे.

गांव के पीछे के मयूरकुंज की अलकनंदा इमारत की पांचवी मंजिल के एक फ्लैट में एक सुखी जोड़ा रहता था. यह फ्लैट सेक्टर-62 की एक सौफ्टवेयर कंपनी में काम करने वाले धनंजय विश्वास का था. फ्लैट में धनंजय अपनी पत्नी रोहिणी के साथ रहते थे.

रोहिणी दिल्ली में पंजाब नेशनल बैंक में प्रोबेशनरी औफिसर थी. वह आगरा की रहने वाली थी. 2 वर्ष पूर्व धनंजय से उस का विवाह हुआ था. इस से पहले धनंजय दिल्ली में अपने मातापिता के साथ रहता था. विवाह के बाद उस के सासससुर ने यह फ्लैट खरीदवा दिया था. रोहिणी वाकई रोहिणी नक्षत्र के समान सुंदर थी. धनंजय और उस की जोड़ी खूब फबती थी.

धनंजय के औफिस का समय सवेरे 9 बजे से शाम 6 बजे तक था. वह औफिस अपनी कार से जाता था. लेकिन लौटने का उस का कोई समय निश्चित नहीं था. रोहिणी शाम साढ़े छह बजे तक घर लौट आती थी. इन हालात में पतिपत्नी शाम का खाना साथ ही खाया करते थे. हां, छुट्ïटी के दिनों दोनों मिल कर हसंतेखेलते खाना बनाते थे. धनंजय हर रविवार को सेक्टर-2 में लगने वाली मछली बाजार से मछलियां और फाइन चिकन एंड मीट शौप की दुकान से मीट लाता था.

पहली जून की सुबह 6 बजे फ्लैट की घंटी बजने पर दूध देने वाले गनपत से दूध ले कर धनंजय फटाफट तैयार हो कर मीट लेने के लिए निकल गया. रोहिणी को वह सोती छोड़ गया था. वह कार ले कर निकलने लगा तो चौकीदार ने हंसते हुए पूछा, “साहब, आज रविवार है न, मीट लेने जा रहे हो?”

धनंजय ने हंस कर कार आगे बढ़ा दी थी. फाइन चिकन एंड मीट शौप पर आ कर उस ने 2 किलोग्राम मीट और एक किलोग्राम कीमा लिया. इस के बाद उस ने रास्ते में मछली और नाश्ते के लिए अंडे, ब्रेड, मक्खन और 4 पैकेट सिगरेट लिए. लगभग साढ़े 7 बजे वह फ्लैट पर लौट आया. वाचमैन नीचे ही था, साफसफाई करने वाले अपने काम में लगे थे. ऊपर पहुंच कर उस ने ‘लैच की’ से दरवाजा खोला. दरवाजे के अंदर अखबार पड़ा था, जिसे नरेश पेपर वाला दरवाजे के नीचे से अंदर सरका गया था. अखबार उठाते हुए उस ने रोहिणी को आवाज लगाई, “उठो भई, मैं तो बाजार से लौट भी आया.”

धनंजय के फ्लैट में सुखसुविधा के सभी आधुनिक सामान मौजूद थे. उस ने डाइनिंग टेबल पर सारा सामान रख कर 2 बड़ी प्लेटें उठाईं. एक में उस ने गोश्त और दूसरे में मछली निकाली. फ्लैट के हौल में शानदार दरी बिछी थी और कीमती सोफे सजे थे. एक कोने में टीवी और डीवीडी प्लेयर रखा था. दूसरे कोने में शो केस के नीचे टेलीफोन रखा था, वहीं मेज पर लैपटौप था. पीछे की ओर गैलरी थी, जहां से दिल्ली की ओर जाने वाली सडक़ के साथसाथ दूर तक फैली हरियाली और नोएडा गेट दिखाई देता था.

इस हौल के बाईं ओर बैडरूम का दरवाजा था. बैडरूम में डबल बैड, गोदरेज की 2 अलमारियां और एक ड्रेसिंग टेबल था. बैडरूम से लग कर ही एक छोटा गलियारा था. गलियारे में ही टौयलेट और बाथरूम था. सारा सामान डाइनिंग टेबल पर रखने के बाद बैडरूम में घुसते ही धनंजय की चीख निकल गई, “रोहिणी?”

उस की सुंदर पत्नी, उसे जीजान से चाहने वाली जीवनसंगिनी, जो अभी रात में उस के सीने पर सिर रख कर सोई थी, जिसे वह सुबह की मीठी नींद में छोड़ कर गया था, रक्त से सराबोर बैड पर मरी पड़ी थी. रोहिणी के गले, सीने और पेट से उस वक्त भी खून रिस रहा था, जिस से सफेद बैडशीट लाल हो गई थी.

कुछ क्षणों बाद धनंजय रोहिणी का नाम ले कर चीखता हुआ बाहर की ओर भागा. उस के अड़ोसपड़ोस में 3 फ्लैट थे. दाईं ओर के 2 फ्लैटों में सक्सेना और मिश्रा तथा बाईं ओर के फ्लैट में रावत रहते थे. पागलों की सी अवस्था में धनंजय ने सक्सेना के फ्लैट की घंटी पर हाथ रखा तो हटाया ही नहीं. वह पड़ोसियों के नाम लेले कर चिल्ला रहा था.

कुछ क्षणों बाद तीनों पड़ोसी बाहर निकले. वे धनंजय की हालत देख कर दंग रह गए. धनंजय कांप रहा था. वह कुछ कहना चाहता था, पर उस के मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे. उस के कंधे पर हाथ रख कर सक्सेना ने पूछा, “क्या हुआ विश्वास?”

