Crime Stories: उज्बेक डांसर शाखनोजा का दुखत अंत

Crime Stories: उज्बेकिस्तान से टूरिस्ट वीजा पर लड़कियों का भारत आना कोई नई बात नहीं है. ऐसा तभी से हो रहा है जब से रूस टुकड़ों में बंटा. यहां आ कर ये लड़कियां देह के दलालों के चक्कर में फंस जाती हैं. ये दलाल इतने खूंखार हो सकते हैं कि किसी की जान ले लें, सोचा भी नहीं जा सकता.

25 सितंबर, 2015 की सुबह की बात है. समालखा, पानीपत की पुलिस को सूचना मिली कि जीटी रोड स्थित गांव करहंस में पूर्व मंत्री करतार सिंह भड़ाना की कोठी के पास वाले खेतों में जला हुआ एक बड़ा सूटकेस पड़ा है. मामला कुछ गंभीर लग रहा था, इसलिए डीएसपी गोरखपाल राणा पुलिस टीम के साथ मौके पर जा पहुंचे.

जला हुआ सूटकेस आजाद सिंह के खेतों में पड़ा था. पुलिस ने देखा तो उस में से एक विदेशी युवती की अधजली लाश बरामद हुई. इस का मतलब था कि उसे किसी दूसरी जगह कत्ल कर के वहां ला कर जलाया गया था. जले हुए सूटकेस और शव को अपने कब्जे में ले कर समालखा पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 302/201/23 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. यह मुकदमा खेत मालिक आजाद सिंह की तहरीर पर दर्ज हुआ.

इस तरह के केसों में तफ्तीश का सब से पहला चरण होता है शव की पहचान. लेकिन समालखा पुलिस के तमाम प्रयासों के बाद भी मृतका के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी. आखिरकार समालखा पुलिस चुप हो कर बैठ गई. दूसरी ओर उज्बेकिस्तान में 24 सितंबर, 2015 को ही इस घटना का सूत्रपात हो चुका था यानी लाश मिलने से काफी पहले.  24 सितंबर की रात करीब 10 बजे 60 वर्षीया शोखिस्ता डिनर से अभी फारिग हुई थीं कि उन के फोन की घंटी बज उठी. काल इंडिया से थी. फोन करने वाले ने उन से कहा, ‘‘मैं शाखनोजा का दोस्त बोल रहा हूं. मैं ने आप को यह बताने के लिए फोन किया है कि आप की बेटी गंभीर हादसे का शिकार हो गई है.’’

‘‘गंभीर हादसा, वह भी शाखनोजा के साथ? कैसा हादसा?’’ शोखिस्ता ने घबरा कर पूछा.

‘‘शाखनोजा का सरेशाम अपहरण कर लिया गया है.’’ फोन करने वाले ने बताया.

यह खबर सुन कर शोखिस्ता के लिए अपने पैरों पर खड़े रह पाना मुश्किल हो गया था. वह धम्म से वहीं जमीन पर बैठ गईं. काल अभी भी डिसकनेक्ट नहीं हुई थी. किसी तरह उन्होंने पूछा, ‘‘कब हुई किडनैपिंग?’’

‘‘अभी 2 मिनट पहले. मैं वहीं घटनास्थल के पास हूं. किडनैपिंग देखते ही मैं ने तुरंत आप का नंबर मिलाया है.’’

‘‘पुलिस को इनफौर्म नहीं किया?’’

‘‘अभी कर रहा हूं.’’ कहने के साथ ही दूसरी ओर से फोन कट गया.

शोखिस्ता के 5 बच्चों में शाखनोजा सब से छोटी थी. वह जब 2 बरस की थी, तभी उस के सिर से पिता का साया उठ चुका था. शोखिस्ता ने ही उसे मांबाप दोनों का प्यार दे कर पाला था. शोखिस्ता खुद एक कलाकार थीं. अपने बच्चों को भी वह कला के क्षेत्र में लाने के लिए प्रयासरत रहीं. उन्हें सब से ज्यादा प्रतिभा शाखनोजा में दिखाई देती थी. भारतीय गीतों पर वह बहुत अच्छा नृत्य करने लगी थी. शायद यही वजह थी कि वह अपनी कला का प्रदर्शन भारत में करने को लालायित रहती थी. भारत जैसे उस के सपनों का देश था. आखिर वह अपने सपनों के देश में जा ही पहुंची थी, जहां से अब उस के अपहृत हो जाने की खबर आई थी.

शोखिस्ता ने इस बारे में अपने कुछ रिश्तेदारों व परिचितों को बताया तो उन्होंने उन से उज्बेक एंबेसी से संपर्क करने को कहा. अगली सुबह ऐसा ही किया गया. एंबेसी अधिकारियों ने आगामी काररवाई के लिए शोखिस्ता की शिकायत दर्ज कर ली. शायद इसी का असर था कि दिल्ली पुलिस ने इस मामले में दिलचस्पी दिखाते हुए थाना कोटला मुबारकपुर में डीडीआर दर्ज कर के 26 सितंबर को एक टैक्सी ड्राइवर प्रीतम सिंह को पूछताछ के लिए थाने में तलब कर लिया.

प्रीतम सिंह अपनी टैक्सी से शाखनोजा को दिल्ली घुमाया करता था. उस ने पुलिस को बताया कि 24 सितंबर की सुबह शाखनोजा के बुलाने पर वह पहाड़गंज स्थित उस के होटल गया था. उस रोज शाखनोजा दिन भर उस के साथ रही थी और दिल्ली में कई जगहों पर गई थी. प्रीतम सिंह ने आगे बताया, ‘‘रात 10 बजे शाखनोजा मुझे साउथ एक्सटेंशन ले गई. एक जगह गाड़ी रुकवा कर उस ने मुझे इंतजार करने को कहा और वह सामने वाली दिशा में चली गई. वहां नीले रंग की इंडिका कार खड़ी थी, जिस के पास गुरविंदर उर्फ गगन अपनी पत्नी माशा व एक अन्य औरत नाज के साथ खड़ा था. ये तीनों शाखनोजा को पहले से जानते थे. मैं भी उन्हें जानता था. उन लोगों के अंदाज से लग रहा था कि उन्होंने शाखनोजा को बुला रखा था और वे वहां खड़े उसी का इंतजार कर रहे थे.’’

प्रीतम ने आगे अपना स्पष्टीकरण देते हुए कहा, ‘‘शाखनोजा के वहां पहुंचते ही वे लोग पहले तो उस से बहस करने लगे. फिर उसे जबरन गाड़ी में धकेलते हुए वहां से गाड़ी भगा ले गए.’’

‘‘चूंकि शाखनोजा ने किसी खतरे की बात मुझ से नहीं बताई थी. वैसे भी वे लोग पहले से एकदूसरे के परिचित थे. इस से मुझे लगा कि शायद वे आपस में हंसीठिठोली कर रहे होंगे. इसलिए मैं ने इस बारे में पुलिस को फोन कर के बताना जरूरी नहीं समझा. लेकिन अब मुझे अपनी गलती का अहसास हो रहा है. उन लोगों ने वाकई शाखनोजा का अपहरण कर लिया था.’’

भारत में पुलिस अपने ढंग से काम कर रही थी. उधर उज्बेकिस्तान में शोखिस्ता का दिल उसी दिन से बैठा जा रहा था, जिस दिन उन्हें शाखनोजा के अपहरण की खबर मिली थी. उन की एक बेटी जमिरा पूर्व फ्लाइट अटेंडेंट थी और इन दिनों ताशकंद में रह रही थी. भारत में बहन का अपहरण हो जाने की बात सुन कर वह मां के पास उज्बेकिस्तान चली आई थी. जमिरा के आते ही शोखिस्ता ने उस से दो टूक कहा, ‘‘जैसे भी हो, मुझे इंडिया ले चलो. शाखनोजा को ले कर मेरे मन में बहुत बुरे खयाल आ रहे हैं.’’

फिर उन्होंने अपने कुछ राज साझा करते हुए जमिरा से कहा, ‘‘शाखनोजा ने इंडिया में अपना एक बौयफ्रैंड बना लिया था, जिस से उसे गर्भ ठहर गया था. मेरे हिसाब से उसे अब तक 6 सप्ताह की गर्भवती होना चाहिए.’’

जमिरा अपनी मां की फिक्र को समझ रही थी. उस ने प्रयास कर के वीजा वगैरह लगवाया और मां को ले कर 5 अक्टूबर को दिल्ली पहुंच गई. शोखिस्ता की सब से बड़ी बेटी नोदिरा अमेरिका में अपने पति व जवान बेटे के साथ रहती थी. वह अकेली वहीं से उड़ान भर कर मां के पास सीधे दिल्ली आ पहुंची. दिल्ली में इन लोगों ने उज्बेक एंबेसी के अफसरों से ले कर पुलिस कमिश्नर भीमसेन बस्सी तक से मुलाकात कर के शाखनोजा का पता लगाने की गुहार लगाई. शाखनोजा का अपहरण अभी तक रहस्य ही बना हुआ था. पुलिस का कहना था कि टैक्सी ड्राइवर प्रीतम के बयान के आधार पर गगन, माशा व नाज को भी थाने बुलवा कर उन से पूछताछ की गई थी. मगर इस पूछताछ में कुछ निकल नहीं पाया था.

अपने बयानों में इन्होंने यही बताया था कि उस रात शाखनोजा मस्ती के मूड में अपनी खुशी से उन के साथ गई थी. फिर एक जगह गाड़ी से उतर कर एक अन्य नौजवान के साथ उस की बड़ी सी गाड़ी में बैठ कर चली गई थी. इस के बाद वह उन से नहीं मिली थी. उन का आरोप था कि प्रीतम नाहक बढ़ाचढ़ा कर बयान दे रहा था. अगर उस ने हम लोगों को शाखनोजा को अपने साथ जबरन ले जाते देखा था तो उस ने शोर क्यों नहीं मचाया? इस मामले को उस ने इतनी सहजता से क्यों लिया? 100 नंबर पर फोन कर के पुलिस को सूचित क्यों नहीं किया? आखिर वह कोई अनपढ़ गंवार न हो कर दिल्ली जैसे महानगर का टैक्सी ड्राइवर था.

इन लोगों का कहना था कि किन्हीं कारणों से प्रीतम से उन की नहीं बनती. इसी वजह से वह उन्हें परेशान करने के लिए ऐसी बातें कर रहा है, वरना शाखनोजा के गायब होने से तो हम खुद परेशान हैं. वह हर महफिल में रौनक जमाने वाली हमारी खास साथी थी. पुलिस ने इन लोगों के अलावा अन्य कई लोगों को भी संदेह के दायरे में रख कर पूछताछ की थी. लेकिन शाखनोजा के बारे में कहीं से कोई जानकारी नहीं मिल पाई थी.

शाखनोजा की मां व दोनों बहनों ने तब तक दिल्ली में ही रुके रहने का फैसला कर लिया, जब तक उस का पता न चल जाए. इस के लिए उन्होंने एक फ्लैट किराए पर ले लिया. इंसाफ की चाहत लिए एक दिन वे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से भी मिलीं. दिल्ली पुलिस के अधिकारियों से तो वे रोजाना ही मिल रही थीं. इन लोगों द्वारा शाखनोजा के बारे में टुकड़ों में बताई गई बातों से उस का परिचय कुछ इस तरह से सामने आया. घर में छोटी होने की वजह से शाखनोजा सब की लाडली थी. उस ने ताशकंद में रह कर स्कूली शिक्षा हासिल की थी, जहां अच्छे एकैडमिक ग्रेड हासिल करने के साथ वह डांस प्रतियोगिताओं में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी.

दरअसल, शाखनोजा का जन्म ऐसे कलाकारों के परिवार में हुआ था, जहां सभी को गीतसंगीत का शौक था. उस के पिता जानेमाने संगीतकार थे, लेकिन अज्ञात बीमारी के चलते वह तब दुनिया को अलविदा कह गए थे, जब शाखनोजा केवल 2 साल की थी. लेकिन शोखिस्ता ने अपनी इस बेटी को कभी भी पिता की कमी महसूस नहीं होने दी थी.

शाखनोजा छुटपन से ही डांस विधा की ओर अग्रसर होने लगी थी. उस का शौक देखते हुए उस का दाखिला एक अच्छे डांस स्कूल में करवा दिया गया था, जहां उस ने बैले डांस से ले कर भारतीय फिल्मों के गीतों तक पर डांस करना सीखा. देखतेदेखते उस ने इंडियन फिल्मी गीतों पर डांस करने में महारत हासिल कर ली. माधुरी दीक्षित अभिनीत ‘देवदास’ के गीत ‘मार डाला…’ पर तो वह इतना बढि़या डांस किया करती थी कि देखने वाले को एक बार विश्वास ही नहीं होता था कि डांस करने वाली लड़की भारतीय न हो कर विदेशी होगी. शायद इन नृत्यों की वजह से ही उसे भारत और यहां के कल्चर से प्यार हो गया था.

शाखनोजा सब से पहले एक एंबेसी इवेंट में भाग लेने के लिए सन 2008 में भारत आई थी. उन दिनों वह उज्बेकिस्तान में कोरियोग्राफी का एक विशेष क्रैश कोर्स कर रही थी. इस कोर्स को बीच में ही छोड़ कर वह इंडिया आ गई थी, जहां की संस्कृति ने उसे इस कदर मोह लिया था कि उस का मन यहीं बसने को बेचैन हो उठा था. इस के बाद वह टूरिस्ट वीजा पर अकसर इंडिया आने लगी थी. इस से उसे दिल्ली की काफी जानकारी हो गई थी. वह जब भी भारत आती थी तो वह पहाड़गंज के होटलों में या फिर किशनगढ़ के अपार्टमेंट्स में रुकती थी. किशनगढ़ में उस की मुलाकात नाज से हुई थी. बाद में दोनों रूममेट बन कर रहने लगी थीं.

नाज का पूरा नाम था एटाजहानोवा कुपालबायवेना. वह भी उज्बेकिस्तान की रहने वाली थी. नाज के माध्यम से शाखनोजा की दिल्ली में रहने वाले तमाम उज्बेकियों से जानपहचान हो गई थी. वह उन लोगों के पारिवारिक समारोहों में खूब बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने लगी थी. इसी सिलसिले में उस की मुलाकात एक अन्य उज्बेक युवती माशा व उस के भारतीय पति गगन से हुई थी.

शाखनोजा करीब रोजाना ही अपनी मां को फोन कर के एकएक बात के बारे में बताया करती थी. शोखिस्ता उस से मिलने एकदो बार दिल्ली भी आई थीं और बेटी के इधर के कई दोस्तों से मिली थीं. उन्होंने महसूस किया था कि यहां उन की बेटी ने अपनी अच्छी जगह बना ली है. उस की प्रशंसा करने वालों की कमी नहीं है. शाखनोजा ने तब मां को बताया था कि यहां के सांस्कृतिक समारोहों के सहारे वह जल्दी ही भारतीय फिल्मों में भी काम हासिल कर लेगी. शोखिस्ता बेटी की सफलताओं से खुश हो कर उस के उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हुई खुशीखुशी उज्बेकिस्तान लौटी थीं.

कुछ समय बाद एक दिन शाखनोजा ने फोन कर के उन्हें बताया कि उस के डांस प्रोग्राम इस कदर पसंद किए जाने लगे हैं कि वह मांग को पूरा करने में खुद को असमर्थ महसूस कर रही है. कभीकभी मोटे पैसों का लालच दिए जाने के बावजूद उसे कार्यक्रम छोड़ने पड़ते हैं. ऐसे ही एक बार शोखिस्ता को बेटी की ओर से इंडिया में बौयफ्रैंड बनाने और उस से गर्भ ठहरने का समाचार मिला. इस से शोखिस्ता को लगा कि शाखनोजा अब वहीं अपना घर बसा कर भारत में रह जाएगी. वैसे उन्हें इस बात का पहले से ही अहसास था कि शाखनोजा की जान इंडिया में अटकी रहती है.

फोन पर ऐसी ही बातों के बीच एक दिन शाखनोजा ने मां को कुछ ऐसा बताया, जिसे सुन कर वह परेशान हो गईं. शाखनोजा ने उन्हें बताया कि 16 अगस्त, 2015 को हुई एक पार्टी में वह इतना नाची कि थक कर चूर हो गई. डांस खत्म होने पर जब वह वहां बिछे एक काउच पर बैठी तो किसी ने उसे पीने को कोक का गिलास दिया, जिसे वह एक ही सांस में पी गई.  उसे पीने के बाद उस पर बेहोशी छाने लगी. उस के बाद जब वह चेतना में लौटी तो उस ने खुद को एक दूसरी जगह पर पाया. उस के शरीर पर कपड़े भी पहले वाले नहीं थे. वहां 2 लड़कियां थीं, जिन्होंने उसे बताया कि तंग कपड़ों की वजह से उस की तबीयत खराब हो गई थी. इसीलिए उसे यहां ला कर उस के उन कपड़ों को उतार कर ये ढीले कपड़े पहनाए गए हैं.

इस घटना के बाद से शाखनोजा थोड़ा परेशान रहने लगी थी. उस की बातें सुन कर शोखिस्ता भी बेचैन हो जाती थीं. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि इस मामले में वह बेटी से क्या कहें? कुछ कहने से वह और ज्यादा चिंता में पड़ सकती थी. इसलिए उन्होंने शाखनोजा से इतना ही कहा कि आगे से कहीं इतना न नाचे कि तबीयत खराब हो जाए. उन्होंने बेटी को भले ही चेता दिया था, लेकिन उन्हें उस की चिंता सताती रहती थी कि अकेली रहते हुए वह कहीं किसी षडयंत्र का शिकार न हो जाए. इस के बाद शोखिस्ता इंडिया जा कर मामले की तह में पहुंचने का विचार करने लगी थीं.

इस घटना को घटे अभी सवा महीना ही बीता था कि 24 सितंबर की रात उन्हें बेटी के अपहरण की सूचना ने झकझोर कर रख दिया. वह तुरंत अपनी दूसरी बेटियों के साथ दिल्ली पहुंचीं और बेटी की तलाश में जुट गईं. पुलिस पर वह लगातार दबाव डालती रहीं कि इस मामले को वह हलके में न ले कर उन लोगों से सख्ती से पूछताछ करे, जिन पर उसे शक है. शोखिस्ता का कहना था कि इस मामले को पुलिस हल्के में ले कर संदिग्ध लोगों से गंभीरता से पूछताछ नहीं कर रही है. आखिर पुलिस ने अपना रवैया बदला और संदिग्ध लोगों को फिर से थाने बुला कर सख्ती से पूछताछ शुरू की.

दूसरे लोगों के अलावा जब गगन से भी सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि उस ने शाखनोजा को ही नहीं, नाज को भी मौत के घाट उतार कर उस की भी लाश जला दी है. यह सुन कर पुलिस दंग रह गई. इस के बाद पुलिस ने गगन को 6 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले कर गहराई से पूछताछ की. पूछताछ में उस ने जो कुछ बताया, उस से इन हत्याओं का जो राज सामने आया, वह कुछ इस तरह से था. गगन एक बड़ा सैक्स रैकेट चलाता था. उस के नेटवर्क में देसी ही नहीं, विदेशी लड़कियों की भी खूब डिमांड थी. सोनू पंजाबन के लिए काम कर चुके गगन के नेटवर्क में काफी रशियन लड़कियां थीं, जिन्हें वह दिल्ली, एनसीआर के अलावा चंडीगढ़, जयपुर और मुंबई की रेव पार्टियों में भेजता था.

इस के लिए वह रूस में सैक्स रैकेट से जुड़े लोगों से संपर्क कर के लड़कियों को टूरिस्ट वीजा पर 3 महीने के लिए भारत बुलाता था. भारत में रशियन लड़कियों की डिमांड पूरी करने के लिए सैक्स रैकेट से जुड़े लोग सीआईएस (कौमनवैल्थ औफ इंडिपेंडेंट स्टेट्स) से जुड़े देशों जैसे उज्बेकिस्तान व कजाकिस्तान की गरीब लड़कियों को अच्छी जिंदगी का लालच दे कर टूरिस्ट वीजा पर भारत ला कर देह धंधे के कारोबार से जोड़ देते थे.

गगन और उस की पत्नी माशा के इस धंधे की पार्टनर नाज उज्बेकिस्तान की रहने वाली थी. माशा लोगों को ब्लैकमेल करने में माहिर थी. नाज पहले खुद अपनी देह बेचती थी, उम्र ढलने पर उस की डिमांड कम हुई तो वह दूसरी लड़कियों से धंधा करवा कर उन की कमाई से कमीशन लेने लगी. वह ज्यादातर उज्बेक लड़कियों को ही पटाने की कोशिश करती थी. शाखनोजा को देखते ही नाज उस पर लट्टू हो गई थी. उसे उस ने देहधंधे में उतारने की कोशिश भी की. इस कोशिश में जब उसे लगा कि वह ऐसीवैसी लड़कियों में नहीं है, तब उस ने उस की रूममेट बन कर उसे अपने जाल में फंसाने की कोशिश की.

अमीर एवं प्रतिष्ठित परिवार से संबंध रखने वाली शाखनोजा एक प्रतिभावान कलाकार थी. उस की कला की कदर भी बढ़ रही थी. अपने नृत्य कार्यक्रमों से उसे अच्छा पैसा मिलने लगा था. नाज के माध्यम से ही वह माशा और उस के पति गगन के संपर्क में आई. उसे इन की असलियत मालूम नहीं थी. अलबत्ता ये सभी उस से उम्र में बड़े थे, इस वजह से वह इन लोगों की बहुत इज्जत करती थी. शाखनोजा स्वभाव से थोड़ा भोली थी, जिस का फायदा उठाते हुए ये लोग उस से पैसे उधार मांगने लगे, जो बढ़तेबढ़ते 8 लाख रुपए तक पहुंच गए.

एक दिन शाखनोजा ने इन से अपने पैसे वापस मांगे तो नाराज हो कर इन लोगों ने उसे धमकाने के लिए 24 सितंबर, 2015 की रात धोखे से साउथ एक्सटेंशन में एक जगह बुला लिया. वहां थोड़ाबहुत हड़का कर इन लोगों ने उसे अपनी गाड़ी में जबरदस्ती बैठा लिया और चले गए. कार गगन चला रहा था. माशा उस की बगल वाली सीट पर बैठी थी. पिछली सीट पर नाज लगातार शाखनोजा की पिटाई करते हुए उस का गला दबा कर उसे डरा रही थी. उसी बीच उबड़खाबड़ जगह पर कार थोड़ा उछली तो नाज के हाथों का दबाव बढ़ गया, जिस की वजह से शाखनोजा की मौत हो गई.

ये लोग शाखनोजा को मारना नहीं चाहते थे, लेकिन जब वह मर गई तो उस की लाश को दिल्ली में फेंकना खतरे से खाली नहीं था. उस की लाश को ठिकाने लगाने के लिए इन्होंने एक सूटकेस का इंतजाम किया और उस में लाश को रख कर रात ही में पानीपत के कस्बा समालखा में एक जगह उस सूटकेस और लाश पर पैट्रोल छिड़क कर आग लगा दी. इस तरह इन लोगों ने शाखनोजा से छुटकारा पा लिया. इस घटना से गगन और माशा जरा भी नहीं घबराए, लेकिन नाज के दिलोदिमाग पर इस का गहरा असर पड़ा. उसे पकड़े जाने का भय सताने लगा. हालांकि कुछ दिनों बाद एक बार पुलिस उस से पूछताछ भी कर चुकी थी. तब गगन उस के लिए ढाल बन गया था.

इस के बाद गगन को लगा कि यह डरपोक औरत खुद तो फंसेगी ही, अपने साथ उन्हें भी फंसाएगी. रहीसही कसर शाखनोजा के उस पत्र ने पूरी कर दी, जिस में उस ने अपनी जिंदगी से जुड़ी तमाम घटनाओं का जिक्र करते हुए एंबेसी को लिखा था. यह पत्र पुलिस को बाद में शाखनोजा के सामान से मिला था. खैर, नाज को अपने लिए खतरा बनते देख गगन ने 5 अक्टूबर, 2015 को उसे भी गला घोंट कर मार दिया और उस की लाश को उत्तर प्रदेश के हापुड़ ले जा कर एक सुनसान जगह में पैट्रोल डाल कर जला दिया.

पूछताछ के बाद गगन को उन दोनों जगहों पर ले जाया गया, जहां उस ने लाशें जलाई थीं. वहां के थानों में अधजली लाशें मिलने के मामले दर्ज थे. बरामदगी के नाम पर स्थानीय पुलिस को इन महिलाओं की अस्थियां ही मिल पाई थीं. शाखनोजा की पहचान के लिए पुलिस ने उस की हड्डी एवं उस की मां शोखिस्ता का डीएनए टैस्ट करवाया है. मामले का खुलासा होने पर माशा भूमिगत हो गई थी. उस से पूछताछ के लिए पुलिस उस की तलाश कर रही थी. गगन से शाखनोजा की कुछ आपत्तिजनक तसवीरें मिली हैं. ये तसवीरें उस ने उसे ब्लैकमेल करने के लिए 16 अगस्त को तब खींची थीं, जब एक नृत्य आयोजन के बाद उसे बेहोशी की दवा मिला कोला पिलाया गया था. यह षडयंत्र गगन का रचा था.

बहरहाल, जमिरा का कहना है कि उस की बहन को बैले डांसर कह कर उस की प्रतिभा का अपमान न किया जाए. वह एक अच्छी नर्तकी थी, जो अपनी कला को निखारने के लिए इंडिया आई थी. लेकिन यहां आ कर उसे बदनामी और निर्मम मौत मिली. Crime Stories

Crime Story Hindi: अंधेरा आश्रम – साक्षी की इज्ज्त से खेलता बाबा

Crime Story Hindi: गिरधारी लाल कसबे के बड़े कारोबारी थे. उन की पत्नी सुशीला देवी घर में पंडितों को भोज, पूजापाठ करवा कर आएदिन उन्हें दक्षिणा देती रहती थीं. वे आंख मींच कर पंडितों और बाबाओं पर भरोसा करती थीं.

वे आएदिन व्रतउद्यापन कराती थीं, सो उन के घर में दूसरी सहेलियों का आनाजाना भी लगा रहता था. हर उद्यापन के पहले शहर के बड़े साड़ी स्टोर से आदमी नए फैशन की साडि़यां ले कर घर आता और सुशीला देवी खटाखट 15 एकजैसी साड़ियां बांटने के लिए निकाल लेतीं. फिर एक भारी साड़ी वे खुद के लिए पसंद करतीं और बहू इंद्रा को भी पुकारतीं और कहतीं कि तुम भी एक अच्छी साड़ी पसंद कर लो.

सुशीला देवी के घर में एक नामी बाबाजी का भी आनाजाना था. उन के आशीर्वाद के बिना तो घर का पत्ता भी नहीं हिलता था. कुछ भी नया काम हो, बाबाजी उस का मुहूर्त निकालते और हवन करते, फिर उस काम की शुरुआत होती.

सुशीला देवी बाबाजी के आश्रम में जातीं और सेवा कर के आतीं. उन का विश्वास था कि घर में हर तरक्की बाबाजी के आशीर्वाद से होती है.

हकीकत यह थी कि सुशीला देवी व उन के जैसे ही दूसरे भक्तों की मदद से बाबाजी का आश्रम हराभरा हो रहा था. जब सुशीला देवी सेवा के लिए जातीं, तो अपनी बेटी साक्षी को भी साथ ले जातीं.

आश्रम में वे कहतीं, ‘‘बाबाजी के पैर छू कर आशीर्वाद लो बेटी.’’

बाबाजी भी साक्षी को आशीर्वाद देते और कहते, ‘‘देखना, हमारी साक्षी बेटी किसी राजा भोज को ब्याही जाएगी.’’

शकुंतला देवी बाबाजी के मुंह से शुभ वचन सुन कर धन्य हो जातीं.

साक्षी निकली भी बहुत खूबसूरत. 4-5 साल बाद वह कालेज जाने लगी थी. जब इम्तिहान का समय आता, बाबाजी घर आते, साक्षी को आशीर्वाद देते. साक्षी भी उन की शख्सीयत से बहुत प्रभावित थी. कभीकभी अगर शकुंतला देवी सेवा के लिए न जा पातीं, तो वे साक्षी को भेज देतीं.

