अदालत में ऐसे झुकी मूछें

अदालत में ऐसे झुकी मूछें – भाग 3

किरन की हत्या और रोहतास के साथ हुए अन्याय को मीडियाकर्मियों ने विभिन्न टीवी चैनलों पर दिखाना शुरू कर दिया. इस खबर के बाद क्षेत्र में हंगामा उठ खड़ा हुआ. कई समाजसेवी और महिला संगठन सड़कों पर उतर आए थे.

किरन के हत्यारे मातापिता और भाई की गिरफ्तारी को ले कर आवाज उठने लगी थीं. हर गली, नुक्कड़ पर इस घटना की चर्चा होने लगी थी. कोई इसे उचित ठहरा रहा था तो कोई अन्याय कह रहा था. पुलिस प्रशासन ने इस मामले से निपटने की पूरी तैयारी कर ली थी.

रोहतास की शिकायत पर 14 फरवरी, 2017 को थाना सदर में किरन के भाई अशोक और अन्य लोगों के खिलाफ किरन की हत्या का मुकदमा भादंवि की धारा 302, 201, 506, 34 के तहत दर्ज कर लिया गया. पुलिस उसी रात जुगलना गांव पहुंच गई.

पुलिस ने लोगों से पूछताछ कर किरन के बारे में जानकारी जुटाई. देर रात पुलिस ने रोहतास की सुरक्षा के मद्देनजर उसे एक गनमैन दे दिया था. क्योंकि अशोक ने रोहतास को जान से मारने की धमकी भी दी थी. दूसरे ऐसे गंभीर माहौल में रोहतास की सुरक्षा अति आवश्यक बन गई थी.

पुलिस ने श्मशान से बरामद किए सबूत

अगली सुबह पुलिस ने जुगलना गांव जा कर अशोक को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया था. अशोक की गिरफ्तारी के बाद थाना सदर और सीन औफ क्राइम की टीम ने मृतका किरन के कमरे का बड़ी बारीकी से मुआयना किया और कुछ चीजों को अपने कब्जे में ले लिया था. इस के बाद पुलिस परिवार के लोगों, गांव के प्रमुख लोगों और सरपंच को साथ ले कर श्मशान घाट पहुंची.

अशोक की निशानदेही पर उस जगह की पहचान करवाई गई, जहां किरन का अंतिम संस्कार किया गया था. श्मशान से पुलिस ने हड्डियों और राख के सैंपल लिए और उन्हें लैब में भेजने के बाद डीएनए टेस्ट की तैयारी शुरू कर दी थी.

इसी के साथ ही किरन द्वारा लिखा गया बताया जाने वाला सुसाइड नोट भी टीम ने अपने कब्जे में ले लिया था ताकि लिखाई की जांच की जा सके. क्राइम टीम ने छत पर उस जगह की मिट्टी के सैंपल भी लिए जिस जगह जहरीला पानी पीने के बाद किरन ने उल्टी की थी.

इस काम से फारिग होने के बाद 16 फरवरी को अशोक को अदालत में पेश कर 2 दिन का पुलिस रिमांड लिया, ताकि अभियुक्त से मृतका का मोबाइल फोन व इस केस से जुड़ी अन्य चीजें बरामद की जा सकें. रिमांड अवधि में पुलिस ने कई सबूत जुटाए. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद पुलिस ने अशोक को अदालत में पेश कर जिला जेल भेज दिया.

पुलिस ने समय पर इस केस की चार्जशीट अदालत में फाइल कर दी थी. यह केस जिला एवं सत्र न्यायालय में एक साल 10 महीने तक चला था. बचाव पक्ष की तरफ से इस केस को ललित गोयल लड़ रहे थे और अभियोजन पक्ष की ओर से इस केस की पैरवी सनातन धर्म चैरिटेबल ट्रस्ट के अधिवक्ता जतिंदर कुश कर रहे थे.

अदालत में डीएनए की रिपोर्ट भी पेश की गई थी जो श्मशान से उठाई गई मृतका की हड्डियों के डीएनए और मृतका के भाई अशोक के डीएनए से मैच कर गई थी. लेकिन पुलिस ने छत से उल्टी के जो सैंपल लिए थे. उन की जांच रिपोर्ट से यह बात साबित नहीं हो सकी कि मृतका को जहर दे कर मारा गया था. जहर की बात रोहतास ने ही पुलिस व अन्य लोगों को अपने बयान में बताई थी.

प्रेमी मुकर गया गवाही से

इस केस में नया मोड़ उस समय आया था, जब मृतका के पति रोहतास ने अदालत में अपनी गवाही देने से मना कर दिया था, जिस प्रेम विवाह की कीमत किरन को अपनी जान दे कर चुकानी पड़ी थी, वही रोहतास बेवफा  निकल गया था.

साथ जीनेमरने की कसमें खा कर शादी के बंधन में बंधने के बाद जब किरन की हत्या कर दी गई तो कानूनी लड़ाई लड़ने के बजाय रोहतास गवाही से ही मुकर गया. उस ने अपने बयान में अदालत को बताया था कि उसे पुलिस से कोई शिकायत नहीं है. उस ने अपने तौर पर पता लगा लिया है कि किरन की मौत प्राकृतिक तरीके से हुई थी.

रोहतास के इस बयान के बाद सनातन धर्म चैरिटेबल ट्रस्ट ने किरन हत्याकांड के मुकदमे की कमान पूरी तरह से अपने हाथ में ले ली थी. ट्रस्ट के वकील जतिंदर कुश ने 5 सितंबर, 2018 को अदालत में एक पेटीशन दायर कर प्रार्थना की थी कि अभियुक्त अशोक के पिता पुलिस में हैं, जिस की वजह से सदर पुलिस ने सनातन धर्म ट्रस्ट के पदाधिकारियों की न तो गवाही दर्ज की थी और न ही किसी रजिस्टर या दस्तावेज को चैक किया था. जबकि इस केस में उन की गवाही की बड़ी अहमियत है.

ट्रस्ट की प्रार्थना स्वीकार कर अदालत ने 14 सितंबर को ट्रस्ट के उस रजिस्टर को चैक किया, जिस में शादी के बाद अपने हस्ताक्षर करते वक्त किरन ने अपनी हत्या होने की आशंका व्यक्त की थी.

इस के बाद सनातन धर्म ट्रस्ट के चेयरमैन संजय चौहान के बयान भी अदालत में दर्ज किए गए थे. तमाम गवाहियां और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अतिरिक्त सेशन जज डा. पंकज ने अशोक को किरन की हत्या का दोषी ठहराते हुए फैसले की तारीख 5 दिसंबर, 2018 तय कर दी थी.

न्यायाधीश डा. पंकज ने इस केस में अपना फैसला निर्धारित तिथि को दिन के 3 बज कर 58 मिनट पर सुनाया. इस फैसले से ठीक 10 मिनट पहले 3:48 बजे दोषी अशोक के थानेदार पिता सुशील उठ कर अदालत से बाहर चले गए थे. वह शायद पहले से ही जानते थे कि फैसला उन के पक्ष में नहीं होने वाला है.

दोषी अशोक को सजा सुनाने से पहले जज साहब ने इस मामले पर अपनी टिप्पणी देते हुए कहा था, ‘‘जो ऐसी साजिश रचते हैं, वह याद रखें कि फांसी का फंदा उन का इंतजार कर रहा है.’’

अदालत ने सुनाई फांसी की सजा

अदालत इसे रेयरेस्ट औफ रेयर अपराध मानते हुए किरन की हत्या के अपराध में आईपीसी की धारा 302 के अंतर्गत दोषी को फांसी की सजा और एक हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई. इस के अलावा धारा 201 के तहत 7 साल के कठोर कारावास की सजा का हुक्म भी दिया.

तभी मुजरिम अशोक ने अदालत से कम सजा करने की अपील करते हुए कहा था कि उस की मां को कैंसर है और वह अकसर बीमार रहती हैं. पिता को अपनी नौकरी से समय नहीं मिलता है. ऐसे में मां की देखभाल करने वाला कोई नहीं है.

पर अदालत ने उस की अपील को खारिज करते हुए कहा था कि ऐसे अपराधी के साथ नरमी नहीं बरती जा सकती. सजा सुनने के बाद अशोक का सिर शर्म और पश्चाताप से नीचे झुक गया था.

किरन की मौत से पहले सन 2017 तक हिसार के गांव जुगलान में थानेदार सुरेश का हंसताखेलता परिवार था. 4 लोगों के इस छोटे से परिवार में बेटी की मौत हो गई और उस की हत्या के अपराध में बेटा जेल चला गया. पत्नी को कैंसर है और सुरेश स्वयं ड्यूटी पर बाहर रहते हैं. कैंसर से पीडि़त पत्नी अब बिना किसी सहारे के घर में अकेली रहेगी.

आखिर क्या मिला ऐसी मूंछ बचा कर. ध्यान से सोचा जाए तो अशोक ही अपने घर को उजाड़ने का कसूरवार निकला. जिस समाज के लिए उस ने इतना बड़ा अपराध किया, अब वह समाज और समाज के ठेकेदार कहां हैं.

अदालत में ऐसे झुकी मूछें – भाग 2

भाई को पता लगी बहन की सच्चाई

अशोक ने बहन से कुछ नहीं कहा बल्कि वह पहले यह पता लगाना चाहता था कि किरन किस से बातें करती है. मौका मिलने पर एक दिन अशोक ने जब किरन का फोन चैक किया तो रोहतास का नाम सामने आया. वह रोहतास से फोन पर बात ही नहीं करती थी, बल्कि वाट्सऐप से भी दोनों एकदूसरे को मैसेज भेजते थे.

तमाम मैसेज अशोक ने देखे तो उस का खून खौल उठा. उस ने किरन से रोहतास के विषय में जब पूछा तो किरन ने झूठ बोलने के बजाए साफ बता दिया था कि रोहतास उस का प्रेमी है और वे शादी कर चुके हैं. क्योंकि अब उस की चोरी पकड़ी जा चुकी थी और बात को छिपाने से कोई फायदा भी नहीं था. मौका मिलने पर वह खुद भी तो यह बात घर वालों को बताना चाहती थी. भाई ने पूछ लिया तो किरन से सब बता दिया.

किरन के इस रहस्योद्घाटन से जैसे घर में भूचाल आ गया था. अशोक और उस की मां ने किरन की जम कर पिटाई की. उन्होंने धमकी भी दी कि वह रोहतास को भूल जाए. अगर उस ने ऐसा नहीं किया तो उसे जान से मार दिया जाएगा, लेकिन किरन अपनी किसी बात से टस से मस नहीं हुई.

उसे इस बात का पहले से अहसास था कि शादी वाली बात घर वालों को पता चलने पर यह सब तो होना ही था. इसीलिए उस ने अपने आप को इन सब बातों के लिए पहले से ही तैयार कर रखा था.

इस के बाद किरन को घर में कैद कर लिया गया. 22 जनवरी, 2017 को अशोक ने किरन के पति रोहतास को फोन कर के धमकाया कि वह किरन से अपने संबंध खत्म कर ले नहीं तो उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा. यह भी कहा कि वह इस शादी को भूल जाए.

इस के बाद 9 फरवरी, 2017 को किरन ने किसी तरह फोन द्वारा रोहतास को बता दिया कि उन की शादी के बारे में घर वालों को पता चल गया है और अब वे सब उस पर जुल्म ढा रहे हैं. जल्दी कुछ करो.

इस से पहले कि रोहतास कुछ करता, 9-10 फरवरी, 2017 की रात को अशोक ने अपनी मां के सामने ही किरन को पहले प्यार से समझाने की कोशिश की थी. किरन को बताया गया कि रोहतास जाति का सैनी है और हम जाट हैं. ऊपर से रोहतास और हमारी हैसियत में जमीनआसमान का फर्क है. वह मामूली परिवार से है.

अशोक ने किरन को ऊंचनीच, जातिपात और मर्यादा का पाठ पढ़ाते हुए रोहतास से रिश्ता तोड़ने के लिए कहा, लेकिन किरन पर अपनी मां और भाई की बातों का कोई असर नहीं हुआ. उस ने अपनी बात पर कायम रहते हुए कह दिया, ‘‘चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए, रोहतास मेरा पति है और पति रहेगा. मैं ने अग्नि और भगवान को साक्षी मान कर उसे अपने मन से पति स्वीकार किया है, इसलिए उसे हरगिज नहीं भुला सकती.’’

किरन की बात सुन कर अशोक के तनबदन में आग लग गई थी. वह उस की चोटी पकड़ कर कमरे में ले गया और उस ने किरन से जबरदस्ती एक रजिस्टर पर सुसाइड नोट लिखवाया, जिस में लिखा गया था, ‘मैं किन्हीं कारणवश अपनी मरजी से आत्महत्या कर रही हूं. इस मामले में मेरे परिवार के किसी सदस्य का कोई लेनादेना नहीं है. उन्हें दोषी न ठहराया जाए.’

किरन को पिला दिया जहर

इस के बाद अशोक किरन को छत पर ले गया और उसे एक गिलास में कोई जहरीला पदार्थ मिला पानी जबरदस्ती पिला दिया. पानी पीते ही किरन को उल्टी हो गई, पर तब तक जहर अपना असर दिखा चुका था. कुछ देर तड़पने और छटपटाने के बाद किरन की मौके पर ही मौत हो गई थी.

किरन की हत्या करने के बाद अशोक उस की लाश को वहीं छत पर ही रजाई से ढक कर नीचे आ कर अपने कमरे में सो गया था. किरन के पिता दरोगा सुरेश सिंह उस समय अपनी ड्यूटी पर रोहतक थाने में थे. उन्हें शायद किरन की हत्या के बाद ही बताया गया था.

अपने बेटे को इस हत्या के केस से और बेटी की बदनामी से बचाने के लिए अगली सुबह गांव में यह बात फैला दी गई कि किरन की हार्ट अटैक से मौत हो गई है. इस के बाद आननफानन में बिना पुलिस या किसी अन्य को सूचना दिए किरन का अंतिम संस्कार कर दिया गया था.

किरन रोजाना रोहतास को फोन किया करती थी. जब 2 दिन गुजर जाने पर भी किरन का फोन नहीं आया और न ही डायल करने पर उस का फोन मिला तो रोहतास को चिंता होने के साथ दाल में कुछ काला दिखाई देने लगा. उस ने अपने स्तर पर किरन के गांव किसी को भेज कर पता लगवाया तो जानकारी मिली कि पिछली 10 तारीख को किरन की मौत हो गई थी और उस के परिजनों ने उस का अंतिम संस्कार भी कर दिया था.

पुलिस से की शिकायत

यह खबर सुन कर रोहतास की तो दुनिया ही वीरान हो गई थी. उसे पक्का विश्वास था कि किरन की हत्या कर दी गई है. रोहतास ने यह बात सनातन धर्म चैरिटेबल ट्रस्ट और जय भीम आर्मी ट्रस्ट के चेयरमैन संजय चौहान को बताई. संजय चौहान रोहतास को साथ ले कर तत्कालीन डीएसपी भगवान दास से मिले और उन्हें पूरी बात विस्तार से बताते हुए कानूनी काररवाई करने की अपील की.

मामला औनर किलिंग और 2 अलगअलग जातियों के परिवारों से संबंधित था. ऐसे में जातीय दंगा भड़कने का खतरा था सो मामले की गंभीरता को देखते हुए डीएसपी भगवान दास ने यह सूचना तत्कालीन एसएसपी (हिसार) राजिंदर मीणा को दी.

एसएसपी के दिशानिर्देश पर डीएसपी ने थाना सदर के इंचार्ज इंसपेक्टर प्रह्लाद सिंह को तुरंत इस मामले में काररवाई करने के निर्देश दिए. उसी दिन थाने के पास ही रोहतास और संजय चौहान ने एक प्रैसवार्ता कर मीडियाकर्मियों को भी इस बात की पूरी जानकारी दे दी.

अदालत में ऐसे झुकी मूछें – भाग 1

हिसार के जिला एवं सत्र न्यायाधीश डा. पंकज की विशेष अदालत के बाहर 5 दिसंबर, 2018 को जुटी भीड़ को देख कर लग रहा था जैसे वहां  पूरा शहर ही उमड़ पड़ा था. अदालत की काररवाई देखनेसुनने के लिए लोग एकदूसरे से धक्कामुक्की कर रहे थे. इलैक्ट्रौनिक और प्रिंट मीडियाकर्मियों का भी वहां तांता लगा हुआ था.

अदालत के बाहर कई महिला संगठन और सनातन धर्म जैसी धार्मिक संस्थाओं के लोग भी मौजूद थे. भीड़ को देखते हुए वहां पुलिस का भी पर्याप्त इंतजाम था. हर कोई इस फैसले को सब से पहले सुनना चाहता था. मुजरिम अशोक को पुलिस की गाड़ी जेल से ले कर आ चुकी थी और उसे कड़ी सुरक्षा के बीच अदालत में ले जाया गया था.

वैसे इस केस की तमाम सुनवाई पूरी हो चुकी थी और 29 नवंबर, 2018 को अदालत ने आरोपी अशोक को दोषी करार दे दिया था. आज जज साहब को अपना फैसला सुनाना था. अदालत के बाहर खड़ी लोगों की भीड़ इस फैसले को सुनने के लिए इसलिए अधिक उतावली थी, क्योंकि हत्या के इस केस के दोषी अशोक के पिता हरियाणा पुलिस में दरोगा थे और उन्होंने अपने बेटे को बचाने के लिए वे सब कानूनी हथकंडे अपनाए थे, जो दोषी को सजा से बचाने के लिए सहायक सिद्ध हो सकते थे.

यह एक औनर किलिंग का मामला था. हिसार के गांव आदमपुर सीसवान निवासी रोहतास की शिकायत पर उस की पत्नी किरन की हत्या का यह मुकदमा किरन के भाई अशोक पर चलाया गया था. इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि कुछ इस प्रकार से थी—

दरोगा की बेटी को हुआ प्यार

हरियाणा के जिला हिसार के गांव जुगलान में सुरेश सिंह का परिवार रहता था. सुरेश हरियाणा पुलिस में सबइंसपेक्टर थे और जिला रोहतक में तैनात थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा बेटा था अशोक, जो उन दिनों हिसार में कोचिंग कर रहा था और एक बेटी थी किरन. किरन भी उन दिनों आईटीआई कर रही थी.

सुरेश के पास लगभग 8 एकड़ खेती की जमीन थी, जो उन्होंने ठेके पर बुआई के लिए किसी को दे रखी थी. क्योंकि दोनों बच्चे पढ़ाई में लगे थे और वह खुद अपनी पुलिस की नौकरी में व्यस्त थे. ऐसे में जमीन की देखभाल करने वाला कोई नहीं था.

किरन और रोहतास की मुलाकात सन 2012 में हुई थी. किरन आईटीआई के लिए बस से रोज आदमपुर जाया करती थी. आदमपुर सीसवान निवासी रोहतास पेशे से ड्राइवर था और उन दिनों आदमपुर-हिसार मार्ग पर बस चलाया करता था. किरन अकसर उस की बस में ही आयाजाया करती थी.

इसी दौरान दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित हुए और दोनों के दिलों के बीच प्यार के अंकुर फूटे थे. दोनों की आपस में बातें होने लगी थीं. आपसी विचार मिलने के कारण उन्हें एकदूजे से प्यार हो गया था और जल्दी ही दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा था.

नौबत यहां तक पहुंच गई कि उन्होंने शादी करने का फैसला ले लिया. पर समस्या यह थी कि दोनों अलगअलग बिरादरी के थे. रोहतास सैनी था और किरन जाट परिवार से थी. ऐसे में शादी के बारे में सोचना तक उन दोनों के लिए किसी अपराध से कम नहीं था. पर वे शादी करने की ठान चुके थे.

काफी सोचविचार के बाद दोनों ने तय किया कि अपनेअपने परिवारों को बताए बिना वे गुपचुप तरीके से शादी कर लेंगे. फिर 8 अगस्त, 2015 को रोहतास और किरन ने सनातन धर्म चैरिटेबल ट्रस्ट, हिसार की सहायता से शादी कर ली.

किरन ने कर ली प्रेमी रोहतास से शादी

अपने परिवार वालों की आदत देखते हुए किरन ने शादी के समय ही सनातन धर्म मंदिर के शादी वाले रजिस्टर में अपने हस्ताक्षर करते समय यह भी लिख दिया था, ‘शादी के बाद मैं अपने मातापिता के घर जाऊंगी. अगर लगातार 5-7 दिनों तक मेरा मेरे पति के साथ संपर्क न हो पाए तो यह समझा जाए कि मेरी जान को खतरा है. मेरे घर वाले मेरी हत्या भी कर सकते हैं. मुझे वहां से निकाल लिया जाए. इस में मेरे पति का कोई दोष नहीं होगा.’

मंदिर में शादी करने के बाद उन्होंने अपनी शादी कोर्ट से भी रजिस्टर्ड करवा ली. फिर वह दोनों अपने अपने घर चले गए. दरअसल किरन की मां को कैंसर था. वह कोई सदमा बरदाश्त करने की स्थिति में नहीं थीं.

ऐसे में उन्हें गैरजाति के युवक के साथ शादी करने वाली बात बताना तो कतई उचित नहीं था, इसलिए दोनों ने मिल कर यह योजना बनाई थी कि इस शादी को तब तक गुप्त रखा जाएगा, जब तक किरन के मातापिता इस बात को ले कर राजी नहीं हो जाते.

योजना यह भी थी कि किरन इस बीच मां के स्वस्थ होने पर अपने मातापिता को पूरी बात बता कर इस शादी के लिए तैयार कर लेगी. लेकिन ऐसा हो नहीं सका था. पतिपत्नी होते हुए भी लगभग 18 महीने तक किरन और रोहतास एकदूसरे से अलग अपनेअपने घरों में रहे.

उन दोनों के बीच केवल फोन पर ही रोज बातें हुआ करती थीं. वे दोनों इसी बात से ही खुश और संतुष्ट थे. इस बीच किरन आदमपुर से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद आगामी पढ़ाई के लिए जयपुर चली गई थी.

रोहतास ने भी वह बस छोड़ कर गुड़गांव में कैब चलानी शुरू कर दी. सब कुछ ठीक चल रहा था पर एक दिन किरन की मां को उस पर शक हो गया. किरन घंटों तक फोन पर रोहतास से बातें किया करती थी. यह बात उस ने अपने बेटे अशोक को बताते हुए कहा था कि न जाने किरन घंटों तक फोन पर किस से बातें करती है.

आयशा हत्याकांड : मोहब्बत की सजा मौत

आयशा हत्याकांड : मोहब्बत की सजा मौत – भाग 3

पूरी योजना तैयार कर के इमरान ने 14 सितंबर, शनिवार को बहन से कहा, ‘‘आयशा, मुझे लगता है कि नाजिम तुझे खुश रखेगा. इसलिए तेरा निकाह उस से कर देना ही ठीक है. ऐसा करो, आज रात 9 बजे नाजिम को फोन कर के तुम घर पर बुला लो. निकाह कब और कैसे किया जाए, बात कर लेते हैं.’’

इमरान की बात सुन कर आयशा को यकीन नहीं हुआ. इसलिए उस ने कहा, ‘‘भाईजान, आप यह क्या कह रहे हैं?’’

‘‘मैं सच कह रहा हूं,’’ इमरान ने विश्वास दिलाते हुए कहा, ‘‘जब घर के सभी लोग तैयार हैं तो मैं ही तेरी खुशी में टांग क्यों अड़ाऊं?’’

इमरान में बदलाव देख कर आयशा खुश हो उठी. उस ने कहा, ‘‘भाईजान, मैं अभी नाजिम को फोन किए देती हूं. वह काम से लौटते हुए सीधे अपने घर आ जाएगा.’’

इस के बाद आयशा ने अपने मोबाइल फोन से नाजिम को फोन कर के कहा, ‘‘नाजिम, आज काम से लौटते समय तुम सीधे मेरे घर आ जाना. इमरान भाई मान गए हैं. वह तुम से बात कर के निकाह की तारीख पक्की करना चाहते हैं.’’

आयशा ने अपनी यह बात पूरे विश्वास के साथ कही थी, इसलिए नाजिम ने हामी ही नहीं भरी, बल्कि ठीक समय पर वह उस के घर आ गया. इमरान उस से बड़ी आत्मीयता से मिला. नाजिम को उस ने ऊपर के कमरे में ले जा कर बैठा दिया. उस कमरे में पहले से ही उस्मान और सुफियान बैठे थे. नाजिम उन्हें जानता था, इसलिए उन से बातें करने लगा. नाजिम को नाश्ता भी कराया गया. इस के बाद निकाह कब और कैसे किया जाए, इस पर बातचीत होने लगी. रात 11 बजे तक निकाह के बारे में बहुत सी बातें तय हो गईं.

इस के बाद इमरान ने कहा, ‘‘नाजिम, अम्मी तुम्हारे लिए भी खाना बना रही हैं, खाना खा कर जाना.’’

नाजिम को लगा कि अब सब ठीक हो गया है, इसलिए उस ने हामी भर ली. अब तक गांव में सन्नाटा पसर गया था. दिन भर का थकामांदा नाजिम लापरवाह चारपाई पर बैठा था, इसी का फादया उठा कर उस्मान और सुफियान ने अचानक नाजिम के हाथपैर पकड़ लिए तो इमरान ने झपट कर नाजिम का गला पकड़ लिया और दबाने लगा. छटपटा कर नाजिम ने प्राण त्याग दिए. वह जिंदा न रह जाए, इस के लिए उस पर चाकू से भी वार किए गए. इस के बाद रात में ही नाजिम की लाश गांव के बाहर बाजरे के खेत में बीचोबीच फेंक दी गई.

काम हो जाने के बाद सुफियान और उस्मान अपनेअपने घर चले गए. आयशा, उस की अम्मी और अब्बू तथा घर के अन्य लोग नाजिम की हत्या होते देखते रहे, लेकिन डर के मारे कोई विरोध नहीं कर सका. आयशा ने कुछ कहना चाहा तो इमरान चीख कर बोला, ‘‘खबरदार, अगर किसी ने कुछ भी बोलने या कहने की हिम्मत की तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा. उस का भी वही हाल कर दूंगा, जो मैं ने नाजिम का किया है.’’

घर वालों को धमका कर इमरान उस कमरे में गया, जिस में उस ने नाजिम की हत्या की थी. उस की साफसफाई कर के सुबह से पहले ही घरवालों को बिना कुछ बताए वह भी फरार हो गया.

3 दिनों तक नाजिम के बारे में किसी को कुछ पता नहीं चला. 18 सितंबर को जब लाश से दुर्गंध आने लगी तो कुछ लोग खेत के भीतर यह देखने के लिए घुसे कि दुर्गंध किस चीज की आ रही है. तब नाजिम की हत्या का पता चला.

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मोहम्मद आरिफ की सूचना पर पुलिस इमरान और साथियों को गिरफ्तार नहीं कर सकी तो दबाव बनाने के लिए इमरान के अम्मीअब्बू तथा बहन आयशा को थाने ले आई थी. पूछताछ के बाद थानाप्रभारी रामसूरत सोनकर ने इब्राहीम को थाने में रोक कर परवीन बेगम और आयशा को घर भेज दिया.

इमरान को साथियों से पता चल गया था कि आयशा ने नाजिम की हत्या की एकएक बात पुलिस को बता दी है. यही नहीं, वह अदालत में भी यह कहने को तैयार है कि नाजिम की हत्या उस के भाई इमरान ने अपने मौसेरे भाई उस्मान तथा दोस्त सुफियान के साथ मिल कर की है.

आयशा चश्मदीद गवाह थी. अगर वह अदालत में गवाही देती तो इमरान और उस के साथियों को सजा निश्चित थी. इसलिए इमरान को लगा कि किसी भी तरह आयशा को रोका जाए. वह उसी रात छिपतेछिपाते घर आया और आयशा को समझाने लगा कि वह उस के खिलाफ गवाही न दे. लेकिन आयशा अपनी जिद पर अड़ी थी. क्योंकि उस के प्रेमी को मारा गया था.

उस ने कहा, ‘‘दुनिया भले ही इधर से उधर हो जाए, मैं अपनी बात से नहीं डिगूंगी. अदालत में मैं वही कहूंगी, जो मैं ने आंखों से देखा है.’’

इस के बाद इमरान को इतना गुस्सा आया कि उस ने तय कर लिया कि इसे मार देना ही ठीक है. उस ने मिट्टी के तेल का डिब्बा उठाया और उस पर तेल डालने लगा. आयशा जान बचाने के लिए चीखते हुए भागी. तब उसे लगा कि अगर उस ने आग लगाई तो यह शोर मचा देगी.

शोरशराबा न हो, यह सोच कर उस ने आयशा को पकड़ा और अपने दोस्त जहीद की मदद से उस का गला दबा कर मार दिया. इस के बाद हत्या को आत्महत्या का रूप देने के लिए उस ने आयशा की लाश को रस्सी का फंदा बना कर दरवाजे के ऊपर बने रोशानदान से लटका दिया और अपने साथी जहीद के साथ घर से भाग गया.

कथा लिखे जाने तक नाजिम की हत्या में शामिल तीसरे अभियुक्त सुफियान तथा आयशा की हत्या में शामिल जहीद को पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकी थी. पुलिस उन की गिरफ्तारी के लिए जगहजगह छापे मार रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

आयशा हत्याकांड : मोहब्बत की सजा मौत – भाग 2

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में इमरान और उस्मान ने नाजिम और आयशा की हत्या की जो कहानी पुलिस को बताई, वह प्रेमसंबंध और औनर किलिंग की निकली.

इलाहाबाद के थाना धूमनगंज के गांव दामूपुर में मोहम्मद आरिफ अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 6 बेटे थे. बेटों में नाजिम सब से छोटा था. वह मकानों में मार्बल लगाने का ठेका लेता था, जिस से वह अच्छीखासी कमाई कर रहा था. जबकि मोहम्मद आरिफ गांव में ही पान की दुकान चलाते थे.

इसी गांव के रहने वाले मोहम्मद इब्राहीम मोटर मैकेनिक थे. जीटी रोड चौफटका पर उस की अपनी दुकान थी. घर में पत्नी परवीन बेगम के अलावा 3 बेटे और 4 बेटियां थीं. 18 वर्षीया आयशा तीसरे नंबर पर थी. एकहरे बदन की गोरीचिट्टी आयशा देखने में ठीकठाक लगती थी.

आयशा के भाई इमरान की नाजिम से खूब पटती थी. उन की यह दोस्ती बचपन की थी. नाजिम का उस के घर भी आनाजाना था. इसी आनेजाने में आयशा को नाजिम कब पसंद आ गया, उसे खुद ही पता नहीं चला. नाजिम आयशा को 1-2 दिन दिखाई न देता तो वह बेचैन हो उठती. उस की आंखें नाजिम के दीदार को तड़पने लगतीं.

जल्दी ही नाजिम को आयशा की इस तड़प का अहसास हो गया. यही वजह थी कि जिस आग में आयशा जल रही थी, उसी आग मे नाजिम भी जलने लगा. वह जब भी आयशा के घर आता, चाहतभरी नजरों से उसे देखता रहता.

ऐसे में ही किसी दिन आयशा और नाजिम को तनहाई में मिलने का मौका मिला तो दोनों के दिल की तड़प होठों पर आ गई. नाजिम ने आयशा का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘आयशा, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. जी चाहता है मैं तुम्हें हमेशा देखता रहूं.’’

‘‘नाजिम, मेरा भी यही हाल है.’’ आयशा उस के नजदीक आकर बोली, ‘‘मेरा भी मन करता है कि हर पल तुम्हें ही देखती रहूं, तुम से खूब बातें करूं, तुम्हारे साथ घूमूं. तुम मेरे दिलोदिमाग में रचबस गए हो. दिन में चैन नहीं मिलता तो रातों को नींद नहीं आती. बस, तुम्हारी ही यादों में खोई रहती हूं.’’

आयशा अपनी बात कह ही रही थी कि नाजिम ने उसे अपनी बांहों में भींच लिया. इस के बाद धीरेधीरे उन का प्यार परवान चढ़ने लगा. गुपचुप तौर पर दोनों कभी घर में तो कभी घर के बाहर रात के अंधेरों में मिलनेजुलने लगे. आयशा जब भी नाजिम से मिलती, अपने प्यार की दुनिया बसाने का स्वप्न उस के सीने पर सिर रख कर देखती.

आयशा नाजिम पर कुछ इस कदर दीवानी हुई कि एक दिन अपना सबकुछ उस के हवाले कर दिया. इस के बाद नाजिम ने उसे भरोसा दिलाया कि दुनिया भले ही इधर से उधर हो जाए, लेकिन वह उसे इधर से उधर नहीं होने देगा. वह उसी से निकाह करेगा. प्यार मोहब्बत कोई छिपने की चीज तो है नहीं, यही वजह थी कि नाजिम और आयशा की मोहब्बत का भी खुलासा हो गया. गांव में उन की मोहब्बत की चर्चाएं होने लगीं.

यह खबर इब्राहीम और उस के बेटे इमरान तक भी पहुंच गई. बहन की इस करतूत से इमरान को आग सी लग गई. वह आयशा पर नजर रखने लगा. उस ने आयशा का घर से निकलना बंद करा दिया.

इस के बाद उस ने नाजिम को भी धमकाया, ‘‘खबरदार, अब कभी आयशा से मिलने की कोशिश की तो अंजाम बहुत बुरा होगा.’’

लेकिन नाजिम और आयशा की मोहब्बत इतनी गहरी हो चुकी थी कि इमरान की कोई भी कोशिश सफल नहीं हुई. किसी न किसी बहाने आयशा और नाजिम मिल ही लेते थे.

ऐसे ही पलों में एक दिन आयशा ने कहा, ‘‘नाजिम, मेरे भाईजान इमरान को हमारी मोहब्बत पर सख्त ऐतराज है. वह नहीं चाहते कि मैं तुम से मिलूं. उन्होंने मुझ पर इतनी सख्ती कर दी है कि तुम से मिलना मेरे लिए मुश्किल हो गया है. गांव में भी हमारी मोहब्बत के चर्चे आम हो गए हैं. वैसे मेरी अम्मी और अब्बू को हमारी मोहब्बत पर ज्यादा ऐतराज नहीं है. अगर तुम अपने अब्बू को निकाह के लिए मेरे अब्बू के पास भेजो तो बात बन सकती है.

नाजिम को आयशा की बात उचित लगी. उस ने आयशा को आश्वासन दिया कि घर पहुंचते ही वह अम्मीअब्बू से निकाह की बात करेगा. नाजिम ने कहा ही नहीं, बल्कि घर आते ही बात भी की. तब अगले ही दिन उस के अब्बू आयशा के अब्बू इब्राहीम से मिलने उन के कारखाने पर जा पहुंचे. उन्होंने उन से आयशा और नाजिम के निकाह की बात की तो पहले तो इब्राहीम ने मना कर दिया.

लेकिन बाद में कहा, ‘‘देखो आरिफ भाई, मुझे तो इस निकाह से कोई ऐतराज नहीं है. लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि इमरान इस निकाह के लिए तैयार नहीं होगा. फिर भी मैं घर में बात चलाऊंगा.’’

इमरान को जब पता चला कि आयशा के निकाह के लिए नाजिम के अब्बू उस के अब्बू के पास आए थे तो वह स्वयं को रोक नहीं सका और जा कर नाजिम से झगड़ा करने लगा. तब गांव के कुछ लोगों ने उसे समझाबुझा कर शांत किया.

कहीं कुछ उलटासीधा न हो जाए, यह सोच कर गांव के कुछ बुजुर्गों ने इकट्ठा हो कर इमरान को समझाया कि नाजिम खाताकमाता है, आयशा भी बालिग हो चुकी है, इसलिए दोनों का निकाह करने में उसे परेशानी किस बात की है? कोई ऊंचनीच हो, इस से बेहतर है कि दोनों का निकाह कर दिया जाए. बुजुर्गों के सामने तो इमरान कोई विरोध नहीं कर सका, लेकिन दिल से वह इस निकाह के लिए तैयार नहीं हुआ.

आयशा और नाजिम की मोहब्बत की उम्र 2 साल से अधिक हो चुकी थी. लाख कोशिश कर के भी इमरान आयशा और नाजिम को अलग नहीं कर सका. बुजुर्गों के समझाने के बाद नाजिम और आयशा को लगने लगा था कि अब उन का निकाह हो जाएगा. इस की वजह यह थी कि दोनों के अम्मीअब्बू राजी थे. बात सिर्फ इमरान की थी. उन्हें विश्वास था कि एक न एक दिन वह भी मान जाएगा.

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15-20 दिनों तक इमरान ने भी विरोध नहीं किया तो आयशा और नाजिम को लगा कि अब सारी रुकावटें दूर हो गई हैं. जबकि आयशा ने जो किया था, उस से इमरान अंदर ही अंदर सुलग रहा था. वह किसी भी कीमत पर आयशा का निकाह नाजिम से नहीं होने देना चाहता था. इस के लिए जब उसे कोई राह नहीं सूझी तो उस ने गुपचुप तरीके से साजिश रच डाली. इस साजिश में उस ने अपने मौसेरे भाई उस्मान, जो बेगम बाजार, बमरौली का रहने वाला था तथा अपने दोस्त सुफियान को विश्वास में ले कर शामिल कर लिया.

आयशा हत्याकांड : मोहब्बत की सजा मौत – भाग 1

उत्तर प्रदेश के जिला इलाहाबाद के थाना धूमनगंज के थानाप्रभारी रामसूरत सोनकर अपने कार्यालय  में जैसे ही आ कर बैठे, एक बुजुर्ग उन के सामने आ कर खड़ा हो गया. उन्होंने उस की ओर देखा तो वह हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘साहब, मेरा नाम मोहम्मद आरिफ है. मैं दामूपुर गांव का रहने वाला हूं. मेरा 26 वर्षीय बेटा नाजिम 14 सितंबर की सुबह 10 बजे घर से काम पर जाने के लिए निकला था.

शाम को वह घर नहीं लौटा तो मैं उस की तलाश करने लगा. लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. आज सुबह 5 बजे गांव में शोर मचा कि सुमित पाल के बाजरे के खेत में एक लड़के की लाश पड़ी है. मैं ने वहां जा कर देखा तो वह मेरे बेटे नाजिम की लाश थी. उस में से बदबू आ रही थी. साहब, मैं उसी की रिपोर्ट दर्ज कराने आया हूं.’’

सुबहसुबह हत्या की खबर से थानाप्रभारी रामसूरत सोनकर का दिमाग चकरा गया. उन्होंने स्वयं को संभाल कर मोहम्मद आरिफ से पूछा, ‘‘बता सकते हो कि तुम्हारे बेटे की हत्या किस ने की होगी?’’

‘‘जी मेरे ही गांव के मोहम्मद इब्राहीम के बेटे इमरान ने यह काम किया है. साहब, मेरा बेटा नाजिम उस की बहन आयशा से प्यार करता था. वह उस से निकाह करना चाहता था. जबकि इमरान को यह पसंद नहीं था.’’

आरिफ की सूचना पर थानाप्रभारी रामसूरत सोनकर ने अपराध संख्या-520/2013 पर भादंवि की धारा 302/364/201 के तहत मोहम्मद इब्राहीम के बेटे इमरान तथा 2 अन्य  लोगों, इमरान के मौसेरे भाई उस्मान और दोस्त सुफियान के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा कर अपने साथ एसएसआई उमाशंकर यादव, एसआई जीतेंद्र बहादुर सिंह, एसआई (टे्रनिंग) संगीता सिंह तथा कुछ सिपाहियों को ले कर गांव दामूपुर के लिए रवाना हो गए.

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पुलिस बल के साथ इंसपेक्टर रामसूरत सोनकर दामूपुर गांव के उस बाजरे के खेत पर जा पहुंचे, जहां लाश पड़ी थी. लाश निर्वस्त्र थी. देखने से ही लग रहा था कि हत्या गला दबा कर की गई थी. उस के बाद उसे चाकुओं से भी गोदा गया था. यह हत्या भी कहीं दूसरी जगह की गई थी. उस के बाद लाश को यहां ला कर फेंका गया था. लाश से तेज दुर्गंध आ रही थी.

इंसपेक्टर रामसूरत सोनकर ने घटनास्थल की आवश्यक काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद अभियुक्तों को गिरफ्तार करने दामूपुर गांव जा पहुंचे. लेकिन वहां कोई नहीं मिला.

इंसपेक्टर रामसूरत सोनकर अभियुक्त इमरान की बहन आयशा, अम्मी परवीन बेगम तथा अब्बा इब्राहीम को पूछताछ के लिए थाने ले आए. पूछताछ में इब्राहीम और उन की पत्नी ने बताया कि न तो उन्होंने यह हत्या की है और न ही उन्हें हत्यारों के बारे में कुछ पता है.

इस के बाद इंसपेक्टर रामसूरत सोनकर ने आयशा को अलग ले जा कर पूछताछ की तो उस ने नाजिम से अपना प्रेम संबंध स्वीकार करते हुए बताया, ‘‘मेरे भाई इमरान ने मेरी मौसी के बेटे उस्मान और दोस्त सुफियान के साथ मिल कर नाजिम की हत्या की है. इमरान ने मुझ से निकाह करने का आश्वासन दे कर नाजिम को शनिवार की रात घर बुलाया. उसी रात तीनों ने नाजिम की गला दबा कर और चाकुओं से गोद कर हत्या कर दी. आधी रात के बाद गांव में सन्नाटा पसर गया तो वे नाजिम की लाश को गांव के बाहर बाजरे के खेत में फेंक आए थे.’’

इंसपेक्टर रामसूरत सोनकर ने इमरान के पिता इब्राहीम को रोक कर आयशा और उस की मां परवीन बेगम को घर भेज दिया था. यह 16 सितंबर की बात है.

19 सितंबर को सूरज ने अभी पूरी तरह आंखें खोली भी नहीं थी कि इब्राहीम के घर की महिलाओं के चीखचीख कर रोने की आवाज से पूरा गांव जाग गया. गांव वाले इब्राहीम के घर पहुंचे तो पता चला कि उस की बेटी आयशा ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली है.

गांव वालों के कहने पर परवीन बेगम ने इस घटना की सूचना थाना धूमनगंज पुलिस को दी. इंसपेक्टर रामसूरत सोनकर को परवीन बेगम की बातों पर कतई विश्वास नहीं हुआ. फिर भी उन्होंने उस के बताए अनुसार अपराध संख्या-529/2013 पर भादंवि की धारा 309 के तहत मुकद्दमा दर्ज करा कर साथियों के साथ दामूपुर स्थित इब्राहीम के घर जा पहुंचे.

आयशा की लाश मकान की पहली मंजिल बने कमरे में दरवाजे के ऊपर के रोशनदान से रस्सी के सहारे लटक रही थी. इंसपेक्टर रामसूरत सोनकर ने लाश का निरीक्षण करने के दौरान देखा कि लटक रही लाश के पैर फर्श को छू रहे थे. शरीर पर 2 जगहों पर जले के निशान थे. कपड़ों से मिट्टी के तेल की गंध आ रही थी. वहीं मिट्टी के तेल का डिब्बा भी पड़ा था.

स्थितियों से यही लग रहा था कि पहले उस पर मिट्टी का तेल डाल कर जला कर मारने का प्रयास किया गया था. किसी वजह से इरादा बदल गया तो गला दबा कर उस की हत्या कर दी गई. उस के बाद लाश को रस्सी के सहारे लटका कर आत्महत्या का रूप दे दिया गया. पुलिस ने जब हत्या की शंका व्यक्त की लेकिन घर वाले यह बात मानने को तैयार नहीं थे.

इंसपेक्टर रामसूरत सोनकर ने लाश को नीचे उतरवा कर आवश्यक काररवाई निपटाई और लाश को पोस्टमार्टम के लिए स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल भिजवा दिया. अब उन्हें पोस्टमार्टम रिपोर्ट की प्रतीक्षा थी.

पोस्टमार्टम के बाद आयशा की लाश अंतिम संस्कार के लिए उस के घर वालों को सौंप दी गई. इंसपेक्टर रामसूरत को पोस्टमार्टम की रिपोर्ट मिली तो उन का शक विश्वास में बदल गया, क्योंकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आयशा की मौत एंटीमार्टम इंजरी स्ट्रांगग्यूलेशन यानी गला दबा कर हत्या करना बता रही थी.

इस बीच इंसपेक्टर रामसूरत सोनकर ने इस मामले में अपने मुखबिरों से बहुत सारी जानकारियां प्राप्त कर ली थीं. प्राप्त जानकारियों के अनुसार आयशा के भाई को उस रात गांव में देखा गया था. चर्चा थी कि आयशा नाजिम की हत्या की पूरी कहानी पुलिस को बता कर मुख्य गवाह बन गई थी, इसीलिए उसे उस के भाई ने मार दिया था.

अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए थाना धूमनगंज पुलिस ने ताबड़तोड़ छापे मारने शुरू किए. परिणामस्वरूप 20 सितंबर को पुलिस ने इमरान के मौसेरे भाई उस्मान को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के बाद अगले दिन पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. इस के बाद 28 सितंबर को आयशा का भाई इमरान भी पुलिस गिरफ्त में आ गया. पुलिस ने पूछताछ कर के अगले दिन उसे भी अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

सपना का अधूरा सपना

सपना का अधूरा सपना – भाग 3

अभिनय ने आर्यसमाज मंदिर में विधिविधान से सपना से शादी कर के सभी को मिठाई खिलाई. इस के बाद प्रार्थना को उस के घर भेज दिया और सपना को साथ ले कर लोहियानगर स्थित अपने घर आ गया. अभिनय के घर वालों ने सपना को बहू के रूप में स्वीकार कर के उस का भव्य स्वागत किया.

प्रार्थना घर पर पहुंची तो उसे अकेली देख कर घर वालों ने सपना के बारे में पूछा. जब उस ने कहा कि बाजार में सपना उसे चकमा दे कर भाग गई है तो घर वाले बौखला उठे. उन्होंने तुरंत सपना को फोन किया. जब सपना ने बताया कि उस ने अभिनय से शादी कर ली है और अब वह उसी के यहां रहेगी तो कुंवरपाल सपना को समझाने लगा कि उस के इस कदम से उस की कालोनी और समाज में बड़ी बदनामी होगी, इसलिए वह वापस आ जाए.

लेकिन जब सपना ने साफसाफ कह दिया कि अब वह किसी भी सूरत में अभिनय को छोड़ कर नहीं आ सकती तो खीझ कर कुंवरपाल ने फोन काट दिया. इस के बाद पतिपत्नी ने प्रार्थना की जम कर पिटाई की. इस तरह सपना की करनी की सजा प्रार्थना को भोगनी पड़ी.

अगले ही दिन कुंवरपाल ने अपने दोनों सालों नंदकिशोर तथा राधाकिशन को बुलाया और उन से पूछा कि अब क्या किया जाए? एक बार उन के मन में आया कि क्यों न वे अभिनय को मार दें. लेकिन जब इस बात पर उन्होंने गहराई से विचार किया तो उन्हें लगा कि इस मामले में अभिनय की क्या गलती है, भाग कर शादी तो सपना ने की है, इसलिए जो सजा दी जाए, उसे दी जाए. इस तरह सपना घर वालों की आंखों का कांटा बन गई.

कुंवरपाल अकसर फोन कर के सपना को समझाता और धमकी देता रहता था कि उस ने जो किया है, वह ठीक नहीं किया है, वह वापस आ जाए, इसी में उस की भलाई है. अगर उस ने उस का कहना नहीं माना तो वह उसे छोड़ेगा नहीं, भले ही उसे पूरी उम्र जेल में बितानी पड़े. इस तरह सिर नीचा कर के जीने से तो अच्छा है, वह पूरी जिंदगी जेल में ही काट दे.

अभिनय के घर वालों ने सपना को बहू के रूप में स्वीकार तो कर लिया था, लेकिन अभिनय के पिता शिशुपाल सिंह जादौन के मन में एक कसक थी कि वह अपने बेटे की शादी धूमधाम से नहीं कर सके. इसलिए वह चाहते थे कि सपना के घर वाले उस की शादी धूमधाम से कर दें. सपना जानती थी कि उस का बाप ऐसा कतई नहीं करेगा, इसलिए उस ने ससुर से कह दिया कि ऐसा होना नामुमकिन है.

शिशुपाल सिंह को लगा कि बेटे की शादी धूमधाम से नहीं हो सकती तो वह अपने घर इस शादी की दावत कर के अपने परिचितों और रिश्तेदारों को बता दें कि उन के बेटे ने प्रेम विवाह कर लिया है. वह दावत की तैयारी कर रहे थे कि एक दिन कुंवरपाल पत्नी उर्मिला और साली के साथ उन के घर आ पहुंचा.

कुंवरपाल और उस की पत्नी ने सपना और उस की ससुराल वालों से कहा कि जो हो गया, सो हो गया. अब वे अपनी बेटी की शादी सामाजिक रीतिरिवाज के अनुसार धूमधाम से करना चाहते हैं. इसलिए शादी की तारीख तय कर के वे सपना को अपने साथ ले जाना चाहते हैं.

सपना मांबाप के साथ घर जाना तो नहीं चाहती थी. लेकिन अभिनय और उस के ससुर शिशुपाल सिंह ने समझाबुझा कर उसे कुंवरपाल के साथ भेज दिया.

आखिर वही हुआ, जिस बात का सपना को डर था. घर आने के बाद कुंवरपाल सपना को इस बात के लिए राजी करने लगा कि उस ने एटा के जिस लड़के के साथ उस की शादी तय की है, वह उस के साथ शादी कर ले. सपना इस के लिए तैयार नहीं थी. उस का कहना था कि एक बार उस ने अभिनय से शादी कर ली है तो वह अब किसी दूसरे से शादी क्यों करे.

25 जुलाई की शाम को भी कुंवरपाल ने सपना से एटा वाले लड़के से शादी करने की बात कही. लेकिन सपना ने साफ मना कर दिया. इस के बाद रात का खाना खा कर जब घर के सभी लोग सो गए तो कुंवरपाल दबे पांव सपना के कमरे में पहुंचा. अंदर से सिटकनी बंद कर के उस ने एक बार फिर सपना को शादी के लिए मनाना चाहा. लेकिन सपना नहीं मानी तो वह उसे मनाने के लिए करंट लगाने लगा. इसी करंट लगाने में सपना बेहोश हो गई.

सपना का इस तरह बेहोश हो जाना कुंवरपाल को खतरे की घंटी लगा. उस ने सोचा कि अब इस का जिंदा रहना ठीक नहीं है, इसलिए उस ने उस की गर्दन और हाथ पर तार लपेट कर प्लग में लगा दिया, जिस से सपना तड़पतड़प कर मर गई.

सपना को मौत के घाट उतार कर कुंवरपाल ने यह बात पत्नी उर्मिला को बताई तो वह सन्न रह गई. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उस का पति इतना घिनौना काम भी कर सकता है. कुंवरपाल ने गुस्से में सपना को मार तो डाला, लेकिन अब उसे अपने किए पर पछतावा हो रहा था. अब उसे जेल जाने का भी डर सताने लगा था. उस समय रात के 2 बज रहे थे.

पुलिस से बचने के लिए उस ने अन्य बच्चों को जगाया और उन्हें घर से बाहर कर के सपना के मोबाइल फोन का स्विच औफ कर दिया. उन्होंने बच्चों को इस बात की जानकारी नहीं होने दी कि सपना के साथ क्या हुआ है. घर में बाहर से ताला लगा कर कुंवरपाल पत्नी और अन्य बच्चों के साथ फरार हो गया.

पूछताछ के बाद उत्तर कोतवाली पुलिस ने अपनी ही बेटी की हत्या के आरोप में कुंवरपाल सिंह यादव को जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक बाकी कोई गिरफ्तार नहीं हुआ था. पुलिस उन की तलाश कर रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित