पटवारी की दुधारी तलवार से बच कर रहना

‘साहब, मैं कभी पाकिस्तान तो क्या, प्रदेश के किसी दूसरे जिले में भी नहीं गया. जैसेतैसे कर के मैं अपने परिवार की गाड़ी खींच रहा हूं.’’ हाथ बांधे सुलेमान बाड़मेर के तत्कालीन एसडीएम की अदालत में गिड़गिड़ा रहा था. यह सन 1975 के शुरुआती दिनों की बात है.

‘‘सुलेमान, तुम्हारे इलाके के पटवारी ने रिपोर्ट दी है कि तुम कुछ दिनों पहले अनाधिकृत रूप से पाकिस्तान भाग गए थे. इसलिए तुम्हारी पुश्तैनी कृषि भूमि को राजस्थान टीनेंसी एक्ट के तहत जब्त किए जाने की काररवाई विचाराधीन है.’’ उपखंड अधिकारी ने कहा.

सुलेमान फिर गिड़गिड़ाया, ‘‘साहब, पाकिस्तान भाग जाने का आरोप झूठा है. हां, उन दिनों मैं रोजीरोटी के लिए परिवार के साथ कहीं दूसरी जगह जरूर चला गया था. पटवारीजी ने मेरे बारे में झूठी रिपोर्ट दी है. गरीब होने के कारण मैं उन की सेवा नहीं कर सकता. इसीलिए उन्होंने नाराज हो कर झूठ लिख दिया है.’’

एसडीएम सुलेमान की फाइल फिर से पलटने लगे. तहसीलदार के निर्णय के खिलाफ सुलेमान ने एसडीएम की अदालत में अपील की थी. आखिरकार एसडीएम ने सुलेमान की गैरहाजिरी में उस की 24 बीघा कृषि भूमि को जब्त कर सरकारी घोषित कर दिया था. तारीख पेशी की जानकारी नहीं होने के कारण सुलेमान उस दिन अदालत में नहीं था.

सुलेमान को जब यह जानकारी मिली तो उसे बड़ा धक्का लगा. उस ने अपनी व्यथा अपने पड़ोसी चौथमल को बताई. चौथमल उस के साथ हुई नाइंसाफी से द्रवित हो उठा. उस ने सुलेमान को राजस्थान हाईकोर्ट जाने की सलाह दी. इतना ही नहीं, वह सुलेमान के साथ जोधपुर स्थित हाईकोर्ट गया और एसडीएम के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट की सिंगल बेंच में अपील दायर कर दी. वहां भी कई सालों तक केस चला.

अंत में वहां का फैसला भी सुलेमान के पक्ष में नहीं आया. इस के बाद चौथमल ने हाईकोर्ट की ही डबल बेंच में अपील दाखिल करा दी.

पिछले महीने खंडपीठ के माननीय न्यायाधीश गोविंद माथुर और एस.पी. शर्मा ने सिंगल बेंच के आदेश को निरस्त करते हुए आदेश दिया कि किसी नागरिक के देश में किसी अन्य क्षेत्र में चले जाने से उस के खिलाफ टीनेंसी एक्ट की काररवाई अनुचित है. आदेश सुनते ही सुलेमान की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए.

राजस्व विभाग के अंतिम छोर के प्यादे ‘पटवारी’ की गलत रिपोर्ट के कारण गरीब सुलेमान 40 सालों तक अदालतों के धक्के खाता रहा. यह तो पटवारी के क्रियाकलापों की बानगी मात्र है, लेकिन राजस्थान के ही हनुमानगढ़ के पटवारी ने अधिकारियों व अन्य लोगों से सांठगांठ कर के फरजीवाड़े का जो खेल खेला, सुन कर आप जरूर चौंक जाएंगे.

देहातों में आज भी बरसों पुरानी एक लोकोक्ति प्रचलित है, ‘ऊपर करतार, नीचे पटवार’. यहां पटवार का मतलब पटवारी यानी लेखपाल से है. लेखपाल राजस्व महकमे का प्यादा होता है. ब्रिटिश हुकूमत काल में कृषि संबंधी लेखाजोखा व लगान वसूली अमीन करता था, जो पटवारी का ही पर्याय होता था. तहसील के मामलों में पटवारी की जांच आख्या को महत्त्वपूर्ण माना जाता है. अपने स्वार्थ की वजह से कुछ पटवारी अपनी कलम से स्याह को सफेद और सफेद को स्याह करने से नहीं चूकते.

राजस्थान प्रदेश का एक जिला है हनुमानगढ़. इसी जिले की पीलीबंगा तहसील का गांव है पड़ोपल बारानी. 10-12 हजार की आबादी वाले इस गांव की कृषि भूमि किलाबंदी के अभाव में आज भी खसरों में समाहित है. इस क्षेत्र में कभी घग्घर नदी का बहाव था, जिस से क्षेत्र की लाल व दोमट मिट्टी बारानी होने के बावजूद बहुत उपजाऊ है. इसी कारण यहां की कृषि भूमि जिले के और क्षेत्रों की अपेक्षा कुछ महंगी है.

सन 2012 के आसपास का वाकया है. इस क्षेत्र में पटवारी संजीव मलिक की नियुक्ति हुई. कहा जाता है कि अनुकंपा के आधार पर नौकरी पाने वाले संजीव की पहुंच राष्ट्रीय स्तर की एक राजनीतिक पार्टी के आला पदाधिकारियों तक थी. शातिरदिमाग संजीव मलिक की ऊंची महत्त्वाकांक्षाएं थीं. अपने क्षेत्र की सरकारी भूमि खाली देख कर उस की आंखें चमक उठीं. वह भूमि उसे सोने का अंडा देने वाली मुरगी नजर आ रही थी.

पर वह सोने के अंडे देने वाली मुरगी उसे उच्चाधिकारियों के सहयोग के बिना मिलनी असंभव थी. इस बेशकीमती कृषि भूमि के सहारे उस ने करोड़पति बनने का सपना संजो लिया था. इस के लिए उस ने दिमागी घोड़े दौड़ाने शुरू कर दिए.

अधिकारियों से संबंध बनाने के लिए उस ने अपने घर पर एक पार्टी का आयोजन किया, जिस में कानूनगो से ले कर एसडीएम तक को आमंत्रित किया. कुल मिला कर 15 मेहमान जुटे.

भोज छोटा था, पर मकसद बहुत ऊंचा था. शाही दावत के रूप में आयोजित इस भोज में संजीव ने शराब और कबाब की भी व्यवस्था की थी. सभी मेहमानों ने इस भोज की जी खोल कर प्रशंसा की.

दावत खाने के बाद विदा होते समय एक अधिकारी ने संजीव का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘भई मान गए संजीव, तुम्हारी जिंदादिली को. तुम्हारा प्रोग्राम बहुत अच्छा रहा. सचमुच मजा आ गया.’’

‘‘साहब, यह आप की ही कृपा का फल है और उम्मीद है कि इस नाचीज पर भविष्य में भी आप की कृपा बनी रहेगी.’’ उचित अवसर देख कर संजीव ने साहब का हाथ दबाते हुए दिल की मंशा जाहिर कर दी.

‘‘हां..हां… क्यों नहीं, कल सुबह औफिस में आ जाना. बैठ कर बातें करेंगे.’’ अधिकारी ने कहा.

संजीव का फेंका गया दूसरा पांसा भी सटीक पड़ा था. अगले दिन संजीव अपने अधिकारी के औफिस चला गया. दोनों में आधे घंटे तक गुफ्तगू होती रही. संजीव ने अपनी सोच जाहिर की तो साहब ने उस पर अपनी मौन स्वीकृति दे दी. पटवारी संजीव की भावी योजना में साहब की सीधे कोई भूमिका नहीं थी. केवल उन्हें चुप रहते हुए अपनी आंखें बंद रखनी थीं.

इस के बाद पटवारी संजीव ने अधिकारियों से सांठगांठ कर फरजी तरीके से भू आवंटन करना शुरू कर दिया. जो कोई उस का विरोध करता, वह मोटे गिफ्ट दे कर उस का मुंह बंद कर देता.

राजस्व विभाग में कामयाबी मिलने के बाद संजीव मलिक ने अगला कदम बैंकिंग प्रबंधन में पैठ बढ़ाने के लिए उठाया. शातिर संजीव ने एकदो व्यापारी मित्रों के सहयोग से इलाके के बैंक मैनेजरों को पटा लिया. वर्तमान में देश के सभी राष्ट्रीयकृत व सहकारी बैंक किसानों को उन की जोत वाली कृषि भूमि पर ऋण उपलब्ध करवा रहे हैं. हर बैंक का कृषक ऋण का कोटा निश्चित होता है. इसी का फायदा संजीव ने उठाया.

संजीव की सांठगांठ से बैंककर्मियों को दोहरा लाभ हो रहा था. एक तो उन का ऋण आवंटन का कोटा सहजता से पूरा हो रहा था, ऊपर से जेब भी गरम हो रही थी. जिस खेती की जमीन पर बैंक लोन देती थी, बैंककर्मी उस का सत्यापन बैंक में बैठेबैठे ही पूरा कर के रिपोर्ट लगा देते थे.

संजीव मलिक ने शुरू में अपने खासमखास छुटभैया नेता ओमप्रकाश व उस के भाई के सहयोग से भरोसेमंद ग्राहकों को फांसा. बाद में उस के नेटवर्क में अन्य क्षेत्रीय राजनेता भी जुड़ गए. संजीव ने ओमप्रकाश व उस के भाई के नाम 56 बीघा कृषि भूमि इंद्राज कर के उन्हें खातेदार घोषित किया. इतना ही नहीं, दोनों ही भाइयों के नाम से 10 लाख 29 हजार रुपए व साढ़े 8 लाख रुपए का कृषि ऋण भी एक बैंक से दिला दिया.

इसी प्रकार खसरा नंबर 1236 में मात्र 2 बिस्वा (1 बीघा का दसवां हिस्सा) रकबा राजकीय दर्ज था. पर लेखपाल से मिलीभगत कर इस खसरा में 40 बीघा रकबा दर्ज दिखा कर दोनों भाइयों के नाम 20-20 बीघा खातेदारी घोषित कर दी गई.

राजस्थान में प्रदेश सरकार राजस्व विभाग की सहायता से समयसमय पर जायज भूमिहीन कृषकों को भूमि आवंटन व निर्धारित दर से भूमि विक्रय करती है. भू आवंटन हेतु एसडीएम की अध्यक्षता में गठित कमेटी भू आवंटन करती है. क्षेत्र के भू अभिलेख निरीक्षक (कानूनगो), हलका पटवारी से संबंधित भूमि व कृषक की रिपोर्ट से संतुष्ट होने पर एसडीएम किसान को भू आवंटन करता है.

इस आवंटन का इंद्राज पटवार परत व सरकार परत में इंतकाल के रूप में दर्ज किया जाता है. इंतकाल की प्रक्रिया पूरी होने के साथ किसान भूमि का मालिकाना हक पा जाता है. पटवार परत जिसे आम बोलचाल में बही कहते हैं, वह पटवारी के पास तहसील कार्यालय में रहती है.

पटवारी के चोले में छिपा संजीव मलिक अब भू माफिया बन चुका था. अपेक्षित स्तर पर मिल रहे सहयोग के बल पर वह फरजी भू आवंटन से बेशुमार दौलत कमा रहा था. सन 2015 के अगस्त माह का वाकया है. क्षेत्र का एक किसान हेतराम संजीव मलिक से मिला. उस ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘पटवारीजी, गरीब आदमी हूं. मुझे भी एक मुरब्बा खातेदारी अलाट करवा दो.’’

‘‘देखो हेतराम, एक मुरब्बा का रेट 7 लाख है. तुम गरीब आदमी हो, इसलिए तुम्हारे 5 लाख लगेंगे. पैसे ले आओ, तुम्हारा काम कर दूंगा.’’

‘‘साहब, 5 लाख तो दूर, मेरे पास तो एक लाख भी नहीं हैं.’’

‘‘देखो हेतराम, पैसे ऊपर तक देने पड़ते हैं. तुम जैसे भी हो, पैसों की व्यवस्था कर लो. बाद में तुम्हें बैंक से केसीसी दिला दूंगा. इस से तुम्हारी जेब में 2-3 लाख ज्यादा आ जाएंगे.’’ संजीव ने कहा.

हेतराम ने जैसेतैसे कर मोटे ब्याज पर रुपए ले कर पटवारी को सौंप दिए. एक पखवाड़े में ही हेतराम एक मुरब्बा कृषि भूमि का मालिक बन गया. पटवारी संजीव मलिक ने हेतराम को उसी जमीन पर 8 लाख रुपए का लोन भी दिलवा दिया था. उस में से उस ने अपने हिस्से के 5 लाख रुपए ले लिए.

समय गुजरता रहा और पटवारी के ग्राहकों की संख्या बढ़ती रही. सूची में क्षेत्र के लोगों के अलावा एकचौथाई कृषक खातेदारी अधिकारों से वंचित हैं. ऐसे कृषकों को बैंकों के कृषि लोन या अन्य योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता था.

जब उन लोगों को पता चला कि पटवारी संजीव जरूरतमंद व्यक्तियों के बजाए अन्य लोगों को लाभ पहुंचा रहा है तो उन्होंने खातेदारी अधिकार के लिए आंदोलन शुरू कर दिया. अप्रैल, 2016 के दूसरे पखवाड़े में शुरू हुए इस आंदोलन में किसानों ने खातेदारी के साथसाथ पटवारी संजीव के कारनामे की जांच व तबादले की मांग भी जोड़ दी.

आंदोलन उग्र होता, इस से पहले ही जिला प्रशासन हरकत में आ गया. तत्कालीन जिलाधिकारी रामनिवास ने इस पूरे मामले की जांच मोहर के एडीएम सुखवीर सिंह चौधरी को सौंप दी. एडीएम ने व्यापक स्तर पर हुए भू घोटाले की जांच हेतु 2 जांच टीमें गठित कीं. पहली टीम में इंसपेक्टर राम सिंह मंद्रा के साथ पटवारी जसवंत सिंह, विनोद कुमार तथा दूसरी में इंसपेक्टर देवीलाल धिंपा के साथ हंसराज व राजकुमार को शामिल किया गया.

जांच टीमों ने सन 2005 से ले कर 2015 तक के तमाम खातों व जमा बंदियों की जांच की. जांच के दौरान पता चला कि आवंटित खसरों में अनुचित रूप से कांटछांट कर अन्य किसानों के नाम जोड़ दिए गए थे. फरजी स्तर पर खातेदारी अधिकार रेवडि़यों की तरह बांटे गए थे.

एडीएम सुखवीर सिंह ने बारीकी से जांच कर 40 पेज की रिपोर्ट तैयार कर के जिलाधिकारी के सामने प्रस्तुत की. रिपोर्ट के अनुसार, पटवारी व अन्य ने अनधिकृत रूप से 41 खाते जोड़े थे. कंप्यूटराइज जमा बंदियों में संविदाकर्मी उमाराम व संजीव मलिक के फरजीवाड़े को इंसपेक्टर उमाराम द्वारा आंखें मूंद कर तसदीक किए जाने का उल्लेख रिपोर्ट में था.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सन 1998 से ले कर 2001 तक की पटवार परत/सरकार परत कार्यालय में नहीं मिली. रकबा उपलब्ध नहीं होने के बावजूद फरजी ढंग से पटवार परत में कांटछांट व ओवरराइटिंग कर के किसानों को भू आवंटन किया गया.

जिलाधिकारी ने जांच रिपोर्ट के आधार पर तहसीलदार पीलीबंगा को 9 कर्मचारियों व 67 लाभान्वितों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करवाने के आदेश दिए. इन में 5 महिलाएं भी थीं. इस जांच रिपोर्ट में पीलीबंगा के तत्कालीन उपखंड अधिकारी व तहसीलदार की भूमिका पर कोई टिप्पणी नहीं की गई थी.

पीलीबंगा के तत्कालीन तहसीलदार बसंत सिंह ने 23 अप्रैल, 2016 को थाने में भू अभिलेख निरीक्षक (कानूनगो) बनवारीलाल, जगदीश बैन, बृजलाल शर्मा, मदनलाल, उमाराम व 4 पटवारियों संजीव, वेदप्रकाश, रामचंद्र व ओमप्रकाश ताखर सहित 76 लोगों के विरुद्ध भांदंवि की धारा 420, 409, 467, 468, 471, 167 व 120बी के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी.

एक आरोपी महिला कृषक चंद्रावली जाट जो एक क्षेत्रीय नेताजी की मां है, को 8 खसरों में लगभग 65 बीघा रकबा आवंटित किया गया था. इस रकबे पर लाखों रुपए का कृषि लोन भी लिया गया था.

मुकदमा दर्ज होते ही राजस्व विभाग ने पटवारी संजीव मलिक को अपदस्थ कर दिया था. पर संजीव मलिक राजस्थान उच्च न्यायालय में राजनीतिक द्वेष का हवाला दे कर राहत पाने में सफल हो गया. मुकदमा दर्ज होते ही नामजद लोगों की नींद उड़ गई. संजीव मलिक के कृत्य से आहत किसानों ने अप्रैल में ही उच्च न्यायालय की शरण ली.

माननीय उच्च न्यायालय ने सुनवाई के बाद अक्तूबर, 2016 में जांच अधिकारी सीओ पीलीबंगा को तलब कर लिया. उच्च न्यायालय के दखल के बाद धीमी गति से चल रही पुलिस जांच में तेजी आ गई. सीओ विजय मीणा के निर्देश पर एएसआई हंसराज, हैडकांस्टेबल लिघमन, सुरेंद्र, अमीलाल व बलतेज सिंह ने नामजद पटवारी संजीव मलिक व उमाराम गिरदावर को उन के निवास स्थान से 3 दिसंबर, 2016 को गिरफ्तार कर लिया.

10 दिसंबर को इसी टीम ने पटवारी के सहायक श्रीचंद मेघवाल व संविदाकर्मी उदाराम को भी गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तार आरोपियों से व्यापक पूछताछ के बाद न्यायालय में पेश कर न्यायिक अभिरक्षा में भिजवा दिया गया.

पटवारी संजीव मलिक ने जिला मुख्यालय के नजदीक स्थित पौश इलाके ड्रीमलैंड सोसाइटी में एक भव्य बंगला बनवाया था. कहा जाता है कि उस के बंगले पर लग्जरी गाडि़यों का आनाजाना लगा रहता था. यह भी कहा जाता है कि बीसियों लाख रुपयों से बने उस के बाथरूम तक में एसी लगे हुए थे. कृषि भूमि आवंटन के फ्रौड में करोड़ों बनाने वाला साईं भक्त संजीव मलिक अपने 3 साथियों के साथ जेल में बंद है.

हजारों बीघा कृषि भूमि के फरजी आवंटन के इस सिलसिले में कमाए गए लाखों रुपयों की बंदरबांट ऊपर से नीचे तक हुई है. कई राजनेताओं पर भी आरोप लग रहे हैं. पूर्व में जिलाधिकारी हनुमानगढ़ ने सभी आवंटन रद्द करने के आदेश जारी किए थे.

पुलिस जांच मात्र राजस्व विभाग के निचले पायदान के कार्मिकों व नामजद किसानों के इर्दगिर्द घूम रही है. विभाग के आला अधिकारी अभी भी जांच से कोसों दूर हैं. जांच उन बैंककर्मियों की भी होनी चाहिए, जिन्होंने फरजी कागजातों के आधार पर खुले हाथों से लाखों के कृषि लोन मंजूर कर बंदरबांट की. पीडि़त किसानों ने राज्य सरकार से इस महाघोटाले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है.      ?

– कथा राजस्व व पुलिस सूत्रों के आधार पर

नशे की गिरफ्त में स्कूली बच्चे

केरल के कोचीन के एक हायर सैकंडरी स्कूल में घटित घटना को पढ़ कर आप भी हैरान हो जाएंगे. घटना कुछ यों है : कक्षा में 2 छात्र स्कूल समय से देरी से पहुंचते हैं और बेहद थके हुए दिखाई देते हैं. इस बात की खबर दूसरे छात्र तुरंत अध्यापकों को देते हैं. अध्यापक छात्रों को स्टाफ रूम में बुलाते हैं और छात्रों से विस्तृत पूछताछ करते हैं.

बच्चों से पूछताछ करने पर जो सचाई सामने आती है वह हैरान कर देने वाली है. दरअसल, उन दोनों छात्रों ने नशीले पदार्थों का सेवन किया हुआ था. केरल में स्कूली छात्रों के बीच नशीले पदार्थों का सेवन तेजी से जोर पकड़ रहा है. स्कूल से क्लास मिस कर के बाहर घूमने वाले छात्रों पर जब पुलिस ने निगरानी रखी तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए.

राज्य की ही एक अन्य घटना में पता चला कि ड्रग्स माफिया ने स्कूल जाते बच्चे को पहले पत्थर मार कर गिरा दिया और फिर नशीले पदार्थ इंजैक्ट करने की कोशिश की. स्कूली बच्चों में नशीले पदार्थों का सेवन तेजी से बढ़ रहा है. केरल के अनेक जिलों के कई बच्चे पुलिस को कुछ ऐसी ही घटनाओं में लिप्त मिले. इन में अधिकांश बच्चे शराब व नशीले पदार्थों की लत के शिकार थे. पुलिस ने बच्चों के अलावा ऐसे समूहों को भी पकड़ा जो स्कूली बच्चों को निशाना बना कर यह धंधा करते हैं.

नशीले पदार्थों की लत

पुलिस जांच में यह बात सामने आई है कि एक बार मित्रों के आग्रह पर नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले बच्चे इस की लत का शिकार हो जाते हैं और बारबार नशीले पदार्थों के प्रयोग के लिए मजबूर हो जाते हैं. पुलिस ने हाल ही में क्लास मिस कर के इधरउधर घूमते, नशे का सेवन करते अनेक छात्रों को धरपकड़ा था.

अकेले कोट्टयम शहर से ऐसे 178 छात्र पकड़े गए हैं. कोट्टयम वैस्ट के सर्कल इंस्पैक्टर ए जे थौमस बच्चों में बढ़ रहे नशीले पदार्थों के व्यापक प्रयोग के बारे में कहते हैं, ‘‘घर से स्कूल जाने के लिए स्कूल यूनिफौर्म पहन कर ये बच्चे स्कूल जाने का ढोंग रचते हैं. वे स्कूल न पहुंच कर कपड़े बदल कर पार्क, मौल, रैस्टोरैंट में समय गुजारते हैं और नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करने के बाद सिनेमा देखने में भी समय बिताते हैं.

जब कोट्टयम पुलिस ने कोट्टयम वैस्ट से ऐसे 112 बच्चों को और कोट्टयम ईस्ट से 64 बच्चों को ढूंढ़ा और उन से पूछताछ की तो पता चला कि ये बच्चे स्कूल से भाग कर मौजमस्ती कर रहे थे. पुलिस ने घटना की सूचना बच्चों के परिवार वालों को दी और उन से बच्चों के बारे में बात की.’’

पुलिस के नेतृत्व में गुरुकुलम

जब कोट्टयम पुलिस की जांच में विद्यार्थियों के स्कूल छोड़ कर नशीले पदार्थों में लिप्त होने की बात सामने आई और बच्चों से विस्तृत पूछताछ करने पर पता चला कि ये बच्चे शराब और नशीले पदार्थों की लत के शिकार थे, तब ऐसे बच्चों को नशे की इस गिरफ्त से बचाने के लिए पुलिस के नेतृत्व में गुरुकुलम योजना शुरू की गई.

योजना के अंतर्गत बच्चे कक्षा में पूरे समय उपस्थित रहें, इस बात का ध्यान रखा जाता है और जो बच्चे उपस्थित नहीं होते उन की जानकारी एसएमएस द्वारा पुलिस को दी जाती है. बच्चे नशीले पदार्थों से कैसे दूर रहें, इस बात पर भी बच्चों की काउंसलिंग की जाती है. इस योजना की जानकारी स्कूलों के अध्यापकों को भी दी गई है ताकि वे बच्चों पर निगरानी रखें व उन्हें सही दिशा दें. पुलिस द्वारा की गई जांच में यह बात भी सामने आई है कि कमजोर तबके के परिवारों के बच्चे ही इस प्रकार के गलत रास्तों पर भटक जाते हैं.

स्कूल परिसर में ड्रग्स माफिया

कुछ महीने पहले केरल के कासर्गोड जिले में स्कूली बच्चों को नशीले पदार्थों का शिकार बनाने वाले ड्रग्स माफिया का खुलासा हुआ था. पुलिस जांच से यह बात सामने आई कि यह माफिया बच्चों को अपना शिकार बनाने के लिए स्कूलों के आसपास की दुकानों में पैन की तरह दिखने वाली सिगरेट बेचने के लिए रखते हैं. इस सिगरेट में पानमसाले का अंश अधिक होता है. एक अन्य घटना में स्कूल की छात्रा ने अपने जन्मदिन पर स्कूल में मिठाई बांटी.

मिठाई का स्वाद अध्यापक को अजीब लगने पर जब उस की जांच की गई तो उस में नशीले पदार्थों की मिलावट पाई गई और साथ ही, यह भी मालूम पड़ा कि ये मिठाइयां स्कूल के आसपास की दुकानों में ही सप्लाई की जाती हैं. यह माफिया बच्चों को अपना शिकार बनाने के लिए सोशल साइट्स व धार्मिक चिह्नों का भी इस्तेमाल करता है. मोबाइल मैसेजेस द्वारा भी यह अपने उद्देश्य को पूरा करता है. नशीले पदार्थों को बच्चों तक पहुंचाने के लिए माफिया कई तरह की मालाएं, लौकेट, खास रंग, चप्पल, बैग आदि निशानी के तौर पर इस्तेमाल करता है.

लत के पीछे इंटरनैट, मोबाइल

बच्चों में इंटरनैट व मोबाइल का दुरुपयोग बढ़ रहा है. इंटरनैट व मोबाइल पर अश्लील वीडियो देखने वाले बच्चों की मानसिक अवस्था पर दुष्प्रभाव पड़ता है और वे गलत राह की ओर अग्रसर हो जाते हैं. बच्चों को इस से बचाने के लिए मातापिता को चाहिए कि वे बच्चों को इस से बचाने के लिए उन पर निगरानी रखें कि वे कौनकौन सी साइट्स देख रहे हैं. बच्चा अगर बाहर किसी अनजान व्यक्ति से मिलता है तो इस बात की भी जानकारी रखें.

बच्चों के दोस्तों व उन के परिवार वालों से भी मेलजोल रखें और बढ़ते बच्चों को समयसमय पर सही दिशानिर्देश दें ताकि वे नशे की आदतों का शिकार हो कर गलत हाथों में न पड़ें. कई बार मातापिता के बीच अलगाव व झगड़े भी बच्चों को बाहरी दुनिया की ओर आकर्षित करते हैं. जब बच्चों को घर में स्वस्थ व खुशहाल माहौल नहीं मिलता और मातापिता व बच्चों के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्ता नहीं होता तब भी बच्चे गलत दोस्तों की संगत में पड़ जाते हैं और गलत राह पर चलने लगते हैं. घर के खुशहाल माहौल के अभाव में बच्चे स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं और सुरक्षा की कमी से मानसिक संघर्ष से जूझते हैं.

तीजतन, ऐसी अवस्था से मुक्ति पाने के लिए नशीले पदार्थों का प्रयोग करना शुरू कर देते हैं और इस तरह उन्हें नशीले पदार्थों की लत लग जाती है. हाल ही में एक बच्चे ने घर में किसी सदस्य के न होने पर घर में रखी शराब पी ली और बेहोश हो कर गिर पड़ा.

शोषण का शिकार बच्चे

शराब एवं नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले बच्चे शारीरिक शोषण का शिकार भी आसानी से बनते हैं. चूंकि इन बच्चों की नशीले पदार्थों के सेवन के कारण सोचनेसमझने की शक्ति क्षीण हो जाती है. और ऐसे में अगर परिवार की ओर से स्वस्थ माहौल न मिले तो ये बच्चे अवैध रिश्तों की ओर आकर्षित हो जाते हैं. परिणामस्वरूप ऐसे बच्चे सामान्य जिंदगी से दूर होने लगते हैं.

बच्चों को समय दें

बढ़ते बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए मांबाप का प्यार और देखभाल बहुत जरूरी होती है. बच्चे गलत राह की ओर न बढ़ें, इस के लिए जरूरी है कि परिवार के सभी लोग एकसाथ समय व्यतीत करें, इकट्ठे खाना खाएं, हंसीमजाक करें. अभिभावक बच्चों से उन की शिक्षा, दिनचर्या और दोस्तों के बारे में जानकारी लें.

बच्चों को घर से बाहर घुमानेफिराने ले जाएं. बच्चों को हमेशा यह एहसास दिलाएं कि आप उन के साथ हैं. बच्चों के जन्मदिन पर व अच्छा काम करने पर उन्हें उपहार दें, उन की तारीफ करें. बच्चों से उन की समस्या के बारे में जानें व उस का हल निकालने में उन की मदद करें. अगर आप समस्या सुलझाने में असमर्थ हों तो मनोचिकित्सक व काउंसलर की सहायता लें.

नशे की लत में डूबे बच्चों को सामान्य जिंदगी की ओर लाने में अभिभावकों का योगदान महत्त्वपूर्ण है, इस में जरा भी देरी न करें. बच्चे देश का भविष्य हैं, उन्हें स्वस्थ व सुरक्षित जीवन जीने के लिए प्रेरित करें.

जागरूक करें बच्चों को

क्लीनिकल साइक्लौजिस्ट डा. विपिन वी रोलडेंट का इस बारे में कहना है कि बच्चे घर और बाहर की परिस्थितियों को बहुत जल्दी समझते हैं और उन से प्रभावित भी होते हैं. वे हर नई बात को अपनाने की चाहत रखते हैं. घर में अगर पिता शराब का सेवन करता हो तो बच्चा भी इस लत का शिकार हो सकता है.

बच्चों को नशीले पदार्थों से दूर रखने के लिए उन्हें जागरूक करना जरूरी है. स्कूली पाठ्यक्रम के साथसाथ बच्चों को नशे से दूर रहने के बारे में भी जानकारी दी जानी चाहिए. वहीं, नशे के शिकार बच्चों को काउंसलिंग व चिकित्सा द्वारा सामान्य जिंदगी की ओर लाने का प्रयास किया जाना चाहिए.

– डा. विपिन वी रोलडेंट
मनोचिकित्सक

ए सीक्रेट नाइट इन होटल – भाग 3

वीडियो देख कर रश्मि पानीपानी हो गई. अब उसे लग रहा था कि उस ने और विवेक ने जो किया था, वह किसी ब्लू फिल्म से कम नहीं था. वह हैरान इस बात पर थी कि यह सब रिकौर्ड कैसे हुआ? जबकि विवेक ने कमरे में दाखिल होते ही अच्छे से ठोकबजा कर देख लिया था कि कमरे में कोई कैमरा वगैरह तो नहीं लगा.

पर जो हुआ था, वह कंप्यूटर स्क्रीन पर चल रहा था. वीडियो देख कर सकते में आ गई रश्मि ने तुरंत फोन कर के विवेक को अपने घर बुलाया. विवेक आया तो रश्मि ने उसे सारी बात बताई, जिसे सुन कर वह भी झटका खा गया. यह तो साफ समझ आ रहा था कि वीडियो उसी रात का था, पर इसे भेजने वाले की मंशा साफ नहीं हो रही थी कि वह क्या चाहता है, सिवाय इस के कि वह गलत मंशा से रश्मि पर दबाव बना रहा था.

दोनों गंभीरतापूर्वक काफी देर तक इस बिन बुलाई मुसीबत पर चरचा करते रहे. बात चिंता की थी, इस लिहाज से थी कि अगर यह वीडियो वायरल हो गया तो वे कहीं के नहीं रह जाएंगे. दोनों अब अपनी जवानी के जोश में छिप कर किए इस कृत्य पर पछता रहे थे. लंबी चर्चा के बाद आखिरकार उन्होंने तय किया कि भेजने वाले से उस की मंशा पूछी जाए.

लिहाजा उन्होंने इस बाबत मैसेज किया तो जवाब आया कि अगर इस वीडियो को वायरल होने से बचाना है तो ढाई लाख रुपए दे दो. अब तसवीर साफ थी कि उन्हें ब्लैकमेल किया जा रहा था. विवेक और रश्मि, दोनों निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों से थे, इसलिए ढाई लाख रुपए का इंतजाम करना उन की हैसियत के बाहर की बात थी. पर होने वाली बदनामी का डर भी उन के सिर चढ़ कर बोल रहा था.

आखिरकार विवेक ने सख्त और समझदारी भरा फैसला लिया कि जब पौकेट में इतने पैसे नहीं हैं तो बेहतर है कि पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी जाए. दोनों अपनेअपने घर से बहाना बना कर बीती 1 मई को ग्वालियर पहुंचे और सीधे एसपी डा. आशीष खरे से मिले. मामले की गंभीरता और शादी के बंधन में बंधने जा रहे इन दोनों की परेशानी आशीष ने समझी और मामला पड़ाव थाने के टीआई को सौंप दिया.

पुलिस वालों ने दोनों को सलाह दी कि वे ब्लैकमेलर से संपर्क कर किस्तों में पैसा देने की बात कहें. रश्मि ने पुलिस की हिदायत के मुताबिक ब्लैकमेलर को फोन कर के कहा कि वह ढाई लाख रुपए एकमुश्त तो देने की स्थिति में नहीं हैं, पर 5 किस्तों में 50-50 हजार रुपए दे सकती है. इस पर ब्लैकमेलर तैयार हो गया.

सीधे उत्तम होटल पर छापा न मारने के पीछे पुलिस की मंशा यह थी कि ब्लैमेलर को रंगेहाथों पकड़ा जाए. ऐसा हुआ भी. आरोपी आसानी से पुलिस के बिछाए जाल में फंस गया और रश्मि से 50 हजार रुपए लेते धरा गया. जिस युवक को पुलिस ने पकड़ा था, उस का नाम भूपेंद्र राय था. वह उत्तम होटल में ही काम करता था.

भूपेंद्र को उम्मीद नहीं थी कि रश्मि पुलिस में खबर करेगी, इसलिए वह पकड़े जाने पर हैरान रह गया. पूछताछ में उस ने बताया कि वह तो बस पैसा लेने आया था, असली कर्ताधर्ता तो कोई और है.

वह कोई और नहीं, बल्कि होटल का 63 वर्षीय मैनेजर विमुक्तानंद सारस्वत निकला. उसे भी पुलिस ने तत्काल गिरफ्तार कर लिया. इन दोनों ने पूछताछ में मान लिया कि उन्होंने इस तरह कई जोड़ों को ब्लैकमेल किया था.

भूपेंद्र ने बताया कि इस होटल में उसे उस के बहनोई पंकज इंगले ने काम दिलवाया था. काम करतेकरते भूपेंद्र ने महसूस किया कि होटल में रुकने वाले अधिकांश कपल सैक्स करने आते हैं. लिहाजा उस के दिमाग में एक खुराफाती बात वीडियो बना कर ब्लैकमेल करने की आई, जिस का आइडिया एक क्राइम सीरियल से उसे मिला था.

भूपेंद्र ने दिल्ली जा कर नाइट विजन कैमरे खरीदे, जो आकार में काफी छोटे होते हैं. इन कैमरों को उस ने टीवी के औनऔफ स्विच में फिट कर रखा था. इस से कोई शक भी नहीं कर पाता था कि उन की हरकतें कैमरे में कैद हो रही हैं. आमतौर पर ठहरने वाले इस बात पर ध्यान नहीं देते कि टीवी का स्विच औन है, क्योंकि इस से कोई खतरा रिकौर्डिंग का नहीं होता.

ग्राहकों के जाने के बाद भूपेंद्र कैमरे निकाल कर फिल्म देखता था और जिन लोगों ने सैक्स किया होता था, उन के नामपते होटल में जमा फोटो आईडी से निकाल कर फेसबुक, व्हाट्सऐप या फिर सीधे मोबाइल फोन के जरिए ब्लैकमेल करता था. दोनों ने माना कि वे ब्लैकमेलिंग के इस धंधे से लाखों रुपए अब तक कमा चुके हैं. दोनों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

मामला उजागर हुआ तो ग्वालियर में हड़कंप मच गया. पता यह चला कि कई होटलों में इस तरह के कैमरे फिट हैं और ब्लैकमेलिंग का धंधा बड़े पैमाने पर फलफूल रहा है. इस तरह की रिकौर्डिंग के विरोध में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने प्रदर्शन भी किया.

इस पर पुलिस ने कई होटलों में छापे मारे, पर कुछ खास हाथ नहीं लगा. क्योंकि संभावना यह थी कि भूपेंद्र की गिरफ्तारी के साथ ही ब्लैकमेलर्स ने कैमरे हटा दिए थे. हालांकि उम्मीद बंधती देख कुछ लोगों ने पुलिस में जा कर अपने ब्लैकमेल होने का दुखड़ा रोया.

जब यह सब कुछ हो गया तो विवेक और रश्मि ब्रेफ्रिकी से नोएडा वापस चले गए और दोबारा शादी की तैयारियों में जुट गए. पर एक सबक इन्हें मिल गया कि हनीमून मनाते वक्त  होटल में इस बात का ध्यान रखेंगे कि टीवी के खटके में कैमरा न लगा हो और घर आने के बाद फिर फेसबुक पर यह मैसेज न मिले कि ‘ए सीक्रेट नाइट इन होटल.’

पढ़े लिखों पर भारी पड़ते अनपढ़ – भाग 3

जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने लगातार हो रही औनलाइन ठगी की वारदातों को देखते हुए काफी समय पहले अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (प्रथम) प्रफुल्ल कुमार के निर्देशन एवं पुलिस उपायुक्त (क्राइम) डा. विकास पाठक के नेतृत्व में क्राइम ब्रांच की विशेष टीम गठित कर इस टीम को ऐसे अपराधियों का पता लगाने का जिम्मा सौंपा था.

इस टीम ने ठगी के एकएक मामले का अध्ययन कर अपराधियों की कार्यप्रणाली समझी. उस के बाद तकनीकी माध्यम से उन मोबाइल नंबरों का पता लगाया, जिन से लोगों को ठगी का शिकार बनाया गया था. व्यापक जांचपड़ताल के बाद पुलिस ने झारखंड से 3 ठगों को गिरफ्तार किया था.

इस से पहले इसी साल 24 फरवरी को सब से पहले सत्यम राय को पकड़ा गया. वह झारखंड के देवघर के खाजुरिया बसस्टैंड के पास स्थित विकासनगर का रहने वाला था. फिलहाल वह पश्चिम बंगाल के कोलकाता के टालीगंज में के.एम. लक्षकार रोड पर रह रहा था. उस ने पिछले साल जयपुर के राजेंद्र गहलोत को अपना शिकार बनाया था.

20 साल के सत्यम राय ने फोन पर खुद को बैंक अधिकारी बता कर राजेंद्र गहलोत से एटीएम कार्ड और ओटीपी नंबर पूछ कर उन के खाते से 43 हजार 391 रुपए औनलाइन निकाल लिए थे. इस ठगी का मुकदमा जयपुर दक्षिण के थाना ज्योतिनगर में दर्ज है.

पूछताछ में सत्यम राय ने बताया था कि राजेंद्र गहलोत से ठगी कर के उस ने 21 हजार 891 रुपए का सैमसंग गैलेक्सी ए 5 एड्रौयड मोबाइल फोन औनलाइन खरीदा था. बाकी रकम उस ने अलगअलग गेटवे के माध्यम से बैंक खाते तथा वौलेटों में डाली थी. मोबाइल फोन आ गया तो उसे ओएलएक्स पर आईफोन एस-5 से एक्सचैंज कर लिया था.

कोलकाता से बीबीए की पढ़ाई करने के बाद सत्यम राय ने हिंदी, अंग्रेजी, भोजपुरी और बंगला सहित अन्य भाषाएं सीखीं, ताकि पूरे देश में विभिन्न बोलीभाषाओं में बात कर लोगों को झांसे में ले सके. पूछताछ में उस ने बताया था कि वह ठगी के जरिए मिली रकम के एक हिस्से से औनलाइन शौपिंग करता था, जिसे वह बेच कर पैसे खड़े कर लेता था.

पुलिस ने सत्यम राय से सैमसंग गैलेक्सी ए-7, आईफोन एस-5 और सैमसंग गैलेक्सी ए-5 फोन बरामद किए थे. उस से पूछताछ और उस के मोबाइल फोन की जांच से पता चला कि उस ने देश के अनेक राज्यों में ठगी के लिए कुल 2860 लोगों को फोन किए थे.

जयपुर के सूरज प्रजापति से 55 हजार रुपए की इसी तरह की गई ठगी में पुलिस ने सागरदास और उस के साले विक्कीदास को 26 फरवरी, 2017 को गिरफ्तार किया था. ये दोनों ठग झारखंड में जामताड़ा जिले के अंबेडकर चौक पंडेडीह के रहने वाले थे. पुलिस ने इन से 5 मोबाइल फोन बरामद किए थे. इन मोबाइल फोनों में फर्जी आईडी पर जारी किए गए सिम मिले थे. जीजासाले ने अलगअलग राज्यों में ठगी के लिए करीब 779 लोगों को फोन किए थे.

जयपुर निवासी राजेश कुमार वर्मा से बैंक अधिकारी बन कर 21 हजार 566 रुपए की  औनलाइन ठगी करने के मामले में जयपुर पुलिस ने झारखंड के जामताड़ा जिले के करमाटांड थाना के धरवाड़ी गांव के रहने वाले जयकांत मंडल को मार्च, 2017 के पहले सप्ताह में गिरफ्तार किया था.

पुलिस ने उस से 3 मोबाइल फोन, 4 सिम और 4 एटीएम कार्ड बरामद किए थे. वह झारखंड के धनबाद के देवली गोविंदपुर में रह कर आईटीआई कर रहा था. उस ने कई भाषाएं सीख रखी थीं. जांच में पता चला कि जयकांत ने ठगी के लिए विभिन्न मोबाइल नंबरों से अलगअलग राज्यों में ठगी के लिए करीब 9068 लोगों को फोन किए थे.

जांच में पता चला है कि झारखंड के जिला जामताड़ा के करमाटांड सहित कुछ इलाके साइबर अपराधियों के गढ़ हैं. कहा जाता है कि करमाटांड के झिलुआ गांव के रहने वाले सीताराम मंडल ने सन 2008-09 में बैंक अधिकारी बन कर लोगों से औनलाइन ठगी के साइबर अपराध को जन्म दिया था. इस का जाल अब पूरे जामताड़ा जिले में फैल चुका है. आजकल वहां 150 से अधिक गिरोह काम कर रहे हैं, जिन में 20 से 30 साल के युवा शामिल हैं.

इन में कुछ गिरोह ऐसे भी हैं, जिन्होंने वेतन और कमीशन के आधार पर दूसरे युवकों को नौकरी दे रखी है. कुछ पुराने ठग नई पीढ़ी के युवाओं को औनलाइन ठगी की ट्रेनिंग देते हैं और इस के बदले में मोटा मेहनताना वसूलते हैं. इन गिरोहों ने बैंक अधिकारी बन कर पूरे देश में अब तक कई अरब रुपए की ठगी की है.

मजे की बात यह है कि इन में ज्यादातर ठग ज्यादा पढ़ेलिखे नहीं हैं. लेकिन देश के अलगअलग राज्यों की भाषाएं सीख कर ये लोगों को ठग रहे हैं. देश में ऐसा कोई वर्ग नहीं है, जो इन की ठगी का शिकार न हुआ हो.

केंद्रीय मंत्री से ले कर, विभिन्न राज्यों के मंत्रियों, आईएएस एवं आईपीएस अधिकारियों, जज, डाक्टर, प्रोफेसर, आयकर अधिकारी, इंजीनियर, चार्टर्ड एकाउंटैंट, बिजनेसमैन सभी इन की ठगी का शिकार हो चुके हैं, जबकि इन लोगों को कहा जाता है कि ये अपनी बुद्धि और वाकचातुर्य के बल पर देश को चला रहे हैं.

आम आदमी को तो ये ठग कुछ ही मिनट में बातों में उलझा कर उस का एटीएम कार्ड और ओटीपी नंबर आदि हासिल कर लेते हैं. इन ठगों ने केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री, बांका के जिला जज, एयरपोर्ट अथौरिटी के एजीएम सहित तमाम बडे़बडे़ अधिकारियों को ठगा है.

साइबर ठगी में लगे तमाम लड़के उच्च शिक्षा भी हासिल कर सूचना प्रौद्योगिकी में दक्ष हो रहे हैं, ताकि लोगों को उन के हिसाब से हैंडल किया जा सके. जामताड़ा में साइबर क्राइम की शुरुआत एसएमएस से मोबाइल फोन का बैलेंस उड़ा कर दूसरों को सस्ती दरों पर मोबाइल फोन का बैलेंस बेचने से हुई थी. इस के बाद 8-9 सालों में यह जिला पूरे देश में चर्चित हो चुका है.

जामताड़ा इलाके से जब मोबाइल फोन से बहुत ज्यादा फोन किए जाने लगे तो मोबाइल कंपनियों को मोटी कमाई होने लगी. नेटवर्क की समस्या दूर करने के लिए मोबाइल कंपनियों ने वहां नए टौवर लगवा दिए, जिस से वहां नेटवर्क अच्छा हो गया. इस से ठगों का काम और ज्यादा आसान हो गया.

ठगी की रकम से ठग ऐशोआराम की जिंदगी जीते हैं. उन के पास आलीशान मकान और लग्जरी गाडि़यां हैं. सड़कें खराब होने से गाडि़यां चलाने में परेशानी हुई तो इन ठगों ने सड़कें भी खुद ही बनवा लीं. अब ये अपराधी खुद को भारतीय रिजर्व बैंक का अधिकारी बता कर ठगी करने लगे हैं. एटीएम रिन्यू करने, उस की वैलिडिटी बढ़ाने एवं आधार कार्ड से जोड़ने के बहाने तो कई सालों से चल रहे हैं.

जामताड़ा इलाके में रोजाना किसी न किसी राज्य की पुलिस साइबर ठगों की तलाश में पहुंचती रहती है. इसलिए अब यहां के ठग थोड़ेथोड़े समय के लिए दूसरे राज्यों में जा कर अपना  ठगी का धंधा करते हैं.

जामताड़ा से पिछले 2 सालों में 268 साइबर अपराधी गिरफ्तार किए गए हैं. इन से 16 सौ से ज्यादा मोबाइल फोन, 176 लग्जरी कारें और करोड़ों रुपए बरामद किए गए हैं.  जयपुर पुलिस की ओर से देवघर से गिरफ्तार मिथलेश ने पुलिस को बताया कि वह अपना एसबीआई का बैंक एकाउंट साइबर ठगों को किराए पर देता था. इस के बदले वह खाते में जमा होने वाली रकम से 20 प्रतिशत हिस्सा लेता था.

भले ही अपराधी पकड़े जा रहे हैं, लेकिन साइबर ठगी बंद होने का नाम नहीं ले रही है. पढ़लिख कर आदमी बुद्धिमान हो जाता है, लेकिन जामताड़ा के अनपढ़ या मामूली शिक्षित अपराधी उन लोगों की आंखों से भी काजल चुरा लेते हैं, जो खुद को सब से ज्यादा समझदार समझते हैं.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पढ़े लिखों पर भारी पड़ते अनपढ़ – भाग 2

इस औनलाइन ठगी से जे.सी. मोहंती परेशान हो उठे थे. उन्होंने बैंक मैनेजर से पैसों की निकासी रोकने को कहा ही नहीं, बल्कि बैंक की जरूरी कागजी खानापूर्ति भी की, ताकि औनलाइन ठगी करने वाले भविष्य में उन के खाते से पैसे न निकाल सकें. इस के बाद अपने औफिस पहुंच कर उन्होंने पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल को फोन कर के अपने साथ हुई साइबर ठगी की जानकारी दी.

जे.सी. मोहंती के साथ हुई ठगी की बात सुन कर संजय अग्रवाल हैरान रह गए. हैरानी की बात यह थी कि राजस्थान पुलिस और विभिन्न बैंकों की ओर से अकसर समाचार पत्रों, इलैक्ट्रौनिक और डिजिटल मीडिया द्वारा रोजाना लोगों को औनलाइन ठगी के बारे में जागरूक करने के लिए बताया जा रहा है कि किसी भी व्यक्ति को फोन पर अपने एटीएम कार्ड या बैंक खाते की डिटेल कतई न दें.

पुलिस और बैंकों की इतनी कवायद के बावजूद भी आम आदमी रोजाना इन ठगों का शिकार हो रहे हैं, लेकिन अगर कोई सीनियर आईएएस अफसर इस तरह की ठगी का शिकार हो जाए तो ताज्जुब होगा ही. संजय अग्रवाल ने जे.सी. मोहंती को रिपोर्ट दर्ज कराने की सलाह देते हुए साइबर ठगों को जल्दी ही पकड़ने का आश्वासन दिया.

मूलरूप से ओडि़सा के रहने वाले राजस्थान कैडर के सन 1985 बैच के आईएएस अधिकारी जे.सी. मोहंती ने उसी दिन जयपुर में शासन सचिवालय के पास स्थित थाना अशोकनगर में अपने साथ हुई इस ठगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी. औनलाइन ठगी का यह मात्र एक उदाहरण है. ऐसी ठगी राजस्थान सहित देश के लगभग हर राज्य में रोजाना सौ-पचास लोगों के साथ हो रही है. राजस्थान में सन 2016 में साइबर क्राइम के 907 मुकदमे दर्ज हुए थे, जिन में 530 मुकदमे सिर्फ जयपुर शहर में दर्ज हुए थे.

मुकदमों के दर्ज होने के बाद जांच में सामने आया कि साइबर ठग खुद को बैंक मैनेजर बता कर लोगों के मोबाइल पर फोन कर के कहते हैं कि ‘आप का एटीएम कार्ड बंद हो रहा है या आप के एटीएम कार्ड की क्रय करने की सीमा बढ़ाई जा रही है अथवा आप के एटीएम कार्ड को आधार कार्ड से लिंक किया जा रहा है.’

किसी भी व्यक्ति से ये ठग मोबाइल फोन पर कहते हैं कि ‘आप का एटीएम कार्ड पुराना हो गया है. उस के बदले नया कार्ड जारी किया जा रहा है, इसलिए आप को एटीएम कार्ड का नया पासवर्ड दिया जा रहा है. आप ने पिछली बार एटीएम से कब रकम निकाली थी? क्या आप ने नए केवाईसी या आधार कार्ड को लिंक नहीं किया है?’

बैंक वालों की तरह तकनीकी बातें कह कर ये ठग मोबाइल फोन पर ही लोगों से एटीएम कार्ड का नंबर, सीवीसी नंबर और ओटीपी नंबर पूछ लेते हैं. इस के बाद ये साइबर ठग स्मार्ट फोन या कंप्यूटर के माध्यम से मनी ट्रांसफर सौफ्टवेयर द्वारा उस व्यक्ति के खाते की रकम निकाल लेते हैं.

राजस्थान में इस तरह की लगातार हो रही ठगी की वारदातों का पता करने के लिए जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने अतिरिक्त पुलिस आयुक्त प्रफुल्ल कुमार के निर्देशन तथा पुलिस उपायुक्त (क्राइम) डा. विकास पाठक के नेतृत्व में क्राइम ब्रांच की तकनीकी शाखा एवं संगठित अपराध शाखा के अधिकारियों की एक टीम बनाई.

इस टीम ने जांच शुरू की तो पता चला कि इस तरह की वारदातें करने वाले महाराष्ट्र के पुणे जिले के तलेगांव इलाके में रह रहे हैं. टीम ने उन अपराधियों को चिन्हित कर उन की निगरानी शुरू की तो पता चला कि ये ठग कौल सैंटर की तर्ज पर बैंक अधिकारी बन कर रोजाना सैकड़ों लोगों को फोन करते हैं और उन से एटीएम कार्ड का नंबर आदि पूछ कर औनलाइन ठगी करते हैं.

कई दिनों की निगरानी के बाद क्राइम ब्रांच ने महाराष्ट्र के पुणे के एसपी (ग्रामीण) सुवेज हक तथा क्राइम ब्रांच के अधिकारियों की मदद से 27 मार्च को 5 लोगों को महाराष्ट्र के तलेगांव दाभाड़े से गिरफ्तार किया. इन में झारखंड के जिला जामताड़ा के करमाटांड निवासी 3 सगे भाई यूसुफ, मुख्तार एवं अख्तर शामिल थे. यूनुस के इन तीनों बेटों में यूसुफ सब से बड़ा और अख्तर सब से छोटा था.

इन के अलावा महाराष्ट्र के पुणे के तलेगांव दाभाड़े निवासी संजय सिंधे और शैलेश को भी गिरफ्तार किया गया था. इन के पास से पुलिस ने 10 छोटे और 4 बड़े मोबाइल फोन, 15 सिम, 7 एटीएम कार्ड और 9 लाख 86 हजार  500 रुपए बरामद किए थे. इन लोगों ने पिछले साल जयपुर के रहने वाले गोपाल बैरवा को फोन कर के उन से 29 हजार 600 रुपए ठगे थे. इस का मुकदमा जयपुर पूर्व के थाना बस्सी में दर्ज था.

गिरफ्तार अभियुक्तों को पुलिस जयपुर ले आई. इन से की गई पूछताछ में पता चला कि झारखंड के जामताड़ा जिले के करमाटांड के रहने वाले तीनों ठग भाइयों ने अपने गांव के ही दूसरे लोगों से बैंक अधिकारी बन कर औनलाइन ठगी करना सीखा और फर्जी आईडी से दर्जनों सिम हासिल कर के आसान तरीके से मोटा पैसा कमाने लगे.

ये लोग ठगी के लिए फर्जी आईडी से लिए गए सिम और दर्जनों मोबाइल का उपयोग करते थे, ताकि पुलिस इन तक पहुंच न सके. इन लोगों ने फर्जी मोबाइल सिमों पर ई-वौलेट भी रजिस्टर्ड करा रखे थे, जिन में शिकार हुए आदमी के बैंक खाते से औनलाइन पैसे ट्रांसफर करते थे. इस के बाद ये औनलाइन शौपिंग करते या ई-वौलेट के माध्यम से उस पैसे को अपने बैंक खाते में भेज देते. ये ठगी गई रकम से ई-वौलेट के जरिए मोबाइल भी रिचार्ज करते थे. इस के लिए ये मोबाइल की दुकान चलाने वालों से मिलीभगत कर उन्हें 30 से 40 प्रतिशत तक कमीशन का लालच देते थे. इस तरह मोबाइल रिचार्ज कर दुकानदारों से मिलने वाली रकम को ये लोग अपने घर वालों के बैंक खाते में जमा कराते थे.

देश भर में हो रही औनलाइन ठगी की वारदातों को देखते हुए झारखंड सहित विभिन्न राज्यों की पुलिस ने झारखंड के जामताड़ा इलाके में रहने वाले साइबर ठगों पर शिकंजा कसा तो करमाटांड के रहने वाले तीनों ठग भाई अपने साथियों संजय सिंधे और शैलेश की मदद से इसी साल फरवरी से पुणे के तलेगांव इलाके में किराए के एक मकान में रहने लगे. उसी मकान से ये पांचों ठगी की वारदात करते थे.

पूछताछ में पता चला कि इन पांचों अभियुक्तों ने पिछले एक साल में राजस्थान सहित देश के 23 राज्यों में 85 हजार से अधिक फोन किए थे. लेकिन ये मुख्य रूप से राजस्थान के लोगों को अपना निशाना बनाते थे. इस का पता इस से चलता है कि 85 हजार फोन में से लगभग 50 हजार फोन राजस्थान के सभी 33 जिलों में किए गए थे.

राजस्थान का ऐसा कोई जिला नहीं बचा था, जहां इन लोगों ने ठगी न की हो. अकेले जयपुर शहर में ही इन लोगों ने करीब 5 हजार फोन किए थे. पुलिस ने इन से जो करीब 10 लाख रुपए बरामद किए थे, ये रुपए एक महीने का कलेक्शन बताया गया था.

तीनों ठग भाइयों ने धोखाधड़ी से करोड़ों रुपए कमाए हैं. ठगी की रकम को इन्होंने करीब 25 बैंक खातों और 50 से अधिक ई-वौलेट में जमा कराई थी. इन के 10 बैंक खातों की डिटेल खंगाली जा रही है. इन में 4 खाते प्राइवेट बैंकों और 6 सरकारी बैंकों में हैं. इन में 4 बैंक खाते केरल में हैं. इन सभी खातों में 58 लाख 18 हजार रुपए जमा हुए थे, लेकिन इन में एक जनवरी, 2017 से 23 मार्च तक 8 लाख 49 हजार रुपए ही बचे थे.

जयपुर पुलिस ने इस से पहले औनलाइन ठगी के एक अन्य मामले में 23 मार्च को एक अभियुक्त दिनेश मंडल को मुंबई से वहां की पुलिस की मदद से गिरफ्तार किया था. मूलरूप से झारखंड के जामताड़ा का रहने वाला दिनेश मंडल मुंबई में वर्ली स्थित जनता कालोनी के कोलीकम में रह कर औनलाइन ठगी कर रहा था.

उस ने पिछले साल जयपुर के विनोद कुमार पाल को फोन कर के खुद को बैंक अधिकारी बता कर एटीएम कार्ड और ओटीपी नंबर पूछ कर उन के खाते से 7 हजार रुपए औनलाइन निकाल लिए थे. इस का मुकदमा जयपुर पश्चिम के थाना सदर में दर्ज हुआ था. पुलिस ने दिनेश मंडल से 4 मोबाइल फोन और 7 सिम बरामद किए थे. उस से की गई पूछताछ में पता चला कि उस ने ठगी के लिए मोबाइल फोन से लगभग 29 सौ लोगों को फोन किए थे.

ए सीक्रेट नाइट इन होटल – भाग 2

ट्रेन के ग्वालियर स्टेशन पहुंचतेपहुंचते अंधेरा छा गया था, पर इस प्रेमीयुगल के दिलोदिमाग में एक अछूते अंजाने अहसास को जी लेने का सुरूर छाता जा रहा था. स्टेशन पर उतर कर विवेक ने औटोरिक्शा किया. नई सवारियों को देख कर ही औटोरिक्शा वाले तुरंत ताड़ लेते हैं कि ये किसी लौज में जाएंगे. कुछ देर औटोरिक्शा इधरउधर घूमता रहा. दोनों ने कई होटल देखे, फिर रुकना तय किया होटल उत्तम पैलेस में.

ग्वालियर रेलवे स्टेशन के प्लेटफौर्म नंबर एक के बाहर की सड़क पर रुकने के लिए होटलों की भरमार है. चूंकि आमतौर पर रेलवे स्टेशनों के बाहर की होटलें जोड़ों को रुकने के लिए मुफीद नहीं लगतीं, इसलिए विवेक और रश्मि को उत्तम होटल पसंद आया. जो रेलवे स्टेशन से एक किलोमीटर दूर रेसकोर्स रोड पर सैनिक पैट्रोल पंप के पास स्थित है. दोनों को यह होटल सुरक्षित लगा.

औटो वाले को पैसे दे कर दोनों काउंटर पर पहुंचे तो वहां एक बुजुर्ग मैनेजर बैठा था, जिस की अनुभवी निगाहें समझ गईं कि यह नया जोड़ा है. मैनेजर पूरे कारोबारी शिष्टाचार से पेश आया और एंट्री रजिस्टर उन के आगे कर दिया. आजकल होटलों में रुकने के लिए फोटो आईडी अनिवार्य है, जो मांगने पर विवेक और रश्मि ने दिए तो मैनेजर ने तुरंत उन की फोटोकौफी कर के अपने पास रख ली.

खानापूर्ति कर दोनों अपने कमरे में आ गए. 6 घंटों से दिलोदिमाग में उमड़घुमड़ रहा प्यार का जज्बा अब आकार लेने लगा. दरवाजा बंद करते ही विवेक ने रश्मि को अपनी बांहों में जकड़ लिया और ताबड़तोड़ उस पर चुंबनों की बौछार कर दी. एक पुरानी कहावत है, आग और घी को पास रखा जाए तो घी पिघलेगा, जिस से आग और भड़केगी.

यही इस कमरे में हो रहा था. मंगेतर की बांहों में समाते ही रश्मि का संयम जवाब दे गया. जल्द ही दोनों बिस्तर पर आ कर एकदूसरे के आगोश में खो गए. तकरीबन एक घंटे कमरे में गर्म सांसों का तूफान उफनता रहा. तृप्त हो जाने के बाद दोनों फ्रेश हुए तो शरीर की भूख मिटने के बाद अब पेट की भूख सिर उठाने लगी.

रश्मि का मन बाहर जा कर खाना खाने का नहीं था, इसलिए विवेक ने कमरे में ही खाना मंगवा लिया. खाना खा कर टीवी देखते हुए दोनों दुनियाजहान की बातें करते आने वाले कल का तानाबाना बुनते रहे कि शादी के बाद हनीमून कहां मनाएंगे और क्याक्या करेंगे?

एक बार के संसर्ग से दोनों का मन नहीं भरा था, इसलिए फिर सैक्स की मांग सिर उठाने लगी, जिस में उस एकांत का पूरा योगदान था, जिस की जरूरत एक अच्छे मूड के लिए होती है. इस बार दोनों ने वे सारे प्रयोग कर डाले, जो वात्स्यायन के कामसूत्र सोशल मीडिया और इधरउधर से उन्होंने सीखे थे.

2-3 घंटे बाद दोनों थक कर चूर हो गए तो कब एकदूसरे की बांहों में सो गए, दोनों को पता ही नहीं चला. और जब चला तब तक सुबह हो चुकी थी. रश्मि और विवेक, दोनों के लिए ही यह एक नया अनुभव था, जिसे उन्होंने जी भर जिया था. दोनों के बीच कोई परदा नहीं रह गया था, पर इस बात की कोई ग्लानि उन्हें नहीं थी, क्योंकि दोनों शादी के बंधन में बंधने जा रहे थे.

सुबह अपना सामान समेट कर दोनों काउंटर पर पहुंचे और होटल का बिल अदा कर रिश्तेदार के यहां पहुंच गए. रश्मि ने चहकते हुए सभी रिश्तेदारों से विवेक का परिचय कराया, लेकिन दोनों यह बात छिपा गए कि वे रात को ही ग्वालियर आ गए थे और रात उन्होंने एक होटल में गुजारी थी. जाहिर है, यह बात बताने की थी भी नहीं.

उसी दिन शाम को दोनों वापस नोएडा के लिए रवाना हो गए. साथ में था एक रोमांटिक रात का दस्तावेज, जिसे याद कर दोनों सिहर उठते थे और एकदूसरे की तरफ देख हौले से मुसकरा देते थे. बात आई गई हो गई, पर दोनों के बीच व्हाट्सऐप और फेसबुक की चैटिंग में वह रात और उस की बातें और यादें ताजा होती रहीं. अब न केवल दोनों, बल्कि उन के घर वाले भी शादी की तैयारियां और खरीदारी में लग गए थे.

इन यादों से उबरते रश्मि की नजर फिर से टैग की हुई इस लाइन पर पड़ी ‘ए सीक्रेट नाइट इन होटल’ तो वह चौंक उठी कि अजीब इत्तफाक है. फैं्रड रिक्वैस्ट भेजने वाले ने जैसे उस की यादों को जिंदा कर दिया था. रश्मि की जिज्ञासा अब शबाब पर थी कि आखिर इस लाइन का मतलब क्या है? लिहाजा उस ने कुछ सोच कर उस अंजान व्यक्ति की फ्रैंड रिक्वै

स्ट स्वीकार कर ली.

जैसे ही उस ने इस नए फेसबुक फ्रैंड का एकाउंट खोला, वह भौचक रह गई. भेजने वाले ने एक पैराग्राफ का यह मैसेज लिख रखा था.

‘रश्मिजी, आप का कमसिन फिगर लाखों में एक है. जब से मैं ने आप को देखा है, मेरी रातों की नींद उड़ गई है. वीडियो में आप एक लड़के को प्यार कर रही हैं. सच कहूं तो मुझे उस लड़के की किस्मत से जलन हो रही है. काश! उस युवक की जगह मैं होता तो आप मुझे उसी तरह टूट कर प्यार करतीं. आप को यकीन नहीं हो रहा हो तो अब वीडियो देखिए.’

अव्वल तो मैसेज पढ़ कर ही रश्मि के दिमाग के फ्यूज उड़ गए थे. रहीसही कसर वह वीडियो देखने पर पूरी हो गई, जिस में उत्तम होटल के कमरे में उस के और विवेक के बीच बने सैक्स संबंधों की तमाम रिकौर्डिंग कंप्यूटर स्क्रीन पर दिख रही थी.

 

पढ़े लिखों पर भारी पड़ते अनपढ़ – भाग 1

मार्च, 2017 के तीसरे या चौथे सप्ताह की बात है. छुट्टी का दिन होने की वजह से भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी जे.सी. मोहंती दोपहर को अपने सरकारी बंगले में बने औफिस में बैठे फाइलें देख रहे थे. उन की टेबल पर फाइलों का ढेर लगा था. वह राजस्थान में जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी के भूजल विभाग में अतिरिक्त मुख्य सचिव हैं. वह पानी के महकमे से जुड़े हैं और इस समय गर्मी का मौसम चल रहा है, इसलिए फाइलों की संख्या काफी हो गई थी.

वह फाइल पर मातहत अधिकारियों द्वारा लिखी गई टिप्पणियों को ध्यान से पढ़ रहे थे कि अचानक उन के मोबाइल फोन की घंटी बजी. उन्होंने मोबाइल के स्क्रीन पर आने वाले नंबर को सरसरी तौर पर देखा और फिर स्विच औन कर के कहा, ‘‘हैलो.’’

‘‘सर, मैं स्टेट बैंक औफ इंडिया से बोल रहा हूं.’’ फोन करने वाले ने कहा.

‘‘हां, बताइए.’’ श्री मोहंती ने फाइल पर नजरें गड़ाए हुए ही कहा.

‘‘सर, आप को पता ही होगा कि एक अप्रैल से स्टेट बैंक औफ बीकानेर एंड जयपुर  सहित देश के 5 बैंकों का एसबीआई में विलय हो रहा है. आप का खाता एसबीबीजे में है. आप के एसबीबीजे के एटीएम कार्ड का वेरिफिकेशन करना है, ताकि उसे एसबीआई से जोड़ा जा सके.’’ दूसरी ओर से फोन करने वाले ने नपेतुले शब्दों में कहा.

बात करने वाले का लहजा सभ्य और अधिकारी जैसा था. इसलिए जे.सी. मोहंती ने पूछा, ‘‘वह तो ठीक है, लेकिन इस में मुझे क्या करना है?’’

‘‘सर, आप अपने एटीएम कार्ड के नंबर बता दीजिए.’’ फोन करने वाले ने कहा.

एसबीबीजे के एसबीआई में विलय की बात श्री मोहंती को पता थी, क्योंकि रोज ही मीडिया में इस की खबरें आ रही थीं. इसलिए उन्होंने टेबल पर ही रखे अपने पर्स से स्टेट बैंक औफ बीकानेर एंड जयपुर का एटीएम कार्ड निकाल कर उस पर सामने की ओर लिखे बारह अंकों का नंबर फोन करने वाले को बता दिया.

दूसरी ओर से फोन करने वाले ने एटीएम कार्ड नंबर नोट करते हुए दोबरा बोल कर कन्फर्म करते हुए कहा, ‘‘थैंक्यू सर, आप का एक मिनट और लूंगा, आप को एटीएम कार्ड के पीछे लिखा सीवीवी नंबर भी बताना होगा.’’

जे.सी. मोहंती ने सीवीवी नंबर भी बता दिया. इस के बाद फोन कट गया तो वह फिर से अपने काम में व्यस्त हो गए. कुछ देर बाद उन के मोबाइल पर एक मैसेज आया. उन्होंने मैसेज देखा तो उस में ओटीपी नंबर था. उसे उन्होंने अपनी डायरी में नोट कर लिया.

मैसेज आने के करीब 10 मिनट बाद उन के मोबाइल पर एक बार फिर उस व्यक्ति का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘सर, आप को एक बार और कष्ट दे रहा हूं. आप के मोबाइल पर ओटीपी नंबर का मैसेज आया होगा. इसी ओटीपी नंबर से आप के एटीएम कार्ड और बैंक खाते का वेरिफिकेशन किया जाएगा. कृपया आप वह ओटीपी नंबर बता दीजिए, ताकि आप के खाते और एटीएम कार्ड को वेरिफाई कर के स्टेट बैंक औफ इंडिया से जोड़ कर अपडेट किया जा सके.’’

कुछ देर पहले ही अपनी पर्सनल डायरी में लिखा ओटीपी नंबर जे.सी. मोहंती ने सहज भाव से फोन करने वाले को बता दिया और अपने काम में व्यस्त हो गए. शासन सचिवालय में आसीन आईएएस अधिकारियों का जीवन बहुत व्यस्त होता है. दिनभर मीटिंगों और फाइलों में सिर खपाना पड़ता है.

कभी संबंधित मंत्री बुला लेते हैं तो कभी मुख्य सचिव. मुख्यमंत्री औफिस से भी दिन में 2-4 बार किसी न किसी फाइल के बारे में पूछताछ की जाती है. वैसे भी उन दिनों राजस्थान विधानसभा का बजट सत्र चल रहा था, इसलिए भूजल विभाग के सवालों के जवाब के लिए उन का विधानसभा में उपस्थित रहना जरूरी था.

इन्हीं व्यस्तताओं के बीच जे.सी. मोहंती के मोबाइल पर पचासों मैसेज ऐसे आए, जिन्हें वह खोल कर देख या पढ नहीं सके. 3 अप्रैल, को वह सचिवालय के अपने औफिस में बैठे थे. जिस समय वह थोड़ा फुरसत में थे, तभी उन के मोबाइल पर एक मैसेज आया. उन्होंने वह मैसेज पढ़ा तो हैरान रह गए. मैसेज के अनुसार उन के बैंक खाते से 30 हजार रुपए निकाले गए थे.

जबकि बैंक से या एटीएम से उन्होंने कोई पैसे नहीं निकाले थे, इसलिए वह परेशान हो उठे. वह तुरंत शासन सचिवालय में ही स्थित स्टेट बैंक औफ बीकानेर एंड जयपुर की शाखा पर पहुंचे और बैंक मैनेजर को पूरी बात बताई. बैंक मैनेजर ने मामले की गंभीरता को समझते हुए तुरंत जे.सी. मोहंती के बैंक खाते की डिटेल निकलवाई, जिसे देख कर श्री मोहंती को झटका सा लगा. उन के बैंक खाते से 22 मार्च से 3 अप्रैल के बीच अलगअलग समय में 2 लाख 73 हजार रुपए निकाले गए थे.

उन के मोबाइल पर बैंक की ओर से इस निकासी के मैसेज भी भेजे गए थे, पर व्यस्तता की वजह से वह उन मैसेजों को देख नहीं सके थे. खाते से करीब पौने 3 लाख रुपए निकलने की डिटेल देख कर जे.सी. मोहंती को करीब 15 दिनों पहले मोबाइल पर आए उस फोन की याद आ गई, जिस में खुद को बैंक अधिकारी बता कर किसी आदमी ने उन से एटीएम कार्ड का नंबर, सीवीसी नंबर और ओटीपी नंबर मांगा था.

जे.सी. मोहंती को समझते देर नहीं लगी कि वह साइबर ठगों द्वारा ठगी का शिकार हो गए हैं. उन के साथ औनलाइन ठगी की गई है. उन्हें दुख इस बात का था कि सितंबर, 2016 में एक बार और उन के साथ साइबर ठगी हो चुकी थी. उस समय उन के क्रेडिट कार्ड से विदेश में 86 हजार रुपए की शौपिंग की गई थी. जयपुर के थाना अशोकनगर में इस की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी. लेकिन ठगों का पता नहीं चल सका था.