सुशीला देवी की बहू इंद्रा पेट से हुई. सुशीला देवी तो बाबाजी के चरण पकड़ कर बैठ गईं और कहने लगीं, ‘‘कुछ ऐसा कीजिए बाबाजी, पहली बार में ही पोते का मुंह देखूं. पोता होते ही आप के पूरे आश्रम में एसी लगवाऊंगी.’’

बाबाजी ने बहू को पुकारा, ‘‘बेटी इंद्रा, जरा इधर आओ तो…’’

इंद्रा वहां आई. बाबाजी ने कुछ मंत्र बुदबुदाया और बहू को आशीर्वाद दिया.

पोते की आस लिए सुशीला देवी जीजान से अपनी एकलौती बहू की सेवा में जुटी रहीं. सुबह उठते ही मक्खनमिश्री मिला कर बहू को दे देतीं और आंखें मटका कर कहतीं, ‘‘रोज खाया करो, मक्खन सा गोरा बेटा पैदा होगा.’’

एक दिन शकुंतला देवी ने साक्षी से कहा, ‘‘बेटी, आज बाबाजी के आश्रम में तुम चली जाओ, मुझे कुछ काम है. और देखो, रसोई में सूखे मेवे रखे हैं, उन्हें ले जाना नहीं भूलना. बाबाजी के आशीर्वाद से पोता ही होगा… देख लेना तुम लोग.’’

साक्षी भी मां के कहे मुताबिक बाबाजी की सेवा में जुटी रहती थी. बहू इंद्रा के दिन चढ़ रहे थे और सुशीला देवी की चिंता बढ़ती जा रही थी. उधर साक्षी पर बाबाजी की सेवा का काम बढ़ता जा रहा था. वह आश्रम में जा कर बाबाजी का बिस्तर लगाती, उन की खड़ाऊं जगह पर रखती, उन की किताबें जमाती, यह सब कर के वह अपनेआप को धन्य समझती.

साक्षी सारीसारी रात बाबाजी के आश्रम में बिताती. सुशीला देवी कुछ पूछतीं, तो वह कहती, ‘‘मां, आज आश्रम में अखंड मंत्र जाप था. सो, उठ कर बीच में नहीं आ सकती थी. मुंहअंधेरे बाबाजी को हवन करना था, इसलिए उस की तैयारी कर रही थी और देर हुई तो वहीं सो गई.’’

सुशीला देवी भी चेहरे पर शांत भाव लाते हुए कहतीं, ‘‘हां बेटी, अच्छा ही है. हमारे घर में जो अच्छी आमदनी हो रही है न, सब बाबाजी की कृपा से ही है. अब बस इसे संभालने वाला एक वारिस और आ जाए, तो मैं बद्री नारायण के दर्शन कर आऊं.’’

साक्षी घर से सलवारकुरता पहन चुन्नी ओढ़ कर जाती और सांझ ढलते ही छोटेछोटे कपड़े पहन किसी अप्सरा का रूप धारण कर लेती. वह अपनी जवानी का बाबाजी के साथ भरपूर मजा ले रही थी.

अंधा क्या चाहे दो आंखें. सो, बाबाजी दिन में घर से लाए मेवों का भोग लगाते और रात में साक्षी का.

कभीकभी सुशीला देवी कहतीं, ‘‘बेटी साक्षी, तुम बहुत आश्रम में बहुत रहने लगी हो. अपनी पढ़ाई पर भी जरा ध्यान दो.’’

साक्षी कहती, ‘‘मां, आप चिंता न कीजिए. मैं खुद ध्यान दे रही हूं अपनी पढ़ाई पर.’’

इधर बाबाजी जब कभी घर आते, तो सुशीला देवी से कहते, ‘‘साक्षी बेटी पर यह साल भारी है, थोड़ा आश्रम में मंत्र जपेगी और हवन करेगी, तो दोष मुक्त होगी.’’

साक्षी तो बाबाजी से इतनी सम्मोहित हो चुकी थी कि घर में कुछ न बताती. जो चल रहा था, उस में वह बहुत खुश थी. कभीकभी साक्षी की सहेलियां उसे पार्टी के लिए बुलातीं, तो साक्षी बाबाजी से कहती, ‘‘बाबाजी, आज रात को मैं न आ सकूंगी.’’

बाबाजी कहते, ‘‘अब तुम बिन हमारा जीवन असंभव है. तुम भी नहीं चाहोगी कि यह राज खुल जाए. एक रात की भी छुट्टी नहीं तुम्हें.’’

साक्षी बाबाजी के डर के मारे जिद न करती और अपनी सहेलियों से कह देती कि घर में काम ज्यादा है, वह पार्टी में न आ सकेगी.

जल्दी ही सुशीला देवी के घर में खुशखबरी आ गई कि उन की बहू इंद्रा ने बेटे को जन्म दिया है.

सुशीला देवी तो खुशी के मारे आसमान में उड़ने लगी थीं. घर में बड़े ही जोरशोर से जश्न मनाया गया और बाबाजी का आश्रम सुशीला देवी की कृपा से चमचमा उठा.

अब पोते के साथ सुशीला देवी और ज्यादा बिजी हो गईं और उधर साक्षी बाबाजी के आश्रम में. वह बाबाजी के खिलाफ एक शब्द भी सुनना पसंद नहीं करती थी.

अब कभीकभी सुशीला देवी कहतीं, ‘‘बेटी साक्षी, अब तुम आश्रम जाना छोड़ दो. पोता हो गया, मैं तो गंगा नहा ली. अब मैं फिर से बाबाजी की सेवा में जुट जाती हूं.’’

साक्षी कहती, ‘‘मां, कहां तुम इस उम्र में आश्रम में दौड़भाग करोगी? अब तुम पोता संभालो, बाबाजी की सेवा में मैं कोई कमी न आने दूंगी.’’

यह सुन कर सुशीला देवी के चेहरे पर बड़ी सी मुसकराहट बिखर जाती. वे मन ही मन सोचतीं, ‘आजकल लड़कियां इतना डिस्को में जाती हैं, अच्छा है साक्षी को यह हवा नहीं लगी. क्या फायदा 4 बौयफ्रैंड्स बना लेगी और वहां नशा करेगी. इस से अच्छा है कि आश्रम में ही सेवा करे, कुछ पुण्य ही कमाएगी.’

सुशीला देवी निश्चिंत हो कर एक तीर्थ कर आईं. उन्हें आए अभी 3-4 दिन ही बीते थे कि अस्पताल से फोन आया, ‘आप की बेटी अस्पताल में भरती है. आप जल्दी यहां आइए.’

सुशीला देवी ने जैसे ही फोन सुना, उन के तो हाथपैर फूल गए. एक बार को तो उन्हें कुछ समझ ही नहीं आया कि वे क्या करें, लेकिन अपनेआप को सहज किया, फिर झट से ड्राइवर को गाड़ी निकालने को कहा.

वहां जा कर जब उन्हें सारी बात मालूम हुई, तो उन्हें कानों सुने पर विश्वास ही न हुआ. मालूम हुआ कि साक्षी अस्पताल में बच्चा गिरवाने आई थी और उस दौरान उस की अंदर की कोई नस फट गई, जिस के चलते उस के शरीर से बहुत खून बह गया और उस की जान को खतरा हो गया.

सुशीला देवी तो समझ ही नहीं पाईं कि यह कब और कैसे हो गया. साक्षी अभी बेहोशी की हालत में थी.

जब साक्षी को होश आया, तो सुशीला देवी ने उस के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, ‘‘यह कैसे हो गया बेटी?’’

साक्षी सिर्फ इतना ही कह पाई, ‘‘बाबाजी…’’

यह सुन कर सुशीला देवी के तो जैसे तनबदन में आग लग गई. वे कहने लगीं, ‘‘क्या बाबाजी ने जबरदस्ती की तुझ से?’’

साक्षी बोली, ‘‘नहीं मां, सब मेरी मरजी से. मुझे नहीं मालूम कि क्या हो गया है, लेकिन बाबाजी का साथ मुझे अच्छा लगता है.’’

उस की बात सुन कर सुशीला देवी का गुस्सा बेकाबू हो गया. फिर भी अपनी व साक्षी की इज्जत की खातिर अपनेआप को शांत कर वे बोलीं, ‘‘बेटी, क्या सोचा और क्या पाया?’’

खैर, अस्पताल में तो उन्हें मुंह बंद रखने में ही समझदारी नजर आई. साक्षी को अस्पताल से डिस्चार्ज करवा कर वे घर लाईं.

सेठ गिरधारी लाल ने जब सचाई सुनी, तो उन के पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई. पर अब किया भी क्या जा सकता था. आखिर इस सब में साक्षी भी तो शामिल थी.

हां, सुशीला देवी का बेटा रमेश कहने लगा, ‘‘देखा मां, बाबाजी की अंधभक्ति का नतीजा. मैं ने तुम्हें कितनी बार समझाया था कि घर में जो कुछ है, वह पिताजी व मेरी मेहनत का फल है. बाबाजी के आशीर्वाद से कुछ नहीं होता है, लेकिन मां, तुम्हें तो उन पर इतना विश्वास था कि तुम मेरी एक भी बात ध्यान से सुनती तक नहीं.’’

भाईभाभी, सुशीला देवी व गिरधारी लाल ने मिल कर साक्षी को बड़े प्यार से समझाया, ताकि वह बाबाजी के सम्मोहन से बाहर निकल सके.

फिर सुशीला देवी का बेटा रमेश व बहू इंद्रा साक्षी को एक काउंसलर के पास ले गए, ताकि वह उसे समझाबुझा कर उस के बीते कल से छुटकारा दिला सके. कुछ महीने के लिए सुशीला देवी उसे अपनी बहन के घर ले गईं. कुछ समय में साक्षी फिर से सामान्य हो गई थी.

अब सुशीला देवी समझ गई थीं कि बाबाजी ने उस की अंधभक्ति का इस्तेमाल किया और उस के विश्वास का फायदा उठा कर उसी की बेटी का सम्मोहन कर लिया था. लेकिन अब सुशीला देवी ने बाबाजी के लिए अपने घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दिए थे.

बाबाजी ने भी सोचा कि शांत रहने में ही भलाई है, वरना कहीं गिरधारी लाल आगबबूला हो गए, तो पुलिस में रिपोर्ट कर देंगे और उन की पोलपट्टी खुल जाएगी. उन्होंने जो आश्रम में हवनकीर्तन के नाम पर कारोबार किया हुआ है और बाबाजी का मुखौटा पहना है, वह जनता के सामने न उतर जाए. कहीं उन्हें जेल की हवा न खानी पड़ जाए. Crime Story Hindi

Hindi Stories: मोबाइल पर फिल्म – सूरज ने कैसे दिखाई धन्नो को फिल्म

Hindi Stories: ऐसे टुकुरटुकुर क्या देख रहा है?’’ अपना दुपट्टा संभालते हुए धन्नो ने जैसे ही पूछा, तो एक पल के लिए सूरज सकपका गया.

‘‘तुझे देख रहा हूं. सच में क्या मस्त लग रही है तू,’’ तुरंत संभलते हुए सूरज ने जवाब दिया. धन्नो के बदन से उस की नजरें हट ही नहीं रही थीं.

‘‘चल हट, मुझे जाने दे. न खुद काम करता है और न ही मुझे काम करने देता है…’’ मुंह बनाते हुए धन्नो वहां से निकल गई.

सूरज अब भी उसे देख रहा था. वह धन्नो के पूरे बदन का मुआयना कर चुका था.

‘‘एक बार यह मिल जाए, तो मजा आ जाए…’’ सूरज के मुंह से निकला.

सूरज की अकसर धन्नो से टक्कर हो ही जाती थी. कभी रास्ते में, तो कभी खेतखलिहान में. दोनों में बातें भी होतीं. लेकिन सूरज की नीयत एक ही रहती… बस एक बार धन्नो राजी हो जाए,

फिर तो…

धन्नो को पाने के लिए सूरज हर तरह के हथकंडे अपनाने को तैयार था.

‘‘तू कुछ कामधंधा क्यों नहीं करता?’’ एक दोपहर धन्नो ने सूरज से पूछा.

‘‘बस, तू हां कर दे. तेरे साथ घर बसाने की सोच रहा हूं,’’ सूरज ने बात छेड़ी, तो धन्नो मचल उठी.

‘‘तू सच कह रहा है,’’ धन्नो ने खुशी में उछलते हुए सूरज के हाथ पर अपना हाथ रख दिया.

सूरज को तो जैसे करंट मार गया. वह भी मौका खोना नहीं चाहता था. उस ने झट से उस का हाथ पकड़ लिया और बोला, ‘‘सच धन्नो, मैं तुम्हें अपनी घरवाली बनाना चाहता हूं. तू तो जानती है कि मेरा बाप सरपंच है. नौकरी चाहूं, तो आज ही मिल जाएगी.’’

सूरज ने भरोसा दिया, तो धन्नो पूछ बैठी, ‘‘तो नौकरी क्यों नहीं करते? फिर मेरे मामा से मेरा हाथ मांग लेना. कोई मना नहीं करेगा.’’

सूरज ने हां में सिर हिलाया. धन्नो उस के इतना करीब थी कि वह अपनी सुधबुध खोने लगा.

‘‘यहां कोई नहीं है. आराम से लेट कर बातें करते हैं,’’ सूरज ने इधरउधर देखते हुए कहा.

‘‘मैं सब जानती हूं. तुम्हारे दिमाग का क्या भरोसा, कुछ गड़बड़ कर बैठे तो…’’ धन्नो ने तपाक से जवाब दिया, ‘‘ब्याह से पहले यह सब ठीक नहीं… मरद जात का क्या भरोसा?’’ इतना कहते हुए वह तीर की मानिंद निकल गई. जातेजाते उस ने सूरज के हाथ को कस कर दबा दिया था. सूरज इसे इशारा समझने लगा.

‘‘फिर निकल गई…’’ सूरज को गुस्सा आ गया. उसे पूरा भरोसा था कि आज उस की मुराद पूरी होगी. लेकिन धन्नो उसे गच्चा दे कर निकल गई.

अब तो सूरज के दिलोदिमाग पर धन्नो का नशा बोलने लगा. कभी उस का कसा हुआ बदन, तो कभी उस की हंसी उसे पागल किए जा रही थी. वैसे तो वह सपने में कई बार धन्नो को पा चुका था, लेकिन हकीकत में उस की यह हसरत अभी बाकी थी.

सरपंच मोहन सिंह का बेटा होने के चलते सूरज के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. सो, उस ने एक कीमती मोबाइल फोन खरीदा और उस में खूब ब्लू फिल्में भरवा दीं. उन्हें देखदेख कर धन्नो के साथ वैसे ही करने के ख्वाब देखने लगा.

‘‘अरे, तू इतने दिन कहां था?’’ धन्नो ने पूछा. उस दिन हैंडपंप के पास पानी भरते समय दोनों की मुलाकात हो गई.

‘‘मैं नौकरी ढूंढ़ रहा था. अब नौकरी मिल गई है. अगले हफ्ते से ड्यूटी पर जाना है,’’ सूरज ने कुछ सोच कर कहा, ‘‘अब तो ब्याह के लिए हां कर दे.’’

‘‘वाह… वाह,’’ नौकरी की बात सुनते ही धन्नो उस से लिपट गई. सूरज की भावनाएं उफान मारने लगीं. उस ने तुरंत उसे अपनी बांहों में भर लिया.

‘‘हां कर दे. और कितना तरसाएगी,’’ सूरज ने उस की आंखों में आंखें डाल

कर पूछा.

‘‘तू गले में माला डाल दे… मांग भर दे, फिर जो चाहे करना.’’

सूरज उसे मनाने की जीतोड़ कोशिश करने लगा.

‘‘अरे वाह, इतना बड़ा मोबाइल फोन,’’ मोबाइल फोन पर नजर पड़ते ही धन्नो के मुंह से निकला, ‘‘क्या इस में सिनेमा है? गानेवाने हैं?’’

‘‘बहुत सिनेमा हैं. तू देखेगी, तो चल उस झोंपड़े में चलते हैं. जितना सिनेमा देखना है, देख लेना,’’ सूरज धन्नो के मांसल बदन को देखते हुए बोला, तो

वह उस के काले मन के इरादे नहीं भांप सकी.

धन्नो राजी हो गई. सूरज ने पहले तो उसे कुछ हिंदी फिल्मों के गाने दिखाए, फिर अपने मनसूबों को पूरा करने के लिए ब्लू फिल्में दिखाने लगा.

‘‘ये कितनी गंदी फिल्में हैं. मुझे नहीं देखनी,’’ धन्नो मुंह फेरते हुए बोली.

‘‘अरे सुन तो… अब अपने मरद से क्या शरमाना? मैं तुम से शादी करूंगा, तो ये सब तो करना ही होगा न, नहीं तो हमारे बच्चे कैसे होंगे?’’ उसे अपनी बाजुओं में भरते हुए सूरज बोला.

‘‘वह तो ठीक है, लेकिन शादी करोगे न? नहीं तो मामा मेरी चमड़ी उतार देगा,’’ नरम पड़ते हुए धन्नो बोली.

‘‘मैं कसम खाता हूं. अब जल्दी से घरवाली की तरह बन जा और चुपचाप सबकुछ उतार कर लेट जा,’’ इतना कहते हुए सूरज अपनी शर्ट के बटन खोलने लगा. उस के भरोसे में बंधी धन्नो विरोध न कर सकी.

‘‘तू सच में बहुत मस्त है…’’ आधा घंटे बाद सूरज बोला, ‘‘किसी को कुछ मत बताना. ले, यह दवा खा ले. कोई शक नहीं करेगा.’’

‘‘लेकिन, मेरे मामा से कब बात करोगे?’’ धन्नो ने पूछा, तो सूरज की आंखें गुस्से से लाल हो गईं.

‘‘देख, मजा मत खराब कर. मुझे एक बार चाहिए था. अब यह सब भूल जा. तेरा रास्ता अलग, मेरा अलग,’’ जातेजाते सूरज ने कहा, तो धन्नो पर जैसे बिजली टूट गई.

अब धन्नो गुमसुम सी रहने लगी. किसी बात में उस का मन ही नहीं लगता.

‘‘अरे, तेरे कपड़े पर ये खून के दाग कैसे?’’ एक दिन मामी ने पूछा, तो धन्नो को जैसे सांप सूंघ गया. ‘‘पिछले हफ्ते ही तेरा मासिक हुआ था, फिर…’’

धन्नो फूटफूट कर रोने लगी. सारी बातें सुन कर मामी का चेहरा सफेद पड़ गया. बात सरपंच मोहन सिंह के पास पहुंची. पंचायत बैठी.

मोहन सिंह के कड़क तेवर को सभी जानते थे. उस के लिए किसी को उठवाना कोई बड़ी बात नहीं थी.

‘‘तो तुम्हारा कहना है कि सूरज ने तुम्हारे साथ जबरदस्ती की है?’’ सरपंच के आदमी ने धन्नो से पूछा.

‘‘नहीं, सूरज ने कहा था कि वह मुझ से ब्याह करेगा, इसलिए पहले…’’

‘‘नहींनहीं, मैं ने ऐसा कोई वादा नहीं किया था…’’ सूरज ने बीच में टोका, ‘‘यह झूठ बोल रही है.’’

‘‘मैं भी तुम से शादी करूंगा, तो क्या तू मेरे साथ भी सोएगी,’’ एक मोटे से आदमी ने चुटकी ली.

‘‘तू है ही धंधेवाली…’’ भीड़ से एक आवाज आई.

‘‘चुप करो,’’ मोहन सिंह अपनी कुरसी से उठा, तो वहां खामोशी छा गई. वह सीधा धन्नो के पास पहुंचा.

‘‘ऐ छोकरी, क्या सच में मेरे सूरज ने तुझ से घर बसाने का वादा किया था?’’ उस ने धन्नो से जानना चाहा.

मोहन सिंह के सामने अच्छेअच्छों की बोलती बंद हो जाती थी, लेकिन न जाने क्यों धन्नो न तो डरी और न ही उस की जबान लड़खड़ाई.

‘‘हां, उस ने मुझे घरवाली बनाने की कसम खाई थी, तभी तो मैं राजी…’’ यह सुनते ही सरपंच का सिर झुक गया. भीड़ अब भी शांत थी.

‘‘बापू, तू इस की बातों में न आ…’’ सूरज धन्नो को मारने के लिए दौड़ा.

‘‘चुप रह. शर्म नहीं आती अपनी घरवाली के बारे में ऐसी बातें करते हुए. खबरदार, अब धन्नो के बारे में कोई एक शब्द कहा तो… यह हमारे घर की बहू है. अब सभी जाओ. अगले लगन में हम सूरज और धन्नो का ब्याह रचाएंगे.’’

धन्नो मोहन सिंह के पैरों पर गिर पड़ी. उस के मुंह से इतना ही निकला, ‘‘बापू, तुम ने मुझे बचा लिया.’’

Rajasthan Crime: हत्यारा प्रेमी – आशिक क्यों बना कातिल

Rajasthan Crime: राजस्थान के जिला नागौर में एक कस्बा है. मेड़ता सिटी. इसी कस्बे में कभी मीराबाई जन्मी थीं. मीरा का मंदिर भी यहां बना हुआ है. मेड़ता सिटी की गांधी कालोनी में दीपक उर्फ दीपू रहता था. दीपक के पिता बंशीलाल डिस्काम कंपनी में नौकरी करते थे. उन की पोस्टिंग सातलावास जीएसएस पर थी. पिता की सरकारी नौकरी होने की वजह से घर में किसी तरह का अभाव नहीं था. जिस से दीपक भी खूब बनठन कर रहता था.

मेड़ता सिटी में नायकों की ढाणी की रहने वाली इंद्रा नाम की युवती से उसे प्यार हो गया था. दीपक चाहता था कि वह अपनी प्रेमिका पर दिल खोल कर पैसे खर्च करे पर उसे घर से जेब खर्च के जो पैसे मिलते थे उस से उस का ही खर्चा बड़ी मुश्किल से चल पाता था. चाह कर भी वह प्रेमिका इंद्रा को उस की पसंद का सामान नहीं दिलवा पाता था.

तब दीपक ने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और वह पिता के साथ डिस्काम में ही काम करने लगा. वहां काम करने से उसे अच्छी आय होने लगी. अपनी कमाई के दम पर वह इंद्रा को अपनी मोटरसाइकिल पर घुमाताफिराता. अपनी कमाई का अधिकांश भाग वह प्रेमिका इंद्रा पर ही खर्च करने लगा.

इंद्रा एक विधवा युवती थी. दरअसल इंद्रा की शादी करीब 3 साल पहले बीकानेर में हुई थी पर शादी के कुछ दिन बाद ही उस के पति की अचानक मौत हो गई. पति की मौत का उसे बड़ा सदमा लगा.

ऊपर से ससुराल वाले उसे ताने देने लगे कि वह डायन है. घर में आते ही उस ने पति को डस लिया. ससुराल में दिए जाने वाले तानों से वह और ज्यादा दुखी हो गई और फिर एक दिन अपने मायके आ गई.

मायके में रह कर वह पति की यादों को भुलाने की कोशिश करने लगी. धीरेधीरे उस का जीवन सामान्य होता गया. वह बाजार आदि भी आनेजाने लगी. उसी दौरान उस की मुलाकात दीपक उर्फ दीपू से हुई. बाद उन की फोन पर भी बात होने लगी. बातों मुलाकातों से बात आगे बढ़ते हुए प्यार तक पहुंच गई. इस के बाद तो वह दीपक के साथ मोटरसाइकिल पर घूमनेफिरने लगी.

यह काम इंद्रा के घर वालों को पता नहीं थी. उन्हें तो इस बात की चिंता होने लगी कि विधवा होने के कारण बेटी का पहाड़ सा जीवन कैसे कटेगा. वह उस के लिए लड़का तलाशने लगे.

आसोप कस्बे में एक रिश्तेदार के माध्यम से पंचाराम नाम के युवक से शादी की बात बन गई. फिर नाताप्रथा के तहत इंद्रा की पंचाराम से शादी कर दी. यह करीब 8 माह पहले की बात है.

दूसरी शादी के बाद इंद्रा ससुराल चली गई तो दीपक बुझा सा रहने लगा. उस के बिना उस का मन नहीं लग रहा था. वह कभीकभी इंद्रा से फोन पर बात कर लेता था. कुछ दिनों बाद इंद्रा आसोप से मायके आई तो वह दीपक से पहले की तरह मिलने लगी. दूसरे पति पंचाराम से ज्यादा वह दीपक को चाहती थी. क्योंकि वह उसे हर तरह से खुश रखता था.

society

मार्च 2017 में दीपक के घर वालों ने अपने ही समाज की लड़की से दीपक की शादी कर दी. दीपक ने अपनी शादी की बात इंद्रा से काफी दिनों तक छिपाए रखी पर इंद्रा को किसी तरह अपने प्रेमी की शादी की बात पता चल गई. यह बात इंद्रा को ठीक नहीं लगी. तब इंद्रा ने दीपक से बातचीत कम कर दी.

जब दीपक उसे मिलने के लिए बुलाता तो वह बेमन से उस से मिलने जाती थी. अक्तूबर, 2017 के तीसरे हफ्ते में दीपक और इंद्रा की मुलाकात हुई तो इंद्रा ने कहा, ‘‘दीपू, ससुराल से पति का बुलावा आ रहा है. मैं 2-4 दिनों में ही चली जाऊंगी.’’

‘‘इंद्रा प्लीज, ऐसा मत करो. तुम चली जाओगी तो मैं तुम्हारे बिना कैसे जी पाऊंगा. याद है जब तुम शादी के बाद यहां से चली गई थी तो मेरा मन नहीं लग रहा था.’’ दीपक बोला.

‘‘मेरी दूसरी शादी हुई है. मैं पति को खोना नहीं चाहती. मुझे माफ करना. मुझे ससुराल जाना ही होगा.’’ इंद्रा ने कहा.

दीपक उसे बारबार ससुराल जाने को मना करता रहा. पर वह जाने की जिद करती रही. इसी बात पर दोनों में काफी देर तक बहस होती रही. इस के बाद दोनों ही मुंह फुला कर अपनेअपने घर चले गए.

उस रोज 27 अक्तूबर, 2017 का दिन था. मेड़ता सिटी थाने में किसी व्यक्ति ने सूचना दी कि एक युवती की अधजली लाश जोधपुर रोड पर स्थित जय गुरुदेव नगर कालोनी के सुनसान इलाके में पड़ी है. सुबहसुबह लाश मिलने की खबर से थाने में हलचल मच गई.

थानाप्रभारी अमराराम बिश्नोई पुलिस टीम के साथ सूचना में बताए पते पर पहुंच गए. घटनास्थल के आसपास भीड़ जमा थी. पुलिस ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया, मगर अधजले शव के पास ऐसी कोई चीज नहीं मिली जिस से मृतका की पहचान हो पाती.

थानाप्रभारी की सूचना पर सीओ राजेंद्र प्रसाद दिवाकर भी मौके पर पहुंच गए थे. उन्होंने भी मौके का निरीक्षण कर वहां खड़े लोगों से पूछताछ की. कोई भी उस शव की शिनाख्त नहीं कर सका.

नायकों की ढाणी का रहने वाला रामलाल नायक भी लाश मिलने की खबर पा कर जय गुरुदेव नगर कालोनी पहुंच गया. उस की बेटी  इंद्रा भी 26 अक्तूबर से लापता थी. झुलसी हुई लाश को वह भी नहीं पहचान सका. लाश की शिनाख्त न होने पर पुलिस ने जरूरी काररवाई कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

मरने वाली युवती की शिनाख्त हुए बिना जांच आगे बढ़नी संभव नहीं थी. सीओ राजेंद्र प्रसाद दिवाकर और थानाप्रभारी अमराराम बिश्नोई इस बात पर विचारविमर्श करने लगे कि लाश की शिनाख्त कैसे हो. उसी समय उन के दिमाग में आइडिया आया कि यदि मृतका के अंगूठे के निशान ले कर उन की जांच कराई जाए तो उस की पहचान हो सकती है क्योंकि आधार कार्ड बनवाते समय भी फिंगर प्रिंट लिए जाते हैं. हो सकता है कि इस युवती का आधार कार्ड बना हुआ हो.