सक्सेना रिटायर्ड कर्नल थे. उन्होंने ही नहीं, मिश्रा और रावत ने भी किसी अनहोनी का अंदाजा लगा लिया था. धनंजय ने हकलाते हुए कहा, “रो…हि…णी.”

सक्सेना, उन का बेटा एवं बहू, मिश्रा और रावत उस के फ्लैट के अंदर पहुंचे. बैडरूम का हृदयविदारक दृश्य देख कर सक्सेना की बहू डर के मारे चीख पड़ी और उलटे पांव भागी. अपने आप को संभालते हुए सक्सेना ने कोतवाली पुलिस को फोन लगा कर घटना की सूचना दी. कोतवाली में उस समय ड्ïयूटी पर सबइंसपेक्टर दयाशंकर थे.

दयाशंकर ने मामला दर्ज कर के मामले की सूचना अधिकारियों को दी और खुद 2 सिपाही ले कर अलकनंदा के लिए निकल पड़े. उन के पहुंचते ही वहां के चौकीदार ने उन्हें सलाम किया. लोगों के बीच से जगह बनाते हुए दयाशंकर सीधे पांचवीं मंजिल पर पहुंचे. लोग सक्सेना के घर में जमा थे. धनंजय सोफे पर अपना सिर थामे बैठा था.

दयाशंकर के पहुंचते ही धनंजय उठ कर खड़ा हो गया. आगे बढ़ कर सक्सेना ने अपना परिचय दिया और धनंजय के फ्लैट की ओर इशारा किया. थोड़ी ही देर में फोरैंसिक टीम के सदस्य भी आ पहुंचे. इंसपेक्टर प्रकाश राय भी आ पहुंचे थे.

उन के वहां पहुंचते ही एक व्यक्ति सामने आया, “गुडमौर्निंग सर? आप ने मुझे पहचाना? मैं रिटायर्ड इंसपेक्टर खन्ना. इन फ्लैटों की सुरक्षा व्यवस्था मेरे जिम्मे है. सोसाइटी के सेक्रैटरी ने फोन पर मुझे सूचना दी. दयाशंकर साहब से मुझे पता चला कि आप आ रहे हैं.”

प्रकाश राय को खन्ना का चेहरा जानापहचाना लगा. मगर उन्हें याद नहीं आया कि वह उस से कहां मिले थे. सीधे ऊपर न जा कर उन्होंने इमारत को गौर से देखना शुरू किया. इमारत में ‘ए’ और ‘बी’ 2 विंग थे. दोनों विंग के लिए अलगअलग सीढिय़ां थीं. धनंजय ‘ए’ विंग में रहता था. इमारत के गेट पर ही वाचमैन के लिए एक छोटी सी केबिन थी, जिस में से आनेजाने वाला हर व्यक्ति उसे दिखाई देता था.

प्यार का बदसूरत चेहरा – भाग 1

अमेरिका के 125 वेस्ट चेस्टर रोड, न्यूटन की रहने वाली एरिन माइकल विलिंगर एक एनजीओ में काम करती थी. उसे घूमने का  बहुत शौक था. वह पूरी दुनिया की सैर चाहती थी, इसलिए पैसा होते ही वह दुनिया देखने के लिए निकल पड़ी. पहले वह अपने दोस्तों के साथ इजरायल गई. कुछ दिनों वहां रहने के बाद उस ने भारत भ्रमण के इरादे से उड़ान भरी तो जुलाई, 2013 में दिल्ली के एयरपोर्ट पर उतरी.

भारत की धरती पर कदम रखते ही खूबसूरत एरिन खिल उठी थी. इस की वजह थी आगरा स्थित प्यार की निशानी ताज. जब से उस ने ताजमहल के बारे में जाना सुना था, तब से वह उसे देखने की तमन्ना मन में पाले थी.

शायद इसीलिए एरिन सब से पहले अन्य जगहों पर जाने के बजाए दोस्तों के साथ दिल्ली से सीधे आगरा आ गई थी. आगरा में उन लोगों ने ताजगंज के होटल ग्रीन पार्क में पड़ाव डाला. सभी के मनों में ताज को देखने की उत्सुकता थी. वे प्यार के उस महल को देखना चाहते थे, जिसे शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की याद में बनवाया था.

एरिन और उस के दोस्त अपना सामान होटल के कमरे में रख कर बाहर निकले तो आटो वालों ने उन्हें घेर लिया. एरिन के पास जो आटो वाला पहुंचा, उस का नाम बंटी शर्मा था. बंटी ने 34 वर्षीया एरिन की आंखों में आंखें डाल कर मुसकराते हुए कहा, ‘‘गुड मौर्निंग मैम, वेलकम इन सिटी औफ लव.’’

‘‘थैंक यू वेरी मच. हाऊ आर यू यंगमैन?’’ एरिन ने बंटी का अभिवादन स्वीकार करते हुए उसी की तरह मुसकराते हुए कहा.

‘‘व्हिच डेस्टीनेशन मैम?’’

‘‘ताजमहल.’’ एरिन बोली.

बंटी ने एरिन और उस के साथियों का जो थोड़ाबहुत सामान था, उसे उठा कर आटो में रखा और ताजमहल की ओर चल पड़ा. बंटी आटो ही नहीं चलाता था, बल्कि अपने टूरिस्टों के लिए गाइड का भी काम करता था. उसे अंगरेजी बहुत ज्यादा तो नहीं आती थी, फिर भी वह इतनी अंगरेजी जरूर सीख गया था कि अपनी सवारियों की जिज्ञासा टूटीफूटी अंगरेजी से शांत कर देता था.

बंटी ताजमहल की पार्किंग में अपना आटो खड़ा कर के एरिन और उस के दोस्तों को ताजमहल दिखाने चल पड़ा. अंदर जा कर वह एरिन और उस के साथियों को वहां की कलाकारी दिखाते हुए उस के बारे में बताता भी जा रहा था. बीचबीच में वह अपनी बातों से उन्हें हंसा भी रहा था. बंटी की बातें एरिन को कुछ ज्यादा ही अच्छी लग रही थीं. वह उस की बातों पर खुल कर हंस रही थी.

बंटी ने जब बताया कि यह ताजमहल बादशाह शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की याद में बनवाया था तो एरिन ने हंसते हुए कहा था, ‘‘काश! मुझे भी कोई ऐसा प्रेमी मिल जाता जो मेरे लिए इसी तरह की खूबसूरत इमारत बनवाता.’’

एरिन की इस बात पर उस के साथी हंसने लगे तो बंटी ने भी उन का साथ देते हुए कहा, ‘‘क्या पता मैम, आप को भी कोई ऐसा ही दीवाना मिल जाए जो आप के लिए भले ही इस तरह की खूबसूरत इमारत न बनवा पाए, लेकिन प्यार बादशाह शाहजहां से भी ज्यादा करे.’’

एरिन ने उसे घूर कर देखा. इस के बाद आगे बढ़ते हुए बोली, ‘‘इस तरह का प्यार करने वाला तो इंडिया में ही मिल सकता है. हमारे यहां तो इस तरह प्यार करने वाला कोई नहीं मिलेगा.’’

‘‘तो यहीं किसी से प्यार कर लो.’’ बंटी ने हंसते हुए कहा.

एरिन मुसकराते हुए आगे बढ़ गई. ताजमहल घूमतेघूमते शाम हो गई. बंटी ने उन सभी को ला कर उन के होटल में छोड़ दिया.

आटो ड्राइवर बंटी ताजगंज इलाके के एमपी गुम्मट के रहने वाले अशोक जोशी का तीसरे नंबर का बेटा था. अशोक जोशी मूलरूप से राजस्थान के धौलपुर के रहने वाले थे. रोजीरोजगार की तलाश में वह आगरा आ गए थे. यहां आ कर भी उन्हें ढंग का कोई रोजगार नहीं मिला. किसी तरह मेहनतमजदूरी कर के उन्होंने बच्चों को पालपोस कर बड़ा तो कर दिया, लेकिन किसी को ढंग से पढ़ालिखा नहीं सके. किसी तरह बंटी ने आठवीं पास कर लिया था.

बंटी थोड़ा समझदार हुआ तो ताजमहल देखने आने वाले पर्यटकों और उन्हें लुभाने वाले भारतीयों से अंगरेजी सीखने लगा. उसे कुछ अंगरेजी आने लगी तो वह पर्यटकों को छोटेमोटे सामान बेचने लगा. इस के बाद जब वह पर्यटकों के बीच खुल गया तो गाइड का भी काम करने लगा.

साधारण परिवार से आए बंटी के पास पैसे आने लगे तो वह ढंग से रहने लगा. अब तक वह शादी लायक हो गया था. ठीकठाक कमाने भी लगा था. इसलिए उस के लिए रिश्ते भी आने लगे थे. घर वालों ने ताजगंज के ही रहने वाले ओमप्रकाश शर्मा की एकलौती बेटी भावना से उस की शादी कर दी. एकलौती बेटी होने की वजह से ओमप्रकाश ने बंटी की शादी में खूब दानदहेज भी दिया था. यही नहीं, उन्होंने उस के लिए एक आटो खरीद दिया, जिस की कमाई से बंटी ढंग से रहने लगा.

शादी के कुछ दिनों बाद बंटी एक बेटे का बाप भी बन गया, जिस का नाम उस ने भोला रखा था. बंटी की कमाई काफी बढ़ गई थी, लेकिन इसी के साथ उस का लालच भी बढ़ गया था. वह ज्यादा कमाई के ही चक्कर में विदेशी पर्यटकों की तलाश में इस होटल से उस होटल घूमता रहता था. उसी बीच उस ने एक और आटो खरीद लिया, जिसे वह किराए पर चलवाने लगा था. इस तरह उस की कमाई और बढ़ गई.

सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. लेकिन लालची बंटी की नजर अब किसी ऐसी महिला पर्यटक की तलाश में रहने लगी थी जो उस से प्रेम  कर सके. क्योंकि आगरा में ऐसी तमाम विदेशी महिला पर्यटक थीं, जो आटो वालों, गाइडों या सामान बेचने वालों से प्रेम करने लगी थीं. कुछ ने तो शादी भी कर ली थी.

ये पर्यटक महिलाएं अपने प्रेमियों या पतियों पर खूब पैसे खर्च करती थीं. किसी ने अपने प्रेमी या पति को आटो खरीद दिया था तो किसी ने घर. कुछ तो अपने साथ ले कर विदेश चली गई थीं. यही सब देख कर बंटी भी इस तलाश में रहने लगा था कि अगर उसे भी कोई विदेशी प्रेमिका या पत्नी मिल जाती तो उस की भी किस्मत चमक उठती लेकिन उसे कोई मिल ही नहीं रही थी. इसी चक्कर में उस के हाथों एक अपराध हो गया, जिस की वजह से उसे जेल भी जाना पड़ा.

हुआ यह था कि उस के एक साथी कलुवा का एक विदेशी पर्यटक से चक्कर चल गया. कलुवा भी उसी के मोहल्ले का रहने वाला था और उसी की तरह आटो चलाता था. वह बड़ा ही समझदार था. उस का व्यवहार भी काफी शालीन था. शायद इसी वजह से स्पेन की रहने वाली सांद्रा उसे अपना दिल दे बैठी थी. उस ने उस के साथ विवाह करने का भी निश्चय कर लिया था. सांद्रा काफी धनी परिवार से थी, इसलिए वह कलुवा की हर तरह से मदद कर रही थी.

आगरा में सांद्रा कलुवा के घर पर ही रह रही थी. उसी बीच उस की मां की तबीयत खराब हो गई तो सांद्रा ने ही उस का इलाज कराया. इस के बाद वह कलुआ को अपने साथ स्पेन भी ले गई. कलुवा स्पेन से लौटा तो एक दिन उस की मुलाकात बंटी से हुई. बंटी ने उस से स्पेन के बारे में पूछा तो उस ने स्पेन के बारे में ही नहीं, सांद्रा और उस के घरपरिवार वालों के बारे में भी सब कुछ बताया. जब बंटी को पता चला कि सांद्रा बहुत पैसे वाले घर की है तो उस के मन में लालच आ गया. उस ने कलुवा से कहा कि वह सांद्रा से उस की भी दोस्ती करवा दे, लेकिन कलुवा ने मना कर दिया. इस बात को ले कर उस ने कलुआ के साथ मारपीट की.

                                                                                                                                            क्रमशः

स्पा के दाम में फाइव स्टार सेक्स – भाग 1

24 मई, 2023 को शाम के करीब 6 बजे का समय था. तारकोल की चिकनी सडक़ पर तेजी से दौड़ती चमचमाती कार सुजुकी अर्टिगा गाजियाबाद के लिंक रोड थानाक्षेत्र में स्थित पैसिफिक माल के सामने आकर रुकी. कार की ड्राइविंग सीट से सफेद वरदी पहना ड्राइवर तेजी से बाहर आया. उस ने कार का पिछला दरवाजा खोला और अदब से एक ओर खड़ा हो गया.

कार से जो शख्स उतरा, वह थुलथुले शरीर वाला नाटा सा व्यक्ति था. उस का चेहरा गोल और आंखें छोटीछोटी थीं. सिर पर आधी खोपड़ी गंजी थी, लेकिन जो बाल थे, वह ब्लैक डाई से रंगे हुए अलग ही पहचाने जा सकते थे. इस व्यक्ति के शरीर पर बेशकीमती ब्राऊन कलर का सफारी सूट था. पैरों में कीमती जूते चमचमा रहे थे. यह पैसों वाला अमीर व्यक्ति जान पड़ता था.

छोटीछोटी आंखों को जबरदस्ती फैला कर वह ड्राइवर से बोला, “मुन्ना देखो, मैं अपना फोन गाड़ी में ही छोड़ कर जा रहा हूं, यदि पीछे से तुम्हारी मालकिन सुनीता का फोन आए तो उस से कहना कि साहब हलका होने गए हैं, समझ गए.” कहने के बाद वह मानीखेज अंदाज में मुसकराया.

मुन्ना ने भद्दे पीले दांत चमकाए और धीरे से बोला, “समझ गया मालिक.”

वह व्यक्ति आगे बढ़ता, तभी मुन्ना ने मासूमियत से उसे टोका, “मालिक?”

वह व्यक्ति रुका, पलटा, “क्या?”

मुन्ना ने दोनों हाथ बांधे और जांघों के बीच में दबा कर खींसे निपोरते हुए बोला, “मालिक, कभी मुझे भी हलका होने के लिए ले चलिए न.”

“शटअप!” वह नाटा व्यक्ति गुस्से में बोला, “शक्ल देखी है कभी अपनी आईने में?”

“सौरी मालिक.” मुन्ना झेंप कर बोला.

वह व्यक्ति लंबेलंबे डग भरता हुआ पैसिफिक माल में चला गया तो मुन्ना ने उसे भद्ïदी सी गली दी, “हरामी कहीं का. घर में इतनी सुंदर बीवी है और रोज यहां गटर में डुबकी मारने आ जाता है.”

पैसिफिक माल में वेश्यावृत्ति

अपनी भड़ास निकाल लेने के बाद मुन्ना ने अपनी जेब से बीड़ी का बंडल निकाल कर बीड़ी सुलगा ली, उस ने बीड़ी का गहरा कश ले कर धुआं बाहर उगला, तभी उस के मोबाइल की घंटी बजने लगी. मुन्ना ने मोबाइल के स्क्रीन पर नजर डाली, उस पर उस के दोस्त गणेशी का नंबर चमक रहा था.

काल रिसीव करते हुए चहक कर बोला, “हैलो, मैं मुन्ना हूं. अबे तू 20 दिन से कहां मर गया था?”

“गांव गया था यार, बीवी की तबीयत खराब थी.”

“अब कैसी है भाभी?”

“अच्छी है अब.” गणेशी की आवाज उभरी, “तू कहां पर है?”

“मालिक को गटर में गोते खिलाने के लिए पैसिफिक माल में लाया हूं.”

“गटर में गोते? अबे तू क्या बक रहा है, तेरा मालिक पैसिफिक माल में कहां के गटर में गोते लगाता है?”

मुन्ना हंसा, “अमा यार, पैसिफिक माल में कई स्पा सेंटर हैं, यहां एक से बढ़ कर एक हसीन लडक़ी मिल जाती है. यहां स्पा की आड़ में जिस्मफरोशी का धंधा खूब होता है. मेरा मालिक सात दिन से रोज इसी वक्त यहां आता है. अमीर है, इसलिए मौज मार रहा है. मैं उस का 15 हजार रुपल्ली का ड्राइवर हूं. मैं बाहर बैठ कर अपनी बदकिस्मती पर सिसकता रहता हूं. काश! मैं भी किसी धन्ना सेठ के यहां पैदा हुआ होता.” मुन्ना ने आह भरी.

दूसरी तरफ गणेशी हंस पड़ा, “रोता क्यों है यार, अपने भी दिन आएंगे कभी मौजमस्ती के.”

“नहीं आएंगे. हम लोगों के नसीब में शादी के वक्त जो औरत पल्ले बांध दी गई है, बस उसी से अपनी हसरतें पूरी करना लिखा है.”

“छोड़ ये बातें, बता घर कब आएगा?”

“इस इतवार को छुट्टी करूंगा, तब आता हूं, भाभी के हाथ की चाय पीने.”

“आ जा, चाय के बाद तुझे बढिय़ा शराब की दावत दूंगा.”

“ठीक है,” मुन्ना ने खुश हो कर कहा, “इतवार की छुट्टी तेरे नाम की.” कहने के बाद मुन्ना ने काल डिसकनेक्ट कर दी. उसे तब अहसास भी नहीं था कि उस की गणेशी से हुई बात को वहीं पास में खड़े एक व्यक्ति ने सुन लिया है. मुन्ना बीड़ी के सुट्टे मारता हुआ ड्राइविंग सीट पर बैठा, तब उस की बातें सुनने वाला व्यक्ति किसी को फोन लगाने लगा था.

मुन्ना की अपने दोस्त गणेशी से होने वाली बातों को सुनने वाला वह व्यक्ति पुलिस का खास मुखबिर जगदीश उर्फ जग्गी था. उस ने तुरंत साहिबाबाद के एसीपी भास्कर वर्मा को फोन लगा कर यह जानकारी दी कि गाजियाबाद के पैसिफिक माल में चल रहे स्पा सेंटर में देह व्यापार का अनैतिक काम चल रहा है.

एसीपी भास्कर वर्मा ने जग्गी को स्पा सेंटरों में चल रहे देह धंधे की पुष्टि कर के उन्हें हकीकत से अवगत करने का निर्देश दे दिया. जग्गी इन कामों का मंझा हुआ खिलाड़ी था. वह उसी वक्त पैसिफिक माल में घुस गया. एक घंटे बाद उस ने एसीपी भास्कर वर्मा को दोबारा फोन लगाया.

“हां जग्गी?” एसीपी ने उतावलेपन से पूछा, “तुम ने मालूम किया?”

“साहब, ईनाम में 5 हजार लूंगा. यहां पैसिफिक माल में एक नहीं पूरे 8 स्पा सेंटर हैं, सभी में लड़कियों से देह धंधा करवाया जा रहा है. इस वक्त छापा डालेंगे तो देह धंधे में लिप्त सैकड़ों लड़कियां, उन के दलाल, मैनेजर और मौजमस्ती करने आए अय्याश लोग भी आप के हाथ आ सकते हैं.”

“ठीक है, तुम्हारा ईनाम पक्का. मैं छापा डालने की तैयारी करवाता हूं.” एसीपी भास्कर वर्मा ने कहा और जग्गी की काल डिसकनेक्ट कर उन्होंने दूसरी जगह फोन घुमाना शुरू कर दिया.

स्पा सेंटर में देह धंधे की खबर से चौंके डीसीपी

एसीपी भास्कर वर्मा ने थाना लिंक रोड, स्वाट टीम ट्रांस हिंडन जोन तथा पुलिस लाइंस कमिश्नरेट गाजियाबाद को फोन कर के तुरंत पुलिस बल सहित महाराजपुर पुलिस चौकी पर पहुंचने का निर्देश दे दिया. उन्होंने ट्रांस हिंडन जोन के डीसीपी विवेक चंद यादव को भी पैसिफिक माल में स्थित 8 स्पा सेंटरों में देह व्यापार होने की सूचना दे कर उन से निर्देश मांगा. डीसीपी विवेक चंद यादव ने चौकी आने की बात कही.

आधा घंटे में ही महाराजपुर पुलिस चौकी में थाना लिंक रोड, स्वाट टीम ट्रांस हिंडन जोन और पुलिस लाइंस कमिश्नरेट गाजियाबाद का पुलिस बल और अधिकारी पहुंच गए. महाराजपुर पुलिस चौकी छावनी में तब्दील होने जैसी प्रतीत होने लगी. डीसीपी विवेक चंद्र यादव और एसीपी भास्कर वर्मा ने आपस में सलाहमशविरा कर इस माल में चल रहे 8 स्पा सेंटरों में एक साथ छापा डालने के लिए 8 पुलिस टीमों का गठन कर दिया. इन टीमों के प्रभारी नियुक्त किए गए.

तांत्रिक शक्ति के लिए अपने बच्चों की बलि

ज्योति ने बुझाई पति की जीवन ज्योति

आवारगी में गंवाई जान

नन्हा हत्यारा, जिसने पूरा पंजाब हिला दिया

संगीता 16 जनवरी, 2017 की शाम को नौकरी से घर पहुंची तो उस के दोनों बच्चे चारपाई पर बैठे रो रहे थे. डेढ़ साल की बेटी काजल जोरजोर से रो रही थी, जबकि 4 साल का राहुल सिसकते हुए उसे चुप कराने की कोशिश कर रहा था. संगीता ने काजल को उठा कर सीने से लगाया और दूसरे हाथ से राहुल की आंखें पोंछते हुए 8 साल के बेटे दीपू को आवाज दी. दीपू नहीं बोला तो संगीता काजल को गोद में लिए बड़बड़ाते हुए घर के बाहर आ गई. उस ने गली में खेल रहे बच्चों से दीपू के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि आज वह उन्हें दिखाई नहीं दिया. खीझ कर वह लौट आई और बड़बड़ाते हुए घर के कामों में लग गई. साढ़े 7 बजे तक घर के काम निपटा कर संगीता खाली हुई तो एक बार फिर दीपू की तलाश में निकल पड़ी.

काफी तलाश के बाद भी जब उस का कुछ पता नहीं चला तो उसे चिंता हुई. अब तक अंधेरा भी घिर आया था. ऐसे में दीपू का न मिलना उसे बेचैन करने लगा था. संगीता घर के बाहर खड़ी सोच रही थी कि अब वह दीपू को कहां ढूंढे, तभी सामने से पति दिलीप कुमार को आते देख कर उसे थोड़ी राहत महसूस हुई. पत्नी के चेहरे पर परेशानी के बादल मंडराते देख दिलीप ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, यहां क्यों खड़ी हो?’’

‘‘दीपू पता नहीं कहां चला गया है. मैं ने उसे सब जगह तलाश लिया है, उस का कुछ पता नहीं चल रहा है.’’

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है,’’ दिलीप ने पत्नी को सांत्वना दी, ‘‘तुम चिंता मत करो, मैं देखता हूं वह कहां है.’’

कह कर दिलीप ने दीपू की तलाश शुरू कर दी. दीपू के गायब होने की जानकारी पड़ोसियों को हुई तो वे भी उस के साथ दीपू की तलाश में जुट गए. आधी रात तक तलाश करने पर भी जब दीपू का कुछ पता जब नहीं चला तो थकहार कर सभी अपनेअपने घर चले गए. दिलीप और संगीता ने वह रात आंखों में काटी.

अगले दिन सवेरा होते ही दिलीप और संगीता नौकरी पर जाने के बजाए दीपू की तलाश में जुट गए. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर दीपू कहां चला गया? दीपू एक समझदार बच्चा था. भले ही परिस्थितियों ने उसे स्कूल का मुंह नहीं देखने दिया था, पर वह अपनी जिम्मेदारियां भलीभांति निभा रहा था.

मातापिता और 15 साल के बड़े भाई दीपक कुमार के नौकरी पर चले जाने के बाद अपने 4 साल के छोटे भाई राहुल और डेढ़ साल की बहन काजल की देखभाल वही करता था. आज तक उस ने शिकायत का कोई मौका नहीं दिया था. लेकिन उस दिन वह पता नहीं कहां चला गया था. जब दीपू का कुछ पता नहीं चला तो दिलीप और संगीता ने उस के लापता होने की सूचना थाना पुलिस को दे दी थी.

इस तरह के मामलों में जैसा होता है, उसी तरह पुलिस ने उन्हें 24 घंटे बाद आने को कहा था. उसी दिन 4 बजे शाम को एक मजदूर ने एक खाली प्लौट में कुछ कुत्तों को आपस में लड़ते देखा. कुत्ते किसी चीज को ले कर छीनाझपटी कर रहे थे. मजदूर ने नजदीक जा कर देखा तो कुत्ते प्लास्टिक के कट्टे को ले कर छीनाझपटी कर रहे थे. वहां 2 कट्टे पड़े थे. कुत्तों को भगा कर उस ने जिज्ञासावश एक कट्टे का मुंह खोला तो उस में जो देखा, डर के मारे पीछे हट गया. कट्टे में मानव अंग थे.

उस ने यह बात मोहल्ले वालों को बताई तो किसी ने इस की सूचना स्थानीय थाना दुगड़ी पुलिस को दे दी. सूचना मिलते ही ड्यूटी अफसर जतिंदर सिंह, हैडकांस्टेबल प्रीतपाल सिंह और कांस्टेबल प्रभजोत सिंह घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस वालों ने प्लास्टिक के कट्टों को खोल कर देखा तो उन में किसी बच्चे की लाश के टुकड़े भरे थे. किसी ने बेरहमी से बच्चे के शरीर के टुकड़ेटुकड़े कर के दोनों कट्टों में भर कर वहां फेंक दिए थे.

बच्चे की लाश मिलने की खबर मोहल्ले में फैली तो लाश देखने दिलीप और संगीता भी वहां पहुंच गए. लाश देखते ही संगीता और दिलीप दहाड़े मार कर रोने लगे. क्योंकि लाश उन के बेटे दीपू की थी. पतिपत्नी दीपू की लाश के टुकड़ों से लिपट कर रो रहे थे. एसआई जतिंदर सिंह ने समझाबुझा कर दोनों को वहां से अलग किया और घटना की सूचना अधिकारियों तथा क्राइम टीम को दे दी.

सूचना मिलते ही थाना दुगड़ी के थानाप्रभारी इंसपेक्टर प्रेम सिंह, सीआईए इंचार्ज इंसपेक्टर हरपाल सिंह ग्रेवाल घटनास्थल पर आ गए थे. दीपू की लाश के टुकड़े मिलने से मोहल्ले वालों में बड़ा रोष था. लोगों की नाराजगी को देखते हुए प्रेम सिंह ने सारी काररवाई पूरी कर के पोस्टमार्टम के लिए लाश के टुकड़ों को सिविल अस्पताल भिजवा दिया था.

इस के बाद मृतक के पिता दिलीप की ओर से थाना दुगड़ी में दीपू की हत्या का मुकदमा अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर लिया गया था.

लुधियाना के सिविल अस्पताल में 17 जनवरी को दीपू की लाश के टुकड़ों का पोस्टमार्टम किया गया. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों ने पुलिस को बताया कि बच्चे का दिल गायब है. इस खबर से लोग तरहतरह की अटकलें लगाने लगे. लेकिन पुलिस लोगों की बातों पर ध्यान न दे कर अपने हिसाब से काम में जुटी रही.

पूछताछ में दिलीप ने बताया था कि वह उत्तर प्रदेश के जिला उन्नाव के थाना बिहार के गांव छेदा का रहने वाला था. रोजीरोजगार की तलाश में वह कई सालों पहले लुधियाना  आ गया था. लुधियाना में वह थाना दुगड़ी की शेख कालोनी के सूआ रोड पर किराए के मकान में परिवार के साथ रहता था.

उस ने 5 साल पहले संगीता से विवाह किया था. संगीता तलाकशुदा थी. पहले पति ननकूराम से उसे 2 बेटे थे, जो दिलीप से शादी के समय 9 साल और 3 साल के थे. दिलीप से भी उसे 2 बच्चे राहुल और बेटी काजल हुई थी. पतिपत्नी दोनों नौकरी करते थे. संगीता का बड़ा बेटा दीपक, जो अब 15 साल का था, वह भी नौकरी करता था. सब के नौकरी पर चले जाने के बाद 8 साल का दीपू अपने छोटे भाई और बहन की देखभाल करता था.

दिलीप के बयान के आधार पर प्रेम सिंह ने एएसआई राम सिंह और एसआई रामपाल के नेतृत्व में एक टीम उत्तर प्रदेश के उन्नाव संगीता के पूर्वपति ननकूराम से पूछताछ के लिए भेजी. लेकिन पूछताछ में ननकूराम निर्दोष पाया गया. इस के बाद पुलिस ने अपना ध्यान इलाके में ही लगा दिया.

पुलिस हत्यारे के बारे में सोच रही थी कि मातानगर के होली सीनियर सैकेंडरी स्कूल के प्रिंसिपल ने फोन द्वारा इंसपेक्टर प्रेम सिंह को सूचना दी कि उन के स्कूल के ग्राउंड में एक जगह मानव दिल पड़ा है. सूचना मिलते ही प्रेम सिंह और हरपाल सिंह होली सीनियर सैकेंडरी स्कूल पहुंच गए और दिल बरामद कर उसे सिविल अस्पताल भिजवा दिया.

सिविल अस्पताल के सीनियर डाक्टरों ने दिल की जांच कर बताया कि बरामद दिल मृतक बच्चे दीपू का था. इस तरह दीपू के सभी अंग पूरे हो गए थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार दीपू की गला दबा कर हत्या की गई थी. उस के बाद किसी ऐसे हथियार से उस के शरीर के टुकड़े किए गए थे, जिस की धार बहुत तेज नहीं थी.

पुलिस को हत्यारे तक पहुंचने का कोई सूत्र नहीं मिला तो उस ने अपने मुखबिरों को सक्रिय कर दिया. इंसपेक्टर हरपाल सिंह ने इलाके के सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी थी, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ था. तभी किसी मुखबिर ने प्रेम सिंह को बताया कि 16 जनवरी की दोपहर करीब डेढ़ बजे दीपू मोहल्ले के ही रमेश (बदला हुआ नाम) के साथ दिखाई दिया था.

शक के आधार पर प्रेम सिंह रमेश को थाने ले आए. उस से पूछताछ की जाने लगी तो वह पुलिस को बहकाने लगा. लेकिन उस की बातों से पुलिस को यकीन हो गया कि भले ही यह बच्चा है, लेकिन है यह घुटा हुआ. मजबूर हो कर प्रेम सिंह और हरपाल सिंह ने जब थोड़ी सख्ती की तो रमेश ने अपना अपराध स्वीकार कर के सच्चाई उगल दी कि उसी ने दीपू की हत्या कर उस की लाश के टुकड़े कर खाली प्लौट में फेंक आया था.

रमेश द्वारा अपराध स्वीकार करने पर वहां मौजूद लोग हैरान रह गए. खतरनाक से खतरनाक हादसे और वारदातें देखने वाले पुलिस अफसर भी सिहर उठे. क्योंकि हत्यारा मात्र 13 साल का था. एडीसीपी क्राइम बलकार सिंह और एसीपी योगीराज के सामने प्रेम सिंह ने जब रमेश से विस्तारपूर्वक पूछताछ की तो किसी हौरर फिल्म की कहानी की तरह रमेश ने जो कहानी सुनाई, वह इस तरह थी—

रमेश मृतक दीपू के घर से 3 घर छोड़ कर अपने मांबाप के साथ किराए के मकान में रहता था. वह मातानगर के होली सीनियर सैकेंडरी स्कूल में 8वीं में पढ़ता था. लेकिन कुछ दिनों पहले उसे स्कूल से निकाल दिया गया था. दरअसल रमेश बचपन से ही अपराधी प्रवृत्ति का जिद्दी लड़का था.

गरीब मातापिता गुजरबसर के लिए सुबह ही काम पर चले जाते थे. उस के बाद रमेश घर में अकेला ही रह जाता था. मांबाप मुश्किल से गुजरबसर कर रहे थे, इस के बावजूद बेटे का भविष्य संवारने के लिए उसे अच्छे स्कूल में पढ़ा रहे थे लेकिन रमेश स्कूल न जा कर इधरउधर आवारागर्दी किया करता था.

कमजोर और छोटे बच्चों पर धौंस जमाना, दादागिरी करना और उन से पैसे तथा खानेपीने की चीजें छीनना उस की आदत बन गई थी. यही नहीं, वह पढ़ने वाले बच्चों से मारपीट करता था और उन की किताबें चोरी कर के कबाड़ी को बेच कर मौज करता था. इसी वजह से क्लास टीचर ने सब के सामने पिटाई कर के उसे स्कूल से निकाल दिया था. स्कूल और क्लास टीचर से बदला लेने के लिए ही उस ने दिल  दहला देने वाला यह कांड कर डाला था.

दरअसल, स्कूल से निकाले जाने के बाद वह क्लास टीचर को सबक सिखाना चाहता था. रमेश टीवी पर आने वाले आपराधिक सीरियल खूब देखता था. इन्हीं धारावाहिकों से आइडिया ले कर वह कम उम्र के बच्चे की तलाश में जुट गया. किसी दिन उस की नजर गली में खेल रहे दीपू पर पड़ी तो उसे लगा कि इस बच्चे से उस के 2 काम हो सकते हैं.

योजना बना कर रमेश बाजार से पतंग ले आया और मोहल्ले वालों की नजर बचा कर दीपू के घर पहुंच गया. उसे पता ही था कि दीपू का भाई और मांबाप काम पर चले जाते हैं, उस के बाद वह घर पर अकेला ही रहता है. दीपू के घर जा कर उसे पतंग दिखाते हुए उस ने कहा, ‘‘देख मेरे पास ढेर सारी पतंगें हैं. चल मेरे घर की छत पर चल कर पतंग उड़ाते हैं.’’

दीपू छोटे भाई और बहन को छोड़ कर जाना तो नहीं चाहता था, पर पतंग उड़ाने के लालच में वह रमेश के साथ चला गया. अपने घर आ कर रमेश ने कहा, ‘‘चल, पहले कुछ खा लेते हैं, उस के बाद छत पर चल कर पतंग उड़ाएंगे.’’

इस तरह रमेश दीपू को अपने कमरे में ले जा कर अंदर से कुंडी बंद कर ली. इस के बाद उसे उठा कर पलंग पर पटक दिया. अचानक हुए इस हमले से दीपू घबरा गया और खुद को रमेश के चंगुल से छुड़ाने के लिए हाथपैर चलाने लगा. दीपू छोटा और उस से कमजोर था, इसलिए उस का मुकाबला नहीं कर सका. उस ने रमेश को 2-3 जगह दांतों से काटा भी. लेकिन रमेश उस की छाती पर सवार हो गया और उस का गला दबा कर उसे मार डाला.

दीपू की हत्या करने के बाद रमेश ने लाश को पलंग से नीचे उतारा और घसीट कर बाथरूम में ले गया. इस के बाद घर में रखी खुरपी से उस के शरीर के टुकड़े कर प्लास्टिक के कट्टे में भर दिए. दिल निकाल कर उस ने अलग पौलीथिन में रख लिया. जब गली में कोई नहीं दिखाई दिया तो लाश के टुकड़ों वाले कट्टे ले जा कर खाली प्लौट में फेंक आया.

इस के बाद बाथरूम को साफ कर दिया. अब बची दिल वाली पौलीथिन, जिसे ले कर जा कर वह स्कूल के ग्राउंड में फेंक आया. जिस समय रमेश अपने घर पहुंचा, सभी दीपू की तलाश कर रहे थे. वह भी सब के साथ दीपू की तलाश करने लगा.

20 जनवरी, 2017 को प्रेम सिंह ने रमेश को हत्या के अपराध में बच्चों की अदालत में पेश कर के 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड के दौरान पूछताछ में बताया कि उस ने दिल स्कूल में इसलिए फेंका था कि अगर वहां दिल मिलेगा तो लोगों को लगेगा कि स्कूल में बच्चों के अंग निकाल कर बेचा जाता है. बाद में वह क्लासटीचर के बारे में अफवाह फैला देता कि वह इस तरह के काम करता है. इस तरह स्कूल भी बदनाम हो जाता और क्लासटीचर भी.

इस के अलावा रमेश दीपू के अपहरण की बात कह कर दिलीप से फिरौती वसूलना चाहता था. लेकिन पुलिस का दबाव बढ़ने की वजह से वह फिरौती के लिए दिलीप को फोन नहीं कर सका था. पुलिस ने रमेश की निशानदेही पर घर से खुरपी बरामद कर ली थी. रिमांड खत्म होने पर पुलिस ने उसे फिर से बच्चों की अदालत में पेश किया था, जहां से उसे बालसुधार गृह भेज दिया गया था.

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