Moradabad Crime: सावधान – ऐसे दोस्तों से

Moradabad Crime: रईस मंसूरी और जमा खां के बीच गहरी दोस्ती थी. इसी दोस्ती की आड़ में रईस ने उस की बेटी से संबंध तो बनाए ही, अश्लील फिल्म भी बना ली. मजबूरी में जमा खां के बेटे ने जो किया, सामाजिक तौर पर क्या उसे उचित कहेंगे?

मुरादाबाद के मोहल्ला वारसीनगर के रहने वाले रईस मंसूरी का इनवर्टर बनाने और उस की मरम्मत करने का काम था. उस का यह काम काफी अच्छा चल रहा था. 15 दिसंबर, 2015 को इनवर्टर लगवाने के लिए उस के दोस्त जमा खां के बेटे आलम ने फोन किया. आलम शहर के ही मोहल्ला बखलान की चामुंडा वाली गली में रहता था. इनवर्टर लगाने के लिए वह रईस को 5 हजार रुपए पहले ही दे चुका था. लेकिन काम ज्यादा होने की वजह से रईस को आलम के यहां इनवर्टर लगाने का समय नहीं मिला था.

आलम ने 15 दिसंबर को रईस को फोन कर के अपने यहां जल्द इनवर्टर लगाने को कहा तो रईस ने उसे भरोसा दिया कि उसी दिन शाम को वह उस के यहां इनवर्टर जरूर लगा देगा. अपने वादे के अनुसार उसी दिन शाम को लगभग साढ़े 7 बजे रईस  अपनी स्कूटी से आलम के घर के लिए निकला. आलम के घर जाने वाली बात उस ने अपनी पत्नी नुसरत को बता दी थी. रईस को आलम के घर गए कई घंटे बीत गए. न तो वह लौटा और न ही उस ने फोन किया. इस से पहले जब कभी उसे देर होने लगती थी तो वह पत्नी को फोन कर देता था. घर आने में कितनी देर और लगेगी, यह जानने के लिए नुसरत ने फोन किया तो रईस का फोन बंद मिला.

नुसरत ने 2-3 बार पति को फोन किया, हर बार कंप्यूटर द्वारा फोन बंद होने की बात बताई गई. नुसरत परेशान हो गई कि उन्होंने फोन बंद क्यों कर दिया है? आधे घंटे बाद उस ने फिर फोन किया. इस बार भी फोन बंद मिला. पति से संपर्क न होने की बात उस ने अपने देवर अमीर को बताई. अमीर आलम को तो जानता ही था, उस ने उस का घर भी देखा था. अमीर भाई के बारे में पता लगाने आलम के घर पहुंचा. पूछने पर आलम ने बताया कि वह तो इनवर्टर लगा कर 8 बजे ही चले गए थे. अमीर घर लौट आया. अमीर और नुसरत रईस के बारे में पता लगाने लगे, लेकिन कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली.

रात भर दोनों परेशान होते रहे. सुबह होते ही रईस के घर वालों ने एक बार फिर उस की खोज शुरू कर दी. सभी रिश्तेदारों से फोन कर के उस के बारे में पूछा, लेकिन सभी ने कहा कि वह उन के यहां नहीं आया था. जब कहीं से रईस के बारे में कुछ पता नहीं चला तो घर वाले चिंतित हो गए. 16 दिसंबर को अमीर हुसैन ने थाना मुरादाबाद पहुंच कर भाई रईस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. रईस के मामले में पुलिस कोई काररवाई करती, उस के पहले ही क्रिकेट खेलने वाले कुछ बच्चों ने रईस के बारे में पता कर लिया.

हुआ यह कि 16 दिसंबर की दोपहर को कुछ बच्चे शहर के किनारे से गुजरने वाली रामगंगा नदी के किनारे क्रिकेट खेल रहे थे. उन्हीं बच्चों में से किसी ने ऐसा शौट मारा कि गेंद पानी के किनारे जा कर गिरी. जैसे ही एक बच्चा गेंद लेने गया, उसे वहां एक आदमी का हाथ पड़ा दिखाई दिया. हाथ देख कर वह बच्चा डर गया और उस ने शोर मचा दिया. शोर सुन कर सभी बच्चे वहां आ गए. हाथ देख कर बच्चे क्रिकेट खेलना भूल कर शोर मचाने लगे. इस के बाद आसपास के खेतों में काम करने वाले भी आ गए. सभी इस बात को ले कर परेशान थे कि यह कटा हाथ किस का हो सकता है?

किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम को इस की सूचना दे दी. वह इलाका थाना मुगलपुरा के तहत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से यह सूचना थाना मुगलपुरा को दे दी गई. खबर मिलते ही मुगलपुरा के थानाप्रभारी अनिल कुमार वर्मा एसएसआई मनोज कुमार सिंह और अन्य पुलिसकर्मियों को साथ ले कर रामगंगा नदी के किनारे पहुंच गए. हाथ के बालों को देख कर पुलिस ने अनुमान लगाया कि यह हाथ किसी आदमी का है. पुलिस को लगा कि इस हाथ को कुत्ता वगैरह यहां खींच कर ले आया है. लाश भी यहीं आसपास ही होगी.

पुलिस वाले लाश को इधरउधर तलाशने लगे. वहां से कुछ दूरी पर रामगंगा पर बने पुल के नीचे 4 बोरे मिले. पुलिस ने उन बोरों को खोला तो उन में से आदमी के कटे अंग निकले. लेकिन उस में सिर और एक हाथ नहीं मिला. थानाप्रभारी ने यह सूचना एसएसपी नितिन तिवारी, एसपी (सिटी) डा. रामसुरेश यादव को दी तो दोनों पुलिस अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने सिर और एक हाथ को आसपास बहुत ढूंढा, लेकिन वे नहीं मिले. शायद उन्हें कोई जंगली जानवर उठा ले गया था.

5 टुकड़ों में लाश मिलने की खबर थोड़ी देर में ही शहर में फैल गई. मीडिया वाले भी वहां पहुंच गए. एक दिन पहले ही थाना मुगलपुरा में रईस मंसूरी की गुमशुदगी दर्ज हुई थी. थानाप्रभारी ने गुमशुदगी वाला रजिस्टर चेक किया तो पता चला कि गुम हुए व्यक्ति की कदकाठी और हुलिया मरने वाले से मिल रहा था. यह गुमशुदगी अमीर ने दर्ज कराई थी. अमीर का फोन नंबर लिखा ही था, थानाप्रभारी ने उस नंबर पर फोन कर के उसे बुला लिया. अनिल कुमार वर्मा से बात होने के बाद अमीर अपनी भाभी नुसरत को ले कर रामगंगा के किनारे पहुंच गया. हालांकि लाश का सिर नहीं था, इस के बावजूद कपड़ों से अमीर और नुसरत ने उस की शिनाख्त रईस मंसूरी की लाश के रूप में कर दी.

पति के शरीर के 5 टुकड़े देख कर नुसरत रोरो कर बेहोश हो गई. अमीर समझ नहीं पा रहा था कि उस के भाई की किसी से ऐसी क्या दुश्मनी थी कि उस की हत्या कर उसे इस तरह टुकड़ों में काट कर यहां फेंक गया. लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि हत्यारों ने उस के गुप्तांग को काट डाला था. हत्या करने से पहले रईस ने शराब भी पी थी. हत्या के इस सनसनीखेज मामले को सुलझाने के लिए एसएसपी ने एसपी (सिटी) डा. रामसुरेश यादव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. इस टीम ने मृतक की पत्नी नुसरत और भाई अमीर से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि रईस का किसी से कोई झगड़ा वगैरह नहीं था.

उस दिन शाम को वह आलम के घर इनवर्टर लगाने गया था. उस के बाद नहीं आया. इसी पूछताछ में पुलिस को पता चला कि नुसरत रईस की चौथी बीवी थी. रईस ने पहला निकाह अमरोहा की शबाना से किया था. उसे तलाक दे कर रईस ने गुइयाबाग निवासी नरगिस से दूसरा निकाह किया था. कुछ दिनों साथ रख कर रईस ने उसे भी छोड़ दिया था. इस के बाद रईस ने लालबाग निवासी रानी से निकाह किया. उसे भी छोड़ कर उस ने 8 साल पहले नुसरतजहां से निकाह किया, जिस से उसे 3 बच्चे थे. पुलिस ने मृतक रईस मंसूरी के फोन नंबर को सर्विलांस पर लगाया तो वह बंद आ रहा था.

लेकिन जांच में पता चला कि उस के फोन की अंतिम लोकेशन 15 दिसंबर की शाम को उसी इलाके में थी, जहां आलम रहता था. इस से यह तो पता चल रहा था कि रईस आलम के यहां गया था, लेकिन वहां जाने के बाद उस का फोन बंद क्यों हो गया? पुलिस को यही पता लगाना था. पुलिस टीम बखलान के रहने वाले आलम के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. पूछताछ के लिए पुलिस उसे थाने ले आई. अनिल कुमार वर्मा ने आलम से रईस की हत्या के बारे में पूछताछ शुरू की तो वह यही कहता रहा कि उस के यहां इनवर्टर लगाने के बाद रईस चला गया था. इस के बाद वह कहां गया, उसे पता नहीं. वह खुद को बेकुसूर बता रहा था.

पूछताछ के दौरान ही एसएसआई मनोज कुमार सिंह को मुखबिर से पता चला कि मृतक रईस के आलम की बहन से नाजायज संबंध थे. यह बात उन्होंने अनिल कुमार वर्मा को बता दी. जिस तरह क्रूरता से रईस की लाश के टुकड़े कर के उस के गुप्तांग को काट कर फेंक दिया गया था, उस से अनिल कुमार वर्मा को लग रहा था कि हत्या के पीछे प्रेमप्रसंग का मामला है. मनोज कुमार सिंह की बात ने उन के शक को पुख्ता कर दिया. उन्हें लगा कि आलम झूठ बोल रहा है. इसलिए उन्होंने उस से थोड़ी सख्ती की तो वह सारी सच्चाई बताने को तैयार हो गया.

उस ने स्वीकार कर लिया कि रईस मंसूरी की हत्या उसी ने की थी. उस ने उस के सामने ऐसे हालात पैदा कर दिए थे कि उसे उस की हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा. आलम से पूछताछ में रईस मंसूरी की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी. रईस मंसूरी और आलम के पिता जमा खां आपस में अच्छे दोस्त थे. कहा जाता है कि दोनों बिजली की लाइनों का तार चोरी किया करते थे. चोरी किए तार से जो पैसा मिलता था, उसे वे आपस में बांट लेते थे. इसी काम से वे अपनेअपने परिवारों को पाल रहे थे.

लेकिन जमा खां की पत्नी को जानकारी नहीं थी कि उस का पति बिजली के तार चोरी करता है. उसे तो जमा खां ने यही बताया था कि वह इलैक्ट्रिशियन है. करीब 15 साल पहले की बात है. रईस और जमा खां काशीपुर की तरफ बिजली के तार काटने गए थे. जमा खां ने पत्नी को बताया था कि उसे काशीपुर में बिजली फिटिंग का एक बड़ा काम मिला है, रईस के साथ वह उस काम को करने जा रहा है. उस की पत्नी रईस को जानती थी, क्योंकि वह उस के यहां आताजाता रहता था. उस ने कहा था कि वह वहां से कई दिनों बाद लौटेगा. लेकिन वह वहां से जिंदा नहीं लौट सका.

दरअसल, हुआ यह कि जब दोनों रात को काशीपुर के जंगल में 11 हजार वोल्ट की लाइन के तार काट रहे थे, तभी जमा खां को बिजली ने करंट मार दिया. वह खंभे से नीचे गिरा और उस की मौत हो गई. दोस्त को मरा देख कर रईस डर गया. कहीं वह पुलिस के चक्कर में न फंस जाए, वह उसे वहीं छोड़ कर घर चला आया. अगले दिन लोगों ने खेत में लाश देखी तो इस की सूचना पुलिस को दे दी. पुलिस मौके पर पहुंची तो लाश के पास बिजली के तार काटने के औजार देख कर पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि यह बिजली के तार काटने वाला चोर है और बिजली के करंट की चपेट में आ कर मर गया है.

पुलिस ने आवश्यक काररवाई कर के लाश का पोस्टमार्टम कराया और शिनाख्त न होने के बाद अज्ञात मान कर उस का अंतिम संस्कार करा दिया. इस के बाद एक दिन जमा खां की पत्नी को बाजार में रईस मिला तो वह उसे देख कर चौंकी, क्योंकि उस का पति तो रईस के साथ काम करने काशीपुर गया था. तसलीमा ने उस से पति के बारे में पूछा तो रईस ने बताया कि उस की एक हादसे में मौत हो गई है.

पति की मौत की बात सुन कर तसलीमा चौंकी, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो, यह नहीं हो सकता?’’

‘‘मैं सच कह रहा हूं भाभी, करंट लगने से जमा खां की मौत हो गई है.’’ रईस ने कहा.

‘‘यह कैसे और कहां हो गया? तुम ने मुझे बताया क्यों नहीं?’’ तसलीमा ने पूछा.

‘‘हम दोनों बिजली का तार काटने काशीपुर गए थे. वहीं तार काटते समय उन्हें 11 हजार वोल्ट का करंट लग गया, जिस से वह खंबे से नीचे गिर गया और उस की मौत हो गई.’’ रईस ने बताया.

‘‘मेरे पति चोर नहीं थे, वह तो इलैक्ट्रिशियन थे. तुम झूठ बोल रहे हो.’’ तसलीमा रोते हुए बोली.

‘‘नहीं भाभी, मैं बिलकुल सच कह रहा हूं. उन्होंने तुम्हें बताया होगा कि वह इलैक्ट्रिशियन हैं. हकीकत में हम दोनों तार काट कर बेचा करते थे.’’ रईस ने कहा.

‘‘मुझे तुम्हारी बात पर यकीन नहीं हो रहा. मैं काशीपुर जा कर वहां की पुलिस से मिलूंगी.’’ तसलीमा ने कहा.

‘‘तुम वहां जाना चाहती हो तो जरूर जाओ. लेकिन वहां जा कर तुम खुद भी फंस सकती हो. वहां की पुलिस ने जब जमा खां की लाश बरामद की थी, तब उस के साथ तार काटने के औजार भी मिले थे. जब तुम वहां जाओगी, पुलिस तुम से कहेगी कि एक चोर की बीवी हो कर तुम ने पुलिस को इस की खबर क्यों नहीं दी?’’ रईस ने उसे डराने के लिए कहा.

तसलीमा सीधीसादी औरत थी. वह रईस की बातों से डर कर काशीपुर नहीं गई और पति की मौत का गम सीने में दबा कर रहने लगी. उस समय उस का बेटा आलम 13 साल का था. रईस मंसूरी ने बाद में इनवर्टर का काम शुरू कर दिया. उस ने एकएक कर के 4 शादियां कीं. 3 बीवियों को वह तलाक दे चुका था, अब चौथी बीवी नुसरतजहां के साथ रह रहा था. पति के मरने के बाद तसलीमा को आर्थिक परेशानी हुई तो रईस ने उस की काफी मदद की. इस वजह से वह रईस की एहसानमंद हो गई. तसलीमा की बेटियां जवान हो चुकी थीं. रईस की नीयत उस की बड़ी बेटी पर खराब हो गई. वह उसे फंसाने की कोशिश करने लगा. उसे इस बात की भी शर्म नहीं आई कि वह उस के लंगोटिया यार की बेटी है. एक तरह से वह उस की बेटी की तरह है. लेकिन उस ने इस ओर ध्यान नहीं दिया.

उसे फंसाने के लिए वह उस की पसंद की चीजें खरीद कर देने लगा. आखिर एक दिन वह अपनी योजना में सफल हो गया. नाजायज संबंध बने तो यह सिलसिला काफी दिनों तक चला. उस ने उस के अंतरंग संबंधों की मोबाइल से फिल्म भी बना ली थी. तसलीमा के घर वालों को रईस मंसूरी पर इतना विश्वास था कि कोई उस के बारे में कुछ गलत सोच भी नहीं सकता था. इसी की आड़ में वह अपने मंसूबे पूरे कर रहा था. कुछ दिनों बाद तसलीमा की बेटी ने महसूस किया कि रईस से संबंध बना कर उस ने ठीक नहीं किया, क्योंकि वह उस की पिता की उम्र का है. उस से वह शादी भी नहीं कर सकती.

यह अहसास होने के बाद वह उस से दूरियां बनाने लगी. लेकिन रईस उस का पीछा छोड़ने को तैयार नहीं था. उस ने जो वीडियो बना रखी थी, उसी के बल पर वह उसे ब्लैकमेल करने लगा. रईस ने उसे धमकी दी कि अगर उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह उस वीडियो को इंटरनेट पर डाल देगा. इस धमकी से वह डर गई. इस तरह रईस उस का शारीरिक व मानसिक शोषण करने लगा. तसलीमा का बेटा आलम अब जवान हो चुका था. वह दुनियादारी समझने लगा था. अपने घर आने वाले रईस की गतिविधियां उसे अच्छी नहीं लगती थीं. क्योंकि वह जब भी उस के घर आता था, उस की बहन के आगेपीछे मंडराता रहता था.

वह रईस से तो कुछ कह नहीं कहा, क्योंकि वह उस के मरहूम पिता की उम्र का था. उस की अम्मी भी उस की बड़ी इज्जत करती थी. इसलिए उस ने बहन को ही डांटा कि वह रईस ज्यादा बातें न किया करे. आलम को पता नहीं था कि बात तो उस की बहन भी नहीं करना चाहती, पर रईस ने वीडियो फिल्म का ऐसा खौफ उस के दिल में बैठा दिया है कि ना चाहते हुए भी वह रईस की हर बात मानती है. एक दिन आलम के एक दोस्त ने अपने मोबाइल में उसे एक वीडियो दिखाई. वह वीडियो देख कर आलम का खून खौल उठा. उस वीडियो में उस की बहन रईस के साथ आपत्तिजनक स्थिति में थी. उस के दोस्त को वह फिल्म रईस ने ही दी थी.

इस के बाद रईस आलम का दुश्मन बन गया. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि वह उसे उस के किए की सजा जरूर देगा. अपने दिल में उठ रहे गुस्से के सैलाब को उस ने जाहिर नहीं होने दिया और रईस को ठिकाने लगाने का उपाय खोजने लगा. आखिर उस ने एक खौफनाक योजना बना ही ली. आलम को अपने घर में इनवर्टर लगवाना था. चूंकि रईस इनवर्टर का काम करता था, इसलिए उस ने रईस को इनवर्टर लगाने के लिए 5 हजार रुपए दे दिए. रईस के पास काम ज्यादा था, इसलिए उस ने सोचा कि जिस दिन उसे टाइम मिलेगा, वह आलम के यहां जा कर इनवर्टर लगा देगा.

आलम ने रईस को फोन किया तो उस ने आलम से कह दिया कि 15 दिसंबर की शाम को वह उस के यहां इनवर्टर लगा देगा. आलम ने उसी दिन रईस को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. इस काम में उस ने अपने एक दोस्त शोएब को भी शामिल कर लिया. उस दिन शाम को वह रईस के आने का इंतजार करने लगा. शाम साढ़े 7 बजे तक रईस उस के यहां नहीं पहुंचा तो उस ने उसे फोन किया. फोन पर बात करने के कुछ देर बाद रईस अपनी स्कूटी से आलम के यहां पहुंच गया.

योजना के अनुसार, आलम ने शराब की एक बोतल पहले से ही खरीद कर रख ली थी. रईस ने जब उस के यहां इनवर्टर लगा दिया तो वह रईस को एक कमरे में ले गया. उस कमरे में मेज पर शराब की बोतल और नमकीन पहले से ही रखी थी.

आलम ने कहा, ‘‘इनवर्टर लगने की खुशी में मैं ने छोटी सी पार्टी रखी है.’’

रईस मना नहीं कर सका और आलम तथा शोएब के साथ शराब पीने बैठ गया. आलम ने तेज आवाज में डेक बजा दिया. जैसे ही उन का पीनेपिलाने का दौर खत्म हुआ, आलम अपनी जगह से उठा और कमरे में पहले से रखे हथौड़े से रईस के सिर पर जोरदार वार कर दिया. एक ही वार में रईस बिना कोई आवाज किए नीचे गिर गया. सिर से खून बहने लगा. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. हत्या के बाद उन के सामने समस्या लाश ठिकाने लगाने की थी. नाराज आलम ने उस की गरदन काट दी. इस के बाद उस ने लाश के टुकड़े कर के 4 बोरों में भर दिए और आधी रात को उन बोरों को एकएक कर के रामगंगा नदी के किनारे फेंक आया.

कमरे में जमीन पर जो खून फैला था, उसे भी उस ने मिट्टी सहित कुरच कर एक बोरे में भर दिया और उसे भी जामा मस्जिद के नाले में डाल आया. उस की स्कूटी को उस ने रामगंगा नदी के पार मजार के पास बने कुंड में फेंक दी. पूछताछ के बाद पुलिस ने आलम के साथी शोएब को भी गिरफ्तार कर लिया. आलम की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त हथौड़ा, चाकू, आरी के ब्लेड, मृतक का मोबाइल फोन और स्कूटी बरामद कर ली. इस के बाद उन्हें न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Moradabad Crime

(कथा पुलिस सूत्रों व अभियुक्त आलम के बयान पर आधारित. कथा में तसलीमा परिवर्तित नाम है)

 

Family Dispute: बुढ़ापे का सहारा बना कातिल

Family Dispute: हरिकिशन अपना करोड़ों का मकान अपनी तलाकशुदा बेटी को देना चाहते थे, जो उन के दोनों बड़े बेटों को इसलिए मंजूर नहीं था, क्यों उसी मकान में बनी दुकानों से उन की रोजीरोटी चलती थी. इस मामले में समझबूझ कर काम लिया गया होता तो बाप और बहन की हत्या में विजय और अजीत जेल में नहीं होते.

उम्र बढ़ने पर इंसान का शरीर तो कमजोर हो ही जाता है, कई तरह की बीमारियां भी घेर लेती हैं. 88 साल के हो चुके हरिकिशन वर्मा के साथ भी कुछ ऐसा ही था. हालांकि देखने में वह ठीकठाक लगते थे, लेकिन अंदर से वह कई तरह की बीमारियों से घिरे थे. वह शास्त्रीनगर के नीमड़ी गांव स्थित अपने घर में अपनी 50 साल की बेटी राजबाला के साथ रहते थे. उसी मकान में उन के बेटे अजीत और विजय अपनी ज्वैलरी शौप चलाते थे, लेकिन इन दोनों बेटों से उन का कुछ लेनादेना नहीं था. इस की वजह यह थी कि उन का उन से संपत्ति को ले कर विवाद चल रहा था. उन का छोटा बेटा अरविंद, जो उत्तरीपश्चिमी दिल्ली के सरस्वती विहार में रहता था, वही उन की देखभाल के लिए रोज आता था.

अरविंद सुबह ही पिता के पास पहुंच जाता और दिन भर उन की देखभाल करता था. शाम 6-7 बजे वह घर लौट जाता था. कई सालों से उस का यही नियम बना हुआ था. अरविंद 28 जनवरी, 2016 की सुबह करीब साढ़े 9 बजे नीमड़ी गांव स्थित पिता के घर पहुंचा. वह जब भी आता था, घर का मुख्य दरवाजा अंदर से बंद मिलता था. दरवाजा खटखटाने के बाद बहन राजबाला कुंडी खोलती थी. 28 जनवरी को भी उस ने दरवाजा खटखटाया. 5 मिनट तक कुंडी नहीं खुली तो उस ने दोबारा दरवाजा खटखटाया. दोबारा भी कुंडी नहीं खुली और न ही अंदर से कोई आवाज आई तो वह सोचने लगा कि पता नहीं क्या बात है, जो अभी तक दरवाजा नहीं खुला.

उस ने आवाज देते हुए दरवाजे को धक्का दिया तो वह खुल गया. वह जैसे ही गैलरी में पहुंचा, उसे किचन के सामने राजबाला औंधे मुंह पड़ी दिखाई दी. बहन को उस हालत में देख कर वह घबरा गया. दौड़ कर उस ने बहन को सीधा किया तो शरीर अकड़ा एवं ठंडा था, नाक और मुंह से थोड़ा खून भी निकला हुआ था, जो सूख चुका था. बहन की हालत देख कर वह सहम उठा. उसे पिता की चिंता हुई तो आवाज देते हुए वह सामने वाले कमरे में गया. वहां टीवी चल रहा था और उस के पिता जो लुंगी बांधे रहते थे, वह बैड पर पड़ी थी. इस के बाद वह सामने वाले कमरे में गया तो वहां पिता रजाई में लिपटे हुए मिले. रजाई हटाई तो उन का शरीर भी ठंडा और अकड़ा हुआ था.

उन्हें पेशाब की जो नली लगी हुई थी, वह जस की तस लगी थी. बहन और पिता की हालत देख कर अरविंद चीखता हुआ बाहर आया और सभी को यह बात बताई. इस के बाद उस ने यह सूचना दिल्ली पुलिस के कंट्रोल रूम को दे दी. नीमड़ी गांव के नजदीक मुख्य रोड पर स्थित पैट्रोल पंप के पास अकसर पुलिस कंट्रोल रूम की वैन खड़ी रहती है. 100 नंबर पर कौल होते ही वैन नीमड़ी गांव पहुंच गई और हरिकिशन तथा उन की बेटी राजबाला को बाड़ा हिंदूराव अस्पताल ले गई, जहां डाक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया.

चूंकि यह क्षेत्र उत्तरी दिल्ली के थाना सराय रोहिल्ला के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से यह सूचना थाना सराय रोहिल्ला को दे दी गई. हरिकिशन और उन के बेटों को थाना सराय रोहिल्ला के ज्यादातर पुलिसकर्मी जानते थे. इस की वजह यह थी कि हरिकिशन और उन के बेटे आए दिन झगड़े की शिकायतें ले कर वहां आते रहते थे. उन के बीच प्रौपर्टी को ले कर काफी समय से झगड़ा चल रहा था.

इसीलिए सूचना पा कर कार्यवाहक थानाप्रभारी साहिब सिंह लाकड़ा एसआई आलोक कुमार राजन, कांस्टेबल यशपाल को ले कर नीमड़ी गांव पहुंच गए. वहां से पता चला कि पुलिस कंट्रोल रूम की वैन हरिकिशन और राजबाला को हिंदूराव अस्पताल ले गई है तो कांस्टेबल यशपाल को घटनास्थल पर छोड़ कर साहिब सिंह लाकड़ा और एसआई आलोक कुमार हिंदूराव अस्पताल जा पहुंचे. साहिब सिंह ने वहां मौजूद मृतक हरिकिशन के बेटे अरविंद से बात करने के बाद इस घटना की जानकारी एसीपी मनोज कुमार मीणा और डीसीपी मधुर वर्मा को दे दी.

2-2 हत्याओं की बात थी, इसलिए डीसीपी मधुर वर्मा, डीसीपी द्वितीय असलम खां, एसीपी मनोज कुमार मीणा भी घटनास्थल का दौरा करने के बाद बाड़ा हिंदूराव अस्पताल पहुंच गए. सूचना पा कर हरिकिशन के अन्य दोनों बेटे विजय वर्मा और अजीत वर्मा, जिन से उन का झगड़ा चल रहा था, वे भी अस्पताल पहुंच गए थे. उन्होंने भी अपने पिता और बहन की हत्या पर दुख जताया. पिता और बहन की हत्या हुई थी, इसलिए दुख होना स्वाभाविक था. पुलिस ने इन दोनों भाइयों से भी बात की. उन्होंने बताया कि जिस मकान में पिता और बहन की हत्या हुई है, उन का वह मकान मेन बाजार में है.

उसी मकान में 2 दुकानें बनी हैं, जिन में वे महालक्ष्मी ज्वैलर्स के नाम से ज्वैलरी का धंधा करते हैं. वे रोजाना सुबह 10 बजे के करीब अपनी दुकानें खोलते हैं और रात 9 बजे बंद कर के सरस्वती विहार स्थित अपने फ्लैटों पर चले जाते थे.

आज जब वे अपनी दुकानों पर आए तो उन्हें पिता और बहन की हत्या की खबर मिली. जब उन्हें पता चला कि दोनों को बाड़ा हिंदूराव अस्पताल ले जाया गया है तो वे वहां आ गए.

‘‘आप दोनों बता सकते हैं कि इन की हत्या किस ने की होगी?’’ साहिब सिंह ने पूछा.

‘‘पता नहीं सर, यह किस ने किया है? इस बारे में हम किसी का नाम भी तो नहीं ले सकते, लेकिन इतना जरूर बता सकते हैं कि कल रात 9 बजे के करीब जब हम दुकान बंद कर के अपने घर के लिए निकले थे, तब दोनों ठीकठाक थे.’’ अजीत वर्मा ने कहा.

अजीत और विजय से बात करने के बाद साहिब सिंह घटनास्थल पर आए. घटनास्थल के निरीक्षण में उन्होंने पाया कि घर का सारा सामान अपनीअपनी जगह पर रखा है. इस से साफ था कि ये हत्याएं लूट की वजह से नहीं की गई थीं. उसी मकान के एक हिस्से में विजय और अजीत की ज्वैलरी की दुकानें थीं. हत्यारों को यदि लूटपाट करनी होती तो वे ताला तोड़ कर दुकानों का सामान ले जा सकते थे, लेकिन दुकानों के ताले बंद थे. अब सवाल यह था कि ये हत्याएं क्यों और किस ने कीं?

थाने पहुंच कर अरविंद ने पुलिस को बताया कि उस के पिता और बहन की हत्या उस के बड़े भाइयों, अजीत वर्मा और विजय वर्मा ने उन की संपत्ति हथियाने के लिए की हैं. संपत्ति को ले कर बापबेटों के बीच आए दिन झगड़ा होने की जानकारी पुलिस को थी ही, इसलिए जब अरविंद ने अपने दोनों सगे भाइयों पर हत्या का शक जताया तो पुलिस ने उस की शिकायत पर अजीत वर्मा और विजय वर्मा के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर के इस बात की जानकारी डीसीपी को दे दी.

डीसीपी मधुर वर्मा ने हत्या के इस मामले को सुलझाने के लिए एसीपी मनोज कुमार मीणा के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित की, जिस में इंसपेक्टर साहिब सिंह लाकड़ा, एसआई आलोक कुमार राजन, राजीव कुमार, कांस्टेबल यशपाल, ताराचंद को शामिल किया गया. जिन दोनों भाइयों के खिलाफ मुकदमा दर्ज था, वे बाड़ा हिंदूराव अस्पताल में थे. पुलिस टीम दोनों भाइयों अजीत वर्मा और विजय वर्मा को वहां से थाने ले आई. थाने में पूछताछ में दोनों भाइयों ने कहा कि प्रौपर्टी को ले कर पिता से उन का विवाद जरूर चल रहा था, लेकिन हत्या करने जैसी बात वे सोच भी नहीं सकते. अपने समय पर वे दुकानें बंद कर के स्कूटी से सरस्वती विहार चले गए थे.

उन का कहना था कि उन के छोटे भाई अरविंद को पिताजी बहुत ज्यादा चाहते थे, क्योंकि घर में वह सब से छोटा था. ज्यादा लाड़प्यार की वजह से वह बिगड़ गया था. कोई कामधंधा भी नहीं करता था. कहीं ऐसा तो नहीं कि पैसे की जरूरत पड़ने पर उस ने पिताजी से पैसे मांगे हों और पिताजी ने मना कर दिया हो तो उसी ने गुस्से में उन्हें मार दिया हो. राजबाला ने उसे देख लिया हो, तो उस ने उस की भी हत्या कर दी हो. अजीत वर्मा और विजय वर्मा ने पुलिस को जो बताया था, वह सच भी हो सकता था. इसलिए सच्चाई जानने के लिए पुलिस ने अरविंद वर्मा को भी थाने बुला लिया.

पड़ोसियों और दुकानदारों को जब पता चला कि जिन लोगों की हत्या हुई है, पुलिस उन्हीं के घर वालों को संदिग्ध मान कर पूछताछ कर रही है तो उन्हें यह बात बुरी लगी. दुकानें बंद कर के सभी इकट्ठा हुए और कहने लगे कि पुलिस इस मामले को गंभीरता से न ले कर घर वालों को ही परेशान कर रही है. इस बात से नाराज हो कर सभी पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करने लगे. एसीपी मनोज कुमार मीणा और अन्य अधिकारियों ने भीड़ को समझाया और विश्वास दिलाया कि उन्हें कातिलों का सुराग मिल चुका है, इसलिए कातिल जल्द ही पुलिस की गिरफ्त में होंगे. पुलिस किसी निर्दोष को कतई नहीं फंसाती. उन के काफी समझाने के बाद भीड़ शांत हुई.

पुलिस पर मामले के खुलासे का दबाव बढ़ता जा रहा था. अरविंद और उस के दोनों भाई पुलिस की गिरफ्त में थे. पुलिस दोनों उन से अपने तरीके से पूछताछ कर रही थी. पुलिस ने पड़ोसियों से पूछताछ कर के यह जानने की कोशिश की कि हरिकिशन और उन की बेटी राजबाला की किसी से कोई दुश्मनी तो नहीं थी? इस पूछताछ में एक बात यह सामने आई कि हरिकिशन अकड़ वाले जिद्दी स्वभाव के आदमी थे. अगर कोई आदमी उन के घर के आगे गाड़ी खड़ी कर देता था तो वह उस से लड़ने को तैयार हो जाते थे. लेकिन ये झगड़े ऐसे नहीं थे, जिस से कोई उन की हत्या कर देता.

हरिकिशन का नीमड़ी गांव में 100 वर्ग गज का जो मकान था, वह वहां की मेन बाजार में था. मौजूदा समय में उस की कीमत करोड़ों रुपए में थी. इस से पुलिस को लग रहा था कि ये हत्याएं प्रौपर्टी को ले कर ही की गई हैं. तीनों भाई खुद को बेकसूर बता रहे थे. एसआई आलोक कुमार राजन जिस समय साहिब सिंह के सामने तीनों भाइयों से पूछताछ कर रहे थे, उसी समय इंद्रलोक चौकी के प्रभारी राजीव कुमार सीसीटीवी कैमरे की एक फुटेज ले कर आ गए. वह फुटेज हरिकिशन के मकान के सामने स्थित एक ज्वैलर्स की दुकान के सामने लगे सीसीटीवी कैमरे की थी.

पुलिस को उस फुटेज से पता चला कि अरविंद रोजाना सुबह 9-10 बजे के बीच पिता के पास आता था और शाम 7, साढ़े सात बजे तक वहां रहता था. 28 जनवरी को भी वह साढ़े 7 बजे के करीब मकान के मुख्य दरवाजे से बाहर निकलता दिखाई दिया था. पूछताछ में अरविंद ने बताया भी यही था. उसी फुटेज में साढ़े 8 बजे के करीब एक युवक हरिकिशन के मकान के मुख्य दरवाजे से तेजी से निकलता दिखाई दिया. एचडी क्वालिटी के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में वह युवक साफतौर पर घबराया हुआ दिख रहा था. उस के निकलने के कुछ देर बाद 2 लोग तेजी से उसी दरवाजे से निकले. वे दोनों हेलमेट लगाए हुए थे.

पुलिस ने वह फुटेज अरविंद को दिखाई तो उस ने उन लोगों को पहचान कर बताया कि हेलमेट लगा कर निकलने वाले उस के बड़े भाई अजीत और विजय हैं. उन से पहले जो युवक भागता हुआ निकला था, वह विजय का बेटा विकास है. अरविंद ने बताया कि विकास कभीकभी वहां आता था. घर से निकलते समय इतना घबराया हुआ क्यों था, यह बात उस की समझ में नहीं आई. उस दिन अजीत और विजय घर के अंदर से हेलमेट लगा कर निकले थे, जबकि इस के पहले वे अपना हेलमेट हाथ में ले कर निकलते थे और स्कूटी पर बैठने के बाद हेलमेट लगाते थे. पुलिस ने वह फुटेज अजीत और विजय को दिखाई तो उन्होंने यह तो माना कि हेलमेट लगाए हुए वही घर से निकले थे, लेकिन उस दिन वे घर के अंदर से हेलमेट लगा कर क्यों निकले, इस बात का वे कोई उचित जवाब नहीं दे सके.

पूछताछ के लिए पुलिस विजय के बेटे विकास को थाने ले आई. विकास को अलग ले जा कर जब उस से इस दोहरे हत्याकांड के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने सारी सच्चाई पुलिस को बात दी. उस ने बताया कि उसी ने अपने पिता और चाचा के साथ मिल कर दादा और बूआ की हत्या की थी. बेटों द्वारा बाप और बहन के कत्ल की बात सुन कर पुलिस हैरान रह गई. क्योंकि एक बाप ने जिस तरह जीजान लगा कर अपने बेटों की परवरिश की थी, किसी लायक बनाया था, वही बेटे उन की जान ले लेंगे, ऐसा किसी ने सोचा भी नहीं था.

खैर, केस खुल चुका था. अजीत और विजय जो अब तक पिता और बहन की हत्या पर घडि़याली आंसू बहा रहे थे और खुद को बेकसूर बता रहे थे, उन की हकीकत सामने आ चुकी थी. पुलिस ने उन दोनों के सामने विकास से पूछताछ की. उस ने उन के सामने भी हत्या का खुलासा कर दिया. अब विजय और अजीत कैसे हत्या से मना कर सकते थे. लिहाजा उन्होंने भी स्वीकार कर लिया कि इस डबल मर्डर को उन्होंने ही अंजाम दिया था. उन्होंने बताया कि पिता और बहन ने उन के सामने ऐसे हालात खड़े कर दिए थे कि उन की हत्या करने के अलावा उन के पास कोई दूसरा उपाय नहीं था.

विकास, विजय और अजीत से पूछताछ के बाद हरिकिशन और उन की बेटी राजबाला की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

हरिकिशन वर्मा मूलरूप से हरियाणा के जिला झज्जर के रहने वाले थे. सन 1950 के आसपास नौकरी की तलाश में वह दिल्ली आए तो सन 1953 में दिल्ली के एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में उन की नौकरी लग गई. इस के बाद वह अपनी पत्नी लक्ष्मी देवी को भी दिल्ली ले आए. हरिकिशन की ड्यूटी गुलाबी बाग के स्कूल में थी, इसलिए उन्होंने वहीं नीमड़ी गांव में किराए का कमरा ले लिया. हंसीखुशी के साथ उन का समय बीत रहा था. वह एकएक कर 4 बेटों आजाद, अजीत, विजय, अरविंद और 4 बेटियों सावित्री, सरला, राजबाला और चंद्रकला के पिता बने.

हरिकिशन के पिता हरलाल गांव में रहते थे. वह हरिकिशन के लिए अनाज वगैरह भेजते रहते थे. घर से सहयोग मिलने की वजह से हरिकिशन को किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होती थी. उसी दौरान उन के पिता ने नीमड़ी गांव में उन के लिए 100 वर्ग गज का एक प्लौट खरीद दिया था. वह प्लौट गांव की मुख्य सड़क के किनारे था. हरिकिशन उसी प्लौट में घर बनवा कर रहने लगे. उन्होंने अपने सभी बच्चों को पढ़ायालिखाया. बच्चे जैसेजैसे जवान होते गए, वह उन की शादियां करते गए. बड़े बेटे आजाद की युवावस्था में ही मौत हो गई थी. उस के बाद उन के 3 बेटे रह गए थे.

हरिकिशन ने उत्तरीपश्चिमी दिल्ली के सरस्वती विहार में एक 3 मंजिला मकान बना कर एकएक फ्लोर अपने तीनों बेटों को रहने के लिए दे दिया था, जिस में वे अपनेअपने परिवारों के साथ रहते थे. उन का नीमड़ी गांव में जो मकान था, उस में अजीत और विजय ने अलगअलग 2 दुकानें बना ली थीं, जिन में वे सोनेचांदी की ज्वैलरी का धंधा करते थे. हर मांबाप के लिए उस समय एक बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है, जब उन की बेटी शादीशुदा होने के बावजूद अपने मायके में आ कर रहने लगती है. राजबाला की यही समस्या थी, जिस की वजह से हरिकिशन काफी परेशान रहते थे. हरिकिशन सन 1988 में नौकरी से रिटायर हो चुके थे.

दरअसल, उन्होंने राजबाला की शादी फरीदाबाद में कर दी थी. शादी के बाद हर औरत की ख्वाहिश मां बनने की होती है. शादी के कई सालों बाद भी जब वह मां नहीं बनी तो वह मानसिक तनाव में रहने लगी. क्योंकि ससुराल में सभी उसे ताने देने लगे थे. हालात यहां तक पहुंच गए कि पति ने उसे तलाक दे दिया. तलाक के बाद राजबाला पिता के पास आ गई. जवान बेटी किस तरह अपनी जिंदगी काटेगी, इस बात की चिंता हरिकिशन और उन की पत्नी लक्ष्मी देवी को परेशान करती थी. दोनों एक बार बेटी का घर फिर से बसाने की कोशिश की और दिल्ली में ही एक आदमी से उस की शादी कर दी.

बेटी का घर फिर से बस गया तो वे निश्चिंत हो गए. सभी बच्चे अपनीअपनी घरगृहस्थी में खुश थे, इसलिए उन्हें किसी भी तरह की कोई चिंता नहीं थी. लेकिन उन की यह निश्चिंतता ज्यादा दिनों तक कायम नहीं नहीं रह सकी. बेटी राजबाला की उन्होंने जो दूसरी शादी की थी, उस से भी उस की जिंदगी में खुशहाली नहीं आ सकी. वजह वही रही कि यहां भी राजबाला की कोख सूनी रही. वह मां नहीं बनी तो उस की गृहस्थी में फिर से जहर घुलना शुरू हो गया.

ससुराल के और लोगों की बात तो दूर, पति भी बातबात पर ताने देने लगा. रोजरोज की बेइज्जती से राजबाला ऊब गई तो एक दिन ससुराल से मायके आ गई. यह सन 2003 की बात है. इस के बाद वह न ससुराल गई और न ही उस का पति उसे बुलाने आया. राजबाला ने इसे नियति का खेल मानते हुए हालातों से समझौता कर लिया और पिता के साथ ही रहने लगी. लक्ष्मी देवी राजबाला की बहुत चिंता करती थीं. इसी चिंता की वजह से वह बीमार रहने लगीं और सन 2004 में एक दिन चल बसीं.

हरिकिशन वर्मा ने तीनों बेटों को सरस्वती विहार में एकएक फ्लैट दे रखा था. उन्हें अब बेटी राजबाला की चिंता थी. उन के न रहने पर बेटे राजबाला की देखभाल करेंगे या नहीं, इस बात पर उन्हें संशय था. इसलिए वह नीमड़ी गांव वाला मकान राजबाला को देना चाहते थे, जिस से भविष्य में उसे किसी का मोहताज न रहना पड़े. नीमड़ी वाले मकान में 2 दुकानों और उन के पीछे वाले 2 कमरों पर विजय और अजीत का कब्जा था. मकान मुख्य बाजार में था, इस से काफी महंगा था. अजीत और विजय को जब पता चला कि उस के पिता यह मकान राजबाला के नाम करना चाहते हैं तो उन्होंने पिता से इस बात का विरोध किया.

हरिकिशन जिद्दी स्वभाव के थे ही. उन्होंने साफ कह दिया कि यह मकान उन का है, इसलिए वह इसे किसे देते हैं, यह उन की मरजी. पिता के इस दो टूक जवाब से दोनों भाइयों को लगा कि अगर उन्होंने मकान दूसरे के नाम कर दिया तो उन के हाथ से दुकानें निकल जाएंगी. तब वे सड़क पर आ जाएंगे. उन्होंने पिता की बात का जम कर विरोध किया और यहां तक कह दिया कि वे किसी भी हालत में यह घर किसी दूसरे के नाम नहीं करने देंगे. इसी बात को ले कर बापबेटों के बीच आए दिन झगड़ा होने लगा.

इस झगड़े से परिवार 2 हिस्सों में बंट गया. एक तरफ अजीत और विजय थे तो दूसरी तरफ हरिकिशन, उन की बेटी राजबाला और बेटा अरविंद. दोनों ही अपनीअपनी जिद पर अड़े थे. हरिकिशन ने भी ठान लिया था कि जो औलाद उन की बात नहीं मान रही, उसे वह अपनी जायदाद से फूटी कौड़ी नहीं देंगे. उन्होंने दोनों बेटों से अपनी दुकानें खाली करने को कह दिया. लेकिन वे दुकानें खाली करने को तैयार नहीं थे. तब हरिकिशन ने दिल्ली उच्च न्यायालय की शरण ली. अजीत और विजय ने न्यायालय में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि चूंकि वे हरिकिशन वर्मा की जायज औलादें हैं, इसलिए इस पैतृक संपत्ति पर उन का भी अधिकार है.

जबकि हरिकिशन कहा था कि यह संपत्ति पैतृक नहीं है, इसे उन्होंने खुद खरीदी है. इसलिए इस संपत्ति पर वे अपना अधिकार नहीं जता सकते. अदालत ने फैसला सुनाया कि जिन दुकानों का अजीत और विजय उपयोग कर रहे हैं, हर महीने वे डेढ़डेढ़ हजार रुपए किराए के रूप में हरिकिशन को दें. यह बात करीब 9 साल पहले की है. इसी आदेश पर दोनों भाई पिता को निर्धारित धनराशि देते रहे. विजय और अजीत ने अपनी दुकानों के पीछे बने कमरों में चांदी के सिक्के बनाने की मशीनें लगवा ली थीं. बड़े ज्वैलर्स के और्डर पर वे चांदी के सिक्के बना कर पहुंचाते थे. इस से उन की आमदनी बढ़ गई थी. राजबाला और हरिकिशन दुकानों को खाली कराने के उपाय खोजते रहते थे. इसलिए दोनों भाई दुकानों के शटर में ताले हमेशा अंदर से लगाते थे.

अंदर से ताले लगा कर वे पीछे की गैलरी से होते हुए घर के मुख्य दरवाजे से निकलते थे. उसी समय राजबाला या हरिकिशन उन से किसी न किसी बात पर झगड़ा कर बैठते थे, जिस की शिकायत पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर होती थी. तब पुलिस मौके पर पहुंच कर दोनों पक्षों को समझाबुझा कर शांत कराती थी. जैसेजैसे हरिकिशन की उम्र बढ़ती जा रही थी और वह बीमार भी रहने लगे थे, इसलिए उन का छोटा बेटा अरविंद उन की देखभाल के लिए रोज सुबह उन के पास आ जाता था. दिन भर उन के पास रहता और शाम को सरस्वती विहार स्थित अपने घर चला जाता था. उस का रोज का यही क्रम था.

दिवाली या अन्य मौकों पर अजीत और विजय के पास चांदी के सिक्के बनाने के बड़े और्डर आते थे, जिन्हें पूरा करने के लिए वे रातदिन काम करते थे. इन के काम को प्रभावित करने के लिए राजबाला 100 नंबर पर फोन कर के शिकायत कर देती थी कि उस के भाई सिक्के बनाने में तेजाब का इस्तेमाल करते हैं, जिस की स्मैल से उस के बूढ़े पिता को सांस लेने में परेशानी होती है. इस शिकायत पर पुलिस आ कर उन का काम रुकवा देती थी. काम रुकने पर विजय और अजीत का नुकसान होता. इस तरह के फोन राजबाला अकसर करती रहती रहती थी. आए दिन के इस तरह के झगड़े से दोनों भाई परेशान रहते थे.

एक दिन विजय के हाथ पिता के इसी मकान की एक परची हाथ लग गई. वह परची गांव वजीरपुर के प्रधान द्वारा लिखी गई थी. पहले जब लोग कोई प्लौट या मकान खरीदते थे, गांव में इसी तरह की परचियों पर लिखापढ़ी हो जाती थी. हरिकिशन को भी प्लौट की इसी तरह की परची कटी थी. वह परची हरिकिशन के पिता हरलाल के नाम थी. लेकिन हरिकिशन ने उस परची पर कटिंग कर के अपना नाम लिख दिया था. विजय को इस परची से लगा कि नीमड़ी गांव वाला प्लौट उस के दादा हरलाल ने खरीदा था. यानी जिस प्लौट को हरिकिशन अपने द्वारा खरीदा बता रहे थे, वह उन के दादा का खरीदा था. जबकि दादा की संपत्ति परिवार के लोगों की मरजी के बिना किसी और को नहीं दी जा सकती थी.

उसी परची के आधार पर विजय ने तीसहजारी न्यायालय में इस्तगासा दाखिल कर प्लौट की उस परची पर कटिंग कर धोखाधड़ी करने वाले पिता हरिकिशन और भाई अरविंद के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने की अपील की थी. यह सन 2009 की बात है. तत्कालीन महानगर दंडाधिकारी ज्योति कलेर के आदेश पर उस परची की फोरैंसिक जांच हुई तो यह बात सिद्ध हो गई कि परची पर कटिंग कर के हरिकिशन का नाम बाद में लिखा गया था. इस के बाद कोर्ट के आदेश पर हरिकिशन और उन के छोटे बेटे अरविंद के खिलाफ सराय रोहिल्ला थाने में भादंवि की धारा 420/467/468/120 बी के तहत रिपोर्ट दर्ज हो गई थी.

इस केस में हरिकिशन की गिरफ्तारी हुई तो अरविंद ने अपनी अग्रिम जमानत ले ली थी. यह मामला आज भी महानगर दंडाधिकारी श्री अजय कुमार मलिक की कोर्ट में चल रहा है, जिस की अगली तारीख 15 मार्च, 2016 है. कोर्ट में केस चलने के बावजूद इन लोगों के बीच चल रहा झगड़ा बंद नहीं हुआ. छोटीछोटी बातों पर झगड़ा कर के पुलिस को फोन करना आए दिन की बात थी, इसीलिए थाने का हर पुलिसकर्मी इन्हें अच्छी तरह से जानता था. झगड़े से विजय और अजीत का धंधा चौपट हो रहा था. उन पर लोगों का कर्ज भी हो गया था.

28 जनवरी, 2016 की शाम 6 बजे दोनों भाई इसी समस्या पर विचार कर रहे थे, तभी विजय का बेटा विकास आ गया. अपने पिता और चाचा की हालत देख कर वह भी परेशान हो गया. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि इस समस्या का समाधान कैसे निकला जाए. अचानक विकास तैश में आ गया. उस ने कहा कि क्यों न इस समस्या की जड़ हरिकिशन और राजबाला को ही खत्म कर दिया जाए? उपाय अच्छा था. विजय और अजीत विकास की बात पर सहमत हो गए, लेकिन समस्या यह थी कि यह सब किया कैसे जाए.

विकास ने कहा, ‘‘यह बहुत आसान है. दादा और बूआ को गला दबा कर मार देते हैं. उस के बाद हम लोग निकल चलते हैं. यहां अरविंद चाचा भी आते हैं, वह दिन भर इन के पास रहते हैं. पुलिस जब पूछताछ करेगी तो हम अरविंद का नाम ले लेंगे. इस तरह एक तीर से 2 शिकार हो जाएंगे. लालच में आ कर तीनों ने हरिकिशन और उस की बेटी राजबाला की हत्या करने की पूरी योजना बना डाली. शाम 7 बजे के बाद जब अरविंद वहां से चला गया तो 8 बजे के करीब उन्होंने अपनी दुकानों के शटर गिरा कर अंदर से ताले बंद किए. इस के बाद वे तीनों गैलरी से होते हुए उन कमरों की तरफ गए, जहां हरिकिशन और राजबाला रहते थे.

राजबाला उस समय कमरे में बैठी टीवी देख रही थी. विजय उस के कमरे में इस तरह घुसा कि राजबाला को उस के आने की भनक तक नहीं लगी. विजय ने उस के पास पहुंच कर पहले एक हाथ से मुंह दबोचा और दूसरे हाथ से उस का गला दबाने लगा. राजबाला मजबूत जिस्म की थी. उस ने खुद को छुड़ाने की कोशिश की. किसी तरह उस ने खुद छुड़ा भी लिया. वह कमरे से निकल कर बाहर के दरवाजे की ओर भागी तो विजय ने उसे पकड़ कर गिरा दिया और दोनों हाथों से गला घोंट दिया.

अजीत और विकास उस कमरे में गए, जिस में हरिकिशन सोते थे. हरिकिशन उस समय रजाई ओढ़े सो रहे थे. आते ही विकास ने हरिकिशन का मुंह वहां पड़ी धोती से दबाया तो हरिकिशन जाग गए. उन्होंने अपना बचाव करते हुए विकास को गाल पर एक चांटा मारा तो विकास की पकड़ ढीली पड़ गई. तभी अजीत ने विकास को हटा कर खुद पिता का मुंह और नाक हाथ से दबा दिया. हरिकिशन तड़पने लगे तो विकास ने उन के पैर दबोच लिए. कुछ देर में उन का शरीर ढीला पड़ गया तो उन्होंने उन की लाश रजाई में लपेट दी. उन्हें उम्मीद थी कि मकान के मुकदमे से जुड़े कागजात घर में रखी सेफ में रखे होंगे, इसलिए वे चाबी तलाशने लगे.

राजबाला के कमरे में उन्हें एक बैग मिला, जिस में उन्हें अलमारी की चाबी मिल गई. वह चाबी विजय ने अपने पास रख ली. दोनों हत्याएं करने के बाद पहले विकास निकला. वह घबराया हुआ इधरउधर यह देख रहा था कि उसे घर से निकलते कोई देख तो नहीं रहा. इस के कुछ देर बाद सिर पर हेलमेट लगा कर विजय और अजीत निकले. जाते समय वे दरवाजे को भिड़ा गए थे. तीनों ने यही सोचा था कि घर से निकलते हुए उन्हें किसी ने नहीं देखा, लेकिन उन के घर के सामने ज्वैलर्स की दुकान के बाहर उच्च क्वालिटी के लगे सीसीटीवी कैमरे ने देख लिया था, यह शायद उन्हें पता नहीं चला.

विकास मैट्रो से तो विजय और अजीत अपनी एक्टिवा से सरस्वती विहार स्थित अपने फ्लैटों पर चले गए थे. तीनों यही सोच रहे थे कि उन पर किसी को शक नहीं होगा. लेकिन उन की हकीकत कैमरे से सामने आ गई थी. पुलिस ने विजय, अजीत और विकास से पूछताछ कर 29 जनवरी को उन्हें तीस हजारी न्यायालय में महानगर दंडाधिकारी अजय कुमार मलिक के समक्ष पेश कर 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. पुलिस ने सेफ की चाबी व अन्य सबूत इकट्ठे कर 31 जनवरी को उन्हें फिर से उन्हीं की अदालत में पेश किया, जहां से सभी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Family Dispute

—कथा पुलिस सूत्रों और अभियुक्तों से की गई बातचीत पर आधारित

 

Emotional Crime Story: इनाम या ब्लैकमेल

Emotional Crime Story: जिंदगी में अच्छे लोग भी मिलते हैं और बुरे भी. जिस लड़की ने अपनी हरकतों से मेरी नींद हराम कर दी थी, वह रिया निकलेगी, मैं ने सोचा भी नहीं था. लेकिन रिया के साथ जो हुआ था, उस ने ही कहां सोचा होगा. बहरहाल, हम मिले तो अच्छाई और बुराई दोनों सामने आ गई.  ट्रेन फुल स्पीड में दौड़ रही थी. बाहर हलकीहलकी बूंदाबांदी हो रही थी. मैं खिड़की के पास ही बैठा था. कुछ देर तक तो रिमझिम फुहार अच्छी लगी,

पर जब पानी की बूंदें मेरी सीट पर गिरने लगीं तो मैं ने शीशा गिरा दिया. लोगों को मुझ से शिकायत रही है कि मुझे बोलना नहीं आता. ठीक ही कहते थे लोग. मैं 4 घंटे से चुपचाप बैठा था. आसपास बैठे यात्री आपस में बातें कर रहे थे. मैं या तो अपनी डायरी उलटपलट कर देखता था या फिर बीचबीच में न्यूजपेपर पढ़ लेता था. मेरे सामने वाली सीट पर एक महिला बैठी थी. मैं ने उस की साड़ी से ही समझ लिया था कि कोई महिला या लड़की है, अभी तक उस की शक्ल नहीं देखी थी. बात करने का तो सवाल ही नहीं था. जबकि वह सब से घुलमिल कर बातें कर रही थी.

इसी बीच वह उठ कर मेरी खिड़की के पास आ कर बोली कि थोड़ी सी खिड़की खोल देती हूं, घुटन सी महसूस हो रही है. मैं अपनी डायरी में कुछ लिखने की सोच रहा था, सो बिना सिर उठाए या उस की तरफ देखे मैं ने हूं कह दिया. खिड़की खोल कर वह अपनी सीट पर जा बैठी. थोड़ी देर में चाय वाला आया तो उस ने अपने लिए चाय ली और औपचारिकतावश आसपास के यात्रियों से भी चाय के लिए पूछा, मुझ से भी. मैं ने बिना उस की ओर देखे ना कह दिया.

खैर, उस ने 3 या 4 कप चाय ली. कितनी, मुझे ठीक से पता नहीं, पर सब के पैसे उसी ने दिए. मैं ने कनखियों से उसे पैसे देते देखा था. इस बीच मैं बाथरूम गया. लेकिन जब लौटा तो वह लड़की सीट पर नहीं थी. मैं यह तो बताना ही भूल गया कि मैं कोलकाता से पटना जा रहा था. जब तक मैं बाथरूम से निकल कर अपनी सीट पर आता, ट्रेन आसनसोल पर खड़ी थी और वह लड़की वहीं उतर गई थी.

थोड़ी देर में ट्रेन चली तो फिर मैं फिर से अपनी डायरी उठा कर पढ़ने लगा. उस में एक परची रखी थी. मैं ने पढ़ना शुरू किया तो दिमाग के तवे पर वैसे ही एक जोरदार छींटा सा लगा, जैसे डोसा बनाने वाले गरम तवे पर पानी के छींटे मारते वक्त होता है. उस पर लिखा था, ‘गिड्डू, तू घोंचू ही रहा. डायरी में जिंदगी को कैद करता है, इस से बाहर निकल कर जिंदगी जीना सीख ले.’

मेरी समझ में नहीं आया कि वह लड़की कौन हो सकती है. गिड्डू विशेषण मुझे हाईस्कूल में मिला था और घोंचू कालेज में. हालांकि दोनों में किसी का सही अर्थ आज तक मुझे खुद नहीं मालूम. पटना में स्कूल के कुछ दोस्तों ने मुझे बताया था कि नाटे को गिड्डू कहते हैं, हालांकि मैं उतना छोटा भी नहीं था. मैं ने उस के बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई टाटा से की थी. इस का मतलब वह लड़की मेरे साथ स्कूल और कालेज दोनों में रही थी. मेरे बगल में बैठे यात्री ने मुझ से पूछा कि क्या मैं उस लड़की को जानता हूं तो मैं ने सिर हिला कर ना कहा. पर वह बोला कि वह तो बारबार आप की ओर देख कर मुसकरा रही थी, लेकिन आप ने एक बार भी उस की ओर नहीं देखा. न ही उस की चाय ली थी. मैं क्या कहता, इसलिए चुप रह गया.

खैर, मैं अपने घर पटना आ गया. मैं कोलकाता में एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी जौइन करने के बाद कुछ दिनों के लिए पटना आया था. कोलकाता में फ्लैट लेने के बाद मुझे अपना बाकी सामान कोलकाता शिफ्ट करना था. पर मेरे जेहन में वह लड़की बैठी थी, कौन हो सकती थी वह? मैं ने ट्रेन में उस से बात तो नहीं की थी, अलबत्ता उसे बातें करते जरूर सुना था. इस बीच मेरे सेल पर 3 बार फोन आया और मेरे हैलो कहने पर उधर से भी एक लेडी हैलो बोलती थी, फिर फोन कट जाता था.

एक बार मैं ने हिम्मत कर के उस नंबर पर डायल किया तो उधर से आवाज आई, ‘‘गिड्डू, सौरी दीपक! मुझे फोन करने की हिम्मत कैसे कर ली? खैर, फोन किया है तो बताओ, तुम कोलकाता कब और किस ट्रेन से लौट रहे हो?’’ बिना कोई बात किए इस बार मैं ने फोन काट दिया. एक बार जब मैं घर पर नहीं था तो घर की लैंडलाइन पर फोन आया था. पिताजी ने फोन उठाया तो उस लड़की ने बताया, ‘‘अंकल, मैं दीपक के औफिस से बोल रही हूं. औफिस में कुछ अरजेंट काम है. आप बता सकते हैं वह कब आ रहे हैं?’’

अब तक मेरा नाम आप भी जान गए होंगे. जी हां, सही पकड़ा आप ने, मेरा नाम दीपक ही है. पिताजी ने तो मेरे बारे में बता दिया था, पर लड़की का नाम नहीं पूछा था. वह लड़की मेरे लिए पहेली बनती जा रही थी. बहरहाल, चौथे दिन मैं कोलकाता लौट आया था. मैं ने अपना सामान ट्रांसपोर्ट से बुक करा दिया था. मैं जब औफिस में पहुंचा तो थोड़ी देर बाद मेरे सेल पर फोन आया. उसी लड़की की आवाज थी.

‘‘क्यों, औफिस पहुंच गया?’’ और फोन कट गया. अब मुझे गुस्सा आने लगा था. मैं ने ठान लिया था कि इस लड़की तक किसी भी कीमत पर पहुंच कर रहूंगा. इसी उलझन में मुझे नींद भी नहीं आ रही थी कि एक बार फिर लड़की ने फोन कर के कहा, ‘‘क्यों, नींद नहीं आ रही है न?’’ इतना कह कर उस ने फोन काट दिया था.

हर शुक्रवार को कंपनी के मैनेजिंग डाइरेक्टर मीटिंग ले कर सप्ताह भर में हुए काम या उन में आने वाली कठिनाइयों की समीक्षा करते थे. उस मीटिंग में सभी इंजीनियर्स को जाना पड़ता था. इस बार की मीटिंग में मुझे थोड़ी डांट पड़ी थी, क्योंकि मेरे काम की प्रगति संतोषजनक नहीं थी. उसी दिन रात में उस लड़की ने फोन किया, ‘‘क्यों, मीटिंग में तैयारी कर के क्यों नहीं आते हो? कभीकभी मैनेजमेंट को ओवर रिपोर्टिंग कर के बचना सीखो. और हां, जो कमी रह गई है, अगले हफ्ते पूरी करो. अब ज्यादा तंग नहीं करूंगी. मेरा कोटा पूरा हो गया. जितना तुम ने तंग किया, उस का बदला ले लिया है.’’

‘‘जहां तक मुझे याद है मैं ने किसी को तंग नहीं किया, पर मेरा फोन नंबर तुम्हें कहां से मिला?’’ मैं ने कहा. संयोग से इस बार उस ने फोन काटा नहीं.

कुछ पल की खामोशी के बाद उस ने कहा, ‘‘फोन नंबर तो तुम्हारी डायरी में ट्रेन में ही मिल गया था. और हां, तुझे बोलना ही कहां आता था, जो मुझे तंग करता? अच्छा मैं ही बोलती हूं. कल दोपहर पार्कस्ट्रीट में ब्लू फौक्स में आ जाना, बोका कहीं का.’’ और फोन कट गया. अगले दिन शनिवार था. छुट्टी का दिन. इस आखिरी शब्द ‘बोका’ पर मेरा माथा ठनका. यह शब्द तो बंगाली बोलते हैं. एक तरह से यह उन का तकियाकलाम होता है. इस का मतलब यह लड़की बंगालिन है और मेरी ही कंपनी में है. हो सकता है, एमडी सचिवालय में ही हो. उस की बातों की टोन बंगाली थी. जबकि मेरे सेक्शन में एक भी बंगाली लड़की नहीं थी. एक रिया नाम की बंगाली लड़की दूसरे सेक्शन में थी.

पटना में हम लोग किराए के एक मकान में रहते थे. रिया भी पास वाले मकान में ही रहती थी. उस के पिता रेलवे में थे और उन की पोस्टिंग पटना में थी. हम दोनों की छत के बीच बस एक 3 फुट की रेलिंग थी. गरमियों में बहुत बार देर रात तक दोनों का परिवार छत पर ही रहता था. कभी सिर्फ हम दोनों ही रहते थे. वह बहुत चुलबुली और खुराफाती थी. कभी अकेले छत पर होता तो कमेंट्स करती थी. कभी होली में रंग फेंकती थी. एक बार जब छत पर अकेला था, उस ने एक पर्ची भी फेंकी थी, लिखा था ‘ना समझे वो अनाड़ी है.’ दूसरे दिन पर्ची पर लिखा था, ‘तेरी बनियान में 2 छेद हैं.’ मेरे कपडे़ छत पर सूखते वक्त देखा होगा उस ने.

एक बार तो लिखा, ‘लव यू बेबी’. पर मेरी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं होती थी. 11वीं कक्षा के बाद उस के पिता का आसनसोल ट्रांसफर हो गया था. इस के अतिरिक्त मैं उस के बारे में कुछ नहीं जानता था. उस का चेहरा भी मुझे याद नहीं था. यह तो स्कूल की बात हुई. मैं सोचने लगा, कालेज में मुझे जो घोंचू विशेषण मिला, उस की जानकारी इस लड़की को कैसे मिली? फिर सोचा कल तो मिल ही रहे हैं, फिर माथापच्ची क्या करना. शनिवार को ठीक 12 बजे मैं ब्लू फौक्स के सामने खड़ा था. तभी टैक्सी से एक लड़की उतर कर मेरी ओर आई और उस ने पास आ कर कहा, ‘‘हाय, मैं रिया. मैं जानती हूं, तुम मेरा ही इंतजार कर रहे हो. चलो, अंदर बैठ कर बातें करते हैं. मैं ने एक टेबल बुक कर रखी है.’’

रिया ने एक एकांत कोने में टेबल बुक करा रखी थी. अब पहली बार मैं ने उस के चेहरे को देखा. मुझे धूमिल सा रिया का चेहरा याद आया. पर अब वह मैच्योर्ड और सुंदर लग रही थी. मैं ने कहा कि अब मैं अपना इंट्रोडक्शन दूं तो उस ने बीच में ही टोका, ‘‘नो मिस्टर दीपक.’’

मैं मुसकरा कर रह गया. वेटर और्डर लेने आया तो उस ने पहले कोल्डड्रिंक लाने को कहा, साथ में लंच भी और्डर कर दिया.

फिर रिया ने कहा, ‘‘शुरू तो मुझे ही करना होगा, तुम से तो हो नहीं सकेगा. तुम सोच रहे होगे, तुम तक मैं पहुंची कैसे?’’

मेरे हां कहने पर उस ने कहा, ‘‘बता चुकी हूं कि ट्रेन में तुम्हारी डायरी से तुम्हारा नंबर मिला था. मैं ने भी इसी कंपनी में एमडी सचिवालय में तकनीकी सहायक के पद पर हाल ही में जौइन किया है. वीकली मीटिंग में भाग लेने वालों में तुम्हारा नाम देखा था. इस तरह तुम तक आसानी से पहुंच गई.’’

तब तक वेटर कोल्डड्रिंक दे गया. हम दोनों ने साथसाथ कोल्डड्रिंक की सिप ली. इस बार मैं बोला, ‘‘तुम्हें मेरे स्कूल और कालेज के विशेषण कहां मिले? तुम तो मेरे सेक्शन में नहीं थी और न ही कालेज में?’’

‘‘घोंचू! सौरी अब नो मोर. तुम्हारे सेक्शन की लड़कियां मेरी भी सहेली थीं. मैं ने भी टाटा से ही इंजीनियरिंग की है. पर पहले अटेंप्ट में कंपीट नहीं कर सकी थी, पर दूसरे साल कंपीट कर गई थी और तुम से एक साल जूनियर हो गई. पर मैं आंखकान दोनों खुले रखती हूं.’’

इस बार मैं खुल कर हंसा. मैं ने पूछा कि मैं ने तो कभी तुम्हें तंग नहीं किया, तुम कैसे कहती हो कि मुझ से बदला ले रही हो. वह हंस कर बोली, ‘‘खाना आ चुका है. शुरू करो, साथ में बातें भी होती रहेंगी.’’ और हम ने खाना शुरू कर दिया.

रिया बोली, ‘‘यही तो शिकायत है तुम से. मैं तो चाहती थी कि तुम मुझे बारबार देखते और छेड़ते. जवाब में मैं भी तुम्हें छेड़ती. इस तरह हम करीब आ सकते थे. पर मैं तुम्हारा मौनव्रत नहीं तुड़वा सकी थी. पहल मैं ने ही की थी, पर तुम उदासीन रहे थे. जहां तक मुझे याद है, तुम ने एक बार भी मेरी तरफ ठीक से नहीं देखा होगा. मुझे लगा, तुम मुझे इग्नोर कर रहे हो. दूसरे लड़कों की तरह मुझे देख कर तुम ने न कभी आंख मारी, न सीटी बजाई. तुम्हारी इसी अदा पर मैं फिदा थी. तब मैं ने सोचा कि तुम्हें मैं ही ठीक करूंगी, पर तब तक पिताजी का ट्रांसफर हो गया था. अब जा कर आखिर पकड़े ही गए.’’

और वह इतना जोर से हंसी कि पास की टेबल पर बैठे लोग हमारी ओर देखने लगे थे. बाद में सौरी बोल कर वह झेंप गई थी. पता नहीं क्यों अब मेरा मन भी रिया के पास आने का करने लगा था. हमारा खानापीना खत्म हुआ, वेटर बिल ले आया. जब मैं ने जेब से पर्स निकाला तो रिया बोली, ‘‘नो..नो, मैं ने तुम्हें यहां बुलाया है तो बिल भी मैं ही दूंगी.’’

होटल से बाहर आ कर उस ने टैक्सी बुलाई तो मैं ने कहा, ‘‘चलो, कुछ देर विक्टोरिया मेमोरियल के पार्क में बैठते हैं.’’

‘‘ये कौन बोला, चलो अच्छा हुआ, डायरी के पन्नों से बाहर निकल आए.’’ कह कर उस ने मेरा मजाक उड़ाया. खैर, हम विक्टोरिया मेमोरियल के पार्क के एक वीरान कोने में जा बैठे. जब रिया ने पूछा कि बीवीबच्चे यहीं हैं कि पटना में तो मैं ने कहा कि अभी तो बैचलर ही हूं. फिर मैं ने पलट कर पूछा, ‘‘तुम ने शादी की?’’

रिया ने कहा, ‘‘नहीं, पर करीब एक साल तक जिस के साथ लिवइन में रही, उस से ब्रेकअप हो गया है. यही कोई एक सवा महीने पहले.’’

मैं कुछ देर खामोश रहा और सोचने लगा कि यह लड़की किस चीज की बनी है. इतना कुछ होने पर भी जिंदगी को खुशीखुशी जिए जा रही है. मैं ने महसूस किया कि रिया खामोश थी. इस के आगे मुझे उस के निजी जीवन के बारे में पूछने का साहस नहीं हुआ. मैं ने उस से कहा कि मेरा कोलकाता का मशहूर बोटैनिकल गार्डन देखने का मन है तो उस ने खामोशी तोड़ते हुए कहा, ‘‘नो प्रौब्लम, कल संडे है. पूरा दिन हम जहां चाहें घूम सकते हैं. कल सुबह नाश्ता कर के 10 बजे यहीं मिलते हैं. मैं सैंडविच और कौफी बना कर साथ ले आऊंगी. वहीं गार्डन में लंच करेंगे, कैसा रहेगा?’’

‘‘परफेक्ट. तुम ने तो मेरे मन की बात कह डाली.’’ मैं ने कहा. इस के बाद मैं अपने फ्लैट पर आ गया. ब्रेकअप के बाद रिया अपनी ही कंपनी की एक लड़की के साथ फ्लैट शेयर करती थी. संडे को हम दोनों बोटैनिकल गार्डन में गंगा के किनारे जा बैठे. मैं ने रिया से परिवार के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि परिवार में बस पिताजी हैं. मां का देहांत हो चुका है. जब उस ने मेरे बारे में पूछा तो मैं ने भी बता दिया कि मां ही है, जो मेरे साथ कोलकाता में रहेगी.

इस के बाद मैं ने ही उस से पूछा कि क्या ब्रेकअप पर पुनर्विचार की संभावना नहीं है. उस ने थोड़ा मुसकरा कर कहा, ‘‘तुम्हें बोलना आ गया है.’’ और आगे भी उसी ने कहा, ‘‘मुझे कायर और धोखेबाज आदमी से सख्त नफरत है. उस से तो बेहतर है, मैं अकेली ही जी लूंगी.’’

मैं ने कहा, ‘‘अकेले का सवाल क्यों? हो सकता है उस से बेहतर साथी मिल जाए. बुरा न मानो तो क्या मुझे बता सकती हो वह कौन है? मैं उस से मिल कर फिर से सब ठीक करने का प्रयास कर सकता हूं.’’

रिया ने मुझे ऐसा करने से मना कर दिया और कहा, ‘‘मैं तो खुली किताब हूं. मुझे तुम्हें बताने में कोई संकोच नहीं है.’’

उस ने बताया कि कंपनी ने उसे 6 महीने की ट्रेनिंग के लिए जर्मनी भेजा था. उसी बैच में मैनेजिंग डाइरेक्टर का बेटा रवि भी गया था. वहीं उस से दोस्ती भी हुई. भारत लौटने पर दोनों की पोस्टिंग नासिक में थी. वहां दोस्ती प्यार में बदल गई और उस के साथ रहने लगी थी. उस ने भरोसा दिलाया था कि जल्द ही दोनों शादी कर लेंगे. इसी बीच रिया को गर्भ रह गया था. रवि ने उस से कहा कि वह शादी बाद में कर लेगा, पर उसे गर्भपात कराना होगा. लेकिन रिया को यह मंजूर नहीं था. यह बात एमडी साहब तक पहुंची तो आननफानन में पिछले माह रिया का ट्रांसफर कोलकाता ब्रांच में कर दिया गया.

रिया ने बताया कि कोलकाता में उसे डायरेक्टर ने अपने सेक्रेटरिएट में रखा था. उसे बुला कर काफी डांटा भी था. कहा था कि वैसे भी किसी दूसरे प्रांत और जाति की लड़की उन की बहू नहीं बन सकती. रिया ने भी दो टूक कह दिया था कि उसे रवि जैसे कायर की जरूरत नहीं है. जब हम दोनों बोटैनिकल गार्डन में बैठे थे, तभी एमडी का पर्सनल सेक्रेटरी भी घूमता हुआ हमारे पास आ गया था. वह 2 मिनट इधरउधर की बातें कर के चला गया था. उस ने बौस को हम दोनों के बारे में बता दिया था. उन्होंने मुझे और रिया को एक साथ अपने चैंबर में बुलाया. उन्हें शायद गलतफहमी थी कि हम दोनों प्यार करते हैं.

वैसे अब मैं खुद उस से प्रभावित था और उसे चाहने लगा था. उन्होंने कहा कि अगर हम लोग शादी कर लें तो एकदो साल के लिए हमारी पोस्टिंग विदेश में करवा सकते हैं. रिया को यह बात बुरी लगी और वह बौस पर ही बरस पड़ी, ‘‘मैं समझ सकती हूं कि आप अपने बेटे की घिनौनी करतूत का ठीकरा दीपक के सिर फोड़ना चाहते हैं.’’

इतना सुन कर एमडी ने आगबबूला हो कर कहा, ‘‘मैं चाहूं तो तुम दोनों को नौकरी से निकाल सकता हूं.’’

इस बार न जाने मुझ में कहां से इतना साहस आ गया कि मैं बोला, ‘‘और अगर रिया चाहे तो आप और आप के बेटे दोनों को हवालात की हवा खिला सकती है. आप भूल जाएं कि आप बौस हैं तो जो जी में आए, कर सकते हैं. आप को इतनी सी समझ आ जाए तो आप का ही भला होगा.’’

रिया आश्चर्यचकित हो कर मेरी ओर देखे जा रही थी. मैं ने इशारे से उसे बाहर निकलने को कहा और हम दोनों बौस के औफिस से बाहर आ गए. रिया मुझे औफिस में ले गई. पहले तो उस ने पानी पीने को कहा, फिर 2 कप चाय और्डर की. फिर उस ने कहा, ‘‘तुम्हें बौस से उलझने की क्या जरूरत थी?’’

मैं ने कहा, ‘‘तो मैं उस खूसट को मनमानी करने देता? अब हमें बड़ा फैसला लेना होगा.’’

वह बोली, ‘‘हमें मतलब? मुझ से क्या चाहते हो?’’

मैं ने कहा, ‘‘ऐसी हालत में लड़कियों को मां की सख्त जरूरत होती है. मुझे पूरा यकीन है कि मेरी मां मेरा साथ अवश्य देगी. हम दोनों 15 दिन की नोटिस के साथ इस्तीफा दे देते हैं. इस बीच हम लोग छुट्टी पर रहेंगे. अगर तुम्हें आजीवन साथ पसंद हो तो सब ठीक हो जाएगा. जब मैं फोन करूं, मेरे फ्लैट पर आ जाना. मैं इस हाल में तुम्हें अकेली नहीं छोड़ सकता. तुम्हें मुझ पर भरोसा है या नहीं?’’

‘‘पहले तो यह बता दूं कि मुझे तुम्हारा अचानक बदला रूप बहुत अच्छा लगा. पर सब कुछ जानते हुए भी तुम इस पचड़े में क्यों पड़ रहे हो?’’

मैं ने सिर्फ इतना कहा कि मेरी बात स्वीकार हो तो मेरे फोन करने पर मेरे फ्लैट पर आ जाना, तब तक मां भी आ जाएगी. और अपना त्यागपत्र दे कर मैं औफिस से निकल गया. घर आ कर मैं ने मां को फोन पर सारी बात बता कर कहा कि वह कल की गाड़ी से कोलकाता आ जाए. मां के आने पर मैं ने रिया को फोन कर के कल आने को कहा. अगले दिन सुबह रिया आई तो मैं ने उसे मां से मिलाया. मां ने मुझ से कहा कि मुझे थोड़ी देर अकेले में रिया से बात करने दो. दोनों ने काफी देर तक बातें कीं. मैं ने देखा कि दोनों की आंखें गीली थीं.

मां ने उसे कल फिर आने को कहा और वह चली गई. मैं ने रिया से फोन पर पूछा कि मां से क्या बातें हुईं तो उस ने कहा, ‘‘पहले तो मेरे परिवार के बारे में बात की. फिर कहा तुम तो हमें पंसद हो, पर इस बच्चे के कारण थोड़ी उलझन में हूं. मैं ने कहा कि आप एक मां हैं, भला कोई मां अपनी कोख गिराना चाहेगी? मुझे तो एक मर्द ने धोखा दिया है. मैं चाहती भी नहीं थी कि दीपक इस झंझट में पड़े. हो सके तो आप ही उसे समझाइए. इस पर मां भी रो पड़ी थीं. पता नहीं कल क्यों बुलाया है?’’

रिया के जाने के बाद मां ने मुझ से भी पूछा, ‘‘सब कुछ जान कर तुम रिया को अपनाने को तैयार हो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है. बाद में तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए.’’

मैं ने फिर फोन कर के मां की बात रिया को बताई और उस से पूछा कि उसे तो कोई प्रौब्लम नहीं है. इस पर वह बोली, ‘‘दीपक मेरे लिए तो विन विन सिचुएशन (चित भी मेरी पट भी मेरी) है. पर तुम मेरी खातिर क्यों नौकरी छोड़ रहे हो?’’

रिया ने बताया था कि उस ने भी रूममेट से अपना इस्तीफा भिजवा दिया है. मैं ने कहा कि 3-4 दिनों के अंदर ही मंदिर में हम शादी कर लेंगे और घर पर ही 15-20 दोस्तों के साथ पार्टी करेंगे. रिया मेरे कंधे पर सिर रख कर सिसकने लगी. मैं ने उसे थपथपाते हुए अलग किया तो बोली, ‘‘मैं ने तो सोचा था कि सब मर्द एक से होते हैं, बल्कि मर्द को दर्द ही नहीं होता है.’’

मैं ने कहा, ‘‘मर्द को भी दर्द होता है.’’

और चौथे दिन हमारी शादी हो गई. उस के अगले दिन हम ने घर पर पार्टी दी. मेरे नहीं चाहने पर भी रिया ने बौस को निमंत्रित किया था. उस ने कहा कि वह बौस को अहसास दिलाना और शर्मिंदा करना चाहती है कि इस दुनिया में उन के बेटे जैसा शैतान भी है तो दीपक जैसा इंसान भी. वे आए भी और उन्होंने बेटे की करतूत के लिए हम लोगों से माफी भी मांगी. साथ ही कहा भी, ‘‘तुम दोनों का इस्तीफा नामंजूर हो गया है और हां, मेरी तरफ से यह उपहार है.’’

वे 2 लिफाफे थे. एक लिफाफे में ट्रैवल एजेंट के नाम का चैक था, ताकि वह हमारे स्विट्जरलैंड टूर का वीसा, टिकट व अन्य खर्चों की व्यवस्था हमारी सुविधानुसार कर सके. दूसरे लिफाफे में काफी महत्त्वपूर्ण पेपर थे, जिन में रवि और उस के मातापिता के हस्ताक्षर थे. लिखा था कि रिया के होने वाले बच्चे पर उन का भविष्य में कोई अधिकार नहीं होगा. जातेजाते बौस ने एक बार फिर माफी मांगी और कहा, ‘‘दीपक, तुम ने 2 बड़े काम किए हैं. एक तो दोनों परिवारों की इज्जत बचाई और दूसरे समाज के लिए एक असाधारण मिसाल पेश की. इसलिए तुम्हें इनाम तो मिलना ही चाहिए. तुम्हारा प्रमोशन और्डर भी मैं ने साइन कर दिया है. इसे अन्यथा नहीं लेना.’’

और बौस ने हम सब को बाय कह कर विदा ले ली. पर रिया सोच रही थी कि यह इनाम था या ब्लैकमेल. Emotional Crime Story

 

Superstition: अल्लाह के नाम पर बेटी की कुर्बानी

Superstition: रमजान का पवित्र महीना चल रहा था. मसजिद से सुबह की अजान हुई तो शबाना की आंखें खुल गईं. वह फटाफट सेहरी के लिए उठी तो देखा कि उस की 4 साल की बेटी रिजवाना बिस्तर पर नहीं थी. वहां केवल छोटी बेटी ही दिखी. शबाना ने सोचा कि रिजवाना को शायद टौयलेट आया होगा तो वह नीचे चली गई होगी. उस ने रिजवाना को आवाज दी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. इस पर शबाना सोचने लगी कि रिजवाना कहां गई होगी. मेरे पास ही तो सो रही थी. शबाना अपनी बेटी को तलाश करने लगी. यह 8 जून, 2018 के तड़के की बात है.

राजस्थान में जोधपुर जिले के पीपाड़ शहर में सिलावटों का मोहल्ला है. इस मोहल्ले में नवाब अली अपने मामा मोहम्मद साजिद के घर में उन के साथ ही ऊपरी मंजिल पर रहता था. नवाब अली और मोहम्मद साजिद मिल कर मीट की दुकान चलाते थे. नवाब अली मूलरूप से पिचियाक गांव का रहने वाला था. वह अपनी बीवी शबाना और 4 साल की बेटी रिजवाना तथा एक छोटी बेटी के साथ मामा के मकान में रहता था.

जून महीने में राजस्थान में भीषण गरमी पड़ती है इसलिए नवाब अली अपनी बीवी और दोनों बेटियों के साथ छत पर सोया हुआ था. शबाना को जब बेटी रिजवाना नहीं मिली तो वह उसे देखने नीचे की मंजिल पर बने कमरे में गई. कमरे का दृश्य देख कर शबाना की आंखें फटी रह गईं. वहां उस की मासूम रिजवाना खून में सनी पड़ी थी. उस के गले से खून बह रहा था. बेटी को रक्तरंजित हालत में देख कर शबाना रोने लगी. उस ने नब्ज देख कर बेटी के जिंदा होने का अनुमान लगाने की कोशिश की लेकिन उसे कुछ पता नहीं चला.

वह रोती हुई तेजी से सीढि़यां चढ़ कर छत पर पहुंची और वहां सो रहे पति नवाब अली को जगा कर नीचे वाले कमरे में खून से लथपथ पड़ी बेटी रिजवाना के बारे में बताया. इस पर नवाब अपनी बीवी के साथ नीचे वाले कमरे में आया और वहां खून फैला देख कर बीवी से कहा कि लगता है इस पर बिल्ली ने हमला किया है, इस से उस का गला कट गया है.

शबाना की चीखपुकार सुन कर नवाब अली के मामा मोहम्मद साजिद के परिवार वाले भी जाग गए. शबाना पति के साथ खून से लथपथ बेटी को अस्पताल ले गई. अस्पताल में डाक्टरों ने चैकअप के बाद बच्ची को मृत घोषित कर दिया. नवाब अली ने बच्ची पर बिल्ली के हमले की बात कह कर अस्पताल में डाक्टरों को संतुष्ट कर दिया और बेटी का शव घर ले आया.

तब तक सूरज का उजाला नजर आने लगा था. नवाब की मासूम बेटी की मौत होने का पता चलने पर मोहल्ले के लोग भी एकत्र हो गए. नवाब ने मोहल्ले वालों को भी बेटी पर बिल्ली के हमले की बात बताई, लेकिन यह बात लोगों के गले नहीं उतरी. इस बीच किसी आदमी ने पुलिस को सूचना दे दी. पुलिस मौके पर पहुंच गई.

पुलिस ने जब बच्ची की लाश का निरीक्षण किया तो उस के शरीर पर कहीं भी बिल्ली के पंजों के निशान नहीं दिखे. गला भी किसी धारदार हथियार से काटा हुआ दिख रहा था, इसलिए पुलिस को शक हो गया कि यह हत्या का मामला है. पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दी.

पुलिस ने बच्ची की मौत के कारणों का पता लगाने के लिए जोधपुर से विधिविज्ञान प्रयोगशाला की टीम को मौके पर बुलाया, लेकिन इन से भी पुलिस को कोई ऐसे सबूत नहीं मिले, जिस से हत्यारे तक पहुंचा जा सके. पुलिस ने डाक्टरों के पैनल से बच्ची के शव का पोस्टमार्टम कराने के बाद शव परिजनों को सौंप दिया.

पुलिस इस बात से भी आश्चर्यचकित थी कि जब कमरे में बच्ची के मातापिता सो रहे थे तो फिर गला रेतने के समय उन्हें रिजवाना के चीखनेचिल्लाने की आवाज सुनाई क्यों नहीं पड़ी. मां के पास सो रही रिजवाना नीचे वाले कमरे में कैसे पहुंची. पुलिस को इस बात के भी कोई सबूत नहीं मिले कि हत्यारा बाहर से आया था, क्योंकि घर के दरवाजे बंद थे.

मासूम बच्ची की हत्या से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई. शबाना की तरफ से पुलिस ने अज्ञात आदमी के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. जोधपुर एसपी (ग्रामीण) राजन दुष्यंत राजन, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) खींवसिंह भाटी और पुलिस उपाधीक्षक सेठाराम बंजारा ने भी मौके पर पहुंच कर जांचपड़ताल की.

एसपी राजन दुष्यंत ने मौकामुआयने के बाद थाने में पुलिस अधिकारियों के साथ इस मामले पर चर्चा की. उन्हें लगा कि रिजवाना की हत्या में परिवार के ही किसी सदस्य का हाथ रहा होगा. परिवार वालों ने जब रिजवाना का शव दफना दिया तो पुलिस नवाब अली और उस के मामा मोहम्मद साजिद को पूछताछ के लिए थाने ले आई. दोनों से अलगअलग पूछताछ की गई. पूछताछ में नवाब अली ने अपनी बेटी रिजवाना की हत्या की जो लोमहर्षक कहानी सुनाई, उसे सुन कर पुलिस अफसर भी स्तब्ध रह गए.

नवाब अली कुरैशी ने पुलिस को बताया कि रमजान के महीने में अल्लाह को खुश करने के लिए वह अपनी सब से प्यारी चीज की कुरबानी देना चाहता था. वह बेटी रिजवाना को बहुत प्यार करता था, इसलिए उसे ही कुरबान कर दिया. नवाब जिस छुरी से बकरे काटता था, उसी से उस ने अपनी बेटी को हलाल कर दिया.

26 साल के नवाब ने पुलिस को बताया कि मैं नमाजी हूं. बेटी को कुरबान कर के अल्लाह को खुश करना चाहता था. वह कई दिनों से अपने ननिहाल में थी. मैं ने रिजवाना को ननिहाल से बुलवा लिया. 7 जून को उसे बाजार ले गया और शहर में घुमायाफिराया. उसे मिठाई, फ्रूट, चौकलेट आदि खिलाए और उस की पसंद की चीजें दिलवाईं. उस के बाद मैं घर आ गया. रात को रिजवाना अपनी मां शबाना के साथ छत पर सोई थी, मैं भी पास में ही सोया था.

आधी रात बाद मैं रिजवाना को चुपके से उठा कर नीचे के कमरे में ले गया. वहां उसे कलमा सुनाया. फिर अपनी गोद में बिठा कर बकरा काटने वाली छुरी से धीरेधीरे उस का गला रेत दिया. बेटी को हलाल करने से मेरी पैंट खून से सन गई तो मैं ने कपड़े बदले. फिर छुरी और खून से सने कपड़े छिपा कर रख दिए और वापस छत पर आ कर सो गया. मुझे नींद नहीं आ रही थी, पर मैं सोने का नाटक कर रहा था. बाद में जब शबाना मुझे बेटी की लाश के पास ले गई तो मैं ने बेटी पर बिल्ली के हमले की बात कह कर मामले को दूसरा रूप देने की कोशिश की लेकिन बाद में पुलिस आ गई और मेरी मंशा पूरी नहीं हो सकी.

पुलिस ने बेटी की हत्या के आरोप में नवाब अली कुरैशी को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया और वहां से उसे जेल भेज दिया गया. दूसरी ओर इसलाम से जुड़े लोगों ने आरोपी के बयान और कृत्य को धर्मविरोधी बताया. इन का कहना था कि इसलाम में इंसान का कत्ल हराम है. यह कृत्य सरासर धर्म के खिलाफ है. Superstition

Suicide Case: यूट्यूबर कोमली ने प्रेम तनाव में की आत्महत्या

Suicide Case: प्यार से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिस ने सभी को हैरान कर दिया. एक यूट्यूबर युवती ने अपने बौयफ्रेंड की यादों और उस से जुड़े मानसिक तनाव से परेशान हो कर आत्महत्या कर ली. आखिर कौन थी यह यूट्यूबर, जिसे प्रेम संबंधों के तनाव ने इतना बड़ा कदम उठाने पर मजबूर कर दिया? आइए जानते हैं इस पूरी घटना और उस यूट्यूबर की कहानी के बारे में.

यह मामला हैदराबाद से सामने आया है, जहां उभरती हुई यूट्यूबर कोमाली ने अपने फ्लैट में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. वह बीएससी की छात्रा थी और पार्टटाइम यूट्यूब पर वीडियो बनाकर अपलोड किया करती थी. आत्महत्या से पहले कोमाली ने कुवैत में रह रही अपनी मम्मी को आखिरी संदेश भेजा, ‘मम्मी, आप अपना खयाल रखना.’

इस खबर के सामने आते ही उन के फैंस सदमे में आ गए. हैदराबाद पुलिस के अनुसार, कोमाली का एक सौफ्टवेयर इंजीनियर के साथ प्रेम संबंध था. बताया जा रहा है कि इसी रिश्ते को ले कर वह मानसिक तनाव में थी. पुलिस ने उस के मोबाइल फोन और कौल रिकौर्ड खंगाले, जिन से इस संबंध की जानकारी मिली.

जानकारी के मुताबिक, कोमाली विशाखापट्टनम की रहने वाली थी और पिछले एक साल से हैदराबाद में बीएससी की पढ़ाई कर रही थी. पुलिस को सूचना मिली थी कि उस का शव फ्लैट में लटका हुआ है. जांच के दौरान पुलिस को उस की एक डायरी भी मिली, जिस में उस ने लिखा था कि वह उस व्यक्ति का इंतजार कर रही है, जिस के साथ उस का 3 सालों से संबंध था. उसने यह भी लिखा था कि ‘वह मेरा नहीं है.’

पुलिस इन पन्नों को सुसाइड नोट से जुड़ी अहम कड़ी मानकर जांच कर रही है. पुलिस पूरे मामले की विस्तार से जांच कर रही है. Suicide Case

 

UP Crime: दामाद बना हैवान – साससाले को चाकुओं से गोदा

UP Crime: एक ऐसा अनोखा मामला सामने आया, जो आप को भी चौंका देगा. जहां एक दामाद ने अपनी सास और साले की चाकू से गोदकर   हत्या कर डाली. चलिए जानते हैं,  फेमिली से जुड़ी इस पूरी पूरी क्राइम स्टोरी को विस्तार से, जो आप को होने वाली ऐसी घटनाओं से सतर्क भी करेगी.

यह दर्दनाक घटना बरेली से सामने आई है. जहां अफसर खान ने अपनी सास आसमा और साले आदिल पर चाकुओं से कई वार किए जिस से उन की मौके पर मौत हो गई.

आप को बता दें कि यह मामला पंचायत के दौरान हुआ था, जिस वक्त अफसर खान और पत्नी के बीच विवाद सुलझाने के लिए पंचायत बुलाई गई थी. इसी पंचायत में अफसर ने अपने ससुरालवालों पर चाकू से हमला कर दिया था. इसी हमले में उस की पत्नी गंभीर रूप से घायल हो गई. वहीं साले और सास भी बुरी तरह घायल थे. उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया था.

इस वारदात की सूचना मिलते ही एसएसपी अनुराग आर्य, एसपी (सिटी) मानुष पारीक, सीओ (तृतीय) पंकज श्रीवास्तव, इज्जतनगर इंस्पेक्टर विजेंद्र सिंह फोर्स और फील्ड यूनिट के साथ मौके पर पहुंचे. पुलिस ने शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजा.

पुलिस हमलावर की गिरफ्तारी के लिए दबिश दे रही है. साइमा की बहन साहिबा ने बताया जीजा एंबुलेंस चलाते हैं. वो पहले भी कई बार मारपीट कर चुके हैं. 9 साल पहले मेरी बहन साइमा की उन से शादी हुई थी. रविवार को भी उन्होंने मारपीट की थी. तब पुलिस कंट्रोल रूम के 112 नंबर पर फोन करके पुलिस बुलाई गई थी. इस पर वह घर से भाग गए थे. आज पंचायत के लिए बुलाया गया, तभी उन्होंने हमला कर दिया. भाई और मां की मौत हो गई है. दीदी की हालत नाजुक है. पुलिस पूरे मामले की विस्तार से जांच कर रही है. UP Crime

Love Crime: सलहज को प्यार – साले को मौत का उपहार

Love Crime: रामवीर की नजर अपनी सलहज कुसुमा पर पहले से ही जमी थी. पत्नी की मौत के बाद तो वह उस के पीछे ही पड़ गया. उस ने उसे पा तो लिया, लेकिन इस का परिणाम सुखद नहीं रहा.

उत्तर प्रदेश के जिला मथुरा के थाना यमुनापार के गांव ढहरुआ में रहता था भागचंद. उस की गिनती गांव के खुशहाल लोगों में होती थी. उस के 7 बेटे और 3 बेटियां थीं. उस ने सभी बच्चों को खूब पढ़ाना चाहा था, लेकिन उस का कोई भी बेटा ज्यादा नहीं पढ़ सका, तब उस ने सभी को उन की मरजी के मुताबिक काम सिखवा दिए. उस के 3 बेटे शटर बनाने का काम करने लगे. बच्चे कमाने लगे तो भागचंद की मौज हो गई. बच्चे जो भी कमाते थे, वह उसी को देते थे. जैसेजैसे बच्चे जवान होते गए, वह उन की शादियां करता गया.

भागचंद ने अपने बेटे भूरा की शादी मथुरा से और उस से छोटे खन्ना की शादी जिला आगरा के गांव मितावली इंकारपुर की कुसुमा से की थी. कुसुमा के पिता की मौत हो चुकी थी. इस के बाद घर में मां मनिया के अलावा 3 बहनें और एक भाई था. खन्ना अपनी कमाई से जो पैसे पिता को देता था, शादी के बाद देने बंद कर दिए थे. उन पैसों से अब वह अपनी गृहस्थी चलाने लगा था. कुसुमा खन्ना के साथ बहुत खुश थी. उन्हीं दिनों भागचंद ने अपनी बेटी पिंकी की शादी राजस्थान के कस्बा कुम्हेरपुर के रामवीर के साथ कर दी. रामवीर भी खातेपीते परिवार का था. पिंकी को ससुराल में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी.

रामवीर का छोटा भाई श्यामवीर भी शादी लायक था. भागचंद को श्यामवीर छोटी बेटी किन्ना के लिए ठीक लगा तो उस के पिता देवी सिंह से बात की. देवी सिंह का परिवार पिंकी से काफी खुश था, इसलिए उन्हें इस रिश्ते से कोई ऐतराज नहीं था. इस के बाद किन्ना की शादी श्यामवीर के साथ हो गई. इस तरह भागचंद की दोनों बेटियों की शादी एक ही घर में हो गई. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. समय के साथ कुसुमा 2 बच्चों की मां बन गई. खन्ना का शटर बनाने का काम बढि़या चल रहा था. पिंकी अपने पति रामवीर के साथ जल्दीजल्दी मायके आती रहती थी. रामवीर मजाकिया स्वभाव का था, इसलिए अपनी सलहज कुसुमा से वह खूब मजाक करता था.

यह बात उस के साले खन्ना को अच्छी नहीं लगती थी. कभीकभी खन्ना अपने बहनोई रामवीर के मजाक करने पर ऐतराज कर दिया करता था. तब रामवीर कहता, ‘‘साले साहब, सलहज से हमारा मजाक करने का हक है, इस में आप को क्यों बुरा लगता है. भाभी को तो कोई ऐतराज नहीं है.’’

खन्ना कहता, ‘‘मजाक का भी कोई समय होता है. हर समय हंसीमजाक अच्छा नहीं लगता. उस की भी एक सीमा होती है, लेकिन आप हैं कि मानते ही नहीं.’’

मगर खन्ना की बातों का रामवीर पर कोई असर नहीं पड़ा. वह जब तक ससुराल में रहता, खन्ना परेशान रहता. खन्ना ने कई बार अपने पिता से भी कहा, ‘‘आप जीजाजी को समझाते क्यों नहीं, वह इतने फूहड़ मजाक करते हैं.’’

भागचंद दामाद के बजाय उसे ही समझाता, ‘‘बेटा, दामाद से इस तरह की बात करना ठीक नहीं है. फिर वह मजाक ही तो करता है. वह यहां महीनों तो रहता नहीं, एकदो दिन रह कर चला जाता है. इस बात को ले कर उसे नाराज नहीं करना चाहिए, हम ने उसे बेटी दी है, बेटी की वजह से हमें चुप रहना चाहिए.’’

रामवीर को किसी की कोई परवाह नहीं थी. वह जब भी ससुराल आता, कुसुमा के आगेपीछे मंडराता रहता और हंसीमजाक करता रहता. जब वह चला जाता तो खन्ना इस बात को ले कर कुसुमा से खूब झगड़ता. एक दिन भागचंद को खबर मिली कि उस की बेटी बीमार है. यह खबर सुन कर वह परेशान हो उठा. उसे देखने के लिए वह बेटे खन्ना के साथ उस की ससुराल कुम्हेरपुर पहुंचा. वहां जा कर पता चला कि पिंकी की हालत बहुत नाजुक है. बेहतर इलाज के लिए वह बेटी को एक बड़े अस्पताल ले गया, लेकिन वहां भी उस की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. लाख कोशिशों के बाद भी डाक्टर पिंकी को नहीं बचा पाए.

पिंकी की मौत उस के मायके वालों के लिए एक बड़ा सदमा थी. उस के बच्चों को पालने की जिम्मेदारी पिंकी की छोटी बहन किन्ना ने ले ली. पत्नी की मौत के बाद भी रामवीर जबतब अपनी ससुराल आता रहता था. ससुराल में अब भी उस की पहले की ही तरह इज्जत होती थी. कुसुमा उस की पहले की ही तरह खातिरदारी करती थी. खन्ना को अब रामवीर का आना बिलकुल भी नहीं अच्छा लगता था. उसी की वजह से अब उस के और कुसुमा के बीच तनाव रहने लगा था. खन्ना की बात पर घर में कोई ध्यान नहीं देता था और न ही कोई उस के मानसिक तनाव को समझने की कोशिश करता था.

जबकि सच्चाई यह थी कि कुसुमा रामवीर की तरफ आकर्षित होती जा रही थी, जिस की वजह से उस के दांपत्य में दरार पड़ने लगी थी. रामवीर और कुसुमा के बीच वे बातें भी होने लगीं, जो दोनों को एकदूसरे के करीब लाने वाली थीं. एक दिन रामवीर ने कुसुमा को मथुरा में मिलने को कहा, लेकिन कुसुमा ने कहा कि घर के सभी लोग शादी में जा रहे हैं, इसलिए घर में अकेली होने की वजह से वह वहां नहीं आ सकती. उस ने रामवीर को अपने यहां आने को कहा. तब रामवीर की खुशी का ठिकाना नहीं रहा, क्योंकि ऐसे में वह उस के घर आ सकता था.

मौके का फायदा उठाने के लिए रामवीर अपनी ससुराल पहुंच गया और एकांत का फायदा उठा कर दोनों ने उस दिन मर्यादाएं लांघ कर इच्छा पूरी कर ली. रामवीर ने साले के दांपत्य में सेंध लगा दी. खन्ना को बीवी की बेवफाई का पता नहीं चला. कुसुमा को भी अपनी बेवफाई पर कोई ग्लानि नहीं हुई. उस दिन के बाद से कुसुमा का पति के प्रति व्यवहार बदलने लगा. खन्ना जब कभी उस से झगड़ता, वह मायके जाने की धमकी देने लगती. खन्ना समझ नहीं पा रहा था कि कुसुमा अब इस तरह की बातें क्यों करती है. वह अंदर ही अंदर तनाव में घुटने लगा. दूसरी ओर कुसुमा को किसी बात की परवाह नहीं थी.

उसी बीच मथुरा में रामवीर और कुसुमा की मुलाकात हुई तो कुसुमा ने उस से कहा कि खन्ना को अब उस पर शक हो गया है. वह छोटीछोटी बात पर उस की पिटाई करने लगा है. तब रामवीर ने कहा, ‘‘मैं खन्ना से बात करूंगा.’’

‘‘नहीं, तुम उस से कुछ मत कहना. अब मेरे घर भी मत आना. जब कभी मिलना होगा, हम बाहर ही मिल लिया करेंगे. लेकिन इस समस्या का कोई हल तो ढूंढ़ना ही होगा. आखिर मैं कब तक उस से पिटती रहूंगी.’’ कुसुमा ने कहा.

कुसुमा की बात पर रामवीर गंभीर हो गया. उसे लगा कि कुछ तो करना ही होगा. कुसुमा ने कहा, ‘‘चलो, हम कहीं भाग चलते हैं.’’

‘‘नहीं, इस से बड़ी गड़बड़ हो जाएगी. तुम्हें यह तो पता ही है कि मेरा छोटा भाई श्यामवीर भी उस घर का दामाद है. जब मैं घर में नहीं रहूंगा तो खन्ना को पूरा विश्वास हो जाएगा कि मैं ही तुम्हें भगा कर ले गया हूं. तब ससुराल वालों से श्यामवीर के संबंध खराब हो जाएंगे. मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से श्यामवीर की गृहस्थी बिगड़े.’’

रामवीर ने कुसुमा को भरोसा दिया कि वह इस बारे में कुछ न कुछ जरूर करेगा. अगर जरूरत पड़ी तो खन्ना को रास्ते से हटा कर हमेशा की टेंशन खत्म कर देगा. होली पर रामवीर बिना बुलाए मेहमान की तरह भागचंद के घर पहुंच गया. खन्ना को उस का आना बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा. लेकिन वह खामोश रहा. होली के बहाने रामवीर ने कुसुमा को अपनी बाहों में भर लिया. रामवीर की इस हरकत से नाराज हो कर खन्ना ने रामवीर की पिटाई कर दी. रामवीर अपनी सफाई में यही कहता  रहा कि वह तो सलहज के साथ होली खेल रहा था. लेकिन खन्ना का गुस्सा कम होने का नाम नहीं ले रहा था. आखिर में घर वालों ने बीचबचाव कर के रामवीर को छुड़ाया.

इस घटना से रंग में भंग पड़ चुका था. खन्ना ने तय किर लिया था कि अब वह रामवीर को किसी भी कीमत पर अपने घर नहीं आने देगा. रामवीर की पिटाई से कुसुमा भी डर गई थी. उस ने पहली बार पति का ऐसा गुस्सा देखा था. खन्ना ने उसे भी चेतावनी दी थी कि वह संभल जाए वरना बहुत पछताएगी. उस दिन कुसुमा को लगा कि अब वह रामवीर से कभी नहीं मिल पाएगी. लेकिन रामवीर ने तो कुछ और ही सोच लिया था. वह खन्ना से अपने अपमान का बदला लेना चाहता था. वह सोचने लगा कि ऐसा क्या किया जाए, जिस से वह खन्ना से बदला भी ले ले और कुसुमा भी हासिल हो जाए.

खन्ना को लगा कि रामवीर इतने अपमान के बाद अब उस के घर नहीं आएगा. वह अपने काम में मन लगाने लगा. कुसुमा का व्यवहार भी उसे सामान्य लगने लगा था. इस तरह वह बेफिक्र हो गया. लेकिन उस की यही लापरवाही आगे चल कर उस की मुसीबत बनने वाली थी. उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि पत्नी की आशिकी उसे कभी मौत की सौगात दे जाएगी. रामवीर और खन्ना के बीच हुए झगड़े के बाद कुसुमा भी सतर्क हो गई थी. उस का रामवीर से भले ही मिलना नहीं हो रहा था, पर वह उस से फोन पर बातें करती रहती थी. जब कभी उसे मौका मिलता, वह फोन पर बात कर के निश्चित जगह पर उस से मिल भी लेती थी.

27 अगस्त, 2015 को सवेरे शटरिंग ठेकेदार अजीत चौधरी ने खन्ना के घर का दरवाजा खटखटाया. खन्ना ने दरवाजा खोला तो अजीत ने कहा कि उसे अभी उस के साथ चलना होगा, क्योंकि पार्टी को अभी काम पूरा कर के देना है. अगर समय पर उस के शटर बना कर नहीं दिए तो परेशानी हो जाएगी.  खन्ना ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम 2 मिनट ठहरो, मैं अभी तैयार हो कर आता हूं.’’

इस के बाद खन्ना ठेकेदार अजीत चौधरी के साथ चला गया. उस दिन अजीत चौधरी के साथ गया खन्ना फिर कभी वापस नहीं लौटा. खन्ना देर रात तक वापस नहीं लौटा तो घर वालों ने अजीत को फोन किया, क्योंकि वह उसी के साथ गया था. अजीत ने बताया कि खन्ना तो शाम को ही काम खत्म कर के घर चला गया था. जब काम खत्म कर के घर के लिए चला था तो रास्ते से कहां गायब हो गया? घर वालों ने रात में ही खन्ना की खोजबीन शुरू कर दी. लेकिन वह नहीं मिला. घर वाले रात भर उस की चिंता में परेशान रहे. जैसेतैसे उन की रात बीती. सवेरा होते ही वे सब फिर खन्ना को तलाशने लगे.

किसी ने चैतन्य अस्पताल के सामने खाली पड़े प्लौट में खन्ना की लाश देखी तो उस के घर वालों को बता दिया. वे वहां पहुंच गए. भागचंद ने जब बेटे की लाश देखी तो फूटफूट कर रोने लगा. खबर मिलने पर थाना यमुनापार के थानाप्रभारी संतोष कुमार पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने लाश का मुआयना किया तो उस के शरीर पर चोट का कोई निशान नहीं मिला. गले में बनियान बंधा था. इस से अंदाजा लगाया गया कि इसी बनियान से उस का गला घोंटा गया था.

भागचंद का शक शटरिंग ठेकेदार अजीत चौधरी पर था, क्योंकि वही उसे अपने साथ घर से लिवा कर ले गया था. मौके की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने खन्ना के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इस के बाद पुलिस ने भागचंद की तरफ से रिपोर्ट दर्ज कर ली. उन्होंने अपना शक अजीत चौधरी पर जताया था. अजीत चौधरी थाना मांट के कुढ़वारा गांव का रहने वाला था. दबिश दे कर पुलिस ने उसे उस के घर से हिरासत में ले लिया.

पुलिस ने अजीत से पूछताछ की तो उस ने खुद को बेकसूर बताया. उस ने कहा कि खन्ना लंबे समय से उस के साथ काम कर रहा था. उस के साथ उस के काफी अच्छे संबंध थे. कोई ऐसी वजह नहीं थी, जिस से वह उस की हत्या करता. पुलिस ने उस से कई तरह से पूछताछ की. लेकिन कोई हल नहीं निकला. इस पूछताछ में अनुभवी थानाप्रभारी को वह वास्तव में बेकसूर लगा. उन्होंने उसे छोड़ दिया. मृतक खन्ना के परिवार वालों को जब इस बात का पता चला तो वे हंगामा करते हुए थाने पहुंच गए और अजीत को जेल भेजने की मांग करने लगे.

इस हंगामे में रामवीर बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहा था. थानाप्रभारी ने मृतक के परिजनों को समझाया कि वह खन्ना के हत्यारे को पकड़ कर जेल जरूर भेजेंगे. इस के बाद पुलिस ने खन्ना के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स का अध्ययन करने पर पता चला कि उस के मोबाइल पर आने वाली आखिरी काल खन्ना के बहनोई रामवीर की थी. पुलिस ने रामवीर के बारे में छानबीन शुरू की तो गांव वालों से पता चला कि होली वाले दिन रामवीर ने खन्ना की बीवी को छेड़ा था, तब खन्ना ने उस की पिटाई कर दी थी.

इस बात की पुष्टि के लिए पुलिस ने खन्ना के घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने कहा कि रामवीर के साथ खन्ना का झगड़ा तो हुआ था, लेकिन वह झगड़ा ऐसा नहीं था कि रामवीर खन्ना की हत्या कर देता. फिर होली के बाद रामवीर उन के यहां आया भी नहीं था. पुलिस को अब तक पता चल चुका था कि खन्ना की बीवी कुसुमा से रामवीर का कोई चक्कर था. इस के बाद पुलिस के सामने तसवीर साफ हो गई.

दूसरी ओर रामवीर को किसी तरह पता चल गया कि पुलिस को उस पर शक हो गया है तो वह फरार हो गया. उस के फरार होने की जानकारी पुलिस को मिल गई. लिहाजा 2 सिपाहियों को उस के घर पर लगा दिया गया. जैसे ही वह घर लौटा, पुलिस ने उसे दबोच लिया. पुलिस रामवीर को पकड़ कर थाने ले आई और पूछताछ शुरू कर दी. रामवीर ने पहले तो पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन पुलिस की सख्ती के आगे वह टूट गया. उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने अपने साले खन्ना की हत्या की थी और उस की लाश को चैतन्य अस्पताल के सामने खाली पड़े प्लौट में फेंक दिया था.

रामवीर ने यह भी स्वीकार किया कि उस की सलहज कुसुमा से उस के नाजायज संबंध थे. कुछ समय तक तो सब कुछ ठीकठाक चला, लेकिन कुछ दिनों बाद खन्ना को उस पर शक होने लगा और उसे उस का आनाजाना अखरने लगा. वह किसी भी कीमत पर कुसुमा से संबंध तोड़ना नहीं चाहता था. कुसुमा भी अपने पति की पिटाई से तंग आ गई थी. वह हमेशा के लिए पति से छुटकारा चाहती थी. इस के बाद दोनों ने खन्ना को ठिकाने लगाने की योजना बना ली.

उस के बाद रामवीर खन्ना का विश्वास जीतने की कोशिश करने लगा. जब उसे उस पर विश्वास हो गया तो रामवीर ने घटना वाले दिन खन्ना को फोन कर के शाम का खाना किसी होटल में खाने की बात कही. खन्ना रामवीर को अपना दुश्मन नहीं बनाना चाहता था. उस ने सोचा कि अगर रामवीर सुधर रहा है तो उसे एक मौका अवश्य देना चाहिए. उस ने सोचा कि खाना खाते समय वह रामवीर को समझाएगा. उस दिन सुबह ही वह ठेकेदार अजीत चौधरी के साथ काम पर निकला था. काम खत्म करने के बाद वह शाम को रामवीर की बताई जगह पर पहुंच गया. रामवीर उसे एक ढाबे पर ले गया, जहां दोनों ने खाना खाया और शराब पी.

रामवीर ने खन्ना को खूब शराब पिलाई. जब खन्ना नशे में धुत हो गया तो वह उसे एक टैंपो में डाल कर सुनसान जगह पर ले गया और अपनी बनियान से उस का गला घोंट दिया. चूंकि उस दिन अजीत चौधरी खन्ना को घर से बुला कर ले गया था, इसलिए घर वालों का शक अजीत पर ही गया. पर पुलिस ने असली अपराधी को खोज निकाला. रामवीर से पूछताछ के बाद पुलिस ने कुसुमा को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. कुसुमा के घर वालों को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कुसुमा ने ही अपने पति को मरवाया है. कुसुमा यही कहती रही कि न उस के रामवीर से संबंध हैं और न ही उस ने पति को मरवाया है.

बहरहाल, पुलिस ने रामवीर और कुसुमा को गिरफ्तार कर के कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखने तक दोनों जेल में थे. Love Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Emotional Story: शादी का सपना दरिया में दफन

Emotional Story: खातून को पाने के लिए राकेश ने  शादी का वादा ही नहीं किया, आर्टिफिशियल मंगलसूत्र भी पहना दिया.  या राकेश ने अपना यह वादा निभाया?   जमींदार राकेश कासनिया से फोन पर बात कर के टिल्लू खां बेहद खुश था. वजह यह थी कि जमींदार ने उसे अपने खेतों में काम करने के लिए बुलाया था. दरअसल राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के रहने वाले जमींदार राकेश कासनिया के यहां बड़े स्तर पर कपास की खेती होती है.

कपास की चुगाई के लिए वह भरतपुर जिले के कैथवाड़ा गांव के रहने वाले टिल्लू खां और उस के साथियों को बुला लेता था. जो भी मजदूर उस के यहां आते थे, वे परिवार सहित आते थे. इस बार राकेश कासनिया ने टिल्लू खां से यह भी कह दिया था कि वह अपनी जानपहचान वाले कुछ और लोगों को भी साथ ले आए.

जमींदार के खेतों में परिवार सहित काम करने से जहां उन परिवारों को एकमुश्त मजदूरी मिल जाती थी, वहीं मालिक को भी मजदूरों के लिए दरदर भटकना नहीं पड़ता था. मजदूरों के आनेजाने का किराया भी जमींदार ही देता था. इसलिए मजदूर उस के यहां खुशीखुशी आते थे. भरतपुर हनुमानगढ़ से लगभग 450 किलोमीटर दूर है. टिल्लू खां ने अपने साथ चलने के लिए करीम खां, अख्तर खां और हबीब से बात की. जमींदार राकेश कासनिया ने सारे मजदूरों के किराए के पैसे टिल्लू खां के खाते में औनलाइन जमा करा दिए थे, जिस से मजदूरों को उस के गांव तक आने में परेशानी न हो.

जमींदार राकेश कासनिया के यहां जाने की बात से सारे मजदूर खुश थे. इस की वजह यह थी कि उन के यहां खानेपीने की कोई परेशानी नहीं होती थी. वहां खाने में घी, दूध और छाछ भी मिलती थी. कुल मिला कर बात यह थी कि जमींदार के खेतों में काम करने वाले मजदूरों की मेहमानों की तरह खातिरतवज्जो होती थी. इसलिए टिल्लू ने जिनजिन लोगों से चलने की बात की, वे सब जाने की तैयारी करने लगे. टिल्लू के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटियां थीं. बड़ी बेटी खातून महज 14 साल की थी. किसी वजह से इस साल उस की पत्नी उस के साथ जमींदार के यहां नहीं जा पा रही थी. तब टिल्लू ने अपनी तीनों बेटियों के साथ जाने का प्रोग्राम बनाया. अन्य मजदूर अपनी बीवीबच्चों के साथ जा रहे थे.

राजस्थान के श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिले में कपास की खेती बहुत ज्यादा होती है. कपास उत्पादन की वजह से इन दोनों जिलों की श्वेत पट्टी के रूप में पहचान बन चुकी है. देशी व अमेरिकन कपास (नरमा) की फसल पकने पर पौधों से फाहों को अलग कराने का काम मजदूरों से कराया जाता है. इस प्रक्रिया को चुगाई या चुनाई कहा जाता है. इस साल 5-6 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से चुनाई की रकम मजदूरों को अदा की गई थी. इस तरह एक मजदूर दिनभर में चुनाई कर के 500 से 600 रुपए तक कमा लेता है. ज्यादा कमाने के लिए लोग अपने परिवार के साथ यहां काम करने आते थे.

सितंबर, 2015 के पहले पखवाड़े में टिल्लू खां अन्य 15 मजदूरों को ले कर जमींदार राकेश कासनिया के गांव जाखड़ावाली पहुंच गया. राकेश के खेतों के पास ही रविंद्र, रणवीर, देवतराम आदि के भी खेत थे. राकेश के खेतों का काम निपटा कर इन मजदूरों को इन पड़ोसी किसानों के खेतों की भी कपास की चुगाई करनी थी. जैसे ही टिल्लू खां की मजदूर टोली राकेश कासनिया के घर पहुंची, उन की खूब आवाभगत हुई. सभी राकेश के ही घर ठहरे.

राकेश का घर काफी बड़ा था. घर के पिछवाड़े दरजन भर दुधारू पशु बंधे रहते थे. सुबह का सारा दूध डेयरी पर भिजवा दिया जाता था, जबकि शाम के दूध का दही जमाया जाता था. अगली सुबह मशीनों से दही मथ कर मक्खन व मट्ठा बनाया जाता था. 3 मजदूर इन पशुओं को संभालते थे. परिवार के मुखिया व राकेश के पिता चौधरी लालचंद की पहल पर पहले दिन सभी मजदूरों को खालिस घी का हलवा व हरी सब्जियों के संग भोजन परोसा गया. सभी मजदूर चौधरी परिवार की मेहमाननवाजी के कायल हो गए.

टिल्लू की बड़ी बेटी खातून तो बेहद खुश थी. खातून को राकेश और उस के भाई कुलदीप की पत्नियां दिखाई नहीं दीं. चुलबुली खातून खोजी निगाहों से उन के घर के कई चक्कर लगा चुकी थी, पर दोनों बहुएं उसे दिखाई नहीं दीं. उसी बीच शोख खातून राकेश की नजरों में जरूर चढ़ गई. अगली सुबह बड़े चौधरी लालचंद के कहने पर सभी मजदूरों को गांव के ही बृजलाल के खाली पड़े मकान में ठहरा दिया गया. अख्तर की बीवी और खातून खाना बनाने के लिए घर पर रुक गईं, जबकि अन्य सभी नरमा चुगाई के लिए राकेश के साथ ट्रैक्टर से खेतों पर चले गए.

आधे घंटे बाद राकेश अपने खेतों से सब्जियां तोड़वा कर ले आया और उसे अख्तर की बीवी को दे कर कहा, ‘‘भाभी, खातून को भेज कर घर से दही और छाछ मंगवा लेना.’’

दरअसल, राकेश का मन 14 साल की खातून पर आ गया था. इसलिए वह बहाने से उसे अपने यहां बुलाना चाह रहा था.

‘‘अरे, अंकल ठहरो. मैं दही और छाछ लेने आप के साथ ही चलती हूं. आप के साथ चलने से मुझे सहूलियत रहेगी.’’

कह कर खातून डोलची ले कर राकेश के पीछेपीछे चल पड़ी. खातून जैसे ही दालान से बाहर निकली, राकेश ने उसे रोक कर कहा, ‘‘खातून, तुम अंकल मत कहो, क्या मैं तुम्हारे अब्बू की उम्र का हूं?’’

‘‘गलती हो गई, अब खयाल रखूंगी. भैया कहूं तो चलेगा?’’ खातून ने कहा, ‘‘अरे भैया, एक बात बताओ, दोनों भाभियां दिखाई नहीं दे रही हैं, कहां छिपा दिया है आप ने उन्हें?’’

‘‘खातून, मैं ने अपनी बीवी को तलाक दे दिया है. अब दूसरी बीवी की तलाश में हूं. कोई लड़की पसंद आ गई तो शादी कर लूंगा. और हां सुन, अब तू बच्ची नहीं रही, मुझे अंकल या भैया कहा तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा. तुम मुझे राकेश कहो, प्यार से रौकी. समझ गई ना?’’ इतना कह कर राकेश आगे बढ़ गया.

डोलची उठाए खातून राकेश के पीछेपीछे चल रही थी. घर पहुंच कर राकेश ने खातून की डोलची छाछ से भर दी. खातून डोलची उठाने लगी तो राकेश ने उस का हाथ दबा दिया. इस पर नादान खातून ने मुसकरा दिया. उस रात न राकेश को नींद आई, न खातून को. दोनों ही सारी रात करवटें बदलते रहे. राकेश शातिर खिलाड़ी था, जबकि खातून प्रेम के इस खेल से अनाड़ी थी. शातिर राकेश ने खातून को फंसाने के लिए शब्दों का जाल बुन लिया. उसे फंसाने के लिए वह उस से लच्छेदार बातें करने लगा. उस की बातों का 14 साल की खातून पर ऐसा असर पड़ा कि वह भी उसे चाहने लगी.

राकेश और उस के बड़े भाई कुलदीप ने उच्चशिक्षा हासिल कर के वैज्ञानिक तरीके से खेती करानी शुरू की थी. जिस से उन्हें अच्छी पैदावार मिलने लगी थी. दोनों की शादी एक ही परिवार में सगी बहनों से हुई थी, लेकिन किन्हीं कारणों से दोनों भाइयों के गृहस्थ जीवन में ऐसी खटास आई कि मामला अदालत की चौखट तक पहुंच गया. राकेश के परिवार की गिनती इलाके में रसूखदार व प्रभावशाली परिवारों में होती थी. उस के  परिवार का इलाके में अच्छाखासा दबदबा था. परिवार में सभी सुखसुविधाओं के साथ कई लग्जरी गाडि़यां व खेतीबाड़ी के लिए ट्रैक्टर था.

शहरी आबोहवा में पल रही गरीब परिवार की खातून 14 साल की उम्र में अपने तंदुरुस्त शरीर की वजह से जवान दिखती थी. गेहुंआ रंग व गठीले बदन की खातून पर राकेश इस कदर फिदा हुआ कि वह उस के लिए पागल सा हो गया था. राकेश सुबह के समय खुद ट्रैक्टर चला कर मजदूरों को खेतों पर ले जाता था. खातून राकेश के पास बैठ जाती थी, जबकि अन्य मजदूर पीछे ट्राली में बैठते थे. खातून की छोटी बहन सलमा भी राकेश की सीट के पास मडगार्ड पर बैठती थी. शाम को वापसी में भी ऐसा ही होता था. इस बीच मौका मिलने पर राकेश खातून से हंसीमजाक कर लिया करता था. एक दिन ट्रैक्टर पर आते समय राकेश ने खातून से धीरे से कहा, ‘‘आज रात को गली में मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा.’’

मजदूरों को जाखड़ावाली आए मात्र 5 दिन ही हुए थे. इस तरह राकेश और खातून ने पलक झपकते ही दूरियां नाप ली थीं. सभी मजदूर थकेमांदे होने के कारण खाना खाने के तुरंत बाद नींद के आगोश में समा जाते थे. खातून ने इसी का फायदा उठाया.

जैसे ही सब लोग सो गए, खातून दबे पांव बाहर निकली. राकेश दीवार की ओट में पहले से ही खड़ा था. खातून के आते ही उस का हाथ पकड़ कर वह रुखीराम के खाली पड़े घर में घुस गया.

एकांत मिलते ही राकेश ने उसे बांहों में भर लिया और उस के साथ छेड़छाड़ करने लगा. खातून ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘यह आप क्या कर रहे हैं, यह सब ठीक नहीं है?’’

‘‘खातून, मैं तुम्हें हर तरह से खुश रखूंगा.’’ राकेश ने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा.

‘‘नहीं, आप शादीशुदा हैं. आप तो मुझे बरबाद कर के चले जाएंगे. मैं जिंदगी भर रोती रहूंगी.’’ खातून ने कहा.

राकेश ने उस का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘खातून, मैं ने अपनी पत्नी को तलाक दे दिया है. अब मैं तुम से शादी कर के तुम्हें पत्नी बना कर रखूंगा. तुम मेरी बात पर यकीन करो. अब फैसला तुम्हें करना है कि शादी गुपचुप करोगी या ढोलधमाकों के साथ.’’

राकेश की बातों पर खातून ने यकीन कर लिया और उस के सामने समर्पण कर दिया. इच्छा पूरी कर के दोनों अपनेअपने बिस्तरों पर चले गए.

अगली सुबह खातून के बदन का पोरपोर दर्द कर रहा था. देर रात तक जागने से उसे सिरदर्द के साथ तेज बुखार भी हो गया था. जब सभी लोग खेतों में जाने लगे तो खातून ने पिता से कहा, ‘‘अब्बू, आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है. मुझे बुखार है, इसलिए आज मैं काम पर नहीं जा पाऊंगी.’’

‘‘कोई बात नहीं, तुम घर पर आराम करो. मैं दवा के लिए छोटे चौधरी (राकेश) को बोल दूंगा.’’ टिल्लू ने कहा.

कुछ देर बाद राकेश ट्रैक्टर ले कर मजदूरों को लेने आया तो टिल्लू ने कहा, ‘‘छोटे चौधरी, खातून को बुखार हो रहा है. उसे गांव के डाक्टर से दवा दिलवा देना. आज वह काम पर भी नहीं जा रही है.’’

‘‘अंकल, आज गांव के डाक्टर एक शादी में गए हैं. दोपहर के समय मैं शहर जाऊंगा तो वहां से दवा दिला दूंगा.’’ राकेश ने कहा.

मजदूरों को खेत में छोड़ कर राकेश जल्दी लौट आया और जिप्सी ले कर खातून के पास पहुंच गया. दवा दिलाने के बहाने उस ने खातून को जिप्सी में बैठा लिया. जिप्सी स्टार्ट करते हुए उस ने चुहलबाजी करते हुए कहा, ‘‘रानी, तबीयत सचमुच में खराब है या चालाकी से मिलने का उपाय ढूंढ़ा है.’’

‘‘देखोजी, आप को मजाक सूझ रहा है और मैं दर्द के मारे मरी जा रही हूं.’’ खातून ने कहा.

‘‘जानेमन, घबराओ मत, आज ससुरजी की इजाजत ले कर आया हूं. पूरे दिन घुमाऊंगा और तुम्हारे तनमन का दर्द निकाल कर ही दम लूंगा.’’ राकेश ने कहा.

कई घंटे घूमने के बाद राकेश की जिप्सी पीलीबंगा शहर से लौट आई. शहर में दोनों ने जी भर कर मस्ती की. मानमनुहार कर के राकेश ने खातून को बीयर भी पिला दी थी. राकेश का साथ मिलने पर बिना दवा के ही खातून ठीक हो गई थी. राकेश की पहल पर खातून ने एक आर्टिफिशियल मंगलसूत्र गले में पड़े पुराने काले धागे में बांध लिया था. खातून की पसंद का एक सुर्ख सूट भी राकेश ने खरीद दिया था. शहर में बिताए उन पलों में राकेश खातून को यह विश्वास दिलाने में सफल हो गया था कि वह उस का शौहर है और समय आने पर वह उस के साथ रीतिरिवाज से निकाह कर लेगा. राकेश ने यह भी कहा था कि उस की पहली पत्नी के जितने भी गहने हैं, वे सब अब उस के हैं.

इस के अलावा वह उस की पसंद के और गहने बनवा कर उसे गहनों से लाद देगा. इस तरह शातिर राकेश उसे लूटता रहा और शादी का सपना संजोए खातून लुटती रही. राकेश ने उस दिन भी रात में उस से मिलने का वादा करा लिया था. शाम को टिल्लू लौटा तो खातून ने राकेश द्वारा दिया सूट दिखाते हुए कहा, ‘‘अब्बा, यह सूट देखो, बड़ी चौधराइन ने दिया है. आप को पहन कर दिखाऊं.’’

सूट बढि़या और महंगा था. अब्बू के इशारे पर खातून ने सूट पहन लिया. कढ़ाईदार सुर्ख सूट में खातून नईनवेली दुलहन सी लग रही थी. रात को सभी सो गए तो खातून राकेश से मिलने उसी खाली मकान में जा पहुंची, जहां वह पहले मिली थी. वहां राकेश पहले से ही मौजूद था. उस समय उस के गले में राकेश के नाम का मंगलसूत्र व बदन पर वही सुर्ख सूट था. वह अप्सरा सी लग रही थी.

राकेश ने उस की सुंदरता की तारीफ की तो खातून ने कहा, ‘‘देखो रौकी, तुम मुझे धोखा मत देना. ऐसा हुआ तो मैं जीते जी मर जाऊंगी. जहर खा कर अपनी जान दे दूंगी.’’

‘‘हट पगली, तू ने ऐसा सोचा भी कैसे? और सुन, शहर से तुझे कल मोबाइल ला कर दे दूंगा.’’ राकेश ने कहा.

अगले दिन राकेश ने खातून को एक मोबाइल ला कर दे दिया. समय गुजरता रहा. राकेश का जब मन करता, वह खातून को मिसकाल कर देता. साइलैंट मोड पर मोबाइल पर आई मिसकाल के इशारे को खातून समझ जाती. उस के बाद शौच का बहाना कर के वह रणवीर जाट के खेत में बने कोठा में पहुंच जाती. वहां दोनों अपनी इच्छा पूरी करते. इस तरह पूरे महीने उन का यह खेल चलता रहा. कहते हैं, लाख कोशिशों के बाद भी इस तरह के संबंध छिपाए नहीं छिपते. राकेश और खातून के साथ भी ऐसा ही हुआ. एक रात लघुशंका के लिए अख्तर खां उठा तो उस ने राकेश और खातून को सुनसान पड़े घर में घुसते देख लिया.

हकीकत जानने के लिए छिप कर वह वहीं बैठ गया. घंटे भर बाद दोनों एक साथ बाहर निकले तो अख्तर पूरा मामला समझ गया. राकेश के बड़े भाई कुलदीप को भी राकेश और खातून के संबंधों को ले कर संदेह हो गया था. एक सुबह खातून नहाने के लिए गुसलखाने में घुसी तो उस के कपड़ों में लिपटा मोबाइल फोन छोटी बहन सलमा के हाथ लग गया. तब खातून ने वह फोन किसी सहेली का बता कर पिंड छुड़ाया. खातून ने यह बात अब्बू को न बताने के लिए सलमा को राजी भी कर लिया.

खातून और राकेश की हरकतों को जान कर अख्तर बेचैन हो उठा. वह पूरी रात इसी उधेड़बुन में लगा रहा. आखिर उस ने यह बात टिल्लू खां को बताने का निश्चय कर लिया. सुबह उठने पर वह टिल्लू को बाहर ले गया और राकेश तथा खातून के बीच पक रही खिचड़ी उसे बता दी. नाबालिग बेटी की हरकतें जान कर टिल्लू खां चौंका. इस के बाद दोनों ने पूरे मामले पर विचारविमर्श कर के फैसला लिया कि यह बात बड़े चौधरी लालचंद को बताई जाए. टिल्लू ने बहलाफुसला कर खातून से मोबाइल फोन ले कर उसे ईंट से चकनाचूर कर दिया.

अख्तर और टिल्लू खां उसी दिन लालचंद से मिले. उन्होंने कहा, ‘‘चौधरीजी, आप का लाडला राकेश मेरी नाबालिग खातून पर डोरे डाल रहा है. वह उस पर गंदी नजर रखता है. हुजूर, मेरी बेटी के साथ कुछ गलत हो गया तो मैं गरीब आदमी बरबाद हो जाऊंगा. आप उसे रोकिए अन्यथा बरबादी की आंच से आप का परिवार भी नहीं बचेगा.’’

टिल्लू खां के मुंह से बेटे की करतूतें सुन कर लालचंद को भी चिंता हुई. उन्होंने दोनों को कुछ करने का आश्वासन दे कर भेज दिया. लालचंद से शिकायत के बाद भी राकेश के व्यवहार में कोई तब्दीली नहीं आई. दीपावली नजदीक आ गई थी. मजदूर टिल्लू खां की इतनी औकात नहीं थी कि वह परदेश में चौधरी के परिवार से कोई पंगा लेता. इसलिए टिल्लू और अख्तर ने अपने गांव लौटने में ही अपनी भलाई समझी.

इस के बाद अख्तर और टिल्लू खां ने राकेश से कहा, ‘‘भैया, अब दीवाली नजदीक आ गई है. अब हम गांव जाना चाहते हैं, इसलिए हमारी अब तक की मजदूरी का हिसाब कर दो.’’

राकेश ने 8 नवंबर को सभी मजदूरों का हिसाब कर दिया. हिसाब हो जाने के बाद मजदूरों ने 9 नवंबर, 2015 को जाने की तैयारी कर ली. हिसाब होने व गांव जाने की बात की जानकारी खातून को हुई तो वह परेशान हो उठी. वह राकेश को किसी भी सूरत में नहीं छोड़ना चाहती थी. राकेश के साथ भले ही उस का विधिवत निकाह नहीं हुआ था, पर राकेश ने उसे पत्नी बना रखा था. उसे मंगलसूत्र भी पहनाया था. खातून के पास राकेश से बात करने का सहारा मोबाइल था, जिसे उस के अब्बा ने ले कर तोड़ दिया था. अब उस के पास ऐसा कोई जरिया नहीं था कि वह राकेश से मिल कर मन की बात कहती.

उस की नजर में एक ही रास्ता था कि वह तुरंत राकेश से मिल कर इस विषय पर बात करे. 9 नवंबर को घर वालों से छिप कर वह राकेश के खेतों की ओर निकल गई. रास्ते में उसे आत्माराम मिला तो उस ने कहा, ‘‘अंकल, प्लीज अपना मोबाइल दे दीजिए. मुझे अब्बू से जरूरी बात करनी है.’’

आत्माराम ने उसे अपना फोन दे दिया. थोड़ा सा अलग हट कर खातून ने राकेश का नंबर मिला दिया. राकेश ने फोन रिसीव किया तो खातून बोली, ‘‘रौकी, मैं नरमा के खेत में जा रही हूं. इस समय मैं बहुत ज्यादा परेशान हूं. मुझे अब्बू गांव ले जाना चाहते हैं, पर मैं आप को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी. तुम तुरंत मुझ से मिलो, नहीं मिले तो तुम्हें पछताना पड़ेगा.’’

खातून की चेतावनी सुन कर राकेश सन्न रह गया. वह जानता था कि खातून जिद्दी है, बिना सोचेसमझे वह किसी भी हद तक जा सकती है. वह उस के खिलाफ कोर्टकचहरी भी जा सकती है. पुलिस और कानूनी काररवाई की बात जेहन में आते ही राकेश परेशान हो उठा. उस का दिमाग घूम गया. परेशानी के इस आलम में उस ने अपने बड़े भाई कुलदीप को बुला लिया. दोनों भाइयों ने इस जटिल मुद्दे पर बात की, लेकिन उन्हें कोई राह नहीं सूझी. तब राकेश ने अपने जिगरी दोस्तों अशोक और पूनम शर्मा को खेत में बुला लिया. चारों राकेश के गले आ पड़ी इस परेशानी का तोड़ ढूंढ़ने में जुट गए. अंत में चारों ने परेशानी की मूल खातून को ही मिटाने का भयानक निर्णय ले लिया. उन्होंने इस का तरीका भी खोज लिया.

योजना को अंजाम देने के लिए राकेश ने अशोक को भेज कर अपने एक अन्य दोस्त दीनदयाल जाखड़ की बोलेरो जीप मंगवा ली. इस के बाद राकेश ने नरमा के खेत में खातून को आवाज दे कर कोठा पर बुला लिया. वहां 3 अन्य लोगों को देख कर खातून घबरा गई. राकेश ने उस के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘घबराओ मत खातून, ये तीनों मेरे अपने हैं. आज मैं इन की मौजूदगी में तुम से शादी करूंगा. यहां तुम्हारे घर वाले आ सकते हैं, इसलिए दूसरी जगह चलने के लिए गाड़ी मंगवा ली है. आगे वाले गांव में शादी की पूरी व्यवस्था मैं ने करवा ली है, वहीं चल कर शादी कर लेंगे.’’

तब तक अंधेरा घिर चुका था. शादी की बात सुन कर खातून बहुत खुश हुई. अंजाम से अंजान खातून खुशीखुशी चारों के साथ बोलेरो में सवार हो गई. अशोक ने गाड़ी एशिया की सब से लंबीचौड़ी इंदिरा गांधी नहर की पटरी पर दौड़ा दी. लाखुवाली हैड के नजदीक सुनसान पटरी पर चारों ने गाड़ी रोकी. गाड़ी में रखी रस्सी से उन्होंने खातून के हाथपांव बांध दिए और किसी बंडल की तरह उसे नहर में उछाल दिया. मौत को सामने देख खातून रोईगिड़गिड़ाई और असफल विरोध भी किया, पर नौजवानों के आगे भला वह क्या कर सकती थी. नहर में गिरते ही वह अथाह जल में समा गई.

उधर घर में खातून के न मिलने से सभी घबरा गए. सांझ ढलने तक उस के न लौटने पर टिल्लू और अख्तर गांव की पुलिस चौकी पहुंचे और राकेश पर बेटी को भगाने का शक जाहिर करते हुए एक तहरीर दे दी. वहां उन की बात नहीं सुनी गई तो 15 नवंबर, 2015 को वे थाना पीलीबंगा पहुंचे और वहां बेटी के अगवा करने का आरोप लगाते हुए राकेश के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. नाबालिग बच्ची का मामला था, वह भी सुदूर जिला की रहने वाली थी. मामला काफी संवेदनशील था. इसलिए मामले की जानकारी मिलते ही युवा पुलिस अधीक्षक गौरव यादव ने थानाप्रभारी विजय कुमार मीणा को मामले का खुलासा करने का आदेश दे दिया.

प्रभावी काररवाई का भरोसा मिलने पर रोताबिलखता मजदूर टोला भरतपुर लौट गया. विजय कुमार मीणा ने एएसआई प्रताप सिंह के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में कांस्टेबल अमर सिंह, ओम नोखवाल, अमनदीप, लक्ष्मण स्वामी और पीरूमल को शामिल किया गया. मुखबिर द्वारा पता चला कि राकेश और उस के 3 साथी गांव से लापता हैं, इस से ये चारों शक के दायरे में आ गए. मुखबिरों से यह भी पता चला था कि खातून ने आत्माराम के मोबाइल से राकेश से बात की थी. डीएसपी नारायण दान रतनू भी पुलिस काररवाई पर नजर रख रहे थे.

पुलिस को कोई सफलता मिलती, इस से पहले ही नहर से सटे थाना रावला की पुलिस ने नहर से 14-15 साल की एक लड़की की लाश बरामद की. लाश की शिनाख्त के लिए भरतपुर से टिल्लू खां और उस की बेगम को बुलवा लिया गया. मृतक लड़की के पैरों में 6-6 अंगुलियां होने से मांबाप ने उस की शिनाख्त अपनी बेटी खातून के रूप में कर दी. मुखबिरों की इत्तला पर पुलिस ने राकेश को पकड़ लिया. पूछताछ में उस ने अपना अपराध स्वीकार कर के साथियों के नाम बता दिए. पुलिस ने 4 दिसंबर, 2015 को पीलीबंगा के मुंसिफ कोर्ट में उसे पेश कर पूछताछ के लिए 5 दिनों के रिमांड पर ले लिया.

इस बीच पुलिस ने कुलदीप, राकेश, अशोक और पूनम शर्मा को भी गिरफ्तार कर लिया था. सभी से विस्तार से पूछताछ कर के उन्हें अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Emotional Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Story Hindi: सोनबाई का सनकी शौहर

Crime Story Hindi: बुढ़ापे में कदम रख चुके रामचंद्र को लगता था कि उस की पत्नी सोनबाई के अपने ही दामाद से अवैध संबंध हैं, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था. तो क्या इस मामले में भी वैसा हुआ, जैसा ऐसे मामलों में होता है?

के कांत्रज गांव की सड़क पर चल रहे उस बूढ़े को जिस ने भी देखा, डर से उस का शरीर सिहर उठा. इस की वजह यह थी कि उस के एक हाथ में खून में डूबी कुल्हाड़ी थी तो दूसरे हाथ में एक महिला का सिर, जिस से उस समय भी खून टपक रहा था. वह तेजी से थाना भारती विद्यापीठ की ओर चला जा रहा था. बूढ़े को उस हालत में जाते देख कुछ लोग मोबाइल से उस की वीडियो बना रहे थे तो कुछ लोगों ने इस बात की सूचना पुलिस कंट्रौल रूम को दे दी थी.

वह थाना भारती विद्यापीठ के पास स्थित चौराहे पर पहुंचा तो चौराहे पर तैनात ट्रैफिक पुलिस ने उसे रोक लिया. लेकिन उन की हिम्मत उस बूढ़े के करीब जाने की नहीं हुई. इस की वजह यह थी उस समय वह बूढ़ा जिस हालत में था, उस की मानसिक स्थिति का पता लगाना मुश्किल था. ट्रैफिक पुलिस उसे समझाबुझा कर खून से सनी कुल्हाड़ी अपने कब्जे में लेने के बारे में सोच रही थी कि थाना भारती विद्यापीठ के असिस्टैंट इंसपेक्टर संजय चव्हाण, हैडकांस्टेबल राहुल कदम, कांस्टेबल मुकुंद पवार वहां पहुंच गए. संजय चव्हाण ने उस के करीब जा कर विनम्रता से उसे समझाते हुए कुल्हाड़ी और सिर को जमीन पर रखने को कहा तो उस ने कुल्हाड़ी तो जमीन पर रख दी, लेकिन सिर नहीं रखा. वह सिर को ले जा कर तालाब में फेंकना चाहता था.

काफी कोशिश के बाद भी जब बूढ़ा नहीं माना तो पुलिस ने कुल्हाड़ी कब्जे में ले कर उसे दबोच लिया और थाने ले आई. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने अपना नाम रामचंद्र उर्फ रामू चव्हाण बताया. उस ने जो सिर ले रखा था, वह उस की पत्नी सोनबाई का था. पत्नी की हत्या कर के वह उस का सिर काट कर तालाब में फेंकने जा रहा था. थाना भारती विद्यापीठ के थानाप्रभारी सीनियर इंसपेक्टर मछिंद्र चव्हाण को भी सूचना दे दी गई थी. वह तुरंत थाने आ गए और रामचंद्र से सरसरी तौर पर पूछताछ कर उस के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करा दिया.

इस के बाद वह संजय चव्हाण, इंसपेक्टर (क्राइम) श्रीकांत शिंदे, पुलिस नाइक राहुल कदम, कांस्टेबल मुकुंद पवार और असिस्टैंट इंसपेक्टर राहुल गौड के अलावा पत्नी की सिर काट कर हत्या करने वाले रामचंद्र को साथ ले कर उस के घर जा पहुंचे. रामचंद्र कांत्रज गांव में सुखसागर एशियन सोसायटी के सामने ओसवाल बिल्डर के एक खाली पड़े प्लौट के कोने में बने छोटे से मकान में रहता था. पुलिस के पहुंचने तक वहां काफी लोग जमा हो गए थे. पुलिस उन्हें हटा कर मकान के पास पहुंची तो 3 कमरों के उस मकान का मुख्य दरवाजा खुला था.

मकान के अंदर का दृश्य दिल दहला देने वाला था. आगे वाले कमरे में सोनबाई की सिर कटी लाश 4 टुकड़ों में बंटी पड़ी थी. उस के आसपास खून ही खून फैला था. वहां का दृश्य बड़ा डरावना लग रहा था. उस के सामने जो कमरा था, उस की कुंडी बाहर से बंद थी. पुलिस ने उसे खोला तो पता चला कि रामचंद्र ने बहू और उस के बच्चों को हत्या से पहले उन्हें कमरे में बंद कर दिया था. मछिंद्र चव्हाण अभियुक्त रामचंद्र की बहू से घटना के बारे में पूछताछ कर ही रहे थे कि एडीशनल पुलिस कमिश्नर डा. सुधाकर पढारे और असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर आत्माचरण शिंदे भी आ पहुंचे.

इन के साथ प्रैस फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो की टीम भी थी. इन लोगों का काम निपट गया तो पुलिस ने औपचारिक काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए पूना ससून डाक अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद थाने लौट कर रामचंद्र से विस्तार से की गई पूछताछ में सोनबाई की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी. 63 वर्षीय रामचंद्र मूलरूप से कर्नाटक के जिला गुलबर्गा का रहने वाला था. उस के पिता शिव चव्हाण गांव के सीधेसादे गरीब किसान थे. गरीबी की ही वजह से रामचंद्र पढ़ नहीं पाया. बचपन से ले कर जवान होने तक उस ने पिता के साथ काम किया.

लगभग 40 साल पहले उस की शादी हुई तो पत्नी सोनबाई को ले कर वह रोजीरोटी की तलाश में पूना आ गया. पूना शहर में कुछ दिनों तक वह इधरउधर छोटामोटा काम करता रहा, लेकिन जब उसे ओसवाल बिल्डर के यहां वाचमैनी की नौकरी मिल गई तो उस के जीवन में ठहरवा आ गया. बिल्डर की ओर से रहने के लिए उसे एक छोटा सा मकान भी मिल गया था. उसी मकान में वह पत्नी के साथ रहने लगा. वहीं उस के 4 बच्चे, 2 बेटियां और 2 बेटे हुए. उस ने बच्चों को पढ़ायालिखाया और जैसेजैसे वे शादी लायक होते गए, वह उन की शादियां करता गया. अब तक उस की दोनों बेटियों और एक बेटे की शादी हो चुकी है.

बड़ी बेटी गुलबर्गा में ब्याही है तो छोटी मुंबई में. बड़े बेटे राजेश की भी शादी हो चुकी है. उस के 2 बच्चे भी हो चुके हैं. राजेश पत्नी सुनीता और बच्चों के साथ पिता के साथ ही रहता था. उस से छोटे उमेश की अभी शादी नहीं हुई थी. दोनों भाइयों की बढि़या नौकरी थी. समय पंख लगा कर अपनी गति से बीतता रहा. रामचंद्र और सोनबाई उम्र के ढलान पर पहुंच चुके थे. सोनबाई वैसे तो अपने सभी बच्चों से बहुत प्यार करती थी, लेकिन छोटी बेटी और दामाद से उसे कुछ ज्यादा ही लगाव था. न जाने क्यों वह छोटे दामाद को कुछ ज्यादा ही मानती थी. वह जब भी उस के यहां आता, वह उस की सेवा में लग जाती, उस का ध्यान सब बच्चों से ज्यादा रखती. उस के साथ अधिक से अधिक समय बिताना चाहती. उस से बातें भी खूब करती.

जबकि रामचंद्र को यह सब जरा भी पसंद नहीं था. उस ने इस के लिए सोनबाई को न जाने कितनी बार समझाया और मना किया, लेकिन बेटी और दामाद की ममता में वह कुछ इस तरह खोई थी कि मानी ही नहीं. वह बेटी और दामाद से फोन पर भी लंबीलंबी बातें करती थी. कई बार समझाने और मना करने पर भी जब सोनबाई नहीं मानी तो रामचंद्र के मन में दामाद और पत्नी को ले कर शक होने लगा. उस के मन में तरहतरह के गलत विचार आने लगे. उसे पत्नी पर से भरोसा उठने लगा.

दिमाग में संदेह का जहर भरा तो उसे पत्नी से नफरत होने लगी. उसे लगता था कि उस की पत्नी सोनबाई और दामाद के बीच गलत संबंध हैं. जबकि सोनबाई और उस के दामाद के बीच वैसा कुछ भी नहीं था. दोनों का चरित्र साफ था. लेकिन अगर किसी को संदेह हो जाए तो उस का इलाज ही क्या है, इसी संदेह की वजह से सोनबाई और रामचंद्र में पतिपत्नी जैसा मधुर संबंध नहीं रह गया. इस के बाद पतिपत्नी में लड़ाईझगड़ा और मारपीट आम बात हो गई. रामचंद्र के बच्चे और बहू उसे समझासमझा कर थक गए, लेकिन न उस का संदेह दूर हुआ और न लड़ाईझगड़ा बंद हुआ. उसे पत्नी से ऐसी नफरत हो गई कि वह पत्नी से लड़ने और उसे मारनेपीटने के बहाने खोजने लगा.

रामचंद्र की जब भी पत्नी से लड़ाई होती, उसे पीटते हुए उस का गला पकड़ कर कहता, ‘‘तू सचसच बता, तेरा दामाद के साथ क्या चल रहा है? तुझे बेटे की उम्र के दामाद से संबंध बनाते शरम नहीं आती.’’

पति के इस झूठे आरोप से सोनबाई का खून खौल उठता. जवाब में वह कहती, ‘‘बुढ़ापे में तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है. मुझे और मेरे बच्चों को देखो, मैं बूढ़ी हो गई हूं और वे जवान हो गए हैं. उन के बच्चे हो गए हैं. उन्हें मैं गोद में ले कर खिलाती हूं. मेरी यह उम्र इश्क करने की है. अगर इश्क ही करना होगा तो दामाद से ही करूंगी? अपनी ही बेटी के सुखी संसार में आग लगाऊंगी? तुम्हें तो लाजशरम रह नहीं गई है, मुझे भी इन बच्चों के सामने बेशरम बना दिया है. इस हालत में तो मेरी मौत हो जाए, यही मेरे लिए अच्छा है.’’

पत्नी की इन बातों का रामचंद्र पर कोई असर नहीं पड़ा. उस के दिमाग में संदेह का जो कीड़ा पैदा हो गया था, अब वह शांति से बैठ नहीं रहा था. आखिर एक दिन वह भी आ गया, जब उस के संदेह के उस कीड़े ने जहरीला नाग बन कर सोनबाई को इस तरह डसा कि वह हमेशाहमेशा के लिए इस नश्वर संसार से विदा हो गई. यह 9 अक्तूबर, 2015 की बात थी. वह दिन भी रोज की ही तरह शुरू हुआ था. राजेश और उमेश खापी कर अपनीअपनी नौकरी पर चले गए थे. घर में सिर्फ राजेश की पत्नी सुनीता और दोनों बच्चे ही रह गए थे. घर आते ही रामचंद्र किसी बात को ले कर सोनबाई से उलझ पड़ा.

बहू सुनीता ने झगड़ा शांत कराने की कोशिश की, लेकिन रामचंद्र चुप नहीं हुआ. धीरेधीरे यह झगड़ा इतना बढ़ गया कि सोनबाई ने एक बार फिर कहा कि अगर मौत आ जाती तो इस झंझट से छुटकारा मिल जाता. इतना कह कर झगड़ा खत्म करने की गरज से वह बाहर जा कर बरतन साफ करने लगी. तभी रामचंद्र ने कहा, ‘‘तू मरना चाहती है न तो मैं तुझे मार ही देता हूं.’’

यह कह कर रामचंद्र घर के अंदर गया और कोने में लकड़ी काटने वाली कुल्हाड़ी ले कर बाहर आ गया. बच्चों को स्कूल के लिए तैयार कर रही सुनीता ने जब रामचंद्र के हाथों में कुल्हाड़ी देखी तो बुरी तरह डर गई. किसी अनहोनी की आशंका से वह अपने पति राजेश को फोन करने लगी. वह पति को ससुर के तेवर के बारे में बता रही थी कि रामचंद्र ने उस के पास आ कर कहा, ‘‘तू बच्चों को ले कर अंदर कमरे में जा.’’

ससुर के गुस्से को सुनीता जानती थी, इसलिए उस की बातों का विरोध किए बगैर वह बच्चों को ले कर चुपचाप अपने कमरे में चली गई. उस के कमरे में जाते ही रामचंद्र ने बाहर से कुंडी लगा दी. इस के बाद वह सीधे पत्नी के पास पहुंचा. सोनबाई बरतन साफ कर रही थी. रामचंद्र ने उस के पास आ कर कहा, ‘‘जब देखो, तब तुम मरने की बात करती रहती हो न, चलो आज तुम्हारी यह तमन्ना मैं पूरी ही कर देता हूं.’’

सोनबाई कुछ कह पाती, उस के पहले ही रामचंद्र ने कुल्हाड़ी से सोनबाई के सिर पर पूरी ताकत से वार कर दिया. सोनबाई जोर से चीखी और सिर पकड़ कर जमीन पर लोट गई. इस के बाद रामचंद्र उसे घसीट कर कमरे में ले आया और मानवता की सारी हदें पार कर के बेरहमी से उस के शरीर के 4 टुकड़े कर दिए. इस के बाद सोनबाई का कटा सिर और कुल्हाड़ी ले कर वह तालाब में फेंकने जा रहा था, तभी लोग उस के पीछे लग गए. आगे चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस मिल गई तो उस ने उसे रोक लिया. तब तक सूचना पा कर थाना पुलिस भी वहां पहुंच गई और उसे पकड़ लिया.

पूरी कहानी सामने आ गई तो मछिंद्र चव्हाण ने रामचंद्र के खिलाफ अपराध संख्या 350/2015 पर भादंवि की धारा 302, 201, 342 और मुंबई पुलिस एक्ट 37-स-135 के तहत मामला दर्ज कर के आगे की जांच असिस्टैंट इंसपेक्टर एस. शिंदे को सौंप दी. एस. शिंदे ने रामचंद्र की दिमागी जांच मनोचिकित्सक से कराई कि उस का कहीं मानसिक संतुलन तो नहीं बिगड़ गया है. डाक्टर ने उसे स्वस्थ बताया तो उसे मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट श्री टी.एन. चव्हाण की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में पूना की यरवदा जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में बंद था. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Delhi News: आरजू की लाश पर सजाई सेज

Delhi News: आरजू और नवीन ने भले ही प्यार कर के जीवन भर साथ निभाने का वादा कर लिया था, लेकिन उन की शादी में अड़चन यह थी कि वे एक ही मोहल्ले के रहने वाले थे. नवीन तो घर वालों के कहने पर मान गया, लेकिन आरजू जिद पर अड़ी थी. तब उस से छुटकारा पाने के लिए नवीन ने जो किया, उस से उसे क्या मिला.

आरजू चौहान अमूमन सुबह जल्दी उठ जाती थी, लेकिन 2 फरवरी को उस की आंख थोड़ी देर से खुली तो वह नहाधो कर कालेज जाने की तैयारी करने लगी. वह अशोक विहार स्थित लक्ष्मीबाई कालेज में बीए फाइनल ईयर में पढ़ रही थी. कालेज जाने में देर न हो जाए, आरजू ने नाश्ता तक नहीं किया. केवल चाय पी कर साढ़े 8 बजे घर से निकल गई. कालेज से वह अकसर दोपहर 2 बजे तक घर आ जाती थी. लेकिन जब कभी उसे आखिरी पीरियड अटैंड करना होता था तो घर आने में उसे 4 बज जाते थे.

लेकिन जब उस दिन वह 4 बजे तक घर नहीं लौटी तो उस की मां कविता ने उसे फोन किया कि इस समय वह कहां है और कब तक घर आएगी? लेकिन उस का फोन बंद था. कई बार फोन करने पर भी बात नहीं हो सकी तो वह परेशान हो उठीं कि पता नहीं आरजू ने फोन क्यों बंद कर दिया है.

आरजू के पिता संजीव चौहान उस समय घर पर ही थे. पत्नी को परेशान देख कर उन्होंने पूछा, ‘‘क्या बात है, क्यों परेशान हो रही हो?’’

‘‘आरजू अभी तक कालेज से नहीं आई है. उस का फोन मिलाया तो वह भी बंद है.’’ कविता ने कहा.

‘‘हो सकता है, फोन की बैटरी डिस्चार्ज हो गई हो. तुम परेशान मत होओ. अब वह बच्ची नहीं है, जो तुम उस की इतनी चिंता कर रही हो?’’ संजीव चौहान ने पत्नी को समझाया.

एक घंटा और बीत गया, पर आरजू घर नहीं आई. मां ने फिर फोन किया. इस बार भी उस का फोन बंद मिला. उन्होंने यह बात पति को बताई तो उन्होंने भी अपने फोन से उसे फोन किया. उन्हें भी फोन बंद मिला. अब वह भी परेशान हो गए. आरजू की एक सहेली सिमरन का फोन नंबर कविता चौहान के पास था. उन्होंने सिमरन को फोन किया तो उस ने कहा, ‘‘आंटी, आज मैं कालेज नहीं गई थी, इसलिए मुझे कुछ नहीं पता.’’

इस के बाद आरजू की दूसरी सहेली राधिका को फोन कर के आरजू के बारे में पूछा गया तो पता चला कि वह भी उस दिन छुट्टी पर थी. जैसेजैसे अंधेरा बढ़ता जा रहा था, चौहान दंपति की चिंता बढ़ती जा रही थी. जवान बेटी का मामला था, इसलिए वह ज्यादा शोरशराबा भी नहीं करना चाहते थे. यहां तक कि उन्होंने आरजू के बारे में अपने परिवार वालों को भी नहीं बताया था.

जवान बेटी के अचानक गायब हो जाने से मांबाप के दिल पर क्या गुजरती है, इस बात को संजीव चौहान और उन की पत्नी कविता से ज्यादा और कौन महसूस कर सकता था. बेटी को इधरउधर तलाशतेतलाशते रात के 11 बज गए, पर उस के बारे में कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली. रात साढ़े 11 बजे संजीव पत्नी को ले कर थाना मौडल टाउन पहुंचे. थानाप्रभारी रामअवतार यादव को उन्होंने बेटी आरजू के बारे में पूरी बात बताई. आरजू कोई दूधपीती बच्ची नहीं थी, जो उस के कहीं खो जाने की आशंका थी. जवान लड़की के गायब होने पर ज्यादातर लोग यही सोचते हैं कि वह अपने प्रेमी के साथ भाग गई होगी या फिर उस के साथ कोई अनहोनी घट गई होगी.

इसलिए आरजू के गायब होने के मामले में भी थानाप्रभारी ने यही सोचा कि वह अपने किसी बौयफ्रैंड के साथ कहीं चली गई होगी, 2-4 दिनों में घूमघाम कर खुद ही घर आ जाएगी. उन्होंने बातों ही बातों में संजीव चौहान से जानना भी चाहा कि उस की किसी लड़के से दोस्ती तो नहीं थी. संजीव चौहान ने इस के लिए मना कर दिया था. संजीव चौहान की तहरीर ले कर उन्होंने कहा कि वह परेशान न हों. उन की बेटी जल्द ही आ जाएगी. पुलिस को बेटी की गुमशुदगी की सूचना देने के बाद चौहान दंपति घर लौट आया. रामअवतार यादव ने यह मामला सबइंसपेक्टर अमित राठी के हवाले कर दिया.

अमित राठी ने आरजू चौहान की गुमशुदगी की काररवाई में उस का हुलिया बता कर दिल्ली के समस्त थानों को वायरलैस से मैसेज प्रसारित करा दिया.बेटी की चिंता में चौहान दंपति की नींद आंखों से उड़ चुकी थी. उन के अलावा उन की बेटी पायल और बेटा कृष्णा भी परेशान था. सवेरा होते ही संजीव चौहान बेटी की तलाश में निकल पड़े. पहले वह लक्ष्मीबाई कालेज गए, जहां आरजू पढ़ती थी. वह प्रिंसिपल से मिले तो उन्होंने तुरंत कालेज के गेट पर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज निकलवाई. उस फुटेज से पता चला कि सुबह 9 बज कर 2 मिनट पर आरजू कालेज आई थी.

अंदर आने की पुष्टि होने पर पिं्रसिपल ने उन प्रोफेसरों को बुलवाया, जो पहले और दूसरे पीरियड में आरजू को पढ़ाती थीं. उन्होंने बताया कि आरजू ने केवल पहला पीरियड अटैंड किया था. अब सवाल यह था कि पहला पीरियड अटैंड कर के वह कहां चली गई थी? संजीव चौहान ने आरजू के साथ पढ़ने वाली कुछ लड़कियों से बात की तो 2 लड़कियों ने बताया कि आरजू से मिलने अकसर नवीन खत्री आता रहता था. कल भी वह अपनी मारुति स्विफ्ट डिजायर कार से आया था.

संजीव चौहान के घर से करीब डेढ़ सौ मीटर दूर रहने वाले नवीन खत्री और आरजू के बीच कई सालों से गहरी दोस्ती थी. उन की यह दोस्ती बाद में प्यार में बदल गई थी. वे दोनों शादी करना चाहते थे, लेकिन एक ही गांव के होने की वजह से दोनों के घर वाले तैयार नहीं थे. करीब 4 महीने पहले संजीव के घर पंचायत हुई थी, जिस में नवीन के घर वाले भी आए थे. पंचायत में तय हुआ था कि आज के बाद दोनों बच्चे आपस में नहीं मिलेंगे और दोनों के ही घर वाले अपनेअपने बच्चों को संभालेंगे.

यह जानकारी मिलने के बाद संजीव घर आ गए. आरजू के लापता होने की बात अभी तक संजीव के घर वालों के अलावा किसी और को नहीं पता थी. बदनामी के डर से संजीव चौहान ने अपने नातेरिश्तेदारों तक को बेटी के बारे में नहीं बताया था. वह खुद ही उसे ढूंढ रहे थे. कालेज से उन्हें नवीन खत्री के बारे में जो जानकारी मिली थी, अगर वह उस के बारे में उस से पूछते तो बात मोहल्ले में फैल सकती थी. इसलिए उन्होंने उस से या उस के घर वालों से बात करना उचित नहीं समझा. 3 फरवरी को भी वह बेटी को तलाशते रहे, लेकिन कहीं से भी उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

चौहान परिवार दर्द को जितना दबाने की कोशिश कर रहा था, वह उतना ही बढ़ता जा रहा था. अब उन्होंने बात को ज्यादा दबाना उचित नहीं समझा और परिवार वालों को बेटी के गायब होने के बारे में बता दिया. उन्हें यह भी बता दिया था कि कालेज की लड़कियों से पता चला है कि आरजू कालेज से नवीन खत्री के साथ कार से गई थी. नवीन की शादी तय हो चुकी थी और अगले दिन यानी 5 फरवरी को उस की शादी थी.

परिवार वालों की सलाह पर कविता चौहान ने बेटी के बारे में पता करने के लिए नवीन के बड़े भाई संदीप खत्री को फोन किया. फोन संदीप की बहन ने उठाया. कविता ने कहा कि उन्हें नवीन से बात करनी है तो उस ने कहा, ‘‘नवीन तो शादी की तैयारी में लगा है, आप चाहें तो मम्मीपापा से बात कर लें.’’

‘‘कराओ,’’ कविता ने कहा.

‘‘लो संदीप भैया आ गए, आप उन्हीं से बात कर लीजिए.’’ नवीन की बहन ने कहा.

‘‘देखो बेटा, आरजू 2 दिनों से घर नहीं आई है. पता चला है कि वह तुम्हारे भाई के टच में थी. नवीन ही उसे कालेज से ले गया है. अगर आप लोग नहीं बताते तो मैं पुलिसिया काररवाई करूंगी.’’ कविता ने कहा.

‘‘नहीं आंटी, वह नवीन के टच में नहीं थी. किसी ने आप को गलत बताया है. आप बेवजह नवीन पर शक कर रही हैं. कल उस की शादी है. रही बात आरजू की तो हम उसे ढूंढने में आप की मदद करेंगे, क्योंकि आप की इज्जत हमारी इज्जत है. इज्जत के लिए हम कुछ भी करेंगे.’’ संदीप ने कहा.

‘‘ठीक है, आज शाम 5 बजे तक मेरी बेटी मेरे पास आ जानी चाहिए.’’ कविता ने कहा.

‘‘आंटी, मैं इस बारे में एसएचओ से बात कर के आरजू को ढूंढने की कोशिश करता हूं.’’ संदीप ने भरोसा दिलाया.

संदीप ने आरजू को ढूंढने की बात कविता से कह तो दी, लेकिन उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह उसे कहां ढूंढे. भाई की शादी थी, सारे काम वही देख रहा था. जब उस की समझ में कुछ नहीं आया तो वह दादी के साथ संजीव चौहान के बड़े भाई राजपाल के घर पहुंचा. उन से कहा कि कविता आंटी उस पर आरजू को ढूंढने का दबाव डाल रही हैं, आखिर वह उसे कहां ढूंढे. राजपाल की पत्नी के भतीजे की नारायणा में शादी थी. वह पत्नी के साथ शादी में जाने की तैयारी कर रहे थे, इसलिए उन्होंने कहा कि वह इस बारे में शादी से लौटने के बाद ही कुछ करेंगे. संदीप घर लौट आया.

संजीव चौहान और उन की पत्नी कविता का बेटी की चिंता में रोरो कर बुरा हाल था. संदीप से बात किए उन्हें कई घंटे हो चुके थे. उधर से उन के पास कोई फोन नहीं आया था. आखिर उन्होंने ही फिर से संदीप को फोन किया, ‘‘संदीप क्या हुआ, अभी तक तुम ने आरजू के बारे में कुछ नहीं बताया.’’

‘‘आंटी, मैं उसे कहां से ढूंढू. हम राजपाल अंकल के पास गए थे. वह शादी में जा रहे थे. उन के लौटने के बाद ही बात करेंगे.’’ संदीप ने कहा.

‘‘मगर तुम ने तो कहा था कि एसएचओ से बात कर के आरजू को ढूंढोगे.’’ कविता ने कहा.

‘‘आंटी, कल हमारे यहां शादी है. बताओ, मैं उसे कहां से लाऊं?’’

‘‘देखो, मैं इस बात की गारंटी देती हूं कि मेरी बेटी घर आ जाएगी तो मैं शादी में कोई विघ्न नहीं डालूंगी.’’ उन्होंने कहा.

संदीप ने फोन अपनी दादी राजरानी को दे दिया. राजरानी से बात करते समय कविता की आंखों में आंसू भर आए. उन्होंने भर्राई आवाज में कहा, ‘‘मैं बहुत दुखी हूं. 3 दिन हो गए मेरी बच्ची घर नहीं आई.’’

‘‘दुख तो हमें भी है. हम ने नवीन को इतना टाइट कर दिया था कि वह 3 महीने से अपनी बहन के घर है. वहीं पर वह अपना काम भी कर रहा है. यहां आता भी नहीं. अब यह उस बच्ची को कहां से लाए?’’ राजरानी ने कहा.

‘‘मुझे पता चला है कि एक हफ्ते पहले नवीन बाइक से आरजू का बस का पास बनवाने ले गया था. अभी भी वह उस के साथ घूमती थी. आप कैसे कह रही हैं कि वह आरजू से नहीं मिलता था. संदीप ने भी कहा था कि अपनी इज्जत के लिए वह कुछ भी करेगा.’’ कविता ने कहा.

‘‘कह दिया होगा तो वह गारंटी थोड़े ही लेगा. वह माचिस की डिब्बी में तो है नहीं, जो निकाल कर दे दें. लड़की की जो फ्रैंड हैं, उन से भी पूछ लो. यह भी हो सकता है कि तुम्हारी रिश्तेदारी में जहां शादी हो रही है, वह वहीं पहुंच जाए. शांति रखो सब ठीक हो जाएगा.’’

‘‘मैं शांति ही तो रखे हुए हूं. मैं ने पुलिस के पास अभी नवीन का नाम तक नहीं लिखवाया है. मुझे मेरी बेटी दिलवा दो. मैं बहुत सहयोग करूंगी. मेरी बेटी तुम्हारी शादी में विघ्न भी नहीं डालेगी.’’ कहतेकहते कविता रो पड़ीं.

अगले दिन नवीन की शादी थी. कविता ने सोचा कि हो सकता है शादी के बाद वह बेटी को ढूंढने में मदद करें, इसलिए उन्होंने एक दिन और चुप रहना उचित समझा. 6 फरवरी की शाम तक संदीप खत्री और उस के घर वालों ने कोई जवाब नहीं दिया तो चौहान दंपति के सब्र का बांध टूट गया. संजीव चौहान थाने पहुंचे और उन्होंने शक के आधार पर नवीन खत्री के खिलाफ बेटी के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

अपहरण की रिपोर्ट दर्ज होते ही पुलिस काररवाई तेज हो गई. डीसीपी विजय सिंह ने एसीपी (मौडल टाउन) के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी रामअवतार यादव, अतिरिक्त थानाप्रभारी सुधीर कुमार, एसआई संदीप माथुर, अमित राठी, विश्वप्रताप शर्मा, हैडकांस्टेबल रंधीर सिंह, जयभगवान, कांस्टेबल शिवकुमार, नवीन, राजेश को शामिल किया गया. रिपोर्ट नामजद थी, इसलिए पुलिस टीम गांव राजपुर, गुड़मंडी में नवीन के घर जा पहुंची. वह घर पर नहीं मिला. उस की मां और दादी ने बताया कि वह अपनी नईनवेली दुलहन को ले कर हनीमून मनाने गोवा गया है.

पुलिस टीम लौट आई. उस के गोवा से लौटने के बाद ही उस से आरजू के बारे में पूछताछ की जा सकती थी. इस बीच पुलिस ने आरजू और नवीन खत्री के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवा लिया था. उस दिन रात 10 बजे के करीब पुलिस टीम को खबर मिली कि नवीन आजादपुर से मौडल टाउन की ओर डीटीसी की एक बस से आ रहा है. इस खबर पर थानाप्रभारी चौंके, क्योंकि उन्हें तो उस के गोवा जाने की खबर मिली थी. उन के पास नवीन खत्री का फोटो था ही, इसलिए वह मौडन टाउन-2 के बस स्टाप पर खड़े हो कर आजादपुर से आने वाली बसों की तलाशी लेने लगे. आखिर एक बस में उन्हें नवीन खत्री मिल गया. पुलिस को देखते ही उस ने भागने की कोशिश की, लेकिन बस के दोनों दरवाजों पर पुलिस के तैनात होने की वजह से उस की कोशिश सफल नहीं हो सकी. उसे हिरासत में ले कर पुलिस टीम थाने ले आई.

आरजू के बारे में पूछने पर उस ने कहा, ‘‘4 महीने पहले जब पंचायत बैठी थी, तभी से मैं ने उस से बातचीत बंद कर दी थी. अब तो मेरी शादी भी हो चुकी है. उस दिन वह कालेज से कहां गई, मुझे नहीं पता.’’

‘‘लेकिन कालेज के गेट पर लगे सीसीटीवी कैमरे की रिकौर्डिंग में आरजू तुम्हारे साथ जाती दिखाई दी है.’’ इंसपेक्टर सुधीर कुमार ने कहा.

‘‘नहीं सर, ऐसा नहीं हो सकता. मैं तो उस दिन सुबह से ही अपनी शादी के कार्ड बांट रहा था.’’ नवीन ने कहा.

नवीन और आरजू के नंबरों की काल डिटेल्स से पता चला था कि 2 फरवरी, 2016 को सुबह 9 से साढ़े 9 बजे के बीच उस की आरजू से बात हुई थी. उस समय उस के फोन की लोकेशन भी लक्ष्मीबाई कालेज के आसपास थी. इस से साफ लग रहा था कि नवीन झूठ बोल रहा है. पुलिस ने उसे सारे सबूत दिखा कर पूछताछ की तो उसे सच बोलना पड़ा. उस ने मान लिया कि उस ने आरजू की हत्या कर दी है और इस वक्त लाश उस के घर में ही पड़ी है.

पुलिस को हैरानी इस बात की थी कि शादी वाले घर में 5 दिनों से लाश कैसे रखी है? पुलिस उसे ले कर उस के घर पहुंची तो मकान में कमरों और किचन के बीच वेंटिलेशन के लिए कुछ खाली जगह छूटी थी, उसी खाली जगह में पानी के पाइप लगे थे. उसे शाफ्ट कहते हैं. उसी शाफ्ट में उस ने आरजू की लाश छिपा कर रखी थी, जिसे उस ने बरामद करा दी. घर से आरजू की लाश बरामद होने पर नवीन के घर वाले भी हैरान रह गए.

आरजू की लाश बरामद होने की जानकारी थानाप्रभारी ने डीसीपी व अन्य अधिकारियों को दी तो जिला स्तर के सभी अधिकारी मौके पर पहुंच गए. क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी मौके पर बुला लिया गया. लाश देख कर ही लग रहा था कि हत्या कई दिनों पहले की गई थी. लाश से दुर्गंध भी आ रही थी. उस के गले में उस समय भी एक दुपट्टा लिपटा था.

थाने का माहौल गमगीन हो गया था. पुलिस अधिकारियों ने पीडि़त पक्ष को आश्वासन दिया कि नवीन के अलावा इस केस में जो भी दोषी पाए जाएंगे, उन के खिलाफ भी काररवाई की जाएगी. किसी तरह समझाबुझा कर पुलिस ने उन्हें शांत किया. इस के बाद उन्होंने लाश पोस्टमार्टम के लिए बाबू जगजीवनराम मैमोरियल अस्पताल भेज दी.

7 फरवरी को पुलिस ने नवीन खत्री को रोहिणी न्यायालय में ड्यूटी मेट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट सोनाली गुप्ता के समक्ष पेश कर के पूछताछ के लिए 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि में अभियुक्त नवीन खत्री से विस्तार से पूछताछ की गई तो आरजू चौधरी की हत्या की रोंगटे खड़े कर देने वाली प्रेम, धोखा और छुटकारे की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली. संजीव चौहान उत्तरीपश्चिमी जिले के गांव राजपुरा, गुड़मंडी में अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी कविता के अलावा 2 बेटियां और एक बेटा था. आरजू उन की दूसरे नंबर की बेटी थी. बड़ी बेटी पायल पढ़लिख कर दिल्ली के ही एक निजी स्कूल में टीचर हो गई थी.

दूसरी बेटी आरजू दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कालेज में बीए फाइनल ईयर में पढ़ रही थी. वह कालेज बस से आतीजाती थी. कभीकभी वह अपनी सहेलियों के साथ कमलानगर मार्केट घूमने चली जाती थी. एक दिन आरजू कालेज की एक दोस्त के साथ कमलानगर मार्केट घूमने गई थी, तभी वहां उस की मुलाकात नवीन खत्री से हो गई. नवीन को वह पहले से जानती थी, क्योंकि वह उसी के मोहल्ले में रहता था. लेकिन वह उस से कभी मिली नहीं थी.

नवीन भी राजपुरा गांव के राजकुमार का बेटा था. उस दिन रैस्टोरेंट में नवीन और आरजू की पहली बार बात हुई तो आरजू के खानेपीने का बिल नवीन ने ही चुकाया. उस दौरान दोनों ने एकदूसरे को अपने फोन नंबर दे दिए. यह करीब 2 साल पहले की बात है.

पहली मुलाकात में ही आरजू नवीन को भा गई थी. उस से नजदीकियां बढ़ाने के लिए वह उसे जबतब फोन करने लगा. कभीकभी आरजू जैसे ही कालेज के लिए घर से निकल कर मेनरोड तक पहुंचती, नवीन मोटरसाइकिल ले कर आ जाता. उसे अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाने के लिए कहता कि उसे लक्ष्मीबाई कालेज के सामने से होते हुए करोलबाग जाना है. तब आरजू उस की मोटरसाइकिल पर बैठ जाती.

इस तरह आरजू और नवीन के बीच दोस्ती हो गई, जो बाद में प्यार में बदल गई. इस के बाद वह अकसर नवीन की मोटरसाइकिल पर घूमने लगी. नवीन भी उस पर खूब पैसे खर्च करने लगा. राजपुरा गांव के कुछ लोगों ने आरजू को नवीन के साथ घूमते देखा तो इस की चर्चा गांव में होने लगी. इस का नतीजा यह निकला कि दोनों के ही घर वालों को उन के प्यार की जानकारी हो गई. तब उन्होंने अपनेअपने बच्चों को समझाने की कोशिश की. लेकिन आरजू और नवीन अपनी प्यार की धुन में रमे थे, उन के बारे में लोग क्या कह रहे हैं, इस की उन्हें परवाह नहीं थी. हां, उन्होंने मिलने में अब ऐहतियात बरतनी शुरू कर दी थी.

प्यार कर लिया, साथ जीनेमरने की कसमें भी खा लीं, लेकिन इस बात पर गौर नहीं किया कि वे एक ही मोहल्ले में रहते हैं, जिस की वजह से शादी होना असंभव है. गांव के रिश्ते से एक तरह से वे भाईबहन लगते थे. अगर यह बात वे पहले सोच लेते तो उन की मोहब्बत परवान न चढ़ती. संजीव चौहान को लगा कि नवीन ने ही उन की बेटी को बहका कर अपने जाल में फांस लिया है. इसलिए उन्होंने फोन कर के नवीन के घर वालों से शिकायत की. इस के बाद नवीन के घर वाले कुछ परिचितों को ले कर संजीव चौहान के घर पहुंचे. यह करीब 4 महीने पहले की बात है.

एक ही गांव का होने की वजह से शादी होना असंभव था, इसलिए सब ने यही कहा कि दोनों के घर वाले अपनेअपने बच्चों को समझाएं. कहा जाता है कि अपने घर वालों की इज्जत को देखते हुए आरजू ने नवीन से बात करनी बंद कर दी थी. उस ने उस से दूरियां बना ली थीं. इस के बाद उस ने अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगा दिया था. कल्पनाओं की दुनिया में नाम कमाने के लिए उस ने किंग्सवे कैंप स्थित एक इंस्टीट्यूट में एनिमेशन के कोर्स में दाखिला भी ले लिया था. कालेज से लौटने के बाद वह एनिमेशन सीखने जाती थी.

आरजू और नवीन भले ही घर वालों के दबाव में एकदूसरे से दूरी बनाए हुए थे, लेकिन पुरानी यादों को भूलना इतना आसान नहीं था. जब कभी वे घर पर एकांत में होते तो उन की पुरानी यादें दिमाग में घूमने लगतीं. वे यादें उन्हें फिर से मिलने के लिए उकसा रही थीं. नतीजा यह हुआ कि दोनों ही खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाए और फोन पर बातें ही नहीं करने लगे, बल्कि मिलने भी लगे.

अब आरजू नवीन पर शादी का दबाव डालने लगी, मगर नवीन कोई न कोई बहाना बना कर उसे टालता रहा. पंचायत के फैसले के बाद नवीन दक्षिणीपश्चिमी दिल्ली के नागल देवत में अपनी बहन के घर रहने लगा था. वह वहीं से आरजू से फोन पर बात कर के निश्चित जगह पर उस से मिल लेता था. जबकि घर वाले सोच रहे थे कि बच्चों ने संबंध खत्म कर लिए हैं.

इस बीच नवीन के घर वालों ने दिल्ली के द्वारका सेक्टर-5 स्थित विश्वासनगर की एक लड़की से उस की शादी तय कर दी थी. इतना ही नहीं, 5 फरवरी, 2016 को विवाह की तारीख भी निश्चित कर दी. यह बात आरजू को पता चली तो वह नवीन पर बहुत नाराज हुई. उस ने उसे धमकी दी, ‘‘मैं किसी और से तुम्हारी शादी कतई नहीं होने दूंगी.’’

आरजू की इस धमकी से नवीन डर गया. आरजू की धमकी वाली बात नवीन के घर वालों को पता चली तो वे भी परेशान हो उठे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि इस बला से कैसे छुटकारा पाया जाए. जैसेजैसे नवीन की शादी की तारीख नजदीक आ रही थी, उन की चिंता बढ़ती जा रही थी. नवीन को इस बात का डर था कि वह उस की शादी में पहुंच कर लड़की वालों के यहां कोई बवंडर न खड़ा कर दे. अब आरजू उस के लिए मुसीबत बन गई थी.

तमाम रिश्तेदारों और परिचितों को वह शादी के कार्ड दे चुका था. बाकी बचे लोगों को 2 फरवरी को उसे कार्ड बांटने और दोपहर को नांगल देवत से अपनी बहन को लाने जाना था. उसी दिन उस की आरजू से बात हुई तो उस ने उस पर शादी का दबाव ही नहीं डाला, बल्कि धमकी भी दी. उस की धमकी से परेशान नवीन ने उसी समय आरजू से हमेशा के लिए छुटकारा पाने का निर्णय ले लिया. 2 फरवरी को आरजू अपने नियत समय पर कालेज चली गई. उसी दौरान उस की नवीन से बात हुई तो उस ने 9, साढ़े 9 बजे उस से कालेज के गेट पर मिलने को कहा. पहला पीरियड अटैंड करने के बाद आरजू कालेज के गेट पर इंतजार कर रहे अपने प्रेमी नवीन के पास पहुंच गई.

आरजू को अपनी स्विफ्ट डिजायर कार में बिठा कर नवीन करोलबाग, धौलाकुआं, रिंगरोड से मुनीरका होते हुए देवली गांव पहुंचा. वहां पर नवीन की बुआ रहती हैं. कार को सड़क पर खड़ी कर के वह अकेला ही बुआ के यहां कार्ड देने गया. आरजू बारबार उस से यही कह रही थी कि तुम शादी के कार्ड बांट तो रहे हो, लेकिन मैं यह शादी होने नहीं दूंगी. नवीन ने तो कुछ और ही सोच रखा था, इसलिए उस की धमकी को उस ने गंभीरता से नहीं लिया.

साढ़े 12 बजे वह देवली से निकला. दोपहर तक उसे अपनी बहन के घर पहुंचना था. साढ़े 12 बजे उसे देवली में ही बज गए. बहन के यहां पहुंचने में उसे 2 घंटे और लगने थे, इसलिए वह कार को तेजी से चलाते हुए सैनिक फार्म, साकेत, महरौली होते हुए वसंतकुंज पहुंचा. वहां बाजार में बीकानेर की दुकान पर उस ने आरजू को गोलगप्पे खिलाए. सवा 2 बजे वह बहन के गांव के लिए निकला. इस बीच आरजू शादी की बात को ले कर उस से बहस करती रही.

नांगल देवत गांव से पहले केंद्रीय विद्यालय के पास सुनसान सड़क पर उस ने कार रोक दी. आरजू उसे बारबार धमकी दे रही थी. नवीन बेहद गुस्से में था. उस ने आरजू के गले में पड़ी चुन्नी के दोनों सिरे पकड़ कर कस दिए. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. गला दबाते समय आरजू की नाक और मुंह से थोड़ा खून तो निकला ही, उस का यूरिन भी निकल गया था.

आरजू के मरते ही नवीन के हाथपैर फूल गए. नाक व मुंह से निकले खून को आरजू के बैग से पोंछा. आरजू के पास 2 मोबाइल फोन थे. उस ने दोनों के सिमकार्ड निकाल लिए. इस के बाद उस की लाश कार की डिक्की में डाल दी. कार की अगली सीट पर निकले उस के यूरिन को उस ने पहले अखबार से, फिर बोतल के पानी से साफ किया.

बहन के यहां पहुंचने में उसे देर हो चुकी थी. वह बहन के यहां पहुंचा तो बहन अपने दोनों बच्चों के साथ तैयार बैठी थी. फटाफट उन्हें गाड़ी में बिठा कर अपने घर ले आया. हत्या करने के बाद भी वह बहन से सामान्य रूप से बातें करता आया था. चूंकि कार में लाश थी, इसलिए उस ने उस की चाबी अपने पास ही रखी. उस के दिमाग में एक ही बात घूम रही थी कि वह लाश को ठिकाने कहां और कैसे लगाए. नवीन का जो मकान बना हुआ था, उस के ग्राउंड फ्लोर पर पार्किंग है.

पहली मंजिल पर वह खुद रहता है. दूसरी मंजिल पर उस के मातापिता और दादी रहती हैं और तीसरे फ्लोर पर उस का बड़ा भाई संदीप पत्नी के साथ रहता है. 2 फरवरी को नवीन की शादी का दहेज का सामान आ गया था. वह सारा सामान ग्राउंड फ्लोर पर ही रखा हुआ था. 5 फरवरी को उस की बारात जानी थी. घर वालों ने रात को दहेज का सामान के कमरे में सेट कर दिया था. इस के बाद सभी अपनेअपने कमरों में जा कर सो गए. लेकिन नवीन को नींद नहीं आ रही थी. वह लाश को ठिकाने लगाने के बारे में ही सोच रहा था.

उस के मकान की रसोई और अन्य कमरों की वेंटिलेशन के लिए कुछ जगह खाली छोड़ी गई थी. इसे वे शाफ्ट कहते थे. लाश छिपाने के लिए नवीन को वही जगह उपयुक्त लगी. सुबह करीब 5 बजे नवीन उठा और अपनी कार की डिक्की से आरजू की लाश निकाल कर शाफ्ट में डाल दी. लाश के ऊपर उस एक पौलीथिन डाल दी. शाफ्ट में एग्जास्ट फैन लगा था. उस की हवा से कहीं पौलीथिन लाश से हट न जाए, उस के ऊपर घर में पड़ा टूटा कांच डाल दिया.

अपने ही घर में लाश को ठिकाने लगा कर नवीन को थोड़ी तसल्ली हुई. अगले दिन वह आरजू का पौकेट पर्स, मोबाइल फोन हैदरपुर बाईपास के नजदीक गहरे नाले में फेंक आया. उधर आरजू के मांबाप को जब पता चला कि 2 फरवरी को उन की बेटी नवीन के ही साथ गई थी तो कविता चौहान ने नवीन के भाई संदीप से बात की. कविता के दबाव पर संदीप और उस के पिता ने नवीन से बात की तो उस ने बताया कि उस ने आरजू की हत्या कर दी है और उस की लाश को जंगल में फेंक आया है. उस ने यह नहीं बताया कि लाश घर के शाफ्ट में रखी है.

कार में हत्या का सबूत न रह जाए, इस के लिए उस की धुलाई होनी जरूरी थी. दिल्ली के पीतमपुरा गांव में नवीन के रिश्ते के मामा कृष्ण रहते थे. संदीप ने फोन कर के आरजू की हत्या करने वाली बात उन्हें बताई तो उन्होंने तसल्ली दी कि चिंता न करें, आगे का काम वह देख लेगा. 5 फरवरी को नवीन के भात भरने की रस्म पूरी करने के लिए कृष्ण राजपुरा गांव पहुंचा तो वह अपने साथ अपने गांव ही के नवीन को भी साथ लाया था, वह उन का नजदीकी था. भात भरने की रस्म के बाद कृष्ण और नवीन उस की स्विफ्ट डिजायर कार पीतमपुरा ले गए. इसी चक्कर में वे उस की बारात तक नहीं गए. पीतमपुरा में उन्होंने कार की अंदरबाहर अच्छी तरह सफाई करा दी. 6 फरवरी को कार संदीप के घर पहुंचा दी.

शाफ्ट में रखी लाश की बदबू घर में फैलने लगी तो नवीन थोड़ीथोड़ी देर में परफ्यूम छिड़क देता था. परफ्यूम की बोतल खत्म हो गई तो वह बाजार से तेज सुगंध वाले परफ्यूम की 2 दरजन बोतलें खरीद लाया, जिन में से वह 17 बोतलें छिड़क चुका था. मेहमान और घर वाले यही समझ रहे थे कि नवीन यह सब शादी की खुशी में कर रहा है. सच्चाई तो तब सामने आई, जब पुलिस ने घर से आरजू की लाश बरामद की.

नवीन खत्री ने अपनी नईनवेली दुलहन के साथ हनीमून के लिए गोवा जाने का प्रोग्राम बनाया था. उस की 6 फरवरी की शाम को दिल्ली से गोवा की फ्लाइट थी. लेकिन वहां पहुंचने से पहले ही उस की फ्लाइट चली गई तो निराश हो कर वह घर लौट आया. इस के बाद किसी काम से वह आजादपुर गया था. रात 10 बजे वह वहां से बस से मौडल टाउन के लिए लौट रहा था, तभी पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

नवीन खत्री से पूछताछ के बाद पुलिस ने 12 फरवरी को नवीन खत्री के पिता राजकुमार, भाई संदीप खत्री, रिश्ते के मामा कृष्ण और नवीन को भादंवि की धारा 201, 202, 212 के तहत गिरफ्तार कर लिया. सभी को महानगर दंडाधिकारी श्री सुनील कुमार की कोर्ट में पेश किया गया. पुलिस ने राजकुमार, संदीप खत्री, कृष्ण और नवीन पर जमानती धाराएं लगाई थीं, इसलिए इन चारों को उसी समय कोर्ट से जमानत मिल गई, जबकि नवीन खत्री को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

नवीन खत्री के पिता राजकुमार हाल ही में जेल से पैरोल पर बाहर आया था. उस ने सन 2005 में गांव के ही अजय का मामूली बात पर कत्ल कर दिया था. हत्या के इस मामले में उस के परिवार के 6 सदस्य जेल गए थे. बहरहाल, कथा लिखने तक प्रेमिका की हत्या करने वाले नवीन खत्री की जमानत नहीं हुई थी. केस की जांच इंसपेक्टर सुधीर कुमार कर रहे हैं. Delhi News

—कथा पुलिस सूत्रों और आरजू के घर वालों के बयानों पर आधारित