पुलिस ने आधार कार्ड मशीन में मृतका के अंगूठे का निशान लिया तो पता चला कि मृतका का आधार कार्ड बना हुआ है. इस जांच से यह पता चल गया कि मृतका का नाम इंद्रा पुत्री रामलाल नायक है. लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने रामलाल नायक को सिटी थाने बुलाया और उस की तहरीर पर अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

पुलिस ने रामलाल नायक से पूछताछ की तो उस ने बताया कि इंद्रा करीब डेढ़ महीने पहले गांधी कालोनी निवासी अपने दोस्त दीपक के साथ बिना कुछ बताए कहीं चली गई थी. उन दिनों गणपति उत्सव चल रहा था. वह 7-8 दिन बाद वापस घर लौट आई थी. इस बार भी सोचा था कि उसी के साथ कहीं चली गई होगी. मगर उस का मोबाइल बंद होने के कारण उन्हें शंका हुई.

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रामलाल ने शक जताया कि इंद्रा की हत्या दीपक ने ही की होगी. रामलाल से पुलिस को पता चला कि इंद्रा के पास मोबाइल फोन रहता था जो लाश के पास नहीं मिला था. अब दीपक के मिलने पर ही मृतका के फोन के बारे में पता चल सकता था.

28 अक्तूबर को डा. बलदेव सिहाग, डा. अल्पना गुप्ता और डा. भूपेंद्र कुड़ी के 3 सदस्यीय मैडिकल बोर्ड ने इंद्रा के शव का पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम के बाद शव उस के परिजनों को सौंप दिया गया.

केस को सुलझाने के लिए सीओ राजेंद्र प्रसाद दिवाकर के नेतृत्व में एक पुलिस टीम  बनाई गई. टीम में थानाप्रभारी (मेड़ता) अमराराम बिश्नोई, थानाप्रभारी (कुचेरा) महावीर प्रसाद, हैडकांस्टेबल भंवराराम, कांस्टेबल हरदीन, सूखाराम, अकरम, अनीस, हरीश, साबिर खान और महिला कांस्टेबल लक्ष्मी को शामिल किया गया. दीपक की तलाश में पुलिस ने इधरउधर छापेमारी की. तब कहीं 5 दिन बाद पहली नवंबर, 2017 को दीपक उर्फ दीपू पुलिस के हत्थे चढ़ पाया.

पुलिस ने थाने ला कर जब उस से इंद्रा की हत्या के बारे में पूछा तो वह थोड़ी देर इधरउधर की बातें करता रहा लेकिन थोड़ी सख्ती के बाद उस ने इंद्रा की हत्या करने का जुर्म स्वीकार कर लिया.

पुलिस ने उसी रोज दीपक को मेड़ता सिटी कोर्ट में पेश कर के 5 दिन के रिमांड पर ले लिया और कड़ी पूछताछ की. पूछताछ में इंद्रा मर्डर की जो कहानी प्रकाश में आई वह इस प्रकार निकली.

दीपक और इंद्रा एकदूजे से बेइंतहा मोहब्बत करते थे. लेकिन उन के संबंधों में दरार तब आई जब इंद्रा को दीपक की शादी होने की जानकारी मिली. इंद्रा को दीपक की यह बात बहुत बुरी लगी कि उस ने शादी करने की बात उस से छिपाए क्यों रखी. इंद्रा को यह महसूस हुआ कि दीपक उसे छल रहा है. इसलिए उस ने दीपक से संबंध खत्म कर पति के पास जाने का फैसला कर लिया. यही बात उस ने दीपक को साफसाफ बता दी.

दीपक ने उसी रोज तय कर लिया था कि अगर इंद्रा ने ससुराल जाने का कार्यक्रम नहीं बदला तो वह उसे जान से मार डालेगा. इंद्रा को यह खबर नहीं थी कि दीपक उस की जान लेने पर आमादा है. जब 26 अक्तूबर को दीपक ने इंद्रा को फोन कर के बुलाया तो उसे पता नहीं था कि प्रेमी के रूप में उसे मौत बुला रही है.

उसे 27 अक्तूबर को ससुराल जाना था इसलिए सोचा कि जाने से पहले एक बार दीपक से मिल ले. इसलिए उस के बुलावे पर वह उस से मिलने पहुंच गई. इंद्रा ने जब उसे बताया कि वह कल ससुराल जाएगी तो दीपक ने ससुराल जाने से उसे फिर मना किया. वह नहीं मानी तो वह उसे बहलाफुसला कर मोटरसाइकिल से सातलावास डिस्काम जीएसएस पर बने कमरे में ले गया.

ससुराल जाने के मुद्दे पर फिर इंद्रा से बहस हुई. दीपक को गुस्सा आ गया. उस ने पहले से बनाई योजनानुसार इंद्रा की चुन्नी उसी के गले में लपेट कर उस की हत्या कर दी. गला घोंटने से इंद्रा की आंखें बाहर निकल गईं और कुछ ही देर में उस की मौत हो गई.

इस के बाद उस की लाश को एक बोरे में डाला और बाइक पर रख कर उसे मेड़ता सिटी से बाहर जोधपुर रोड पर जय गुरुदेव कालोनी में सुनसान जगह पर ले गया.

इस के बाद अपनी मोटरसाइकिल से पैट्रोल निकाल कर रात के अंधेरे में लाश को आग लगा दी. उस ने सोचा कि अब शव की शिनाख्त नहीं हो पाएगी और वह बच जाएगा. लेकिन आधार मशीन पर मृतका के अंगूठे का निशान लेते ही लाश की शिनाख्त हो गई और फिर पुलिस दीपक तक पहुंच गई.

पुलिस ने दीपक की निशानदेही पर उस की बाइक भी जब्त कर ली, जो इंद्रा की लाश ठिकाने लगाने में प्रयुक्त की गई थी. पूछताछ पूरी होने पर दीपक उर्फ दीपू को 5 नवंबर, 2017 को पुन: कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. मामले की जांच थानाप्रभारी अमराराम बिश्नोई कर रहे थे. कथा लिखे जाने तक दीपक की जमानत नहीं हुई थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story: गलतफहमी – बेकसूर परिवार को मिली सजा

Crime Story: भीकाजी बोर्डे का घर औरंगाबाद के चिखनठाना की चौधरी कालोनी में था.बोर्डे परिवार में कुल जमा 3 सदस्य थे. भीकाजी बोर्डे, पत्नी कमलाबाई और बेटा भगवान दिनकर बोर्डे. भीकाजी की एक बेटी भी थी विमल, जिस की वह शादी कर चुके थे. विमल 2 बच्चों की मां थी और पति से चल रहे किसी विवाद की वजह से मायके में रह रही थी. उस के दोनों बच्चे पति के पास रह रहे थे.

23 वर्षीय अमोल बोर्डे भगवान दिनकर बोर्डे का दोस्त था. उस का घर बोर्डे परिवार के घर से कुछ दूरी पर था. दोनों हमउम्र थे. दोस्ती के नाते दोनों का एकदूसरे के घर आनाजाना था.

जब से भीकाजी की बेटी विमल मायके आई थी, तब से अमोल भीकाजी के घर कुछ ज्यादा ही आने लगा था. उसे इस बात की जानकारी थी कि विमल और उस के पति के बीच तनातनी चल रही है और वह हालफिलहाल पति के पास जाने वाली नहीं है. दरअसल, अमोल अभी अविवाहित था, इसलिए दोस्त की बहन को दूसरी नजरों से देखने लगा था.

भाई का दोस्त होने के नाते विमल उसे भी भाई समझती थी. वह बात भी उसी अंदाज में करती थी. वैसे भी विमल बातूनी लड़की थी. जब विमल और अमोल के बीच बातों का सिलसिला जुड़ा तो अमोल ने बातों के कुछ शब्दों को ऐसा रंग देना शुरू कर दिया कि उस की चाहत नजर आए. उस के ऐसे शब्दों पर या तो विमल ने ध्यान नहीं दिया या दिया भी तो उस की बातों को गंभीरता से नहीं लिया. अमोल ने मीठीमीठी बातों से विमल को शीशे में उतारने की काफी कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली. बहुत कुछ समझ कर भी विमल अमोल को ऐसा कुछ नहीं कहना चाहती थी जिस से भाई भगवान दिनकर और अमोल की दोस्ती में दरार पड़े. लेकिन वह कब तक यह सब सहन करती.

आखिर एक दिन सब्र का प्याला छलक ही गया. हुआ यह कि उस दिन विमल घर पर अकेली थी. अमोल को पता चला तो वह मौके का फायदा उठाने की सोच कर उस के घर पहुंच गया. विमल ने उसे बैठने के लिए कुरसी दी और उस के लिए चाय बनाने चली गई. उस समय वह घर में अकेली थी. अमोल ने अपनी मनमरजी करने के लिए इस मौके को उचित समझा. वापस लौट कर विमल ने चाय का प्याला अमोल को दिया तो उसी समय अमोल ने उस का हाथ पकड़ लिया. उस की इस हरकत पर विमल चौंक गई. उस की नीयत में खोट देख कर उसे गुस्सा आ गया. उस ने अपना हाथ छुड़ाने के बाद चाय का प्याला मेज पर रखा, फिर उसे जम कर लताड़ा और उसी समय घर से भगा दिया.

अमोल को इस बात की उम्मीद भी नहीं थी कि विमल उस की इतनी बेइज्जती करेगी. विमल के हंसहंस कर बात करने से वह तो यही सोचता था कि विमल भी उसे चाहती है. इसी का फायदा उठाने के लिए वह आया भी था. लेकिन उसे उलटे विमल के गुस्से का सामना करना पड़ा. बेइज्जती सह कर वह उस समय वहां से चला गया. घर पहुंचने के बाद भी विमल द्वारा की गई बेइज्जती अमोल के दिमाग में घूमती रही. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि इस स्थिति में वह क्या करे.

उधर शाम के समय विमल के मातापिता और भाई घर लौटे तो विमल ने अमोल की हरकत मां कमलाबाई को बता दी. कमलाबाई को बहुत गुस्सा आया. अमोल उस के बेटे का दोस्त था इसलिए वह उसे भी अपने घर का सदस्य समझती थी, लेकिन उस की सोच इतनी घटिया थी, वह नहीं समझ पाई थी. घर की बदनामी को देखते हुए कमलाबाई ने इस बात का शोरशराबा तो नहीं किया लेकिन बेटी को उस से सतर्क रहने की सलाह जरूर दे दी.

अगले दिन अमोल को अपने दोस्त यानी विमल के भाई भगवान दिनकर बोर्डे की याद आई. वह उस के साथ घूमता और गप्पें मारता था, इसलिए उस का मन दोस्त से मिलने के लिए कर रहा था. विमल ने जिस तरह उसे लताड़ा था, वह बात भी उस के दिमाग में घूम रही थी. अमोल यह समझ रहा था कि उस ने विमल के साथ जो हरकत की थी, उस के बारे में विमल अपने घर वालों से चर्चा तक नहीं करेगी, क्योंकि ज्यादातर लड़कियां इस तरह की बातें शुरुआत में अपने तक ही छिपा कर रखती हैं. मातापिता को ये बातें बताने में उन्हें शर्म महसूस होती है.

यही सोच कर अमोल बिना किसी डर के अपने दोस्त भगवान दिनकर बोर्डे से मिलने उस के घर पहुंच गया. विमल अमोल की हरकत मां को पहले ही बता चुकी थी. लिहाजा विमल की मां कमलाबाई ने अमोल को आड़े हाथों लिया. उस ने भी अमोल को जम कर खरीखोटी सुनाई. इतना ही नहीं, उसे बेइज्जत करते हुए धमकी दी कि वह इसी समय वहां से चला जाए और आइंदा उस के घर में कदम न रखे.

बेइज्जती सह कर अमोल वहां से उलटे पांव लौट आया. इस अपमान की ज्वाला उस के सीने में दहकने लगी थी. उस ने तय कर लिया कि विमल और उस की मां ने उस की जो बेइज्जती की है, वह उस का बदला जरूर लेगा. बदले की भावना उस के मन में घर कर गई. बात 25 सितंबर, 2019 की है. अमोल अपने घर पर ही था. उस के दिमाग में बेइज्जती वाली बातें ही घूम रही थीं. वह सोच रहा था कि इस अपमान का बदला कैसे ले. रात के 8 बजे थे. उस समय अमोल को भूख लगी थी. उस ने अपनी मां से खाना परोसने को कहा. मां खाना परोस कर ले आई.

निवाला तोड़ कर वह खाने को हुआ, तभी उस के दिमाग में बदला लेने वाली बात फिर आ गई. अमोल ने खाना छोड़ दिया और किचन की तरफ चल दिया. उस की मां ने बिना खाना खाए उठने की वजह पूछी, लेकिन वह कुछ नहीं बोला. अमोल ने किचन से चाकू उठा कर अपनी जेब में रख लिया. उस की मां पूछती रही, लेकिन उस ने कोई जवाब नहीं दिया. वह घर के बाहर निकल गया. मां पूछने के लिए उस के पीछेपीछे आ रही थी, लेकिन अमोल ने घर का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया ताकि मां घर से बाहर न आए. उस की मां, पिता और भांजी घर में ही बंद रह गए. वे समझ नहीं पा रहे थे कि अमोल ने ऐसा क्यों किया.

अपने घर से करीब 70 मीटर दूर वह सीधे विमल के घर में घुस गया. घर में घुसते ही उस ने मुख्य दरवाजा बंद कर दिया. उस समय वह बहुत गुस्से में था. विमल के मांबाप ने जब अमोल को अपने घर में देखा तो उन्होंने उस से वहां आने की वजह पूछी. तभी अमोल ने जेब में रखा चाकू निकाल लिया और अपने दोस्त दिनकर बोर्डे की तरफ बढ़ा. अमोल को गुस्से में देख कर भगवान बोर्डे अपनी जान बचाने के लिए भागा. अमोल ने दौड़ कर भगवान को पकड़ लिया और उस की गरदन पर चाकू से वार कर दिया. तभी भगवान के मातापिता भी वहां आ गए. बेटे के खून के छींटें उन के ऊपर भी गए. दिनकर भगवान बोर्डे वहीं गिर गया और कुछ ही देर में उस की मृत्यु हो गई.

इस के बाद अमोल बोर्डे ने दिनकर की मां कमलाबाई पर हमला किया. फिर उस ने उस के पिता को भी निशाने पर ले लिया. इस तरह उस ने परिवार के 3 लोगों की हत्या कर दी. इस दौरान विमल दरवाजा खोल कर बाहर भाग गई थी. विमल ने यह बात पड़ोसियों को बताई तो वे घरों से बाहर निकल आए. 3 हत्याएं करने के बाद अमोल खून सना चाकू ले कर घर से बाहर निकला तो कई लोग वहां खड़े थे. लेकिन अमोल की आंखों में तैर रहे गुस्से और खून सने चाकू को देख कर कोई भी कुछ कह नहीं सका और वह वहां से चला गया.

किसी ने इस तिहरे हत्याकांड की खबर पुलिस को दे दी थी. सूचना मिलने पर एमआईडीसी सिडको थाने के प्रभारी सुरेंद्र मोलाले थोड़ी देर में दिनकर बोर्डे के घर पहुंच गए. तभी लोगों ने पुलिस को अमोल बोर्डे के बारे में जानकारी दी कि वह चौराहे पर खड़ा है. यह सूचना मिलने के बाद पुलिस ने चौराहे पर खड़े अमोल बोर्डे को हिरासत में ले लिया. थानाप्रभारी सुरेंद्र मोलाले ने अभियुक्त अमोल से ट्रिपल मर्डर के बारे में पूछताछ की तो उस ने सारी कहानी बता दी.

उस ने कहा कि उस ने अपनी बेइज्जती का बदला लेने के लिए इस वारदात को अंजाम दिया. अमोल बोर्डे से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. Crime Story

Social Story: विचित्र संयोग

Social Story: आनंदी धनंजय और आनंद रोहिणी की मुलाकात एक अजीब संयोग था. लेकिन इस का परिणाम इतना भयंकर होगा, इस की किसी ने कल्पना नहीं की थी.  रविवार के सुबह सात बजे के लगभग धनवानों का इलाका सेक्टर-15ए अभी सोया पड़ा था. चारों ओर शांति फैली थी. वीआईपी इलाका होने के कारण यहां सवेरा यों भी जरा देर से उतरता है, क्योंकि यहां रात का आलम ही कुछ और होता है. चहलपहल थी तो सिर्फ सेक्टर-2 के पीछे के इलाके में. सवेरे 4 बजे से ही यहां मछलियों का बाजार लग जाता है. ट्रौली रिक्शे और टैंपो रुक रहे थे और उन के साथ ही मछलियों के ढेर लग रहे थे. मछलियां लाने के लिए यहां टैंपो और ट्रौली रिक्शों की लाइन लगी थी.

इसी बाजार के पास फाइन चिकन एंड मीट शौप है, जहां सवेरे 4 बजे से ही बकरों को काटने और उन्हें टांगने का काम शुरू हो जाता है. इस इलाके के लोग इसी दुकान से गोश्त खरीदना पसंद करते थे. सामने स्थित डीटीसी बस डिपो से बसें बाहर निकलने लगी थीं. डिपो के एक ओर नया बास गांव है, जिस में स्थानीय लोगों के मकान हैं. डिपो के सामने पुलिस चौकी है, जिस के बाहर 2-3 सिपाही बेंच पर बैठ कर गप्पें मार रहे थे और चौकी के अंदर बैठे सबइंसपेक्टर आशीष शर्मा झपकियां ले रहे थे.

गांव के पीछे के मयूरकुंज की अलकनंदा इमारत की पांचवी मंजिल के एक फ्लैट में एक सुखी जोड़ा रहता था. यह फ्लैट सेक्टर-62 की एक सौफ्टवेयर कंपनी में काम करने वाले धनंजय विश्वास का था. फ्लैट में धनंजय अपनी पत्नी रोहिणी के साथ रहते थे. रोहिणी दिल्ली में पंजाब नेशनल बैंक में प्रोबेशनरी औफिसर थी. वह आगरा की रहने वाली थी. 2 वर्ष पूर्व धनंजय से उस का विवाह हुआ था. इस से पहले धनंजय दिल्ली में अपने मातापिता के साथ रहता था. विवाह के बाद उस के सासससुर ने यह फ्लैट खरीदवा दिया था. रोहिणी वाकई रोहिणी नक्षत्र के समान सुंदर थी. धनंजय और उस की जोड़ी खूब फबती थी.

धनंजय के औफिस का समय सवेरे 9 बजे से शाम 6 बजे तक था. वह औफिस अपनी कार से जाता था. लेकिन लौटने का उस का कोई समय निश्चित नहीं था. रोहिणी शाम साढ़े छह बजे तक घर लौट आती थी. इन हालात में पतिपत्नी शाम का खाना साथ ही खाया करते थे. हां, छुट्टी के दिनों दोनों मिल कर हसंतेखेलते खाना बनाते थे. धनंजय हर रविवार को सेक्टर-2 में लगने वाली मछली बाजार से मछलियां और फाइन चिकन एंड मीट शौप की दुकान से मीट लाता था. पहली जून की सुबह 6 बजे फ्लैट की घंटी बजने पर दूध देने वाले गनपत से दूध ले कर धनंजय फटाफट तैयार हो कर मीट लेने के लिए निकल गया. रोहिणी को वह सोती छोड़ गया था.

वह कार ले कर निकलने लगा तो  चौकीदार ने हंसते हुए पूछा, ‘‘साहब, आज रविवार है न, मीट लेने जा रहे हो?’’

धनंजय ने हंस कर कार आगे बढ़ा दी थी. फाइन चिकन एंड मीट शौप पर आ कर उस ने 2 किलोग्राम मीट और एक किलोग्राम कीमा लिया. इस के बाद उस ने रास्ते में मछली और नाश्ते के लिए अंडे, ब्रेड, मक्खन और 4 पैकेट सिगरेट लिए. लगभग साढ़े 7 बजे वह फ्लैट पर लौट आया. वाचमैन नीचे ही था, साफसफाई करने वाले अपने काम में लगे थे. ऊपर पहुंच कर उस ने ‘लैच की’ से दरवाजा खोला. दरवाजे के अंदर अखबार पड़ा था, जिसे नरेश पेपर वाला दरवाजे के नीचे से अंदर सरका गया था. अखबार उठाते हुए उस ने रोहिणी को आवाज लगाई, ‘‘उठो भई, मैं तो बाजार से लौट भी आया.’’

धनंजय के फ्लैट में सुखसुविधा के सभी आधुनिक सामान मौजूद थे. उस ने डाइनिंग टेबल पर सारा सामान रख कर 2 बड़ी प्लेटें उठाईं. एक में उस ने गोश्त और दूसरे में मछली निकाली. फ्लैट के हौल में शानदार दरी बिछी थी और कीमती सोफे सजे थे. एक कोने में टीवी और डीवीडी प्लेयर रखा था. दूसरे कोने में शो केस के नीचे टेलीफोन रखा था, वहीं मेज पर लैपटौप था. पीछे की ओर गैलरी थी, जहां से दिल्ली की ओर जाने वाली सड़क के साथसाथ दूर तक फैली हरियाली और नोएडा गेट दिखाई देता था. इस हौल के बाईं ओर बैडरूम का दरवाजा था. बैडरूम में डबल बैड, गोदरेज की 2 अलमारियां और एक ड्रेसिंग टेबल था. बैडरूम से लग कर ही एक छोटा गलियारा था. गलियारे में ही टौयलेट और बाथरूम था.

सारा सामान डाइनिंग टेबल पर रखने के बाद बैडरूम में घुसते ही धनंजय की चीख निकल गई, ‘‘रोहिणी?’’

उस की सुंदर पत्नी, उसे जीजान से चाहने वाली जीवनसंगिनी, जो अभी रात में उस के सीने पर सिर रख कर सोई थी, जिसे वह सुबह की मीठी नींद में छोड़ कर गया था, रक्त से सराबोर बैड पर मरी पड़ी थी. रोहिणी के गले, सीने और पेट से उस वक्त भी खून रिस रहा था, जिस से सफेद बैडशीट लाल हो गई थी. कुछ क्षणों बाद धनंजय रोहिणी का नाम ले कर चीखता हुआ बाहर की ओर भागा. उस के अड़ोसपड़ोस में 3 फ्लैट थे. दाईं ओर के 2 फ्लैटों में सक्सेना और मिश्रा तथा बाईं ओर के फ्लैट में रावत रहते थे. पागलों की सी अवस्था में धनंजय ने सक्सेना के फ्लैट की घंटी पर हाथ रखा तो हटाया ही नहीं. वह पड़ोसियों के नाम लेले कर चिल्ला रहा था.

कुछ क्षणों बाद तीनों पड़ोसी बाहर निकले. वे धनंजय की हालत देख कर दंग रह गए. धनंजय कांप रहा था. वह कुछ कहना चाहता था, पर उस के मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे. उस के कंधे पर हाथ रख कर सक्सेना ने पूछा, ‘‘क्या हुआ विश्वास?’’

सक्सेना रिटायर्ड कर्नल थे. उन्होंने ही नहीं, मिश्रा और रावत ने भी किसी अनहोनी का अंदाजा लगा लिया था. धनंजय ने हकलाते हुए कहा, ‘‘रो…हि…णी.’’

सक्सेना, उन का बेटा एवं बहू, मिश्रा और रावत उस के फ्लैट के अंदर पहुंचे. बैडरूम का हृदयविदारक दृश्य देख कर सक्सेना की बहू डर के मारे चीख पड़ी और उलटे पांव भागी. अपने आप को संभालते हुए सक्सेना ने कोतवाली पुलिस को फोन लगा कर घटना की सूचना दी. कोतवाली में उस समय ड्यूटी पर सबइंसपेक्टर दयाशंकर थे. दयाशंकर ने मामला दर्ज कर के मामले की सूचना अधिकारियों को दी और खुद 2 सिपाही ले कर अलकनंदा के लिए निकल पड़े. उन के पहुंचते ही वहां के चौकीदार ने उन्हें सलाम किया. लोगों के बीच से जगह बनाते हुए दयाशंकर सीधे पांचवीं मंजिल पर पहुंचे. लोग सक्सेना के घर में जमा थे. धनंजय सोफे पर अपना सिर थामे बैठा था.

दयाशंकर के पहुंचते ही धनंजय उठ कर खड़ा हो गया. आगे बढ़ कर सक्सेना ने अपना परिचय दिया और धनंजय के फ्लैट की ओर इशारा किया. थोड़ी ही देर में फोरैंसिक टीम के सदस्य भी आ पहुंचे. इंसपेक्टर प्रकाश राय भी आ पहुंचे थे. उन के वहां पहुंचते ही एक व्यक्ति सामने आया, ‘‘गुडमौर्निंग सर? आप ने मुझे पहचाना? मैं रिटायर्ड इंसपेक्टर खन्ना. इन फ्लैटों की सुरक्षा व्यवस्था मेरे जिम्मे है. सोसाइटी के सेक्रैटरी ने फोन पर मुझे सूचना दी. दयाशंकर साहब से मुझे पता चला कि आप आ रहे हैं.’’

प्रकाश राय को खन्ना का चेहरा जानापहचाना लगा. मगर उन्हें याद नहीं आया कि वह उस से कहां मिले थे. सीधे ऊपर न जा कर उन्होंने इमारत को गौर से देखना शुरू किया. इमारत में ‘ए’ और ‘बी’ 2 विंग थे. दोनों विंग के लिए अलगअलग सीढि़यां थीं. धनंजय ‘ए’ विंग में रहता था. इमारत के गेट पर ही वाचमैन के लिए एक छोटी सी केबिन थी, जिस में से आनेजाने वाला हर व्यक्ति उसे दिखाई देता था.

इमारत के चारों और घूमते हुए पीछे एक जगह रुक कर प्रकाश राय ने खन्ना से पूछा, ‘‘ये कमरे किस के है?’’

‘‘सफाई कर्मचारियों और वाचमैन के .’’

‘‘कितने वाचमैन हैं?’’

‘‘2 हैं. इन की ड्यूटी 2 शिफ्टों में है. सुबह 8 बजे से रात 8 बजे और रात 8 बजे से सवेरे 8 बजे तक.’’

‘‘इन के खाने की छुट्टी?’’

‘‘वो तो सर, ये अपनी सुविधा के अनुसार खाने जाते हैं. वैसे भी यह समस्या पहली शिफ्ट में आती है. ज्यादातर ये अपना खाना साथ लाते हैं. इसी कमरे में वे खाना खाते हैं. तब तक हम यहां के स्वीपर को गेट पर बैठा देते हैं.’’

‘‘दोनों के नाम क्या हैं और इन के घर कहां है?’’

‘‘कल नाइट शिफ्ट पर नारायण था. वह सेक्टर-10 में रहता है. मौर्निंग शिफ्ट में जो अभी पौने 8 बजे आया है, उस का नाम भास्कर है, वह खोड़ा में रहता है.’’

‘‘अच्छा, यहां स्वीपर कितने हैं?’’

‘‘एक ही है साहब, रणधीर और उस की पत्नी देविका. ये दोनों अपने दोनों बच्चों के साथ यहीं रहते हैं. बाहर का काम रणधीर और टायलेट वगैरह साफ करने का काम देविका करती है.’’

खन्ना से बात करतेकरते प्रकाश राय इमारत के गेट पर आ गए. तभी एसएसपी, एसपी और सीओ भी आ गए. इन्हीं अधिकारियों के साथ डौग स्क्वायड की टीम भी आई थी.

ऊपर जांच चल रही थी. प्रकाश राय एक सिपाही के साथ नीचे रुक गए, बाकी सभी अधिकारी ऊपर चले गए. प्रकाश राय देविका के बारे में सोच रहे थे. वह सभी के घर में आजा सकती थी. वाचमैन जरूरी काम के बिना किसी फ्लैट में जा नहीं सकते थे. नारायण जो रात की ड्यूटी पर था, उसी के रहते हत्या हुई थी. लेकिन उस से पूछताछ करने पर प्रकाश राय के हाथ कोई सूत्र नहीं लगा. उस ने धनंजय को मीट ले आने जाते और लौटते देखा था बस.

‘‘अच्छा नारायण, धनंजय साहब के जाने के बाद तुम यहीं थे क्या? यहां से कहीं नहीं गए?’’

‘‘साहब, मैं यहां से वहां राउंड मार रहा था और नीचे की लाइन बंद कर रहा था. रणधीर ने पंप चालू किया या नहीं, यह देखने भी गया था.’’

‘‘यानी इस दौरान कोई ऊपर जा सकता था?’’

‘‘साहब, आप जो कह रहे हैं, वह संभव है.’’

‘‘अच्छा नारायण, सुबह तुम ने किसी अनजान आदमी को बाहर जाते तो नहीं देखा?’’

‘‘साहब, मेरे रहते कोई अंदर गया ही नहीं तो बाहर कैसे…?’’

‘‘सुनो नारायण, रात को ही कोई अंदर आ गया होगा या किसी के यहां मेहमान के रूप में आया होगा तो…?’’

नारायण चुप हो गया. उसे अपनी बुद्धि पर तरस आने लगा. कुछ सोच कर बोला, ‘‘साहब, दूध वाला और पेपर वाला, ये दोनों आए थे. गनपत दूध वाला जब आया था, धनंजय साहब घर में ही थे. उन्होंने ही दूध लिया होगा. उस के जाने के बाद ही वह मीट लेने चले गए थे. वह ‘ए’ विंग के 7 फ्लैटों में दूध सप्लाई करता है, बाकी के सभी लोग 9 बजे डेयरी की गाड़ी से दूध लेते हैं.’’

‘‘पेपरवाला नरेश धनंजय साहब के जाने के बाद आया था. 2-3 मिनट में ही वह लौट गया था. सिर्फ एक व्यक्ति मुझे याद है रणधीर. धनंजय साहब के जाने के बाद रणधीर सफाईवाला झाडू और प्लास्टिक की बाल्टी ले कर सीढि़यां साफ करने गया था. धनंजय साहब के लौटने से पहले नीचे आ कर वह ‘बी’ इमारत मे चला गया था.’’

‘‘ठीक है नारायण.’’ कह कर प्रकाश राय ने इशारे से सिपाही को पास बुला कर कहा, ‘‘तुम किसी बहाने से बाहर जाओ और थोड़ी देर बाद लौट कर नारायण से गप्पें मारते हुए रणधीर के बारे में कुछ पता लगाने की कोशिश करो.’’

प्रकाश राय के ऊपर पहुंचते ही दयाशंकर ने धनंजय से उन का परिचय कराया. धनंजय के कंधे पर हाथ रखते हुए और सहानुभूति जताते हुए प्रकाश राय ने कहा, ‘‘धनंजय, तुम्हारे साथ जो हुआ, उस का मुझे बेहद अफसोस है. मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि अगर तुम्हारा सहयोग मिलेगा तो मैं खूनी को कानून के शिकंजे में जकड़ कर ही रहूंगा. आओ, अंदर चलते हैं.’’

अंदर फिंगरप्रिंट्स वाले प्रिंट्स की तलाश में लगे थे और फोटोग्राफर फोटो खींच रहा था. प्रकाश राय ने खून से लथपथ रोहिणी की लाश देखी. फिर वह कमरे का निरीक्षण करने लगे. वह सिर्फ एक ही बात सोच रहे थे कि हत्यारा मुख्य द्वार से आया था या दरवाजे से लग क र जो पैसेज है उस में से किचन पार कर के आया था? पैसेज की जांच के लिए वह किचन के दरवाजे पर आए तो किचन टेबल पर ढेर सारा मीट और मछलियां देख कर चौंके. खाने वाले सिर्फ 2 और सामान इतना. प्रकाश राय बैडरूम में लौट आए. सबइंसपेक्टर दयाशंकर और एएसआई राजेंद्र सिंह अलमारी को सील कर रहे थे. आश्चर्य की बात यह थी कि अलमारी का लौकर खुला था. उस में चाबियां लटक रही थीं. अलमारी का सारा सामान ज्यों का त्यों था, जो इस बात का प्रमाण था कि हत्यारे ने सिर्फ लौकर का माल साफ किया था.

बैडरूम में दूसरी अलमारी भी थी. उसे हाथ नहीं लगाया गया था. दयाशंकर ने प्रकाश राय की ओर प्रश्नभरी नजरों से देखा और फिर धनंजय से कहा, ‘‘मिस्टर विश्वास, आप जरा यह अलमारी खोलने की मेहरबानी करेंगे?’’

धनंजय ने एक बार प्रकाश राय को और फिर दयाशंकर की ओर देखते हुए पूछा, ‘‘मैं इन चाबियों को हाथ लगा सकता हूं?’’

प्रकाश राय ने फिंगरप्रिंट्स एक्सपर्ट को प्रश्नभरी नजरों से देखा. एक्सपर्ट ने गर्दन हिलाते हुए अनुमति दे दी. धनंजय ने पहली अलमारी से चाबी निकाल कर दूसरी अलमारी खोली. प्रकाश राय ने गौर से देखा, अलमारी का सारा सामान ज्यों का त्यों था. कहीं कोई उलटपुलट नहीं की गई थी. पहली अलमारी के लौकर से चोरी गए सामान के बारे में धनंजय से पूछा, ‘‘धनंजय, तुम्हारे अंदाज से कितना सामान चोरी गया होगा?’’

‘‘रोहिणी के जेवरात ही लगभग 30-40 लाख रुपए के थे. 40-42 हजार नकदी भी थी.’’

‘‘इतनी नकदी तुम घर में रखते हो?’’

‘‘नहीं साहब, कल शनिवार  था, रोहिणी ने 40 हजार रुपए बैंक से निकाले थे. बैंक में हम दोनों का जौइंट एकाउंट है. कल सवेरे यह रकम मैं एक टूरिस्ट कंपनी में जमा कराने वाला था.’’

‘‘कारण?’’

‘‘अगले महीने मैं और रोहिणी घूमने के लिए जाने वाले थे.’’ कहते हुए उस ने प्रकाश राय को चेकबुक थमा दी. उन्होंने चेकबुक देखा. धनंजय सही कह रहा था. राजेंद्र सिंह को चेकबुक देते हुए उन्होंने कहा, ‘‘राजेंद्र सिंह, इस चेकबुक को भी कब्जे में ले लो और ‘एवन ट्रैवेल्स’ के एजेंट का स्टेटमेंट भी ले लो. रकम बरामद होने पर प्रमाण के रूप में यह सब काम आएगा.’’

इस के बाद गैलरी में आ कर प्रकाश राय ने इशारे से एक सिपाही को बुला कर दबी आवाज में कहा, ‘‘तुम नीचे जा कर रणधीर से बातें करो और किसी बहाने से उस के घर में जा कर देखो, कहीं कुछ सामान दिखाई देता है क्या? रणधीर संदिग्ध है. बात करतेकरते उस से कहो कि साहब को नारायण पर शक है. वह जरूर कुछ न कुछ बताएगा.’’

सिपाही के रवाना होते ही प्रकाश राय किचन में आए. एसआई दयाशंकर और एएसआई राजेंद्र सिंह किचन का निरीक्षण कर रहे थे. प्रकाश राय ने धनंजय से कहा, ‘‘धनंजय साहब, बुरा मत मानिएगा. मैं एक बात जानना चाहता हूं. तुम और रोहिणी, सिर्फ 2 लोग हो, इस के बावजूद इतना सारा गोश्त और मछली?’’

‘‘साहब, आज मेरे घर पार्टी थी. मेरे औफिस के 2 अधिकारी आशीष तनेजा और देवेश तिवारी अपनीअपनी बीवियों के साथ खाना खाने आने वाले थे. बारीबारी से हम तीनों एकदूसरे के घर अपनी पत्नियों सहित जमा होते हैं और खातेपीते हैं. इस रविवार को मेरे यहां इकट्ठा होना था.’’

‘‘तुम हमेशा फाइन चिकन एंड मीट शौप से ही मीट लाते हो?’’

‘‘जी सर.’’

इतने में सचमुच आशीष तनेजा और देवेश तिवारी अपनीअपनी पत्नियों के साथ धनंजय के घर आ पहुंचे. रोहिणी की हत्या के बारे में सुन कर वे कांप उठे. सक्सेना उन्हें अपने फ्लैट में ले गए. सवेरे 9 बजे धनंजय के मातापिता भी अलकनंदा आ पहुंचे थे. सक्सेना ने फोन कर के उन से कहा था कि रोहिणी सीरियस है. सक्सेना ने दिल्ली में रह रहे रोहिणी के मातापिता को भी खबर कर दी थी. निरीक्षण का काम लगभग पूरा हो गया था. प्रकाश राय ने धनंजय से कहा, ‘‘धनंजय, हमारे एक्सपर्ट को अंगुलियों के कुछ निशान मिले हैं.

वे निशान तुम्हारे और तुम्हारी पत्नी के भी हो सकते हैं. तुम दोनों के निशान छोड़ कर अन्य निशानों की जांच एक्सपर्ट को करनी पड़ेगी. तुम्हारी अंगुलियों के निशान हमें अभी नहीं चाहिए. हमारे सिपाही के आने पर तुम अपनी अंगुलियों के निशान दे देना. रोहिणी के निशान हम पोस्टमार्टम के समय ले लेंगे.’’

अधिकारियों ने आपस में सलाहमशविरा किया और अन्य सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद एसएसपी और एसपी तो चले गए, लेकिन सीओ और इंसपेक्टर प्रकाश राय सहयोगियों के साथ कोतवाली आ गए. सभी चाय पीतेपीते रोहिणी मर्डर केस के बारे में विचारविमर्श करने लगे.

प्रकाश राय अपने ही विचारों में खोए थे. ठीक से वह कुछ कह नहीं सकते थे, इसलिए वह चुपचाप सभी की बातें सुन रहे थे. बातचीत के दौरान सहज ही सबइंसपेक्टर दयाशंकर बोले, ‘‘एक साल पहले ऐसी ही एक घटना दिल्ली में घटी थी. पर अपराधी को उसी समय पकड़ लिया गया था.’’

‘‘जी,’’ एएसआई राजेंद्र सिंह ने कहा, ‘‘उस घटना में एक इमारत में अपराधी घुसा था. डुप्लीकेट चाबी से वह फ्लैट का दरवाजा खोलने की कोशिश कर रहा था कि पड़ोसी ने उसे देख लिया और वह पकड़ा गया. वह बंगलादेश का रहने वाला था. रफीक नाम था उस का.’’

‘‘घर में कौनकौन था?’’

‘‘घर की मालकिन और उस के 2 बच्चे.’’

‘‘और उस का पति कहां गया था?’’

‘‘वह सुबह सब्जी लाने मंडी गया था.’’

‘‘सब्जी लाने?’’ प्रकाश राय आश्चर्य से थोड़ा तेज आवाज में बोले, ‘‘और वह रविवार का दिन था क्या?’’

‘‘जी सर, रविवार ही था.’’

‘‘दयाशंकर, वह आदमी अंदर है या बाहर, पता करो.’’

दिल्ली पुलिस से पता चला कि वह बाहर है. उसे 4 महीने की सजा हुई थी. इस समय वह नोएडा में ही रह रहा है और सेक्टर-62 की किसी फैक्ट्री में नौकरी करता है.  प्रकाश राय उत्साहित हो कर बोले, ‘‘अरे उसे पकड़ कर लाओ यहां, इस केस में उस का हाथ हो सकता है.’’ फिर दयाशंकर की ओर देख कर बोले, ‘‘मुझे पूरा विश्वास है कि इस केस में किसी न किसी ने अपराधी को इनफौर्मेशन दी होगी. रविवार को धनंजय सेक्टर-2 की मार्केट मीटमछली लाने जाता है और रोहिणी घर में अकेली होती है, यह बात जरूर किसी न किसी ने उसे बताई होगी. इन में उस इमारत का नारायण, भास्कर रणधीर, उस की औरत देविका, पेपरवाला, दूधवाला, कोई भी हो सकता है. कोई न कोई उस जैसे लोगों को खबर देता होगा, उस के बारे में पता करो.’’

‘‘ठीक है सर, हम पता करते हैं.’’

‘‘दयाशंकर, तुम अभी उस की तलाश में लग जाओ. इस केस में अगर उस का हाथ हुआ तो उस के पास बहुत माल है. तुम अपना स्टाफ ले कर निकल पड़ो. उस के हाथ लगते ही मुझे सूचित करो.’’

दयाशंकर उसी वक्त सहयोगियों के साथ निकल पड़े. सीओ साहब भी चले गए. इस के बाद प्रकाश राय ने राजेंद्र सिंह से कहा, ‘‘अगर वह आदमी इस मामले में शामिल हुआ तो कोई बात नहीं. पर वह इस मामले में शायद ही शामिल हो.’’

‘‘सर,’’ राजेंद्र सिंह ने कहा, ‘‘आप यह किस उम्मीद पर कह रहे हैं?’’

‘‘मान लो, वह सस्पेक्ट है और उस ने ही यह जुर्म किया है तो सवाल यह उठता है कि वह अंदर घुसा कैसे? गेट पर नारायण था. मान लो, नारायण थोड़ी देर को इधरउधर हो गया और वह अंदर हो गया तो भी पांचवें माले पर जा कर लौक खोल कर हत्या करने, अलमारी खोल कर सारा सामान समेटने और नीचे आने में उसे कम से कम आधा घंटा तो लगा ही होगा. इतनी देर उस का वहां ठहरना संभव ही नहीं था. दूसरी दृष्टि से विचार करो तो धनंजय जब नीचे आया, तब नारायण मौजूद था. धनंजय सवा 6 बजे नीचे आया था. उस के जाने के तुरंत बाद वह अंदर घुस नहीं सकता था, क्योंकि नारायण वहीं था.

मान लो, वह 5-10 मिनट बाद अंदर घुसा और अपना काम किया तो धनंजय और उस का आमनासामना अवश्य होता, क्योंकि धनंजय 7 बजे के लगभग वापस आ गया था. उस वक्त भी नारायण नीचे ही मौजूद था. मगर न उस ने और न सीढ़ी साफ करने गए रणधीर ने उसे देखा. हत्यारा नया है, शातिर होता तो डीवीडी प्लेयर और रोहिणी का कीमती मोबाइल और लैपटौप न छोड़ता.’’ इतने में फोन की घंटी बज उठी. प्रकाश राय ने फोन रिसीव किया, ‘‘हैलो, हां मैं प्रकाश राय. बोलो, शाबाश. किधर टकरा गया वह तुम से? कुछ मिला? ठीक है, तुम उसे सस्पेक्ट मान कर बंद कर दो. मैं तुम्हें फोन करता हूं बाद में.’’ प्रकाश राय ने फोन काट दिया. राजेंद्र सिंह ने अंदाजा लगाते हुए कहा, ‘‘रफीक को पकड़ लिया शायद?’’

‘‘हां,’’ प्रकाश राय ने शांत स्वर में कहा, ‘‘पुलिस ने उसे उस की फैक्ट्री के बाहर से पकड़ लिया है. सोचने वाली बात यह है कि जिस के पास इतने रुपए होंगे, वह नौकरी पर क्यों जाएगा?’’

‘‘लेकिन सर,’’ राजेंद्र सिंह ने अक्ल लगाई, ‘‘हत्यारा जो भी हो, वह नारायण के रहते अंदर गया कैसे?’’

‘‘2 ही बातें हो सकती हैं. अपराधी पाइप के सहारे छत पर चढ़ कर छिपा रहा हो या फिर अंदर का ही कोई व्यक्ति हो.’’ प्रकाश राय ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘कुछ भी हो, हमें नारायण और रणधीर पर नजर रखनी है. ये मुजरिम हो सकते हैं या खबर देने वाले. यह भी एक संभावना है कि हत्या का उद्देश्य चोरी न रहा हो, यानी जेवरात और नकदी उड़ा कर एक बहाना बनाया गया हो. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि रोहिणी के गले में सोने का मंगलसूत्र, हाथ में 4 सोने की चूडि़यां, कानों में झुमके और डे्रसिंग टेबल पर उस की कीमती कलाई घड़ी, कीमती मोबाइल फोन और लैपटौप अपराधी ज्यों का त्यों छोड़ गया था. नारायण या रणधीर ने किसी की मदद से यह कृत्य किया होता तो रोहिणी के शरीर के गहने और घर का सारा सामान चला गया होता. इतनी बड़ी इमारत में रहने वाला भी तो कोई हत्या कर सकता है.’’

प्रकाश राय के मुंह से यह सुन कर राजेंद्र सिंह गंभीर हो गए, क्योंकि ऐसी स्थिति में हत्यारे को अंदरबाहर आनेजाने की जरूरत ही नहीं थी. अभी यह बातचीत चल ही रही थी कि सिपाही नरेश शर्मा प्रकाश राय के कमरे में घुसा. उसे देख कर प्रकाश राय ने पूछा, ‘‘क्यों नरेश, कोई खास खबर?’’

नरेश को प्रकाश राय ने धनंजय के घर में ही रणधीर पर नजर रखने की हिदायत दे दी थी. उसी क्षण से नरेश उस के पीछे लग गया था. दूसरे सिपाही देवनाथ को नारायण के पीछे प्रकाश राय पहले ही लगा चुके थे.

‘‘साहब, खास कुछ भी नहीं है. आप के चले आने के बाद हाथ में एक बर्तन लिए वह बाहर निकला. मैकडोनाल्ड की गली से पीछे जा कर देशी दारू के ठेके पर उस ने एक गिलास चढ़ाई और फिर अपने घर आ कर सोया पड़ा है.’’

‘‘तुम खुद ठेके में गए थे?’’

‘‘नहीं साहब, मेरी जानपहचान का एक फेरीवाला अंदर गया था. अब भी वह रणधीर के घर पर नजर रखे हुए है. मैं आप को यही खबर देने आया था.’’

‘‘नरेश, तुम रणधीर पर कड़ी नजर रखो. मुझे उस पर पूरा शक है. मेरा अनुमान है कि रणधीर और नारायण आज शाम को किसी स्थान पर जरूर मिलेंगे.’’

‘‘ठीक है साहब.’’ कह कर नरेश चला गया. राजेंद्र सिंह को संबोधित करते हुए प्रकाश राय बोले, ‘‘आज रात उस बिल्डिंग पर कड़ी नजर रखनी है. अपने 4-5 सिपाही तैयार रखना. नारायण और रणधीर, दोनों साथी हुए तो रणधीर आज रात को सामान ठिकाने लगाने की कोशिश…’’

प्रकाश राय अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाए थे कि फोन की घंटी बज उठी. उन्होंने रिसीवर उठाया. दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘सर, मैं मिश्रा बोल रहा हूं.’’

‘‘हां, बोलो मिश्रा, क्या खबर है?’’

‘‘साहब, वह व्यापारी अभी तक घर में ही है और उस का औफिस नीचे ही है. उसे जो बिल्डिंग बेचनी है, उस के ग्राउंड फ्लोर पर ही उस का औफिस है.’’

मिश्रा ने जिन सांकेतिक शब्दों का प्रयोग किया था, उन्हें प्रकाश राय समझ गए. व्यापारी का मतलब था नारायण, औफिस यानी घर और ग्राउंड फ्लोर औफिस का मतलब था नारायण ग्राउंड फ्लोर पर ही रहता था. मिश्रा की भाषा से ही प्रकाश राय समझ गए कि मिश्रा कई लोगों के सामने से बोल रहा था. उन्होंने मिश्रा से कहा, ‘‘तुम वहीं ठहरो और अपने आदमियों के वहां पहुंचने तक रोके रहो. संभव हुआ तो मैं भी आऊंगा. कोई विशेष बात होने पर मुझे फोन करना.’’ इस के बाद वह राजेंद्र सिंह से बोले, ‘‘तुम पोस्टमार्टम के बाद रोहिणी का शव विश्वास को जल्दी से जल्दी दिलाने की कोशिश करो.’’

‘‘यस सर.’’ कह कर राजेंद्र सिंह अपने स्टाफ के साथ निकल पड़े. अब प्रकाश राय अकेले थे और नए सिरे से रोहिणी मर्डर केस के बारे में सोचने लगे. एक सूत्र से दूसरा सूत्र जोड़ कर वह अपना जाल बिछाना चाहते थे. उन्होंने अपनी डायरी निकाली. उन्हें अपने कुछ महत्त्वपूर्ण आदमियों को फोन करने थे. वे समाज के जिम्मेदार लोग थे और इन से प्रकाश राय की अच्छी जानपहचान थी. इन्हें प्रकाश राय ने विशेष मतलब से बुलाया था और एक जरूरी काम सौप दिया था. इन्हें रोहिणी के दाहसंस्कार के समय शोकसंतप्त चेहरा बना क र लोगों की बातों को चुपचाप सुन कर उस की रिपोर्ट प्रकाश राय को देनी थी. मजे की बात यह थी कि ये लोग एकदूसरे को नहीं जानते थे.

अंतिम निवास विद्युत शवदाहगृह में 2 व्यक्तियों की बातचीत सुन कर आशीष तनेजा के कान खड़े हो गए, ‘‘कमाल की बात है. आनंदी दिखाई नहीं दी?’’

‘‘सचमुच हैरानी की बात है भई, वह तो रोहिणी की बहुत पक्की सहेली थी. लगता है, उसे किसी ने खबर नहीं दी. रोहिणी के पास तो उस का फोन नंबर भी था.’’

‘‘आनंदी दिखाई देती तो मिस्टर आनंद के भी दर्शन हो जाते.’’

‘‘शनिवार को तो बैंक में आनंदी का फोन भी आया था?’’

आनंदी को ले कर कुछ ऐसी ही बातें देवेश तिवारी से भी सुनीं. उधर मेहता ने जो कुछ सुना, वह इस प्रकार था.

‘‘विवाह आगरा में था, इसीलिए दोनों आगरा गए थे.’’

‘‘आगरा तो वे हमेशा आतेजाते रहते थे.’’‘‘वैसे विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ.’’

ऐसा ही कुछ नागर ने भी सुना था. इन लोगों ने अपने कानों सुनी बातें फोन पर प्रकाश राय को बता दीं.

यह पता नहीं चल रहा था कि आगरा में किस का विवाह था. प्रकाश राय के लिए यह जानना जरूरी भी नहीं था. एक विचार जो जरूर उन्हें सता रहा था, वह यह कि रोहिणी की पक्की सहेली होने के बावजूद आनंदी उस के अंतिम दर्शन करने भी नहीं आई थी. और तो और आनंदी का पति भी दाहसंस्कार में शामिल नहीं हुआ था. इन दोनों का न होना लोगों को हैरान क्यों कर रहा था? अब इस आनंदी को कहां ढूंढ़ा जाए?

प्रकाश राय स्वयं राजेंद्र सिंह को ले कर चल पड़े. रास्ते में प्रकाश राय ने राजेंद्र सिंह को आनंदी के बारे में जो कुछ सुना था, बता दिया. रोहिणी के बैंक के मैनेजर रोहित बिष्ट से मिल कर प्रकाश राय ने अपना परिचय दिया और वहां आने का कारण बताते हुए कहा, ‘‘जो कुछ हुआ, बहुत बुरा हुआ. हमें तो दुख इस बात का है कि हत्यारे का हमें कोई सुराग तक नहीं मिल रहा है.’’

‘‘हम तो आसमान से गिर पड़े. सवेरे 10 बजे आते ही फोन पर रोहिणी की हत्या की खबर मिली.’’

‘‘तुम्हें फोन किस ने किया था?’’

‘‘सक्सेना नाम के किसी व्यक्ति ने. पर एकाएक हमें विश्वास ही नहीं हुआ. हम ने मिसेज विश्वास के घर फोन किया. तब पता चला कि रोहिणी वाकई अब इस दुनिया में नहीं रही. हम कुछ लोग अलकनंदा गए थे. मैं दाह संस्कार में जा नहीं पाया. हां, मेरे कुछ साथी जरूर गए थे.’’

‘‘आप जरा बुलाएंगे उन्हें?’’

कुछ क्षणों बाद ही 5-6 बैंक कर्मचारी मैनेजर के कमरे में आ गए. उन्होंने प्रकाश राय से उन का परिचय कराया. बातचीत के दौरान प्रकाश राय ने वहां उपस्थित हेड कैशियर सोलंकी से पूछा, ‘‘शनिवार को मिसेज विश्वास ने कुछ रुपए निकाले थे क्या?’’

‘‘हां, 40 हजार…’’

‘‘खाता किस के नाम था?’’

‘‘मिस्टर और मिमेज विश्वास का जौइंट एकाउंट है.’’

‘‘आप ने मिसेज विश्वास को जो रकम दी थी, वह किस रूप में थी?’’

‘‘5 सौ के नए कोरे नोटों के रूप में दिया था. उन नोटों के नंबर भी हैं मेरे पास.’’

प्रकाश राय ने राजेंद्र सिंह से नोटों के नंबर लेने और उस चेक को कब्जे में लेने को कहा.

कुछ क्षण रुक कर उन्होंने अपना अंदाज बदलते हुए कहा, ‘‘अरे क्या खूब याद आया बिष्ट साहब, विश्वास के यहां हमें बारबार ‘बैंक, आनंदी, कल फोन किया था’- ऐसा सुनाई पड़ रहा था. आप के यहां कोई आनंदी काम..?’’

‘‘नहीं,’’ वहां मौजूद एक अधिकारी ने कहा, ‘‘वह आनंदी गौड़ है. रोहिणी की फास्टफ्रैंड. वह यहां काम नहीं करती.’’

‘‘अच्छा, यह बात है. बारबार आनंदी का नाम सुनने पर मुझे लगा कि वह यहीं काम करती होगी. आप को मालूम है, यह आनंदी कहां रहती है?’’

‘‘निश्चित रूप से तो मालूम नहीं, पर वह दिल्ली में कहीं रहती है. 2-3 बार वह बैंक में भी आई थी. शनिवार को उस का फोन भी आया था. शायद एक, डेढ़ महीना पहले ही उन की जानपहचान हुई थी. मिसेज विश्वास ने ही मुझे बताया था?’’

‘‘एक विवाह में शामिल होने के लिए अप्रैल महीने के अंत में गई थीं और 3 मई को ड्यूटी पर आ गई थीं.’’

‘‘यहां किसी ने मिसेज आनंदी को रोहिणी की हत्या के बारे में बताया तो नहीं है. अगर नहीं तो अब कोई नहीं बताएगा. क्या किसी के पास उस का नंबर है. अगर नहीं है तो रोहिणी के काल डिटेल्स से तलाशना पड़ेगा.’’

मैनेजर ने बैंक की औपरेटर से इंटरकौम पर बात की तो प्रकाश राय को आनंदी का फोन नंबर मिल गया. इस के बाद उन्होंने उस नंबर से आनंदी के घर का पता मालूम कर लिया.

‘‘पता कहां का है?’’ मैनेजर से पूछे बिना नहीं रहा गया.

‘‘साउथ एक्स का. अच्छा मिसेज गौड़ ने किसलिए फोन किया था?’’

‘‘औपरेटर ने बताया है कि किसी वजह से मोबाइल पर फोन नहीं मिला तो मिसेज गौड़ ने लैंडलाइन पर फोन किया था. वह रविवार को मिसेज विश्वास को शौपिंग के लिए साथ ले जाना चाहती थीं. पर रोहिणी ने कहा था कि उस के यहां कुछ मेहमान खाना खाने आ रहे हैं, इसलिए वह नहीं आ सकेगी.’’

इतने में ही राजेंद्र सिंह और मिश्रा वहां आ पहुंचे. राजेंद्र सिंह अपना काम पूरा कर चुके थे. प्रकाश राय ने रोहिणी का बियरर चेक ले कर उसे देखा और बडे़ ही सहज ढंग से पूछा, ‘‘मिस्टर बिष्ट, आप के बैंक में सेफ डिपौजिट वाल्ट की सुविधा है?’’

‘‘हां, है. आप को कुछ…?’’

‘‘नहीं, नहीं, मैं ने यों ही पूछा. अब हम चलते हैं.’’

प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह बैंक से निकल कर साउथ एक्स में जहां आनंदी रहती थी, वहां पहुंचे. प्रकाश राय ने ऊपर पहुंच कर एक फ्लैट के दरवाजे की घंटी बजाई. फ्लैट के दरवाजे पर लिखा ‘आनंद गौड़’ नाम वह पहले ही पढ़ चुके थे. कुछ क्षणों बाद दरवाजा खुला. प्रकाश राय को समझते देर नहीं लगी कि उन के सामने आनंदी और उस के पति आनंद गौड़ खड़े हैं और दोनों बाहर जाने की तैयारी में हैं. मिस्टर गौड़ ने आश्चर्य से प्रकाश राय को देखा. प्रकाश राय ने शांत भाव से कहा, ‘‘मुझे आनंद गौड़ से मिलना है.’’

आनंद ने आनंदी को और आनंदी ने आनंद को देखा. 2 अपरिचितों को देख कर वे हड़बड़ा गए थे.

‘‘मैं ही आनंद गौड़ हूं, आप…?’’

‘‘हम दोनों नोएडा पुलिस से हैं. एक जरूरी काम से आप के पास आए हैं. घबराने की कोई बात नहीं है. मुझे आप से थोड़ी जानकारी चाहिए.’’

‘‘आइए, अंदर आइए.’’

प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह ने घर में प्रवेश किया. ड्राइंगरूम में बैठते हुए प्रकाश राय बोले, ‘‘मिस्टर आनंद, जिन लोगों का पुलिस से कभी सामना नहीं होता, उन का आप की तरह घबरा जाना स्वाभाविक है. मैं आप से एक बार फिर कहता हूं, आप घबराइए मत. बस, आप मेरी मदद कीजिए.’’

बातचीत के दौरान आनंद से प्रकाश राय को मालूम हुआ कि आनंद के परिवार में मातापिता, भाईबहन और पत्नी, सभी थे. 2 साल पहले आनंद और आनंदी का विवाह हुआ था. करोलबाग में आनंद के पिता की करोलबाग शौपिंग सेंटर नामक एक शानदार दुकान थी . टीवी, डीवीडी प्लेयर, फ्रिज, पंखा आदि कीमती सामानों की यह दुकान काफी प्रसिद्ध थी. मंगलवार को दुकान बंद रहती थी. इसलिए मिस्टर आनंद घर पर मिल गए थे. पतिपत्नी अपने किसी रिश्तेदार के यहां पूजा में जा रहे थे कि वे वहां पहुंच गए थे.

आनंद ने अपने निजी जीवन के बारे में सब कुछ बता दिया तो आनंदी ने प्रकाश राय से कहा, ‘‘अब तो बताइए कि आप हमारे घर कौन सी जानकारी हासिल करने आए हैं?’’

‘‘मिसेज आनंदी, आप यह बताइए कि आप मिसेज रोहिणी विश्वास को जानती हैं?’’

प्रकाश राय के मुंह से रोहिणी का नाम सुन कर आनंद और आनंदी भौचक्के रह गए.

‘‘हां, वह मेरी सहेली है. क्यों, क्या हुआ उसे?’’

‘‘आप की और रोहिणी की मुलाकात कब और कहां हुई थी?’’

‘‘हमारी जानपहचान हुए लगभग एक महीना हुआ होगा. अप्रैल के अंतिम सप्ताह में हम दोनों घूमने आगरा गए थे. 3 मई को आगरा से दिल्ली आते समय शताब्दी एक्सप्रेस में हमारी मुलाकात हुई थी.’’

‘‘लेकिन जानपहचान कैसे हुई?’’

‘‘हम आगरा स्टेशन से गाड़ी में बैठे थे. रोहिणी और उस के पति भी वहीं से गाड़ी में बैठे थे. उन की सीट हमारे सामने थी. बांतचीत के दौरान हमारी जानपहचान हुई. हम दोनों के पति गाड़ी चलते ही सो गए थे. हम एकदूसरे से बातें करने लगी थीं. फिर हम बचपन की सहेलियों की तरह घुलमिल गईं.’’

‘‘सारे रास्ते तुम दोनों के पति सोते ही रहे?’’

‘‘अरे नहीं, दोनों जाग गए थे. फिर हम ने एकदूसरे का परिचय कराया. रोहिणी को हजरत निजामुद्दीन उतरना था, हमें नई दिल्ली. उतरने से पहले हम दोनों ने एकदूसरे को अपनेअपने घर का पता और फोन तथा मोबाइल नंबर दे दिया था.’’

‘‘तुम अपने पति के साथ रोहिणी के घर जाती थी?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘रोहिणी के पति तुम्हारे घर आया करते थे?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘इस का कारण?’’ प्रकाश राय ने आनंद की ओर देखते हुए पूछा.

‘‘कारण…?’’ आनंद गड़बड़ा गया, ‘‘एक तो दुकान के कारण मुझे समय नहीं मिलता था, दूसरे न जाने क्यों मुझे मिस्टर विश्वास से मिलने की इच्छा नहीं होती थी.’’

‘‘रोहिणी से आखिरी बार तुम कब मिली थीं?’’ प्रकाश राय ने आनंदी से पूछा.

‘‘पिछले हफ्ते मैं रोहिणी के बैंक गई थी.’’

‘‘अच्छा रोहिणी को तुम ने आखिरी बार फोन कब किया था और क्यों?’’

‘‘पिछले शनिवार को. लाजपतनगर में शौपिंग के लिए मैं ने उसे बुलाया था. पर उस ने मुझे बताया कि रविवार को उस के यहां कुछ लोग खाने पर आने वाले थे.’’

अब तक आनंद दंपति ने जो कुछ बताया था, वह सब सही था. प्रकाश राय थोड़ा सा घबराए हुए थे. एक प्रश्न का उत्तर उन्हें नहीं मिल रहा था. इतनी पूछताछ के बाद बेचैन हुए आनंद ने प्रकाश राय से पूछा, ‘‘आप रोहिणी के बारे में इतनी पूछताछ क्यों कर रहे है?’’

गंभीर स्वर में प्रकाश राय ने कहा, ‘‘लोग हम से सत्य को छिपाते हैं, लेकिन हमारा काम ही है लोगों को सच बताना. परसों सवेरे 6 से 7 बजे के बीच किसी ने छुरा घोंप कर रोहिणी की हत्या कर दी है.’’

‘‘नहीं..,’’ आनंदी चीख पड़ी. लगभग 10 मिनट तक आनंदी हिचकियां लेले कर रोती रही. उस के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. आनंदी के शांत होने पर प्रकाश राय ने पूरी घटना सुनाई और अफसोस जाहिर करते हुए कहा, ‘‘अभी तक हमें कोई भी सूत्र नहीं मिला है. हमारी जांच जारी है, इसलिए रोहिणी के सभी परिचितों से मिल कर हम पूछताछ कर रहे हैं. कल उस का अंतिम संस्कार भी हो गया है.’’

‘‘लेकिन सर, किसी ने भी हमें इस घटना की सूचना क्यों नहीं दी?’’ आनंद ने पूछा.

‘‘मैं भी यही सोच रहा हूं मिस्टर आनंद, तुम्हारी पत्नी और रोहिणी में बहुत अच्छी मित्रता थी. फिर भी धनंजय ने तुम्हें खबर क्यों नहीं दी, जबकि उस ने कर्नल सक्सेना को तमाम लोगों के फोन नंबर दे कर इस घटना की खबर देने को कहा था. है न आश्चर्य की बात?’’

‘‘मैं क्या कह सकता हूं?’’

‘‘मैं भी कुछ नहीं कह सकता मिस्टर आनंद. कारण मैं धनंजय से पूछ नहीं सकता. पूछने से लाभ भी नहीं, क्योंकि धनंजय कह देगा, मैं तो गम का मारा था, मुझे यह होश ही कहां था? अच्छा आनंदी, मैं तुम से एक सवाल का उत्तर चाहता हूं. रोहिणी ने कभी अपने पति के बारे में कोई ऐसीवैसी बात या शिकायत की थी तुम से?’’

‘‘नहीं, कभी नहीं. वह तो अपने वैवाहिक जीवन में बहुत खुश थी.’’

प्रकाश राय का प्रश्न और आनंदी का उत्तर सुन कर आनंद ने जरा घबराते हुए पूछा,  ‘‘आप धनंजय पर ही तो शक नहीं कर रहे हैं?’’

‘‘नहीं, उस पर मैं शक कैसे कर सकता हूं, अच्छा, अब हम चलते हैं. जरूरत पड़ने पर मैं फिर मिलूंगा.’’

प्रकाश राय सोच रहे थे कि पूरे सफर के दौरान आनंद और धनंजय ने एकदूसरे से ज्यादा बात क्यों नहीं की? यहां भी वे एकदूसरे से क्यों नहीं मिलते थे?

मंगलवार, 5 मई. रोहिणी कांड की गुत्थी ज्यों की त्यों बरकरार थी. प्रकाश राय को कई लोगों पर शक था, पर प्रमाण नही थे. सिर्फ शक के आधार पर किसी को पकड़ कर बंद करना प्रकाश राय का तरीका नहीं था. दोपहर बाद प्रकाश राय के औफिस पहुंचने से पहले ही उन की मेज पर फिंगरप्रिंट्स ब्यूरो की रिपोर्ट रखी थी. रिपोर्ट देखतेदेखते उन के मुंह से निकला, ‘‘अरे यह…तो.’’ घंटी बजा कर इन्होंने राजेंद्र सिंह को बुलाया.

‘‘राजेंद्र सिंह, रोहिणी मर्डर केस का अपराधी नजर आ गया है.’’ कह कर प्रकाश राय ने उन्हें एक नहीं, अनेक हिदायतें दीं. राजेंद्र सिंह और उन के स्टाफ को महत्पूर्ण जिम्मेदारी सौंप कर योजनाबद्ध तरीके से समझा कर बोले,  ‘‘जांच को अब नया मोड़ मिल गया है. भाग्य ने साथ दिया तो 2-3 दिनों में ही अपराधी पूरे सबूत सहित अपने शिकंजे में होगा. समझ लो, इस केस की गुत्थी सुलझ गई है. बाकी काम तुम देखो. मैं अब जरा अपने दूसरे केस देखता हूं.’’

उत्साहित हो कर राजेंद्र सिंह निकल पड़े उन के आदेशों का पालन करने. 7 मई की सुबह 9 बजे दयाशंकर अपने स्टाफ के साथ औफिस पहुंचे. पिछली रात प्रकाश राय के निर्देश के अनुसार राजेंद्र सिंह पूरी तरह मुस्तैद थे. थोड़ी देर बाद प्रकाश राय के गाड़ी में बैठते ही गाड़ी सेक्टर-15 की ओर चल पड़ी. करीब साढ़े 9 बजे प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह अलकनंदा स्थित धनंजय के घर पहुंचे. प्रकाश राय को देख कर धनंजय जरा अचरज में पड़ गया. उस के पिता भी हौल में ही बैठे थे. उस की मां और बहन अंदर कुछ काम में व्यस्त थीं. ज्यादा समय गंवाए बगैर प्रकाश राय ने धनंजय से कहा, ‘‘विश्वास, तुम जरा मेरे साथ बाहर चलो. रोहिणी के केस में हमें कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिली हैं.

हम तुम्हें दूर से ही एक व्यक्ति को दिखाएंगे. तुम ने अगर उसे पहचान लिया तो समझो इस हत्या में उस का जरूर हाथ है. उस के पास से तुम्हारी संपत्ति भी मिल जाएगी. अब उसे पहचानने के लिए हमे तुम्हारी मदद की जरूरत है.’’

‘‘ठीक है, आप बैठिए. मैं 10 मिनट में तैयार हो कर आता हूं.’’ कह कर धनंजय अंदर चला गया और प्रकाश राय उस के पिता के साथ गप्पें मारने लगे. गप्पें मारतेमारते उन्होंने बड़े ही सहज ढंग से पास रखी टेलिफोन डायरी उठाई, उस के कुछ पन्ने पलटे और यथास्थान रख दिया. फिर वह टहलते हुए शो केस के पास गए. उस में रखा चाबी का गुच्छा उन्हें दिखाई दिया. शो केस  में रखी कुछ चीजों को देख कर वह फिर सोफे पर आ बैठे.

15-20 मिनट में धनंजय तैयार हो गया. प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह के साथ निकलने से पहले उस ने शो केस में से सिगरेट का पैकेट, लाइटर, पर्स, चाबी और रूमाल लिया. अब प्रकाश राय और राजेंद्र सिंह धनंजय को साथ ले कर निरुला होटल की ओर चल पड़े. लगभग 10 मिनट बाद उन की गाड़ी होटल के निकट स्थित बैंक के सामने जा कर रुकी. गाड़ी रुकते ही प्रकाश राय ने धनंजय से कहा, ‘‘विश्वास, हम ने तुम्हारी सोसायटी के वाचमैन नारायण को गिरफ्तार कर लिया है. इस समय वह हमारे कब्जे में है. इस बैंक के सेफ डिपौजिट लौकर डिपार्टमेंट में 2 चौकीदार काम करते हैं. इन में से हमें एक पर शक है. मुझे विश्वास है कि उस ने नारायण के साथ मिल कर चोरी और हत्या की है. हम उसे दरवाजे पर ला कर तुम्हें दिखाएंगे. देखना है कि तुम उसे पहचानते हो या नहीं?’’

धनंजय को ले कर प्रकाश राय बैंक में दखिल हुए और बैंक के लौकर डिपार्टमेंट में पहुंचे. वहां मौजूद 2-4 लोगों में से प्रकाश राय ने एक व्यक्ति से पूछा, ‘‘आप…?’’

‘‘मैं बैंक मैनेजर हूं.’’

‘‘आप इन्हें जानते हैं?’’

‘‘हां, यह धनंजय विश्वास हैं.’’

‘‘इन का खाता है आप के बैंक में?’’

‘‘खाता तो नहीं है, लेकिन कल दोपहर 3 बजे इन्होंने लौकर नंबर 106 किराए पर लिया है.’’

‘‘आप जरा वह लौकर खोलने का कष्ट करेंगे?’’

बैंक मैनेजर सुरेशचंद्र वर्मा ने लौकर के छेद में चाबी डाल कर 2 बार घुमाई, पर लौकर एक चाबी से खुलने वाला नहीं था, क्योंकि दूसरी चाबी धनंजय के पास थी. प्रकाश राय धनंजय से बोले, ‘‘मिस्टर विश्वास, तुम्हारी जेब में चाबी का जो गुच्छा है, उस में लौकर नंबर 106 की दूसरी चाबी है. उस से इस लौकर को खोलो.’’

धनंजय घबरा गया. उस ने चाबी निकाल कर कांपते हाथों से लौकर खोल दिया. प्रकाश राय ने लौकर में झांक कर देखा और फिर धनंजय से पूछा, ‘‘यह क्या है मिस्टर विश्वास?’’

धनंजय ने गरदन झुका ली. प्रकाश राय ने लौकर से कपड़े की एक थैली बाहर निकाली. उस थैली में धनंजय के फ्लैट से चोरी हुए सारे जेवरात और 5 सौ रुपए के नोटों का एक बंडल भी था, जिस पर रोहिणी के पंजाब नेशनल बैंक की मोहर लगी थी. इस के अलावा एक और चीज थी उस में, एक रामपुरी छुरा.

‘‘मिस्टर विश्वास, यह सब क्या है?’’ प्रकाश राय ने दांत भींच कर पूछा.

एक शब्द कहे बिना धनंजय ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक कर रोते हुए कहा, ‘‘साहब, मैं अपना गुनाह कबूल करता हूं. रोहिणी का खून मैं ने ही किया था.’’

दरअसल, हुआ यह था कि मंगलवार को औफिस में आते ही प्रकाश राय को जो फिंगरप्रिंट्स रिपोर्ट मिली थी, उस के अनुसार फ्लैट में केवल रोहिणी और धनंजय के ही प्रिंट्स मिले थे. किसी तीसरे व्यक्ति की अंगुलियों के निशान थे ही नहीं. इसलिए प्रकाश राय की नजरें धनंजय पर जम गई थीं. प्रकाश राय ने फिंगरप्रिंट्स रिपोर्ट अलग रख कर पोस्टमार्टम रिपोर्ट गौर से देखना शुरू किया था. रिपोर्ट के अनुसार, रोहिणी की मृत्यु लगभग 12 से 14 घंटे पहले हुई थी. रोहिणी का पोस्टमार्टम शाम 4 बजे हुआ था यानी राहिणी की मृत्यु आधी रात के बाद 2 बजे से सुबह 4 बजे के बीच हुई थी.

फिर धनंजय सवा 6 बजे से 7 बजे के बीच हत्या होने की बात कैसे कह रहा था? पूरा माजरा प्रकाश राय की समझ में धीरेधीरे आता जा रहा था. धनंजय को अपने ही घर में चोरी करने की क्या जरूरत थी? इस सवाल का जवाब भी प्रकाश राय की समझ में आ गया था. उन्होंने राजेंद्र सिंह को समझाते हुए कहा, ‘‘राजेंद्र सिंह, धनंजय बहुत ही चालाक है. तुम एक काम करो,पिछले 2 दिनों से धनंजय बाहर नहीं गया है. आज भी वह घर पर ही होगा. कुछ दिनों बाद वह चोरी का सामान किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर जरूर रखेगा. उस का सारा घर हम लोगों ने छान मारा है. हो सकता है, उस ने बिल्डिंग में ही कहीं सामान छिपा कर रखा हो या फिर…

‘‘धनंजय जिस वक्त गोश्त लाने निकला था, उस समय उस ने सामान कहीं बाहर रख दिया होगा. पर उस ने कहां रखा होगा. राजेंद्र सिंह कहीं ऐसा तो नहीं कि वह थैली ले कर नीचे उतरा हो और स्कूटर की डिक्की में रख दी हो? हो सकता है राजेंद्र सिंह,’’ प्रकाश राय चुटकी बजाते हुए बोले, ‘‘वह थैली अभी उसी डिक्की में ही हो? राजेंद्र सिंह तुम फौरन अपने स्टाफ सहित निकल पड़ो और धनंजय पर नजर रखो.’’

इस के बाद राजेंद्र सिंह ने अलकनंदा के आसपास अपने सिपाहियों को धनंजय पर निगरानी रखने के लिए तैनात कर दिया था. धनंजय अपने स्कूटर पर ही निकलेगा, यह राजेंद्र सिंह जानते थे. इसलिए राजेंद्र सिंह ने स्कूटर वाले और टैक्सी वाले अपने 2 मित्रों को सहायता के लिए तैयार किया. सारी तैयारियां कर के राजेंद्र सिंह अलकनंदा के पास ही एक इमारत में रह रहे अपने एक गढ़वाली मित्र के घर में जम गए.

5 तारीख का दिन बेकार चला गया. धनंजय और उस के परिवार को सांत्वना देने के लिए लोगों का आनाजाना लगातार बना हुआ था. शायद इसीलिए धनंजय बाहर नहीं निकल पाया था. लेकिन 6 तारीख को दोपहर के समय धनंजय के नीचे उतरते ही राजेंद्र सिंह सावधान हो गए. धनंजय अपनी स्कूटर स्टार्ट कर के जैसे ही बाहर निकला, वैसे ही अपने सिपाहियों के साथ टैक्सी में बैठ कर राजेंद्र सिंह उस के पीछे हो लिये. गोल चक्कर होते हुए धनंजय निरुला होटल के पास स्थित बैंक के सामने आ कर रुक गया. राजेंद्र सिंह ने थोड़ी दूरी पर ही टैक्सी रुकवा दी.

स्कूटर खड़ी कर के धनंजय ने डिक्की खोली और कपड़े की एक थैली निकाली. धनंजय के हाथ में थैली देख कर ही राजेंद्र सिंह ने मन ही मन प्रकाश राय के अनुमान की प्रशंसा की.थैली ले कर धनंजय के बैंक में घुसते ही राजेंद्र सिंह ने अपने मित्र को बैंक में भेजा, क्योंकि यह जानना जरूरी था कि धनंजय का बैंक में खाता है या किसी परिचित से मिलने गया था. थैली किसी को देने गया था या लौकर में रखने? उन के मित्र ने लौट कर उन्हें बताया कि धनंजय मैनेजर के साथ लौकर वाले कमरे में गया है. इस से पहले सीधे मैनेजर की केबिन में जा कर उस ने एक फार्म भरा था.

धनंजय को खाली हाथ बाहर आते देख कर अपने 2 सिपाहियों को उस का पीछा करने के लिए कह कर राजेंद्र सिंह वहीं ओट में खड़े हो गए. धनंजय के वहां से जाते ही राजेंद्र सिंह सीधे बैंक मैनेजर की केबिन में पहुंचे. अपना परिचय दे कर उन्होंने कहा, ‘‘अभी 5 मिनट पहले जिस व्यक्ति ने आप के यहां लौकर लिया है, वह वांटेड है. हमारे आदमी उस का पीछा कर रहे हैं. आप हमें सिर्फ यह बताइए कि आप से उस की क्या बातचीत हुई. ’’

‘‘धनंजय को एक महीने के लिए लौकर चाहिए  था. यहां उपलब्ध लौकर्स में से उस ने 106 नंबर लौकर पसंद किया. नियमानुसार फार्म भर कर एडवांस जमा किया और लौकर में एक थैली रख कर चला गया.’’

लौकर खोलने के लिए 2 चाबियां लगती थीं. पहले बैंक की चाबी, फिर जिस व्यक्ति ने लौकर लिया हो, उस की चाबी से लौकर खुल सकता था. बैंक अधिकारी तहखाने में बने सेफ डिपौजिट वाल्ट में आ कर एक चाबी से लौकर खोल कर चले जाते थे. बाद में ग्राहक बैंक से प्राप्त चाबी से लौकर को खोल कर जो भी सामान रखना चाहे, रख सकता था. इसलिए ग्राहक ने लौकर में क्या रखा या निकाला, बैंक को इस की जानकारी नहीं रहती है.

राजेंद्र सिंह ने बैंक से ही प्रकाश राय को फोन किया. इस के बाद राजेंद्र सिंह ने बैंक मैनेजर से कहा, ‘‘यह व्यक्ति शायद कल फिर आए, तब इसे लौकर खोलने की इजाजत मत दीजिएगा. मैं कुछ सिपाही कल सवेरे बैंक खुलने से पहले ही यहां भेज दूंगा. वह यहां आया तो इसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा. अगर यह खुद नहीं आया तो हम इसे ले कर आएंगे.’’

धनंजय को बैंक ले जाने के लिए जब प्रकाश राय अलकनंदा पहुंचे थे तो वहां शो केस की वस्तुओं को देखने के बहाने उन्होंने चाबी के गुच्छों में लौकर नंबर 106 की चाबी देख ली थी. टेलीफोन के पास रखी धनंजय की टेलीफोन डायरी को उन्होंने केवल आनंदी का नंबर जानने के लिए यों ही उल्टापलटा था. ‘ए’ पर आनंदी का नंबर न पा कर उन्होंने ‘जी’ पर नजर दौड़ाने के लिए पन्ने पलटे, क्योंकि आनंदी का पूरा नाम आनंदी गौड़ था. मगर ‘एफ’ और ‘एच’ के बीच का ‘जी’ पेज गायब था. वह पेज फाड़े जाने के निशान मौजूद थे.

पकड़े जाने के थोड़ी देर बाद ही धनंजय ने अपने आप पर काबू पा लिया था. गहरी सांस ले कर उस ने कहा, ‘‘इंसपेक्टर साहब, मैं ने ही अपनी बीवी की हत्या की है. उस के चरित्र पर मुझे लगातार शक रहता था. आगे चल कर मेरा शक विश्वास में बदल गया. लेकिन कुछ बातें अपनी आंखों से देखने पर मैं बेचैन हो उठा. मेरे मन की शांति समाप्त हो गई. मैं परेशान रहने लगा. मैं अपनी पत्नी को बेहद चाहता था, पर मुझे धोखा दे कर उस ने सब कुछ नष्ट कर दिया था. उस की चरित्रहीनता का कोई सबूत मैं नहीं दे सकता था. मेरे पास एक ही रास्ता था, उसे हमेशा के लिए मिटा देने का. वही मैं ने किया भी.’’

प्रकाश राय धनंजय को कोतवाली ले आए. धनंजय ने बड़े योजनाबद्ध तरीके से रोहिणी का खून किया था. रोहिणी को यह दिखाने के लिए कि वह उस से बेहद प्रेम करता है, उस ने बाहर जाने का प्लान बनाया और 40 हजार रुपए भी निकलवाए थे, लेकिन वह कहीं जाने वाला नहीं था. रविवार पहली तारीख को उस ने जानबूझ कर आशीष तनेजा और देवेश तिवारी को अपने घर बुलाया. रात 3 से 4 बजे के बीच रोहिणी की हत्या करने के बाद सवेरे उठ कर वह बड़े ही सहज ढंग से मटनमछली लाने गया था, सिर्फ इसलिए कि कोई उस पर शक न करे. इतना ही नहीं, पुलिस को चकमा देने के लिए उस ने खुद चोरी भी की थी. चोरी का सारा सामान उस ने मटन लेने जाते समय स्कूटर की डिक्की में रख दिया था.

इस के बाद वह कुछ बताने को तैयार नहीं था. जब प्रकाश राय ने टेलीफोन डायरी का ‘जी’ पेज कैसे फटा, इस बारे में पूछा तो जवाब में उस ने सिर्फ 2 शब्द कहे, ‘‘मालूम नहीं.’’

धनंजय को अगले दिन कोर्ट में पेश करना था. उस रात प्रकाश राय देर तक औफिस में ठहरे थे. एक सिपाही से उन्होंने धनंजय को अपने पास बुलवाया और उसे कुर्सी पर बैठा कर बोले,‘‘धनंजय, मेरा काम पूरा हो गया है. कल तुम्हें जेल भेजने के बाद हमारी मुलाकात कोर्ट में होगी. मुझे मालूम है कि तुम कुछ न कुछ छिपा रहे हो. मैं सत्य जानने के लिए उत्सुक हूं. अब तुम मुझे कुछ भी बतोओगे, उस का कोई लाभ नहीं होगा, क्योंकि तुम्हारे सारे कागजात तैयार हो गए हैं. उस में परिवर्तन नहीं हो सकता है. तुम जो कुछ भी बताओगे, वह मेरे तक ही सीमित रहेगा. अब मुझे बताओ कि तुम ने आनंद और आनंदी को रोहिणी की हत्या की खबर क्यों नहीं दी और आनंदी के फोन नंबर का ‘जी’ तुम ने क्यों फाड़ डाला?’’

धनंजय गंभीर हो गया. उस की आंखों में आंसू भर आए. कुछ क्षणों बाद खुद को संभालते हुए बोला, ‘‘जो सच है, मैं सिर्फ आप को बता रहा हूं. एक सुखी परिवार को नष्ट करना या बचाना, आप के हाथ में है. पर मुझे विश्वास है कि आप यह बात किसी और को नहीं बताएंगे.

‘‘आगरा में रोहिणी की मौसेरी बहन का विवाह था. उसी विवाह में हम आगरा गए थे. विवाह के बाद शताब्दी एक्सप्रेस से हम लौट रहे थे तो हमारी मुलाकात आनंद और आनंदी से हो गई. वे सामने की सीट पर बैठे थे. मैं 2-3 पैग पिए हुए था, फिर भी मुझे नींद नहीं आ रही थी. उस समय मेरी नींद उड़ गई थी.’’

‘‘ऐसा क्यों?’’

‘‘मेरे सामने बैठी आनंदी और कोई नहीं, मेरी प्रेमिका थी. हम दोनों एकदूसरे को जीजान से चाहते थे.’’

‘‘क्या?’’ प्रकाश राय की आंखें हैरानी से फैल गईं, ‘‘अच्छा, फिर क्या हुआ?’’

‘‘मेरी क्या हालत हुई होगी, आप अंदाजा लगा सकते हैं. पास में पत्नी बैठी थी और सामने प्रेमिका, वह भी अपने पति के साथ. मुझे देखते ही आनंदी भी परेशान हो गई थी. मैं असहज मानसिक अवस्था और बेचैनी के दौर से गुजर रहा था, वह भी उसी दौर से गुजर रही थी. सचसच कहूं तो हम दोनों ही अपने ऊपर काबू नहीं रख पा रहे थे.

‘‘इस मुलाकात के असर से उबरने में मुझे 4 दिन लगे. तब मुझे नहीं मालूम था कि एक चक्रव्यूह से निकल कर मैं दूसरे चक्रव्यूह में फंस गया हूं. तब मैं यह भी नहीं जानता था कि इस दूसरे चक्रव्यूह से निकलने के लिए मुझे रोहिणी की हत्या करनी पड़ेगी. खैर…

‘‘ट्रेन में आनंदी और रोहिणी की गप्पें जो शुरू हुईं तो थोड़ी देर बाद वे एकदूसरे की पक्की सहेली बन गईं. आनंदी 2-3 बार मेरे घर भी आई थी. खुदा का लाख शुक्र था कि हर बार मैं घर पर नहीं रहा. मैं आनंदी से मिलना भी नहीं चाहता था. मैं उस से संबंध बढ़ा कर रोहिणी को धोखा देना नहीं चाहता था. इसलिए रोहिणी और आनंदी की बढ़ती दोस्ती से मैं चिंतित था.’’धनंजय सांस लेने के लिए रुका. प्रकाश राय को लगा, कुछ कहने के लिए वह अपने आप को तैयार कर रहा है. उन का अंदाजा गलत नहीं था. धनंजय भारी स्वर में बोला,

‘‘एक दिन ऐसी घटना घटी कि मैं पागल सा हो गया. मुझे लगा, मेरे दिमाग की नसें फट जाएंगी. अपने सिर को दोनों हाथों से थाम कर मैं जहां का तहां बैठ गया. अपने आप पर काबू पाना मुश्किल हो गया. मैं कंपनी के काम से सेक्टर-18 गया था. वहां एक होटल में मैं ने रोहिणी को एक युवक के साथ सटी हुई बैठी देखा, हकीकत जाहिर करने के लिए यह काफी था. मैं यह जानता था कि उस होटल में रूम किराए पर मिलते थे. मैं उस होटल से थोड़ी दूरी पर ही बैठ कर कल्पना से सब देखता रहा. खून कैसे खौलता है, मैं ने उसी वक्त महसूस किया. 12 बजे उस होटल में गई रोहिणी 4 बजे बाहर निकली थी.

‘‘इसके बाद कुछ दिनों की छुट्टी ले कर मैं ने रोहिणी का पीछा किया. अनेक बार रोहिणी मुझे उसी युवक के साथ दिखाई दी. वह युवक और कोई नहीं, आनंद था…आनंदी का पति.’’

धनंजय ने आंखों में भर आए आंसुओं को पोंछा. प्रकाश राय स्तब्ध बैठे थे, पत्थर की मूर्ति बने. थोड़ी देर बाद शांत होने पर धनंजय बोला, ‘‘कैसा अजीब इत्तफाक था. विवाह से पहले मेरी प्रेमिका के साथ मेरे शारीरिक संबंध थे और विवाह के बाद मेरी प्रेमिका के पति के साथ मेरी पत्नी के शारीरिक संबंध. आनंदी को तो मैं पहले से जानता था, लेकिन रोहिणी और आनंद की पहचान तो शताब्दी एक्सप्रेस में हुई थी. यात्रा के दौरान जिस चक्रव्यूह में मैं फंसा था, उस से निकलने के लिए मैं ने रोहिणी को हमेशा के लिए मिटा दिया और आनंदी मेरी नजरों के सामने न आए, इसीलिए मैं ने टेलीफोन डायरी से ‘जी’ पेज फाड़ दिया था. मुझे जो भी सजा होगी, इस का मुझे जरा भी रंज नहीं होगा. मैं खुशीखुशी सजा भोग लूंगा. बस यही है मेरी दास्तान.’’

इस केस की बदौलत आनंद और आनंदी से प्रकाश राय की जानपहचान हो गई थी. कुछ दिनों बाद आनंद से उन्हें एक ऐसी बात पता चली कि उन का सिर चकरा कर रह गया था. जबजब आनंद और आनंदी उन के सामने आते थे, वह बेचैन हो जाते थे और सोचने पर मजबूर हो जाते थे कि काश, धनंजय और आनंदी एवं रोहिणी और आनंद का विवाह हो गया होता.

एक दिन बातचीत में आनंद ने कहा, ‘‘मुझे धनंजय की सजा का दुख नहीं है. अच्छा ही हुआ, उसे सजा होनी भी चाहिए. मुझे दुख है तो रोहिणी का. मैं ने आप से कहा था कि रोहिणी की और मेरी मुलाकात शताब्दी एक्सप्रेस में हुई थी. रोहिणी को देख कर मैं अभेद्य चक्रव्यूह में फंस गया था. आगरा से दिल्ली तक की यात्रा के घंटे मैं ने कैसे बिताए, मैं ही जानता हूं, क्योंकि मेरे सामने बैठी रोहिणी कोई और नहीं, मेरी पूर्व प्रेमिका थी.’’

यह सुनते ही प्रकाश राय के होश फाख्ता होतेहोते बचे. विचित्र था संयोग और भयानक थी भाग्य की विडंबना. क्या सचमुच नियति के खेल में मनुष्य मात्र खिलौना होता है?  (कथा सत्य घटना पर आधारित है, किसी का जीवन बरबाद न हो, कथा में स्थानों एवं सभी पात्रों के नाम बदले हुए हैं) Social Story

 

True Crime Story: ख्वाहिशों से घिरी औरत

True Crime Story: महत्त्वाकांक्षी नंदिनी पति को छोड़ कर लखनऊ में प्रौपर्टी का कारोबार करने के साथसाथ सैक्स रैकेट भी चलाने लगी थी. यही सैक्स का कारोबार उस की जान का दुश्मन बन गया.

9 सितंबर की दोपहर लखनऊ के थाना इंदिरानगर की राहुल विहार कालोनी में रोज की तरह सब ठीकठाक चल रहा था. तभी अचानक सायरन बजाती पुलिस की गाडि़यां कालोनी के एक मकान के सामने आ कर रुकीं तो लोग किसी अनहोनी की आशंका से घरों से बाहर निकल आए. घटना पंकज कुमार सिंह के मकान में घटी थी, जिसे इंदिरानगर के सेक्टर 17 के मकान नंबर 646 में किराए पर रहने वाली नंदिनी तिवारी ने किराए पर ले रखा था. पुलिस के पहुंचते ही उत्सुकतावश भारी संख्या में लोग इकट्ठा हो गए थे.

दरअसल, थाना इंदिरानगर पुलिस को उस मकान में किराए पर रहने वाली नंदिनी तिवारी के बेटे मनीष ने अपनी मां को गोली मारे जाने की सूचना दी थी. उसी की सूचना पर पुलिस वहां पहुंची थी. दिनदहाड़े महिला को गोली मारे जाने की सूचना पा कर डीआईजी डी.के. चौधरी, एसएसपी राजेश पांडेय, सीओ (गाजीपुर) दिनेश पुरी और थानाप्रभारी धीरेंद्र यादव पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गए थे.

पुलिस अधिकारी मकान के बाहरी कमरे को पार कर के पीछे वाले कमरे में पहुंचे तो बैड के पास पड़ी कुरसी पर 45-46 वर्षीया नंदिनी तिवारी घायल पड़ी थी. उस का सिर दाईं ओर झुका था. सिर के नीचे गरदन के ऊपरी हिस्से पर घाव था. इस के अलावा पीठ पर भी गहरा घाव था. इन घावों से बहा खून फर्श पर फैला था. अनुमान लगाया गया कि गोली काफी नजदीक से खड़े हो कर मारी गई थी, जो गरदन से घुस कर पीठ से निकल गई थी.

नंदिनी की सांसें चलती हुई महसूस हुईं तो पुलिस उसे लोहिया अस्पताल ले गई, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. इस के बाद धीरेंद्र यादव ने पुलिसिया काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भिजवा दिया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. बैड पर चाय के कप रखे थे, जिन में सिगरेट के कई टुकड़े पड़े थे. इस का मतलब हत्यारे एक से अधिक थे और मृतका के परिचित थे. कमरे में ही कई मोबाइल फोन टूटे पड़े थे, जिन्हें पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. कुर्सी के पास ही नंदिनी का मंगलसूत्र टूटा पड़ा था.

मकान का कोनाकोना खंगाला गया, लेकिन हत्यारों से जुड़ा कोई सबूत नहीं मिला. मकान में फर्नीचर न के बराबर था. ड्राइंगरूम में एक तख्त, फ्रिज और टीवी था. दूसरे कमरे में डबलबैड और अलमारी थी, जिस में कपड़े और कौस्मैटिक्स का सामान रखा था. जिस बैडरूम में हत्या हुई थी, उस में एक बैड, कुर्सी और अलमारी थी. अलमारी में कपड़े थे. इन के अलावा तीनों कमरों से शराब की बोतलें, डिब्बे और भारी मात्रा में आपत्तिजनक चीजें बरामद हुईं, जिस से अंदाजा लगाया गया कि नंदिनी सैक्स रैकेट चलाती थी. इस का मतलब उसी धंधे से जुड़े किसी आदमी से उस का विवाद हो गया था, जिस में उस की हत्या हो गई थी.

पुलिस अधिकारियों ने नंदिनी के बेटे मनीष से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस की मां नंदिनी उस के और भाई संदीप के साथ इंदिरानगर के सेक्टर 17 में रहती थी. वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम करती थी. 3 महीने पहले उस ने यह मकान किराए पर लिया था. इस में वह दिन में एक बार जरूर आती थी. इस मकान में उस की परिचित एक महिला पुनीता उर्फ खुशी करीब एक महीने से पति संजय यादव और बेटे के साथ रह रही थी. लगभग ढाई बजे खुशी और एक अन्य महिला सोनिया मेहरोत्रा ने आ कर उसे घटना की सूचना दी थी. सोनिया एलआईसी एजेंट थी. वह चौक में पान वाली गली में रहती थी. नंदिनी को गोली मारी गई तो खुशी और सोनिया घर में ही मौजूद थीं, इस का मतलब हत्या उन के सामने हुई थी.

इस के बाद पुलिस अधिकारियों ने खुशी और सोनिया से पूछताछ की. खुशी ने बताया कि लगभग डेढ़ बजे 2 लड़के आए तो नंदिनी उन्हें ले कर पीछे वाले कमरे, जो बैडरूम था, में चली गईं. उन के कहने पर वह उन के लिए चायनाश्ता भी दे आई. लगभग 2 बजे सोनिया जन्माष्टमी का प्रसाद ले कर मिलने आई तो नंदिनी के व्यस्त होने की वजह से वह बाहरी कमरे, जो ड्राइंगरूम था, में रुक गई और उस के साथ बैठ कर टीवी देखने लगी.

कुछ देर बाद नंदिनी ने आवाज दे कर उन्हें बैडरूम में अपने पास बुला लिया. उस समय नंदिनी की दोनों लड़कों से कहासुनी हो रही थी. दोनों लड़कों ने उसे और सोनिया को एक तरफ खड़ा कर दिया और उन में से एक लड़के ने जेब से पिस्तौल निकाल कर नंदिनी को गोली मार दी. उन्होंने उन्हें भी गोली मारने की कोशिश की, लेकिन किसी कारण से गोली नहीं चली.

इस के बाद उन लड़कों ने उन के और नंदिनी के गहने तथा मोबाइल छीन लिए. मोबाइलों को तो उन्होंने तोड़ कर वहीं फेंक दिए और बाहर से कमरा बंद कर के भाग गए. कमरे में बने रोशनदान से किसी तरह वह निकल कर बाहर आई और कमरा खोल कर सोनिया को निकाला. इस के बाद उस ने घटना की सूचना मनीष को दी. सोनिया ने खुशी की बात की पुष्टि की. उस ने बताया कि वह नंदिनी को 6 साल से जानती थी. उस ने नंदिनी का बीमा किया था. इस के बाद नंदिनी ने उस से कई लोगों का बीमा करवाया था. आज वह जन्माष्टमी का प्रसाद देने आई थी, तभी यह घटना घट गई. इस के बाद खुशी और सोनिया ने दोनों अज्ञात हत्यारों का जो हुलिया बताया था, उस के हिसाब से उन की उम्र 22-23 साल रही होगी.

अब तक फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड आ गए थे. फोरैंसिंक टीम घटनास्थल से साक्ष्य जुटाने में लग गई. डौग स्क्वायड का खोजी कुत्ता कमरे से निकल कर बाहर आया और कालोनी की गलियों में घूमता हुआ करीब 2 सौ मीटर दूर बनी झोपड़पट्टी के पास जा कर रुक गया. आसपास के लोगों से भी पूछताछ की गई, लेकिन उन से भी कोई ठोस सुराग हाथ नहीं लग सका.

थाने से चंद कदमों की दूरी पर यह घटना घटी थी. नंदिनी के घर से थाने के लिए 2 रास्ते थे. एक तो काफी खराब था, दूसरा पक्का था. दोनों रास्तों पर सीसीटीवी कैमरे तलाशे गए, लेकिन कहीं भी कैमरा लगा नहीं मिला. हत्यारों के थाने के सामने से निकलने के बारे में सोच कर थाने के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज खंगाली गई तो उस में भी ऐसा कोई आदमी नजर नहीं आया, जैसा हुलिया खुशी और सोनिया ने बताया था. पुलिस ने घर वालों, सभी करीबियों तथा परिचितों के मोबाइल नंबर ले लिए. इस के बाद थाने आ कर धीरेंद्र यादव ने मृतका के बेटे मनीष तिवारी की तहरीर पर अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. सोनिया और खुशी को बुला कर उन के बताए अनुसार, हत्यारों के स्कैच बनवाए गए.

अब तक की जांच में पता चला था, नंदिनी अपने पति अजय तिवारी से 19 सालों से अलग रह रही थी. अजय बिहार के सीवान जिले में नौकरी करता था. नंदिनी के बेटे मनीष ने अपने पिता को घटना की खबर न दे कर लखनऊ में ही रहने वाले अपने मौसीमौसा को खबर दी थी. घटना की खबर पा कर सभी रिश्तेदार पोस्टमार्टम हाउस पहुंच गए थे. रिश्तेदारों ने अजय को भी नंदिनी की हत्या की सूचना दी थी, पर वह नहीं आया था. पोस्टमार्टम के बाद शव मिलने पर बेटों ने रिश्तेदारों की मदद से उस का अंतिम संस्कार कर दिया था.

अगले दिन जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उस में गोली मारने से पहले नंदिनी के साथ मारपीट किए जाने की भी पुष्टि हुई. नंदिनी की गरदन के पीछे ऐसे निशान पाए गए थे, जो उस के साथ हुई मारपीट की तरफ इशारा कर रहे थे. धीरेंद्र यादव ने नंदिनी के तीनों मोबाइल नंबरों को चेक किया. उस के वाट्सएप नंबर वाले मोबाइल पर कई लड़कियों के ऐसे फोटो और मैसेज मिले, जिस से उस के गलत कामों में लिप्त होने के संकेत मिल रहे थे.

घटनास्थल से मिली आपत्तिजनक चीजों और मोबाइल से मिले फोटो से लग रहा था कि नंदिनी सैक्स रैकेट चलाती थी. सोशल मीडिया द्वारा भेजे गए संदेशों से भी लग रहा था कि नंदिनी के कई लड़कियों से संपर्क थे. पुलिस ने जब नंदिनी के बड़े बेटे संदीप का मोबाइल चेक किया तो उस के मोबाइल में भी कई लड़कियों के फोटो मिले, जो उस ने वाट्सएप से दूसरों को भेजे थे. पुलिस ने नंदिनी के नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस में जिन नंबरों पर नंदिनी की ज्यादा बातचीत होती थी, उन नंबरों को अलग कर लिया गया. उन नंबरों की घटना के दिन की लोकेशन देखी गई. जिस नंबर की लोकेशन घटनास्थल के नजदीक की थी. उन का रिकौर्ड देखा गया.

उन नंबरों में से एक नंबर की लोकेशन पहले इंदिरानगर और फिर खुर्रमनगर की थी. उस नंबर से घटना के दिन नंदिनी के नंबर पर फोन भी आया था. उस नंबर के बारे में पता किया गया तो वह नंबर लखनऊ के गोमतीनगर थानाक्षेत्र के विनीत खंड निवासी अभिषेक कनौजिया का निकला. थानाप्रभारी ने अभिषेक के कालेज का पता कर के कालेज से उस की फोटो निकलवाई. इस बात की भनक अभिषेक और उस के किसी करीबी को भी नहीं लगने दी गई. वह फोटो उन्होंने खुशी और सोनिया को दिखाया तो उन्होंने उसे पहचान लिया. वह दोनों हत्यारों में से एक था और उसी ने नंदिनी की गोली मार कर हत्या की थी.

इस के बाद पुलिस ने अभिषेक के घर पर दबिश दी तो वह घर से फरार मिला. 12 सितंबर को धीरेंद्र यादव ने एक गुप्त सूचना पर गोमतीनगर में हुसडि़या पुल के पास से अभिषेक कनौजिया को उस के एक साथी के साथ गिरफ्तार कर लिया. अभिषेक के साथ गिरफ्तार हुए युवक का नाम विनय चौहान था और वह गोमतीनगर में विनय खंड में रहता था. अभिषेक से पूछताछ की गई तो उस ने विनय के साथ मिल कर नंदिनी की हत्या करने का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने हत्या के पीछे की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

नंदिनी बिहार के सीवान जिले की रहने वाली थी. उस के पति अजय तिवारी कृषि विभाग में नौकरी करते थे. उन के 2 बेटे थे, संदीप और मनीष. नंदिनी पहले तो ठीकठाक थी, लेकिन 2 बेटों के होने के बाद उस में अचानक आश्चर्यजनक परिवर्तन आ गया था. इस की वजह थी, उस की संगति कुछ अमीर घर की महिलाओं से हो गई थी. वे महिलाएं दिल खोल कर पैसे खर्च करती थीं और ठाठ से रहती थीं. संगति का असर तो होना ही था. नंदिनी को भी उन महिलाओं की तरह पैसे खर्च करने की आदत पड़ गई. वैसे भी साथ में रह कर खर्च करना ही पड़ता है.

इस फिजूलखर्ची को ले कर नंदिनी की पति से रोज कहासुनी होने लगी. अजय ने उसे काफी समझाया, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ. रोजरोज झगड़े होने लगे तो नंदिनी को अजय के साथ रहना दुश्वार लगने लगा. आखिर उस ने अजय से अलग होने का फैसला कर लिया. अजय ऐसा नहीं चाहता था, लेकिन वह भी नंदिनी की हरकतों से आजिज हो चुका था. इसलिए वह भी अलग होने को तैयार हो गया. अजय ने उसे एक निश्चित रकम दे कर पीछा छुड़ा लिया. दोनों बेटों के साथ नंदिनी 1996 में लखनऊ आ गई. यहां उस ने जानकीपुरम के सेक्टर 3 में एक तीनमंजिला मकान नंबर 407 खरीद लिया और उसी में अपने दोनों बेटों के साथ रहने लगी. उस ने घर में किराएदार भी रख लिए, जिस से उस का खर्च चलने लगा.

लखनऊ में उस ने कुछ परिचितों की मदद से प्रौपर्टी डीलिंग का काम शुरू किया. यहां पारा थानाक्षेत्र में उस के बहनोई रहते थे, उन से भी उसे मदद मिलती थी. धीरेधीरे नंदिनी का काम चल निकला. इस काम से उसे अच्छा मुनाफा होेने लगा. जल्दी ही उस का परिचय रसूखदारों, नेताओं और अधिकारियों से हो गया. महिला होने का उसे फायदा भी काफी मिला. हाईसोसायटी के लोगों में उठनाबैठना शुरू हुआ तो तरहतरह के लोगों से उस का वास्ता पड़ने लगा. नंदिनी उन के साथ रह कर शराब भी पीने लगी. वह अमर सिंह की पार्टी से भी जुड़ गई, जिस में उसे महिला लोकमंच का नगर अध्यक्ष बना दिया गया.

हाईसोसायटी में 2 चीजें प्रसिद्ध होती हैं, एक शराब और दूसरी शबाब. इस की वजह यह है कि ऐसे लोगों के पास पैसों की कमी तो होती नहीं. जब इंसान के पास अथाह पैसा होता है तो उस में ऐब आ ही जाते हैं. इन में सब से बड़े ऐब शराब और शबाब हैं. इन चीजों की जानकारी नंदिनी को भी हो गई. उस ने देखा, इस काम में बैठेबिठाए जितना पैसा मिलता है, उतना किसी काम में नहीं है. कमाई देख कर नंदिनी ने इस काम को अपनाने का फैसला कर लिया. उस के संपर्क में कुछ ऐसी लड़कियां थीं, जो पैसों की खातिर कुछ भी करने को तैयार थीं. नंदिनी ने उन से बात की तो वे चोरीछिपे यह काम करने को तैयार हो गईं. कुछ घंटों में हजारों कमाने की चाहत में वे लड़कियां इस दलदल में उतर गईं.

लड़कियों के आने के बाद नंदिनी उन की डीलिंग करने लगी. अपने संबंधों का फायदा उठा कर वह लोगों को पैसों के बदले लड़कियां होटलों या उन के बताए ठिकाने पर उपलब्ध कराने लगी. उस का यह धंधा दिन दूना रात चौगुना तरक्की करने लगा. इसी बीच नंदिनी ने देखा कि कई ग्राहक ऐसे होते हैं, जो होटलों में जाने का खतरा नहीं उठाना चाहते. ऐसे लोगों के लिए नंदिनी ने इंदिरानगर के सेक्टर 17 में मकान नंबर 646 किराए पर ले लिया. यह मकान एलआईसी में नौकरी करने वाले विनोद सिंह का था. इसी मकान में लोगों को लड़कियां मुहैया कराती थी. नंदिनी ग्राहकों से मिले रुपयों से 25 प्रतिशत लड़कियों को देती थी, बाकी खुद रख लेती थी.

इस के बाद वह अपने बेटों के साथ इंदिरानगर वाले मकान में शिफ्ट हो गई. यहां आने के बाद उस ने सैक्स वाला धंधा बंद कर दिया. उस ने जानकीपुरम वाला अपना मकान किराए पर उठा दिया था. धंधे के लिए उस ने राहुलविहार में एक मकान किराए पर ले लिया. वह अपना काम इतने गुपचुप ढंग से करती थी कि किसी को खबर नहीं लगती थी. उस के बेटों तक को इस बात की खबर नहीं थी कि उन की मां ने और भी कोई मकान किराए पर ले रखा है. थोड़ेथोड़े समय पर वह मकान  बदल देती थी.

चूंकि वह प्रौपर्टी डीलिंग के धंधे से जुड़ी थी, इसलिए उस के घर बड़ेबड़े लोगों का आनाजाना लगा रहता था. इस की वजह से आसपास के लोगों को उस पर शक नहीं होता था. यही वजह थी कि वह कभी पकड़ी नहीं गई. कोई भी मकान किराए पर लेने पर मकानमालिक सत्यापन कराता तो वह पाकसाफ निकलती. इसलिए आसानी से उसे मकान किराए पर मिल जाता था. दूसरी ओर नंदिनी के दोनों बेटे अपनी मां के कार्य से अंजान अपना कैरियर बनाने की कोशिश कर रहे थे.

इस समय बड़ा बेटा संदीप माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से मासकौम की पढ़ाई कर रहा है तो छोटा मनीष पीसीएस की तैयारी कर रहा है. नंदिनी ने स्पीक एशिया जैसी कंपनी में भी अपना पैसा लगा रखा था. उस ने कई बीमे भी करा रखे थे. ये सारे बीमे उस ने चौक की पान वाली गली निवासी सोनिया मेहरोत्रा से कराए थे. 35 वर्षीया सोनिया एलआईसी एजेंट थी. उस का पति आजाद मेहरोत्रा भी एलआईसी एजेंट था. सोनिया के नंदिनी से इतने घनिष्ठ संबंध थे कि नंदिनी ने अपनी पहुंच से उसे कई मालदार आसामियों के बीमे कराए थे.

लखनऊ के गोमतीनगर थानाक्षेत्र के विनीत खंड में अभिषेक कनौजिया उर्फ विस्सू रहता था. वह बाराबंकी के एक कालेज से बीकौम की पढ़ाई कर रहा था. उस के पिता अनिल कुमार कनौजिया लेखाविभाग में क्लर्क थे. कालेज के कुछ मित्रों की संगत में पड़ कर अभिषेक ने गलत राह पकड़ ली थी. वह इतना खूबसूरत नहीं था कि कालेज की लड़कियां उस की ओर आकर्षित होतीं. दोस्तों के बीच हमेशा लड़कियों के बारे में बातें होती रहती थीं, लेकिन लड़कियों का सान्निध्य मिलना तो दूर, उन लोगों की तरफ कोई देखती तक नहीं थी.

सभी दोस्त शराब और पोर्न फिल्मों के शौकीन थे. महंगे स्मार्टफोन पास में होने के कारण सोशल मीडिया के जरिए वे एकदूसरे को अश्लील फोटो व वीडियो क्लिप भेजते रहते थे. अभिषेक के कुछ दोस्त अपने तन की गरमी शांत करने के लिए कालगर्ल्स के पास भी जाने लगे थे. कालगर्ल्स से मिलने वाले आनंद को वे दोस्तों के सामने आ कर बढ़ाचढ़ा कर बताते, जिस से अभिषेक के मन में भी वह आनंद पाने की चाहत जाग उठी. इस के लिए उस ने अपने बहराइच निवासी एक दोस्त सलमान से बात की तो उस ने उस की मुलाकात नंदिनी तिवारी से करा दी. सलमान नंदिनी के यहां मौजमस्ती करने जाता रहता था.

अभिषेक की मुलाकात नंदिनी से हुई तो वह हर हफ्ते उस के यहां जाने लगा. नंदिनी उसे उस की पसंद की लड़की 2 घंटे के लिए अपने ही घर में उपलब्ध करा देती थी, बदले में उस से 8 से 10 हजार रुपए ले लेती थी. अभिषेक नंदिनी के मकान में शराब पीता और पसंद की हुई लड़की के साथ रंगरलियां मनाता. धीरेधीरे अभिषेक ने इस मौजमस्ती में अपने सारे रुपए उड़ा दिए. जब उस के पास पैसे नहीं रहे तो उस ने दूसरों से कर्ज लेना शुरू कर दिया. वह शराब और सैक्स का इतना आदी हो गया था कि इन दोनों के बिना रह नहीं सकता था. कर्ज में लिए गए रुपए भी खत्म हो गए. ऐसी हालत में जब वह बिना पैसों के नंदिनी के यहां जाता तो नंदिनी उसे लड़कियों के सामने ही दुत्कारने लगती.

जून, 2015 में नंदिनी ने किराए पर मकान दिलाने वाले ब्रोकर का पैंफ्लेट देखा तो उस में लिखे मोबाइल नंबर पर फोन किया और किराए का मकान दिलाने को कहा. उस ब्रोकर ने मूलरूप से सीतापुर निवासी प्रौपर्टी डीलर विनीत से नंदिनी को मिलवाया. नंदिनी ने प्रौपर्टी डीलर विनीत को अपनी आईडी के तौर पर आधार कार्ड की छायाप्रति दी और कहा कि उस के पति बाहर नौकरी करते हैं और उस के 2 बच्चे हैं, जो स्कूल में पढ़ते हैं.

यह झूठ बोल कर नंदिनी ने किसी तरह प्रौपर्टी डीलर को झांसे में ले लिया, जिस के बाद उस प्रौपर्टी डीलर ने नंदिनी को इंदिरानगर थानाक्षेत्र के राहुल विहार में पंकज कुमार सिंह का मकान 10 हजार रुपए मासिक किराए पर दिला दिया. मकान मालिक पंकज सिंह हरिद्वार में नौकरी करता था और परिवार के साथ रहता था. पंकज का भाई इंदिरानगर में रहता था, उसे ही हर महीने किराया देने की बात तय हुई. इस मकान की देखभाल और आने वाले मेहमानों की आवभगत के लिए नंदिनी ने 8 अगस्त को पुनीता उर्फ खुशी को रख लिया. 30 वर्षीया खुशी नंदिनी के जानकीपुरम वाले मकान के पड़ोस में रहती थी. वहीं उस का नंदिनी से परिचय हुआ था.

मूलरूप से बिहार निवासी पुनीता उर्फ खुशी तिवारी ने सीतापुर के संदना थानाक्षेत्र निवासी संजय यादव उर्फ छोटू से विवाह किया था. उस का 3 साल का बेटा था. संजय लखनऊ के विकासनगर थानाक्षेत्र की एक कपड़े की दुकान पर काम करता था. वह सुबह घर से निकलता था तो देर रात लौटता था. इस मकान में 3 कमरे थे, जिन में से 2 कमरे बैडरूम और एक कमरा ड्राइंगरूम बना दिया गया. जो मिलने आता था, उसे ड्राइंगरूम में बैठा दिया जाता था और दोनों बैडरूम लोगों को लड़कियों के साथ मौजमस्ती के लिए मुहैया कराए जाते थे. नंदिनी इस मकान में अकसर दिन में आती थी, कभीकभी रात में भी रुक जाती थी.

दूसरी ओर नंदिनी के तानों से आजिज अभिषेक ने उसे सबक सिखाने की ठान ली थी. उस ने अपनी मोटरसाइकिल खरगापुर निवासी सुरेंद्र बहादुर को 20 हजार रुपए में बेच दी और उसी पैसों से उस ने एक पिस्तौल खरीदी. इस के बाद उस ने अपने दोस्त विनय चौहान से बात की. वह उस का साथ देने को तैयार हो गया. विनय गोमतीनगर में विनय खंड में रहता था. वह ताज होटल में वेटर था, लेकिन इधर उस ने नौकरी छोड़ दी थी.

9 सितंबर की सुबह अभिषेक ने नंदिनी को मिलने के लिए फोन किया तो उस ने उसे बुला लिया. लेकिन उस ने उसे अपने लिए वोदका शराब की एक बोतल लाने को कहा. अभिषेक ने नंदिनी के लिए वोदका शराब और अपने दोनों के लिए बीयर के 2 केन खरीदे. इस के बाद वह विनय के साथ औटो से नंदिनी के इंदिरानगर के राहुल विहार वाले मकान पर पहुंच गया. अभिषेक ने नंदिनी के सामने आते ही पैर छुए. नंदिनी उन दोनों को ले कर बैडरूम में चली गई. उसी बीच उस ने खुशी से चायनाश्ता दे जाने के लिए कहा. नंदिनी से अभिषेक बातें करने लगा. खुशी चाय बना कर दे गई. तीनों ने चाय पी. इस के 15 मिनट बाद नंदिनी ने शराब पी तो अभिषेक और विनय ने बीयर पी.

नंदिनी ने उन दोनों की बीयर में अपनी थोड़ी शराब भी डाल दी. तभी सोनिया जन्माष्टमी का प्रसाद देने आई. नंदिनी को 2 लड़कों से बातें करते देख वह ड्राइंगरूम में बैठ कर टीवी देखने लगी. जब शराब का नशा चढ़ा तो नंदिनी ने अभिषेक को ताना मारा कि उस के पास रुपए नहीं है तो वह क्यों चला आता है. इस के बाद दोनों में कहासुनी होने लगी. नंदिनी से अभिषेक ने मारपीट की तो उस ने ड्राइंगरूम में बैठी खुशी और सोनिया को कमरे में बुला लिया. उस ने दोनों को कमरे में एक किनारे खड़ा कर दिया. विनय ने उन्हें कवर किया तो अभिषेक ने जेब से पिस्टल निकाल कर खड़ेखड़े कुर्सी पर बैठी नंदिनी को पास से गरदन के ऊपरी हिस्से में गोली मार दी, जो कि पीठ से बाहर निकल गई.

नंदिनी घायल अवस्था में बेहोश हो गई. अभिषेक ने नंदिनी, खुशी और सोनिया के मोबाइल ले कर तोड़ दिए. अभिषेक को उन दोनों से खतरा नहीं था, क्योंकि वे उसे पहचानती नहीं थीं. फिर उन्हें कमरे में बंद कर के दोनों वहां से बाहर निकले और औटो से चले गए. कमरे में एसी लगाने के लिए रोशनदान में गत्ता लगा हुआ था, जिसे हटा कर खुशी बाहर निकली और कमरे का दरवाजा खोल कर सोनिया को बाहर निकाला. इस के बाद उन्होंने नंदिनी के बेटे मनीष को घटना की सूचना दी.

धीरेंद्र यादव ने अभियुक्तों की निशानदेही पर अंसल से हत्या में प्रयुक्त पिस्तौल बरामद कर ली. खुशी और सोनिया से हुई लूट की बात पुलिस जांच में गलत निकली. आवश्यक काररवाई के बाद दोनों को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Social Crime Story: आशिकी ने लगाया गृहस्थी पर ग्रहण

Social Crime Story: सरस्वती को पता चला कि राजपाल का उस की भौजाई से याराना चल रहा है तो उस ने गांव के ही महेश से संबंध बना लिए. इस के बाद ऐसा क्या हुआ कि उसे पति का खून करना पड़ा. शादी के बाद उस की जिंदगी काफी खुशहाल थी. पति और सासससुर का उसे भरपूर प्यार मिलता था. नत्थू सिंह और जाविकी के 2 बेटे थे. बड़ा शिशुपाल और छोटा राजपाल. शादी के कुछ सालों बाद शिशुपाल और उस की पत्नी गुड्डो अपने बच्चों के साथ बगल वाले मकान में अलग रहने लगे थे. छोटे बेटे राजपाल की शादी के बाद जाविकी ने साफ कह दिया था कि बहूबेटा उन के साथ ही रहेंगे.

उत्तर प्रदेश के एटा जिले के गांव फरीदपुर के रहने वाले नत्थू सिंह के छोटे बेटे राजपाल का विवाह बदायूं जिले के गांव कलुआं ढेर निवासी प्रेमपाल की छोटी बेटी सरस्वती के साथ हुआ था. ससुराल में सरस्वती को पति का नहीं, सासससुर का भी खूब प्यार मिला. कालांतर में सरस्वती 3 बेटों, प्रदीप, पवन और मनीष की मां बनी. बेटों के जन्म के बाद ससुराल में सरस्वती का सम्मान और बढ़ गया. राजपाल एटा में नगरिया मोड़ पर स्थित दूध की डेयरी में काम करता था. उसे वहां से जो वेतन मिलता था, उस से परिवार का गुजारा आसानी से हो जाता था. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि इसी बीच एक दिन सरस्वती की भाभी रामस्नेही उस के यहां आई.

रामस्नेही उस के यहां रही तो 2-3 दिन ही, पर उतने ही दिनों में उस ने सरस्वती के गृहस्थ जीवन में आग लगा दी थी. उस की अपने ननदोई राजपाल से नजदीकियां बढ़ गई थीं, जिस की वजह से राजपाल का पत्नी सरस्वती से मन उचट गया था. उस की दिलचस्पी रामस्नेही में बढ़ गई थी. जल्दी ही सरस्वती को पति का प्यार दिखावा लगने लगा था. इस बारे में जब उस ने पति से पूछा तो वह पत्नी को समझाने के बजाय उस पर खीझ जाता था. पति का यह व्यवहार सरस्वती को जरा भी अच्छा नहीं लगता था. वह मन मसोस कर रह जाती थी.

गांव में राजपाल का एक दोस्त था महेश. उस का उस के यहां काफी आनाजाना था. महेश शादीशुदा था. उसे राजपाल और उस की पत्नी के बीच बढ़ रही दूरियों की जानकारी थी. इसी बात का वह फायदा उठाना चाहता था.

एक दिन महेश राजपाल की गैर मौजूदगी में उस के घर आया. सरस्वती ने उसे देख कर कहा, ‘‘वह तो ड्यूटी पर गए हैं.’’

‘‘जानता हूं भाभी, वह नहीं हैं तो क्या मैं आप से बातें नहीं कर सकता?’’

‘‘हां…हां, क्यों नहीं, आइए.’’ कहते हुए सरस्वती ने उसे घर में आने का इशारा किया.

महेश घर के अंदर आ कर चारपाई पर बैठ गया. उस ने सरस्वती का हालचाल पूछा तो उस ने कहा कि वह बिलकुल ठीक है. महेश ने मौके का फायदा उठाते हुए सरस्वती का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘भाभी, मैं जानता हूं आप कह जरूर रही हैं कि सब ठीक है, लेकिन कुछ भी ठीक नहीं हैं. आप अपने दिल पर हाथ रख कर कहिए कि राजपाल आप का दिल नहीं दुखा रहा है. सब कुछ सहते हुए भी आप के होंठों पर मुसकान है. भाभी, आप अपने मुंह से भले ही न कहें, लेकिन मैं आप का दुख समझता हूं.’’

महेश अपनी मीठीमीठी बातों से सरस्वती को पटाने की कोशिश करने लगा. सरस्वती काफी अवसाद में थी. ऐसी हालत में महेश उसे अपना सा दिखाई देने लगा. तभी महेश चारपाई से उठ कर चलते हुए बोला, ‘‘मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है भाभी कि राजपाल इतनी खूबसूरत बीवी की उपेक्षा क्यों कर रहा है?’’

इतना कह कर वह घर से निकल गया. महेश के जाने के बाद सरस्वती उस की बातों पर विचार करने लगी. उसे महेश की बातें बिलकुल ठीक लग रही थीं. उस का ध्यान महेश पर जम गया. अब उस का मन महेश के लिए बेचैन हो उठा. लेकिन इधर वह दिखाई नहीं दे रहा था. एक दिन दोपहर के समय महेश उस के यहां अचानक आ गया. उसे देखते ही वह खुश हो गई. मौका देख कर उस दिन महेश ने कह दिया कि वह उसे प्यार करता है.

सरस्वती कमजोर औरत थी, जरा सा सहारा मिलते ही वह महेश की बांहों में आ गिरी. वह यह भी भूल गई कि वह 3 बच्चों की मां है. उसे पता नहीं था कि पतन का रास्ता बड़ा ही फिसलन भरा होता है. एक बार जो इस पर कदम रख देता है, वह संभल नहीं पाता. सरस्वती के साथ भी यही हुआ. महेश के साथ नजदीकी बनने के बाद वह खुद को उस से अलग नहीं कर पाई. महेश ने जो चाहा था, वह उसे मिल चुका था, इसलिए उस का सरस्वती के यहां वक्तबेवक्त आनाजाना शुरू हो गया था. दोनों ने मिलनेजुलने में सावधानी तो खूब बरती, लेकिन मोहल्ले वालों की नजरों से नहीं बच सके. दोनों के बारे में लोग तरहतरह की बातें करने लगे.

बात राजपाल के कानों तक पहुंची तो उस ने पत्नी से पूछताछ की. पति की तरफ से सरस्वती का मन पहले से ही खट्टा था, इसलिए अपने बारे में कुछ कहने के बजाय उस ने पति को अपनी भाभी रामस्नेही के संबंधों को ले कर खरीखोटी सुना दी. मजबूरन राजपाल को अपना मुंह बंद करना पड़ा. राजपाल के बड़े भाई शिशुपाल का घर बिलकुल बगल में था. शिशुपाल की पत्नी गुड्डो ने जब उसे महेश और सरस्वती के संबंधों के बारे में बताया तो उस ने एक दिन राजपाल को अपने घर बुला कर कहा कि यह सब ठीक नहीं है. महेश का इस तरह सरस्वती से मेलजोल रखने का मतलब क्या है?

भाई की बात सुन कर राजपाल को लगा कि अब उस की मोहल्ले मे खासी बदनामी हो रही है. इस के बाद उस ने गुस्से में सरस्वती की पिटाई कर दी. पिटने के बाद भी सरस्वती कहती रही कि उस के महेश के साथ गलत संबंध नहीं है. लोग वैसे ही उसे बदनाम कर रहे हैं. लेकिन राजपाल को उस की बातों पर यकीन नहीं हुआ. वह अब पत्नी पर निगाह रखने लगा. महेश से संबंध बनने के बाद सरस्वती अपने सासससुर से अलग पति के साथ दूसरे मकान में रहने लगी थी. प्रेमी से मिलने के लिए उस ने एक दूसरा रास्ता निकाल लिया. वह रात के खाने में पति को नींद की गोलियां मिला कर खिला देती थी, जिस से जल्द ही वह गहरी नींद सो जाता था. इस के बाद प्रेमी महेश के साथ वह मौजमस्ती करती थी.

लेकिन एक दिन सरस्वती ने राजपाल को नींद की गोलियां खाने में खिलाईं तो उस के कुछ देर बाद उसे किसी वजह से उलटियां हो गईं, जिस से उस का खाया हुआ ज्यादातर खाना बाहर निकल गया. उलटियां कर के वह बिस्तर पर लेट गया. सरस्वती ने सोचा कि वह सो गया होगा, इसलिए रोज की तरह उस ने महेश को फोन कर दिया. बिना किसी डर के दोनों अपनी हसरतें पूरी करने लगे. उसी दौरान अचानक राजपाल की आंखें खुल गईं. उस के जागते ही महेश वहां से भाग गया. लेकिन राजपाल को पत्नी की हकीकत पता चल गई. उस दिन उस ने उस की खूब पिटाई की.

राजपाल को अब अपनी गृहस्थी बिखरती नजर आ रही थी. उस ने इस बारे में अपने भाई शिशुपाल से बात की. दोनों ने सलाह कर के इस मामले में पंचायत बुलाने का फैसला किया. पंचायत बुलाई गई. पंचायत में महेश के पिता इंदुपाल को भी बुलाया गया. पंचों ने इंदुपाल से साफ कह दिया कि वह महेश को समझा ले, वरना उस के परिवार का हुक्कापानी बंद कर दिया जाएगा.

घर वालों के दबाव में महेश ने सरस्वती से दूरी तो बना ली, लेकिन उस का दिल उस के लिए बेचैन रहता था. उधर सरस्वती की हालत भी बिन पानी मछली जैसी हो रही थी. इस बात ने सरस्वती के मन में पति के प्रति नफरत पैदा कर दी. पतिपत्नी के बीच दूरियां बढ़ती जा रही थीं. उसी बीच एक दिन राजपाल के पास रामस्नेही का फोन आया. उस ने कहा कि उस के पति नौबत सिंह की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई है.

राजपाल ने नौबत सिंह की बीमारी की बात सरस्वती को बताई और उसे ले कर कलुआं पहुंच गया. उस ने नौबत सिंह को अस्पताल में भरती करा दिया. लेकिन वह बच नहीं पाया. उस की मौत हो गई. नौबत सिंह की मौत के बाद रामस्नेही एकदम अकेली हो गई. नौबत सिंह रेलवे में नौकरी करता था. अब रामस्नेही राजपाल के सहयोग से मृतक आश्रित के तहत नौकरी पाने की कोशिश करने लगी.

सरस्वती तो कुछ दिनों बाद अपने घर आ गई, पर सलहज की नौकरी के सिलसिले में राजपाल का उस के यहां आनाजाना लगा रहा. सरस्वती मन ही मन बेचैन थी. वह महेश से मिलना चाहती थी, पर उसे एक बुरी खबर मिली कि महेश ट्रैक्टर के नीचे आ गया है, जिस से उस का पैर कट गया है. इस का सरस्वती को बड़ा दुख हुआ. इधर साले नौबत सिंह की मौत के बाद राजपाल सलहज की आर्थिक मदद भी करने लगा था. जब इस बात की जानकारी सरस्वती को हुई तो उस ने ऐसा करने से मना किया.

राजपाल ने उसे यह समझाने की कोशिश की कि रामस्नेही को जब नौकरी मिल जाएगी तो उस के सामने फिर कोई समस्या नहीं रहेगी. शक का एक कीड़ा सरस्वती के दिमाग में और बैठ गया. इसी बीच एक दिन रामस्नेही और उस के बच्चों को राजपाल अपने घर लिवा लाया. वह उस के यहां लगभग 15 दिनों तक रही. उस दौरान राजपाल रामस्नेही से खूब हंसीमजाक करता था. इस बात से सरस्वती को लगा कि उस का पति उस के हाथ से निकल गया है. रामस्नेही तो अपने घर चली गई, पर सरस्वती और राजपाल के रिश्तों में जो कड़वाहट पैदा हुई, वह खत्म नहीं हो सकी. आए दिन उन के बीच झगड़ा होने लगा. सरस्वती का गुस्सा बढ़ता जा रहा था. उसे अपना और अपने बच्चों का भविष्य खतरे में दिखाई देने लगा था.

उस के मन में डर पैदा हो रहा था कि यदि पति ने उसे छोड़ दिया तो वह बच्चों को ले कर कहां जाएगी. राजपाल की अपनी सलहज रामस्नेही से नजदीकी लगातार बढ़ती जा रही थी. अब वह कईकई दिनों तक घर नहीं आता था. वह रामस्नेही के पास चला जाता. सरस्वती जब कभी पूछती तो कह देता कि डेयरी पर ज्यादा काम होने की वजह से वह वहीं रुक गया था. सरस्वती जानती थी कि वह झूठ बोलता है. गुस्से में एक दिन सरस्वती ने अपनी भाभी रामस्नेही को खूब खरीखोटी सुनाई, तब रामस्नेही ने उसे अपने दिल की बात बताते हुए कहा कि वह राजपाल से दूर नहीं रह सकती और वे दोनों साथ रह सकती हैं. सरस्वती आगबबूला होते हुए बोली, ‘‘भाभी, तुम जो कर रही हो, ठीक नहीं है. देखना एक दिन तुम्हें इस का अंजाम भुगतना पड़ेगा.’’

इधर रामस्नेही के भाई को जब बहन की हरकतों की जानकारी हुई तो उस ने भी रामस्नेही को समझाया और कहा कि वह जो कर रही है, उस से समाज में उस की अच्छीखासी बदनामी हो रही है. यह सब ठीक नहीं है. रामस्नेही ने भाई से भी कह दिया कि मरते वक्त उस के पति ने उस का और बच्चों का भार राजपाल पर डाल दिया था. इसलिए अब वह उन के साथ ही रहेगी. बहन के इस जवाब से भाई नाराज हो गया, लेकिन रामस्नेही ने इस की कोई परवाह नहीं की.

अब रामस्नेही और राजपाल ने साथसाथ रहने का फैसला कर लिया. उन्हें समाज की कोई परवाह नहीं थी. रामस्नेही को मर्द की जरूरत थी, वह जरूरत उस के ननदोई राजपाल से पूरी हो रही थी. लोग उस के बारे में क्या कह रहे हैं, इस की उसे कोई परवाह नहीं थी. सरस्वती को इस बात का डर था कि कहीं किसी दिन राजपाल रामस्नेही को ले कर घर न आ जाए. यदि उस ने ऐसा किया तो उसे बाहर का रास्ता दिखा देगा. एक दिन वह अपनी जेठानी गुड्डो के पास जा कर अपनी व्यथा बता कर कहने लगी कि वह राजपाल को समझाए. वह भाभी को अपनी सौत के रूप में स्वीकार नहीं करेगी.

देवरानी की समस्या बड़ी जटिल थी. इसलिए उस ने अपने हिसाब से राजपाल को समझाया, लेकिन राजपाल पर तो इश्क का भूत सवार था. उस ने भाभी की सलाह को एक कान से सुना, दूसरे से निकाल दिया. राजपाल पिछले 15 दिनों से घर नहीं आया था. अचानक 16 अगस्त, 2015 की शाम को आ गया. सरस्वती पहले से ही गुस्से से भरी हुई थी. वह समझ गई कि सौतन के घर से ही आया होगा. वह तुनक कर बोली, ‘‘तुम आ गए?’’

‘‘हां, बहुत काम होता है डेयरी में. आज जा कर फुरसत मिली है.’’ राजपाल ने जवाब दिया.

‘‘मैं अच्छी तरह से जानती हूं कि आजकल तुम कौन सा काम कर रहे हो.’’

‘‘तुम्हें तो जलीकटी सुनाने की आदत हो गई है. अच्छा अब जोरों की भूख लगी है, खाना ले आओ.’’ कह कर राजपाल चारपाई पर बैठ गया. सरस्वती ने एक नजर बच्चों पर डाली. वे डरेसहमे एक तरफ बैठे थे. राजपाल ने एक बार भी उन्हें नहीं देखा. उस का दिल जल गया, उस ने खाने की थाली राजपाल की ओर बढ़ाई और उसी क्षण तय कर लिया कि अब वह और नहीं सहेगी.

राजपाल खापी कर निश्चिंत हो कर चारपाई पर लेट गया. उस की यह निश्चिंतता सरस्वती को अखर गई. बच्चों को खाना खिलाने के बाद उस ने रसोई की सफाई की. इस के बाद वह बच्चों को ले कर ऊपर छत पर चली गई. देर रात को वह उठी और धीरे से नीचे आ गई. राजपाल नीचे चारपाई पर सो रहा था. वह अलमारी के पास गई और धड़कते दिल से दरवाजा खोल कर तमंचा व कारतूस निकाल लाई. तमंचे में कारतूस भरा और राजपाल की चारपाई के पास पहुंच गई. इस से पहले कि उस का इरादा बदल जाता, उस ने तमंचा राजपाल की कनपटी से सटा कर फायर कर दिया. यह 16/17 अगस्त की रात की बात थी.

राजपाल को चीखने का भी मौका नहीं मिला. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. सरस्वती ने कुछ देर बाद मुख्य दरवाजा खोला. बाहर अभी भी सन्नाटा पसरा था. वह तेजी से खेत की ओर बढ़ी, अपने खेत में पहुंच कर उस ने गड्ढा खोदा और उसी में तमंचा दबा दिया. वापस लौट कर उस ने मृत पति पर घृणा भरी नजर डाली और ऊपर जा कर लेट गई. वह सोचने लगी कि अब आगे क्या करना है? सुबह 6 बजे के करीब उठ कर वह अपनी जेठानी के यहां गई और उस से कहा कि राजपाल खून की उलटी कर रहा है. जेठजेठानी घबरा कर उस के यहां आए तो देखा कि राजपाल चारपाई पर लहूलुहान पड़ा था. शिशुपाल ने घूर कर सरस्वती से पूछा, ‘‘किस ने मारी इसे गोली?’’

‘‘मैं क्या जानूं, मैं तो ऊपर सो रही थी.’’ सरस्वती बोली.

शिशुपाल ने उस समय ज्यादा कुछ  कहना उचित नहीं समझा. उस ने पड़ोसियों को इकट्ठा किया और पुलिस को फोन कर दिया. थाना मारघा के थानाप्रभारी घनश्याम सिंह सूचना मिलते ही मयफोर्स के वहां आ गए. उन्होंने राजपाल के शव को देखा, गोली उस की कनपटी पर लगी थी. थानाप्रभारी ने लोगों से पूछताछ की तो लोगों ने बताया कि राजपाल की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. तभी उन की निगाह सरस्वती की ओर गई, जो चारपाई की पाटी पर सिर रख कर रो रही थी. उन्होंने हैरानी से उसे देखा, फिर पूछा, ‘‘रात में तुम कहां थीं? क्या तुम्हें फायरिंग की भी आवाज नहीं सुनाई दी?’’

‘‘साहब, मैं तो सो रही थी. मैं ने कोई आवाज नहीं सुनी. सुबह उठी तो खून देख कर डर गई और अपनी जेठानी को जा कर बताया.’’ उस ने रोते हुए कहा.

सरस्वती की बौडी लैंग्वेज देख कर थानाप्रभारी को उस पर शक हो गया. खैर, उन्होंने घटनास्थल की काररवाई निपटाने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और हत्या कर मामला दर्ज कर के केस की जांच शुरू कर दी. जांच में उन्हें पता चला कि राजपाल और उस की सलहज रामस्नेही के बीच नाजायज संबंध थे. उन्हें लगा, कहीं यह हत्या इन्हीं संबंधों की वजह से तो नहीं हुई. उन्होंने रामस्नेही से पूछताछ की. उस ने कहा कि यह सब सरस्वती ने किया होगा. इस के बाद थानाप्रभारी ने सरस्वती को थाने बुला कर पूछताछ की. थोड़ी सख्ती के बाद सरस्वती ने सचाई उगल दी. उस ने हत्या का जुर्म स्वीकारते हुए सारी कहानी पुलिस को बता दी.

सरस्वती द्वारा पति की हत्या का गुनाह कबूल कर लेने के बाद पुलिस ने राहत की सांस ली. अब सरस्वती जेल में है. उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त तमंचा पुलिस ने बरामद कर लिया है. Social Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Superstition: न खुदा मिला बिसाले सनम

Superstition: खजाने के लिए मासूम जाकिर की बलि देने वाले इमरान को खजाना नहीं मिला तो उसे बड़ा अफसोस हुआ. अपने इसी अपराधबोध की वजह से वह बेचैन रहने लगा. बेचैनी कम करने के लिए वह हज करने गया. उस के बाद भी…

उत्तर प्रदेश के शहर अलीगढ़ की कोतवाली के मोहल्ला पठानान में रहती थी संजीदा बेगम. उन के कुल 11 बच्चे थे. बच्चे बड़े होने लगे तो उन का घर छोटा पड़ने लगा. उन्होंने सोचा कि एक मकान और ले लिया जाए तो परिवार आराम से रह सकेगा. संजीदा बेगम के बड़े बेटे इमरान का फलों का कारोबार था. उन्होंने इमरान से कहा कि उन्हें एक मकान और खरीद लेना चाहिए. इस के बाद वह मकान के लिए जमीन की तलाश में लग गया. तभी उसे बहन से पता चला कि उस के पड़ोस में रहने वाली मुन्नी दरजिन का मकान बिक रहा है. उस की बहन गुलफ्शां बाबरी मंडी में रहती थी. उस ने वह मकान अपनी मां संजीदा बेगम के नाम से खरीद लिया.

वह मकान काफी पुराना था, इसलिए संजीदा बेगम उसे अपने हिसाब से बनवाना चाहती थीं. उन्होंने अपने हिसाब से मकान बनवाना शुरू भी कर दिया. मकान बनाने का ठेका उन्होंने आमिर को दिया, जो अपने साथियों बाबू, इरफान, शहजाद और राजू के साथ मकान तोड़वाने लगा. यह जनवरी, 2014 की बात है. संजीदा बेगम को क्या पता था कि यह मकान ले कर उस ने अपने लिए मुसीबत खड़ी कर ली है. मकान का काम अभी शुरू ही हुआ था कि 11 मार्च, 2014 को इमरान अपने छोटे भाई शाजेब के साथ कोतवाली पहुंचा. उस ने कोतवाली प्रभारी मोहम्मद हनीफ त्यागी को बताया कि उस के निर्माणाधीन मकान के एक कमरे में एक 11-12 साल के बच्चे की लाश पड़ी है, जिस की गरदन काट कर हत्या की गई है.

इमरान ने बताया था कि सुबह करीब 8 बजे जब वह अपने छोटे भाई शाजेब के साथ मकान का ताला खोल कर अंदर गया तो उस ने पीछे के कमरे में एक लाश देखी, जिस की सूचना देने वह सीधे कोतवाली आ गया. इमरान की बात सुन कर कोतवाली प्रभारी ने मामला दर्ज करा कर मामले की जांच के लिए एसएसआई ओमप्रकाश राणा को सौंप दी. ओमप्रकाश राणा कुछ सिपाहियों के साथ इमरान के निर्माणाधीन मकान पर पहुंच गए. मकान के सामने काफी लोग जमा थे. उस दिन मौसम काफी खराब था. काले घने बादल छाए हुए थे. दिन में भी रात जैसे हालात थे, हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था. ओमप्रकाश राणा टार्च ले कर उस कमरे में पहुंचे, जहां लाश पड़ी थी. लाश के पास काफी खून फैला था, वहीं खून से सनी एक छुरी पड़ी थी.

मोहल्ले वालों से लाश की शिनाख्त कराई गई तो कोई पहचान नहीं पाया. इस का मतलब बच्चा किसी दूसरे मोहल्ले का रहने वाला था. उसे कहीं और से ला कर यहां मारा गया था. अब सवाल यह था कि बच्चे को कौन और कैसे मकान के अंदर ले आया, क्योंकि मकान में तो ताला बंद था. पुलिस को आशंका हुई कि कहीं बच्चे को कुकर्म के लिए तो यहां नहीं लाया गया? कुकर्म के बाद मार दिया गया हो. लेकिन जब लाश का बारीकी से निरीक्षण किया गया तो यह आशंका निराधार निकली. हत्या कुकर्म के उद्देश्य से नहीं की गई थी, क्योंकि उस के कपड़े एकदम दुरुस्त थे. चूंकि जिस मकान में लाश मिली थी, वह इमरान का था, इसलिए पुलिस ने उस से पूछताछ शुरू की.

उस ने बताया कि शायद बच्चे को दूसरे कमरे की खिड़की से अंदर लाया गया था, क्योंकि उस में अभी दरवाजे नहीं लगे थे. रोक के लिए पटरे लगा दिए गए थे. शायद किसी ने फंसाने के लिए यह काम किया है. ओमप्रकाश को इमरान की बातचीत और हावभाव से उस पर संदेह हो रहा था. वहां फैले खून से लग रहा था कि हत्या अभी कुछ देर पहले ही की गई है. बहरहाल पुलिस ने जरूरी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

घटनास्थल की काररवाई निपटा कर ओमप्रकाश राणा पूछताछ कर रहे थे कि एक आदमी ने उन के पास आ कर कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम साबिर है. मैं मुल्ला पाड़ा में रहता हूं. मेरा 11 साल का बेटा जाकिर सुबह करीब 6 बजे सो कर उठा, तब से गायब है. मैं उसे खोज रहा था कि मुझे पता चला कि यहां किसी बच्चे की लाश मिली है. मैं उसे देखना चाहता हूं.’’

राणा ने तुरंत पूछा, ‘‘तुम्हारे बेटे ने क्या पहन रखा था?’’

‘‘साहब, वह काले रंग की कमीज पहने था.’’

काले रंग की कमीज तो मृतक बच्चा भी पहने था. उम्र भी वही थी. कहीं वह लाश इसी के बेटे की तो नहीं, यह सोच कर ओमप्रकाश राणा ने कहा, ‘‘तुम पोस्टमार्टम हाउस चले जाओ. जा कर वहां लाश देख लो.’’

लाश देखने की बात से साबिर का कलेजा कांप उठा. पोस्टमार्टम हाउस जा कर उस ने लाश देखी तो वह लाश उस के बेटे जाकिर की ही थी. लाश देख कर वह दहाड़े मार कर रोने लगा. उस ने फोन कर के यह बात पत्नी परवीन को बताई तो घर में कोहराम मच गया. मोहल्ले वालों के साथ परवीन भी वहां पहुंची. बेटे की हत्या हो जाने से वह सीना पीटपीट कर रो रही थी. परवीन चीखचीख कर कह रही थी कि उस के बेटे की हत्या इमरान ने ही की है. लेकिन पुलिस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि आखिर इमरान जाकिर की हत्या क्यों करेगा? किसी ने जाकिर को इमरान के साथ आतेजाते भी नहीं देखा था.

पोस्टमार्टम के बाद जाकिर की लाश घर वालों को सौंप दी गई तो उन्होंने उसे दफना दिया. लेकिन परवीन ने प्रतिज्ञा कर ली कि कुछ भी हो, उस का सब कुछ बिक जाए, पर वह अपने बच्चे के कातिल का पता लगा कर रहेगी. मुल्ला पाड़ा जहां परवीन अपने परिवार के साथ रहती थी, बाबरी मंडी जहां जाकिर की लाश मिली थी, दोनों के बीच करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी थी. पुलिस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि बच्चा उतनी सुबह वहां कैसे पहुंच गया? या तो कोई उसे लालच दे कर ले गया या फिर किसी परिचित के साथ वहां गया. काफी सोचविचार के बाद भी हत्या की कोई वजह पुलिस की समझ में नहीं आ रही.

परवीन जिस एल्यूमिनियम की फैक्टरी में काम करती थी, वह हाफिज की थी, हाफिज इमरान के बहनोई रिजवान का भाई था. परवीन का कहना था कि उस के बेटे का कातिल इमरान ही है. पुलिस के पास सिफारिशें आ रही थीं कि इमरान सीधासादा आदमी है. हत्या जैसा घिनौना काम वह बिलकुल नहीं कर सकता. आखिर वह एक रिक्शे वाले के बेटे की हत्या क्यों करेगा? पुलिस को कोई वजह भी नजर नहीं आ रही थी. ओमप्रकाश राणा की समझ में बात नहीं आई तो हत्या के इस मामले की जांच खुद कोतवाली प्रभारी मोहम्मद हनीफ त्यागी करने लगे. मई में उन का ट्रांसफर हो गया. उन की जगह आए इंसपेक्टर हैदर रजा जैदी. वह जब भी इमरान को पूछताछ के लिए कोतवाली बुलाते, उस के समर्थन में सैकड़ों लोग कोतवाली आ कर हंगामा करते और जांच को प्रभावित करने की कोशिश करते.

आखिर नवंबर महीने में इस मामले की जांच क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर प्रेमपाल सिंह नागर को सौंप दी गई. तमाम प्रयास के बाद वह भी हत्यारे तक नहीं पहुंच सके. इस के बाद जांच एसआई सुरेशबाबू यादव के हाथ में आ गई. जांच करने वाले बदलते रहे, लेकिन न हत्यारा पकड़ में आ रहा था, न हत्या की वजह पता चल रही थी. परवीन लगातार पुलिस के पीछे पड़ी थी. वह काफी परेशान थी और सीधे कह रही थी कि जाकिर की हत्या इमरान ने ही की है. हालांकि वजह उसे भी पता नहीं थी. परवीन के 7 बच्चे थे, जिन में 5 बेटियां और 2 बेटे. बड़ा बेटा था गुलशन और छोटा जाकिर, जिस की हत्या हो गई थी.

साबिर रिक्शा चलाता था. इस के अलावा शादीब्याह में बैंडबाजा वालों के साथ काम करता था. उस के दोनों बेटे भी बारातों में बाजा बजाने का काम करते थे. इस तरह उस के परिवार का गुजर हो रहा था. किसी से भी उस की कोई दुश्मनी नहीं थी. जिस दिन जाकिर की हत्या हुई थी, साबिर ने ही उसे 6 बजे जगाया था.

जाकिर उन दिनों मोहल्ले के ही बिहारीलाल स्कूल में सातवीं में पढ़ रहा था. सुबह जिस समय जाकिर घर से निकला था, परवीन सो रही थी. उठते ही उस ने पूछा था कि जाकिर कहां है? शायद उस ने कोई बुरा सपना देखा था. जाकिर कहीं नहीं दिखाई दिया तो उस ने साबिर से कहा, ‘‘जाकिर के साथ कुछ बुरा हो गया है.’’

साबिर ने कहा, ‘‘चिंता मत करो, क्रिकेट खेलने गया होगा, आ जाएगा.’’

परवीन 11 बजे तक पागलों की तरह बेटे को ढूंढती रही, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. इस के बाद उसी ने साबिर को फोन कर के बताया कि जाकिर तो नहीं मिला, लेकिन पता चला है कि बाबरी मंडी में किसी बच्चे की लाश मिली है. जा कर उसे देख लो. पत्नी की इस बात पर साबिर घबरा गया. वह बाबरी मंडी स्थित इमरान के घर पहुंचा तो वहां पुलिस मौजूद थी. उस ने ओमप्रकाश राणा को अपने बेटे के गायब होने के बारे में बताया तो उन्होंने उसे लाश की शिनाख्त के लिए पोस्टमार्टम हाउस भेज दिया था.

पुलिस मामले की जांच कर रही थी, लेकिन परवीन और साबिर पुलिस की इस जांच से संतुष्ट नहीं थे. संतुष्ट होते भी कैसे, पुलिस उन के बेटे के कातिल को ढूंढ नहीं पा रही थी. उसी बीच सितंबर, 2014 में इमरान अपनी मां संजीदा बेगम के साथ हज करने चला गया. परवीन ने पुलिस का पीछा नहीं छोड़ा था. वह लगातार कोतवाली के चक्कर लगा रही थी. उस के बेटे को क्यों मार दिया गया, यह बात रहरह कर उसे साल रही थी. यही सोचते हुए अचानक उस के मन में आया कि कहीं जाकिर की बलि तो नहीं दी गई? उस ने यह बात मामले की जांच कर रहे ओमप्रकाश राणा को भी बताई.

इस के बाद वह एक बार फिर से पूछताछ करने पहुंचे. इस बार उन्होंने संजीदा बेगम से पूछताछ की तो उस ने बताया कि मकान की खुदाई करते समय 5 मिट्टी के घड़े मिले थे, जिन में से 2 में कोयला और 3 में मिट्टी भरी थी. शायद किसी ने उन्हें फंसाने के लिए बच्चे को उस के घर ले जा कर मारा है. दूसरी ओर परवीन का कहना था कि उस के बेटे की तांत्रिक क्रिया कर के बलि दी गई थी. पुलिस को भी अब इमरान पर शक होने लगा था, लेकिन बिना किसी ठोस सबूत के उसे गिरफ्तार करना पुलिस के लिए मुश्किल था.

पुलिस ने राजमिस्त्री आमिर से भी पूछताछ की थी. उस ने बताया था कि घटना वाले दिन जब वह मजदूरों के साथ काम करने पहुंचा था तो इमरान और शाजेब वहां मौजूद थे. उन्होंने कहा था कि आज काम नहीं होगा. उस ने खुदाई से घड़े निकलने की बात स्वीकार की थी. कहते हैं कि कुदरत सब कुछ देखती है और अपना करिश्मा दिखा कर रहती है. जून, 2015 की बात है. परवीन का भाई कल्लन आया हुआ था. कल्लन बदायूं में रहता था. अचानक इमरान अपने भाई शाजेब के साथ उस के घर पहुंचा. उन्हें देख कर परवीन के माथे पर बल पड़ गए. साबिर ने उन्हें बैठाया.

इस के बाद इमरान ने कहा, ‘‘मैं आप लोगों से कुछ कहना चाहता हूं. मेरे हाथों बहुत बड़ा गुनाह हो गया है. मैं लालच में आ गया था. एक बाबा ने मुझे बताया था कि मेरे घर में काफी धन गड़ा है. अगर बच्चे की बलि दी जाए तो मुझे वह धन मिल सकता है. इस के बाद मैं ने अपने भाई शाजेब के साथ मिल कर जाकिर की बलि दे दी थी. उस के बाद भी धन नहीं मिला और एक बच्चे की जान चली गई.’’

इमरान अपने हाथों हुए गुनाह की माफी मांग रहा था और बदले में 10 लाख रुपए देने की बात कर रहा था. सभी उस की बात चुपचाप सुनते रहे. उस के बाद परवीन ने कहा, ‘‘ठीक है, सोचसमझ कर बताऊंगी.’’

इमरान ने कहा, ‘‘इस में सोचनेसमझने की क्या बात है, 10 लाख रुपए कम नहीं होते.’’

परवीन बोली, ‘‘अगर मैं आप को 10 लाख रुपए दूं तो क्या तुम मेरे बेटे को लौटा दोगे.’’

‘‘अगर मैं ऐसा कर सकता तो जरूर करता, पर मुझे अफसोस है कि मैं ऐसा कर नहीं सकता. मेरे हाथों जो गुनाह हुआ है, वह मुझे चैन नहीं लेने दे रहा है. हम हज भी कर आए हैं, पर मन को तसल्ली नहीं मिल रही है. तुम लोग मुझे माफ कर दो. मैं तुम लोगों के जवाब का इंतजार करूंगा.’’

इमरान के जाने के बाद घर में सन्नाटा पसर गया. जाकिर तो अब वापस आ नहीं सकता था. साबिर जैसे गरीब आदमी के लिए 10 लाख रुपए कम नहीं थे. लेकिन परवीन के लिए रुपए से बढ़ कर बच्चा था. उस ने तय कर लिया कि वह बेटे के कातिलों को सजा दिला  कर रहेगी. 5 जून, 2015 को परवीन ने कोतवाली जा कर सारी बात ओमप्रकाश राणा को बता दी. अब पुलिस को गिरफ्तारी का रास्ता मिल गया. हैदर रजा जैदी पुलिस बल के साथ इमरान के घर पहुंचे और उसे गिरफ्तार कर के कोतवाली ले आए. इमरान वैसे ही अपराधबोध से ग्रसित था. उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद पुलिस पूछताछ में जाकिर की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

इमरान फलों का व्यापारी था. उस ने बाबरी मंडी में मुन्नी दरजिन का मकान खरीदा और बनवाने के लिए उस की खुदाई कराने लगा. मकान काफी बड़ा था. उस की दीवारें काफी चौड़ी थीं. अचानक खुदाई में मिट्टी के घड़े निकलने लगे, जिन में कोयला और मिट्टी भरी थी. मिट्टी के घड़ों का निकलना हैरान करने वाला था. इमरान को लगा, मकान में जरूर कहीं खजाना गड़ा है. उस ने तांत्रिकों से पूछताछ शुरू की तो किसी तांत्रिक ने बताया कि घड़ों के मिलने का मतलब है कि उस मकान में खजाना गड़ा है, लेकिन वह खजाना तभी मिलेगा, जब किसी बच्चे की बलि दी जाए.

खजाना पाने के लिए इमरान बच्चे की बलि देने को तैयार हो गया. वह अपने भाई शाजेब के साथ मिल कर किसी ऐसे बच्चे की तलाश में जुट गया, जिस की बलि दी जा सके. 1 फरवरी, 2014 को मुल्ला पाड़ा में सवेरे उन्हें जाकिर दिख गया तो उन्होंने उसे 10-10 के 4 नोट दे कर कहा कि वह उन का एक काम कर दे तो वे उसे और रुपए देंगे. जाकिर राजी हो गया तो वे उसे मोटरसाइकिल पर बैठा कर अपने बन रहे नए मकान पर ले आए. मकान में वे उसे तीसरे कमरे में ले गए, जहां काफी अंधेरा था. शाजेब ने उसे बातों में उलझा लिया तो इमरान ने उस के गले पर छुरी चला दी. बच्चे की मौत हो गई. उसी समय मकान पर काम करने वाले राजमिस्त्री और मजदूर आ गए. इमरान और शाजेब डर गए. उन्होंने बाहर आ कर काम करने वाले मजदूरों से कहा कि मेरी दादी बीमार हैं, इसलिए आज काम नहीं होगा.

राजमिस्त्री और मजदूर चले गए, लेकिन इमरान और शाजेब ने जो अपराध किया था, उस से वे डरे हुए थे कि अगर किसी को पता चल गया तो वे पकड़े जाएंगे. उन्हें पुलिस और जेल का डर सताने लगा था. सुबह का समय था, रात से पहले वे लाश को वहां से निकाल नहीं सकते थे. आखिर इमरान ने तय किया कि वह खुद थाने जा कर पुलिस को बताएगा कि किसी ने उस के मकान में एक बच्चे की हत्या कर दी है. जब उन्होंने सुबह आ कर मकान का दरवाजा खोला तो अंदर उन्हें बच्चे की लाश मिली.

इस के बाद इमरान ने वही किया. वह पैसे वाला और रसूखदार आदमी था. इसलिए शक होने के बावजूद पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर सकी. लेकिन बच्चे की बलि देने के बाद भी जब कोई खजाना नहीं मिला तो उसे काफी अफसोस हुआ. अपने गुनाहों की माफी के लिए वह अपनी मां संजीदा बेगम के साथ हज करने गया. उस ने वहां उलेमाओं से बात की तो उन्होंने सलाह दी कि वह मृतक बच्चे के मांबाप से माफी मांगे और उन्हें हरजाने के रूप में धनराशि दे तो उसे चैन मिल सकता है.

उलेमाओं की सलाह पर इमरान भाई के  साथ परवीन के घर गया. दरअसल अपराधबोघ से वह बेचैन था. वह बच्चे के गरीब मांबाप को धन दे कर माफी चाहता था. लेकिन बच्चे के मांबाप को तो अपने निर्दोष बेटे के लिए इंसाफ चाहिए था. उन्होंने उसे माफ नहीं किया और पुलिस को सारी बात बता दी. इमरान को तो पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, जबकि शाजेब फरार हो गया. पुलिस ने इमरान को जेल भेज दिया. बाद में शाजेब ने भी आत्मसमर्पण कर दिया. वह नाबालिग था, इसलिए उसे बालसुधार गृह भेज दिया गया. सेशन कोर्ट से इमरान की जमानत खारिज हो चुकी है. अब उस ने हाईकोर्ट में जमानत के लिए अपील की है. Superstition

—कथा पुलिस सूत्रों और जाकिर के घर वालों के बयान पर आधारित

 

Domestic Dispute: गलती गुरतेज की – क्यों बना बीवी का हत्यारा

Domestic Dispute: गुरतेज सिंह के 2 और भाई थे. ये सभी बठिंडा के थाना संगत के गांव मुहाला के आसपास रहते थे. गुरतेज भाइयों से अलग रहता था. उस के पास पैसा भी था और रुतबा भी. शादी के 2 सालों बाद ही वह एक बेटे का बाप बन गया था.

वह सुबह खेती के काम के लिए निकल जाता तो शाम को ही लौटता था. पतिपत्नी एकदूसरे से बहुत खुश थे. लेकिन एक दिन गुरतेज के एक दोस्त ने उसे जो बताया, उस से इस घर की खुशियों में ग्रहण लगना शुरू हो गया. गुरतेज के उस खास दोस्त ने बताया था कि उस ने जसप्रीत भाभी को एक लड़के के साथ शहर के बाजार में घूमते देखा था. लेकिन गुरतेज को उस की बातों पर विश्वास ही नहीं हुआ.

लेकिन यही बात कुछ दिनों बाद किसी दूसरे दोस्त ने बताई तो गुरतेज सोचने को मजबूर हो गया कि दोनों दोस्तों को एक जैसा धोखा नहीं हो सकता.

इसलिए शाम को घर लौट कर उस ने जसप्रीत से इस बारे में पूछा तो उस ने खिलखिला कर हंसते हुए कहा, ‘‘लगता है, आप के दोस्त भांग पी कर घूमते हैं, इसीलिए आप से बहकीबहकी बातें करते हैं. आप खुद ही सोचिए, मैं आप के बगैर शहर क्या करने जाऊंगी?’’

जसप्रीत के इस जवाब से गुरतेज लाजवाब हो गया. लेकिन यह धोखा नहीं था. इस के 10 दिनों बाद की बात है. यही बात एक रिश्तेदार ने गुरतेज से कही तो घर में झगड़ा होना स्वाभाविक था, जबकि जसप्रीत का अब भी वही कहना था, जो उस ने पहले कहा था.

जसप्रीत की बातों से गुरतेज को लगता कि वही गलत है. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि कौन सच है और कौन झूठा? लेकिन एक बात तय थी कि कोई न कोई तो झूठ बोल रहा था. काफी सोचनेविचारने के बाद भी गुरतेज को इस समस्या का कोई हल नजर नहीं आया. इसी तरह ऊहापोह में कुछ दिन और बीत गए, इस बार उस के छोटे भाई जगतार ने एक दिन उस से कहा, ‘‘भाई, आप होश में आ जाइए, कहीं ऐसा न हो कि पानी सिर के ऊपर से गुजर जाए और आप को इस की खबर तक न लगे.’’

इस बार भाई जगतार ने जसप्रीत के बारे में खबर दी तो उसे पूरा विश्वास हो गया कि सभी सच थे, झूठ जसप्रीत ही बोल रही थी. इसलिए उस दिन गुरतेज ने सख्ती से काम लिया. उस ने जसप्रीत को खूब डांटाफटकारा.

इस के बाद पतिपत्नी दोनों ही सतर्क हो गए. जसप्रीत जहां घर से बाहर निकलने में सावधानी बरतने लगी, वहीं गुरतेज गुपचुप तरीके से उस पर नजर रखने के साथ पड़ोसियों से उस के बारे में पूछता रहता था. इस से गुरतेज को पता चल गया कि उस के खेतों पर जाने के बाद कोई लड़का उस के घर आता है. उस के आने के बाद जसप्रीत बेटे को किसी पड़ोसी के घर छोड़ कर उस लड़के के साथ चली जाती है.

वह लड़का कौन था, यह कोई नहीं जानता था. इस से साफ हो गया कि जसप्रीत के किसी लड़के से संबंध हैं. इस बारे में गुरतेज ने जसप्रीत से कुछ नहीं पूछा. दरअसल, वह उसे रंगेहाथों पकड़ना चाहता था, इसलिए एक दिन घर से वह खेतों पर जाने की बात कह कर गांव में ही छिप गया.

करीब एक घंटे बाद एक टाटा 407 टैंपो आ कर रुका. उस में से एक लड़का उतर कर गांव की ओर चला गया. गुरतेज ने उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, क्योंकि इस तरह लोगों के रिश्तेदार अपनी गाडि़यों से आते रहते थे. लेकिन जब कुछ देर बाद टैंपो स्टार्ट होने लगा तो उस ने झांक कर देखा. लड़के के साथ टैंपो में जसप्रीत बैठी थी.

गुरतेज मोटरसाइकिल से टैंपो के पीछेपीछे चल पड़ा, लेकिन वह टैंपो का पीछा नहीं कर सका. कुछ दूर जा कर टैंपो उस की आंखों से ओझल हो गया. कुछ देर वह सड़क पर खड़ा सोचता रहा, उस के बाद घर लौट आया. घर के अंदर कदम रखते ही उस का दिमाग चकरा गया, क्योंकि जसप्रीत घर में बैठी बेटे को खाना खिला रही थी. उसे देख कर गुरतेज की बोलती बंद हो गई.

उस ने सोचा था कि जसप्रीत यार से मिल कर लौटेगी तो वह पूछेगा कि कहां से आ रही है? पर उस ने अपनी आंखों से जो देखा, वह भी झूठा हो गया था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे, उस ने उसे खुद टैंपो में बैठ कर जाते देखा था. यह धोखा कैसे हो गया? गुरतेज के पास अब कहने को कुछ नहीं बचा था, इसलिए वह खामोश रह गया.

लेकिन उस ने जसप्रीत का पीछा करना नहीं छोड़ा. आखिर एक दिन उस ने जसप्रीत को बाजार में एक लड़के के साथ घूमते देख लिया. दोनों उस से कुछ दूरी पर थे. वहां भीड़ थी. गुरतेज के वहां पहुंचने तक लड़का तो गायब हो गया, पर जसप्रीत खड़ी रह गई. अब जसप्रीत के पास अपनी सफाई में कहने को कुछ नहीं था.

गुरतेज ने घर आ कर जसप्रीत की जम कर पिटाई की, लेकिन उस ने प्रेमी का नाम बताना तो दूर, यह भी नहीं माना कि उस के साथ बाजार में कोई था. लेकिन अब गुरतेज को सच्चाई का पता चल गया था. इसलिए पतिपत्नी में क्लेश रहने लगा. घर में रोजाना लड़ाईझगड़ा और मारपीट आम बात हो गई.

आखिर एक दिन गुरतेज को कुछ बताए बगैर जसप्रीत बेटे को छोड़ कर घर से भाग गई. लेकिन वह अपने किसी प्रेमी के साथ नहीं भागी थी, अपने पिता के घर गई थी. हालांकि जसप्रीत के पिता ने उसे काफी समझाया, पर उस ने उन की एक नहीं सुनी. पिता के घर कुछ दिन रहने के बाद वह अपनी बड़ी बहन के पास बाड़ी गांव चली गई.

दरअसल, जसप्रीत बहन के यहां कुछ दिन रह कर अपने प्रेमी के साथ भाग जाना चाहती थी. लेकिन उस की बहन को न जाने कैसे इस बात का पता चल गया. उस ने यह बात अपने पति को भी बता दी. उन लोगों ने सोचा कि अगर जसप्रीत उन के घर से भागती है तो उन की बदनामी तो होगी ही, साथ ही लोग यही कहेंगे कि जसप्रीत को उन्हीं लोगों ने भगाया है.

यही सोच कर उन्होंने गुरतेज को अपने गांव बुलाया और पतिपत्नी में समझौता करा दिया. गुरतेज जसप्रीत को ले कर गांव आ गया. जसप्रीत ने भी पति से माफी मांगी और वादा किया कि अब वह कभी वैसी गलती नहीं करेगी. पतिपत्नी फिर पहले की ही तरह रहने लगे. जिंदगी की गाड़ी एक बार फिर से पटरी पर दौड़ने लगी.

27 जुलाई, 2017 की रात आम दिनों की तरह गुरतेज और जसप्रीत ने साथसाथ रात का खाना खाया. बेटा पहले ही खाना खा कर सो गया था. खाना खाते ही गुरतेज को बहुत जोर से नींद आ गई तो वह जा कर बैड पर लेट गया. वह पिछले एक सप्ताह से देख रहा था कि खाना खाते ही उसे नींद आ जाती है. लेकिन उस ने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

बहरहाल, खाना खा कर वह सो गया. सुबह 4 बजे के करीब उस की आंख खुली तो उसे लगा कि उस का सिर भारीभारी है. वह बिस्तर पर चुपचाप पड़ा रहा. तभी उसे किसी के हंसने और बातें करने की आवाजें सुनाई दीं. उस ने ध्यान लगा कर सुना तो उन की आवाजों के साथ चूडि़यों के खनकने की भी आवाजें आ रही थीं.

अब उस से रहा नहीं गया. वह बैड से उठा. कमरे से बाहर आ कर उस ने जो देखा, उस से उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. गुस्सा और उत्तेजना से उस का पूरा शरीर कांपने लगा. सामने आंगन में बिछी चारपाई पर जसप्रीत एक लड़के के साथ आपत्तिजनक स्थिति में थी. उस दृश्य ने उसे आकाश की ऊंचाइयों से उठा कर पाताल में झोंक दिया था. वही क्या, उस की जगह कोई भी होता, उस का यही हाल होता.

गुरतेज कमरे में गया और दीवार पर टंगी लाइसेंसी बंदूक उतारी और आंगन में पड़ी चारपाई के पास पहुंच कर उस ने बिना कुछ कहे एक गोली जसप्रीत की छाती में तो दूसरी गोली उस के यार को मार कर दोनों को मौत के घाट उतार दिया.

पत्नी और उस के प्रेमी को मौत के घाट उतार कर गुरतेज ने यह बात दोनों भाइयों, गुरप्रीत सिंह और जगतार सिंह को बता दी. इस के बाद इधरउधर भागने के बजाय उस ने थाना पुलिस को फोन कर के कहा कि उस ने अपनी पत्नी और उस के प्रेमी को गोली मार कर मौत के घाट उतार दिया है. पुलिस आ कर उन की लाशें बरामद कर के उसे गिरफ्तार कर ले. वह घर में बैठा पुलिस का इंतजार कर रहा है.

इस के बाद गुरतेज ने अपने छोटे भाई जगतार से नाश्ता बनवाने तथा बेटे को संभालने को कहा. इस के बाद नहाधो कर घर के आंगन में कुरसी डाल कर बैठ कर पुलिस का इंतजार करने लगा.

सचना मिलते ही थाना संगत के थानाप्रभारी इंसपेक्टर परमजीत सिंह एसआई सुरजीत सिंह, हवलदार जसविंदर सिंह, सिपाही राकेश कुमार, तारा सिंह, तेज सिंह, महिला सिपाही चरनजीत कौर और कर्मजीत कौर को साथ ले कर गांव मलीहा पहुंच गए.

गुरतेज आंगन में कुरसी डाले बैठा था. बाहर गांव वालों की भीड़ लगी थी. वहीं चारपाई पर जसप्रीत और उस के प्रेमी की रक्तरंजित निर्वस्त्र लाशें पड़ी थीं. परमजीत सिंह ने लाशों पर चादर डलवा कर सारी काररवाई कर उन्हें पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दिया.

गुरतेज सिंह उर्फ तेजा को हिरासत में ले कर थाने आ गए. उस के बयान के आधार पर अपराध संख्या 174/2017 पर आईपीसी की धारा 302 और 27 आर्म्स एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. उसी दिन उसे जिला मजिस्ट्रैट की अदालत में पेश कर दिया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

इस के बाद परमजीत सिंह ने जसप्रीत के साथ मारे गए उस के प्रेमी के बारे में पता किया तो पता चला कि उस का नाम गुरप्रीत सिंह था. वह गांव मिडू खेड़ा के रहने वाले दिलवीर सिंह का बेटा था. वह टैंपो चलाता था. करीब 2 सालों से जसप्रीत कौर से उस के अवैध संबंध थे.

दोनों शादी करना चाहते थे, वे शादी करते, उस के पहले ही गुरतेज ने उन्हें खत्म कर दिया. लेकिन यहां गलती गुरतेज ने भी की. बेशर्म पत्नी और उस के प्रेमी को मार कर उन्हें क्या मिला, वह तो हत्या के आरोप में जेल चले गए. शायद उन्हें सजा भी हो जाए. ऐसे में उन का घर तो बरबाद हुआ ही, बेटा भी अनाथ हो गया. Domestic Dispute

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित