सपना का अधूरा सपना – भाग 2

सपना के परिवार में पिता कुंवरपाल सिंह यादव, मां उर्मिला यादव, 3 बहनें प्रार्थना, मधु और भावना के अलावा 1 छोटा भाई आशीष था. कुंवरपाल का दूध का अच्छाखासा व्यवसाय था. फिरोजाबाद के ही थाना सिरसागंज के गांव सिकरामऊ में उस की खेती की काफी जमीन भी थी. फिरोजाबाद के सुदामानगर की जिस नवनिर्मित कालोनी में कुंवरपाल रहता था, उस में उस की गिनती संपन्न लोगों में होती थी. उस का काफी बड़ा मकान भी था.

कुंवरपाल को राजनीति से लगाव था, इसलिए उस ने तमाम नेताओं से संबंध बना रखे थे. संबंध की ही वजह से उस के यहां तमाम नेताओं का आनाजाना लगा रहता था. सिरसागंज के विधायक से तो कुंवरपाल की दांत काटी दोस्ती थी. कुंवरपाल के 2 साले थे. दोनों ही एक राजनीतिक दल में पदाधिकारी थे. उन का अपने क्षेत्र में खासा रुतबा था. इस का असर उन की बहन यानी कुंवरपाल की पत्नी उर्मिला पर भी था. रौबरुतबे की ही वजह से पतिपत्नी कालोनी में किसी को कुछ नहीं समझते थे. वे जल्दी से किसी से बात भी नहीं करते थे.

सपना ने घर के नजदीक ही स्थित लिटिल ऐंजल्स कान्वेंट स्कूल से इंटर करने के बाद एम.जी. कालेज से ग्रैजुएशन किया. इस के बाद वह कोई प्रोफेशनल कोर्स करना चाहती थी. थोड़ी कोशिश के बाद उस का बीएड में हो गया, जिस के लिए उस ने दाऊदयाल महिला महाविद्यालय में दाखिला ले लिया.

सपना जिन दिनों हाईस्कूल में पढ़ रही थी, उन्हीं दिनों उस की मुलाकात अभिनय राणा से हुई थी. अभिनय सुदामानगर से 2 किलोमीटर दूर स्थित लोहियानगर में रहता था. उस के परिवार में पिता शिशुपाल सिंह जादौन, मां प्रेमा देवी जादौन और एक बड़ा भाई अभिषेक जादौन था. पिता उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही थे. जादौन परिवार के पास काफी पुश्तैनी प्रौपर्टी थी, इसलिए इस परिवार का रहनसहन रईसों जैसा  था. उन दिनों वह बारहवीं में पढ़ रहा था.

एक दिन सपना स्कूटी से कोचिंग से घर जा रही थी, तभी एक बाइक सवार की टक्कर से गिर पड़ी. बाइक सवार तो भाग गया, लेकिन डिवाइडर से टकराने की वजह से सपना के पैर से खून बहने लगा. पीछे से आ रहे अभिनय ने उसे उठाया और मरहमपट्टी करा कर उसे उस के घर पहुंचाया. अभिनय का यह सेवाभाव सपना के दिल को छू गया. उस की छवि उस के दिल में एक अच्छे युवक की बन गई.

सपना जिस कोचिंग में पढ़ती थी, उसी में अभिनय भी पढ़ता था. अभिनय की गिनती कोचिंग इंस्टीट्यूट में अच्छे लड़कों में होती थी. ऐसी ही बातों से वह सपना के दिल की धड़कन बन गया. आमनेसामने पड़ने पर दोनों एकदूसरे को देख कर मुसकरा देते थे. कभीकभार बातचीत भी हो जाती थी. किसी दिन दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए तो दोनों के बीच लंबीलंबी बातें होतेहोते प्यार का भी सिलसिला शुरू हो गया.

दोनों में प्यार गहराया तो वे एकदूसरे की पसंद का खयाल रखने लगे. इस तरह प्यार की नाव पर सवार हुए उन्हें एकएक कर के 5 साल बीत गए. इस बीच सपना ने ग्रैजुएशन कर लिया तो अभिनय बीएसपी कर के ठेकेदारी करने लगा. इस समय वह फिरोजाबाद का एक बड़ा शराब व्यवसाई माना जाता है. शहर और कस्बों में उस की अंग्रेजी शराब और देशी शराब की तमाम दुकानें हैं. उस के कई बार भी हैं. अभिनय भले ही शराब का बड़ा कारोबारी बन चुका था, लेकिन सपना के प्रति उस का प्यार वैसा ही था.

सपना ने ग्रैजुएशन कर के बीएड में दाखिला ले लिया था. 5 सालों से उस का जो प्यार चोरीछिपे चल रहा था, अब तक कई लोगों की नजरों में आ चुका था. वे कुंवरपाल के परिचित थे, इसलिए यह बात उस तक पहुंच गई. जानकारी होने पर कुंवरपाल ने सपना को बुला कर अभिनय और उस से प्यार के बारे में पूछा तो उस ने इस बात को इसलिए नहीं छिपाया, क्योंकि अभिनय हर तरह से कुंवरपाल का दामाद बनने लायक था.

लेकिन जब कुंवरपाल को पता चला कि सपना का प्रेमी ठाकुर है तो वह बौखला उठा. उस ने चीखते हुए कहा, ‘‘यादवों ने चूड़ी पहन रखी है क्या, जो ठाकुर का लौंडा उन की लड़कियों के साथ गुलछर्रे उड़ाएगा.’’

बाप के गुस्से को देख कर सपना की समझ में आ गया कि उस का बाप ऊंची जाति से भी उतनी ही नफरत करता है, जितनी नीची जाति वालों से. कुंवरपाल ने उस से साफसाफ कह दिया कि आज से ही वह उस लड़के से सारे संबंध खत्म कर ले. अगर उस के साथ कहीं दिखाई दे गई तो वह उसे काट कर रख देगा.

कुंवरपाल ने भले ही अपना आदेश सुना दिया था, लेकिन सपना को अभिनय के बिना अपनी दुनिया अंधकारमय नजर आ रही थी. इसलिए उस ने भी तय कर लिया कि कुछ भी हो जाए, वह अभिनय का साथ किसी भी हालत में नहीं छोड़ेगी. इसलिए उस ने तुरंत फोन कर के सारी बातें अभिनय को बता दीं. अभिनय ने उस का हौसला बढ़ाते हुए कहा, ‘‘चिंता करने की कोई बात नहीं है. हम दोनों ही बालिग हैं, इसलिए अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने में सक्षम हैं.’’

प्रेमी की इस बात से सपना को काफी सुकून मिला. लेकिन अब उस के घर से अकेली निकलने पर पाबंदी लगा दी गई. इसी के साथ कुंवरपाल ने उस की शादी के लिए लड़के की तलाश भी जोरशोर से शुरू कर दी. वह बीएड की पढ़ाई पूरी होते ही सपना की शादी कर देना चाहता था.

इधर कुंवरपाल सपना की शादी के लिए लड़का ढूंढ रहा था, उधर उस ने अभिनय से शादी करने का फैसला कर लिया था. यह अप्रैल, 2014 की बात है.

दरअसल, सपना मौका निकाल कर अभिनय से बातें तो कर ही लेती थी, कभीकभार घर वालों की चोरी से मिल भी लेती थी. कुंवरपाल को संदेह था कि बेटी कोई भी उल्टासीधा कदम उठा सकती है, इसलिए उस ने रजिस्ट्रार औफिस के कर्मचारियों से सांठगांठ कर ली थी कि अगर सपना वहां विवाह के लिए आवेदन करती है तो तुरंत उसे इस बात की जानकारी दे दी जाए.

सपना के घर से निकलने पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई, जिस से उस का बीएड भी पूरा नहीं हो सका. उस का फोन भी छीन लिया गया था. ऐसे में सपना का साथ उस की छोटी बहन प्रार्थना ने दिया. बहन की भावनाओं का खयाल रखते हुए वह कभीकभार अपने फोन से उस की बात अभिनय से करा देती थी.

29 मई, 2014 को प्रार्थना की मदद से सपना घर से बाहर निकली और वहां पहुंच गई, जहां अभिनय 2-3 महिलाओं और 4-5 पुरुषों के साथ उस का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. उस ने फिरोजाबाद के ही उलाऊखेड़ा प्रांगण में बने आर्यसमाज मंदिर में विधिविधान से विवाह करने की व्यवस्था पहले से ही कर रखी थी, इसलिए सपना को साथ ले कर वह सीधे वहीं पहुंच गया.

