अधेड़ उम्र का खूनी प्यार – भाग 1

देश की राजधानी दिल्ली की सीमा से सटा हरियाणा का एक जिला है गुरुग्राम. इसी गुरुग्राम जिले के बादशाहपुर के बड़ा बाजार में सिटी हेल्थ सेंटर के पास रहता था मधुसूदन सिंगला. मधुसूदन की उम्र करीब 52 वर्ष थी. मधुसूदन घर में ही टेलरिंग शौप चलाता था. 22 वर्ष पहले मधुसूदन का विवाह सविता से हुआ था. सविता बादशाहपुर के ज्ञान भारती स्कूल में टीचर थी.

उन के 3 बच्चे हुए, जिन में 2 बेटियां और एक बेटा है. इस समय बड़ी बेटी 21 साल की, दूसरी बेटी 19 साल की और बेटा 18 साल का है. तीनों बच्चे पढ़ रहे थे. रोज तीनों बच्चे कालेज चले जाते थे. सविता भी स्कूल बच्चों को पढ़ाने के लिए चली जाती थी. घर दुकान में अकेला रह जाता था मधुसूदन.

26 जून 2023 को भी मधुसूदन रोज की तरह घर में अकेला था. दोपहर ढाई बजे के करीब मधुसूदन की बड़ी बेटी रवीना कालेज से वापस घर आई तो घर का मेन गेट खुला हुआ था. गेट से जब वह अंदर पहुंची तो कमरे में सामने ही अपने पिता को खून से लथपथ पड़ा देखा. अपने पिता को उस हाल में देख कर उसकी चीख निकल गई. वह फौरन वहां से तेजी से बाहर निकली और थोड़ी दूर पर रहने वाले अपने चाचा सोनू के पास पहुंच गई.

उस ने रोतेबिलखते चाचा को पिता के खून से लथपथ कमरे में पड़े होने की बात बता दी. यह सुनते ही सोनू और घर के अन्य लोग तेज कदमों से मधुसूदन के घर पहुंच गए. सोनू और घर वालों ने जब मधुसूदन को देखा तो पता चला कि मधुसूदन की मौत हो चुकी है. चीखपुकार सुन कर आसपास के लोग भी वहां एकत्र हो गए. उन में से ही किसी व्यक्ति ने स्थानीय बादशाहपुर थाने को घटना की सूचना दे दी.

खून से लथपथ मिली लाश

बादशाहपुर पुलिस और पुलिस के आला अधिकारीगण घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने लाश का निरीक्षण किया. मृतक मधुसूदन के सिर पर किसी भारी वस्तु से प्रहार किया गया था, यह बात उस के सिर के घाव देखने के बाद पता चली. इस के अलावा उस के गले को किसी तेज धारदार हथियार से काटा गया था.

कमरे का सारा सामान बिखरा पड़ा था, अलमारियां खुली पड़ी थीं. शुरुआती जांच में मामला लूट के बाद हत्या का लग रहा था. अनुमान लगाया जा रहा था कि मधुसूदन घर में अकेले थे, इसलिए कोई बदमाश लूट के इरादे से घर में घुसा, मधुसूदन ने विरोध किया तो बदमाश ने उन की हत्या कर दी होगी.

बदमाश घर से कोई सामान ले जाने में सफल हुआ कि नहीं, ये पता नहीं चला. पति की हत्या की खबर मिलने पर सविता भी घर आ गई थी. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने किसी पर शक नहीं जताया. घर से क्या कुछ गायब हुआ है तो सविता भी कुछ न बता सकी.

पुलिस ने आसपास के लोगों से जानकारी जुटाई तो पता चला कि मृतक के घर की जमीन के लेनदेन को ले कर कुछ समझौता हुआ था, जिस के एवज में कई लाख रुपए मिले थे, जिस की सूचना उन के परिचित व कुछ निजी लोगों को थी. हो सकता है, उन पैसों के कारण यह घटना तो अंजाम नहीं दी गई. यह बात भी पता चली कि घटना से पहले मधुसूदन के पास बिना मूंछों वाला एक व्यक्ति बैठा देखा गया था.

क्राइम ब्रांच ने की जांच शुरू

फिलहाल पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया. फिर थाने में अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. इस हत्याकांड की जांच क्राइम ब्रांच सेक्टर 39 की यूनिट को सौंप दी गई. इस यूनिट के प्रभारी थे पंकज कुमार.

थाना पुलिस के सहयोग से क्राइम ब्रांच यूनिट ने केस की जांच शुरू कर दी. पुलिस ने घटनास्थल के आसपास के सीसीटीवी कैमरे खंगाले. उन कैमरों की फुटेज में कोई भी संदिग्ध व्यक्ति नहीं दिखा, लेकिन घटना से पहले मधुसूदन की पत्नी जरूर घर आतीजाती एक युवक के साथ दिखी. उस युवक के हाथ में एक छाता था.

घटना से पहले और बाद में भी उन का साथ जाना पुलिस वालों के जेहन में शक पैदा कर गया. आनेजाने के बीच का समय काफी ज्यादा था. घटना भी दोपहर एक बजे से दो बजे के बीच अंजाम दी गयी थी. घटना का समय और उन दोनों के आने जाने का समय इस बात का यकीन दिला रहा था कि मधुसूदन की हत्या इन दोनों द्वारा ही की गई है.

सविता के साथ वाले युवक के बारे में पता किया गया तो पता चला कि सविता के साथ दिखने वाला युवक आशीष वर्मा उर्फ टीनू है. वह सविता के स्कूल में ही टीचर है. जानकारी जुटाने के बाद पुलिस ने दोनों के खिलाफ और सुबूत जुटाने शुरू किए.

पुलिस ने सविता के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई, जिस में सविता द्वारा एक नंबर पर हर रोज ज्यादा बात किए जाने की बात पता चली. घटना वाले दिन भी उस फाने पर बातें हुई थीं. घटना के समय दोनों के नंबरों की लोकेशन भी घटनास्थल पर पाई गई. जांच करने पर वह नंबर किसी और का नहीं, बल्कि आशीष वर्मा का ही निकला. आशीष बादशाहपुर में ही रहता था.

इस के बाद अगले ही दिन 27 जून, 2023 को पुलिस ने सविता और आशीष वर्मा को गिरफ्तार कर लिया. बादशाहपुर थाने ला कर जब सविता और आशीष से पूछताछ की गई तो दोनों पुलिस को बरगलाने लगे, लेकिन जब पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज, काल डिटेल्स और लोकेशन रिपोर्ट दोनों के सामने सुबूत के तौर पर रखी तो दोनों समझ गए कि इन का भांडा फूट गया है. तब दोनों ने इस मर्डर केस का जुर्म स्वीकार करते हुए हत्या के पीछे की पूरी कहानी बयान कर दी.

स्कूल के टीचर से हो गया प्यार

मधुसूदन सिंगला के साथ सविता 22 साल से किसी तरह निभा रही थी. मधुसूदन शराब का शौकीन था. ये शौक उस की आदत में इस कदर शुमार था, कि वह हर रोज शराब पीता था. यहां तक तो चलो कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन इस के बाद जो होता था, वह बरदाश्त के बाहर वाला मामला था. शराब पीने के बाद मधुसूदन हैवान बन जाता था, वह रोज किसी न किसी बात को ले कर सविता से झगड़ पड़ता था और उस की जम कर पिटाई कर देता था.

मौज मजा बन गया सजा

मौज मजा बन गया सजा – भाग 3

बलदाऊ यादव डा. सुनील के ही यहां था. थोड़ी देर में डा. अशोक कुमार भी मैडिकल कालेज परिसर स्थित डा. सुनील आर्या के आवास पर पहुंच गए. इस के बाद डा. अशोक कुमार अपनी गाड़ी से तो डा. सुनील आर्या ने अपनी गाड़ी में बलदाऊ को बैठा लिया. अविनाश चौहान शरीफ के साथ उस की गाड़ी में बैठ गया था.  सभी पनियरा डाक बंगले की ओर चल पड़े. सभी रात डेढ़ बजे के करीब वे लोग गेस्टहाऊस पहुंचे.

आराधना मिश्रा बाहर ही खड़ी रह गईं, जबकि डा. अशोक कुमार, डा. सुनील आर्या, शरीफ, अविनाश और बलदाऊ डाकबंगले के अंदर चले गए. अंदर पहुंच कर डा. अशोक कुमार ने अराधना के बारे में पूछा तो डा. आर्या ने कहा, ‘‘आराधना फ्रेश होने गई है. अभी आ जाएगी.’’

डा. अशोक कुमार वहीं पड़ी कुर्सी पर बैठ गए. इस के बाद उसी के सामने कुर्सी रख कर डा. आर्या भी बैठ गए. उस ने डा. अशोक कुमार को बातों में उलझा लिया तो शरीफ ने देशी तमंचा निकाल कर उस की कनपटी से सटाया और ट्रिगर दबा दिया. गोली लगते ही डा. अशोक कुमार लुढ़क कर छटपटाने लगा.

थोड़ी देर में वह खत्म हो गया तो डा. आर्या ने बलदाऊ से अपनी कार से तौलिया मंगा कर उस के सिर में लपेट दिया. इस के बाद लाश उठा कर शरीफ अहमद की इंडिका में रख दी गई. गेस्टहाउस से तकिए का कवर निकाल कर बलदाऊ ने फर्श पर फैला खून साफ किया और उस तकिए के कवर को भी रख लिया.

एक बार फिर तीनों कारें चल पड़ीं. उस समय रात के ढाई बज रहे थे. डा. अशोक कुमार की कार अविनाश चला रहा था तो लाश वाली गाड़ी में शरीफ के साथ बलदाऊ बैठा था. आराधना मिश्रा डा. सुनील आर्या की कार में थी. गोरखपुर के भटहट पहुंच कर लाश को शरीफ की गाड़ी से निकाल कर मृतक डा. अशोक कुमार की कार में डाला जाने लगा तो आराधना को पता चला कि डा. अशोक कुमार की हत्या कर दी गई है. वह डर गई, लेकिन बोली कुछ नहीं.

वहीं डा. सुनील आर्या ने अपनी कार अविनाश को दे कर आराधना को उस के साथ गोरखपुर भेज दिया. जबकि खुद शरीफ और बलदाऊ के साथ लाश को ठिकाने लगाने के लिए देवरिया की ओर चल पड़ा. इस के बाद देवरिया-सलेमपुर रोड पर स्थित वन विभाग की पौधशाला के पास डा. अशोक की लाश को फेंक दिया.

उसी के साथ उन्होंने तौलिया और तकिया का कवर भी फेंक दिया था. लाश तो ठिकाने लग गई थी, अब कार को ठिकाने लगाना था. कार ले जा कर उन्होंने जिला मऊ के थाना दक्षिण टोला के जहांगीराबाद में सड़क किनारे खड़ी कर दी. उस के बाद सभी गोरखपुर वापस आ गए.

तीनों से पूछताछ के बाद पुलिस ने बलदाऊ यादव को भी गिरफ्तार कर लिया था. इस के बाद शरीफ की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त 315 बोर का एक देशी पिस्तौल, 2 कारतूस, हत्या के समय पहने कपड़े बरामद कर लिए थे. कार में लगे खून के धब्बे के नमूने परीक्षण के लिए लखनऊ भेज दिए गए थे.

आराधना मिश्रा की डा. अशोक कुमार की हत्या में कोई भूमिका नहीं थी, इसलिए पुलिस ने उसे पूछताछ के बाद छोड़ दिया था. लेकिन गवाहों की सूची में उस का भी नाम था. पुलिस ने इस मामले में 34 लोगों को गवाह बनाया था.

अभियुक्तों के बयान और सभी गवाहों के गवाही होने में काफी अरसा लग गया. लगभग 13 सालों तक चले डा. अशोक कुमार की हत्या के मुकदमे का फैसला सुनाया गया 11 अप्रैल, 2014 को. न्यायमूर्ति श्री सुरेंद्र कुमार यादव ने डा. अशोक कुमार की हत्या का दोषी मानते हुए 52 पृष्ठों का अपना फैसला सुनाया था.

फैसले में अभियुक्त अविनाश चौहान, शरीफ अहमद, डा. सुनील आर्या तथा बलदाऊ यादव को आजीवन कारावास के साथ 10-10 हजार रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई थी. जुर्माना अदा न करने पर एक साल की अतिरिक्त सजा भोगनी होगी. सजा सुनाते ही सभी अभियुक्तों को पुलिस ने अपनी कस्टडी में ले कर जेल भेज दिया. अब चारों अभियुक्त हाईकोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं.

—कथा अदालत द्वारा सुनाए फैसले पर आधारित

मौज मजा बन गया सजा – भाग 2

अगले दिन जब डा. अशोक कुमार के लापता होने की खबर अखबारों में छपी तो मऊ पुलिस को लगा कि बरामद कार डा. अशोक कुमार की है, क्योंकि कार का जो नंबर था, उसी नंबर की जेन कार ले कर वह निकले थे. मऊ पुलिस ने कार बरामद होने की सूचना गोरखपुर पुलिस को दी तो गोरखपुर पुलिस डा. अशोक कुमार के घर वालों को साथ ले कर मऊ के थाना दक्षिण टोला जा पहुंची.

घर वालों ने कार की शिनाख्त कर दी. कार डा. अशोक कुमार की ही थी. कार की स्थिति देख कर सभी को यही लगा कि डा. अशोक कुमार के साथ कोई अनहोनी घट चुकी है. अखबारों में छपी खबर पढ़ कर देवरिया पुलिस ने गोरखपुर पुलिस को अपने यहां से एक लाश बरामद होने की सूचना दी.

उसी सूचना के आधार पर महावीर प्रसाद के बड़े दामाद जयराम प्रसाद गोरखपुर पुलिस के साथ देवरिया के थाना खुखुंदू जा पहुंचे. लाश के फोटो और कपड़े आदि देख कर उन्होंने बता दिया कि फोटो और सामान डा. अशोक कुमार के हैं. संदेह तो पहले ही था, अब साफ हो गया कि डा. अशोक कुमार की हत्या हो चुकी है. इस के बाद परिवार में कोहराम मच गया.

मामला हाईप्रोफाइल था, इसलिए इस मामले के खुलासे के लिए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक विजय कुमार ने इस मामले की जांच में चौराचौरी के क्षेत्राधिकारी, एसओजी प्रभारी और क्षेत्राधिकारी एस.के. भगत के नेतृत्व में 3 टीमें बना कर लगा दीं. चूंकि मामला एससी/एसटी का था, इसलिए इस मामले की जांच क्षेत्राधिकारी एस.के. भगत को सौंपी गई थी.

क्षेत्राधिकारी एस.के. भगत ने जब अपने हिसाब से इस मामले की जांच की तो पता चला कि डा. अशोक कुमार काफी आशिकमिजाज आदमी थे. वह अपने कुछ खास मित्रों के साथ पनियारा स्थित वन विभाग के बांकी डाक बंगले में अकसर मौजमस्ती के लिए जाया करते थे. उन्होंने जब उन के खास दोस्तों के बारे में पता किया तो वे थे बीआरडी मैडिकल कालेज के प्रोफेसर डा. सुनील आर्या, कपड़ा व्यवसायी शरीफ अहमद, साइबर कैफे चलाने वाला अविनाश चौहान और बलदाऊ यादव. इन में एक महिला भी थी, जिस का नाम था अराधना मिश्रा, जो नर्स थी.

इस जानकारी के बाद एस.के. भगत ने डा. सुनील आर्या, शरीफ अहमद, अविनाश चौहान और बलदाऊ यादव की ही नहीं, डा. अशोक कुमार की भी घटना के दिन एवं उस से 3 दिन पहले की मोबाइल फोन एवं लैंडलाइन फोनों की काल डिटेल्स निकलवा ली. इस से पता चला कि डा. अशोक कुमार के मोबाइल फोन पर अंतिम फोन डा. सुनील आर्या का आया था. उसी के बाद डा. अशोक कुमार गायब हुए थे.

इस से मामले की जांच कर रहे क्षेत्राधिकारी एस.के. भगत को डा. सुनील आर्या पर ही नहीं, उन के अन्य साथियों पर शक हुआ.  इस के बाद शक के आधार पर ही उन्होंने डा. सुनील आर्या, अविनाश चौहान, बलदाऊ यादव और शरीफ अहमद को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. कई चक्रों में की गई पूछताछ में जब घटना का खुलासा हुआ तो जो बातें सामने आईं, वह हैरान करने वाली थीं. पता चला कि डा. अशोक कुमार की हत्या उन के इन्हीं दोस्तों ने की थी.

डा. अशोक कुमार, डा. सुनील आर्या, शरीफ अहमद, अविनाश चौहान और बलदाऊ यादव शराब और शबाब के यार थे. ये सभी एक साथ शराब पीते और एक साथ अय्याशी करते. डा. अशोक कुमार अपने यार डा. सुनील आर्या के घर बैठ कर शराब पीते तो उन की पत्नी रंजना को जरा भी ऐतराज न होता. इसी तरह डा. सुनील डा. अशोक के यहां बैठ कर शराब पीते तो निर्मला भी ऐतराज नहीं करती थी. इस तरह दोनों लगभग रोज ही पार्टी करते थे.

6 जुलाई, 2001 को अविनाश चौहान के भांजे के जन्मदिन की पार्टी थी. उस पार्टी में डा. अशोक कुमार और डा. सुनील आर्या भी आमंत्रित थे. डा. अशोक कुमार तो निर्मला के साथ पार्टी में पहुंच गए, लेकिन डा. सुनील आर्या उस दिन लखनऊ में थे, इसलिए पार्टी में नहीं आ पाए. केवल उन की पत्नी रंजना आर्या ही आई थीं.

पार्टी में पीने की भी व्यवस्था थी. डा. अशोक कुमार पीने के शौकीन थे ही. वह शराब पी रहे थे, तभी किसी ने उन से पूछा, ‘‘डा. साहब, आज अकेलेअकेले ही पार्टी का मजा ले रहे हैं. आप के मित्र नहीं आए हैं क्या?’’

‘‘यार नहीं आया तो क्या हुआ, उस की मैडम तो आई हैं. उस की कमी मैं पूरी कर दूंगा. हम दोनों के बीच सब चलता है.’’ डा. अशोक कुमार ने नशे में कहा.

डा. अशोक कुमार के पास ही अविनाश खड़ा था, इसलिए उस ने ये बातें सुन ली थीं. डा. अशोक कुमार की बात से उसे हैरानी हुई कि यह नया खेल कब से शुरू हो गया? जबकि उन की दोस्ती काफी पुरानी थी. उस ने तो ऐसा कभी नहीं सुना था.

डा. अशोक कुमार की यह बात अविनाश को बहुत बुरी लगी. बुरी लगने की एक वजह यह थी कि वह डा. सुनील आर्या का सगा साढू था. देर रात पार्टी खत्म हुई तो अविनाश को अशोक कुमार की बात उस के दिमाग में घूमने लगी. क्योंकि अशोक ने एक तरह से उस की साली को गाली दी थी. गाली भी ऐसी, जो सहन करने लायक नहीं थी. उस से नहीं रहा गया तो उस ने डा. सुनील को फोन कर के डा. अशोक द्वारा रंजना के बारे में कही गई बात बता दी.

अविनाश की बातें सुन कर डा. सुनील आर्या के तनबदन में आग लग गई. उस ने कहा, ‘‘मैं अभी गोरखपुर के लिए निकल रहा हूं. उस कमीने ने जो उलटासीधा कहा है, उस की सजा तो उसे मिलनी ही चाहिए.’’

सवेरा होते ही डा. सुनील आर्या गोरखपुर के लिए रवाना हो गए. उस समय उन के साथ उन की महिला मित्र आराधना मिश्रा के अलावा बलदाऊ यादव भी था. वहीं से उन्होंने शरीफ अहमद को फोन कर के गोरखपुर में मिलने के लिए कहा.

गोरखपुर पहुंच कर डा. सुनील आर्या ने अपने सभी साथियों यानी अविनाश चौहान, शरीफ अहमद, बलदाऊ यादव और आराधना मिश्रा को विश्वास में ले कर डा. अशोक कुमार की हत्या की योजना बना डाली.

10 जुलाई की रात डा. सुनील आर्या पत्नी रंजना के साथ एक पार्टी में गए. पार्टी में खाना खा कर उन्होंने पत्नी को घर पहुंचाया और खुद कार से निकल पड़े. इस के बाद वह मैडिकल कालेज के उत्तरी गेट पर पहुंचे, जहां नर्स आराधना मिश्रा उन का इंतजार कर रही थी. आराधना को कार में बैठा कर उन्होंने डा. अशोक कुमार को फोन किया, ‘‘भई, आज रात का क्या प्रोग्राम है?’’

‘‘आज तो कोई प्रोग्राम नहीं है.’’

डा. अशोक कुमार ने कहा तो डा. सुनील आर्या ने कहा, ‘‘सोच रहा हूं, आज बढि़या सा प्रोग्राम रखा जाए, जिस में सब कुछ हो. तुम कहो तो आराधना मिश्रा को बुला लूं?’’

डा. अशोक कुमार भला क्यों मना करते. उन्होंने हामी भर दी. इस तरह डा. सुनील आर्या जो चाहते थे, वह हो गया.  डा. अशोक कुमार से बात करने के बाद डा. सुनील आर्या ने शरीफ और अविनाश को फोन कर के बुला लिया. शरीफ अपनी इंडिका कार से उस के यहां पहुंच गया.

मौज मजा बन गया सजा – भाग 1

गोरखपुर के अपर सत्र न्यायाधीश (विशेष) अनुसूचित जाति/जनजाति श्री सुरेंद्र कुमार यादव  की अदालत में एक बहुत ही चर्चित मामले का फैसला सुनाया जाने वाला था, इसलिए उस दिन अदालत में मीडिया वालों के साथसाथ आम लोगों की कुछ ज्यादा ही भीड़ थी.

दरअसल हत्या के जिस मामले का फैसला सुनाया जाना था, उस मामले में मृतक डा. अशोक कुमार कोई मामूली आदमी नहीं थे. वह कांगे्रस के जानेमाने नेता और हरियाणा के राज्यपाल रहे स्व. महावीर प्रसाद के दामाद थे. उस भीड़ में मृतक डा. अशोक कुमार के ही नहीं, उन की हत्या के आरोपी अविनाश चौहान, शरीफ अहमद, डा. सुनील आर्या और बलदाऊ यादव के घर वाले भी मौजूद थे.

सरकारी वकील इरफान मकबूल खान ने जहां चारों अभियुक्तों को हत्या का दोषी ठहरा कर कठोर से कठोर सजा देने की मांग की थी, वहीं बचाव पक्ष के वकील का कहना था कि उन के मुवक्किलों को गलत तरीके से फंसाया गया है. पुलिस ने जो सुबूत पेश किए हैं, वे घटना एवं घटनास्थल से मेल नहीं खाते, उन के मुवक्किल निर्दोष हैं, जिस से उन्हें बरी किया जाए.

इस हत्याकांड का फैसला जानने से पहले आइए इस हत्याकांड के बारे में जान लें, जिस से फैसला जानने में थोड़ी आसानी रहेगी.

जिन डा. अशोक कुमार की हत्या के मुकदमे का फैसला सुनाया जाना था, वह उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर की कोतवाली शाहपुर की पौश कालोनी आवासविकास के मकान नंबर बी-88 में रहने वाले सबइंस्पेक्टर के पद से रिटायर हुए दूधनाथ के 3 बेटों में सब से बड़े बेटे थे.

दूधनाथ सरकारी नौकरी में थे, इसलिए उन्होंने अपने सभी बच्चों की पढ़ाईलिखाई पर खास ध्यान दिया था. इसी का नतीजा था कि उन के बड़े बेटे अशोक कुमार का चयन सीपीएमटी में हो गया था. कानपुर के गणेशशंकर विद्यार्थी मैडिकल कालेज से एमबीबीएस करने के बाद नेत्र चिकित्सा में विशेष योग्यता हासिल करने के लिए वह दिल्ली स्थित आल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ मैडिकल साइंसेज चले गए थे.

एम्स से एमएस करने के बाद डा. अशोक कुमार ने दिल्ली के आई केयर सेंटर में नौकरी कर ली. वहां से ठीकठाक अनुभव प्राप्त कर के वह गोरखपुर आ गए और गोरखपुर के शाहपुर में नेहा आई केयर सेंटर के नाम से अपना खुद का अस्पताल खोल लिया.

जल्दी ही डा. अशोक कुमार की गिनती गोरखपुर के मशहूर नेत्र विशेषज्ञों में होने लगी, जिस से शोहरत भी मिली और पैसा भी आया. फिर दोस्तों की भी संख्या बढ़ने लगी. लेकिन उन की सब से ज्यादा घनिष्ठता थी डा. सुनील आर्या से. इस की एक वजह यह थी कि डा. सुनील आर्या उन के किशोरावस्था के दोस्त थे. इस के अलावा दोनों एक ही पेशे से जुड़े थे, फिर दोनों के स्वभाव भी एक जैसे थे. डा. सुनील आर्या मैडिकल कालेज में प्रोफेसर थे.

डा. अशोक कुमार डाक्टरी की पढ़ाई कर रहे थे, तभी गोरखपुर की तहसील बांसगांव के गांव उज्जरपार के रहने वाले कांगे्रस के कद्दावर नेता महावीर प्रसाद ने अपनी छोटी बेटी निर्मला की शादी उन से कर दी थी. उन की सिर्फ 2 ही बेटियां थीं. बड़ी बेटी का ब्याह उन्होंने गोरखपुर के दाउदपुर के रहने वाले जयराम कुमार के साथ किया था. वह सिंचाई विभाग में अधिशाषी अभियंता थे.

शादी के बाद महावीर प्रसाद ने दोनों ही बेटियों को उपहार में एकएक गैस एजेंसी दी थी. विमला की गैस एजेंसी महाराजगंज में थी, जबकि निर्मला की गैस एजेंसी उन के बेटे हिमांशु के नाम से गोरखपुर के राप्तीनगर के मोहल्ला चकसा हुसैननगर में थी.

10 जुलाई, 2001 की रात साढ़े नौ बजे के करीब डा. अशोक कुमार गैस एजेंसी के काम से अकेले ही अपनी मारुति जेन कार यूपी 53 एल 2345 से इलाहाबाद के लिए निकले. उस समय उन के पास गैस एजेंसी के कागजतों के अलावा 1 लाख 10 हजार रुपए नकद थे.

11 जुलाई की सुबह 7 बजे के आसपास पति का हालचाल लेने के लिए निर्मला ने उन के मोबाइल पर फोन किया. फोन बंद होने की वजह से बात नहीं हो पाई. उन्हें लगा, लंबे सफर की वजह से वह थक गए होंगे. कोई परेशान न करे, इसलिए फोन बंद कर दिया होगा.

11 बजे तक डा. अशोक कुमार का फोन नहीं आया तो निर्मला ने एक बार फिर फोन किया. इस बार भी फोन बंद था. इस के बाद निर्मला रहरह कर पति का फोन मिलाती रही, लेकिन हर बार उन का फोन स्विच औफ बताता रहा. जब पति से किसी भी तरह संपर्क नहीं हुआ तो उन का दिल घबराने लगा.

निर्मला ने बहनोई जयराम प्रसाद को फोन किया तो पता चला कि वह भी गैस एजेंसी के ही काम से इलाहाबाद गए हुए हैं. इस के बाद निर्मला ने इलाहाबाद में रहने वाले अपने परिचितों को फोन कर के पति के बारे में पूछा. उन में से कोई भी डा. अशोक कुमार के बारे में कुछ नहीं बता सका. इसी तरह 2 दिन बीत गए. जब डा. अशोक के बारे में कुछ पता नहीं चला तो परिवार में बेचैनी हुई. निर्मला ने दिल्ली में रह रहे अपने पिता महावीर प्रसाद को फोन कर के सारी बात बताई.

दामाद के इस तरह अचानक गायब हो जाने से महावीर प्रसाद परेशान हो उठे. उन्होंने निर्मला से थाने में गुमशुदगी दर्ज कराने को कह कर गोरखपुर के पुलिस अधिकारियों से बात की. पिता के कहने पर निर्मला ने तीसरे दिन थाना शाहपुर में तहरीर दे कर पति डा. अशोक कुमार की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

डा. अशोक कुमार कोई मामूली आदमी नहीं थे. वह दरोगा के बेटे होने के साथसाथ कांग्रेस के बड़े नेता के दामाद भी थे. महावीर प्रसाद ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को फोन कर ही दिया था, इसलिए गुमशुदगी दर्ज होते ही जिले के सभी थानों की पुलिस सक्रिय हो गई.

11 जुलाई, 2001 को गोरखपुर से जुड़े जिला देवरिया के थाना खुखुंदु पुलिस ने चौकीदार लालजी यादव की सूचना पर सलेमपुरदेवरिया रोड पर बनी वन विभाग की पौधशाला के पास से एक लाश बरामद की. लाश के पास एक तौलिया और एक तकिया का कवर मिला था. दोनों ही चीजें खून से सनी थीं. मृतक की उम्र 35-36 साल के करीब थी. देखने से ही लग रहा था कि यह हत्या का मामला है, इसलिए थानाप्रभारी श्यामलाल चौधरी ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करा दिया.

मृतक की तलाशी में ऐसी कोई भी चीज नहीं मिली थी, जिस से उस की शिनाख्त हो सकती. इस से पुलिस को यही लगा कि मृतक की हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेकी गई थी. पुलिस ने लाश के फोटो करवा कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. लाश की शिनाख्त न होने से थाना खुखुंदू पुलिस ने पोस्टमार्टम के बाद उसे लावारिस मान कर उसी दिन उस का अंतिम संस्कार करा दिया था.

अगले दिन यानी 12 जुलाई की देर रात आजमगढ़ के करीबी जिला मऊ के थाना दक्षिण टोला पुलिस ने जहांगीराबाद से सड़क के किनारे से एक मारुति जेन कार बरामद की. पुलिस ने कार की खिड़कियों के शीशे तुड़वा कर टार्च की रोशनी में चैक किया तो कार की पिछली सीट पर खून के कुछ निशान दिखाई दिए.

अगली सीट पर कनियार पुल के टोल टैक्स की रसीद के साथ 12 बोर की गोली का एक खोखा बरामद हुआ. कार के अंदर ही गाड़ी के कागजात मिल गए थे, जो गोरखपुर के शाहपुर की आवासविकास कालोनी, गीतावाटिका के रहने वाले डा. अशोक कुमार के नाम थे. इस के अलावा कार से एक जोड़ी चप्पलें और भोजपुरी गीतों के 6 औडियो कैसेट बरामद हुए थे. पुलिस ने कार को कब्जे में ले कर इस की सूचना जिला नियंत्रण कक्ष को दे दी थी.

प्रेम की आग में भस्म

इश्क जान भी लेता है

इश्क जान भी लेता है – भाग 3

काफी समझाने के बावजूद भी जब मानसी ने उस की बात नहीं मानी तो अभिषेक उर्फ नीतू ने मानसी को ठिकाने लगाने का फैसला कर लिया. उस ने उसे ठिकाने लगाने की योजना बना भी ली.

योजना के तहत 5 जुलाई, 2014 को नीतू अपने 2 दोस्तों खुशीराम और कपिल के साथ गुडग़ांव के सैक्टर-17 स्थित गंदे नाले के पास पहुंचा. नीतू मानसी का काम तमाम कर के लाश को उसी नाले में ठिकाने लगाना चाहता था, लेकिन मानसी को नाले के पास बुलाना आसान नहीं था, क्योंकि उस ने उस से संबंध खत्म कर लिए थे.

नीतू जानता था कि मानसी बेहद लालची है. इसलिए उसे वहां बुलाने के लिए उस ने एक चाल चली. उस ने वहीं से मानसी को फोन किया. उस वक्त शाम को 5 बज रहे थे. उस ने कहा, “मानसी, मैं ने तुम्हारे लिए 8 तोले का एक हार बनवाया है. हार का डिजाइन इतना अच्छा है कि तुम्हें जरूर पसंद आएगा. आज रात ही मैं मुंबई जा रहा हूं. फिर हमारी मुलाकात हो या न हो, इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम इस हार को ले लो.”

मानसी 8 तोला सोने के हार के लालच में आ गई. वह हार लेने के लिए साढ़े 5 बजे गंदे नाले के पास पहुंच गई. नीतू को देखते ही वह चहक कर बोली, “नीतू, तुम तो मुझे एकदम भूल गए. कभीकभार तो मुझ से मिलने आ जाय करो. मैं तुम्हें बहुत मिस करती हूं.”

कुछ देर बाद नीतू के दोस्त खुशीराम और कपिल वहां पहुंचे तो वह चौंकी, क्योंकि वह पहले से उन्हें जानती थी. मानसी ने सोचा कि उन से उसे क्या मतलब. उसे तो हार ले कर वहां से निकल जाना है. उस ने नीतू का हाथ पकड़ते हुए कहा, “लाओ, वह हार कहां है.”

नीतू ने जेब से चाकू निकाल कर लहराया, “अब हार पहन कर क्या करोगी, जब तुम जीवित ही नहीं रहोगी.”

चाकू देख कर और उस की बातें सुन कर मानसी घबरा गई. इस से पहले कि वह कुछ कह पाती, अभिषेक ने चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दिए. मानसी वहीं गिर गई और कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. इस के बाद खुशीराम और कपिल ने उस की लाश उठा कर नाले में फेंक दी.

4 दिनों बाद 9 जुलाई, 2014 को नाले में महिला की लाश पड़ी होने की सूचना थाना राजेंद्रपार्क पुलिस को मिली तो पुलिस ने नाले से लाश निकलवाई. लाश काफी सडग़ल गई थी. वह पूरी तरह कीचड़ में सनी हुई थी. मृतका कौन है, यह जानने के लिए पुलिस ने पहले लाश धुलवाई. उस का चेहरा गल चुका था, इसलिए वहां मौजूद भीड़ में से कोई भी उसे पहचान नहीं सका.

पुलिस को उस की बाईं हथेली पर नीतू नाम गुदा मिला. जब लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और लावारिस मान कर उस का अंतिम संस्कार कर दिया.

अभिषेक उर्फ नीतू की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को पता चला कि 9 जुलाई, 2014 थाना राजेंद्रपार्क पुलिस ने नाले से जो महिला की लाश बरामद की थी, वह मानसी की थी. अगर नीतू पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ता तो मानसी की हत्या का राज उजागर ही न हो पाता.

एक दिन गुडग़ांव के सैक्टर-28 स्थित एक कैफे में मोहित अपने दोस्तों के साथ मौजूद था, तभी अभिषेक उर्फ नीतू अपने दोस्तों के साथ वहां पहुंचा. मोहित के दोस्तों ने नीतू का मजाक उड़ाया तो नीतू गालियां बकने लगा. तभी मोहित और उस के दोस्तों ने नीतू और उस के दोस्तों की पिटाई कर दी. उसी पिटाई का बदला लेने के लिए नीतू मौका ढूंढ़ रहा था.

25 अगस्त, 2015 की शाम को उसे यह मौका मिल गया. उसे पता चला कि मोहित अपने दोस्त सक्षम व मामा नाहर सिंह के साथ ओल्ड बौक्स कैफे में है तो वह अपने साथियों के साथ वहां पहुंच गया और मोहित की गोली मार कर हत्या कर दी.

मोहित की हत्या एवं मानसी की हत्या के आरोप में पुलिस ने अभिषेक उर्फ नीतू, ब्रजेश, दीपांकर, बौबी, आदित्य को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश कर के 2 दिनों की पुलिस रिमांड पर ले कर हत्या में प्रयुक्त रिवौल्वर व मानसी की हत्या में प्रयुक्त चाकू बरामद कर लिया. मानसी की हत्या में शामिल खुशीराम और कपिल को गिरफ्तार करने पुलिस पहुंची तो वे घर से फरार मिले. कथा लिखे जाने तक वे पकड़े नहीं जा सके थे. इस के बाद सभी अभियुक्तों को 29 अगस्त, 2015 को पुन: न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

इश्क जान भी लेता है – भाग 2

नाहर सिंह ने शादी नहीं की थी. वह अपनी बहनों और भांजों को बेहद चाहते थे. उन की बहनें भी संपन्न थीं. वह खुद भी उन के लिए काफी खर्च करते थे. अपने भांजों को भी वह जेब खर्च के लिए इतने पैसे देते थे, जिन से एक मध्यमवर्गीय परिवार का एक महीने का खर्च चल सकता था.

दरअसल, नाहर सिंह की सोच थी कि पढ़लिख कर उन के भांजों को कोई बहुत अच्छी नौकरी तो मिलेगी नहीं, इसलिए वह उन्हें नेता बनाना चाहते थे और नेता बनने के लिए शैक्षिक योग्यता की जगह दबंगई होनी चाहिए. अपनी इसी सोच के चलते वह मोहित और सचिन को दबंग बना रहे थे. मामा की शह पर मोहित कुछ ज्यादा ही बिगड़ चुका था. लोगों से मारपीट कर आतंक फैला कर उस ने इलाके में अपनी दबंगई कायम कर ली थी. वह कई संगीन वारदातों को भी अंजाम दे चुका था.

दरअसल, मोहित और अभिषेक उर्फ नीतू पहले दोस्त थे. उन के बीच दुश्मनी की शुरुआत सन 2012 में तब हुई थी, जब मानसी से नीतू ने कोर्टमैरिज कर ली थी.

मानसी मूलरूप से बिहार के रहने वाले फकीरेलाल की बेटी थी. फकीरेलाल गुडग़ांव की एक कंपनी में काम करते थे और गुडग़ांव के सैक्टर- 4 में किराए पर कमरा ले कर अपने बच्चों के साथ सपरिवार रहते थे. मानसी फैशनपरस्त और बिंदास लडक़ी थी. उस की कई लडक़ों से दोस्ती थी. वह उन के साथ कार या बाइक से घूमती, फिल्में देखती और महंगे रैस्टोरैंट में खाना खाती. कई युवकों से उस के शारीरिक संबंध भी थे.

रोजाना नएनए लडक़ों के साथ घूमते हुए उसे मोहल्ले के अनेक लोगों ने देखा था. उन्होंने उस की शिकायत फकीरेलाल से की तो उन्होंने उसे डांटा. लेकिन मानसी बहक कर उस ढलान पर पहुंच चुकी थी, जहां से वापस आना उस के लिए आसान नहीं था. इसलिए पिता के समझाने का उस पर जरा भी असर नहीं हुआ.

मानसी का अपने पुरुष दोस्तों के साथ घूमनेफिरने का सिलसिला कायम रहा. इस से मोहल्ले में फकीरेलाल की बदनामी हो रही थी. लाख समझाने के बावजूद भी जब मानसी नहीं मानी तो तंग आ कर फकीरेलाल ने उसे घर से निकाल दिया.

घर से निकालने पर मानसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की, बल्कि वह सैक्टर-18 में किराए के फ्लैट में रहने लगी. अब उस से कोई टोकाटाकी करने वाला नहीं था, जिस से वह पूरी तरह से आजाद हो गई थी. उसे जब जहां मन होता, जाती थी. वह क्लबों और पबों में डांस भी करने लगी थी.

सन 2012 के फरवरी महीने में एक पब में मानसी की मुलाकात विक्की से हुई. पहली ही मुलाकात में मानसी विक्की के दिल में उतर गई. विक्की उस पर खूब रुपए लुटाता था. वह विक्की की गाड़ी में घूमतीफिरती. विक्की उस की हर फरमाइश पूरी करता. विक्की भी गुडग़ांव का रहने वाला था. वह भी एक अमीर परिवार से ताल्लुक रखता था. विक्की और मोहित आपस में गहरे दोस्त थे.

विक्की ने मानसी से साफ कह दिया था, “मानसी, मैं तुम से शादी तो नहीं कर सकता. पर हां, तुम्हारा सारा खर्च ताउम्र उठाता रहूंगा. तुम्हें जीवन में किसी भी चीज की कमी नहीं होने दूंगा. परंतु बदले में मुझे तुम से इसी तरह का प्यार चाहिए. तुम एक बात का खास ध्यान रखना कि किसी दूसरे पुरुष ने तुम्हें छुआ भी तो मैं हरगिज बरदाश्त नहीं करूंगा.”

मानसी उस की शर्त मानने को तैयार हो गई. तब जिस फ्लैट में मानसी रहती थी, उस का किराया, कार, सौंदर्य प्रसाधन और खानेपीने का सारा खर्च विक्की उठाने लगा. वह हफ्ते में 1-2 बार उस से मिलने उस के फ्लैट पर पहुंच जाता था.

विक्की से मुलाकात के बाद मानसी ने अपने और पुरुष दोस्तों से मिलनाजुलना बंद कर दिया. विक्की उस से हफ्ते में 1-2 बार ही मिलने आता था. उस के जाने के बाद मानसी का मन नहीं लगता था. रोजना ही नएनए दोस्त बनाने वाली मानसी भला विक्की के साथ बंध कर कैसे रह सकती थी. लिहाजा उस ने फिर से लोगों से दोस्ती करनी शुरू कर दी.

उसी दौरान उस की मुलाकात अभिषेक उर्फ नीतू से हुई. नीतू की शानोशौकत देख कर मानसी का झुकाव उस की तरफ हो गया. नीतू हर मायने में उसे विक्की से अच्छा लगा. विक्की को जब यह बात पता चली तो उस ने मानसी से कहा, “मैं ने कहा था न कि अगर किसी पराए पुरुष ने तुम्हारे शरीर को छुआ भी तो मैं बरदाश्त नहीं करूंगा.”

“विक्की, मैं भी इंसान हूं और मेरी भी कुछ भावनाएं हैं,” मानसी ने नाराजगी प्रकट करते हुए कहा, “मैं भी चाहती हूं कि मेरा पति हो, घर हो, बच्चे हों. यह सब तुम्हारे साथ नहीं हो सकता. इसलिए मैं रखैल नहीं, पत्नी बन कर जीना चाहती हूं.”

मानसी की बात सुन कर विक्की को गुस्सा आ गया, वह चिल्लाते हुए बोला, “मानसी, मेरे जीतेजी तुम ऐसा कभी नहीं कर पाओगी.”

“चिल्लाओ मत. मैं तुम्हारी ब्याहता नहीं हूं, जो इस तरह मुझ पर अपना हक जता रहे हो.” मानसी भी गुस्से में आ गई. वह आगे बोली, “मैं नीतू से शादी कर रही हूं. वह तुम से ज्यादा दौलतमंद है और मेरे सारे अरमान पूरे करने की उस की हैसियत भी है. और सुन लो, आज के बाद मेरा तुम से कोई वास्ता नहीं.”

विक्की मानसी को धमकाते हुए वहां से चला गया. विक्की का पत्ता काटने के बाद अप्रैल, 2012 में अभिषेक उर्फ नीतू ने मानसी से कोर्टमैरिज कर ली. कोर्टमैरिज की बात जब विक्की को पता चली तो उसे बहुत बुरा लगा. गुस्से में तिलमिलाया हुआ वह नीतू से मिला.

“नीतू जब तुम्हें यह बात पता थी कि मानसी मेरी रखैल है तो तुम ने उस से कोर्टमैरिज क्यों कर ली?” विक्की ने पूछा.

“विक्की, मैं ने मानसी के साथ कोई जोरजबरदस्ती नहीं की. वह राजी थी, तभी तो शादी हुई. अगर वह मुझे नहीं चाहती तो भला मैं उसे कैसे पा सकता था. उस ने जब अपनी मरजी से शादी की है तो इस में तुम्हारे लिए बुरा मानने वाली क्या बात है.” नीतू बोला.

“देख नीतू, तू मेरा दोस्त है, इसलिए तुझे एक बात बता रहा हूं कि मानसी जैसी लड़कियां उसी पर प्यार न्यौछावर करती हैं, जिस के पास दौलत होती है. उस ने तुझ से यह जानने के बाद शादी की है कि तेरे पास मुझ से ज्यादा दौलत है. एक दिन उसे तुझ से ज्यादा पैसे वाला कोई और मिल गया तो वह तुझे भी ठुकरा देगी. फिर तुझे भी उस की हकीकत पता चलेगी और उस दिन तू बहुत पछताएगा.” यह कह कर विक्की वहां से चला गया.

समय गुजरता रहा और 2 साल बीत गए. नीतू तो उसे पहले की तरह प्यार करता था, लेकिन मानसी का प्यार जरूर फीका पड़ गया. उस का नीतू से एक तरह से मन भर गया था. हालांकि नीतू उस पर दोनों हाथों से पैसे खर्च कर रहा था. इस के बावजूद वह नए दोस्तों को तलाशने लगी. इस की वजह साफ थी कि उसे अलगअलग लोगों के साथ मौजमस्ती करने की आदत जो पड़ गई थी.

अभिषेक ने जब उसे डांस क्लबों में जाने से मना किया तो मानसी ने साफ कह दिया, “नीतू, मैं कोई ङ्क्षपजरे में बंद हो कर रहने वाली चिडिय़ा नहीं हूं. मेरा जो मन करेगा, मैं वही करूंगी. तुम कभी मुझे रोकने की कोशिश भी मत करना.”

इस के बाद वह नीतू को छोड़ कर अलग किराए के मकान में रहने लगी. अभिषेक उस से मिलने आता तो वह उसे दुत्कार देती. इस बात का अभिषेक को बड़ा दुख होता था. लाखों रुपए उस पर खर्च करने के बावजूद उसे प्रेमिका की दुत्कार मिलती थी.

इश्क जान भी लेता है – भाग 1

नाहर सिंह गुडग़ांव के थाना सदर के अंतर्गत आने वाले गांव इसलापुर के रहने वाले थे. गुडग़ांव, सोनीपत और हिसार में उन की हार्डवेयर की 3 दुकानें थीं. गांव में भी उन की कई एकड़ खेती की जमीन थी. इस के अलावा गुडग़ांव में उन के 2 आलीशान मकान थे. उन की 3 बहनें थीं, जिन की शादियां हो चुकी थीं.

छोटी बहन विमला की शादी दौलताबाद के रहने वाले देवेंद्र कुमार के साथ हुई थी. देवेंद्र भारतीय सेना में सूबेदार थे. उन की पोस्टिंग सिक्किम में थी. विमला घर पर ही रह कर बच्चों आदि को देखती थी. उन के 2 बेटे थे, सचिन और मोहित. दोनों ही जवान थे. बच्चों की देखरेख के लिए नाहर सिंह भी विमला के यहां ही रहते थे. देवेंद्र को फौज से जब भी छुट्टी मिलती थी, वह अपनी बीवीबच्चों के पास आ जाया करते थे.

25 अगस्त, 2015 की शाम लगभग 5 बजे नाहर सिंह छोटे भांजे मोहित और उस के दोस्त सक्षम के साथ गुडग़ांव के सैक्टर- 23 स्थित एक कैफे में बैठे कौफी पी रहे थे, तभी वहां अभिषेक उर्फ नीतू अपने दोस्तों मन्ना, दीपांकर और नितेश के साथ आया. आते ही नीतू ने मोहित की मेज पर रखे कौफी के प्याले को उठा कर फेंक दिया.

नीतू की इस हरकत से मोहित और सक्षम को गुस्सा आ गया. पास बैठे नाहर सिंह समझ नहीं पाए कि नीतू ने ऐसा क्यों किया. इस से पहले कि नाहर सिंह कुछ कहते, सक्षम ने चिल्लाते हुए कहा, “लगता है, उस दिन की मार के तेरे निशान ठीक हो गए हैं, जो…”

उस की बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि नीतू के दोस्त नितेश ने सक्षम के गाल पर जोरदार थप्पड़ मारते हुए कहा, “अपनी जुबान बंद रख, वरना अभी काट कर फेंक दूंगा.”

दोस्त की बेइज्जती मोहित बरदाश्त नहीं कर सका और नितेश से भिड़ गया, “तू ने इस पर हाथ उठाने की हिम्मत कैसे की?”

“ओए चल दूर हट यहां से. अब बहुत भौंक चुका तू.” नीतू ने अंटी से रिवौल्वर निकाल कर मोहित पर तानते हुए कहा, “मैं अपना अपमान कभी नहीं भूलता. अपमान का बदला जब तक ले न लूं, चैन की नींद सोना हराम समझता हूं. तेरी कोई आखिरी ख्वाहिश हो तो अपने मामू को बता दे.”

इसी के साथ नीतू के दोस्तों ने नाहर सिंह को हथियारों के बल पर काबू कर लिया था. नीतू की धमकी पर मोहित आगबबूला हो कर नीतू को पीटने के लिए आगे बढ़ा ही था कि अभिषेक ने उस पर एक के बाद एक कई फायर झोंक दिए. गोलियां मोहित के सीने, पेट व आंख के पास लगीं. मोहित लहूलुहान हो कर नीचे गिर कर कराहने लगा.

उस समय कैफे में और भी लोग थे. गोलियों की आवाज सुन कर सभी चौंके. लेकिन हथियारों को देख कर किसी की कुछ कहने की हिम्मत नहीं  हुई. वे सुरक्षित स्थान तलाशने लगे. अपने सामने भांजे के साथ हुई इस वारदात पर नाहर सिंह भी कुछ नहीं कर सके. मोहित की हत्या कर हमलावर कार से फरार हो गए.

नाहर सिंह ने तुरंत पुलिस को फोन कर के इस घटना की सूचना दी. गोली मारने की खबर पाते ही थाना पालम विहार के थानाप्रभारी जितेंद्र सिंह राणा पुलिस टीम के साथ थोड़ी ही देर में सैक्टर-23 के उस कैफे में पहुंच गए. मोहित की कुछ देर बाद ही मौत हो चुकी थी. पुलिस ने अपने आला अधिकारियों को भी इस हत्या की सूचना दे दी थी.

थानाप्रभारी ने नाहर सिंह से बात की तो उन्होंने पूरा वाकया बता दिया. इस के अलावा थानाप्रभारी ने कैफे के मैनेजर, वेटरों और वहां मौजूद ग्राहकों से भी पूछताछ की. इस के बाद घटनास्थल की जरूरी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. नाहर सिंह की तहरीर पर पुलिस ने नामजद रिपोर्ट दर्ज कर ली. मामला एकदम स्पष्ट था. कैफे में लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में भी साफ नजर आ रहा था कि मोहित पर गोलियां अभिषेक उर्फ नीतू ने चलाई थीं. इसलिए पुलिस को सिर्फ हत्याभियुक्तों को गिरफ्तार करना था.

उन की गिरफ्तारी के लिए पुलिस कमिश्नर नवदीप सिंह विर्क ने एसीपी (क्राइम) राजेश कुमार के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह राणा, एसआई सुखजीत सिंह, एएसआई सुरेश कुमार, सुनीता कुमार, हैडकांस्टेबल संदीप, धीरज सर्वसुख के अलावा कांस्टेबल धर्मेंद्र, नीति आदि को शामिल किया गया.

अगले दिन 28 अगस्त को पुलिस ने नामजद अभियुक्तों के घरों पर दबिश दी तो वे सभी अपनेअपने घरों से फरार मिले. फिर उसी दिन शाम के समय एक मुखबिर की सूचना पर गुडग़ांव के हिमगिरी चौक से अभिषेक उर्फ नीतू, ब्रजेश उर्फ नोनी, दीपांकर, बौबी तथा आदित्य को गिरफ्तार कर लिया गया.

थाने में जब उन से पूछताछ की गई तो उन्होंने मोहित की हत्या की वजह तो बता ही दी, साथ ही एक ऐसे हत्याकांड से भी परदाफाश किया, जिस की फाइल पुलिस बंद कर चुकी थी.

21 वर्षीय अभिषेक उर्फ नीतू एक अमीर बाप की बिगड़ी औलाद था. उस के पिता भानमल गुडग़ांव के धनवापुर गांव में अपने परिवार के साथ रहते थे. करीब 4 साल पहले एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने उन की 5 एकड़ जमीन 22 करोड़ में खरीदी थी. जमीन बेचने के बाद उन्होंने आलीशान मकान बनवाया, नौकर रखे और 2 कारें खरीदीं. तब से यह परिवार ठाठबाट से रह रहा था.

अचानक पैसा आता है तो अपने साथ कई बुराइयां भी लाता है. ऐसा ही इस परिवार में भी हुआ. अभिषेक उर्फ नीतू भानमल का एकलौता बेटा था, इसलिए वह उस की हर फरमाइश पूरी करते थे. अभिषेक अपने यारदोस्तों के साथ कार ले कर दिन भर इधरउधर घूमता और अय्याशी करता. वह अपने पिता से जितने पैसे मांगता, वह उसे मिल जाते थे. जिन्हें वह खुले हाथों से खर्च करता था. इसलिए उस के दोस्त भी उस से खुश रहते थे.

उस के खास दोस्तों में 20 वर्षीय ब्रजेश उर्फ नोनी, 19 वर्षीय दीपांकर, 20 वर्षीय बौबी, 18 वर्षीय आदित्य थे. ये सभी उस के घर के आसपास ही रहते थे. ये सभी कार से जब भी घूमने निकलते, इतना ऊधम मचाते थे कि राहगीर भी परेशान हो जाते थे. कोई इन का विरोध करता तो ये उस की पिटाई कर देते. एक तरह से इलाके में इन का आतंक छा चुका था.

पिता ने भी कभी नीतू पर लगाम लगाने की कोशिश नहीं की, जिस से वह और ज्यादा उद्दंड होता चला गया. बातबात पर सीधेसादे लोगों को पीटना, राह चलती लड़कियों को छेडऩा, शराब पी कर हुड़दंग मचाना, हवाई फायर कर के दहशत फैलाना आदि नीतू का जैसे शगल बन गया था.