सपना का अधूरा सपना – भाग 1

फिरोजाबाद की नवनिर्मित कालोनी सुदामानगर के रहने वाले कुंवरपाल सिंह यादव के जानवरों के लगातार रंभाने  से पड़ोसियों का ध्यान उन की ओर गया. इस की वजह यह थी कि वे इस तरह रंभा रहे थे, जैसे उन्हें कई दिनों से चारापानी न मिला हो. उन के रंभाने से परेशान हो कर पड़ोसी कुंवरपाल के घर गए तो पता चला कि घर में बाहर से ताला बंद है.

कुंवरपाल का इस तरह ताला बंद कर के घर छोड़ कर जाना हैरान करने वाला था. क्योंकि उन्होंने तमाम गाएं और भैंसें पाल रखी थीं, इसलिए उन्हें छोड़ कर वह पूरे परिवार के साथ कहीं नहीं जा सकते थे. लोगों को किसी अनहोनी की आशंका हुई तो कालोनी के 2 लड़के कुंवरपाल के बगल वाले घर की सीढि़यों से चढ़ कर छत के रास्ते उन के घर जा पहुंचे.

नीचे कमरे में उन्होंने जो देखा, उन की चीख निकल गई. एक कमरे में पड़े तखत पर एक लाश पड़ी थी. लड़कों ने उसे पहचान लिया, वह कुंवरपाल की बड़ी बेटी सपना की लाश थी. उस के दोनों हाथों में नंगा तार बंधा था, जिस का दूसरा छोर स्विच बोर्ड के पास नीचे फर्श पर पड़ा था. देखने से ही लग रहा था कि उसे करंट लगा कर मारा गया था.

उन लड़कों के चीखने से बाहर खड़े लोग समझ गए कि अंदर कोई अनहोनी घटी है. जब लड़कों ने बाहर आ कर पूरी बात बताई तो उन्हें थोड़ा राहत महसूस हुई कि घर के बाकी लोग जहां भी हैं, सुरक्षित हैं. फिर भी लोगों के मन में आशंका तो थी ही, इसलिए तरहतरह की बातें होने लगीं.

जिस ने भी कुंवरपाल की बेटी सपना की हत्या के बारे में सुना, उस के घर की ओर भागा. यह इलाका फिरोजाबाद की उत्तर कोतवाली के अंतर्गत आता था, इसलिए सूचना पा कर कोतवाली प्रभारी शशिकांत शर्मा एसएसआई के.पी. सिंह, एसआई अर्जुनलाल वर्मा, सिपाही धर्मेंद्र सिंह, श्यामसुंदर और उमेशचंद को साथ ले कर कुंवरपाल के घर आ पहुचे.

कोतवाली प्रभारी शशिकांत शर्मा ताला तोड़वा कर कुछ लोगों के साथ घर के अंदर पहुंचे तो तखत पर पड़ी लाश देख कर हैरान रह गए. क्योंकि लाश देख कर ही लग रहा था कि लड़की की हत्या करंट लगा कर बड़ी बेरहमी से की गई थी. उन्होंने फोटोग्राफर बुला कर घटनास्थल की और लाश की फोटोग्राफी कराई. इस के बाद लाश का बारीकी से निरीक्षण शुरू किया. मृतका की गर्दन पर करंट लगाने के निशान साफ नजर आ रहे थे. दाएं हाथ की अंगुली में तो करंट लगाने से छेद हो गया था.

मामला हत्या का था, इसलिए कोतवाली प्रभारी शशिकांत शर्मा ने घटना की जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दे दी. घर के अन्य लोग गायब थे, इसलिए पुलिस को संदेह हो रहा था कि कहीं इस हत्या में घर वालों का ही हाथ तो नहीं है. क्योंकि ऐसा कहीं से नहीं लग रहा था कि मृतका के घर में अकेली होने पर बाहर के लोगों ने आ कर उस की हत्या की हो. क्योंकि वहां न तो लूटपाट का कोई निशान था, न दुष्कर्म का. पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर कुंवरपाल के मकान को सील कर दिया. यह 26 जुलाई, 2014 की घटना थी.

उसी दिन शाम 5 बजे के आसपास फिरोजाबाद के ही लोहियानगर का रहने वाला अभिनय राणा जिलाधिकारी विजय करन आनंद के आवास पर अपने कुछ साथियों के साथ पहुंचा. जिलाधिकारी से मिल कर उस ने बताया कि सुदामानगर में जिस लड़की की हत्या हुई है, वह उस की पत्नी सपना थी. उस की हत्या उस के पिता कुंवरपाल यादव ने पत्नी उर्मिला यादव तथा 2 सालों नंदकिशोर और राधाकिशन के साथ मिल कर की थी.

अभिनय राणा ने सपना को पत्नी बताया ही नहीं था, बल्कि पत्नी होने के तमाम सुबूत भी जिलाधिकारी को दिए थे. सुबूत देख कर जिलाधिकारी को समझते देर नहीं लगी कि यह औनर किलिंग का मामला है. उन्होंने तुरंत अभिनय राणा की तहरीर पर कोतवाली प्रभारी शशिकांत शर्मा को सपना की हत्या का मुकदमा दर्ज करने का आदेश कर दिया था.

अभिनय राणा जिलाधिकारी आवास से सीधे उत्तर कोतवाली पहुंचा और जिलाधिकारी के आदेश वाली तहरीर तथा सारे सुबूत कोतवाली प्रभारी शशिकांत शर्मा के सामने रख दिए तो उस तहरीर और सुबूतों के आधार पर उन्होंने अभिनय राणा की पत्नी सपना की हत्या का मुकदमा उस के पिता कुंवरपाल सिंह यादव, मां उर्मिला यादव तथा दोनों मामाओं, नंदकिशोर और राधाकिशन के नाम दर्ज करा कर मामले की जांच की जिम्मेदारी खुद संभाल ली.

नामजद मुकदमा दर्ज होते ही अभियुक्तों की तलाश में कोतवाली प्रभारी शशिकांत शर्मा ने अपनी टीम के साथ लगभग दर्जन भर जगहों पर छापे मारे, लेकिन एक भी अभियुक्त उन के हाथ नहीं लगा. वह मुखबिरों के साथसाथ सर्विलांस की भी मदद ले रहे थे. लेकिन सभी अभियुक्तों के मोबाइल बंद थे, इसलिए उन्हें सर्विलांस का कोई फायदा नहीं मिल रहा था.

घटना से पूरे 15 दिनों बाद रक्षाबंधन के अगले दिन यानी 11 अगस्त को किसी मुखबिर से शशिकांत शर्मा को कुंवरपाल के बारे में पता चल गया कि वह कहां छिपा है. फिर क्या था, शशिकांत शर्मा ने अपने सहयोगियों एसएसआई के.पी. सिंह, एसआई अर्जुनलाल वर्मा, सिपाही धर्मेंद्र सिंह, उमेशचंद और श्यामसुंदर के साथ रात 2 बजे छापा मार कर कुंवरपाल सिंह यादव को गिरफ्तार कर लिया.

कुंवरपाल राजनीतिक पहुंच वाला आदमी था. उस ने अपनी इस पहुंच के बल पर पुलिस पर दबाव बनाने की कोशिश भी की, लेकिन उस की एक नहीं चली. उस ने जिसे भी फोन किया, उस ने उस समय किसी भी तरह की मदद करने से मना कर दिया. इस तरह उस की गिरफ्तारी के बाद उस की जानपहचान का कोई भी नेता उस के काम नहीं आया.

थाने ला कर कुंवरपाल से पूछताछ शुरू हुई. जाहिर सी बात है, कोई भी जल्दी से यह नहीं स्वीकार करता कि उस ने अपराध किया है. कुंवरपाल भी झूठ बोलता रहा. लेकिन पुलिस के पास उस के हत्यारे होने के तमाम सुबूत थे. इसलिए उन्हीं सुबूतों के बल पर पुलिस ने उस से स्वीकार करा लिया कि सपना की हत्या उसी ने की थी.

इस के बाद कुंवरपाल ने सपना की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह कंपा देने वाली थी. उस के द्वारा सुनाई गई कहानी और अभिनय राणा द्वारा सुनाई गई कहानी को मिला कर सपना की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस तरह थी.

उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद की नवनिर्मित कालोनी सुदामानगर के रहने वाले कुंवरपाल सिंह यादव की बड़ी बेटी सपना के जवानी में कदम रखते ही वह नौजवानों का सपना बन गई थी. उस की उम्र का वह हर नौजवान उस का सपना देखने लगा था, जिस ने उसे एक बार देख लिया था.

लेकिन हर किसी का सपना कहां पूरा होता है. पूरा होता भी कैसे, सपना अकेली थी, जबकि उस का सपना देखने वाले तमाम नौजवान थे. जवान और खूबसूरत सपना यादव जल्दी ही सहपाठियों की ही नहीं, कालेज के तमाम नौजवानों के दिल की धड़कन बन चुकी थी.

यही नहीं, कालोनी और जिस रास्ते से वह आतीजाती थी, उस रास्ते के भी तमाम नौजवान उसे हसरतभरी नजरों से ताकते थे. उसे देखने वाला हर नौजवान उस की नजदीकी के लिए बेताब रहने लगा था. सपना का सपना देखने वाले भले ही तमाम लोग थे, लेकिन उन में से कोई भी सपना का सपना नहीं था. उस का सपना तो कोई और ही था.

प्यार का ऐसा भयानक अंजाम

नींद न आने की वजह से सुशीला बेचैनी से करवट बदल रही थी. जिंदगी ने उसे एक ऐसे मुकाम पर ला खड़ा किया था, जहां वह पति प्रदीप से जुदा हो सकती थी. चाहत हर किसी की कमजोरी होती है और जब कोई इंसान किसी की कमजोरी बन जाता है तो वह उस से बिछुड़ने के खयाल से ही बेचैन हो उठता है. सुशीला और प्रदीप का भी यही हाल था.

प्रदीप उसे कई बार समझा चुका था, फिर भी सुशीला उस के खयालों में डूबी रातरात भर बेचैनी से करवट बदलती रहती थी. उस रात भी कुछ वैसा ही था. रात में नींद न आने की वजह से सुबह भी सुशीला के चेहरे पर बेचैनी और चिंता साफ झलक रही थी. उसे परेशान देख कर प्रदीप ने उसे पास बैठाया तो उस ने उसे हसरत भरी निगाहों से देखा. उस की आंखों में उसे बेपनाह प्यार का सागर लहराता नजर आया.

कुछ कहने के लिए सुशीला के होंठ हिले जरूर, लेकिन जुबान ने साथ नहीं दिया तो उस की आंखों में आंसू उमड़ आए. प्रदीप ने गालों पर आए आंसुओं को हथेली से पोंछते हुए कहा, ‘‘सुशीला, तुम इतनी कमजोर नहीं हो, जो इस तरह आंसू बहाओ. हम ने कसम खाई थी कि हर पल खुशी से बिताएंगे और एकदूसरे का साथ नहीं छोड़ेंगे.’’

‘‘साथ ही छूटने का तो डर लग रहा है मुझे.’’ सुशीला ने झिझकते हुए कहा.

‘‘सच्चा प्यार करने वालों की खुशियां कभी अधूरी नहीं होतीं सुशीला.’’

‘‘मैं तुम्हारे बिना जिंदा नहीं रह सकती प्रदीप. तुम मेरी जिंदगी हो. यह जिस्म मेरा है, दिल मेरा है, लेकिन मेरे दिल की हर धड़कन तुम्हारी नजदीकियों की मोहताज है.’’

सुशीला के इतना कहते ही प्रदीप तड़प उठा. अपनी हथेली उस के होंठों पर रख कर उस ने कहा, ‘‘मुझे कुछ नहीं होगा सुशीला. मैं तुम्हें सारे जहां की खुशियां दूंगा. तुम्हारे चेहरे पर उदासी नहीं, सिर्फ खुशी अच्छी लगती है, इसलिए तुम खुश रहा करो. इस फूल से खिलते चेहरे ने मुझे हमेशा हिम्मत दी है, वरना हम कब के हार चुके होते.’’

‘‘मैं ने सुना है कि मेरे घर वालों ने धमकी दी है कि वे हमें जिंदा नहीं छोड़ेंगे?’’ सुशीला ने चिंतित हो कर पूछा.

‘‘अब तक कुछ नहीं हुआ तो आगे भी कुछ नहीं होगा, इसलिए तुम बेफिक्र रहो. अब तो हमारे प्यार की एक और निशानी जल्द ही दुनिया में आ जाएगी. हम हमेशा इसी तरह खुशी से रहेंगे.’’ प्रदीप ने कहा.

पति के कहने पर सुशीला ने बुरे खयालों को दिल से निकाल दिया. नवंबर के पहले सप्ताह की बात थी यह. अगर सुशीला ने प्रदीप से प्यार न किया होता तो उसे यह डर कभी न सताता. प्यार के शिखर पर पहुंच कर दोनों खुश थे. यह बात अलग थी कि इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने काफी विरोध का सामना किया था.

उन्होंने ऐसी जगह प्यार का तराना गुनगुनाया था, जहां कभी सामाजिक व्यवस्था तो कभी गोत्र तो कभी झूठी शान के लिए प्यार को गुनाह मान कर अपने ही खून के प्यासे बन जाते हैं.

प्रदीप हरियाणा के सोनीपत जिले के खरखौदा कस्बे के बरोणा मार्ग निवासी धानक समाज के सुरेश का बेटा था. वह मूलरूप से झज्जर जिले के जसौर खेड़ी के रहने वाले थे, लेकिन करीब 17 साल पहले आ कर यहां बस गए थे. उन के परिवार में पत्नी सुनीता के अलावा 2 बेटे एवं एक बेटी थी. बच्चों में प्रदीप बड़ा था. सुरेश खेती से अपने इस परिवार को पाल रहे थे.

3 साल पहले की बात है. प्रदीप जिस कालेज में पढ़ता था, वहीं उस की मुलाकात नजदीक के गांव बिरधाना की रहने वाली सुशीला से हुई. सुशीला जाट बिरादरी के किसान ओमप्रकाश की बेटी थी. दोनों की नजरें चार हुईं तो वे एकदूसरे को देखते रह गए. इस के बाद जब भी सुशीला राह चलती मिल जाती, प्रदीप उसे हसरत भरी निगाहों से देखता रह जाता.

सुशीला खूबसूरत थी. उम्र के नाजुक पायदान पर कदम रख कर उस का दिल कब धड़कना सीख गया था, इस का उसे खुद भी पता नहीं चल पाया था. वह हसीन ख्वाबों की दुनिया में जीने लगी थी. प्रदीप उस के दिल में दस्तक दे चुका था.

सुशीला समझ गई थी कि खुद उसी के दिल की तरह प्रदीप के दिल में भी कुछ पनप रहा है. दोनों के बीच थोड़ी बातचीत से जानपहचान भी हो गई थी. यह अलग बात थी कि प्रदीप ने कभी उस पर कुछ जाहिर नहीं किया था. वक्त के साथ आंखों से शुरू हुआ प्यार उन के दिलों में चाहत के फूल खिलाने लगा था.

एक दिन सुशीला बाजार गई थी. वह पैदल ही चली जा रही थी, तभी उसे अपने पीछे प्रदीप आता दिखाई दिया. उसे आता देख कर उस का दिल तेजी से धड़कने लगा. वह थोड़ा तेज चलने लगी. प्रदीप के आने का मकसद चाहे जो भी रहा हो, लेकिन सामाजिक लिहाज से यह ठीक नहीं था.

प्रदीप ने जब सुशीला का पीछा करना काफी दूरी तक नहीं छोड़ा तो वह रुक गई. उसे रुकता देख कर प्रदीप हिचकिचाया जरूर, लेकिन वह उस के निकट पहुंच गया. सुशीला ने नजरें झुका कर शोखी से पूछा, ‘‘मेरा पीछा क्यों कर रहे हो?’’

‘‘तुम्हें ऐसा क्यों लग रहा है?’’ प्रदीप ने सवाल के जवाब में सवाल ही कर दिया.

‘‘इतनी देर से पीछा कर रहे हो, इस में लगने जैसा क्या है.’’

‘‘तुम से बातें करने का दिल हो रहा था मेरा.’’ प्रदीप ने कहा.

‘‘इस तरह मेरे पीछे मत आओ, किसी ने देख लिया तो…’’ सुशीला ने कहा.

प्रदीप उस दिन जैसे ठान कर आया था, इसलिए इधरउधर नजरें दौड़ा कर उस ने कहा, ‘‘अगर किसी से 2 बातें करने की तड़प दिल में हो तो रहा नहीं जाता सुशीला. तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. तुम पहली लड़की हो, जिसे मैं प्यार करने लगा हूं.’’

सुशीला ने उस की बातों का जवाब नहीं दिया और मुसकरा कर आगे बढ़ गई. हालांकि प्रदीप की बातों से वह मन ही मन खुश हुई थी. वह भी प्रदीप को चाहने लगी थी. उस रात दोनों की ही आंखों से नींद गायब हो गई थी.

इस के बाद उन की मुलाकात हुई तो सुशीला प्रदीप को देख कर नजरों में ही इस तरह मुसकराई, जैसे दिल का हाल कह दिया हो. इस तरह प्यार का इजहार होते ही उन के बीच बातों और मुलाकातों का सिलसिला चल निकला. प्यार के पौधे को रोपने में भले ही वक्त लगता है, लेकिन वह बढ़ता बहुत तेजी से है.

यह जानते हुए भी कि दोनों की जाति अलगअलग हैं, वे प्यार के डगर पर चल निकले. सुशीला प्रदीप के साथ घूमनेफिरने लगी. प्यार अगर दिल की गहराइयों से किया जाए तो वह कोई बड़ा गुला खिलाता है. दोनों का यह प्यार वक्ती नहीं था, इसलिए उन्होंने साथ जीनेमरने की कसमें भी खाईं.

समाज प्यार करने वालों के खिलाफ होता है, यह सोच कर उन के दिलों में निराशा जरूर काबिज हो जाती थी. यही सोच कर एक दिन मुलाकात के क्षणों में सुशीला प्रदीप से कहने लगी, ‘‘मैं हमेशा के लिए तुम्हारी होना चाहती हूं प्रदीप, लेकिन शायद ऐसा न हो पाए.’’

‘‘क्यों?’’ कड़वी हकीकत को जानते हुए भी प्रदीप ने अंजान बन कर पूछा.

‘‘मेरे घर वाले शायद कभी तैयार नहीं होंगे.’’

‘‘बस, तुम कभी मेरा साथ मत छोड़ना, मैं तुम्हारे लिए हर मुश्किल पार करने को तैयार हूं.’’

‘‘यह साथ तो अब मरने के बाद ही छूटेगा.’’ सुशीला ने प्रदीप से वादा किया.

प्यार उस शय का नाम है, जो कभी छिपाए नहीं छिपता. सुशीला के घर वालों को जब बेटी के प्यार के बारे में पता चला तो घर में भूचाल आ गया. ओमप्रकाश के पैरों तले से यह सुन कर जमीन खिसक गई कि उन की बेटी किसी अन्य जाति के लड़के से प्यार करती है. उन्होंने सुशीला को आड़े हाथों लिया और डांटाफटकारा, साथ ही उस की पिटाई भी की. उन्होंने जमाना देखा था, इसलिए उस पर पहरा लगा दिया.

शायद उन्हें पता नहीं था कि सुशीला का प्यार हद से गुजर चुका है. इस से पहले कि कोई ऊंचनीच हो, ओमप्रकाश ने उस के लिए लड़के की तलाश शुरू कर दी. सुशीला ने दबी जुबान से मना किया कि वह शादी नहीं करना चाहती, लेकिन उस की किसी ने नहीं सुनी.

प्यार करने वालों पर जितने अधिक पहरे लगाए जाते हैं, उन की चाहत का सागर उतना ही उफनता है. सुशीला के साथ भी ऐसा ही हुआ. एक दिन किसी तरह मौका मिला तो उस ने प्रदीप को फोन किया. उस से संपर्क न हो पाने के कारण वह भी परेशान था.

फोन मिलने पर सुशीला ने डूबे दिल से कहा, ‘‘मेरे घर वालों को हमारे प्यार का पता चल गया है प्रदीप. अब शायद मैं तुम से कभी न मिल पाऊं. वे मेरे लिए रिश्ता तलाश रहे हैं.’’

यह सुन कर प्रदीप सकते में आ गया. उस ने कहा, ‘‘ऐसा नहीं हो सकता सुशीला. तुम सिर्फ मेरा प्यार हो. तुम जानती हो, अगर ऐसा हुआ तो मैं जिंदा नहीं रहूंगा.’’

‘‘उस से पहले मैं खुद भी मर जाना चाहती हूं. प्रदीप जल्दी कुछ करो, वरना…’’ सुशीला ने कहा और रोने लगी.

प्रदीप ने उसे हौसला बंधाते हुए कहा, ‘‘मुझे सोचने का थोड़ा वक्त दो सुशीला. पहले मैं अपने घर वालों को मना लूं.’’

दोनों के कई दिन चिंता में बीते. प्रदीप ने अपने घर वालों को दिल का राज बता कर उन्हें सुशीला से विवाह के लिए मना लिया. जबकि सुशीला का परिवार इस रिश्ते के सख्त खिलाफ था. उन्होंने उस पर पहरा लगा दिया था. मारपीट के साथ उसे समझाने की भी कोशिश की गई थी, लेकिन वह प्रदीप से विवाह की जिद पर अड़ी थी.

सुशीला बगावत पर उतर आई थी, क्योंकि प्रदीप के बिना उसे जिंदगी अधूरी लग रही थी. कई दिनों की कलह के बाद भी जब वह नहीं मानी तो उसे घर वालों ने अपनी जिंदगी से बेदखल कर के उस के हाल पर छोड़ दिया.

प्रदीप ने भी सुशीला को समझाया, ‘‘प्यार करने वालों की राह आसान नहीं होती सुशीला. हम दोनों शादी कर लेंगे तो बाद में तुम्हारे घर वाले मान जाएंगे.’’

एक दिन सुशीला ने चुपके से अपना घर छोड़ दिया. पहले दोनों ने कोर्ट में, उस के बाद सादे समारोह में शादी कर के एकदूसरे को जीवनसाथी चुन लिया. इसी के साथ परिवार से सुशीला के रिश्ते खत्म हो गए.

सुशीला और प्रदीप ने प्यार की मंजिल पा ली थी. इस बीच प्रदीप ने एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली. एक साल बाद प्यार की निशानी के रूप में सुशीला ने बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम उन्होंने प्रिया रखा. वह 3 साल की हो चुकी थी. अब एक और खुशी उन के आंगन में आने वाली थी.

इतने दिन हो गए थे, फिर भी एक अंजाना सा डर सुशीला के दिल में समाया रहता था. इस की वजह थी उस के परिवार वाले. उन से उसे धमकियां मिलती रहती थीं. उस दिन भी सुशीला इसीलिए परेशान थी. सुशीला के घर वालों की नाराजगी बरकरार थी.

अपने रिश्ते को उन्होंने सुशीला से पूरी तरह खत्म कर लिया था. एक बार प्रदीप की होने के बाद सुशीला भी कभी अपने मायके नहीं गई थी. उसे मायके की याद तो आती थी, लेकिन मजबूरन अपने जज्बातों को दफन कर लेती थी. उस ने सोच लिया था कि वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा.

प्रदीप और सुशीला अपने घर में नए मेहमान के आने की खुशी से खुश थे, लेकिन जिंदगी में खुशियों का स्थाई ठिकाना हो, यह जरूरी नहीं है. कई बार खुशियां रूठ जाती हैं और वक्त ऐसे दर्दनाक जख्म दे जाता है, जिन का कोई मरहम नहीं होता. सुशीला और प्रदीप की भी खुशियां कितने दिनों की मेहमान थीं, इस बात को कोई नहीं जानता था.

18 नवंबर की रात की बात है. प्रदीप के घर के सभी लोग सो रहे थे. प्रदीप और सुशीला बेटी के साथ अपने कमरे में सो रहे थे, जबकि उस के मातापिता सुरेश और सुनीता, भाई सूरज अलग कमरे में सो रहे थे. बहन ललिता अपने ताऊ के घर गई थी. समूचे इलाके में खामोशी और सन्नाटा पसरा था. तभी किसी ने प्रदीप के दरवाजे पर दस्तक दी. प्रदीप ने दरवाजा खोला तो सामने कुछ हथियारबंद लोग खड़े थे.

प्रदीप कुछ समझ पाता, उस से पहले ही उन्होंने उस पर गोलियां चला दीं. गोलियां लगते ही प्रदीप जमीन पर गिर पड़ा. सुशीला बाहर आई तो उसे भी गोली मार दी गई. प्रदीप के पिता सुरेश और मां सुनीता के बाहर आते ही हमलावरों ने उन पर भी गोलियां चला दीं. सूरज की भी आंखें खुल गई थीं. खूनखराबा देख कर उस के होश उड़ गए. हमलावरों ने उसे भी नहीं बख्शा.

गोलियों की तड़तड़ाहट से वातावरण गूंज उठा था. आसपास के लोग इकट्ठा होते, उस के पहले ही हमलावर भाग गए थे. घटना की सूचना स्थानीय थाना खरखौदा को दी गई. थानाप्रभारी कर्मबीर सिंह पुलिस बल के साथ मौके पर आ पहुंचे. पुलिस आननफानन घायलों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले गई. तीनों की हालत गंभीर थी, लिहाजा प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें रोहतक के पीजीआई अस्पताल रेफर कर दिया गया.

उपचार के दौरान सुरेश, सुनीता और प्रदीप की मौत हो गई, जबकि डाक्टर सुशीला और सूरज की जान बचाने में जुट गए. सूरज के कंधे में गोली लगी थी और सुशीला की पीठ में. डाक्टरों ने औपरेशन कर के गोलियां निकालीं. सुरक्षा के लिहाज से अस्पताल में पुलिस तैनात कर दी गई थी. सुशीला गर्भ से थी. उस के शिशु की जान को भी खतरा हो सकता था.

डाक्टरों ने उस की सीजेरियन डिलीवरी की. उस ने स्वस्थ बेटे को जन्म दिया. डाक्टरों ने दोनों को खतरे से निकाल लिया था. पति और सासससुर की मौत ने उसे तोड़ कर रख दिया था. सुशीला बहुत दुखी थी. अचानक हुई घटना ने उस के जीवन में अंधेरा ला दिया था. वह दर्द और आंसुओं की लकीरों के बीच उलझ चुकी थी.

घायल सूरज ने पुलिस को जो बताया था, उसी के आधार पर अज्ञात हमलावरों के खिलाफ हत्या और हत्या के प्रयास का मुकदजा दर्ज किया गया. एसपी अश्विन शैणवी ने अविलंब आरोपियों की गिरफ्तारी के निर्देश दिए. 3 लोगों की हत्या से क्षेत्र में दहशत फैल गई थी.

अगले दिन एसपी अश्विन शैणवी और डीएसपी प्रदीप ने भी घटनास्थल का दौरा किया. उन के निर्देश पर पुलिस टीमों का गठन किया गया. एसआईटी इंचार्ज राज सिंह को भी टीम में शामिल किया गया. पुलिस ने जांच शुरू की तो सुशीला और प्रदीप के प्रेम विवाह की बात सामने आई.

पुलिस ने सुशीला से पूछताछ की, लेकिन वह सही से बात करने की स्थिति में नहीं थी. फिर भी उस ने हमले का शक मायके वालों पर जताया. मामला औनर किलिंग का लगा. पुलिस ने सुशीला के पिता के घर दबिश दी तो वह और उन के बेटे सोनू एवं मोनू फरार मिले.

इस से पुलिस को विश्वास हो गया कि हत्याकांड को इन्हीं लोगों के इशारे पर अंजाम दिया गया था. पुलिस के हाथ सुराग लग गया कि खूनी खेल खेलने वाले कोई और नहीं, बल्कि सुशीला के घर वाले ही थे. पुलिस सुशीला के पिता और उस के बेटों की तलाश में जुट गई.

उन की तलाश में झज्जर, बेरी, दादरी, रिवाड़ी और बहादुरगढ़ में दबिशें दी गईं. पुलिस ने उन के मोबाइल नंबर हासिल कर के जांच शुरू कर दी. 22 नवंबर को पुलिस ने सुशीला के एक भाई सोनू को गिरफ्तार कर लिया. उस से पूछताछ की गई तो नफरत की जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इस प्रकार थी—

दरअसल, सुशीला के अपनी मरजी से अंतरजातीय विवाह करने से पूरा परिवार खून का घूंट पी कर रह गया था. सोनू और मोनू को बहन के बारे में सोच कर लगता था कि उस ने उन की शान के खिलाफ कदम उठाया है. उन्हें सब से ज्यादा इस बात की तकलीफ थी कि सुशीला ने एक पिछड़ी जाति के लड़के से शादी की थी.

उन के दिलों में आग सुलग रही थी. मोनू आपराधिक प्रवृत्ति का था. उस की बुआ का बेटा हरीश भी आपराधिक प्रवृत्ति का था. हरीश पर हत्या का मुकदमा चल रहा था और वह जेल में था. समय अपनी गति से बीत रहा था. समाज में भी उन्हें समयसमय पर ताने सुनने को मिल रहे थे. जब भी सुशीला का जिक्र आता, उन का खून खौल उठता था.

मोनू ने मन ही मन ठान लिया था कि वह अपनी बहन को उस के किए की सजा दे कर रहेगा. उस के इरादों से परिवार वाले भी अंजान नहीं थे. जुलाई में मोनू की बुआ का बेटा हरीश पैरोल पर जेल से बाहर आया तो वह मोनू का साथ देने को तैयार हो गया. मोनू लोगों के सामने धमकियां देता रहता था कि वह बहन को तो सजा देगा ही, प्रदीप से भी अपनी इज्जत का बदला ले कर रहेगा.

मोनू शातिर दिमाग था. वह योजनाबद्ध तरीके से वारदात को अंजाम देना चाहता था. उस ने छोटे भाई सोनू को सुशीला के घर भेजना शुरू कर दिया. इस के पीछे उस का मकसद यह जानना था कि वे लोग कहांकहां सोते हैं, कोई हथियार आदि तो नहीं रखते. इस बीच जबजब सुशीला को पता चलता कि मोनू प्रदीप और उस के घर वालों को मारने की धमकी दे रहा है, वह परेशान हो उठती थी.

मोनू का भाई सोनू और पिता भी इस खतरनाक योजना में शामिल थे. जब मोनू पहली प्लानिंग में कामयाब हो गया तो उस ने वारदात को अंजाम देने की ठान ली. हरीश के साथ मिल कर उस ने देशी हथियारों के साथ एक कार का इंतजाम किया. इस के बाद वह कार से अपने साथियों के साथ रात में सुशीला के घर जा पहुंचा और वारदात को अंजाम दे कर फरार हो गया.

एक दिन बाद पुलिस ने सुशीला के षडयंत्रकारी पिता ओमप्रकाश को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के बाद दोनों आरोपियों को पुलिस ने अदालत में पेश कर के न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. इस बीच खरखौदा थाने का चार्ज इंसपेक्टर प्रदीप के सुपुर्द कर दिया गया. वह मुख्य आरोपी मोनू की तलाश में जुटे हैं.

सुशीला ने सोचा भी नहीं था कि उसे प्यार करने की इतनी बड़ी सजा मिलेगी. ओमप्रकाश और उस के बेटे ने सुशीला के विवाह को अपनी झूठी शान से न जोड़ा होता तो शायद ऐसी नौबत न आती. सुशीला का सुहाग उजाड़ कर वे सलाखों के पीछे पहुंच गए हैं. कथा लिखे जाने तक आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी और पुलिस मोनू और उस के अन्य साथियों की सरगर्मी से तलाश कर रही थी.

मायके में मोहब्बत : भाई बना दुश्मन

मायके में मोहब्बत : भाई बना दुश्मन – भाग 3

लाखन भी गांव में ही रहता था, इसलिए उस का अंकुर और उस के चाचा का अकसर आमनासामना हो जाया करता था. यही नहीं, वह उन्हें देख कर अपनी मूंछों पर ताव भी दिया करता था. गांव में वैसे भी पहले से उन की बहुत बदनामी हो चुकी थी. लाखन की यह हरकत उन के गुस्से में आग में घी डालने का काम करती थी. जब यह उन के बरदाश्त से बाहर हो गया, तब अंकुर ने अपने चाचा और चचेरे भाई के साथ मिल कर लाखन को जिंदा नहीं रहने देने की सौगंध खा ली.

तीनों ने लखन को रास्ते से हटाने के लिए उस की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू कर दी. उस की दिनचर्या मालूम करने के बाद वारदात के दिन 5 अप्रैल, 2023 की शाम को उन्होंने देखा कि लाखन बस स्टैंड के पास राधेश्याम राठौर के मकान के सामने ट्रैक्टर ट्रौली से गेहूं खाली कर रहा है. उस के आसपास कोई और नहीं था. तीनों ने मौका देख कर उस पर हमला कर दिया. पुलिस को इस हत्याकांड का कोई भी चश्मदीद नहीं मिला था, जबकि हत्या की साजिश पहले ही बना ली गई होगी.

लाखन की हत्या जिस जगह पर हुई थी, उस के पास में ही आरोपी प्रेम सिंह की दूध डेयरी भी थी. पुलिस को पता चला कि शायद इसी दुकान पर बैठ कर हत्या की योजना बनाई गई होगी, क्योंकि दुकान में पहले से ही पिस्टल और सब्बल रखा हुआ था. लाखन को घेर कर यहीं से हथियार निकाले गए थे.

मिटा दिया बहन का सिंदूर

उस दिन लाखन गांव के राधेश्याम राठौर के खेत पर गेहूं निकाल रहा था. वह ट्रैक्टर ट्रौली में गेहूं ले कर धानोदा गांव के बस स्टैंड के पास स्थित राधेश्याम के घर के सामने पहुंचा ही था, तब शाम के लगभग साढ़े 7 बजे थे. लाखन ने ट्रौली से गेहूं खाली करना शुरू ही किए थे कि आरोपी अचानक से आ गए थे.

अंकुर दौड़ कर डेयरी से पिस्टल ले आया था. उस ने लाखन की ओर फायर किया था. गोली उस की कमर में लगी थी और लाखन ट्रौली के पास ही सटे खंभे के पास गिर गया था. इस के बाद एक आरोपी दौड़ा और डेयरी से सब्बल निकाल ले आया. फिर तीनों उस पर टूट पड़े थे. उन्होंने सब्बल और पत्थर से उस पर जानलेवा हमला कर दिया था. इस के बाद अंकुर ने फिर से उस पर गोली दाग दी.

लाखन पूरी तरह से निढाल जमीन पर गिर गया था. सब्बल चाचा के लडक़े के हाथ में था, जिसे छुड़ा कर अंकुर ने उस पर इतनी जोर से वार किया कि सब्बल गले के आरपार हो गया. उस दिन गांव में अनेक शादियां थीं. हत्याकांड के बाद काफी दहशत फैल गई. बैंडबाजे सब कुछ बजने बंद हो गए. पूरे गांव में सन्नाटा पसर गया. न कोई शादी में शामिल हुआ, न कोई दावत खाने गया. परिवार वालों ने ही जैसेतैसे रस्में निभाईं.

इस घटना से पहले लाखन के पिता बहादुर सिंह नीतू के परिवार से मिल रही धमकियों से बेहद डरे हुए थे. जिस के चलते वह घर के पास ही मंदिर में जा कर रहने लगे थे. लाखन उन का इकलौता बेटा था. उस की मौत से उन का बुरा हाल हो गया था. मां का भी रोरो कर बुरा हाल हो गया था.

हत्याकांड के बारे में लाखन की मां श्याम कुंवर ने बताया कि बेटे ने नीतू से लव मैरिज की थी, जो दोनों की पसंद की थी. फिर भी बहू नीतू के घर वाले बेटे को जान से मारने की धमकी दे रहे थे. नीतू प्रेग्नेंट थी. लाखन के जिम्मे ही मातापिता, पत्नी नीतू और बहन की जिम्मेदारी थी. लाखन की मौत के बाद 4 लोगों की जिंदगी पूरी तरह से बिखर गई. नीतू के नाराज भाइयों ने ही उस के पति की हत्या की थी. वह उस का पहला और आखिरी प्यार था.

नीतू ने बताया कि घर वालों ने उस की मरजी के खिलाफ उस की शादी राजेंद्र से कर दी थी. पति की शराब की लत से रिश्ता बिगड़ गया था. इस बीच इन 5 सालों में एक बेटा और एक बेटी का जन्म भी हुआ. कोरोना काल में पिता भगवान सिंह की मौत के बाद ससुराल वालों के तेवर बदल गए. वे आए दिन किसी न किसी बात पर विवाद करते थे. पति नशे में धुत हो कर छोटीछोटी बातों पर पीटता. जब बात बरदाश्त से बाहर हो गई तो दोनों बच्चों को रावतपुरा गांव छोड़ कर मायके धानोदा आ गई थी.

लाखन की बहन ने भी नीतू के भाइयों पर हत्या का आरोप लगाया. उस ने भी बताया कि भाभी के घरवालों को यह शादी अपनी इज्जत पर दाग जैसी लग रही थी. उन्होंने इसी का बदला लिया.

माचलपुर एसएचओ जितेंद्र अजनारे के सामने मृतक लाखन की बहन सपना की तरफ से नामजद रिपोर्ट दर्ज कर ली. हत्या के तीनों आरोपियों से पूछताछ करने के बाद उन्हें कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में अंकुर परिवर्तित नाम है.

मायके में मोहब्बत : भाई बना दुश्मन – भाग 2

नीतू ने एक नजर से सहेली को देखा, वह जैसे ही जाने लगी उस ने उस से नजर चुरा कर लाखन का गिफ्ट पैकेट ले लिया. लाखन तुरंत साइकिल का पैडल मार कर आगे बढ़ गया.

नीतू ने सहेली को पुकारा, “अरे मुझे अकेला छोड़ कर जाएगी क्या? ठहर, मैं आ रही हूं.”

इसी के साथ नीतू दौड़ती हुई सहेली के पास आ गई. वह बोली, “देख, लाखन के बारे में घर में किसी को नहीं बतइयो, वरना मेरी पढ़ाई छुड़वा देंगे!”

“मैं क्यों बताने लगी भला उस के बारे में! तू उस से संभल कर रहियो. वह आवारा है.”

दोनों चुपचाप घर की ओर चल दिए. रास्ते में उन के बीच कोई और बात नहीं हुई. नीतू ने घर आ कर रात में लाखन का दिया हुआ गिफ्ट खोला. उस में घड़ी थी. वह खुश हो गई, लेकिन सोच में पड़ गई कि किसी को क्या बोल कर उसे पहनेगी? उस बारे में पिता और दूसरे लोग पूछेंगे, तब वह उस बारे उन से क्या बोलेगी? इसी उधेड़बुन में उस की आंख लग गई.

अगले रोज सुबह उस की नींद देर से खुली. फटाफट स्कूल जाने की तैयारी करने लगी. इसी अफरातफरी में लाखन के गिफ्ट का पैकेट बिछावन के नीचे गिर गया था. वह स्कूल चली गई. शाम को सहेली संग घर लौटी, तब वह घड़ी उस के पिता भगवान सिंह हाथ में थी. उन्होंने उस घड़ी के बारे में उस से पूछ लिया. वे नाराज दिखे. उन की नाराजगी को सहेली ने ही दूर किया. वह बोली कि उस ने राखी पर मिले पैसों से यह खरीदी है.

इस पर भगवान सिंह सिर्फ इतना ही बोले कि वह मन लगा कर पढ़ाई करे. इधरउधर की बातों में न पड़े, वरना परीक्षा में फेल होने पर नाम कटवा देंगे. पिता की बात सुन कर नीतू का मन थोड़ा हलका हुआ. ‘जी पापा!’ बोल कर वह घर के भीतर चली गई.

एक तरफ लाखन से उस की नजदीकियां बढ़ रही थीं. जबकि इस की खबर गांव में फैल गई. दोनों की शिकायतें भगवान सिंह के पास आने लगीं. भगवान सिंह पहले ही उस के रंगढंग देख कर बहुत कुछ समझ चुके थे. उन्होंने समझदारी से काम लिया और तुरंत उस के योग्य लडक़ा देखा और 2017 में शादी कर दी.

बिना मरजी के हो गई शादी

नीतू की शादी राजगढ़ जिले में ही राजेंद्र नामक युवक से हुई थी. शादी हो जाने के बाद लाखन उस की जिंदगी से जा चुका था. शादी के कुछ साल बाद नीतू 2 बच्चों की मां बन गई. वह एक बेटा और बेटी पा कर बेहद खुश थी, लेकिन पति के साथ उस की अच्छी नहीं बनती थी. इस कारण वह अपने बच्चों के साथ अकसर मायके आ जाती थी और फिर कुछ दिन रह कर अपने ससुराल चली जाती थी.

यह सिलसिला चल रहा था. मायके वालों को भी बिना वजह यहां आना अच्छा नहीं लगता था. इस पर पड़ोसी भी तरहतरह की बातें करते थे. इस दौरान नीतू की पूर्व प्रेमी लाखन से भी मुलाकातें हो जाती थीं. लाखन अब एक सुलझा हुआ जिम्मेदार व्यक्ति बन गया था.

एक बार तो हद ही हो गई. नीतू ने बच्चों को ले कर मायके आते ही सब को अपना फैसला सुना दिया कि वह अब अपनी ससुराल कभी नहीं जाएगी. मायके में बच्चों का अपने दम पर पालनपोषण करेगी. पिता की खेतीबाड़ी में हाथ बंटाएगी.

उस ने बताया कि पति उसे प्रताडि़त करता है. उसे मारतापीटता रहता है. नीतू को मायके में पनाह मिल गई. लेकिन वे नीतू के पति के साथ बिगड़े संबंध सुधारने की कोशिश करने लगे. इसी बीच नीतू का लाखन से मिलनाजुलना ज्यादा बढ़ गया. उसे गांव में एकमात्र लाखन ही अपना हमदर्द लगा. उस से अपने दिल का हाल सुनातेसुनाते आगे की जिंदगी उस के जिम्मे सौंपने का फैसला ले लिया.

लाखन ने भी इस पर बहुत जल्द निर्णय ले लिया. दोनों की नजदीकियां बढऩे और साथ रहने की खबर एकदूसरे के कानों से होते हुए पूरे गांव में फैल गई. जिस ने भी सुना, वही दांतों तले अंगुली दबा कर रह गया और थूथू करने लगा. सभी ने इसे समाज परिवार के लिए गलत बताया.

गांव वाले इस के लिए नीतू के परिवार वालों को ही दोषी ठहरा रहे थे. उसी दौरान नीतू के पिता भगवान सिंह की मृत्यु हो चुकी थी, लेकिन घर में मर्द के रूप में भाई का निर्णय ही चलता था. चाचा का भरापूरा परिवार भी था. सभी को नीतू की हरकतें बुरी लगीं.

नीतू और लाखन ने भी अपनेअपने घर वालों से दूर खेत में ही अपनी दुनिया बसा ली. वे गांव से 3 किलोमीटर दूर खेत में छोटा सा टपरीनुमा घर बना कर रहने लगे. जबकि लाखन के पिता बहादुर सिंह और मां श्याम कुंवर परिवार के सदस्यों के साथ गांव में ही रह रहे थे. गांववालों ने लखन को नीतू से दूरी बना कर रहने के बारे में भी समझाया था. नीतू के भाई अंकुर ने तो उन्हें धमकी तक दे डाली थी कि लाखन ने नीतू से दूरी नहीं बनाई तो बापबेटे को मौत के घाट उतार देंगे.

नीतू की वजह से हुई घर वालों की बदनामी

जुलाई, 2022 में नीतू अचानक घर से लापता हो गई थी. परिवार के लोगों ने उस की खोजखबर लेने के लिए लाखन से भी संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन वह भी अपने घर से गायब मिला. इस बाबत माचलपुर थाने में शिकायत दर्ज करवाई गई.

कुछ समय बाद माचलपुर पुलिस दोनों को राजस्थान के झालावाड़ से खोज कर गांव ले आई. उस के बाद ही नीतू और लाखन के परिजनों समेत ग्रामीणों को मालूम हुआ कि उन्होंने 8 जुलाई, 2022 को शादी कर ली थी और नीतू लाखन के साथ रहने चली गई थी.

इसे ग्रामीणों और परिजनों ने बिरादरी में चली आ रही परंपरा के खिलाफ समझा. बिरादरी की यह बात अंकुर के दिल में चुभ गई कि उस की बहन ने उसे समाज में कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा था. रातदिन उस की यह हरकत दिमाग में घूमने लगी. वह इस बदनामी को भुला नहीं पा रहा था. चाचा और चचेरे भाई को भी यह सब चैन से जीने नहीं दे रहा था.

मायके में मोहब्बत : भाई बना दुश्मन – भाग 1

राजगढ़ जिले के माचलपुर थाने के अंतर्गत एक गांव है धानोदा. राजपूत बाहुल्य वाले इस गांव में 5 अप्रैल, 2023 को एक ऐसी घटना घटी कि पूरे गांव में सनसनी फैल गई. यहीं के रहने वाले 28 वर्षीय युवक लाखन राजपूत की किसी ने रात में हत्या कर दी थी. वह गांव से करीब 3 किलोमीटर दूर खेत में ही एक टपरी बना कर रहता था. उस के साथ में पत्नी नीतू भी रहती थी, जिस का मायका इसी गांव में था.

गांव में शादी का माहौल था. उस दिन इस गांव में 4-4 शादियां थीं. अचानक खुशी के माहौल में रात को हत्या की सूचना पुलिस के लिए भी परेशान करने वाली थी. हत्या की सूचना पा कर थाने के टीआई जितेंद्र आजनारे तुरंत अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने इस की सूचना एसडीपीओ आनंद राय, एडीशनल एसपी मनकामना प्रसाद और राजगढ़ एसपी वीरेंद्र कुमार सिंह को भी दे दी.

घटनास्थल पर की गई छानबीन में पुलिस ने पाया कि युवक की हत्या बड़ी बेरहमी से की गई थी. उस पर किए गए वार से स्पष्ट था कि हमलावर ने उस के ऊपर काफी तेजी से हमले किए थे. शरीर पर गोलियों के 2 निशान थे. इस के अलावा उस पर सब्बल से ऐसा वार किया गया था कि वह गले के आरपार हो गया था.

पूछताछ करने पर घटनास्थल पर मौजूद नीतू नाम की युवती ने बताया कि मृतक उसका पति है. उस ने हत्या का आरोप सीधेसीधे अपने चाचा, चचेरे भाई और सगे भाई पर लगा दिया. उस ने घटना का जिक्र करते हुए पुलिस को बताया कि उन्होंने बड़ी बेदर्दी से उस के पति की हत्या कर दी. उन का वश चलता तो वे उसे भी जान से मार डालते. उस वक्त उन की आंखों में खून सवार था. वह डर कर भाग गई थी, इस से वह बच गई.

नीतू ने ही सभी हमलावरों के नाम पुलिस को बता दिए थे. इस के अलावा मृतक के मातापिता ने भी बताया था कि उन्हें वे काफी समय से धमकी दे रहे थे. उन के बयानों से मालूम हुआ कि यह हत्याकांड एक औनर किलिंग है. हत्यारों ने जानबूझ कर लाखन राजपूत की हत्या की है, जिस ने करीब 8 महीने पहले ही गांव की नीतू से प्रेम विवाह किया था.

मामला निकला औनर किलिंग का

यानी कि लव मैरिज करने के कारण लाखन को जान गंवानी पड़ी. उस के 17 साल के नाबालिग साले अंकुर ने ही चाचा प्रेम सिंह और चचेरे भाई लोकेश उर्फ सुरेंद्र के साथ मिल कर हत्या कर दी थी. बहन के लव मैरिज करने से अंकुर के सिर पर इस कदर खून सवार था कि उस ने जीजा को बेरहमी से मौत की नींद सुला दिया. तीनों आरोपियों को पुलिस ने 2 दिनों बाद ही गिरफ्त में ले लिया था.

पुलिस के हत्थे पहले चाचा प्रेमसिंह और चचेरे भाई लोकेश उर्फ सुरेंद्र चढ़े थे, फिर अगले रोज नाबालिग भाई अंकुर भी खेत पर बनी टपरी से गिरफ्तार कर लिया गया. आरोपियों के पास से वारदात के समय पहने गए कपड़े, हत्या में प्रयोग की गई पिस्टल, एक जिंदा कारतूस और गले में जो सब्बल फांसा था, बरामद कर लिया गया.

प्रारंभिक जांचपड़ताल में पता चला कि वारदात के लिए इस्तेमाल किया गया पिस्टल अवैध था. उसे उन्होंने आगर-मालवा जिले के किसी व्यक्ति से खरीदा था. हत्याकांड का मास्टरमाइंड अंकुर ही था. तीनों से इस मामले की गहन पूछताछ की गई. पता चला कि उन्होंने नीतू के छोटे भाई अंकुर के कहने पर उस का साथ दिया था. वैसे वे भी शादीशुदा नीतू के प्रेम विवाह करने से खुश नहीं थे. इस के चलते गांव और आसपास के इलाके में उन की बहुत बेइज्जती हो रही थी.

अंकुर ने पुलिस को हत्या के पीछे की जो चौंकाने वाली वजह बताई, वह इस प्रकार है—

करीब डेढ़ हजार की आबादी वाले धानोदा गांव का रहने वाला भगवान सिंह एक साधारण किसान था. उस के 3 बच्चों में बड़ी बेटी नीतू, उस के बाद एक और बेटी, उस के बाद छोटा बेटा अंकुर है. नीतू जब हाईस्कूल में थी, तब उस की जानपहचान गांव के ही लाखन राजपूत से हो गई थी. वह नीतू से उम्र में बड़ा था. गांव में मटरगश्ती किया करता था. हर किसी से मजाक कर लेता था. स्कूल जाते वक्त वह लड़कियों को छेड़ देता था. उन में से एक नीतू भी थी.

एक ही गांव के होने की वजह से दूसरी लड़कियों की तरह ही उस की मजाकिया बातों को दिल पर नहीं लेती थी. उस के छेडऩे पर बुरा नहीं मानती थी. इस दौरान लाखन अकसर उस की तारीफ करता था. उसे बाकी लड़कियों से अधिक खूबसूरत बताता था. प्रेम की बातें करता था. एक दिन उस ने मजाक में बोल दिया कि उसे उस से मोहब्बत हो गई है, वह उस से शादी करना चाहता है.

यह सुन कर नीतू उस वक्त थोड़ी नाराज हो गई थी, लेकिन लाखन द्वारा कही गई वे बातें उस के दिमाग में घूमने लगी थीं. उस के बाद स्कूल में 3 दिनों की छुट्टियां हो गई थीं. चौथे दिन जब वह स्कूल गई, तब उस की निगाहें लाखन को ढूंढने लगीं, लेकिन वह न तो स्कूल जाते समय नजर आया और न ही स्कूल से लौटते वक्त ही मिला. अगले दिन भी ऐसा ही हुआ. लाखन को ले कर उस के दिल की धडक़नें तेज हो गई थीं.

स्कूल से लौटते समय उस ने अपनी सहेली से लाखन के बारे पूछ लिया. सहेली भी कुछ कम मजाकिया नहीं थी. वह भी तपाक से बोल पड़ी, “बड़ा उस बदमाश की खोजखबर ले रही हो, उस पर दिल आ गया है क्या?”

यह सुनते ही नीतू शरमा गई और उसे चिकोटी काटती हुई बोली, “अरे तू भी उसी तरह मजाक करती है.”

“देख उधर, नाम लेते ही आ गया… हमारी तरफ ही आ रहा है. जा, जा कर पूछ ले उसी से कि कहां था?”

तब तक लाखन उन के करीब आ चुका था. वह साइकिल पर था. एक पैर जमीन पर टिका कर उन के पास साइकिल रोक दी और झट से बोल पड़ा, “क्या बात है तुम लोग मेरे बारे में ही बातें कर रही थी न?”

“मैं क्यों करूंगी? यही कर रही थी.” नीतू की तरफ हाथ से इशारा कर उस की सहेली बोलती हुई और आगे बढऩे लगी. जबकि नीतू वहीं ठिठकी रही. लाखन ने तुरंत अपनी जेब से एक पैकेट निकला और नीतू की ओर बढ़ा दिया.

“क्या है?” नीतू बोली.

“तुम्हारे लिए राजगढ़ से लाया हूं. गिफ्ट है. बहुत दिनों से तुम्हें कुछ देने की सोच रहा था. इसे घर जा कर खोलना. कैसा लगा, कल जरूर बताना.”

“ले ले, मैं किसी को कुछ नहीं बताऊंगी,” थोड़ी दूर जाती हुई नीतू की सहेली बोली.

शर्तों वाला प्यार : प्रेमी ने किया वार

नेताजी को समझ में आया कानून सबके लिए एक है

शर्तों वाला प्यार : प्रेमी ने किया वार – भाग 4

14 अप्रैल को मंधना स्थित गेस्ट हाउस में पहले गोद भराई की रस्म पूरी हुई फिर देर शाम धूमधाम से तिलक समारोह संपन्न हुआ. इस समारोह में हरिओम और सोनू भी शामिल हुए. समारोह के दौरान सोनू ने अन्नपूर्णा से मिलने का भरसक प्रयास किया, लेकिन वह मिल न सकी.

राकेश के घर में शादी की चहलपहल शुरू हो गई थी. रिश्तेनातेदारों के आने का सिलसिला शुरू हो गया था. घर में मंडप गड़ चुका था और मंडप के नीचे ढोलक की थाप पर मंगल गीत गाए जाने लगे थे.

इधर ज्योंज्यों शादी की तारीख नजदीक आती जा रही थी, त्योंत्यों सोनू की बेचैनी बढ़ रही थी. उसे अन्नपूर्णा की बेवफाई पर गुस्सा भी आ रहा था. आखिर जब उस की बेचैनी ज्यादा बढ़ी तो उस ने अन्नपूर्णा से आखिरी बार आरपार की बात करने का निश्चय किया.

उस ने इस बाबत अपने दोस्त विनीत और शुभम से बात की तो दोनों उस का साथ देने को राजी हो गए. विनीत नारामऊ में रहता था और उस की मोबाइल शौप थी. जबकि शुभम पंचोर रोड पर रहता था. दोनों को जब भी पैसों की जरूरत पड़ती, सोनू उन की मदद कर देता था. जिस से वह उस के अहसान तले दबे थे.

16 अप्रैल, 2019 की रात 8 बजे सोनू मोटरसाइकिल से अन्नपूर्णा के घर के पास पहुंचा. उस के साथ उस के दोस्त विनीत और शुभम भी थे. सोनू ने मोटरसाइकिल सड़क किनारे ठेली लगा कर अंडे बेचने वाले के पास खड़ी कर दी. फिर उस ने विनीत को समझाबुझा कर अन्नपूर्णा को बुलाने भेजा.

विनीत अन्नपूर्णा के घर पहुंचा तो संयोग से वह उसे घर के बाहर ही मिल गई. विनीत ने उसे सोनू का संदेश दे कर साथ चलने को कहा. लेकिन अन्नपूर्णा ने साथ जाने और सोनू से बात करने से साफ इनकार कर दिया. इस पर विनीत ने अपने फोन पर अन्नपूर्णा की बात सोनू से कराई.

अन्नपूर्णा ने सोनू से फोन पर बात की और मिलने से साफ इनकार कर दिया. इस पर सोनू ने उस से कहा कि वह आखिरी बार उस से मिलना चाहता है. साथ ही धमकी भी दी कि यदि वह उस से मिलने न आई तो वह शादी वाले दिन ही उस के घर पर आत्महत्या कर लेगा.

प्रेमी बन गया कातिल

अन्नपूर्णा सोनू की धमकी से डर गई और उस से आखिरी बार मिलने को राजी हो गई. अन्नपूर्णा विनीत के साथ मोटरसाइकिल पर बैठ कर सोनू के पास पहुंची. सोनू अन्नपूर्णा और अपने दोनों दोस्तों के साथ मोटरसाइकिल से दलहन अनुसंधान केंद्र के पास लिंक रोड पर पहुंच गया. वहां उस ने मोटरसाइकिल रोक दी. तब तक रात के 9 बज चुके थे और लिंक रोड पर सन्नाटा पसरा था.

विनीत और शुभम तो मोटरसाइकिल से उतर कर किनारे खड़े हो गए. जबकि सोनू अन्नपूर्णा से बतियाने लगा. बातचीत के दौरान सोनू बोला, ‘‘अन्नपूर्णा तुम ने मेरे साथ बेवफाई क्यों की? प्यार मुझसे किया और शादी किसी और से कर रही हो, ऐसा नहीं हो सकता. मैं ने तुम पर लाखों रुपए खर्च किए हैं. उपहार में ज्वैलरी दी है. या तो तुम मेरे रुपए ज्वैलरी वापस कर दो या फिर मुझ से शादी करो.’’

सोनू की बात सुन कर अन्नपूर्णा गुस्से में बोली, ‘‘सोनू, रुपए ज्वैलरी दे कर तुम ने मुझ पर कोई एहसान नहीं किया है. उस के बदले तुम ने मेरे शरीर का भी तो शोषण किया था. अब हिसाबकिताब बराबर. मेरा रास्ता अलग और तुम्हारा रास्ता अलग.’’

‘‘अन्नू, अभी हिसाबकिताब बरबार नहीं हुआ है. तुम मेरी दुलहन नहीं हुई तो मैं तुम्हें किसी और की दुलहन नहीं बनने दूंगा.’’ इतना कह कर सोनू ने मोटरसाइकिल से लोहे की रौड निकाली जिसे वह साथ लाया था और अन्नपूर्णा के सिर पर भरपूर प्रहार कर दिया. अन्नपूर्णा जमीन पर बिछ गई. इस के बाद उस ने 2-3 प्रहार और किए.

इसी बीच उस की नजर ईंट पर पड़ी. उस ने ईंट से प्रहार कर उस का सिर मुंह, कुचल डाला. उस ने हाथ व कमर पर भी प्रहार किए. अन्नपूर्णा कुछ देर तड़पी फिर सदा के लिए शांत हो गई. सोनू का रौद्र रूप देख कर विनीत और शिवम डर गए. इस के बाद सोनू दोस्तों के साथ घटनास्थल से भाग गया.

इधर सुबह 8 बजे दलहन अनुसंधान केंद्र के सुरक्षाकर्मी के.पी. सिंह ने लिंक रोड के किनारे एक युवती की लाश पड़ी देखी तो यह सूचना थाना बिठूर पुलिस को दे दी. सूचना पाते ही बिठूर थानाप्रभारी विनोद कुमार सिंह घटनास्थल पहुंचे और जांच शुरू कर दी.

लेकिन पुलिस जांच में उलझ गई. आखिर 3 महीने बाद अन्नपूर्णा की हत्या का खुलासा हुआ और कातिल पकड़े गए. अभियुक्तों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन की निशानदेही पर लोहे की रौड, खूनसनी ईंट तथा सोनू की मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली.

3 अगस्त, 2019 को पुलिस ने अभियुक्त सोनू, विनीत व शुभम को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया जहां से उन्हें जिला कारागार भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित