Murder Story : जेठानी ने कर डाला देवर के बेटे का कत्ल

विधवा मंजीत कौर ने अपने विवाहित देवर को न सिर्फ अपने जाल में फांसा बल्कि उस की गृहस्थी उजाड़ कर शादी भी कर ली. इस के बाद उस का ऐसा कौन सा स्वार्थ रह गया जिस के चलते उस ने अपने सौतेले बेटे को भी ठिकाने लगा दिया

‘‘दखो सरदारजी, एक बात सचसच बताना, झूठ मत बोलना. मैं पिछले कई दिनों से देख रही हूं कि आजकल तुम अपनी भरजाई पर कुछ ज्यादा ही प्यार लुटा रहे हो. क्या मैं इस की वजह जान सकती हूं?’’ राजबीर कौर ने यह बात अपने पति हरदीप सिंह से जब पूछी तो वह उस से आंखें चुराने लगा. पत्नी की बात का हरदीप को जवाब भी देना था, इसलिए अपने होंठों पर हलकी मुसकान बिखेरते हुए उस ने राजबीर कौर से कहा, ‘‘तुम भी कमाल करती हो राजी. तुम तो जानती ही हो कि बड़े भाई काबल की मौत हुए अभी कुछ ही समय हुआ है. भाईसाहब की मौत से भाभीजी को कितना सदमा पहुंचा है. यह बात तुम भी समझ सकती हो. मैं बस उन्हें उस सदमे से बाहर निकालने की कोशिश कर रहा हूं. और फिर भाईसाहब के दोनों बच्चे मनप्रीत सिंह और गुरप्रीत सिंह भी अभी काफी छोटे हैं.’’

हरदीप अपनी पत्नी को प्यार से राजी कह कर बुलाता था.

‘‘हां, यह बात तो मैं अच्छी तरह समझ सकती हूं पर कोई ऐसे तो नहीं करता, जैसे तुम कर रहे हो. तुम्हें यह भी याद रखना चाहिए कि अपना भी एक बेटा किरनजोत है. तुम अपनी बीवीबच्चे छोड़ कर हर समय अपनी विधवा भाभी और उन के बच्चों का ही खयाल रखोगे तो अपना घर कैसे चलेगा.’’ राजबीर कौर बोली.

‘‘मैं समझ सकता हूं और यह बात भी अच्छी तरह से जानता हूं कि मेरी लापरवाही में तुम घर को अच्छी तरह संभाल सकती हो. फिर अब कुछ ही दिनों की तो बात है, सब ठीक हो जाएगा.’’ पति ने समझाया. कहने को तो यह बात यहीं खत्म हो गई थी पर राजबीर कौर अच्छी तरह जानती थी कि अब आगे कुछ ठीक होने वाला नहीं है. इसलिए उस ने मन ही मन फैसला कर लिया कि जहां तक संभव होगा, वह अपने घर को बचाने की पूरी कोशिश करेगी. पंजाब के अमृतसर देहात क्षेत्र के थाना रमदास के गांव कोटरजदा के मूल निवासी थे बलदेव सिंह. पत्नी के अलावा उन के 3 बेटे थे परगट सिंह, काबल सिंह और हरदीप सिंह. बलदेव सिंह ने समय रहते सभी बेटों की शादियां कर दी थीं और तीनों भाइयों में जमीन का बंटवारा भी कर के अपने फर्ज से मुक्ति पा ली थी.

अपने हिस्से की जमीन ले कर परगट सिंह ने अपना अलग मकान बना लिया था. काबल और हरदीप अपने पुश्तैनी घर में मातापिता के साथ रहते थे. काबल सिंह की शादी मनजीत कौर के साथ हुई थी. उस के 2 बच्चे थे 13 वर्षीय मनप्रीत सिंह और 12 वर्षीय गुरप्रीत सिंह.  सन 2003 में हरदीप सिंह की शादी खतराये निवासी राजबीर कौर के साथ हुई थी. शादी के बाद उन के घर किरनजोत सिंह ने जन्म लिया था. बच्चे के जन्म से दोनों पतिपत्नी बड़े खुश थे. तीनों भाइयों की अपनी अलगअलग जमीनें थीं. सब अपनेअपने कामों और परिवारों में मस्त थे. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि 24 जून, 2008 को काबल सिंह की दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई. इस के बाद तो उस घर पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था. उस की खेती आदि के काम कोई करने वाला नहीं था क्योंकि उस समय बच्चे भी छोटे थे. तब भाई के खेतों के काम से ले कर उस के दोनों बच्चों की देखभाल का जिम्मा हरदीप सिंह ने संभाल लिया था.

अपनी विधवा भाभी मनजीत कौर से सहानुभूति रखने और उस की मदद करतेकरते हरदीप सिंह का झुकाव धीरेधीरे अपनी विधवा भाभी की ओर होने लगा. हरदीप की पत्नी राजबीर कौर इन सब बातों से बेखबर नहीं थी.  वह समयसमय पर पति हरदीप सिंह को उस की अपनी घरेलू जिम्मेदारियों का अहसास दिलाती रहती थी. पर उस ने इन बातों को ले कर कभी पति से क्लेश या लड़ाईझगड़ा नहीं किया था. वह हर मसले को प्यार और समझदारी से निपटाने के पक्ष में थी और यही बात उस के हक में नहीं रही. उसे जब इन सब बातों की समझ आई तब पानी सिर से ऊपर गुजर चुका था. उस का पति हरदीप अब उस का नहीं रहा. वह कभी का अपनी विधवा भाभी मंजीत कौर की आगोश में जा चुका था. राजबीर कौर ने जब अपना घर उजड़ता देखा तब उस की नींद टूटी और उस ने इस रिश्ते का जम कर विरोध किया था.

बाद में उस ने इस मसले पर रिश्तेदारों से शिकायत भी की पर कोई नतीजा नहीं निकला. इस पूरे मामले में राजबीर कौर की यह गलती रही कि उस ने अपने पति पर विश्वास करते हुए समय रहते इन सब बातों का विरोध नहीं किया था. शायद उसे पति की वफादारी और अपनी समझ पर भरोसा था. बहरहाल उस का बसाबसाया घर टूट गया था. हरदीप सिंह और राजबीर कौर के बीच तलाक हो गया था. यह सन 2013 की बात है. राजबीर कौर का हरदीप सिंह से तलाक भले ही हो गया था, पर वह वहीं रहती रही. हरदीप सिंह अपने 9 वर्षीय बेटे किरनजोत सिंह और अपने दोनों भतीजों मनप्रीत सिंह और गुरप्रीत सिंह के साथ मंजीत कौर के साथ रहने लगा था. भाभी के साथ रहने पर लोगों ने कुछ दिनों तक चर्चा जरूर की पर बाद में सब शांत हो गए.

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा. सब अपनेअपने कामों में व्यस्त हो गए थे. हरदीप तीनों बच्चों और दूसरी पत्नी मंजीत कौर के साथ खुशी से रह रहा था.  बात 28 जून, 2018 की है. तीनों बच्चों सहित हरदीप और मंजीत कौर रात का खाना खा कर सो गए थे. हरदीप और मंजीत कौर कमरे के अंदर और तीनों बच्चे बाहर बरामदे में सो रहे थे. बिस्तर पर लेटते ही हरदीप को तो नींद आ गई थी पर मंजीत कौर अपने बिस्तर पर लेटेलेटे ही टीवी पर कोई कार्यक्रम देख रही थी. कमरे की लाइट बंद थी पर टीवी चलने के कारण उस कमरे में पर्याप्त रोशनी थी. रात के करीब 12 बजे का समय होगा कि मंजीत कौर ने अपने कमरे में एक साया देखा. साया कमरे से बाहर की ओर निकल गया था. फिर अचानक मंजीत कौर की नजर कमरे में रखी हुई अलमारी पर पड़ी. अलमारी खुली हुई थी और पास ही सामान बिखरा पड़ा था. यह देख कर वह चौंक गई. घबरा कर उस ने पास में सोए पति हरदीप को जगाया और अलमारी की ओर इशारा किया.

कमरे में चल रहे टीवी की रोशनी में उसे भी खुली अलमारी के आसपास कपड़े आदि बिखरे दिखे. इस के बाद हरदीप ने तुरंत उठ कर घर की लाइट जला दी. वह समझ गया कि घर में चोरी हो गई है. कमरे से निकल कर जब वह बरामदे में पहुंचा तो उस की नजर बरामदे में सोए बच्चों पर गई. वहां मनप्रीत और गुरप्रीत तो सो रहे थे, लेकिन उस का अपना 9 वर्षीय बेटा किरनजोत सिंह गायब था. यह सब देख कर हरदीप ने चोरचोर का शोर मचाना शुरू कर दिया था. रात के सन्नाटे में उस की आवाज सुन कर पड़ोसी उस के घर आ गए और जब सब को पता चला कि 9 वर्षीय किरनजोत को भी चोर अपने साथ उठा कर ले गए हैं तो सब हैरान रह गए. किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. ऐसे में किरनजोत को कहां और कैसे ढूंढा जाए. फिर भी समय व्यर्थ न करते हुए सभी लोग रात में ही किरनजोत की तलाश में अलगअलग दिशाओं में निकल पड़े.

पूरी रात किरनजोत की तलाश होती रही. लोगों ने गांव से ले कर मुख्य मार्ग तक भी छान मारा पर वह नहीं मिला. पूरी रात बीत गई थी पर किरनजोत का कुछ पता नहीं चला था. हरदीप सिंह की पहली बीवी यानी किरनजोत को जन्म देने वाली मां राजबीर कौर को जब अपने बेटे के चोरी होने का पता चला तो रोरो कर उस ने अपना बुरा हाल कर लिया था. किरनजोत को तलाश करतेकरते दिन निकल आया था. बच्चे के न मिलने पर सभी लोग निराश थे. कुछ देर बाद गांव के एक आदमी ने हरदीप सिंह को आ कर यह खबर दी कि किरनजोत की लाश नहर किनारे पड़ी है.  यह सुनते ही हरदीप व अन्य लोग नहर किनारे पहुंचे तो वास्तव में वहां किरनजोत की लाश मिली. कुछ ही देर में गांव के तमाम लोग नहर किनारे जमा हो गए. किसी ने पुलिस को भी खबर कर दी.

सूचना मिलते ही थाना रमदास के थानाप्रभारी मनतेज सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस ने बच्चे की लाश को अपने कब्जे में ले कर जरूरी काररवाई कर के पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दी और भादंवि की धारा 302 के तहत अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. मुकदमा दर्ज होने के बाद मनतेज सिंह ने हरदीप सिंह के घर का मुआयना किया. हरदीप सिंह से बात करने के बाद पता चला कि उस के घर का कोई सामान चोरी नहीं हुआ था. इस से यही पता लगा कि वारदात को चोरी का रूप देने की कोशिश की गई है. पुलिस को यह भी पता चला कि कमरे में कोई साया होने की बात सब से पहले हरदीप सिंह की पत्नी मंजीत कौर ने बताई थी, इसलिए थानाप्रभारी ने मंजीत कौर के ही बयान लिए.

थानाप्रभारी मनतेज सिंह को मंजीत के बयानों में काफी झोल दिखाई दे रहे थे. यह बात भी उन्हें हजम नहीं हो रही थी कि कमरे में जागते और टीवी देखते हुए कैसे चोर की हिम्मत हो गई कि वह चोरी करने के साथसाथ बच्चे को भी उठा कर अपने साथ ले गया. भला उस बच्चे से उसे क्या मतलब था और किस मकसद से उस ने बच्चे को अगवा किया था. लाख सोचने पर भी मनतेज सिंह को यह बात समझ नहीं आ रही थी. तब थानाप्रभारी ने अपने कुछ विश्वासपात्र लोगों को सच्चाई का पता करने पर लगाया. इस बीच अस्पताल में किरनजोत के पोस्टमार्टम के समय उस की मां राजबीर कौर ने खूब हंगामा खड़ा किया. उस ने अपनी जेठानी मंजीत कौर पर आरोप लगाते हुए कहा कि किरनजोत की हत्या के पीछे मंजीत कौर का ही हाथ है क्योंकि वह उसे अपना सौतेला बेटा मानती थी.

राजबीर कौर के आरोप को मद्देनजर रखते हुए पुलिस ने अपने मुखबिरों को सच्चाई का पता लगाने के लिए लगाया. इस के बाद थानाप्रभारी को मंजीत कौर के बारे में जो खबर मिली, वह चौंकाने वाली थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में किरनजोत की मौत के बारे में बताया कि उस की मौत गला घोंटने से हुई थी. सोचने वाली बात यह थी कि मारने वाले ने बच्चे को घर से उठाया और हत्या के बाद वह उसे नहर के किनारे फेंक आया. इस में इकट्ठे सो रहे तीनों बच्चों में से उस ने किरनजोत सिंह को ही क्यों उठाया. थानाप्रभारी मनतेज सिंह ने मृतक किरनजोत की मां राजबीर कौर से भी पूछताछ की. राजबीर कौर ने बताया कि 10 साल पहले उस का विवाह हरदीप सिंह के साथ हुआ था. उस के जेठ काबल सिंह की मौत हो जाने के बाद उस के पति हरदीप सिंह के उस की जेठानी मंजीत कौर से अवैध संबंध हो गए थे. इस कारण उस ने अपने पति को तलाक दे दिया और दूसरा विवाह कर लिया.

उस के पति हरदीप सिंह ने भी उस की जेठानी के साथ शादी कर ली थी. शादी के बाद न तो उस की जेठानी उसे उस के बेटे किरनजोत से मिलने देती थी और न ही वह उसे पसंद करती थी. उसे पूरा यकीन है कि उस के बेटे की हत्या मंजीत कौर ने ही करवाई है. थानाप्रभारी ने महिला हवलदार सुरजीत कौर को भेज कर मंजीत कौर को पूछताछ के लिए थाने बुला लिया. शुरुआती दौर में वह अपने आप को निर्दोष बताते हुए चोरी की कहानी पर डटी रही पर जब उस से पूछा गया कि क्याक्या सामान चोरी हुआ है तो यह सुन कर वह बगलें झांकने लगी.  थोड़ी सख्ती करने पर उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा कि उसी ने किरनजोत की गला घोंट कर हत्या की थी और लाश को गोद में उठा कर नहर किनारे फेंक आई. फिर आधी रात को अपने पति हरदीप को जगा कर चोरी वाली कहानी सुनाई थी.

इस की वजह यह थी कि मंजीत कौर को हरदीप और किरनजोत के बीच का प्यार खलता था. वह नहीं चाहती थी कि उस के दोनों बेटों के अलावा उस का पति हरदीप अपनी पहली बीवी से हुए बेटे किरनजोत के साथ कोई भी रिश्ता रखे. पिता का यही प्यार बेटे की मौत का कारण बन गया. दरअसल हरदीप सिंह तीनों बच्चों से तो प्यार करता था पर वह सब से अधिक अपने किरनजोत को चाहता था. पति के इस प्यार की वजह से मंजीत कौर को यह भ्रम हो गया था कि हरदीप सिंह किरनजोत के बड़े होने पर अपनी सारी जायदाद उसी के नाम कर देगा.

ऐसे में उस के पैदा किए बच्चे दानेदाने को मोहताज हो जाएंगे, जबकि ऐसी कोई बात नहीं थी. हरदीप ने सपने में भी कभी यह नहीं सोचा था कि मंजीत कौर ऐसा भी कुछ सोच सकती है. मंजीत कौर के बयान दर्ज करने के बाद किरनजोत सिंह की हत्या के आरोप में उसे गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया. अदालत के आदेश पर उसे जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारिते

Extramarital Affair : चचेरे देवर के साथ मिलकर कर दी पति की हत्या

जब कोई पूरी योजना बना कर किसी की हत्या करता है, उस की सोच यह होती है कि वह पकड़ा नहीं जाएगा. लेकिन कानून के शिकंजे से बचना आसान नहीं होता. सरिता और बलराम ने भी…

उत्तर प्रदेश के मीरजापुर जिले में मीरजापुरइलाहाबाद मार्ग से सटा एक गांव है-महड़ौरा. विंध्यक्षेत्र की पहाड़ी से लगा यह गांव हरियाली के साथसाथ बहुत शांतिप्रिय गांवों में गिना जाता है. इसी गांव के रहने वाले बंसीलाल सरोज ने रेलवे की नौकरी से रिटायर होने के बाद बड़ा सा पक्का मकान बनवाया, जिस में वह अपने पूरे परिवार के साथ रहते थे. उन के भरेपूरे परिवार में पत्नी, 2 बेटे, एक बेटी और बहू थी. गांव में बंसीलाल सरोज के पास खेती की जमीन थी, जिस पर उन का बड़ा बेटा रणजीत कुमार सरोज उर्फ बुलबुल सब्जी की खेती करता था. खेती के साथसाथ रणजीत अपने मामा के साथ मिल कर होटल भी चलाता था.

जबकि छोटा राकेश सरोज कानपुर में बिजली विभाग में नौकरी करता था. वह कानपुर में ही रहता था. महड़ौरा में 9-10 कमरों का अपना शानदार मकान होने के साथसाथ बंसीलाल के पास गांव से कुछ दूर सरोह भटेवरा में दूसरा मकान भी था. रात में वह उसी मकान में सोया करते थे. बंसीलाल के परिवार की गाड़ी जिंदगी रूपी पटरी पर हंसीखुशी से चल रही थी. घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. दोनों बेटे अपनेअपने पैरों पर खड़े हो चुके थे, जबकि वह खुद इतनी पेंशन पाते थे कि अकेले अपने दम पर पूरे परिवार का खर्च उठा सकते थे.

बड़ा बेटा रणजीत कुमार सुबह होने पर खेतों पर चला जाता था, फिर दोपहर में उसे वहां से होटल पर जाना होता था. जहां से वह रात में वापस लौटता था और खापी कर सो जाता था. यह उस की रोज की दिनचर्या थी. रणजीत की 3 बेटियां थीं. 10 साल की माया, 7 साल की क्षमा और 3 साल की स्वाति. वह अपनी बेटियों को दिलोजान से चाहता था और उन्हें बेटों की तरह प्यार करता था. उस की बेटियां भी अपनी मां से ज्यादा पिता को चाहती थीं. व्यवहारकुशल, मृदुभाषी रणजीत गांव में सभी को अच्छा लगता था. वह जिस से भी मिलता, हंस कर ही बोलता था. खेतीकिसानी और होटल के काम से उसे फुर्सत ही नहीं मिलती थी. उसे थोड़ाबहुत जो समय मिलता था, उसे वह अपने बीवीबच्चों के साथ गुजारता था.

सोमवार 19 मार्च, 2018 का दिन था. रात होने पर रणजीत कुमार रोज की तरह होटल से घर आया तो उस की पत्नी सरिता उसे खाने का टिफिन पकड़ाते हुए बोली, ‘‘लो जी, दूसरे मकान पर बाबूजी को खाना दे आओ. आज काफी देर हो गई है, बाबूजी इंतजार कर रहे होंगे. आप खाना दे कर आओ तब तक मैं आप के लिए खाने की थाली लगा देती हूं.’’

पत्नी के हाथ से खाने का टिफिन ले कर रणजीत दूसरे मकान पर चला गया, जहां उस के पिता बंसीलाल रात में सोने जाया करते थे. उन का रात का खाना अकसर उसी मकान पर जाता था. रणजीत उन्हें खाना दे कर जल्दी ही लौट आया और घर आ कर खाना खाने बैठ गया. खाना खाने के बाद वह अपने कमरे में सोने चला गया. रणजीत की मां, पत्नी सरिता, बहन सोनी और रणजीत की तीनों बेटियां बरांडे में सो गईं. रणजीत बना निशाना रणजीत सोते समय अपने कमरे का दरवाजा खुला रखता था. उस दिन भी वह अपने कमरे का दरवाजा खुला छोड़ कर सोया था. देर रात पीछे से चारदीवारी फांद कर किसी ने रणजीत के कमरे में प्रवेश किया और पेट पर धारदार हथियार से वार कर के उसे मौत की नींद सुला दिया.

उस पर इतने वार किए गए थे कि उस की आंतें तक बाहर आ गई थीं. रणजीत की मौके पर ही मौत हो गई थी. आननफानन में घर वाले उसे अस्पताल ले कर भागे, लेकिन वहां डाक्टरों ने रणजीत को देखते ही मृत घोषित कर दिया. भोर में जैसे ही इस घटना की सूचना पुलिस को मिली वैसे ही विंध्याचल कोतवाली प्रभारी अशोक कुमार सिंह पुलिस टीम के साथ गांव पहुंच गए. वहां गांव वालों का हुजूम लगा हुआ था. अशोक कुमार सिंह ने इस घटना की सूचना अपने उच्चाधिकारियों को भी दे दी. इस के बाद उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया. घर के उस कमरे में जहां रणजीत सोया हुआ था, काफी मात्रा में खून पड़ा हुआ था. मौकाएवारदात को देखने से यह साफ हो गई कि जिस बेदर्दी के साथ रणजीत की हत्या की गई थी, संभवत: वारदात में कई लोग शामिल रहे होंगे.

यह भी लग रहा था कि या तो हत्यारों की रणजीत से कोई अदावत रही होगी या किसी बात को ले कर वह उस से खार खाए होंगे. इसी वजह से उसे बड़ी बेरहमी से किसी धारदार हथियार से गोदा गया था. खून के छींटे कमरे के साथसाथ बाहर सीढि़यों तक फैले थे. इंसपेक्टर अशोक कुमार सिंह ने आसपास नजरें दौड़ा कर जायजा लिया तो देखा, जिस कमरे में वारदात को अंजाम  दिया गया था, वह कमरा घर के पीछे था. संभवत हत्यारे पीछे की दीवार फांद कर अंदर आए होंगे और हत्या कर के उसी तरह भाग गए होंगे. इसी के साथ उन्हें एक बात यह भी खटक रही थी कि हो न हो इस वारदात में किसी करीबी का हाथ रहा हो. घटनास्थल की वस्तुस्थिति और हालात इसी ओर इशारा कर रहे थे. ताज्जुब की बात यह थी कि इतनी बड़ी घटना होने के बाद भी घर के किसी मेंबर को कानोंकान खबर नहीं हुई थी.

बहरहाल, अशोक कुमार सिंह ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर मृतक रणजीत के बारे में जानकारी एकत्र की और थाने लौट आए. उन्होंने रणजीत के पिता बंसीलाल सरोज की लिखित तहरीर के आधार पर अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत केस दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. रणजीत की हत्या होने की खबर आसपास के गांवों तक पहुंची तो तमाम लोग महड़ौरा में एकत्र हो गए. हत्या को ले कर लोगों में आक्रोश था. आक्रोश के साथसाथ भीड़ भी बढ़ती गई. महिलाएं और बच्चे भी भीड़ में शामिल थे. आक्रोशित भीड़ ने गांव के बाहर मेन रोड पर पहुंच कर इलाहाबाद मीरजापुर मार्ग जाम कर दिया. दोनों तरफ का आवागमन बुरी तरह ठप्प हो गया. गुस्से के मारे लोग पुलिस के विरोध में नारे लगाने के साथ मृतक के हत्यारों को गिरफ्तार करने और उस की बीवी को मुआवजा दिलाने की मांग कर रहे थे.

धरना बना जी का जंजाल इस की जानकारी मिलने पर विंध्याचल कोतवाली की पुलिस वहां पहुंच गई, जहां भीड़ जाम लगाए हुए थी. जाम के चलते इंसपेक्टर अशोक कुमार सिंह ने धरने पर बैठे गांव वालों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन वे किसी भी सूरत में पीछे हटने को तैयार नहीं थे. अपना प्रयास विफल होता देख उन्होंने अपने उच्चाधिकारियों को वहां की स्थिति बता कर पुलिस फोर्स भेजने को कहा, ताकि कोई अप्रिय घटना न घट सके. वायरलैस पर सड़क जाम की सूचना प्रसारित होते ही पड़ोसी थानों जिगना, गैपुरा और अष्टभुजा पुलिस चौकी के अलावा जिला मुख्यालय से पहुंची पुलिस और पीएसी ने मौके पर पहुंच कर मोर्चा संभाल लिया. कुछ ही देर में पुलिस अधीक्षक आशीष तिवारी सहित अन्य पुलिस और प्रशासन के अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए.

अधिकारियों ने ग्रामीणों को विश्वास दिलाया कि रणजीत के हत्यारों को जल्द से जल्द गिरफ्तार कर लिया जाएगा. काफी समझाने के बाद ग्रामीण मान गए और उन्होंने धरना समाप्त कर दिया. इस के साथ ही धीरेधीरे जाम भी खत्म हो गया. जाम समाप्त होने के बाद विंध्याचल कोतवाली पहुंचे पुलिस अधीक्षक आशीष तिवारी ने रणजीत के हत्यारों को हर हाल में जल्दी से जल्दी गिरफ्तार कर के इस केस को खोलने का सख्त निर्देश दिया. पुलिस अधीक्षक के सख्त तेवरों को देख कोतवाली प्रभारी अशोक कुमार और उन के मातहत अफसर जीजान से जांच में जुट गए. अशोक कुमार सिंह ने इस केस की नए सिरे से छानबीन करते हुए मृतक रणजीत के पिता बंसीलाल से पूछताछ करनी जरूरी समझी. इस के लिए वह महड़ौरा स्थित बंसीलाल के घर पहुंचे, जहां उन्होंने बंसीलाल से एकांत में बात की.

इस बातचीत में उन्होंने रणजीत से जुड़ी छोटी से छोटी जानकारी जुटाई. बंसीलाल से हुई बातों में एक बात चौंकाने वाली थी जो रणजीत की पत्नी सरिता से संबंधित थी. पता चला उस का चालचलन ठीक नहीं था. इस संबंध में रणजीत के पिता बंसीलाल ने इशारोंइशारों में काफी कुछ कह दिया था. पिता से मिला क्लू बना जांच का आधार इस जानकारी से इंसपेक्टर अशोक कुमार सिंह की आंखों में चमक आ गई. उन्होंने पूछताछ के लिए मृतक रणजीत की पत्नी सरिता और उस के चचेरे भाई बलराम सरोज को थाने बुलाया. लेकिन इन दोनों ने कुछ खास नहीं बताया. दोनों बारबार खुद को बेगुनाह बताते रहे.

बलराम रणजीत का भाई होने का तो सरिता पति होने का वास्ता देती रही. दोनों के घडि़याली आंसुओं को देख कर इंसपेक्टर अशोक कुमार ने उस दिन उन्हें छोड़ दिया, लेकिन उन पर नजर रखने लगे. इसी बीच उन के एक खास मुखबिर ने सूचना दी कि सरिता और बलराम भागने के चक्कर में हैं. मुखबिर की बात सुन कर अशोक कुमार सिंह ने बिना समय गंवाए 29 मार्च को महड़ौरा से सरिता को थाने बुलवा लिया. साथ ही उस के चचेरे देवर बलराम को भी उठवा लिया. थाने लाने के बाद दोनों से अलगअलग पूछताछ की गई. पूछताछ के लिए पहला नंबर सरिता का आया. वह पुलिस को घुमाने का प्रयास करते हुए अपने सुहाग का वास्ता दे कर बोली, ‘‘साहब, आप कैसी बातें कर रहे हैं, भला कोई अपने ही हाथों से अपने सुहाग को उजाड़ेगा? साहब, जरूर किसी ने आप को बहकाया है. आखिरकार मुझे कमी क्या थी, जो मैं ऐसा करती?’’

उस की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि इंसपेक्टर अशोक कुमार सिंह बोले, ‘‘देखो सरिता, तुम ज्यादा सती सावित्री बनने की कोशिश मत करो, तुम्हारी भलाई इसी में है कि सब कुछ सचसच बता दो वरना मुझे दूसरा रास्ता अख्तियार करना पड़ेगा.’’ लेकिन सरिता पर उन की बातों का जरा भी असर नहीं पड़ा. वह अपनी ही रट लगाए हुई थी. अशोक कुमार सिंह सरिता के बाद उस के चचेरे देवर बलराम से मुखातिब हुए, ‘‘हां तो बलराम, तुम कुछ बोलोगे या तुम से भी बुलवाना पड़ेगा.’’

‘‘म…मम…मतलब. मैं कुछ समझा नहीं साहब.’’

‘‘नहीं समझे तो समझ आओ. मुझे यह बताओ कि तुम ने रणजीत को क्यों मारा?’’

‘‘साहब, आप यह क्या कह रहे हैं, रणजीत मेरा भाई था, भला कोई अपने भाई की हत्या क्यों करेगा? मेरी उस से खूब पटती थी. उस के मरने का सब से ज्यादा गम मुझे ही है. और आप मुझे ही दोषी ठहराने पर तुले हैं.’’

उस की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि अचानक इंसपेक्टर अशोक कुमार का झन्नाटेदार थप्पड़ उस के गाल पर पड़ा. वह अपना चेहरा छिपा कर बैठ गया. अभी वह कुछ सोच ही रहा था कि इंसपेक्टर अशोक कुमार सिंह बोले, ‘‘बलराम, भाई प्रेम को ले कर तुम्हारी जो सक्रियता थी, वह मैं देख रहा था. तुम्हारा प्रेम किस से और कितना था, यह सब भी मुझे पता चल चुका है. तुम ने रणजीत को क्यों और किस के लिए मारा, वह भी तुम्हारे सामने है.’’

उन्होंने सरिता की ओर इशारा करते हुए कहा तो बलराम की नजरें झुक गईं. उसे इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि उस की बनाई कहानी का अंत इतनी आसानी से हो जाएगा और पुलिस उस से सच उगलवा लेगी. तीर निशाने पर लगता देख इंसपेक्टर अशोक कुमार सिह ने बिना देर किए तपाक से कहा, ‘‘अब तुम्हारी भलाई इसी में है, दोनों साफसाफ बता दो कि रणजीत की हत्या क्यों और किसलिए की, वरना मुझे दूसरा तरीका अपनाना पड़ेगा.’’

खुल गया रणजीत की हत्या का राज सरिता और बलराम ने खुद को चारों ओर से घिरा देख कर सच्चाई उगलने में ही भलाई समझी. पुलिस ने दोनों को विधिवत गिरफ्तार कर के पूछताछ की तो रणजीत के कत्ल की कहानी परत दर परत खुलती गई. बलराम ने अपना जुर्म कबूल करते हुए बताया कि न जाने कैसे रणजीत को उस के और सरिता के प्रेम संबंधों की जानकारी मिल गई थी. फलस्वरूप वह उन दोनों के संबंधों में बाधक बनने लगा. यहां तक कि उस ने बलराम को अपनी पत्नी से मिलने के लिए मना कर दिया था. इसी के मद्देनजर सरिता और बलराम ने योजनाबद्ध तरीके से रणजीत की हत्या की योजना बनाई. योजना के मुताबिक बलराम ने घर में घुस कर बरामदे में सोए रणजीत की चाकू घोंप कर हत्या कर दी.

बलराम की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल किया गया चाकू घर से 2 सौ मीटर दूर गेहूं के खेत से बरामद कर लिया. सरिता और बलराम ने स्वीकार किया कि जिस चाकू से रणजीत की हत्या की गई थी, उसे बलराम ने हत्या से एक दिन पहले ही गांव के एक लोहार से बनवाया था. पुलिस ने उस लोहार से भी पूछताछ की. उस ने इस की पुष्टि की. पुलिस लाइन में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान पुलिस अधीक्षक आशीष तिवारी ने खुलासा करते हुए बताया कि रणजीत सरोज की पत्नी के अवैध संबंध उस के चचेरे भाई बलराम से पिछले 5 वर्षों से थे. रणजीत ने दोनों को एक बार रंगेहाथों पकड़ा था. उस वक्त घर वालों ने गांव में परिवार की बदनामी की वजह से इस मामले को घर में ही दबा दिया था. साथ ही दोनों को डांटाफटकारा भी था.

रणजीत ने बलराम को घर में आने से मना भी कर दिया था. इस से सरिता अंदर ही अंदर जलने लगी थी. उसे चचेरे देवर से मिलने की कोई राह नहीं सूझी तो उस ने बलराम के साथ मिल कर पति की हत्या की योजना तैयार की ताकि पिछले 5 सालों से चल रहे प्रेम संबंध चलते रहें. पकड़े जाने पर दोनों ने पुलिस और मीडिया के सामने अपना जुर्म कबूल करते हुए अवैध संबंधों में हत्या की बात मानी. दोनों ने पूरी घटना के बारे में विस्तार से बताया. रणजीत हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने के बाद पुलिस ने पूर्व  में दर्ज मुकदमे में अज्ञात की जगह सरिता और बलराम का नाम शामिल कर के दोनों को जेल भेज दिया.

 

Double Murder की सूचना पाकर पुलिस के उड़े होश

कुछ लोग पत्नी में कमियां निकाल कर उस से पीछा छुड़ाने के लिए अपराध का रास्ता चुनते हैं. इस में वे कामयाब भी हो जाते हैं लेकिन उस वक्त वे भूल जाते हैं कि हर अपराध की एक सजा भी होती है. थाना बनियाठेर के थानाप्रभारी प्रवीण सोलंकी रात भर गश्त कर के सुबह 5 बजे अपने कमरे पर पहुंचे. वह आराम करने के लिए लेटे ही थे कि मोबाइल की घंटी बज उठी. उन्होंने काल रिसीव की तो फोन करने वाले अज्ञात व्यक्ति ने बताया कि रसूलपुर के पास कैली गांव में मांबेटी की हत्या कर दी गई है.

डबल मर्डर की सूचना से उन की नींद काफूर हो गई. वह अपने मातहतों को ले कर घटनास्थल की ओर रवाना हो गए. यह बात 19 जून, 2018 की है. थानाप्रभारी ने यह जानकारी उच्च अधिकारियों को भी दे दी. गांव कैली थाने से करीब एक किलोमीटर दूर है, इसलिए प्रवीण सोलंकी करीब 10 मिनट में कैली गांव पहुंच गए. गांव जा कर उन्हें पता चला कि घटना भारत सिंह के घर में घटी है. थानाप्रभारी ने वहां जा कर देखा तो एक कमरे में एक ही चारपाई पर बेटी पूनम और उस के ऊपर उस की मां शांति की लाशें पड़ी थीं. मां के गले में उसी की साड़ी का फंदा कसा हुआ था, साथ ही उस का गला भी कटा हुआ था. चारपाई के पास जमीन पर काफी खून पड़ा था.

शुरुआती जांच में यही लगा कि दोनों को गला घोंट कर मारा गया है और बाद में गला काटा गया है. चारपाई से दूर एक कोने में कुछ टूटी हुई चूडि़यां पड़ी थीं. पूनम के शरीर पर खरोंचों के भी निशान थे, जिस से लग रहा था कि उस ने हत्यारों से अपने बचाव का प्रयास किया था. कुछ ही देर में घटनास्थल पर कप्तान राधेमोहन भारद्वाज, एडीशनल एसपी पंकज कुमार मिश्र और सीओ ओमकार सिंह यादव भी पहुंच गए. उन्होंने थानाप्रभारी को निर्देश दिए. इस के बाद थानाप्रभारी ने लाशें पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दीं.

कैली गांव उत्तर प्रदेश के जिला संभल की तहसील मुख्यालय से करीब 8 किलोमीटर दूर है. करीब 3 हजार की आबादी वाले इस गांव में चंद्रपाल का परिवार रहता था. उस के 4 बेटे और 2 बेटियां थीं. करीब 30 वर्ष पूर्व चंद्रपाल की दर्दनाक मौत हो गई थी. उस की मौत के पीछे की भी एक अलग कहानी थी. दरअसल गांव में पेयजल का संकट था. चंद्रपाल के घर के सामने कुएं की खुदाई चल रही थी. चंद्रपाल भी खुदाई कर रहा था. काफी गहराई तक मिट्टी निकाली जा चुकी थी. तभी अचानक ऊपर से मिट्टी की ढांग गिर कई और चंद्रपाल जिंदा ही दफन हो गया.

उस समय इतने संसाधन नहीं थे कि चंद्रपाल को जल्दी निकाला जा सके. फिर भी गांव वालों ने जैसेतैसे उसे बाहर निकाला लेकिन तब तक उस की मौत हो चुकी थी. इस के बाद गांव वालों ने वह कुआं फिर से मिट्टी से भर दिया. बाद में जब चंद्रपाल के बेटे जवान हुए तो उन्होंने गांव वालों के सहयोग से पिता के मिशन को पूरा किया. कुआं तैयार हो जाने के बाद गांव में पेयजल की समस्या दूर हो गई. जिस समय चंद्रपाल की मौत हुई थी, उस समय उस के सभी बच्चे छोटे थे यानी शांति भरी जवानी में विधवा हो गई थी. उस के सामने 6 बच्चों के पालनपोषण की समस्या थी. ऐसे में एक रिश्तेदार भारत सिंह ने शांति के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा.

भारत सिंह मुरादाबाद जिले की पुलिस चौकी जरगांव के अंतर्गत आने वाले भूड़ी गांव का निवासी था. उस की पत्नी की मौत भी एक हृदयविदारक घटना में हुई थी. भारत सिंह का विवाह करीब 32 साल पहले गांव नानपुर की मिलक, जिला रामपुर की महेंद्री नाम की युवती से हुआ था. एक दिन अचानक रात में डाकुओं ने भूड़ी गांव पर धावा बोल दिया. गांव वालों ने भी मोर्चा संभाला. डाकू लगातार फायरिंग कर रहे थे. ग्रामीण फायरिंग का जवाब ईंटपत्थरों से दे रहे थे. लेकिन उन का मुकाबला करने में वे नाकाम रहे. तब अधिकांश लोग जान बचाने के लिए जंगलों की ओर भागने लगे.

भारत सिंह भी अपने भाइयों राधेश्याम व सूरज सिंह के साथ जंगल में भाग गया. भारत सिंह की पत्नी महेंद्री गहरी नींद में सो रही थी. वह घर में अकेली रह गई. उस समय उस की कोख में 6 महीने का बच्चा था. महेंद्री की जब आंख खुली तो खुद को घर में अकेला देख वह घबरा गई. फायरिंग की आवाज सुन कर वह माजरा समझ गई. बदहवास महेंद्री ने भी जान बचाने की खातिर घर से जंगल की ओर दौड़ लगा दी. भागते वक्त वह ठोकर खा कर गिर गई. जब डाकू गांव में लूटपाट कर के चले गए, तब गांव के लोग घर वापस आए. रास्ते में लोगों ने महेंद्री को तड़पते हुए देखा. भारत सिंह भी पत्नी के पास पहुंच गया. उस की हालत देख कर उस के होश उड़ गए.

घर वाले महेंद्री को उठा कर घर ले आए. खून बहता देख वे लोग समझ गए कि पेट में पल रहे नवजात को हानि पहुंची है. महेंद्री भी बेहोशी की हालत में थी. आधी रात का समय था. इलाज के लिए शहर में ले जाने का कोई साधन नहीं था. घरों में लूटपाट होने की वजह से गांव में वैसे ही कोहराम मचा था. कोई भी गाड़ी ले कर जाने का साहस नहीं जुटा पा रहा था. फलस्वरूप सुबह होने से पहले ही महेंद्री की मौत हो गई. भारत सिंह की शादी हुए केवल 4 साल हुए थे. पत्नी की मौत के बाद वह खोयाखोया सा रहने लगा था. फिर एक रिश्तेदार के सुझाव पर उस ने 6 बच्चों की मां, विधवा शांति देवी के साथ कराव कर लिया. दरअसल हिंदू विवाह संस्कार के अनुसार अग्नि के सात फेरे और कन्यादान एक बार ही किया जाता है. चूंकि शादी के समय शांति सात फेरे ले चुकी थी और उस का कन्यादान भी हो चुका था, इसलिए भारत के साथ वह दूसरी बार अग्नि के फेरे नहीं ले सकती थी, इसलिए उस का कराव करा दिया गया.

इस के बाद भारत सिंह व शांति का दांपत्य जीवन हंसीखुशी से गुजरने लगा. कुछ दिनों बाद ही भारत सिंह अपने हिस्से की डेढ़ बीघा जमीन बेच कर और घर अपने भाइयों को दे कर कैली में आ कर रहने लगा. वह मेहनतमजदूरी कर के बच्चों का पालनपोषण करने लगा. इस बीच उस के 3 बच्चे और हुए. जैसेजैसे बच्चे बड़े हुए, भारत सिंह ने उन की शादी कर दी. उस ने सब से छोटी बेटी पूनम का विवाह इसी साल 18 फरवरी को अनिल के साथ कर दिया था. अनिल चंदौसी शहर के हनुमानगढ़ी मोहल्ले में रहता था. पूनम देहाती माहौल में पलीबढ़ी थी जबकि उस की शादी शहर के लड़के से हुई थी. कई महीने तक शहर में रहने के बावजूद  वह खुद को शहरी माहौल में नहीं ढाल पाई. ससुराल वाले उसे लाख समझाते पर वह खुद को बदलने के लिए तैयार नहीं थी.

अनिल विवाह आदि समारोहों में फोटोग्राफी व वीडियोग्राफी का काम करता था. रात को देर से आना उस की पेशेगत मजबूरी थी. जब वह कहीं बुकिंग पर नहीं जाता, तब भी वह शराब के नशे में देर से घर आता था. पूनम को उस का शराब पीना पसंद नहीं था. वैचारिक मतभेद के साथ दोनों के बीच मनभेद भी बढ़ता चला गया. अनिल और पूनम के 4 महीने के वैवाहिक जीवन में घरेलू कलह रहने लगी थी. विवाद बढ़ने पर कई बार अनिल ने पूनम की पिटाई भी कर दी थी, जिस से उस के कान में चोट आई थी. ससुराल में पूनम की उपेक्षा बढ़ती जा रही थी. एक बार पूनम को बुखार आया तो अनिल उसे उस के मायके छोड़ आया. मायके वालों ने पूनम का इलाज कराया.

चोट की वजह से उस के कान में दर्द रहने लगा था. मायके वालों ने उस के कान का भी इलाज कराया. पूनम के मायके वाले  उस के दांपत्य जीवन को सुखी बनाए रखने के प्रयास में लगे रहे. 25 मई, 2018 को कैली गांव में किसी की शादी थी. शादी की दावत में पूनम व उस के पति अनिल को भी आमंत्रित किया गया था. अनिल ससुराल से पत्नी को साथ ला कर विवाह समारोह में शामिल हुआ. इस के बाद अनिल अपनी पत्नी पूनम को मायके में छोड़ कर रात में ही अपने गांव चला गया. ससुराल वालों ने उस से रात में वहीं रुकने का आग्रह करते हुए कहा कि सुबह पूनम को भी साथ ले कर चला जाए. इस पर अनिल ने कहा कि 2-4 दिन बाद आ कर उसे ले आएगा. लेकिन 15 दिन बीत गए और अनिल पूनम को लेने नहीं आया. पूनम उस से मोबाइल पर बात करना चाहती तो वह कोई न कोई बहाना बना कर उस से बात नहीं करता था. वह कहता था कि 2-4 दिन में उसे लेने आ जाएगा. इस तरह वह उसे टालता रहा.

19 जून को पूनम व उस की मां की हत्या से घर में कोहराम मच गया था. पूरा गांव शोक में डूबा था. भारत सिंह का रोरो कर बुरा हाल था. मांबेटी की अर्थी जब एक साथ उठी तो शवयात्रा में शामिल ग्रामीणों की आंखें नम हो गईं.  उधर पुलिस ने अपनी जांच भारत सिंह से शुरू की. भारत ने पुलिस को बताया कि 18 जून की रात अनिल के पिता फूल सिंह का फोन आया था. उन्होंने बताया था कि अनिल पूनम को लेने गांव गया हुआ है. उस समय वह खेतों पर लगी मेंथा की टंकी पर था. वहां वह किसानों का मेंथा औयल निकालता था. इस काम से उसे अच्छीखासी आमदनी हो जाती थी. उस रात वह घर नहीं आ सका था.

पुलिस को अन्य सूत्रों से भी पता चला कि अनिल उस रात गांव में देखा गया था. पुलिस ने अनिल के घर दबिश दी तो वह घर पर ही मौजूद था. पुलिस उसे पूछताछ के लिए थाने ले आई. जब उस से पूनम और उस की मां की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो वह काफी देर तक पुलिस को गुमराह करता रहा. पुलिस ने थोड़ी सख्ती की तो वह टूट गया और उस ने अपने जुर्म का इकबाल कर लिया. फिर डबल मर्डर की कहानी कुछ इस तरह सामने आई. अनिल ने बताया कि गंवार संस्कृति की पूनम से वह पीछा छुड़ाना चाहता था. वह उस के दिल से पूरी तरह उतर चुकी थी, इसलिए वह उसे मायके छोड़ गया था. लेकिन उस के घर वाले उसे साथ ले जाने के लिए दबाव बना रहे थे. उधर पूनम भी बारबार उसे आने के लिए फोन करती रहती थी. किसी भी तरह वह उस से पीछा छुड़ाना चाहता था.

18 जून, 2018 की शाम को उस के पास पूनम का फोन आया. तब अनिल ने अपनी ससुराल के लोगों के बारे में जानकारी की. पता चला कि उस के पिता व भाई घर पर नहीं हैं. पिता मेंथा टंकी पर हैं और भाई खेत पर. कुछ अपनी रिश्तेदारियों में गए हुए हैं. घर पर पूनम और उस की मां ही है. उसे ऐसे ही मौके की तलाश थी. पूनम अपनी मां के साथ गांव की हवेली से दूर अंतिम सिरे पर स्थित घेर कहे जाने वाले मकान में थी. सुनील जानता था कि पूनम के पांचों भाई अपने परिवार के साथ अंदर वाली हवेली में रहते हैं. पूनम की मां धार्मिक प्रवृत्ति की थी. वह ज्यादातर अपने हाथ का ही बना सादा भोजन करती थी. कभीकभी वह बहुओं द्वारा बनाया गया सादा भोजन भी खा लेती थी.

अनिल अपने दोस्त कौशल के साथ बाइक से घेर वाले उस मकान पर पहुंच गया. वह हाइवे से गांव को जाने वाली सड़क से न जा कर मकान के उत्तर में खाली प्लौटों से होता हुआ गया. उस ने बाइक भी कुछ दूर मकान की दीवार से सटा कर खड़ी कर दी थी. वहां से वह योजनानुसार पैदल ही घर पहुंचे, जिस से आसपड़ोस वालों को पता न चल सके कि पूनम के घर कोई आया है. पूनम अपनी मां शांति के साथ छत पर लेटी हुई थी. अनिल को देख पूनम की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा. मांबेटी ने दोनों का आदरसत्कार किया. चायनाश्ते के बाद अनिल ने अपनी सास व अपने दोस्त को यह कह कर ऊपर छत पर भेज दिया कि पूनम से कुछ बात करनी है. अनिल ने पूनम से कह कर चारपाई बरामदे से उठा कर कमरे में डलवाई. उस समय लाइट भी नहीं थी. पूनम समझ नहीं पा रही थी कि इतनी गरमी में अंदर बैठ कर वह क्या खास बात करेंगे.

अनिल चारपाई पर बैठी पत्नी से औपचारिक बातें करने लगा, तभी अचानक उस ने अपने दोनों हाथों से पूनम का गला पकड़ लिया. पूनम समझ नहीं पाई कि वह क्या कर रहा है. गले पर हाथों का दबाव बढ़ने पर पूनम ने अपने बचाव में हाथपैर चलाने शुरू कर दिए, जिस से उस की चूडि़यां भी टूट गईं और शरीर पर खरोचों के निशान भी पड़ गए. पति के सामने पूनम का संघर्ष असफल रहा. कुछ ही देर में वह चारपाई पर लुढ़क गई. जब अनिल को यकीन हो गया कि पूनम की सांसें थम गई हैं, तब उस ने अपने दोस्त कौशल को नीचे बुलाया. उस के साथ पूनम की मां शांति भी नीचे आ गई.

शांति जब नीचे आई तो पूनम उसे बरामदे में दिखाई नहीं दी. उस ने अनिल से पूनम के बारे में पूछा. अनिल ने इशारा करते हुए कहा कि वह अंदर कमरे में है. शांति जैसे ही कमरे की तरफ बढ़ी, अनिल ने उसे पीछे से दबोच लिया. दोस्त के सहयोग से उस ने सास को भी जमीन पर गिरा कर पहले उस के मुंह में कपड़ा ठूंसा, जिस से उस की आवाज न निकल सके. फिर कौशल ने पैर जकड़े और अनिल ने उसी की साड़ी से उस का गला घोंट दिया. शांति को मारने के बाद दोनों ने उसे जमीन से उठा कर पूनम की लाश के ऊपर डाल दिया. अनिल को यह अहसास हुआ कि सास शांति देवी की सांसें अभी थमी नहीं हैं, तब उस ने उस की गरदन चारपाई से नीचे की ओर लटकाई. कौशल ने लटकती गरदन को पकड़ा और अनिल ने सब्जी काटने के चाकू से गरदन रेत दी.

इस के बाद दोनों वहां से निकल गए. इस मकान से आगे केवल 2 मकान और हैं. उस के बाद आबादी नहीं है. उन्होंने वहां आड़ में खड़ी बाइक उठाई और चले गए. सामने व पड़ोस में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को इस दोहरे हत्याकांड की भनक तक नहीं लग सकी. पूनम का एक विकलांग भाई कुंवरपाल 5-6 मकान पहले गली के नुक्कड़ पर स्थित पशुशाला में सोने के लिए आया था. 4 साल की उम्र में उसे पोलियो हो गया था. उस की शादी भी एक विकलांग लड़की से हुई थी. वह बैसाखी के सहारे चलती है. कुंवरपाल रात 10 बजे सोने के लिए पशुशाला में चला जाता था. करीब 25 सदस्यों का इन का संयुक्त परिवार है. सभी का भोजन एक साथ बनता है. सभी भाइयों एवं उन की बहुओं में गजब का सामंजस्य है. कुंवरपाल को भी घटना की जानकारी नहीं लगी.

अनिल से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उस के और उस के दोस्त कौशल के खिलाफ हत्या का केस दर्ज कर के अनिल को सीजेएम रवि कुमार के समक्ष पेश कर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. पुलिस ने दूसरे अभियुक्त कौशल की तलाश में इधरउधर छापे मारे तो उस ने 28 जून, 2018 को अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. अनिल ने हत्या का कारण यह भी बताया कि पूनम मानसिक रोगी थी और यह बात उस के घर वालों ने उस से छिपाई थी. जबकि परिजनों का कहना है कि उस के इस आरोप के कारण पूनम का सीटी स्कैन कराया था, जिस में वह पूर्ण स्वस्थ पाई गई.

मामले की जांच थानाप्रभारी प्रवीण सोलंकी कर रहे हैं.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

भाभी के प्यार में पागल देवर ने ली साले की जान

फौजी सुरेंद्र के संबंध अपनी भाभी से थे. भाई की मौत के बाद वह उसे अपने साथ रखना चाहता था, जबकि सुरेंद्र की पत्नी ममता ने इस का विरोध किया तब इस सनकी फौजी ने जो किया, उस से 2 घर बरबाद हो गए. कानपुर महानगर के थाना चकेरी के अंतर्गत आने वाले गांव घाऊखेड़ा में बालकृष्ण यादव अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी वीरवती के अलावा 2 बेटियां गीता, ममता और 3 बेटे मोहन, राजेश और श्यामसुंदर थे. बालकृष्ण सेना में थे, इसलिए उन्होंने अपने सभी बच्चों की परवरिश बहुत ही अच्छे ढंग से की थी. उन की पढ़ाईलिखाई भी का भी विशेष ध्यान रखा था.

नौकरी के दौरान ही उन्होंने अपने बड़े बेटे मोहन और बड़ी बेटी गीता की शादी कर दी थी. सन 2004 में बालकृष्ण सेना से रिटायर्ड हो गए थे. अब तक उन के अन्य बच्चे भी सयाने हो गए थे. इसलिए वह एकएक की शादी कर के इस जिम्मेदारी से मुक्ति पाना चाहते थे. इसलिए घर आते ही उन्होंने ममता के लिए अच्छे घरवर की तलाश शुरू कर दी. इसी तलाश में उन्हें अपने दोस्त लक्ष्मण सिंह की याद आई. क्योंकि उन का छोटा बेटा सुरेंद्र सिंह शादी लायक था.

लक्ष्मण सिंह भी उन्हीं के साथ सेना में थे. उन के परिवार में पत्नी लक्ष्मी देवी के अलावा 2 बेटे वीरेंद्र और सुरेंद्र थे. वीरेंद्र प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता था, जबकि सुरेंद्र की नौकरी सेना में लग गई थी. वीरेंद्र की शादी कानपुर के ही मोहल्ला श्यामनगर के रहने वाले रामबहादुर की बहन निर्मला से हुई थी. सुरेंद्र की नौकरी लग गई थी, इसलिए लक्ष्मण सिंह भी उस के लिए लड़की देख रहे थे. सुरेंद्र का ख्याल आते ही बालकृष्ण अपने दोस्त के यहां जा पहुंचे. उन्होंने उन से आने का कारण बताया तो दोनों दोस्तों ने दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने का निश्चय कर लिया.

इस के बाद सारी औपचारिकताएं पूरी कर के ममता और सुरेंद्र की शादी हो गई. ममता सतरंगी सपने लिए अपनी ससुराल गांधीग्राम आ गई. यह सन 2005 की बात है. शादी के बाद ममता के दिन हंसीखुशी से गुजरने लगे. लेकिन जल्दी ही ममता की यह खुशी दुखों में बदलने लगी. इस की वजह यह थी कि सुरेंद्र पक्का शराबी था. वह शराब का ही नहीं, शबाब का भी शौकीन था. इस के अलावा उस में सभ्यता और शिष्टता भी नहीं थी. शादी होते ही हर लड़की मां बनने का सपना देखने लगती है. ममता भी मां बनना चाहती थी.

लेकिन जब ममता कई सालों तक मां नहीं बन सकी तो वह इस विषय पर गहराई से विचार करने लगी. जब इस बात पर उस ने गहराई से विचार किया तो उसे लगा कि एक पति जिस तरह पत्नी से व्यवहार करता है, उस तरह का व्यवहार सुरेंद्र उस से नहीं करता. उसी बीच ममता ने महसूस किया कि सुरेंद्र उस के बजाय अपनी भाभी के ज्यादा करीब है. लेकिन वह इस बारे में किसी से कुछ कह नहीं सकी. इस की वजह यह थी कि उस ने कभी दोनों को रंगेहाथों नहीं पकड़ा था. फिर भी उसे संदेह हो गया था कि कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है.

एक तो वैसे ही ममता को सुरेंद्र के साथ ज्यादा रहने का मौका नहीं मिलता था, दूसरे जब वह घर आता था तो उस से खिंचाखिंचा रहता था. सुरेंद्र ममता को साथ भी नहीं ले जाता था, इसलिए ज्यादातर वह मायके में ही रहती थी. आखिर शादी के 5 सालों बाद ममता का मां बनने का सपना पूरा ही हो गया. उस ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रखा गया सौम्य. ममता को लगा कि बेटे के पैदा होने से सुरेंद्र बहुत खुश होगा. उन के बीच की जो हलकीफुलकी दरार है, वह भर जाएगी. उस के जीवन में भी खुशियों की बहार आ जाएगी.

लेकिन ऐसा हुआ नहीं, क्योंकि ममता को जैसे ही बेटा पैदा हुआ, उस के कुछ दिनों बाद ही सुरेंद्र के बड़े भाई वीरेंद्र की मौत हो गई. वीरेंद्र की यह मौत कुदरती नहीं थी. वह थोड़ा दबंग किस्म का आदमी था. उस का किसी से झगड़ा हो गया तो सामने वाले ने अपने साथियों के साथ उसे इस तरह मारापीटा कि अस्पताल पहुंचने से पहले ही उस की मौत हो गई. वीरेंद्र की मौत के बाद सुरेंद्र और उस की भाभी के जो नजायज संबंध लुकछिप कर बन रहे थे, अब घरपरिवार और समाज की परवाह किए बगैर बनने लगे. ममता का जो संदेह था, अब सच साबित हो गया. भाभी को हमारे यहां मां का दरजा दिया जाता है, लेकिन सुरेंद्र और निर्मला को इस की कोई परवाह नहीं थी. जेठ के रहते ममता ने इस बात पर खास ध्यान नहीं दिया था. लेकिन जेठ की मौत के बाद सुरेंद्र खुलेआम भाभी के पास आनेजाने लगा.

ममता ने इस का विरोध किया तो उस के ससुर ने कहा, ‘‘ममता, इस मामले में तुम्हारा चुप रहना ही ठीक है. दरअसल मैं ने अपनी सारी प्रौपर्टी पहले ही वीरेंद्र और सुरेंद्र के नाम कर दी थी. निर्मला अभी जवान है. अगर वह कहीं चली गई तो उस के हिस्से की प्रौपर्टी भी उस के साथ चली जाएगी. इसलिए अगर तुम बखेड़ा न करो तो सुरेंद्र उस से शादी कर ले. इस तरह घर की बहू भी घर में ही रह जाएगी और प्रौपर्टी भी.’’

सौतन भला किसे पसंद होती है. इसलिए ससुर की बातें सुन कर ममता तड़प उठी. वह समझ गई कि यहां सब अपने मतलब के साथी हैं. उस का कोई हमदर्द नहीं है. पति गलत रास्ते पर चल रहा है तो ससुर को चाहिए कि वह उसे सही रास्ता दिखाएं और समझाएं. जबकि वह खुद ही उस का समर्थन कर रहे हैं. बल्कि उस से यह कह रहे हैं कि वह सौतन स्वीकार कर ले. उस का पति तो वैसे ही उसे वह मानसम्मान नहीं देता, जिस की वह हकदार है. अगर उस ने भाभी से शादी कर ली तो शायद वह उसे दिल से ही नहीं, घर से भी निकाल दे. यही सब सोच कर ममता ने उस समय इस बात को टालते हुए कहा, ‘‘बाबूजी, यह मेरी ही नहीं, मेरे बच्चे की भी जिंदगी से जुड़ा मामला है. इसलिए मुझे थोड़ा सोचने का समय दीजिए.’’

इस के बाद ममता मायके गई और घरवालों को पूरी बात बताई. ममता की बात सुन कर सभी हैरान रह गए. एकबारगी तो किसी को इस बात पर विश्वास ही नहीं हुआ, क्योंकि निर्मला 3 बच्चों की मां थी. उस समय उस की बड़ी बेटी लगभग 20 साल की थी, उस से छोटा बेटा 16 साल का था तो सब से छोटा बेटा 12 साल का. इस उम्र में निर्मला को अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचना चाहिए था, जबकि वह अपने बारे में सोच रही थी. उस की बेटी ब्याहने लायक हो गई थी, जबकि वह खुद अपनी शादी की तैयारी कर रही थी. ममता के घर वालों ने उस से साफसाफ कह दिया कि वह इस बात के लिए कतई न राजी हो. जेठानी को जेठानी ही बने रहने दे, उसे सौतन कतई न बनने दे.

मायके वालों का सहयोग मिला तो सीधीसादी ममता ने अपने ससुर से साफसाफ कह दिया कि वह कतई नहीं चाहती कि उस  का पति उस के रहते दूसरी शादी करे. ममता का यह विद्रोह न सुरेंद्र को पसंद आया, न उस के बाप लक्ष्मण सिंह को. इसलिए बापबेटे दोनों को ही ममता से नफरत हो गई. परिणामस्वरूप दोनों के बीच दरार बढ़ने लगी. ममता सुरेंद्र की परछाई बन कर उस के साथ रहना चाहती थी, जबकि सुरेंद्र उस से दूर भाग रहा था. अब वह छोटीछोटी बातों पर ममता की पिटाई करने लगा. ससुराल के अन्य लोग भी उसे परेशान करने लगे. इस के बावजूद ममता न पति को छोड़ रही थी, न ससुराल को. इतना परेशान करने पर भी ममता न सुरेंद्र को छोड़ रही थी, न उस का घर तो एक दिन सुरेंद्र ने खुद ही मारपीट कर उसे घर से निकाल दिया.

सुरेंद्र ने जिस समय ममता को घर से निकाला था, उस समय उस की पोस्टिंग लखनऊ के कमांड हौस्पिटल में थी. ममता के पिता बालकृष्ण और भाई श्यामसुंदर ने सुरेंद्र के अफसरों से उस की इस हरकत की लिखित शिकायत कर दी. तब अधिकारियों ने सुरेंद्र और ममता को बुला कर दोनों की बात सुनी. चूंकि गलती सुरेंद्र की थी, इसलिए अधिकारियों ने उसे डांटाफटकारा ही नहीं, बल्कि आदेश दिया कि वह ममता को 10 हजार रुपए महीने खर्च के लिए देने के साथ बच्चों को ठीक से पढ़ाएलिखाए. इस के बाद अधिकारियों ने कमांड हौस्पिटल परिसर में ही सुरेंद्र को मकान दिला दिया, जिस से वह पत्नी और बच्चों के साथ रह सके.

अधिकारियों के कहने पर सुरेंद्र ममता को साथ ले कर उसी सरकारी क्वार्टर में रहने तो लगा, लेकिन उस की आदतों में कोई सुधार नहीं आया. उसे जब भी मौका मिलता, वह भाभी से मिलने कानपुर चला जाता. अगर ममता कुछ कहती तो वह उस से लड़नेझगड़ने लगता. साथ रहने पर सुरेंद्र से जितना भी हो सकता था, वह ममता को परेशान करता रहा, इस के बावजूद ममता उस का पीछा छोड़ने को तैयार नहीं थी. अगर सुरेंद्र ज्यादा परेशान करता तो वह उस की ज्यादतियों की शिकायत उस के अधिकारियों से कर देती, जिस से उसे डांटाफटकारा जाता. लखनऊ में रहते हुए ममता ने एक बेटी को जन्म दिया. बेटी के पैदा होने के समय वह मायके आ गई थी. लेकिन 2 महीने के बाद वह अकेली ही लखनऊ चली गई.

धीरेधीरे सुरेंद्र सेना के नियमों का उल्लंघन करने लगा. एक दिन वह शराब पी कर बिना हेलमेट के सैन्य क्षेत्र में मोटरसाइकिल चलाते पकड़ा गया तो उसे दंडित किया गया. लेकिन उस पर इस का कोई असर नहीं पड़ा. दंडित किए जाने के बाद भी उस में कोई सुधार नहीं आया. इसी तरह दोबारा शराब पी कर बिना हेलमेट के सैन्य क्षेत्र में मोटरसाइकिल चलाने पर सेना के गार्ड ने उसे रोका तो उस ने गार्ड को जान से मारने की धमकी दी. गार्ड ने इस बात की रिपोर्ट कर दी. निश्चित था, इस मामले में उसे सजा हो जाती. इसलिए सजा से बचने के लिए वह भाग कर कानपुर चला गया.

सुरेंद्र को लगता था कि इस सब के पीछे उस के साले श्यामसुंदर का हाथ है. यह बात दिमाग में आते ही श्यामसुंदर उस की आंखों में कांटे की तरह चुभने लगा. क्योंकि श्यामसुंदर काफी पढ़ालिखा और समझदार था. वह कानपुर में ही एयरफोर्स में नौकरी कर रहा था. बात भी सही थी. उसी ने अधिकारियों से उस की शिकायत कर के ममता को साथ रखने के लिए उसे मजबूर किया था. सुरेंद्र को लग रहा था कि जब तक श्यामसुंदर रहेगा, उसे चैन से नहीं रहने देगा. इसलिए उस ने सोचा कि अगर उसे चैन से रहना है तो उसे खत्म करना जरूरी है. इसी बात को दिमाग में बैठा कर सुरेंद्र 29 सितंबर को चकेरी के विराटनगर स्थित अपने ससुर की दुकान पर जा पहुंचा. उस समय शाम के सात बज रहे थे.

श्यामसुंदर ड्यूटी से आ कर दुकान पर बैठ कर पिता की मदद करता था. संयोग से उस दिन श्यामसुंदर दुकान पर अकेला ही था. सुरेंद्र ने पहुंचते ही अपने लाइसेंसी रिवाल्वर से श्यामसुंदर पर गोली चला दी. गोली लगते ही श्यामसुंदर गिर कर छटपटाने लगा. गोली की आवाज सुन कर आसपास के लोग दौड़े तो सुरेंद्र ने हवाई फायर करते हुए कहा, ‘‘अगर किसी ने रोकने या पकड़ने की कोशिश की तो उस का भी यही हाल होगा.’’

डर के मारे किसी ने सुरेंद्र को पकड़ने की हिम्मत नहीं की. सुरेंद्र आसानी से वहां से भाग निकला. पड़ोसियों की मदद से बालकृष्ण बेटे को एयरफोर्स हौस्पिटल ले गए, जहां निरीक्षण के बाद डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. श्यामसुंदर की मौत से उस के घर में कोहराम मच गया. श्यामसुंदर की पत्नी सीमा देवी, जिस की शादी अभी 3 साल पहले ही हुई थी, उस का रोरो कर बुरा हाल था. अपने 2 साल के बेटे कार्तिक को सीने से लगाए कह रही थी, ‘‘बेटा तू अनाथ हो गया. तुझे किसी और ने नहीं, तेरे फूफा ने ही अनाथ कर दिया.’’

इस घटना की सूचना ममता को मिली तो उस का बुरा हाल हो गया. वह दोनों बच्चों को ले कर रोतीपीटती किसी तरह लखनऊ से कानपुर पहुंची. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी भाभी को कैसे सांत्वना दे. वह तो यही सोच रही थी कि वह स्वयं विधवा हो गई होती तो इस से अच्छा रहता. घटना की सूचना पा कर अहिरवां चौकी प्रभारी विक्रम सिंह चौहान सिपाही रूप सिंह यादव, सीमांत सिकरवार, विनोद कुमार तथा योंगेंद्र को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंचे. घटना गंभीर थी, इसलिए उन्होंने घटना की सूचना थानाप्रभारी संगमलाल सिंह को दी. इस तरह सूचना पा कर थानाप्रभारी संगमलाल सिंह, पुलिस अधीक्षक (पूर्वी) राहुल कुमार और क्षेत्राधिकारी कैंट भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

इस के बाद श्यामसुंदर के भाई राजेश यादव द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर हत्या का यह मुकदमा थाना चकेरी में सुरेंद्र सिंह यादव पुत्र लक्ष्मण सिंह यादव निवासी गांधीग्राम, चकेरी के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. दूसरी ओर घटनास्थल और लाश का निरीक्षण करने पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. इस के बाद मामले की जांच की जिम्मेदारी थानाप्रभारी संगमलाल सिंह ने संभाल ली. अगले दिन पोस्टमार्टम के बाद श्यामसुंदर का शव मिला तो घरवालों ने सुरेंद्र की गिरफ्तारी न होने तक अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया. मृतक के घर वालों की इस घोषणा से पुलिस प्रशासन सकते में आ गया. इस के बाद पुलिस सुरेंद्र की गिरफ्तारी के लिए दौड़धूप करने लगी. परिणामस्वरूप अगले दिन यानी 1 अक्तूबर, 2013 को रामादेवी चौराहे से सुबह 4 बजे अभियुक्त सुरेंद्र सिंह यादव को गिरफ्तार कर लिया गया.

इस के बाद पुलिस ने सुरेंद्र की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त उस की लाइसेंसी रिवाल्वर बरामद कर ली. पूछताछ में सुरेंद्र ने बताया, ‘‘मेरे अपनी भाभी निर्मला से अवैध संबंध थे. भाई के मरने के बाद मैं उसे अपने साथ रखना चाहता था, जबकि ममता और उस के घर वाले इस बात का विरोध कर रहे थे. श्यामसुंदर इस मामले में सब से ज्यादा टांग अड़ा रहा था, इसलिए मैं ने उसे खत्म कर दिया.’’

सुरेंद्र की गिरफ्तारी के बाद उसी दिन शाम को श्यामसुंदर को घर वालों ने उस का अंतिमसंस्कार कर दिया. इस तरह एक सनकी फौजी ने अपनी सनक की वजह से 2 घर बरबाद कर दिए. साले के बच्चे को तो अनाथ किया ही, अपने भी बच्चों को अनाथ कर दिया.

ममता भी पति के रहते न सुहागिन रही न विधवा. उस के लिए विडंबना यह है कि वह मायके में भी रहे तो कैसे? अब उस की और उस के बच्चों की परवरिश कौन करेगा? सुरेंद्र को सजा हो गई तो उस के मासूम बच्चों का क्या होगा?

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Murder Story : चारपाई के नीचे पति को दफनाया और प्रेमी संग बनाई रंगरलियां

आदमी हो या औरत, जवानी में अगर उस के पैर बहक जाएं तो फिर दिल्लगी दिल की लगी बन कर ऐसा कहर ढाती है कि खून भी पानी सा लगने लगता है. माया और टुल्लू के बीच…

चित्रकूट जिले के गांव लोहदा का रहने वाला फूलचंद विश्वकर्मा कानपुर की एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में ट्रक ड्राइवर की नौकरी करता था. उस की मां और बड़े भाई का परिवार गांव में रहते थे. ट्रक ड्राइवर का पेशा ऐसा है, जिस में कई बार आदमी को लौटने में महीनोंमहीनों लग जाते हैं. इसी वजह से फूलचंद पिछले एक साल से गांव में रह रही बूढ़ी मां और भाई के परिवार से नहीं मिल सका था. समय मिला तो उस ने 5 जुलाई, 2018 को गांव जाने का फैसला किया.

फूलचंद तहसील राजापुर स्थित अपने गांव लोहदा पहुंचा तो उस की वृद्धा मां तो पुश्तैनी घर में मिल गई, लेकिन अलग रह रहा बड़ा भाई शिवलोचन और उस का परिवार घर में नहीं था. वह मां से मिला तो उस की आंखें भर आईं और वह उस के गले लग कर रो पड़ी. फूलचंद को लगा कि मां से एक साल बाद मिला है, इसलिए वह भावुक हो गई है. उस ने जैसेतैसे सांत्वना दे कर मां को चुप कराया और बड़े भाई शिवलोचन और उस के परिवार के बारे में पूछा.

उस की मां चुनकी देवी ने रोते हुए बताया कि पिछले 8 महीने से शिवलोचन का कोई पता नहीं है. बहू माया भी 7-8 महीने पहले दोनों बच्चों को ले कर अपने मायके चली गई थी. तब से वापस नहीं लौटी. मां की बात सुन कर फूलचंद परेशान हो गया. उस ने इस बारे में मां से विस्तार से पूछा तो उस ने बताया कि 8 महीने पहले जब कई दिनों तक शिवलोचन  दिखाई नहीं दिया तो उस ने और गांव वालों ने बहू माया से उस के बारे में पूछा. माया ने बताया कि शिवलोचन अपनी नौकरी पर कर्वी चला गया है. इस के कुछ दिन बाद माया भी यह कह कर दोनों बच्चों के साथ मायके चली गई कि घर में राशन खत्म हो गया है. जब शिवलोचन लौट आएं तो खबर भिजवा देना, मैं आ जाऊंगी.

फूलचंद को मालूम था कि उस का भाई शिवलोचन कर्वी के एक जमींदार तेजपाल सिंह के खेतों में टै्रक्टर चलाने का काम करता था. जमींदार की गाडि़यां भी वही ड्राइव करता था. मां ने बताया कि उस ने शिवलोचन को कई बार फोन भी कराया था, लेकिन उस का फोन बंद था. मां ने आशंका व्यक्त करते हुए यह भी कहा कि शिवलोचन इतने महीनों तक कभी भी कर्वी में नहीं रहा, बीचबीच में वह आता रहता था.

फूलचंद इस बात को समझता था कि आदमी भले ही कितना भी व्यस्त क्यों न रहे, ऐसा नहीं हो सकता कि अपने परिवार की सुध ही न ले. संदेह की एक वजह यह भी थी कि भाई का हालचाल जानने के लिए फूलचंद ने खुद भी भाई के मोबाइल पर फोन किए थे, लेकिन उस का फोन हर बार बंद मिला था. उस वक्त उस ने यही सोचा था कि संभव है, भाई किसी ऐसी जगह पर हो, जहां नेटवर्क न मिलता हो. संदेह पैदा हुआ तो फूलचंद उसी दिन गांव के 2 आदमियों को साथ ले कर कर्वी के जमींदार तेजपाल सिंह के पास गया. वहां उसे जो जानकारी मिली, उस ने फूलचंद की चिंता और बढ़ा दी. तेजपाल सिंह ने बताया कि शिवलोचन नवंबर 2017 में दीपावली के बाद से काम पर नहीं आया है.

उस के कई दिनों तक काम पर न आने की वजह से उन्होंने उस के मोबाइल पर फोन किया तो उस की बीवी माया ने फोन उठाया. उस ने कहा कि शिवलोचन ने उन की नौकरी छोड़ दी है, उसे कहीं दूसरी जगह ज्यादा पगार की नौकरी मिल गई है. तेजपाल सिंह ने आगे बताया कि उन्होंने इस के बाद यह सोच कर फोन नहीं किया कि जब वह अपना बकाया वेतन लेने के लिए आएगा तो पूछेंगे कि अचानक नौकरी क्यों छोड़ दी. तेजपाल सिंह के यहां से मिली जानकारी के बाद चिंता में डूबा फूलचंद उदास चेहरा लिए अपने गांव लौट आया. फूलचंद ने घर लौट कर भाई के बारे में गहराई से सोचा तो यह बात उस की समझ में नहीं आई कि भाई ने जब दूसरी जगह नौकरी कर ली थी तो माया भाभी ने गांव वालों और मां से यह क्यों कहा था कि वह कर्वी में अपने काम पर गया है.

फूलचंद ने शिवलोचन के साथसाथ अपनी भाभी माया को भी कई बार फोन किया था, लेकिन शिवलोचन की तरह माया का भी फोन बंद मिला था. फूलचंद की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर शिवलोचन कहां चला गया और 8 महीने से घर क्यों नहीं लौटा. ऊपर से उस का फोन भी बंद था. आश्चर्य की बात यह थी कि उस की भाभी माया जब से अपने मायके गई थी, वापस नहीं लौटी थी. न ही उस ने किसी को फोन कर के कभी कुशलक्षेम पूछी थी. ऊपर से उस का फोन नहीं लग रहा था. फूलचंद को अपने भाई शिवलोचन की चिंता सताने लगी तो वह भाई की खोजबीन  में जुट गया. फूलचंद की एक बड़ी बहन थी, सावित्री. उस की शादी चित्रकूट की मऊ तहसील में हुई थी. उस के पास शिवलोचन की ससुराल वालों का नंबर था.

फूलचंद ने फोन कर के बहन को बताया कि शिवलोचन पिछले कई महीनों से लापता है और माया अपने मायके गई है. दोनों में से किसी का फोन भी नहीं लग रहा. शिवलोचन के बारे में पता लगाने की सोच कर फूलचंद ने सावित्री से माया के पिता का नंबर ले लिया. उस ने वह नंबर लगा कर जब माया के पिता से बात की तो उस ने बताया कि माया अपने दोनों बच्चों को ले कर 8 महीने पहले दीपावली के बाद उन के पास आई थी. लेकिन वह 2 महीना पहले दोनों बच्चों को उन के घर छोड़ कर यह कह कर गई थी कि शिवलोचन के बारे में जानकारी लेने लोहदा जा रही है, 2-4 दिन में आ जाएगी. लेकिन उस के बाद ना तो वह घर लौटी, न ही उस ने फोन कर के बच्चों की कुशलक्षेम पूछी.

माया के पिता ने जो कुछ बताया, वह चौंकाने वाला था. क्योंकि अभी तक तो फूलचंद इस भ्रम में था कि उस की भाभी माया अपने मायके में है, लेकिन जब पता चला कि माया अपने मायके से 2 महीना पहले ही कहीं चली गई है तो फूलचंद के माथे पर परेशानी की लकीरें और गहरा गईं. गांव में जहां शिवलोचन का मकान था, फूलचंद की मां उस से कुछ दूर अपने पैतृक मकान में रहती थी. वहीं पर वह अपनी गुजरबसर के लिए चाय का ढाबा चलाती थी. शिवलोचन की पत्नी माया जब 7-8 महीने पहले बच्चों को ले कर मायके गई थी तो जाते वक्त घर का ताला लगा कर चाभी अपनी सास चुनकी देवी को दे गई थी. तभी से शिवलोचन का मकान बंद पड़ा था.

इसी दौरान शिवलोचन के पड़ोसी हुकुम सिंह ने उस से कहा कि 8 महीने पहले शिवलोचन ने उस का सेकेंड हैंड टीवी यह कह कर लिया था कि कुछ दिन में पैसे दे देगा. लेकिन टीवी लेने के कुछ दिन बाद ही शिवलोचन और उस की पत्नी पता नहीं कहां चले गए. उन्होंने न तो पैसे दिए, न टीवी लौटाया. हुकुम सिंह ने फूलचंद से कहा कि शिवलोचन तो पता नहीं कब आएगा, इसलिए वह उस का टीवी निकाल कर उसे दे दे. फूलचंद ने अपनी मां चुनकी देवी से शिवलोचन के घर की चाभी ले कर ताला खोला तो अंदर के दोनों कमरों से तेज बदबू का झोंका आया. बंद कमरों के खुलने के कुछ देर बाद जब बदबू कम हुई तो फूलचंद ने हुकुम सिंह का टीवी उठा कर उसे दे दिया.

फूलचंद को लगा कि लंबे समय से मकान बंद था, जिस से सीलन और गंदगी की वजह से बदबू आ रही होगी. उस ने सोचा कि क्यों न दोनों कमरों की सफाई कर दी जाए. लेकिन जब वह उस कमरे की सफाई करने लगा, जिस में शिवलोचन और माया रहते थे तो कमरे के फर्श की कच्ची जमीन थोड़ी धंसी हुई दिखाई दी. यह देख कर फूलचंद का मन शंका से भर उठा. क्योंकि वहां की जमीन को देख कर ऐसा लग रहा था, मानो कच्चे फर्श का वह हिस्सा अलग हो. उस जगह को गौर से देखने पर लगा, जैसे वहां कोई चीज दबाई गई हो.

पांव से दबाने पर वहां की जमीन नीचे की तरफ दब रही थी. गांव के कुछ लोगों को बुला कर फूलचंद के जमीन का वह हिस्सा दिखाया तो सब ने राय दी कि क्यों न जमीन खोद कर देख लिया जाए. लेकिन जमीन में ऐसीवैसी किसी चीज के दबे होने की आशंका से फूलचंद खुदाई करने से हिचक रहा था. लिहाजा उस ने सब से राय ली कि क्यों न पहले पुलिस को खबर कर दी जाए.

‘‘अरे भैया, तुम तो ऐसे डर रहे हो जैसे जमीन में खजाना गड़ा हो. अरे तुम्हारा घर है, तुम्हारी जमीन है. खोद कर देखो, जो कुछ भी होगा सामने आ जाएगा और अगर ऐसावैसा कुछ हुआ भी तो पुलिस को खबर कर देना.’’ कई लोगों ने एक राय हो कर कहा. बात फूलचंद की समझ में आ गई. लिहाजा उस ने कमरे के उस हिस्से की फावड़े से खुदाई शुरू कर दी. 3 फुट गहरा गड्ढा खुद चुका था मगर कुछ भी नहीं निकला. लेकिन एक बात ऐसी थी, जिस की वजह से केवल फूलचंद ही नहीं, बल्कि गांव वालों का मन भी आशंका से भर उठा.

बात यह थी कि उस जगह की मिट्टी काफी नरम थी. मिट्टी की सतह वैसे नहीं चिपकी थी, जैसे आमतौर पर चिपकी होती है. इतना ही नहीं जैसेजैसे जमीन खोदी जा रही थी, गड्ढे में से बदबू आनी शुरू हो गई थी. छह इंच जमीन और खोदते ही फूलचंद की आशंका सच साबित हुई. जमीन के उस गड्ढे से कुछ हड्डियां मिली. इस के बाद दहशत में आ कर फूलचंद ने खुदाई रोक दी. गांव वालों से बातचीत के बाद फूलचंद अपनी मां चुनकी देवी, पड़ोसी हुकुम सिंह, गांव के प्रधान, चौकीदार और कुछ अन्य लोगों को साथ ले कर थाना पहाड़ी पहुंचा. यह 7 जुलाई, 2018 की दोपहर की बात है. पहाड़ी थाने के एसएचओ इंसपेक्टर अरुण पाठक थाने में ही मौजूद थे.

एक साथ इतने सारे लोगों को आया देख पाठक ने उन से आने की वजह पूछी तो फूलचंद ने अपने भाई और भाभी के घर से गायब होने के बारे में बता कर घर में हुई खुदाई के दौरान मानव हड्डियों के निकलने की बात उन्हें बता दी. इंसपेक्टर अरुण पाठक बोले, ‘‘अरे भाई, जब तुम ने इतना गड्ढा खोद ही दिया था तो थोड़ा सा और खोद लेते. कम से कम यह पता तो चल जाता कि वहां किसी जानवर की हड्डियां दबी हैं या इंसान की.’’

‘‘दरअसल, मेरे भाईभाभी का कुछ पता नहीं है, इसलिए हमें बड़ा डर लग रहा है. आप चल कर देख लीजिए.’’ फूलचंद ने इंसपेक्टर पाठक के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा.

इंसपेक्टर अरुण पाठक पुलिस टीम ले कर फूलचंद और उस के साथ आए गांव वालों के साथ लोहदा गांव में शिवलोचन के घर पहुंच गए. घर के बाहर पहले से ही काफी भीड़ जमा थी. इंसपेक्टर अरुण पाठक ने पहले से 2-3 फीट खुदे गड्ढे की थोड़ी और खुदाई कराई. पहले से करीब साढे़ 3 फीट खुदे गड्ढे की थोड़ी और खुदाई कराई. करीब साढ़े 3 फीट खुदे गड्ढे की एक फीट और खुदाई हुई तो पूरा नरकंकाल निकला. नरकंकाल की गर्दन में रस्सी बंधी हुई थी, जो गली नहीं थी. ऐसा लग रहा था जैसे रस्सी से उस का गला दबाया गया हो.

चूंकि शव पूरी तरह कंकाल में तब्दील हो चुका था, इसलिए लग रहा था कि शव को कई महीने पहले दफनाया गया था. मामले की गंभीरता को समझते हुए इंसपेक्टर अरुण पाठक ने इलाके के क्षेत्राधिकारी शिवबचन सिंह और नायब तहसीलदार को मौके पर बुलवा लिया. दोनों अधिकारियों ने बात जानने के बाद नरकंकाल को सावधानीपूर्वक गड्ढे से बाहर निकलवा लिया. इस दौरान चित्रकूट जिले के पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार झा भी फोरेंसिक टीम को ले कर लोहदा पहुंच गए. कंकाल किसी आदमी का था, यह ढांचे से साबित हो रहा था. कंकाल की पहचान के लिए गड्ढे से कोई ऐसी चीज नहीं निकली थी, जिसे पहचान कर कोई यह बता पाता कि कंकाल किस का है.

अलबत्ता फूलचंद व उस की मां चुनकी देवी ने कंकाल को गौर से देखने के बाद आशंका जताई कि कंकाल शिवलोचन का हो सकता है. इंसपेक्टर अरुण पाठक ने फूलचंद से पूछा, ‘‘तुम यह बात इतने विश्वास से कह रहे हो कि कंकाल शिवलोचन का ही है?’’

‘‘सर, मेरे भाई के बाए हाथ के पंजे में अंगूठा नहीं था. इस कंकाल के भी बाएं हाथ में सिर्फ चार अंगुलियों की हड्डियां हैं. अंगूठे की हड्डी गायब है. मेरे भाई के बाएं हाथ का अंगूठा एक दुर्घटना में पूरी तरह कट गया था.’’

फूलचंद ने विश्वास का कारण बताया तो इंसपेक्टर पाठक को भी लगा कि संभव है, कंकाल फूलचंद के भाई शिवलोचन का ही हो. वजह यह थी कि शिवलोचन काफी दिनों से गायब था. लेकिन कंकाल शिवलोचन का ही है, इस की वैज्ञानिक रूप से पुष्टि डीएनए टेस्ट होने पर ही हो सकती थी. पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार झा के आदेश पर पुलिस ने नरकंकाल का पंचनामा भरवा कर उसे डीएनए टेस्ट के लिए भिजवाने की औपचारिकता पूरी की. डीएनए मिलान के लिए फोरेंसिक टीम के डाक्टरों ने शिवलोचन की मां चुनकी देवी का ब्लड सैंपल ले लिया.

पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार झा ने सीओ शिववचन सिंह को निर्देश दिया कि वह चुनकी देवी और उन के बेटे फूलचंद से शिवलोचन के गायब होने की शिकायत ले कर मुकदमा दर्ज करें. साथ ही शिवलोचन की लापता पत्नी माया और उस के दोनों बच्चों का भी पता लगाए. पहाड़ी थाने के प्रभारी इंसपेक्टर अरुण पाठक ने शुरू में इस मामले को जितने सहज ढंग से लिया था, केस उतना ही पेचीदा निकला. यह जानकर उन्हें और भी ज्यादा आश्चर्य हुआ कि 2 महीने पहले माया अपने बच्चों को मां के पास छोड़ कर कहीं चली गई थी. इंसपेक्टर अरुण पाठक ने शिवलोचन और माया के संबंधों के बारे में गहराई से पता लगाने के लिए गांव के लोगों और शिवलोचन के परिवार के सभी सदस्यों से एकएक कर के पूछताछ करनी शुरू कर दी.

उन लोगों से मिली जानकारी के बाद यह साफ हो गया कि शिवलोचन के घर में जो नरकंकाल मिला वह शिवलोचन का ही है. शिवलोचन के घर वालों और लोहदा गांव के लोगों से पूछताछ के बाद इंसपेक्टर अरुण पाठक की समझ में  आ गया कि शिवलोचन के रहस्यमय ढंग से गायब होने और उस की पत्नी के लापता हो जाने के पीछे क्या राज है. अरुण पाठक ने फूलचंद से तहरीर ले कर 7 जुलाई की रात को ही पहाड़ी थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत शिवलोचन की पत्नी माया और लोहदा गांव के टुल्लू लोध, जिसे रज्जन भी कहते थे, के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करवा दिया.

पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार झा के निर्देश पर एसएचओ अरुण पाठक ने मुकदमे की जांच का काम खुद ही शुरू कर दिया. सहयोग के लिए उन्होंने एक पुलिस टीम का गठन किया, जिस में सिपाही मुकद्दर सिंह, वीरेंद्र सिंह, रामअजोर सरोज और महिला सिपाही रुचि सिंह को शामिल किया गया. पुलिस अधीक्षक के आदेश पर क्राइम व साइबर सेल की टीम भी थाना पहाड़ी पुलिस की मदद में लग गई. थानाप्रभारी अरुण पाठक ने सब से पहले टुल्लू लोध उर्फ रज्जन के पिता लिसुरवा और भाई लल्लन को हिरासत में ले कर उन से यह जानने का प्रयास किया कि टुल्लू इन दिनों कहां है. पूछताछ में पता चला कि वह मुंबई में है. पुलिस ने जब कड़ी पूछताछ की तो उस के घर वालों ने टुल्लू का मोबाइल नंबर भी दे दिया. अरुण पाठक ने टुल्लू तक पहुंचने के लिए उस के पिता की उस से बात कराई.

बात से पहले ही मोबाइल फोन का स्पीकर औन करवा दिया गया था. उन्होंने लिसुरवा को हिदायत दे दी थी कि वह सामान्य ढंग से बात करे और टुल्लू को जरा भी अहसास न होने दे कि बात पुलिस की मौजूदगी में हो रही है. इंसपेक्टर अरुण पाठक की टुल्लू के पिता की उस से बातचीत कराने की तरकीब काम कर गई. उन्हें पता चल गया कि टुल्लू मुंबई में है और माया भी उसी के साथ है. टुल्लू से हुई बातचीत में अरुण पाठक को यह भी पता चला कि टुल्लू अपने पिता से मिलने और उन की आर्थिक मदद के लिए आना चाहता है. उस ने अपने पिता से कहा था कि 15 जुलाई को वह कर्वी बस अड्डे पर पहुंच जाएं.

अरुण पाठक ने लिसुरवा तथा उस के परिवार के सदस्यों को 15 जुलाई तक पुलिस की निगरानी में रहने का निर्देश दिया. उन के मोबाइल फोन भी इंसपेक्टर पाठक ने अपने कब्जे में ले लिए, जिस से वे लोग टुल्लू को सतर्क न कर सकें. इस के बाद इंसपेक्टर पाठक और उन की पुलिस टीम बेसब्री से 15 जुलाई का इंतजार करने लगे. 15 जुलाई की सुबह टुल्लू ने अपने भाई लल्लन के मोबाइल पर फोन किया. पुलिस ने अपनी निगरानी में उस की बात कराई. टुल्लू ने लल्लन को फोन पर बताया कि वह माया के साथ चित्रकूट रेलवे स्टेशन पर है और दोपहर एक बजे तक कर्वी बसअड्डे पर पहुंचेगा. पाठक ने लल्लन व उस के पिता लिसुरवा को साथ लिया और पुलिस टीम के साथ कर्वी बस अड्डे के आसपास पुलिस का जाल बिछा दिया.

पुलिस ने लल्लन व उस के पिता को बस अड्डे के पास अकेले छोड़ दिया. सादे कपड़ों में 2 पुलिस वाले दोनों के आसपास मंडराते रहे. करीब एक बजे कर्वी बस अड्डे के टिकट काउंटर के पास बेसब्री से बेटे का इंतजार कर रहे लिसुरवा के पास एक युवक व महिला पहुंचे. आगंतुक युवक ने जब लिसुरवा के पैर छुए तो इंसपेक्टर पाठक समझ गए कि वही टुल्लू है. नजरें गड़ाए बैठी पुलिस टीम ने उन लोगों को चारों ओर से घेर लिया. पूछताछ में पता चला कि युवक टुल्लू लोध उर्फ रज्जन राजपूत ही है और उस के साथ जो खूबसूरत सी महिला है, वह माया है. पुलिस टुल्लू और माया को उस के घर वालों के साथ थाना पहाड़ी ले आई. टुल्लू लोध और माया को हिरासत में लिए जाने की खबर उच्चाधिकारियों को भी मिल चुकी थी.

टुल्लू तथा मायादेवी से पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार झा और क्षेत्राधिकारी शिवबचन सिंह के समक्ष पूछताछ की गई. दोनों से पूछताछ में शिवलोचन हत्याकांड की हैरान करने और दिल दहलाने वाली कहानी सामने आई. पूछताछ में यह बात साफ हो गई कि शिवलोचन के घर से जो नरकंकाल बरामद हुआ था, वह शिवलोचन का ही था. एक रात माया और टुल्लू ने उस की हत्या कर के लाश को घर में ही जमीन में गाड़ दिया था. लोहदा गांव में रहने वाला 27 वर्षीय टुल्लू लोध उर्फ रज्जन राजपूत मकानों में टाइल्स लगाने का काम करता था. उस के परिवार में मातापिता के अलावा एक भाई व दो बहनें थीं. बहनों की शादी हो चुकी थी. जबकि छोटा भाई लल्लन अभी कुंवारा था. कई साल पहले टुल्लू की दोस्ती गांव के ही शिवलोचन से हो गई थी.

दोनों ही शराब पीने के शौकीन थे. सो दोस्ती की शुरुआत भी शराब के ठेके से हुई. टुल्लू और शिवलोचन ने एक बार साथ बैठ कर शराब पी तो जल्द ही उन की दोस्ती पारिवारिक संबंधों में तब्दील हो गई. दोनों एकदूसरे के घर आनेजाने लगे. कई बार दोनों का खानापीना भी साथसाथ होता था. दरअसल, टुल्लू की शिवलोचन से गहरी दोस्ती की असली वजह उस की खूबसूरत और जवान पत्नी माया थी, जिसे वह भाभी कह कर बुलाता था. माया अल्हड़ और चंचल स्वभाव की औरत थी. टुल्लू को माया पहली ही नजर में भा गई थी. उस ने माया की नजरों में दिखाई देने वाली प्यास को पढ़ लिया था. टुल्लू का शिवलोचन के घर आनाजाना शुरू हुआ तो जल्दी ही यह सिलसिला शिवलोचन की अनुपस्थिति में भी चलने लगा.

एक तरफ माया की जवानी उफान मार रही थी, जबकि दूसरी ओर उस का पति शिवलोचन काफीकाफी दिनों तक घर से दूर रहता था. माया उम्र के उस दौर से गुजर रही थी जब औरत को हर रात मर्द के साथ की जरूरत होती है. टुल्लू ने पति से दूर रह रही और पुरुष संसर्ग के लिए तरसती माया के आंचल में अपने प्यार और हमदर्दी की बूंदें उडे़ली तो माया निहाल हो गई. जल्दी ही दोनों के बीच नाजायज रिश्ते बन गए. माया, टुल्लू के प्यार में ऐसी दीवानी हुई कि दोनों के बीच रोज शारीरिक संबंध बनने लगे. शिवलोचन काफीकाफी दिनों तक घर के बाहर रहता था. रोकटोक करने वाला कोई नहीं था.

लेदे कर घर में एक सास थी जो अकसर माया के पास आ कर रहने लगती थी. लेकिन टुल्लू से संबंध बनने के बाद माया ने सास चुनकी देवी से भी लड़ाईझगड़ा शुरू कर दिया था, फलस्वरूप सास उस के मकान पर न आ कर ज्यादातर अपने पैतृक घर में रहती थी. माया ने ऐसा इसलिए किया था ताकि टुल्लू रात में उस के पास बेरोकटोक आ जा सके. मूलरूप से ग्राम देवरी पंधी, जिला बिलासपुर छत्तीसगढ़ की रहने वाली माया की पहली शादी 13 साल पहले उस के मायके में ही एक युवक से हुई थी. लेकिन शादी के एक साल बाद ही पति ने गलत चालचलन का आरोप लगा कर उसे छोड़ दिया था. 2008 में शिवलोचन अपने एक परिचित के साथ किसी काम से माया के गांव देवरी पंधी गया था.

वहां बातोंबातों में किसी ने जब उस से पूछा कि उस ने शादी क्यों नहीं की तो शिवलोचन ने बता दिया कि अभी तक कोई अच्छी लड़की नहीं मिली. उस परिचित ने शिवलोचन से कहा कि अगर वह कुछ रुपए खर्च करे तो वह अपने गांव की एक तलाकशुदा लड़की से उस की शादी करा देगा. शिवलोचन की उम्र बढ़ रही थी. उसे भी एक जीवनसाथी की जरूरत थी. वह पैसा खर्चने को तैयार हो गया तो उस परिचित ने शिवलोचन को माया के घर ले जा कर उस के परिवार व माया से मिलवा दिया. शिवलोचन को माया पसंद आ गई. माया के घर और परिवार की माली हालत ठीक नहीं थी.

लिहाजा बिचौलिया बने परिचित ने माया के पिता को कुछ रकम दे कर जब शिवलोचन का माया से विवाह करने की बात चलाई तो  वह तुरंत राजी हो गया. इस के बाद चट मंगनी पट विवाह की रस्म अदा कर के शिवलोचन माया को पत्नी बना कर अपने घर ले आया. वक्त हंसीखुशी गुजरने लगा. माया से उसे 2 बेटे हुए प्रमांशु (6) और 8 वर्षीय हिमांशु. शिवलोचन काफीकाफी दिनों तक परिवार से दूर रह कर इसलिए जी तोड़ मेहनत करता था ताकि पत्नी व बच्चों का भविष्य संवार सके. उसे क्या पता था कि उस की गैरहाजिरी में माया उसी के दोस्त के साथ रंगरेलियां मनाती है.

बात पिछले साल दीवाली के बाद तब बिगड़ी, जब नवंबर में शिवलोचन छुट्टी ले कर घर आया. घर में उस के हाथ एक ऐसा फोटो लगा, जिसे देख कर उस का माथा ठनक गया. दरअसल, फोटो माया और टुल्लू का था, जिस में दोनों एक साथ थे. शिवलोचन ने उस फोटो को देखने के बाद पहली बार माया पर हाथ उठाया. उसी शाम जब टुल्लू उस के घर आया तो उस ने उस की भी पिटाई कर दी.  बात इतनी बढ़ी कि मामला थाने तक जा पहुंचा. गांव के बड़े बुजुर्ग और समझदार लोग भी थाने पहुंचे. दरअसल, काफी दिनों से लोग शिवलोचन से शिकायत कर रहे थे कि उस की गैरमौजूदगी में टुल्लू उस के घर आताजाता है और वह अकसर रात को भी उस के घर में ही रहता है. शिवलोचन ने जब यह बात माया से पूछी तो उस ने ऐसे आरोपों को गलत बताया.

लेकिन जब शिवलोचन ने दोनों की एक साथ फोटो देखी तो वह समझ गया कि गांव के लोग जो कहते हैं, वह गलत नहीं है. बहरहाल, उस समय पुलिस ने बड़े बुजुर्गों के बीच बचाव के बाद शिवलोचन और टुल्लू में समझौता करा दिया. साथ ही टुल्लू को माया से न मिलने और उस के घर न जाने की हिदायत भी दी. लेकिन इस के बावजूद टुल्लू और माया का मिलना बदस्तूर जारी रहा. काम के सिलसिले में शिवलोचन को अकसर घर से बाहर रहना पड़ता था जबकि माया को टुल्लू के संग साथ की जो लत लग चुकी थी, उस ने दोनों को एकदूसरे से दूर नहीं होने दिया. दूसरी ओर शिवलोचन ने माया और टुल्लू की निगरानी शुरू कर दी थी. उस ने गांव के अपने एक दो हम उम्र दोस्तों से कह दिया था कि वे माया और टुल्लू पर नजर रखें.

जब उसे पता चला कि दोनों के बीच मिलनाजुलना अब भी बदस्तूर जारी है तो उस ने माया से मिल कर इस समस्या को खत्म करने का फैसला किया. इस के लिए वह 4 नवंबर को अपने घर आया. उस ने माया और टुल्लू के मेलजोल की बात को ले कर पत्नी की पिटाई कर दी. शाम को वह घर में ही शराब पी कर सो गया. माया उसी दिन से शिवलोचन ने नफरत करने लगी थी, जब उस ने पहली बार दोनों का फोटो देखने के बाद तमाशा किया था और उस की पिटाई भी कर दी थी. तभी से गांव भर की औरतें माया को बदचलन औरत की नजर से देखने लगी थी. उस दिन शिवलोचन की मार ने आग में घी का काम किया. उस ने शिवलोचन के शराब पी कर गहरी नींद में सोते ही टुल्लू को फोन कर के अपने घर बुला लिया.

उस ने टुल्लू से कहा कि अगर वह उसे सचमुच प्यार करता है तो आज रात ही शिवलोचन से उस के अपमान का बदला लेने के लिए उसे जान से मार दे. टुल्लू तो माया का दीवाना था. उस ने सोचा कि शिवलोचन मर जाएगा तो माया सदा के लिए उस की हो जाएगी. यही सोच कर उस ने घर में पड़ी लाठी से सोते हुए शिवलोचन के सिर पर एक के बाद एक कई प्रहार किए, जिस से वह चारपाई पर ही ढेर हो गया. इस काम में माया ने भी उस का साथ दिया. इस के बावजूद माया इत्मीनान कर लेना चाहती थी कि शिवलोचन मरा है या नहीं. उस ने टुल्लू के साथ मिल कर कमरे में पड़ी जूट की रस्सी का फंदा बनाया और शिवलोचन के गले में डाल कर काफी देर तक खींचा. शिवलोचन के मरने के बाद समस्या थी लाश को ठिकाने लगाने की. क्योंकि लाश को घर से बाहर ले जाने से पकडे़ जाने का डर था.

माया ने सुझाव दिया कि शिवलोचन के शव को कमरे में ही जमीन खोद कर गाड़ दिया जाए. इस के बाद उन्होंने ऐसा ही किया. टुल्लू ने फावड़े से कमरे के एक हिस्से के कच्चे फर्श को 5 फुट गहरा खोदा और शिवलोचन के गले में बंधी रस्सी समेत लाश को गड्ढे में धकेल दिया. टुल्लू ने खून से सने कपड़े लाश के ऊपर ही डाल दिए. लाश को गड्ढे में डालने के बाद माया और टुल्लू ने उस पर मिट्टी डाल दी. रात में ही माया ने उस जगह को अच्छी तरह से लीप दिया, ताकि किसी को गड्ढा खोदे जाने की बात का पता न चल सके. उस रात शिवलोचन की हत्या करने से पहले माया और टुल्लू ने कुछ खायापीया नहीं था. लिहाजा लाश को घर में ही दफनाने के बाद माया ने चूल्हा जला कर खाना बनाया. जिस लाठी से शिवलोचन की हत्या की गई थी, माया ने उसे चूल्हे में जला कर रोटियां सेंकी.

इस के बाद दोनों ने चारपाई उसी जगह बिछाई, जहां शिवलोचन के शव को दफनाया था. उस रात शिवलोचन ने जिस बोतल से शराब पी थी, उस में कुछ शराब बची थी. टुल्लू और माया ने बची हुई शराब बराबरबराबर पी, फिर दोनों ने साथसाथ खाना खाया. खाना खाने के बाद दोनों लाश दफनाने वाली जगह पर बिछी चारपाई पर सो गए. सोने से पहले दोनों ने एकदूसरे के जिस्म की प्यास बुझा कर शिवलोचन के मरने का जश्न मनाया. शिवलोचन की हत्या को अंजाम देने के बाद माया करीब 15 दिन तक उसी घर में रही. इस दौरान टुल्लू हर रात उस के पास आता. दोनों एक साथ खाना खाते और उसी चारपाई पर रंगरेलियां मनाते, जो उन्होंने शिवलोचन की लाश दफनाने के बाद फर्श की जमीन लीप कर उस के ऊपर डाली थी.

शिवलोचन की हत्या के बाद जब गांव के लोग या माया की सास चुनकी देवी माया से शिवलोचन के बारे में पूछते तो वह कहती कि कर्वी में काम चल रहा है, वहीं रहते हैं. करीब 15 दिन बाद जब घर का सारा राशन खत्म हो गया तो माया के पास वहां रहने की कोई वजह नहीं बची. इस दौरान माया और टुल्लू ने आपस में तय कर लिया था कि उन्हें आगे की जिंदगी किस तरह बितानी है. इसलिए 15 दिन बाद माया अपने दोनों बच्चों को ले कर मायके चली गई. जाने से पहले उस ने अपनी सास से खूब लड़ाई की और ताना दिया कि उस का बेटा परिवार का ख्याल नहीं रखता. घर में राशन तक नहीं है इसलिए अपनी मां के घर जा रही हूं. जब शिवलोचन घर आए तो मुझे लेने आ जाएं.

उसी दिन माया ने घर की चाभी भी अपनी सास को दे दी थी. दरअसल, वह अच्छी तरह से जानती थी कि सास चुनकी देवी ढाबे वाले अपने पैतृक घर को छोड़ कर उस के घर में रहने के लिए नहीं जाएगी. वजह यह थी कि एक तो वह गांव में काफी पीछे और सुनसान जगह पर था, दूसरे वहां उस की देखभाल करने वाला भी कोई नहीं था. माया जानती थी कि शिवलोचन तो अब किसी को मिलेगा नहीं, उस का शव भी गल जाएगा. समय के साथ शिवलोचन की मौत भी रहस्यमय गुमशुदगी बन कर रह जाएगी. माया के गांव से जाने के एक 2 दिन बाद टुल्लू भी मुंबई चला गया था और वहां बिल्डिंगों में टाइल्स लगाने का काम करने लगा था.

अपनी ससुराल लोहदा से जाने के बाद माया मई के महीने तक अपने मातापिता के पास रही. उस ने परिवार वालों को बताया कि बिना बताए शिवलोचन कहीं चला गया है. अपने गांव पहुंच कर माया ने अपना मोबाइल नंबर भी बदल दिया था. शिवलोचन के मोबाइल को उस ने उस की हत्या के बाद ही तोड़ कर फेंक दिया था. उस का नया नंबर सिर्फ टुल्लू के पास था, जिस पर दोनों की रोज बातें होती थीं. टुल्लू अकसर अपने गांव में फोन कर के शिवलोचन को ले कर हो रही गतिविधियों की जानकारी लेता रहता था. जब कई महीने बीत गए और माया को लगा कि अब मामला ठंडा हो गया है तो उस ने मई महीने में अपने पिता से कहा कि वह पति के बारे में जानकारी करने के लिए चित्रकूट जा रही है, जल्दी ही लौट आएगी.

अपने बच्चों को छोड़ कर माया कर्वी आ गई, जहां पहले से ही टुल्लू उसे लेने के लिए आया हुआ था. वहां से वे दोनों मुंबई चले गए और पतिपत्नी की तरह साथ रहने लगे. माया की योजना थी कि एक दो महीने का वक्त और गुजरने के बाद अपने दोनों बच्चों को भी ले आएगी. लेकिन उस से पहले ही माया व टुल्लू पुलिस के हत्थे चढ़ गए. पुलिस ने माया व टुल्लू से पूछताछ के बाद वह फावड़ा भी बरामद कर लिया, जिस से शिवलोचन की हत्या के बाद उस का शव दफनाने के लिए गड्ढा खोदा था. चूंकि महीनों गुजर जाने के बाद भी किसी को कोई शक नहीं हुआ था, इसलिए माया और टुल्लू को उम्मीद थी कि अब शिवलोचन की हत्या का भेद नहीं खुल पाएगा.

दरअसल शिवलोचन के घर वालों और गांव के लोगों से पूछताछ के बाद जब इंसपेक्टर अरुण पाठक को पता चला था कि माया और गांव के टुल्लू के बीच लंबे अर्से से न केवल अवैध संबंध थे बल्कि इन्हीं संबंधों के चलते शिवलोचन और टुल्लू में मारपीट भी हुई थी, तभी पाठक को शक हो गया था कि हो न हो शिवलोचन की हत्या में माया व टुल्लू का ही हाथ हो. क्योंकि माया तो गांव से चली ही गई थी, कुछ दिन बाद टुल्लू भी गांव से गायब हो गया था. इंसपेक्टर अरुण पाठक ने माया व टुल्लू से पूछताछ के बाद दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. इसी दौरान पुलिस को शिवलोचन की डीएनए रिपोर्ट भी मिल गई, जिस से स्पष्ट हो गया कि शिवलोचन के घर में मिला नरकंकाल उसी का था.

— कथा अभियुक्तों से पूछताछ, परिजनों द्वारा पुलिस को दी गई जानकारी पर आधारित

 

300 करोड़ के लिए अफसर बहू बनी कातिल

उस समय सुबह के करीब 11 बज रहे थे, तारीख थी 22 मई, 2024. डा. मनीष पुत्तेवार अपने हौस्पिटल में वार्ड का दौरा कर रहे थे, तभी उन के फोन की घंटी बजी. उन्होंने फोन में देखा तो काल चंद्रपुर में रहने वाले उन के बड़े भाई डा. हेमंत की थी.

”हां बड़े भैया, आज सुबह सुबह कैसे फोन किया?’’ डा. मनीष ने काल रिसीव करते हुए पूछा.

”मनीष एक दुखद सूचना है. मुझे अभीअभी अजनी थाने से फोन आया है कि पापा का बालाजी नगर में एक कार से ऐक्सीडेंट हो गया है. मैं नागपुर के लिए निकल रहा हंू. तुम भी सीधे अजनी थाने पर पहुंचो,’’ डा. मनीष के बड़े भाई हेमंत ने रोते हुए कहा.

”भैया, आप रो क्यों रहे हैं? मैं अभी वहां पर जा कर देखता हूं. अभी थोड़ी देर पहले ही तो पापा यहां पर मम्मी से मिल कर गए हैं. आप बिलकुल भी चिंता मत करो, मैं उन्हें अभी अपने हौस्पिटल ले कर आता हंू.’’ डा. मनीष ने कहा.

”भाई, मनीष हमारे पापा अब नहीं रहे. मुझे अभी अभी थाने से यही खबर मिली है. भाई, मैं आप मम्मी के बारे में, पापा से उन की तबीयत के बारे में पूछ रहा था, तभी दूसरी ओर से मुझे पुलिस द्वारा यह दुखद समाचार मिला है. कोई कार वाला पापा को कुचल कर भाग गया.’’ कह कर हेमंत फिर से फूटफूट कर रोने लगे.

”भाईसाहब, मुझे तो कभी ऐसी सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि हमारे पापा हम सब को ऐसे छोड़ कर चले जाएंगे. आप फिक्र मत कीजिए, अपना ध्यान रखिएगा. मैं तुरंत अजनी थाने पहुंच रहा हंू,’’ कहते हुए मनीष ने काल डिसकनेक्ट कर दी.

डा. मनीष पी. पुत्तेवार अजनी पुलिस स्टेशन पहुंचे तो अब तक पुलिस राहगीरों की मदद से पुरुषोत्तम को सरकारी अस्पताल ले गई थी, परंतु चोट इतनी घातक थी कि अस्पताल ले जाते हुए उन्होंने रास्ते में ही दम तोड़ दिया था. अजनी थाने के सीनियर इंसपेक्टर अशोक भंडारे डा. मनीष को अपने साथ ले कर घटनास्थल पर भी गए.

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    मृतक पुरुषोत्तम पुत्तेवार

वहां सड़क पर चारों तरफ खून ही खून बिखरा हुआ था. डा. मनीष पुत्तेवार की तहरीर पर अजनी थाने में भादंवि की धारा 304 (ए) के तहत ऐक्सीडेंट का मामला दर्ज कर लिया गया और अज्ञात हत्यारे और अज्ञात कार की तलाश में पुलिस जुट गई.

उधर पुलिस ने लाश का पंचनामा बना कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और पोस्टमार्टम के बाद पुरुषोत्तम के शव को उन के परिजनों को सौंप दिया. 23 मई, 2024 को उन का अंतिम संस्कार भी कर दिया.

बड़े बेटे को क्यों आई षडयंत्र की बू

मृतक पुरुषोत्तम पुत्तेवार (82 वर्ष), नागपुर के शुभ नगर निवासी थे. उन के पास करोड़ों की प्रौपर्टी थी. उन के परिवार में पत्नी शकुंतला के अलावा 2 बेटे हेमंत पुत्तेवार, मनीष पुत्तेवार व एक बेटी योगिता थी. इन दिनों पुरुषोत्तम पुत्तेवार की पत्नी शकुंतला का औपरेशन हुआ था, जो एलेक्सिस मल्टीस्पेशलिटी हौस्पिटल, मनकापुर में भरती थीं. यह हौस्पिटल उन के छोटे बेटे डा. मनीष पुत्तेवार का था.

पुरुषोत्तम सुबह शाम अपनी पत्नी शकुंतला के लिए खाना खुद ही ले जाते थे. हौस्पिटल उन की बेटी योगिता के घर के नजदीक था, इसलिए वह अपनी बेटी योगिता के घर पर ही रह रहे थे.

22 मई, 2024 को भी सुबह पुरुषोत्तम अपनी पत्नी को नाश्ता दे कर वापस लौट रहे थे, तभी पीछे से तेज रफ्तार कार ने उन्हें टक्कर मार दी थी, जिस के कारण घटनास्थल पर ही उन की दर्दनाक मौत हो गई थी.

इन दिनों पुरुषोत्तम पुत्तेवार के बड़े बेटे डा. हेमंत भी चंद्रपुर से सपरिवार नागपुर आ गए थे. उन का चंद्रपुर में अपना निजी क्लीनिक था, वह जनरल फिजिशियन थे. मृतक पुरुषोत्तम पुत्तेवार की शोकसभा का तीसरा दिन था, तभी वहां पर डा. हेमंत का बचपन का दोस्त पंकज पंवार आ गया.

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            डा. मनीष पुत्तेवार                                                                      डा. हेमंत पुत्तेवार 

दोनों काफी देर तक बातचीत करते रहे. दोनों बचपन से जवानी तक एक साथ खेल कर पढ़ कर बड़े हुए थे. बाद में फिर हेमंत मैडिकल लाइन में चले गए और पंकज ने एमबीए करने के बाद अपनी फैक्ट्री संभाल ली थी.

”यार हेमंत, मुझे तुम काफी बुझेबुझे और परेशान से लग रहे हो. तुम्हारे दिल के भीतर जरूर कुछ न कुछ बात है. देखो, मैं तुम्हारा बचपन का दोस्त हूं. तुम किसी भी बात को काफी अधिक समय दिल में रख लेते हो. मुझे खुल कर बताओ, शायद हम दोनों मिलबैठ कर कुछ समाधान निकाल सकें.’’ पंकज ने यह बात कही और दोनों फिर एक अलग कमरे में बैठ गए.

”यार पंकज, मुझे लग रहा है कि पापा का किसी ने कत्ल किया है, पर वारदात ऐसी दिखाई गई है कि यह ऐक्सीडेंट का केस लगे.’’ यह कहते हुए डा. हेमंत फूटफूट कर रोने लगे थे.

”देख भाई हेमंत, मेरे साथ तू अभी चल, मेरे एक अच्छे मित्र हैं जो डीसीपी हैं. उन का नाम निमिष गोयल है. मैं तुझे उन के पास ले कर चलता हूं.’’ कहते हुए पंकज ने डीसीपी (क्राइम) निमिष गोयल को फोन कर दिया.

DCP NIMISH GOYAL

     डीसीपी निमिष गोयल

थोड़ी ही देर के बाद पंकज अपने दोस्त हेमंत को ले कर डीसीपी निमिष गोयल के औफिस में पहुंच चुका था. पंकज ने कुछ बातें तो फोन पर ही निमिष गोयल को बता दी थीं. बाकी सारी जानकारी भी उस ने औफिस पहुंच कर निमिष गोयल को दे दी थी. डीसीपी निमिष गोयल पंकज के एक अच्छे मित्र थे, इसलिए उन्होंने सारी बातें तसल्ली से सुनीं.

”डा. हेमंत, आप को ऐसा क्यों लगता है कि आप के पापाजी का किसी ने मर्डर किया है. आप को किसी पर संदेह है?’’ डीसीपी ने सीधा प्रश्न हेमंत से किया.

”डीसीपी साहब, मेरे पापाजी का इस हादसे से पहले भी 2 बार खतरनाक ऐक्सीडेंट हुआ है. उस समय तो मेरी समझ में कुछ नहीं आया, मगर मुझे उन दोनों हमलों में भी किसी खतरनाक षडयंत्र की बू आ रही थी. इस बार तो मुझे पूरा यकीन है कि किसी गहरी साजिश के तहत मेरे पापाजी का प्रीप्लांड मर्डर किया गया है.’’

इस के बाद डा. हेमंत ने कई अन्य जानकारियां भी डीसीपी (क्राइम) निमिष गोयल से साझा कीं, ”डा. हेमंत, आप अब बेफिक्र हो कर यहां से जा सकते हैं. मैं इस बारे में सारी जांचपड़ताल करूंगा और मैं आप को विश्वास दिलाता हूं कि आप को पूरापूरा न्याय अवश्य मिलेगा.’’ डीसीपी (क्राइम) निमिष गोयल ने डा. हेमंत को आश्वस्त करते हुए अपने औफिस से विदा करते हुए कहा.

पुलिस ने क्यों समझा इसे सामान्य दुर्घटना

डीसीपी (क्राइम) निमिष गोयल ने अजनी थाने से संपर्क कर के जब जानकारी ली तो मामला संदिग्ध लगा. उन्होंने यह केस फिर नागपुर के कमिश्नर रवींद्र सिंघल को बताया तो मामले की गंभीरता को देखते हुए नागपुर कमिश्नर ने यह केस नागपुर क्राइम ब्रांच यूनिट- 4 को विस्तृत जांच के लिए सौंप दिया.

Comissioner RAVINDER SINGAL

        कमिश्नर रवींद्र सिंघल

22 मई की सुबह ये वारदात तब हुई थी, जब 82 साल के बुजुर्ग पुरुषोत्तम पुत्तेवार अस्पताल से पैदल ही अपनी बेटी के घर लौट रहे थे. अस्पताल में उन की पत्नी का औपरेशन होने के कारण वह वहां पर भरती थीं.

पिछले कुछ दिनों से पुरुषोत्तम पुत्तेवार का यही रुटीन चल रहा था, लेकिन पुरुषोतम अपनी बेटी घर पहुंच पाते, तभी नागपुर के बालाजी नगर इलाके में एक तेज रफ्तार कार ने उन्हें पीछे से टक्कर मार दी और कार उन्हें घसीटते हुए काफी दूर तक ले गई थी, जिस के कारण उन की जान चली गई. लेकिन कार चालक वहां से तुरंत फरार हो गया था.

पहले तो सभी को यह मामला ऐक्सीडेंट का लगा था. इसीलिए पुलिस ने भी आईपीसी की धारा 304-ए के तहत ऐक्सीडेंट का केस दर्ज किया था. उस के बाद अजनी पुलिस कार की नंबर प्लेट, सीसीटीवी फुटेज व आसपास के प्रत्यक्षदर्शियों के माध्यम से कार ड्राइवर नीरज ईश्वर निमजे तक पहुंची और उसे गिरफ्तार कर लिया.

पूछताछ में ड्राइवर नीरज ने इसे गलती से हुआ ऐक्सीडेंट बताया और बाद में पुलिस ने नीरज निमजे को जमानत पर रिहा भी कर दिया.

सीसीटीवी फुटेज और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान के बाद जब आरोपी ड्राइवर नीरज निमजे को गिरफ्तार करने के बाद जब जमानत पर छोड़ दिया गया तो उस के तुरंत बाद नागपुर शहर में इस सनसनीखेज रोड एक्सीडेंट को ले कर तरह तरह की बातें होने लगी थीं. लोग पुलिस की कार्यप्रणाली को ले कर प्रश्नचिह्न लगाने लगे थे.

मृतक पुरुषोत्तम के बेटे और अन्य रिश्तेदारों व परिचितों के माध्यम से पुलिस के उच्च अधिकारियों को कत्ल की साजिश से अवगत कराया गया. चूंकि मृतक पुरुषोत्तम पुत्तेवार नागपुर में करोड़ों की प्रौपर्टी के मालिक भी थे और उन का इन प्रौपर्टीज को ले कर अपने रिश्तेदारों से कई सालों से विवाद भी चला आ रहा था.

उन के परिचित व रिश्तेदारों को लगता था कि शायद इस ऐक्सीडेंट के पीछे कोई गहरी साजिश छिपी हो सकती है. यह बात पुलिस के कानों तक भी पहुंच चुकी थी.

खुद मृतक पुरुषोत्तम के कुछ रिश्तेदारों ने इस सनसनीखेज केस को ले कर नागपुर के पुलिस कमिश्नर से व्यक्तिगत तौर पर मुलाकात भी की थी, जिस के बाद मामला संदिग्ध पाए जाने पर पुलिस कमिश्नर डा. रवींद्र सिंघल ने इस मामले की जांच अजनी पुलिस से ले कर क्राइम ब्रांच के हवाले कर दी थी और फिर यहीं से मामले में ऐसा चौंकाने वाला ट्विस्ट सामने आया, जिस ने पूरे नागपुर शहर व महाराष्ट्र को ही नहीं, बल्कि समूचे देश को चौंका कर रख दिया.

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 आरोपी  नीरज ईश्वर निमजे

शराब पार्टियों ने कैसे खोला मर्डर का राज

नीरज ईश्वर निमजे जो एक छोटामोटा अपराधी था, जिस ने कभी भी अपने दोस्तों को एक पार्टी तक नहीं दी थी. उस ने हमेशा दोस्तों, परिचतों और लोगों से पैसे उधार लिए मगर उस ने उधार कभी चुकाया तक नहीं था. अचानक जब उस ने अपने दोस्तों को पार्टियां देनी शुरू कर दीं, महंगी महंगी ब्रांड की शराब दोस्तों को पेश की तो इस वजह से लोगों को उस पर शक हुआ.

मुखबिरों के माध्यम से यह खबर उड़ते उड़ते पुलिस के कानों भी जा पहुंची थी कि नीरज निमजे जो एक चिल्लर अपराधी है, उस के पास अचानक इतना सारा पैसा आखिर कहां से आ गया? कुबेर का खजाना उसे अचानक कब और कैसे मिल गया?

बुजुर्ग पुरुषोत्तम पुत्तेवार की बहू अर्चना निकली मास्टरमाइंड

पुलिस की क्राइम ब्रांच ने जब इन रहस्यों को खंगालना शुरू किया और नीरज निमजे को एक बार फिर गिरफ्तार कर सख्ती से पूछताछ की तो उस ने कुबूल किया कि पुरुषोत्तम पुत्तेवार की मौत कोई हादसा नहीं थी, बल्कि एक सोचीसमझी साजिश के चलते इस हत्या को अंजाम दिया गया था.

नागपुर के रहने वाले एक बुजुर्ग शख्स के कत्ल की साजिश इतनी भयानक होगी, यह किसी ने कभी सोचा तक नहीं था. सीसीटीवी कैमरे में कैद हुई वे तसवीरें बहुत साफ तो नहीं थीं, लेकिन इन्हें देख कर फौरी तौर पर इतना तो कहा ही जा सकता था कि यह मामला महज एक ऐक्सीडेंट का नहीं था.

22 मई, 2024 की सुबह हुई इस वारदात की तसवीरों को देख कर शुरू में नागपुर पुलिस को भी कुछ ऐसा ही लगा था. क्योंकि सीसीटीवी की उन फुटेजों में जो दिखा था, वो असल सच नहीं था और जो हकीकत थी वह उन तसवीरों में दिखी नहीं.

पुलिस की पूरी जांच में पूरा केस हिट एंड रन का नहीं, बल्कि इरादतन की गई हत्या की एक बड़ी साजिश का निकला, पुलिस के मुताबिक इस खूनी साजिश की पूरी स्क्रिप्ट लिखने वाली मास्टरमाइंड मृतक की बहू अर्चना निकली, जिस ने करीब 300 करोड़ रुपए की संपत्ति के लालच में अपने ससुर के मर्डर का प्लान बनाया था.

पुरुषोत्तम पुत्तेवार के कत्ल के मास्टरमाइंड के तौर पर जिस महिला का नाम सामने आया, वह मृतक की बहू होने के साथसाथ महाराष्ट्र के ही गढ़चिरौली और चंद्रपुर के टाउन प्लानिंग डिपार्टमेंट की वर्तमान में असिस्टेंट डायरेक्टर है, यानी कि सरकारी महकमे की वह क्लास वन औफिसर भी है. जबकि इस साजिश में अर्चना का साथ उस के भाई प्रशांत पार्लेवार ने दिया, जोकि नागपुर के ही माइक्रो स्माल ऐंड मीडियम इंटरप्राइजेज के डायरेक्टर है.

2 क्लास वन अफसरों ने कैसे रची खूनी खौफनाक साजिश

प्रशांत अर्चना पुत्तेवार का सगा भाई है. असल में पुलिस की गिरफ्त में आए कातिलों ने कुबूल किया था कि पुरुषोत्तम पुत्तेवार का मर्डर करने के लिए अर्चना ने ही उन्हें पूरे एक करोड़ रुपए की सुपारी दी थी.

जब पुलिस ने इस खुलासे के बाद अर्चना को गिरफ्तार कर उस से विस्तृत पूछताछ की तो मास्टरमाइंड अर्चना के पीछे एक और मास्टरमाइंड प्रशांत पार्लेवार का नाम सामने आया. यानी एक ऐसा शख्स जो एक बड़ा सरकारी अफसर तो है ही, जो सत्ताधारी दल के नेताओं का भी बेहद करीबी माना जाता है.

अपने ही ससुर की हत्या की सुपारी देने वाली क्लास वन अधिकारी अर्चना ने अपने ससुर को अपने पिता के खिलाफ गवाही देने से रोकने और ससुर की संपत्ति हड़पने के लिए ससुर पुरुषोत्तम पुत्तेवार का मर्डर कराया था.

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मृतक की बहू आरोपी अर्चना

अर्चना के परिवार में 2 भाई एक बहन थे. बड़ा भाई प्रशांत पार्लेवार, उस से छोटा प्रवीण पार्लेवार व अर्चना, जबकि पुरुषोत्तम पुत्तेवार के परिवार में पत्नी शकुंतला, बेटे हेमंत, मनीष व एक बेटी योगिता थी. इन में अर्चना की शादी डा. मनीष पुत्तेवार से व अर्चना के भाई प्रवीण की शादी पुरुषोत्तम पुत्तेवार की बेटी योगिता के साथ हुई थी.

पुलिस को दिए गए अपने बयान में अर्चना ने कहा कि उस के भाई प्रवीण की मौत अकस्मात हो गई थी. प्रवीण की मृत्यु के बाद योगिता अपने पिता पुरुषोत्तम पुत्तेवार की संपत्ति में हिस्सा चाहती थी. इस के लिए योगिता ने कोर्ट में केस भी दाखिल किया था. इस मामले में अर्चना के ससुर पुरुषोत्तम पुत्तेवार गवाह थे.

वहीं दूसरी ओर अर्चना के पिता अपनी संपत्ति अपने दूसरे बेटे प्रशांत पार्लेवार और बेटी अर्चना को देना चाहते थे. अर्चना अपने पिता की ओर से योगिता को बेदखल तो करना ही चाहती थी, साथ ही वह यह भी चाहती थी कि योगिता को उस के पिता पुरुषोत्तम पुत्तेवार की संपत्ति से भी कुछ न मिले.

इस मामले में अर्चना ने अपने ससुर पुरुषोत्तम पुत्तेवार को कई बार गवाही न देने के लिए कहा भी था, लेकिन जब पुरुषोत्तम ने इंकार कर दिया तो फिर अर्चना ने अपने भाई प्रशांत पार्लेवार के साथ मिल कर ससुर को हमेशा हमेशा के लिए रास्ते से हटाने की योजना बना डाली.

अर्चना ने अपने बयान में पुलिस को बताया कि उस के पिता के पास भी करोड़ों की संपत्ति है. इस में नागपुर के ऊंटखाना इलाके में 6 हजार वर्ग फीट जमीन शामिल है. अर्चना और प्रशांत इसी जमीन पर माल बनाना चाहते थे. अगर योगिता इस जमीन में अपना हिस्सा ले लेती तो माल बनाने के लिए बहुत कम जमीन बच रही थी.

अपने ससुर पुरुषोत्तम पुत्तेवार की हत्या की साजिश अर्चना ने काफी योजनाबद्ध ढंग से रची थी. इस खूनी साजिश में उस ने अपने पति डा. मनीष पुत्तेवार के ड्राइवर सार्थक साहेबराव बागड़े, अपने भाई प्रशांत पार्लेवार और अपनी पीए पायल नागेश्वर को भी शामिल किया था. अर्चना ने इन को हत्या करने के लिए एक करोड़ रुपए का लालच भी दिया.

ड्राइवर सार्थक ने अपने प्लान में अपने 3 साथियों नीरज निमजे, सचिन धार्मिक और संकेत घोड़मारे को शामिल किया था. अर्चना ने जिन लोगों को अपने ससुर की सुपारी दी थी, उन्हें शुरुआत में 17 लाख रुपए और कुछ गोल्ड ज्वैलरी एडवांस में दी थी. बाकी पैसे काम होने पर देने की बात कही गई थी.

इस मामले में बहू अर्चना ने एक लाख 76 हजार में एक पुरानी आई20 कार खरीदी. इसी कार से टक्कर मारने के बाद पुरुषोत्तम पुत्तेवार की मौके पर ही मौत हो गई थी.

खास बात तो यह थी कि बहू ने अपने ससुर को मरवाने की एक ही महीने में 3 बार कोशिश की थी. 2 बार तो पुरुषोत्तम बच गए, मगर तीसरी बार वह उन का शिकार बन गए.

नागपुर के पुलिस कमिश्नर रवींद्र सिंघल ने मीडिया से बातचीत करते हुए बताया, ”पुरुषोत्तम पुत्तेवार को मारने के 2 अन्य प्रयास 8 मई, 2024 और 16 मई, 2024 को किए गए थे. 8 मई को सचिन धार्मिक ने उन्हें कार से कुचलने की कोशिश की थी, जबकि 16 मई को सचिन धार्मिक और नीरज निमजे ने पुरुषोत्तम के सिर पर लोहे की रौड से वार किया और फिर स्कूटर से भाग गए.

”चूंकि उन्हें ज्यादा चोटें नहीं आई थीं, इसलिए उन के बेटे डा. मनीष ने इसे दुर्घटना मानते हुए पुलिस में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी.’’

इस संबंध में डीसीपी निमिष गोयल ने कहा, ”सीसीटीवी फुटेज से हमें पता चला कि यह महज दुर्घटना नहीं थी, क्योंकि पुरुषोत्तम सड़क के एकदम किनारे पर चल रहे थे और ड्राइवर ने जानबूझ कर उन्हें कार से कुचल कर नीचे गिरा दिया. साथ ही उन्हें काफी दूर तक घसीटा भी गया ताकि उन्हें गंभीर चोटें लगें और बचने की कोई उम्मीद न रहे.’’

डीसीपी ने आगे बताया, ”जांच के दौरान हमें पता चला कि एक एक्टिवा स्कूटी लगातार पुरुषोत्तम पुत्तेवार का पीछा कर रही थी. एक्टिवा भी घटनास्थल पर मिली थी. और दुर्घटना के तुरंत बाद एक्टिवा पर सवार 2 लोग वहां से भाग गए थे.

इस के आधार पर फिर से जांच की गई तब नीरज निमजे ने अपने साथी सचिन धार्मिक की भूमिका का खुलासा किया. इस के बाद भारतीय दंड संहिता और मोटर वाहन अधिनियम की हत्या, साजिश और सबूत नष्ट करने की संबंधित धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई, फिर नीरज निमजे और सचिन धार्मिक को 4 जून, 2024 को गिरफ्तार कर लिया गया.

सचिन धार्मिक की काल डिटेल्स से पता चला कि वह लगातार अर्चना के संपर्क में था. उस के बाद जब गिरफ्तारी के बाद उस से पुलिस द्वारा कड़ी पूछताछ की गई तो उस ने अपना अपराध कुबूल कर लिया और फिर उस ने ड्राइवर सार्थक बागड़े की भूमिका का भी खुलासा कर दिया.

पुलिस ने बताया कि अर्चना ने पुलिस को गुमराह करने के लिए काफी कोशिशें की थीं और यह दावा भी किया था कि उस ने 6 महीने पहले सार्थक बागड़े को नौकरी से निकाल दिया था. इसलिए उस ने हमारे परिवार से बदला लेने के लिए यह अपराध बदले की भावना से किया था.

हालांकि पुलिस जांच में यह तथ्य सामने आया कि सार्थक बागड़े ने 20 मई, 2024 तक उन के साथ काम किया था और जिस के बाद अर्चना और सार्थक बागड़े की नागपुर पुलिस द्वारा 6 जून और 10 जून, 2024 को गिरफ्तार कर लिया गया था.

बहन द्वारा रची गई कत्ल की साजिश में भाई कैसे बना मददगार

इस कत्ल की मास्टरमाइंड अर्चना पत्नी डा. मनीष पुत्तेवार ने पहले अपने ड्राइवर सार्थक बागड़े को इस काम के लिए राजी किया, उसे पूरे एक करोड़ रुपए की सुपारी का लालच दिया. सार्थक बागड़े के साथसाथ नीरज निमजे, सचिन धार्मिक और संकेत घोड़मारे से विस्तृत बातचीत की गई, जिन्होंने पुरुषोत्तम का कत्ल करने के लिए हामी भर दी.

सचिन धार्मिक को एक बीयर बार लाइसेंस का लालच भी दिया गया. अर्चना ने ये काम पूरा कर देने पर अपने भाई एमएसएमई के डायरेक्टर प्रशांत पार्लेवार से लाइसेंस दिलाने में मदद करने का वादा किया.

प्रशांत पार्लेवार लगातार अपनी बहन अर्चना को इस कत्ल की साजिश को पूरा करने के लिए गाइड कर रहा था. क्राइम ब्रांच ने ऐक्सीडेंट वाली जगह के आसपास के कई किलोमीटर के सीसीटीवी फुटेज निकाल कर चैक किए तो इस कोशिश में पुलिस को कुछ अहम सुराग मिले.

पुलिस को यह पता चला कि उस दिन 22 मई, 2024 को जब आई20 कार ने पुरुषोत्तम पुत्तेवार को कुचला था, तब कार ड्राइवर नीरज निमजे के साथ उस का एक साथी सार्थक बागड़े भी मौजूद था. इस आई 20 कार के पीछे एक एक्टिवा भी आगेपीछे चल रही थी. अब पुलिस इन लोगों की पहचान करना चाहती थी.

दूसरी बार जब क्राइम ब्रांच ने नीरज निमजे और सार्थक बागड़े को हिरासत में ले कर जब नए सिरे से पुलिसिया ढंग से पूछताछ की तो पता चला कि उस दिन उन की कार के पीछे एक्टिवा पर चल रहे 2 लोग सचिन धार्मिक और संकेत घोड़मारे थे, जोकि पुरुषोत्तम पुत्तेवार की और उन की पहचान कराने के लिए बालाजी नगर पहुंचे थे, ताकि नीरज निमजे अपनी कार से पुरुषोत्तम पुत्तेवार को कुचल कर आसानी से वहां से भाग सकें.

आरोपी अर्चना पहले से है करोड़ों की मालकिन

ससुर पुरुषोत्तम पुत्तेवार मर्डर की मुख्य आरोपी अर्चना ने पुलिस पूछताछ में अपनी अकूत संपत्ति का भी खुलासा किया है. उस ने बताया कि नियोजन विभाग में काम करते हुए उस ने काफी संपत्ति अर्जित की थी. वह खुद बैरमजी टाउन में अपने एक आलीशान फ्लैट में रहती है. इस के अलावा उस के पास 2 और भी फ्लैट हैं और एक आलीशान फार्महाउस भी है.

उस ने पुलिस को दिए अपने बयान में स्वीकार किया कि उस ने अपने ससुर की हत्या करने के लिए एक करोड़ रुपए की सुपारी दी थी. इस में से उस ने 17 लाख रुपए नकद, 40 ग्राम सोने के कंगन और 100 ग्राम सोने के बिसकुट एडवांस के तौर पर हत्यारों को दिए थे. पुलिस ने हत्यारों से रुपए, सोने के बिसकुट गहने बरामद भी कर लिए हैं

पुलिस के अनुसार अर्चना ने सरकारी विभाग में काम करते हुए करोड़ों रुपए की संपत्ति बनाई है. वहीं पुलिस को बड़सा के एक व्यापारी के माध्यम से अर्चना द्वारा बेनामी संपत्ति खरीदे जाने का भी पता चला है. काली कमाई से बनाई गई संपत्ति की जांच एंटी करप्शन ब्यूरो द्वारा कराई जाएगी. पुलिस जल्द ही इस संबंध में एसीबी को पत्र भेजने वाली है.

इस के अलावा पुलिस जांच में अर्चना मनीष पुत्तेवार के कार्यस्थल पर कई अनियमितताएं भी उजागर हुई हैं. अर्चना पुत्तेवार अपने पद का इस्तेमाल काफी गलत ढंग से कर रही थी. उस के खिलाफ लोगों द्वारा कई शिकायतें भी दर्ज कराई गई थीं. अर्चना पर नियमों को तोडऩे और अनधिकृत लेआउट को मंजूरी देने जैसे कई गंभीर आरोप लगाए गए थे, हालांकि अर्चना के राजनीतिक संबंधों के कारण किसी भी आरोप को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया गया था.

कुछ साल पहले कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि बेटी का पिता की संपत्ति पर अधिकार होता है, इसे ले कर तमाम जगहों पर काफी होहल्ला भी हुआ था.

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         पायल नागेश्वर

अर्चना की 3 दिन की पुलिस रिमांड के दौरान पायल अर्चना के बैरमजी टाउन के आलीशान अपार्टमेंट में चली गई और उस ने अपने मोबाइल फोन से आपत्तिजनक संदेश और काल रिकौर्ड डिलीट कर दिए. पुलिस के अनुसार गिरफ्तारी के बाद पायल नागेश्वर ने अपने और अर्चना के मोबाइल से काल, चैट, मैसेज और तसवीरें मिटाने की बात स्वीकार की है.

पुलिस अब साइबर विशेषज्ञों के माध्यम से मिटाए गए सबूतों को वापस लाने और गैजेट को फोरैंसिक प्रयोगशाला में भेजने की तैयारी कर रही थी. पुलिस जांच दल का मानना है कि काल, चैट, संदेशों और तसवीरों से हत्या के कई सबूत सामने आ सकते हैं, जिस में प्रत्येक आरोपी की भूमिका और आपसी संबंध उजागर किए जा सकेंगे. पायल नागेश्वर ने मर्डर की सरगना अर्चना की ओर से हत्यारों के बीच सुपारी की रकम बांटने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

कहानी लिखे जाने तक नागपुर पुलिस पुरुषोत्तम पुत्तेवार मर्डर के आरोपी अर्चना पुत्तेवार (53 वर्ष) पत्नी डा. मनीष पुत्तेवार, प्रशांत एम. पार्लेवार (58 वर्ष) महाराष्ट्र के मध्यम एवं लघु उद्योग डायरेक्टर, अर्चना की पीए पायल नागेश्वर (28 वर्ष) निवासी बैरमजी टाउन नागपुर, सार्थक साहेबराव बागड़े (29 वर्ष) निवासी चैतन्येश्वर नगर वाथोडा नागपुर, नीरज ईश्वर निमजे (30 वर्ष) निवासी शक्ति माता नगर खरबी रोड नागपुर, सचिन मोहन धार्मिक (29 वर्ष) निवासी बगडग़ंज नागपुर और सातवें आरोपी संकेत घोड़मारे (23 वर्ष) निवासी नागपुर को गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी थी.

—कथा पुलिस सूत्रों व जनचर्चा पर आधारित है. तथ्यों का नाट्य रूपांतरण किया गया है. कथा में पंकज पवार नाम काल्पनिक है.

कौन सही कौन गलत : सनक में आकर कर दी पत्नी की हत्या

18 अक्तूबर, 2017 की सुबह मोहाली पुलिस कंट्रोल रूम को हैरान करने वाली सूचना  दी गई कि फेज-10 के मानवमंगल स्कूल के पास एक आदमी ने अपनी पत्नी को रिवौल्वर से 6 की 6 गोलियां मार दी हैं, जो शायद सब की सब उस के सिर में ही लगी हैं. लेकिन अभी उस औरत की सांसें चल रही हैं. आप तुरंत आ कर उसे किसी अच्छे अस्पताल में पहुंचा दीजिए तो शायद उस की जान बच जाए.

‘‘आप कौन बोल रहे हैं?’’ पूछा गया तो फोन करने वाले ने कहा, ‘‘मैं तो राहगीर हूं. अपनी आंखों से इस दर्दनाक हादसे को देखा, इसलिए इंसानियत के नाते आप को फोन कर दिया. पर आप लोग समय बरबाद मत कीजिए. किसी की जिंदगी का सवाल है. वह औरत मर सकती है. जल्दी आ कर उस बदनसीब को बचा लीजिए.’’

इस के बाद तुरंत पीसीआर वैन को सूचना में बताए गए पते पर भेज दिया गया, साथ ही घटना के बारे में उस इलाके के थाना फेज-2 को भी सूचना दे दी गई. फेज-2 के थानाप्रभारी इंसपेक्टर अमरप्रीत सिंह उस समय थाने में ही थे. उन्होंने एएसआई सतनाम सिंह, नरिंदर कुमार, सतिंदरपाल सिंह, हवलदार जसवीर सिंह और निर्मल सिंह को साथ लिया और घटनास्थल की ओर चल पडे़.

थाना पुलिस के पहुंचने तक पीसीआर की गाड़ी पहुंच चुकी थी. घटनास्थल पर काफी लोग इकट्ठा थे. मानवमंगल स्कूल की ओर सड़क के किनारे सिल्वर रंग की एक इंडिगो कार खड़ी थी, जिस का बाईं ओर वाला अगला दरवाजा खुला था. उसी के पास एक औरत जमीन पर पड़ी थी.

उस से कुछ दूरी पर सड़क पर एक बूढ़ा लेटा था, जिस की दोनों टांगें ऊपर की ओर थीं. सिर को उस ने अपने दोनों हाथों से कुछ इस तरह से सहारा दे रखा था, जैसे वह बुरी तरह से किसी मानसिक परेशानी से घिरा हो.

पुलिस के आते ही वह धीरे से उठा. उस के उठते ही भीड़ में से किसी ने उस की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘इंसपेक्टर साहब, यही वह आदमी है, जिस ने पहले इस औरत से झगड़ा किया, उस के बाद रिवौल्वर निकाल कर उसे धड़ाधड़ गोलियां मार दीं.’’

इंसपेक्टर अमरप्रीत सिंह ने पलट कर उस बूढ़े की ओर देखा तो वह उन्हीं की ओर आ रहा था. इस बीच अमरप्रीत सिंह ने सुना कि लोग कह रहे थे, ‘‘यह बुड्ढा तो बहुत खतरनाक है. बच के रहो, अब पता नहीं किस को गोली मार दे.’’

बूढ़े ने भी अपने बारे में कही जाने वाली बातें सुन ली थीं. इसलिए अपने दोनों हाथों को ऊपर उठा कर अमरप्रीत सिंह की ओर देखते हुए उस ने कहा, ‘‘सर, मैं आत्मसमर्पण करने के लिए ही आप का इंतजार कर रहा था. मेरा खाली रिवौल्वर कार में पड़ा है. मैं ने उस की सारी गोलियां चला दी हैं, जो शायद उस के सिर में ही लगी हैं. फिर भी आप इसे अस्पताल पहुंचा दीजिए, शायद यह बच जाए.’’

‘‘इस का मतलब राहगीर बन कर पुलिस को आप ने ही फोन किया था?’’ अमरप्रीत सिंह ने पूछा.

‘‘जी हां, मैं ने ही फोन किया था. मैं अपनी गिरफ्तारी देने को तैयार हूं. लेकिन मेहरबानी कर के पहले आप घायल पड़ी मेरी पत्नी को अस्पताल पहुंचा दीजिए. शायद डाक्टर इसे बचा लें. मैं इसे इस तरह मरते नहीं देख सकता.’’ बूढ़े ने दोनों हाथ जोड़ कर कहा.

‘‘आप परेशान मत होइए, हम इन्हें अस्पताल ही ले जा रहे हैं. फिलहाल आप हमारी गाड़ी में बैठ जाइए.’’ अमरप्रीत सिंह ने पुलिस की गाड़ी की ओर इशारा कर के कहा.

ऐंबुलैंस को पहले ही फोन कर दिया गया था. थोड़ी देर में ऐंबुलैंस आ गई. उस के बाद महिला को फोर्टिस अस्पताल ले जाया गया. डाक्टरों ने चैकअप के बाद महिला को मृत घोषित कर दिया. इस के बाद पुलिस ने शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दिया.

पत्नी को गोलियां मारने वाले उस बूढ़े को हिरासत में ले तो लिया गया था, लेकिन उस के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज कराने को तैयार नहीं था. बूढे़ ने ही 100 नंबर पर फोन कर के पुलिस कंट्रोल रूम को घटना की सूचना दी थी. वही इस अपराध का दोषी था. वारदात में प्रयुक्त लाइसैंसी रिवौल्वर भी कब्जे में ले ली गई थी.

कोई दूसरा चारा न देख अमरप्रीत सिंह ने अपनी ओर से एक तहरीर तैयार की और एफआईआर दर्ज करवाने को हवलदार जसवीर सिंह के हाथों थाना भिजवा दिया. कुछ ही देर में थाना फेज-2 में भादंवि की धारा 302 के अलावा शस्त्र अधिनियम की धाराओं 25 और 27 के अंतर्गत निरंकार सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई, क्योंकि उस बूढ़े का नाम निरंकार सिंह था.

सारी काररवाई पूरी कर के निरंकार सिंह और उस की कार को कब्जे में ले कर पुलिस थाने लौट आई. थाना पहुंचते ही निरंकार सिंह की तबीयत बिगड़ने लगी. इस के बाद उन के कहने पर उन के मैनेजर अनीश शर्मा को फोन कर के उन की दवाएं मंगवाई गईं. अनीश शर्मा के आने पर निरंकार सिंह ने एक साथ 10 तरह की टैबलेट्स खाईं, तब कहीं जा कर उन की स्थिति में सुधार आना शुरू हुआ.

अनीश को जब इस दर्दनाक घटना के बारे में पता चला तो वह हैरान रह गए. पुलिस को उन्होंने जो बताया, उस के अनुसार सुबह दोनों पीजीआई अस्पताल जाने के लिए एक साथ निकले थे. निरंकार सिंह ने हलका नाश्ता किया था, जबकि उन की पत्नी ने ठीकठाक नाश्ता किया था. दोनों की बातचीत में किसी तरह का तनाव या मनमुटाव नहीं दिखाई दिया था. निरंकार सिंह जो इंडिगो कार ले कर आए थे, वह उन्हीं की थी.

निरंकार सिंह से पूछताछ करना आसान नहीं था. उन का मैडिकल करवाया गया तो पता चला कि वह दवाओं के सहारे जिंदगी जी रहे थे. दिल के मरीज होने के साथसाथ हाइपरटेंशन, शुगर और अन्य कई तरह की बीमारियों से वह इस तरह गंभीर रूप से ग्रस्त थे कि उन्हें अपना जीवन चलाने के लिए दिन में 3 बार 10 तरह की दवाओं को नियमित खाना पड़ता था. अगर एक भी गोली नहीं खाते थे तो उन की तबीयत इस तरह खराब हो जाती थी कि उन्हें संभालना मुश्किल हो जाता था.

जो भी था, चिकित्सीय सुविधा के साथ पुलिस ने निरंकार सिंह से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की. इस पूछताछ में निरंकार सिंह और उन के मैनेजर अनीश शर्मा के बयान से जो कहानी सामने आई, वह एक अजीबोगरीब कहानी थी—

60 साल के निरंकार सिंह सराओ का मोहाली के फेज-10 में अच्छाखासा सराओ होटल था. उसी होटल के टौप फ्लोर में वह खुद रहते थे. सन 1977 में उन की शादी उन से 2 साल बड़ी कुलवंत कौर से हुई थी. कुलवंत कौर अनिवासी भारतीय थीं, जो लंदन में रहती थीं. शादी के बाद वह भारत में रहने आईं तो वहां के मुकाबले उन्हें भारत का रहनसहन अच्छा नहीं लगा.

इसलिए कुलवंत कौर ने पति से भी इंडिया छोड़ कर लंदन चल कर रहने को कहा, लेकिन निरंकार इस के लिए तैयार नहीं थे. उन्हें अपने देश में रहना ज्यादा अच्छा लगता था. उन्हें मोहाली से कुछ ज्यादा ही लगाव था. वहां उन का बढि़या होटल था, जो ठीकठाक चल रहा था.

कुलवंत कौर कभी लंदन चली जातीं तो कभी भारत आ कर पति के साथ रहतीं. उन के पास इंडिया और इंग्लैंड दोनों जगहों की नागरिकता थी. कभीकभी निरंकार सिंह भी इंग्लैंड चले जाते थे. जिस तरह कुलवंत कौर को इंडिया में अच्छा नहीं लगता था, उसी तरह निरंकार सिंह को इंग्लैंड में अच्छा नहीं लगता था. इसलिए वह कुछ दिनों के लिए ही इंग्लैंड जाया करते थे. इसी तरह यह सिलसिला चलता रहा.

देखतेदेखते सालों बीत गए. इस बीच दोनों बेटी अमनप्रीत कौर और बेटे नवप्रीत सिंह के मांबाप बन गए. दोनों बच्चे लंदन में ही रह रहे थे. वहीं पर उन की शादियां हो गई थीं. उन के भी बच्चे हो गए. लेकिन उन का लगाव पिता से कम, मां से ज्यादा था. अमनप्रीत कौर इस समय 39 साल की है तो नवप्रीत सिंह 37 साल को हो चुका है.

उम्र के साथ निरंकार सिंह को कई बीमारियां हो गई थीं. उन का इलाज चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल से चल रहा था. कुलवंत कौर तो पहले ही से कहती रहती थीं कि जो सुविधाएं इंग्लैंड में हैं, भारत में नहीं है. इधर वह पति से स्पष्ट कहने लगी थीं कि अगर उन्हें लंबा स्वस्थ जीवन जीना है तो वह अपनी सारी संपत्ति बेच कर हमेशा हमेशा के लिए इंग्लैंड चल कर बस जाएं, वरना यहां के अस्पतालों के आधारहीन इलाजों से वह जल्दी ही मौत के आगोश में समा जाएंगे.

लेकिन निरंकार सिंह किसी भी सूरत में ऐसा करने के हक में नहीं थे, इसलिए उन्होंने पत्नी से साफ कह दिया था कि वह चाहें तो उन की प्रौपर्टी से अपना हिस्सा ले उन से अलग रहने का अधिकार ले लें, लेकिन वह किसी भी कीमत पर भारत छोड़ कर कहीं नहीं जाएंगे. वह मरते दम तक मोहाली में ही रहेंगे.

घटना से करीब 2 हफ्ते पहले ही कुलवंत कौर अकेली ही भारत आई थीं. इस बार पति को अपने साथ इंग्लैंड ले जाने के चक्कर में उन्होंने भारत और इंग्लैंड के बीच बराबर तुलना करती रहीं. उस दिन कार में जाते समय भी वह वही सब कहती रहीं. पीछे से अगर कोई हौर्न बजाता तो कुलवंत कौर कहतीं, ‘‘इंग्लैंड में ऐसा नहीं होता.’’

होटल मैनेजर अनीश शर्मा ने पुलिस को जो बताया, उस के अनुसार निरंकार सिंह उस दिन चैकअप के लिए पीजीआई अस्पताल जा रहे थे. वह सुबह 9 बजे ही तैयार हो गए थे. उन के पास .32 बोर का लाइसैंसी रिवौल्वर था, जिसे उन्होंने अपने पास रख लिया था.

निरंकार सिंह के पास बीएमडब्ल्यू कार थी. लेकिन उस दिन उन्होंने अपनी कार सर्विस के लिए भिजवाने के लिए अनीश शर्मा को बोल कर उन की इंडिगो कार ले ली थी. नाश्ता वगैरह कर के वह पत्नी को साथ ले कर कार को खुद चलाते हुए होटल से निकल पड़े थे.

इस के बाद जो कुछ हुआ, उस के बारे में निरंकार ने पुलिस को बताया, ‘‘कार में बैठते ही कुलवंत ने हमेशा की तरह इंग्लैंड चलने को ले कर मेरा दिमाग चाटना शुरू कर दिया. उन का कहना था कि इंडिया के घटिया अस्पतालों में इलाज करवा कर मैं अपनी मौत को क्यों बुला रहा हूं. इंडिया छोड़ कर उन के साथ इंग्लैंड चलूं, जहां इतने बढि़या अस्पताल हैं कि वहां के इलाज से मैं एकदम भलाचंगा हो जाऊंगा.’’

इस के बाद एक लंबी सांस ले कर उन्होंने आगे कहा, ‘‘कुछ ही देर में मुझे पत्नी की इस बकबक पर ऐसा गुस्सा आया कि मैं ने कार को सड़क किनारे खड़ी की और कुलवंत कुछ समझ पाती, उस के पहले ही अपना रिवौल्वर निकाला और छहों की छहों गोलियां उस पर दाग दीं.

‘‘इस के बाद अचानक मुझे पछतावा हुआ. मैं कार से निकल कर दूसरी तरफ आया, कार का दरवाजा खोलते ही वह सड़क पर गिर गई. उस की सांसें अभी चल रही थीं. मैं ने अपना परिचय छिपाते हुए 100 नंबर पर फोन कर दिया.’’

पूछताछ के बाद पुलिस ने 19 अक्तूबर, 2017 को निरंकार सिंह को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. 28 नवंबर को विदेश से उन के बेटे बेटी ने मोहाली पुलिस को ईमेल भेजा है कि उन के सनकी पापा को मां से कभी प्यार नहीं था. यह सोची समझी साजिश के तहत की गई हत्या थी. इस के लिए उन के पिता को सख्त से सख्त सजा दिलाई जाए.

बहरहाल, इस मामले में अभी भी चर्चा चल रही है कि आखिर किस की सोच गलत थी और किस की सही, इस का फैसला अब शायद ही हो पाए.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

दो सगे भाइयों की करतूत : 20 साल तक बहन को दी यातना

दुनिया में इंसान को सब कुछ मिल जाता है, लेकिन एक ही मां से पैदा हुए भाईबहन कभी नहीं मिलते. भाईबहन का प्यार दुनिया के लिए एक मिसाल है. भाई अपनी बहन को इतना प्यार करता है कि उस के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है. बहन भी शादी के बाद ससुराल चली जाती है तो हमेशा अपने भाई की खुशी की कामना करती रहती है.

लेकिन आज की इस रंग बदलती दुनिया में मुंबई के रहने वाले 2 भाइयों रविंद्र वेर्लेकर और मोहनदास वेर्लेकर ने अपनी सगी बहन सुनीता वेर्लेकर को 20 सालों तक एक अंधेरी कोठरी में कैद कर के रखा. बिना किसी कसूर के उस ने उस कोठरी में जो जिंदगी गुजारी, उसे जान कर हर किसी का मन द्रवित हो उठेगा.

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11 जुलाई, 2017 की बात है. हमेशा की तरह उस दिन भी सवीना मार्टिंस अपनी संस्था के औफिस में समय से पहुंच गई थीं. वह अपने कंप्यूटर पर आए ईमेल मैसेज चैक करने लगीं. मैसेज को पढ़ते पढ़ते उन की नजर एक निवेदन पर आ कर रुक गई. वह निवेदन बहुत ही गंभीर और अत्यंत मार्मिक था. किसी अजनबी व्यक्ति द्वारा भेजे गए उस मैसेज को पढ़ कर सवीना मार्टिंस सन्न रह गईं. उन्हें उस संदेश पर विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ऐसे भी लोग हैं, जो इंसान और इंसानियत के नाम पर कलंक है.

सवीना मार्टिंस गोवा के पणजी शहर की एक जानीमानी समाजसेवी संस्था की अध्यक्ष हैं. उन की संस्था नारी उत्पीड़न रोकने का काम करती है. औनलाइन भेजे गए उस मार्मिक संदेश में उस व्यक्ति ने लिखा था कि ‘पणजी बांदोली गांव सुपर मार्केट के आगे एक बंगले के पीछे बनी कोठरी में सुनीता वेर्लेकर नामक महिला कई सालों से कैद है. मेरी आप से विनती है कि आप उस की मदद कर के उसे उस कैद से मुक्त कराएं.’

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                                                           सवीना मार्टिंस

सवीना मार्टिंस ने उस ईमेल मैसेज का प्रिंटआउट निकाल कर अपने पास रख लिया. अपने सहयोगियों के साथ बांदोली गांव जा कर उस मैसेज की सच्चाई का पता लगाया. इस के बाद उन्होंने पणजी महिला पुलिस थाने जा कर वहां की महिला थानाप्रभारी रीमा नाइक से मुलाकात कर उन्हें पूरी बात बता कर ईमेल मैसेज का प्रिंट उन के सामने रख दिया. सवीना ने सुनीता वेर्लेकर को बंदी बना कर रखने वाले उस के दोनों भाइयों के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा कर उसे कैद से मुक्त कराने की मांग की.

थानाप्रभारी रीमा नाइक ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए इस की जानकारी अपने सीनियर अधिकारियों को दे दी. अधिकारियों का निर्देश मिलते ही वह पुलिस टीम के साथ तुरंत घटनास्थल की तरफ रवाना हो गईं. जिस समय पुलिस टीम बताए गए पते पर पहुंची, उस से पहले ही समाजसेवी संस्था के सदस्य, डाक्टर, प्रैस वाले और एंबुलैंस वहां पहुंच चुकी थी.

पुलिस टीम और संस्था के सदस्यों को पहले तो सुनीता वेर्लेकर के दोनों भाइयों और भाभियों ने गुमराह करने की कोशिश की. उन्होंने बताया कि सुनीता कई साल पहले पागल हो कर कहीं चली गई थी. पर पुलिस और संस्था के सदस्यों को उन की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने उन के मकान की तलाशी ली तो एक मकान में ताला बंद मिला.

उस मकान से तेज बदबू आ रही थी. थानाप्रभारी को शक हुआ कि ये लोग झूठ बोल रहे हैं. उन्होंने उस मकान का ताला खोलने को कहा तो वे आनाकानी करने लगे. पुलिस ने उन्हें डांटा तो उन्होंने मकान का ताला खोल दिया.

मकान का गेट खुलते ही अंदर से दुर्गंध का ऐसा झोंका आया, जिस से वहां लोगों का खड़े रहना दूभर हो गया. सभी को अपनीअपनी नाक पर रूमाल रखना पड़ा. मकान के एक कमरे में पुलिसकर्मियों ने झांक कर देखा तो उस में एक महिला बैठी मिली. उस से बाहर आने को कहा गया तो वह चारपाई से उठ कर एक कोने में चली गई. वह सुनीता वेर्लेकर थी.

संस्था के सदस्य और पुलिस नाक पर रूमाल रख कर कमरे के अंदर गई. अंदर का दृश्य देख कर सभी स्तब्ध रह गए. कमरे के एक कोने में डरीसहमी सुनीता वेर्लेकर दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपाए बैठी थी. उस के बदन पर कपड़े भी नाममात्र के थे. यही वजह थी कि शरम की वजह से वह बाहर आने को तैयार नहीं थी. संस्था के सदस्यों ने उसे कपड़े ला कर दिए तो वह उन्हें पहन कर कोठरी से बाहर आई.

पिछले 20 सालों से एक कमरे में कैद सुनीता वेर्लेकर ने बाहर आ कर उजाला देखा तो वह अपने आप को संभाल नहीं पाई. खुशी से उस की आंखों से आंसू टपकने लगे. वह बेहोश जैसी हो गई. संस्था के सदस्यों ने उसे संभाला और पीने का पानी दिया.

घटनास्थल पर मौजूद डाक्टरों ने सुनीता का सरसरी तौर पर निरीक्षण किया और उसे एंबुलैंस में लिटा दिया. डाक्टर उसे पहले गोवा के आयुर्वेदिक मैडिकल अस्पताल ले गए.

प्राथमिक उपचार के बाद वहां के डाक्टरों ने उसे बांदोली के मानसरोवर अस्पताल भेज दिया. सुनीता का परीक्षण किया गया तो वह मानसिक रूप से ठीक पाई गई. उपचार के बाद अस्पताल से उसे छुट्टी दे दी गई.

सुनीता को अस्पताल भेज कर पुलिस और संस्था के सदस्यों ने कमरे का निरीक्षण किया, जिस में सुनीता रहती थी तो पाया कि उस कमरे में सुनीता की जिंदगी बद से बदतर बनी हुई थी. वह उसी कमरे में नित्यक्रिया करती थी, जिस के कारण कोठरी में कीड़ों मकोड़ों और मच्छरों की भरमार थी.

पता चला कि पिछले 20 सालों से सुनीता वेर्लेकर नहाई नहीं थी. उस के खाने के लिए एक टूटी प्लेट और सोने के लिए एक चारपाई थी. उसे खाना दरवाजा खोल कर देने के बजाय दरवाजे की निकली हुई एक पट्टी के बीच से ऐसे डाला जाता था, जैसे किसी कुत्ते बिल्ली को दिया जाता है.

घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण करने और आसपास के लोगों से पूछताछ करने के बाद पुलिस टीम ने सुनीता के भाई रविंद्र वेर्लेकर, मोहनदास वेर्लेकर, भाभी अनीता वेर्लेकर और अमिता वेर्लेकर को हिरासत में ले लिया. थाने में जब इन सभी से पूछताछ की गई तो सभी ने अपना अपराध स्वीकार कर सुनीता पर किए गए अत्याचारों की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

45 साल की सुनीता शिरोडकर उर्फ वेर्लेकर जितनी ही सुंदर थी, उतनी ही महत्त्वाकांक्षी भी. पिता का नाम रामदेव वेर्लेकर था. सुनीता वेर्लेकर उन की एकलौती बेटी थी, जिसे वह बहुत ही प्यार करते थे. रामदेव वेर्लेकर के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे रविंद्र वेर्लेकर और मोहनदास वेर्लेकर थे. दोनों की शादियां हो चुकी थीं. घर में सब से छोटी होने की वजह से सुनीता दोनों भाभियों अनीता और अमिता की भी लाडली थी.

सुनीता वेर्लेकर ने भी भाइयों की ही तरह पणजी के कालेज से पढ़ाई की. अच्छे नंबरों से बारहवीं पास करने के बाद वह उच्च शिक्षा हासिल कर अपना भविष्य तय करना चाहती थी. लेकिन मातापिता इस पक्ष में नहीं थे. पुरानी सोच वाले मातापिता का मानना था कि बेटियों को अधिक पढ़ाना ठीक नहीं है. उन्होंने उस की पढ़ाई बंद करा दी.

20 साल की उम्र में मातापिता उस के लिए योग्य वर की तलाश में जुट गए. अपनी जानपहचान वालों के माध्यम से शीघ्र ही उन्हें सुनीता के लिए लड़का भी मिल गया. लड़के का नाम था रमेशचंद्र शिरोडकर. मुंबई की एक निजी कंपनी में वह नौकरी करता था. उस के घर की आर्थिक स्थिति भी ठीकठाक थी.

सुनीता के पिता रामदेव वेर्लेकर को यह रिश्ता पसंद आ गया. इस के बाद सामाजिक रीतिरिवाज से दोनों की शादी कर दी गई. यह 25 साल पहले की बात है. शादी के बाद रमेशचंद्र शिरोडकर और सुनीता मुंबई में हंसीखुशी से रहने लगे.

2-3 साल कैसे गुजर गए, उन्हें पता ही नहीं चला. इस के बाद समय जैसे ठहर सा गया था, क्योंकि सुनीता इतने सालों बाद भी मां नहीं बन सकी थी. जिस की वजह से रमेशचंद्र उदास रहने लगा और धीरेधीरे सुनीता से दूर जाने लगा. सुनीता भी इस बात को ले कर काफी दुखी थी. एक दिन ऐसा आया कि रमेशचंद्र की जिंदगी में दूसरी लड़की आ गई.

उस लड़की के आने के बाद रमेशचंद्र काफी बदल गया. अब वह आए दिन सुनीता को प्रताडि़त करने लगा. उस ने सुनीता से साथ मारपीट भी शुरू कर दी. उस के चरित्र पर भी कीचड़ उछालने लगा. उसी लड़की की वजह से एक दिन वह सुनीता को उस के मायके यह कह कर छोड़ आया कि सुनीता का किसी लड़के से चक्कर चल रहा है.

सुनीता को मायके पहुंचा कर रमेशचंद्र ने उस लड़की से विवाह कर नई गृहस्थी बसा ली. इस के बाद वह सुनीता को भूल गया. रमेशचंद्र जिस तरह सुनीता पर घिनौना लांछन लगा कर मायके छोड़ आया था, उस से वेर्लेकर परिवार काफी दुखी था. सुनीता भी पति के इस आरोप और व्यवहार से इस प्रकार आहत थी कि उस का हंसना मुसकराना सब बंद हो गया था.

वह उदास और खोईखोई सी रहने लगी थी. उस की आंखों से अकसर आंसू बहते रहते थे. शादी के कुछ दिनों पहले ही उसे छोड़ कर चली गई थी. एक पिता ही था, जो बेटी के मन की स्थिति को समझता था.

रामदेव बेटी का पूरा खयाल रखते थे. वह उसे समझाते बुझाते रहते थे. पिता भी अपनी लाडली बेटी का दुख अधिक दिनों तक सहन नहीं कर सके और एक दिन बेटी के दर्द को सीने से लगा कर हमेशा हमेशा के लिए यह संसार छोड़ गए. उन्हें हार्टअटैक हुआ था.

पिता की मौत के बाद सुनीता अकेली रह गई. एक तरफ पति की बेवफाई और दूसरी तरफ पिता की मौत ने सुनीता को तोड़ कर रख दिया. अब सुनीता की देखभाल करने वाला कोई नहीं था. दोनों भाई और भाभियां उस की उपेक्षा करने लगीं. इस से सुनीता का स्वभाव चिड़चिड़ा सा हो गया. वह अपने प्रति लापरवाह हो गई. वह अकसर अकेली बैठी बड़बड़ाती रहती. जहां बैठती, वहां घंटोंघंटों बैठी रह जाती. जहां जाती, वहां से जल्दी लौट कर नहीं आती. रातदिन का उस के लिए कोई मायने नहीं रह गया था.

सुनीता के इस व्यवहार से उस के भाइयों और भाभियों ने उस का ध्यान रखने के बजाय उसे पागल करार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. फिर एक दिन बिना किसी कसूर के उस के भाइयों और भाभियों ने उसे एक कमरे में बंद कर दिया. 10×10 फुट के उस कमरे में हमेशा अंधेरा रहता था. इस के बाद भाईभाभियों ने यह अफवाह फैला दी कि सुनीता पागल हो कर पता नहीं कहां चली गई.

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा. सुनीता उस अंधेरी कोठरी में रह कर अपने भाइयों और भाभियों द्वारा दी गई सजा काट रही थी. भाभियां तो दूसरे घरों से आई थीं, लेकिन भाई तो अपने थे. ताज्जुब की बात यह थी कि उन सगे भाइयों का दिल भी इतना कठोर हो गया था कि उन्हें भी उस पर दया नहीं आई. वे बड़े बेदर्द हो गए थे.

अंधेरी कोठरी में कैद सुनीता पर उस के भाई भाभी जिस प्रकार का जुल्म ढा रहे थे, उस प्रकार का तो अंगरेजी हुकूमत ने भी शायद अपने कैदियों पर नहीं ढाया होगा.

घर का जूठा और बचाखुचा खाना ही उसे कोठरी के अंदर पहुंचाया जाता था. नित्यक्रिया के लिए भी उसे उसी कोठरी के कोने का इस्तेमाल करना पड़ता था. न तो नहाने के लिए पानी मिलता था, न पहनने के लिए कपड़े और न सोने के लिए बिस्तर था. उस कोठरी में इंसान तो क्या, जानवर भी नहीं रह सकता था.

यदि उसे वहां से मुक्त नहीं कराया जाता तो एक दिन उस की लाश ही बाहर आती. अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद पुलिस ने सुनीता को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे गोवा के पर्वभरी प्रायदोरिया आश्रम गृह भेज दिया गया.

पुलिस ने पूछताछ के बाद सुनीता वेर्लेकर के बड़े भाई रविंद्र वेर्लेकर, छोटे भाई मोहनदास वेर्लेकर, भाभी अमिता वेर्लेकर, अनीता वेर्लेकर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उन्हें कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक चारों की जमानत हो चुकी थी और वे जेल से बाहर आ चुके थे. सुनीता वेर्लेकर गोवा के आश्रम में थी, जहां उस की अच्छी देखरेख हो रही थी.

—कथा में रामदेव और रमेशचंद्र काल्पनिक नाम हैं

15 टुकड़ों में बंटी गीता

राजधानी पटना के थाना परसा बाजार के थानाप्रभारी नंदजी अपने औफिस में बैठे थे. तभी 60-65 साल का एक व्यक्ति अंदर आया. उन्होंने उस पर सरसरी निगाह डालने के बाद सामने खाली पड़ी कुरसी पर बैठने का इशारा किया. वह कुरसी पर बैठ गया. उस के माथे पर उभरी चिंता की लकीरों से साफ लग रहा था कि वह परेशान और चिंतित है.

नंदजी ने उस के आने का कारण पूछा तो वह बोला, ‘‘साहब, मेरा नाम राकेश चौधरी है, मैं तरेगना डीह गांव का रहने वाला हूं. मैं बहुत परेशान हूं, मेरी मदद कीजिए.’’

परेशानी पूछने पर वह बोला, ‘‘साहब, मेरी विवाहित बेटी गीता एक हफ्ते से घर से लापता है. उस का मोबाइल फोन भी बंद है. स्थानीय अखबारों में कई दिनों से टुकड़ों में मिली महिला की लाश की खबरें छप रही हैं. उस खबर को पढ़ कर ही मैं यहां आया हूं.’’

इस के बाद वह व्यक्ति अपने थैले से गीता की तसवीर निकाल कर नंदजी की ओर बढ़ाते हुए बोला, ‘‘यह गीता की तसवीर है, मुझे डर है कि कहीं उस के साथ कोई अनहोनी घटना तो नहीं घट गई.’’

‘‘आप फिक्र न करें.’’ नंदजी ने तसवीर पकड़ते हुए कहा, ‘‘वैसे आप कैसे इतने यकीन से कह सकते हैं कि गीता इसी थानाक्षेत्र से लापता हुई है?’’

‘‘साहब, मैं यह बताना भूल गया कि मेरी नातिन यानी गीता की बेटी जिस का नाम पूनम है, अपने पति रंजन के साथ कुसुमपुरम कालोनी में किराए के मकान में रहती है. जब मैं उस के घर गया तो ताला लगा मिला. पड़ोसियों से पूछने पर पता चला कि पूनम 18 तारीख से ही घर पर नहीं है. उस का फोन भी बंद है, इसलिए मैं यहां आ गया.’’

नंदजी के कहने पर राजेश चौधरी ने अपनी बेटी गीता की गुमशुदगी की तहरीर लिख कर दे दी.

दरअसल, 18 अप्रैल को पटना-गया पैसेंजर ट्रेन के गया रेलवे स्टेशन पर पैसेंजर ट्रेन की एक बोगी में ऊपर की सीट पर कोने में बादामी रंग के लेदर के 2 बड़े बैगों में किसी महिला के हाथपैरों के कटे हुए 3-3 टुकड़े मिले थे.

इस के 3 दिन बाद 20 अप्रैल को जक्कनपुर के पटना-गया रेलखंड पर गुमटी के पास रेलवे ट्रैक पर किसी महिला का कटा हुआ सिर और फ्लैक्स में बंधे हुए धारदार हथियार मिले थे. उसी दिन उन्हीं के थानाक्षेत्र परसा बाजार की कुसुमपुरम कालोनी में किसी महिला का धड़ से कमर तक का हिस्सा एक नाले से बरामद किया गया था.

दरअसल, 2 जिलों पटना और गया के 3 थानाक्षेत्रों गया जंक्शन, पटना के जक्कनपुर और परसा बाजार में 15 टुकड़ों में बंटा एक महिला का शव मिला था. शव एक अधेड़ महिला का था, जिस की उम्र करीब 40-50 साल के बीच रही होगी. 1-1 दिन के अंतराल में मिले शव के टुकड़ों से पटना और गया में सनसनी फैल गई थी.

गया, जक्कनपुर और परसा बाजार से मिले अंगों को एसएसपी मनु महाराज एक ही महिला के होने की आशंका जता रहे थे. उन का तर्क था कि हत्यारों ने लाश के टुकड़े 3 जगहों पर इसलिए फेंके होंगे, ताकि पुलिस आसानी से न तो महिला की शिनाख्त करा सके और न ही कातिलों तक पहुंच सके. इस से साबित हो रहा था कि कातिल जो भी था, बहुत चालाक था. स्थानीय अखबारों ने शव के टुकड़ों की सनसनीखेज खबर बना कर पुलिस की बखिया उधेड़ रखी थी.

राजेश चौधरी की बेटी गीता 17 अप्रैल से लापता थी. उस ने उस का जो हुलिया बताया था, शव के कटे अंगों को जोड़ कर देखने पर काफी मिलताजुलता लग रहा था. नंदजी ने सोचा कि कहीं शव के टुकड़े गीता के ही तो नहीं हैं.

नंदजी ने जक्कनपुर के इंसपेक्टर ए.के. झा को अपने थाने में बुला लिया. वह जब परसा बाजार थाना पहुंचे तो उन्होंने उन का परिचय राजेश चौधरी से करवाया और सारी बात उन्हें बता दी. इस के बाद वह राजेश चौधरी और इंसपेक्टर झा को साथ ले कर एसएसपी मनु महाराज के औफिस गए और उन्हें पूरी जानकारी दी.

एसएसपी मनु महाराज ने जक्कनपुर के थानाप्रभारी ए.के. झा से उस फ्लैक्स के बारे में जानकारी ली, जिसे जक्कनपुर के रेलवे ट्रैक से बरामद किया गया था और उस में खून से सने 3 धारदार हथियार मिले थे. उस फ्लैक्स पर फ्रैंड्स क्लब औफ कुसुमपुरम, नत्थूरपुर रोड, परसा बाजार लिखा था. फ्लैक्स पर लिखे पते के आधार पर पुलिस ने अनुमान लगाया कि हो न हो, महिला का कुसुमपुरम से कोई संबंध रहा होगा.

पुलिस की मेहनत तब रंग लाई. जब लापता बेटी की तलाश के लिए राजेश चौधरी थाने पहुंच गए. पुलिस को यकीन हो चला था कि टुकड़ों में मिला शव गीता का ही रहा होगा.

क्योंकि जिस दिन से गीता लापता हुई थी, उसी के अगले दिन से उस की बेटी और दामाद भी मकान पर ताला लगा कर फरार थे. पुलिस के शक की सूई मृतका की बेटी पूनम और दामाद रंजन की ओर घूम गई थी, लेकिन वह जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहती थी.

चूंकि यह सनसनीखेज मामला परसा बाजार थाने से जुड़ा था, इसलिए इस केस को गया राजकीय रेलवे थाने और जक्कनपुर थाने से स्थानांतरित कर के जांच के लिए परसा बाजार थाने को सौंप दिया गया.

एसएसपी मनु महाराज के आदेश पर इस मामले की जांच की जिम्मेदारी परसा बाजार थानाप्रभारी नंदजी को सौंपी गई. जक्कनपुर थाने के इंसपेक्टर ए.के. झा को कहा गया कि केस के खुलासे में वह नंदजी को सहयोग करें.

थानेदार नंदजी और ए.के. झा ने फ्लैक्स पर लिखे पते को ध्यान में रखते हुए जांच आगे बढ़ाई. फ्लैक्स पर फ्रैंड्स क्लब औफ कुसुमपुरम, नत्थूरपुर रोड, परसा बाजार लिखा था. पुलिस ने शक के आधार पर कुसुमपुरम के 6 युवकों को हिरासत में ले लिया. पूछताछ में उन युवकों ने बताया कि इस तरह के फ्लैक्स उन्होंने सरस्वती पूजा में लगाए थे. बाद में डेकोरेशन वाले फ्लैक्स में सामान लपेट कर ले गए थे.

उन युवकों से पूछताछ के आधार पर पुलिस उस डेकोरेटर तक पहुंच गई, जिस ने सरस्वती पूजा में सजावट की थी. डेकोरेटर ने पुलिस को बताया कि जेनरेटर देने वाला राजेश चौधरी फ्लैक्स को अपने साथ ले गया था. डेकोरेटर से पुलिस ने राजेश का पता लिया और शाहपुर थानाक्षेत्र स्थित उस के गांव खाजेकलां पहुंच गई. राजेश घर पर ही मिल गया. अचानक पुलिस को देख कर वह घबरा गया.

उस के चेहरे के उड़े रंग और पसीने को देख कर पुलिस का शक और पुख्ता हो गया. पुलिस उसे गिरफ्तार कर के थाना परसा बाजार ले आई. वहां जब उस से कड़ाई से पूछताछ की गई तो उस ने सारा राज उगल दिया. पूछताछ में उस ने बताया कि मरने वाली गीता उस के दोस्त रंजन की सास थी. रंजन ने उसे 20 हजार रुपए देने का लालच दिया था. उस के कहने पर ही उस ने उस का साथ दिया था. हत्या के बाद उन दोनों ने मिल कर गीता के शरीर के 15 टुकडे़ किए थे. यह बात 22 अप्रैल की है.

राजेश के बयान के आधार पर पुलिस ने उसी रात खाजेकलां से मृतका के पति उमेशकांत चौधरी, उस की बेटी पूनम और प्रेमी अरमान मियां को गिरफ्तार कर लिया. रंजन पुलिस के आने से पहले ही फरार हो गया था.

पुलिस ने पूनम और उमेशकांत से गीता की हत्या और अरमान से उस के प्रेम के रिश्ते के बारे में पूछताछ की तो दोनों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया. उमेशकांत ने पत्नी की हत्या का षडयंत्र कैसे रचा था, उस से परदा उठ गया.

गीता देवी हत्याकांड के आरोपियों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उमेशकांत चौधरी, पूनम, रंजन चौधरी और राजेश को नामजद आरोपी बना कर भादंवि की धारा 302, 201, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर के अदालत पर पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. पुलिस पूछताछ में गीता हत्याकांड की कहानी कुछ इस तरह सामने आई—

48 वर्षीय उमेशकांत चौधरी मूलरूप से पटना के शाहपुर थाना के गांव जमसौर का रहने वाला था. वह शारीरिक रूप से विकलांग था. विकलांगता के आधार पर उसे पटना सचिवालय स्थित भवन निर्माण विभाग में ड्राफ्ट्समैन की नौकरी मिल गई थी. करीब 25 साल पहले उस का विवाह इसी जिले के मसौढ़ी, तरेगना डीह के रहने वाले राकेश चौधरी की बेटी गीता से हुआ था.

औसत कदकाठी की गीता को शादी के बाद जब पति के विकलांग होने की बात पता चली तो उस के अरमान आंसुओं में बह गए. उस के साथ अपनों ने ही धोखा किया था.

शादी से पहले मांबाप ने बेटी को उस के पति की विकलांगता के बारे में कुछ नहीं बताया था. अलबत्ता, उन्होंने इतना जरूर कहा था कि लड़का सरकारी नौकरी में है. अच्छा कमाता है, उस में कोई दुर्गुण नहीं है और वह परिवार व पैसे से भी मजबूत है.

बेटी के भावी जीवन के प्रति एक पिता की यह सोच गलत भी नहीं थी. खैर, पति जैसा भी था, उस का जीवनसाथी था. गीता से वह बहुत प्यार करता था. दोनों की जीवन नैया आहिस्ताआहिस्ता चलने लगी. धीरेधीरे गीता 3 बच्चों की मां बन गई. 3 बच्चों की मां बनने के बाद भी उस की शारीरिक बनावट को देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह 3 बच्चों की जन्म दे चुकी है.

उमेशकांत के बचपन का एक दोस्त उसी गांव में रहता था, जिस का नाम अरमान मियां था. वह गबरू जवान था. उस का आनाजाना घर के भीतर तक था. दोस्त की बीवी को वह भाभी कह कर बुलाता था और कभीकभी उस से मजाक भी कर लेता था. गीता इसे गंभीरता से नहीं लेती थी.

अरमान ने जब से दोस्त की पत्नी को देखा था, उस पर उस का दिल आ गया था. गीता भी अरमान के कसरती और सुडौल बदन को देख कर उस पर मर मिटी थी. जल्दी ही दोनों के संबंध बन गए. उमेशकांत भले ही शरीर से विकलांग था, लेकिन आंख से अंधा या कान से बहरा नहीं था.

उसे पत्नी और दगाबाज दोस्त की घिनौनी करतूतों का पता चला तो वह गुस्से से लाल हो उठा. उस ने पत्नी को समझाया कि वह अपनी हरकतों से बाज आए. लेकिन अरमान के प्यार में अंधी गीता को न तो पति की बात सुनाई दी और न ही उस की नसीहत का कोई असर हुआ. इसी बात को ले कर उमेश पत्नी से नाराज रहता था.

गीता और अरमान के अवैध संबंधों से परेशान हो कर उमेशकांत पत्नी गीता और बच्चों को ले कर ससुराल तरेगना डीह आ गया और वहीं पर परिवार के साथ रहने लगा. धीरेधीरे बच्चे बड़े होते गए. इस बीच उस के बडे़ बेटे को बैंक में नौकरी मिल गई और वह चुनार चला गया. बेटी पूनम की खाजेकलां के रंजन कुमार से शादी हो गई थी. छोटी बेटी को उस ने पढ़ाई के लिए परिवार से दूर भेज दिया था.

इस के बावजूद गीता में बदलाव नहीं आया था. वह अरमान से मिलने जमसौर चली जाती थी. इस बात को ले कर पतिपत्नी में विवाद काफी बढ़ गया था. फिर भी गीता ने अरमान को नहीं छोड़ा. अरमान की वजह से उमेशकांत की बसी बसाई गृहस्थी उजड़ गई थी. दोनों सिर्फ रिश्तों के पतिपत्नी रह गए थे.

गीता के मायके में रहने के दौरान अरमान का वहां भी आनाजाना लगा रहा. इस से परेशान हो कर उमेशकांत बेटी पूनम को ले कर कुसुमपुरम कालोनी में किराए का कमरा ले कर रहने लगा. पूनम पिता की तकलीफ को समझती थी. वह मां के चालचलन को भी अच्छी तरह जानती थी. दामाद रंजन भी ससुर के साथ ही खड़ा रहता था.

गीता हर महीने के आखिरी दिन कुसुमपुरम कालोनी वाले घर आती और जबरन पति की सारी तनख्वाह ले कर चली जाती. उस में से आधी रकम वह खुद रखती और आधी अपने आशिक को दे देती.

वह मायके में ही मांबाप के साथ रह रही थी. इस बात से उमेशकांत और पूनम उस से काफी नाराज थे. पत्नी की हरकतों से आजिज आया उमेशकांत समझ नहीं पा रहा था कि इस मुसीबत से हमेशा के लिए कैसे पीछा छुड़ाए. इस बारे में उस ने बेटी पूनम और दामाद रंजन से बात की. बेटी और दामाद भी गीता की हरकतों से आजिज आ चुके थे. वे भी उस से पीछा छुड़ाना चाहते थे.

दामाद रंजन ने ससुर को भरोसा दिलाया कि वह परेशान न हों. इस मुसीबत से छुटकारा पाने का वह कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेगा. रंजन आपराधिक सीरियल बड़े चाव से देखा करता था.

सीरियल देख कर ही उस ने सास को रास्ते से हटाने की योजना बनाई. उस की योजना यह थी कि सास की हत्या कर के उस के शरीर के छोटेछोटे टुकड़े किए जाएं और बैग में भर कर उसे ट्रेन में डाल दिया जाए. उस के बाद सारा खेल ही खत्म हो जाएगा.

रंजन ने सास की हत्या की फूलप्रूफ योजना बना डाली. उस ने इस योजना के बारे में अपने ससुर उमेशकांत को भी बता दिया. उमेशकांत पत्नी से खुद इतना आजिज आ चुका था कि अब उसे उस के नाम से भी घृणा हो गई थी. वह चाहता था कि जितनी जल्दी हो सके, गीता नाम की बला से मुक्ति मिल जाए. उस ने हां कर दी.

रंजन चौधरी इस योजना को अकेला अंजाम नहीं दे सकता था. उसे एक ऐसे सहयोगी की जरूरत थी, जो उस का साथ भी दे और इस राज को अपने सीने में दफन भी रखे.

ऐसे में उसे अपने ही गांव का बचपन का साथी और कारोबारी पार्टनर राजेश याद आया. वह उस का हमराज था. उस ने 20 हजार रुपए का लालच दे कर उसे अपनी योजना में शामिल कर लिया. राजेश शादीविवाह में किराए पर जनरेटर चलाता था. रंजन उस के धंधे में बराबर का सहयोगी था.

योजना के मुताबिक, 17 अप्रैल 2017 को पूनम ने मां को फोन किया और विश्वास में ले कर उसे चिकन की दावत पर कुसुमपुरम वाले किराए के मकान पर बुलाया. दोपहर बाद गीता मायके से कुसुमपुरम पहुंच गई. घर से निकलते समय उस ने किसी को कुछ नहीं बताया था कि वह कहां जा रही है. जब वह बेटी के घर पहुंची तो वहां पूनम के अलावा उमेशकांत और दामाद रंजन भी मौजूद थे. थोड़ी देर चारों हंसीठिठोली करते रहे, ताकि गीता को शक न हो.

पूनम मां को रंजन से बातचीत करने को कह कर किचन में चली गई. उमेशकांत भी बेटी के पीछेपीछे हो लिया. उमेशकांत ने पहले ही नींद की दवा मंगा कर रख ली थी.

पूनम कटोरी में मीट और थाली में चावल परोस कर ले आई. नींद की 10 गोलियां पीस कर उस ने अच्छी तरह मीट की कटोरी में मिला दी थीं. पूनम ने मां को खाना खिलाया. खाना खाने के थोड़ी देर बाद गीता का सिर भारी होने लगा और उसे नींद आ गई. गोलियों ने अपना असर दिखा दिया था.

गीता के बेहोश होते ही पूनम, रंजन और उमेशकांत सक्रिय हो गए. योजना के अनुसार, रंजन ने उमेशकांत और पूनम को वहां से खाजेकलां भेज दिया, जहां उस का पुश्तैनी मकान था. इस के बाद रंजन ने खाजेकलां से अपने दोस्त राजेश को कुसुमपुरम बुला लिया. वह रात 9 बजे के करीब कुसुमपुरम आ गया.

बेहोश गीता को जब होश आया तो वह उल्टियां करने लगी. रंजन और उस का दोस्त राजेश आगे के कमरे में बैठे टीवी देख रहे थे. गीता समझ गई कि बेटी, पति और दामाद ने मिल कर उस के साथ धोखा किया है. बात समझ में आते ही वह अपने फोन से अरमान को फोन कर के सारी बातें बताने लगी.

रंजन ने सास को फोन करते सुन लिया. वह घबरा गया कि कहीं उन की योजना पर पानी न फिर जाए. वह दौड़ कर सास के पास पहुंचा और उस के हाथों से फोन छीन लिया. फोन छीनते समय दोनों के बीच गुत्थमगुत्था भी हुई, तब तक राजेश भी आ गया था.

रंजन ने सास को उठा कर बैड पर पटक दिया. राजेश ने उस के दोनों पैर पकड़ लिए और रंजन ने उस का गला घोंट कर हत्या कर दी. रंजन ने सास का मोबाइल फोन ले कर उसे स्विच्ड औफ कर दिया, ताकि कोई उस से संपर्क करने की कोशिश न कर सके. बाद में उस ने हथौड़ी से फोन का चूरा कर के नाले में फेंक दिया.

जब रंजन और राजेश दोनों को यकीन हो गया कि गीता मर चुकी है तो उन्होंने लाश को बैडरूम से निकाल कर बरामदे में रखी चौकी पर रख दिया. रंजन पहले ही लोहा काटने वाले 2 ब्लेड और 1 गड़ासा खरीद लाया था, वह कमरे से गड़ासा ले आया और उसी से उस ने गीता का गला काट दिया. उस ने एक बड़ा टब चौकी के नीचे रख दिया था, ताकि घर में खून न फैले. टब में खून जमा हो गया तो वह उसे बाथरूम में फेंक आया. बाथरूम में कई बाल्टी पानी गिरा कर उस ने खून नाली में बहा दिया.

धड़ को सिर से अलग करने के बाद रंजन और राजेश ने मिल कर गीता के दोनों पैरों के 6, दोनों हाथों के 6 और धड़ के कमर के बीच से 3 टुकड़े यानी कुल मिला कर 15 टुकड़े किए. योजना के अनुसार, पहले से खरीद कर लाए गए 2 बड़े लैदर के बैगों में हाथ और पैरों के टुकड़े भर दिए.

कटे सिर और धारदार हथियारों को रंजन ने फ्लैक्स के टुकड़े में लपेट दिया और उसे काले रंग की बड़ी सी पौलीथिन में रख दिया. यह सब करने में उन्हें ढाई घंटे का समय लगा. लाश के टुकड़ों को बैग में भरने के बाद दोनों बाथरूम में गए और शरीर पर लगे खून को अच्छी तरह साफ किया. इस के बाद दोनों ने बड़ी सफाई से सारे सबूत मिटा दिए. तब तक सुबह हो गई थी.

योजना के अनुसार, रंजन और राकेश को 18 अप्रैल को दोपहर के डेढ़ बजे एकएक बैग ले कर पटना-गया पैसेंजर ट्रेन में चढ़ना था. उन्होंने ऐसा ही किया और इत्मीनान से सीट पर बैठ गए. दोनों बैगों को उन्होंने ऊपर वाली सीट पर कोने में रख दिया. फिर पुनपुन स्टेशन पर उतर कर दोनों घर लौट आए. उन बैगों को उसी दिन रात में गया जंक्शन पर जीआरपी ने बरामद किया था.

अगले दिन 19 अप्रैल को रंजन और राजेश ने जक्कनपुर स्टेशन के बीच गुमटी के पास गीता का कटा हुआ सिर और रेलवे ट्रैक पर फ्लैक्स में लिपटे धारदार हथियार फेंक दिए.  फिर रात में ही धड़ और कमर के बीच से किए गए टुकड़ों को उन्होंने बोरे में भर कर कालोनी से दूर नाले में फेंक दिया. 20 अप्रैल को जक्कनपुर और परसा बाजार पुलिस ने सिर और धड़ बरामद कर लिए.

बहरहाल, रंजन चौधरी ने फूलप्रूफ योजना बनाई थी. हर चालाक कातिल की तरह उस से भी एक चूक यह हो गई थी कि उस ने धारदार हथियारों को फ्लैक्स में लपेट कर फेंका था. फ्लैक्स के ऊपर पता लिखा था. उस पते के आधार पर ही पुलिस टुकड़ों में बंटी गीता के कातिलों तक पहुंच गई और सनसनीखेज हत्या से परदा उठा दिया. इस मामले में अरमान मियां से भी पूछताछ की गई, लेकिन निर्दोष पाए जाने पर उसे छोड़ दिया गया.

कथा लिखे जाने तक गिरफ्तार किए गए चारों आरोपियों उमेशकांत, पूनम, राजेश जमानत पर जेल से बाहर आ गए थे. फरार चल रहा रंजन चौधरी गिरफ्तार कर लिया गया था. पुलिस ने चारों आरोपियों के खिलाफ न्यायालय में आरोपपत्र दाखिल कर दिया था. राजेश और रंजन अभी भी जेल में हैं. पति, बेटी और दामाद को अपने किए पर जरा भी अफसोस नहीं है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सुहागरात का थप्पड़ : शादी के 25 दिन बाद ही मारा गया मनीष

सुहागरात जिंदगी की ऐसी रात है कि शादी के पहले जहां युवा इस के खयालों में खोए रहते हैं, वहीं शादी के बाद इस की यादों में. यही वजह है कि हर दंपति इसे यादगार  बनाना चाहता है. प्रथम परिचय, पहले अभिसार और दांपत्य की बुनियाद सुहागरात, नीरस और उबाऊ लोगों को भी गुदगुदा जाती है. फिर मनीष तो 22 साल का नौजवान था. वह इस रात का तब से इंतजार कर रहा था, जिस दिन उस की शादी तय हुई थी.

शाम से ही उस के जीजा और भाभियां सुहागरात का कमरा सजाते हुए उस से हंसीमजाक भी कर रहे थे. घर में सब से छोटा होने की वजह से उसे तमाम नसीहतें भी मिल रही थीं, जिस से उसे चिढ़ सी हो रही थी. एक तो वह शादी के उबाऊ रीतिरिवाजों से वैसे ही तंग था, दूसरे पंडित की वजह से 2 दिन गुजर जाने के बाद भी वह पत्नी पूजा के पास नहीं जा सका था. सिर्फ उस के पायलों की छनछनाहट और चूडि़यों की खनखनाहट ही उस तक पहुंच सकी थी.

उतरती मई की भीषण गर्मी से बेखबर मनीष बेचैनी से रात होने का इंतजार कर रहा था. जनवरी में उस की और पूजा की सगाई हुई थी. तभी से उस का चेहरा उस की आंखों के सामने नाच रहा था. अब जब मिलन की घड़ी नजदीक आई तो ये जीजा और भाभियां बेवजह समय बरबाद कर रहे थे.

जैसेतैसे वह घड़ी आ ही गई. भाभियों ने उसे बुला कर सुहागकक्ष में धकेल दिया. कमरे के अंदर जाते ही मनीष ने पहला काम लाइट बुझाने का किया तो बाहर से भाभियों के हंसने के साथ आवाज आई, ‘‘लाला, अंधेरे में दुलहन का चेहरा कैसे दिखेगा?’’

कहीं ऐसा न हो कि भाभियां दरवाजे से कान सटाए मजे लेने की सोच रही हों, इसलिए मनीष कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा. जब उसे लगा कि बाहर कोई नहीं है तो वह उस पलंग की ओर बढ़ा, जिस पर दुलहन पूजा सिमटी गठरी सी बनी बैठी थी.

पूजा का क्या हाल है, यह उसे पता नहीं था. लेकिन उस का दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था. किसी तरह उसे काबू में कर के वह पलंग पर जा कर बैठ गया और पूजा की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगा.

पूजा उसी तरह सिर झुकाए चुपचाप बैठी रही. लड़कियां कितनी भी पढ़ीलिखी और आधुनिक क्यों न हो जाएं, वे इस रात को शरमाती ही हैं. यह मनीष को पता था, इसलिए उस ने पहल करते हुए पूजा की ओर हाथ बढ़ाया तो वह इस तरह चौंक कर पीछे हट गई, मानो करंट लगा हो. मनीष ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

जवाब में पूजा कुछ नहीं बोली तो मनीष ने अगला सवाल किया, ‘‘कोई परेशानी है क्या?’’

‘‘नहीं.’’ पूजा ने धीमे से संक्षिप्त सा जवाब दिया.

मनीष की जान में जान आई कि चलो जवाब तो मिला. उस ने पूछा, ‘‘तो फिर क्या हुआ?’’

‘‘कुछ नहीं, मैं इस सब के लिए अभी तैयार नहीं हूं.’’ पूजा ने कहा.

पूजा की बात का मतलब समझ कर मनीष ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘मैं कहां तुम्हें खाए जा रहा हूं. वैसे भी यह रात बातों के लिए बनी है. वह तो जिंदगी भर होता रहेगा.’’

इतना कह कर मनीष ने पूजा का हाथ पकड़ा तो उस ने उस का हाथ झटक दिया. पत्नी की इस हरकत से उस का माथा ठनका. उस ने थोड़ा गुस्से से पूछा, ‘‘आखिर बात क्या है?’’

‘‘आप मुझे छू भी नहीं सकते.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘बस यूं ही.’’

‘‘कोई तो बात होगी. मेरी तुम से शादी हुई है, इसलिए तुम्हें छूने का मेरा हक बनता है. अगर कोई बात है तो बताओ?’’ मनीष ने व्यग्रता से कहा.

जवाब में पूजा कुछ नहीं बोली तो मनीष झल्ला उठा. पूजा की बेरुखी से उस के सुहागरात के सारे अरमान झुलस गए थे. वह यह सोच सोच कर हलकान होने लगा कि पूजा उसे छूने क्यों नहीं दे रही है. यह बात उस की मर्दानगी और वजूद को ललकार रही थी. इसलिए उस ने एक बार फिर थोड़ा गुस्से से पूजा का हाथ पकड़ने की कोशिश की तो इस बार पूजा ने भी थोड़ा गुस्से से उस का हाथ और जोर से झटक दिया.

चटाक की आवाज के साथ एक जोरदार तमाचा पूजा के गाल पर पड़ा. जहां चुंबन जड़ा जाना चाहिए था, वहां तमाचा जड़ दिया गया था. थप्पड़ की वह आवाज कूलर के शोर में दब गई थी. लेकिन इस से इस बात का खुलासा हो गया था कि पूजा पति को शरीर सौंपने की कौन कहे, छूने तक नहीं देना चाहती.

निराश मनीष पलंग पर दूसरी ओर मुंह कर के लेट गया. उस के सारे अरमान मिट्टी में मिल गए थे. लेकिन मन के किसी कोने में अभी भी एक आस थी कि पूजा शायद हंसते हुए कहेगी कि ‘क्या हुआ यार? मैं तो मजाक कर रही थी. जबकि तुम सीरियस हो गए.’

लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. उस का दिल टूट चुका था, पर दिमाग दुरुस्त था. उस समय उस की समझ और धैर्य दाद देने लायक थी. वह एकदम से किसी नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहता था. लेकिन दाल में कुछ काला है, यह वह जरूर समझ गया था. कुछ ही देर में वह बेचैन और बेबस नए पति की जगह एक गंभीर युवक बन गया था.

मनीष के पिता सीताराम मीणा का अपने सीहोर रोड स्थित गांव भैंसाखेड़ा में ही नहीं, पूरे मीणा समाज में खासा रसूख था. उन की गिनती इलाके के संपन्न किसानों में होती थी. इस के अलावा उन की अच्छीखासी चलती दूध की डेयरी भी थी. डेयरी की जिम्मेदारी मनीष ही संभालता था. उस के चाचा परशुराम मीणा का नाम कौन नहीं जानता. वह राज्य के गृहमंत्री बाबूलाल गौर के बहैसियत विधायक ग्रामीण प्रतिनिधि हैं और भाजपा से पार्षद भी रह चुके हैं.

4 भाईबहनों में सबसे छोटे मनीष ने पढ़ाई लिखाई में कोई कसर नहीं रखी. लेकिन कमउम्र में ही उसे खेतीकिसानी, खास कर डेयरी में रुचि जाग उठी थी, इसलिए नौकरी के बारे में उस ने सोचा ही नहीं.

मीणाओं में लड़के लड़कियों की शादी कमउम्र में ही कर दी जाती थी. लेकिन अब समय थोड़ा बदल गया है. मनीष जब खेती किसानी में रम गया और उम्र भी शादी लायक हो गई तो उस के पिता ने उस की शादी अपने दोस्त की बेटी पूजा से तय कर दी.

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ससुराल के बारे में मनीष सिर्फ इतना जानता था कि वे लोग भी उसी की तरह संपन्न किसान हैं. इस के अलावा उस के ससुर एक सरकारी स्कूल में शिक्षक थे. उस ने रिश्तेदारों से यह भी सुन रखा था कि उस की होने वाली पत्नी बहुत खूबसूरत है.

जनवरी में पूजा से उस की सगाई हुई और 29 मई को शादी. 30 मई को मनीष पूजा को दुलहन बना कर अपने घर ले आया.

पूजा के बारे में ही सोचते सोचते मनीष की आंख लग गई थी. आंख खुली तो उसे लगा शायद सुबह होने वाली है. उस ने पलट कर पूजा की ओर देखा. वह अब भी जाग रही थी.

सुहागरात को पत्नी को थप्पड़ का तोहफा दे कर मनीष बिलकुल खुश नहीं था. लेकिन उस ने बरताव ही ऐसा किया कि वह खुद को रोक नहीं पाया. उसे उठता देख पूजा भी उठ बैठी. बाहर जाते हुए उस ने पूजा से कहा, ‘‘आज तुम्हारी विदाई है. लेकिन अब जब भी आना, खुल कर बात करना, वरना मेरे घर वालों को तुम्हारे घर वालों से बात करनी पड़ेगी.’’

‘‘ठीक है.’’ पूजा ने कहा, ‘‘लेकिन इस के लिए मुझे थोड़ा समय चाहिए.’’

‘‘तुम्हारे आने तक मैं खामोश रहूंगा.’’ कह कर मनीष चला गया.

पूजा विदा हो कर मायके आ गई. पत्नी के व्यवहार से मनीष गुमसुम और उदास रहने लगा था, जिसे घर वालों ने पूजा की याद समझा. कोई भी उस के दिल की व्यथा नहीं समझ सका. बात भी ऐसी थी, जिसे वह किसी से कह भी नहीं सकता था. 2-4 दिनों बाद घर वालों की बातचीत से पता चला कि 25 जून को वे पूजा को विदा कराने जाएंगे. पूजा की विदाई के बारे में जान कर उस का दिल धड़का जरूर, लेकिन पत्नी के आने की जो खुशी किसी के मन में होती है, वह कहीं भी नही ंथी.

घर वाले 25 जून को पूजा को विदा करा ले आए. उस दिन रिवाज के अनुसार घर में पूजापाठ का आयोजन था. उस आयोजन में काफी लोगों को बुलाया गया था. इसलिए घर में काफी चहलपहल थी.

उस दिन मनीष सुबह ही अपनी भैंसों को ले कर जंगल की ओर चला गया था. क्योंकि घर में पूजा होने की वजह से दोपहर को उसे जल्दी वापस आना था.

दोपहर बाद होने वाली पूजा में उस की मौजूदगी जरूरी थी. वह भैंसों को ले कर कुछ ही दूर गया था कि उस के मोबाइल फोन की घंटी बजी. स्क्रीन पर उभरा नंबर पूजा के फुफेरे भाई संदीप का था, इस से उसे लगा कि पूजा ने ही कोई संदेश भिजवाया होगा. उस ने फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से संदीप ने कहा, ‘‘जीजाजी, आप बैरागढ़ आ जाइए, कुछ जरूरी बात करनी है.’’

मनीष ने यह भी नहीं पूछा कि क्या बात करनी है. उस ने अपनी भैंसें चचेरे भाई के हवाले कीं और खुद बैरागढ़ की ओर चल पड़ा. वह कुछ ही दूर गया था कि रास्ते में बीनापुर निवासी वीरेंद्र अपनी एसयूवी कार लिए मिल गया.

वीरेंद्र को वह जानता था. वह संदीप का दोस्त भी था और  रिश्तेदार भी. पूजा के यहां भी उस की रिश्तेदारी थी. वीरेंद्र ने कहा कि संदीप यहीं आ रहा है तो वह वहीं रुक गया. इस के बाद वीरेंद्र ने उसे अपनी कार में रखी माजा की बोतल निकाल कर थमा दी. दूसरी एक बोतल निकाल कर उस ने खुद खोल ली. दोनों माजा पीते हुए बातचीत करने लगे.

दूसरी ओर सुबह का गया मनीष दोपहर तक घर नहीं लौटा तो घर वाले नाराज होने लगे कि कम से कम आज तो उसे जल्दी आ जाना चाहिए था. परेशानी की बात यह थी कि एक तो उस का फोन बंद था, दूसरे वह किसी को कुछ बता कर नहीं गया था.

इंतजार करतेकरते शाम और फिर रात हो गई और मनीष लौट कर नहीं आया तो घर वालों की नाराजगी चिंता में बदल गई. उस की तलाश शुरू हुई. जब उस के बारे में कहीं से कोई खबर नहीं मिली तो देर रात उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट थाना खजूरी सड़क में दर्ज करा दी गई.

पूजा में आए ज्यादातर लोग वापस चले गए थे. सभी की नजरें पूजा पर टिकी थीं कि वह पति के लिए परेशान है. जबकि सही बात यह थी कि सिर्फ वही जानती थी कि इस समय मनीष कहां है और अब वह कभी वापस नहीं आएगा. दोपहर को ही उस के मोबाइल पर मैसेज आ गया था कि काम हो गया है. यानी मनीष की हत्या हो चुकी है.

मनीष के घर वालों ने वह रात आंखों में काटी. सुबह घर वाले उस की तलाश में निकलते, उस के पहले ही थाने से खबर आ गई कि मनीष की लाश बरामद हो गई है. यह खबर मिलते ही घर में कोहराम मच गया. रोनापीटना सुन कर पूरा गांव सीताराम के घर इकट्ठा हो गया.

थाना खजूरी सड़क के थानाप्रभारी एन.एस. रघुवंशी ने गांव वालों की सूचना पर कोल्हूखेड़ी के जंगल से मनीष की लाश बरामद की थी. लाश की शिनाख्त तुरंत हो गई थी. उस की गुमशुदगी दर्ज ही थी, इसलिए तुरंत उन्होंने लाश बरामद होने की जानकारी उस के घर वालों को दे दी थी.

एक कद्दावर भाजपाई नेता के भतीजे की हत्या की सूचना पा कर पुलिस अधिकारी भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. लाश देख कर ही लगता था कि उस की हत्या गला दबा कर कहीं दूसरी जगह की गई थी. सुबूत मिटाने और पुलिस को चकमा देने के लिए लाश यहां ला कर फेंकी गई थी.

शुरुआती पूछताछ में यह उजागर हो गया था कि मनीष में न कोई ऐब था, न किसी से उस की रंजिश थी. तब किसी ने उस की हत्या क्यों की, पुलिस की यह समझ में नहीं आ रहा था.

लेकिन पुलिस को जब पता चला कि मनीष की अभी जल्दी ही शादी हुई है तो पुलिस का ध्यान तुरंत उस की नवविवाहिता पत्नी पूजा पर गया. पुलिस अधीक्षक अरविंद सक्सेना ने मनीष और पूजा के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवा ली. इस काल डिटेल्स से पता चला कि शादी के बाद पूजा 25 दिन मायके में रही और इस बीच मनीष से उस की एक भी बार बात नहीं हुई. जबकि एक अन्य नंबर पर पूजा ने इन्हीं 25 दिनों में 470 बार बात की थी. पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह नंबर पूजा के बीनापुर निवासी एक रिश्तेदार वीरेंद्र मीणा का था.

इस के बाद मनीष की हत्या का राज खुलने में देर नहीं लगी. पुलिस ने वीरेद्र को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर वीरेंद्र से पूछताछ की गई तो उस ने तुरंत मनीष की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने बताया, ‘‘मांजा की बोतल में मैं ने नींद की गोलियां घोल कर मनीष को पिला दी थीं. जब वह बेहोश होने लगा तो मैं ने अंगौछे से उस का गला घोंट दिया. उस के बाद संदीप की मदद से उस की लाश को ले जा कर कोल्हूखेड़ी के जंगल के रास्ते पर फेंक दिया था.’’

वीरेंद्र मीणा ने पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में मनीष की हत्या के पीछे की जो कहानी सुनाई थी, वह इस प्रकार थी.

वीरेंद्र और पूजा एकदूसरे को प्यार करते थे. यह सिलसिला तकरीबन 4 सालों से चला आ रहा था. भोपाल के करौंद में समाज के एक धार्मिक समारोह में दोनों की मुलाकात हुई तो उसी पहली मुलाकात में दोनों एकदूसरे को दिल दे बैठे थे.

इन के प्यार की मध्यस्था कर रहा था पूजा का फुफेरा भाई संदीप. वही दोनों के मिलनेजुलने की व्यवस्था करता था. वीरेंद्र और संदीप आपस में रिश्तेदार थे. संदीप पूजा का भाई था, इसलिए उस पर कोई शक नहीं करता था कि वह बहन को ले जा कर उस के प्रेमी वीरेंद्र को सौंपता होगा.

वीरेंद्र होनहार भी था और स्मार्ट भी. वह आईएएस की तैयारी कर रहा था. इस के लिए उस ने दिल्ली जा कर कोचिंग भी की थी. स्नातक भी उस ने जालंधर विश्वविद्यालय से किया था. बड़े शहरों में रहने की वजह से वह रहता भी ठाठ से था. खानदानी रईस था ही.

पूजा और वीरेंद्र का प्यार परवान चढ़ा तो शादी की भी बात चली. लेकिन पूजा के पिता ने इस शादी के लिए साफ मना कर दिया. क्योंकि वीरेंद्र उन का दूर का रिश्तेदार था. इस के बावजूद पूजा और वीरेद्र ने हिम्मत नहीं हारी. उन्हें उम्मीद थी कि आज नहीं तो कल, घर वाले जरूर मान जाएंगे.

लेकिन जब पूजा के पिता ने उस की शादी अपने दोस्त के बेटे मनीष से तय कर दी तो उन की उम्मीद पर पानी फिर गया. पूजा शादी के लिए मना नहीं कर पाई, लेकिन उस ने वीरेंद्र को भरोसा दिलाया कि वह जब तक जिंदा रहेगी, तनमन से उसी की रहेगी. चाहे वह पति ही क्यों न हो, कोई उसे छू नहीं पाएगा.

ऐसा हुआ भी. पूजा ने सचमुच मनीष को हाथ नहीं लगाने दिया था. सुहागरात को थप्पड़ वाली बात उस ने वीरेंद्र को बताई तो उस का खून खौल उठा. उस ने उसी समय कसम खाई कि मनीष दोबारा पूजा को हाथ लगाए, उस के पहले ही वह उस की हत्या कर देगा.

वीरेंद्र, पूजा और संदीप, तीनों ही हमउम्र थे. वीरेंद्र संपन्न परिवार का था और उस के पास एक्सयूवी कार भी थी. उस का बहुत बड़ा मकान था और फिल्मी हीरो जैसे लटकेझटके भी. इसलिए पूजा को मनीष रास नहीं आया था. उसे वह डेयरी वाला नहीं, बल्कि भैंसों के तबेले वाला नौकर लगता था.

तीनों का सोचना था कि मनीष की हत्या के बाद पूजा विधवा हो जाएगी. उस के कुछ दिनों बाद वीरेंद्र उस से शादी कर लेगा. क्योंकि मीणा समाज में आज भी विधवा से जल्दी कोई शादी नहीं करता. पूजा के सपने बड़े थे, इसीलिए उस के इरादे खतरनाक हो गए थे. मनीष के हाथों थप्पड़ खा कर वह नागिन सी फुफकार उठी थी.

वीरेंद्र के बयान के आधार पर पुलिस ने पूजा और संदीप को भी गिरफ्तार कर लिया था. पूछताछ में उन दोनों ने अपनाअपना अपराध स्वीकार कर लिया था. पूजा का तो कहना था कि वह भले ही जेल में रहेगी, लेकिन अपने प्रेमी के साथ एक छत के नीचे तो रहेगी. पूछताछ के बाद पुलिस ने तीनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया था.

वीरेंद्र और पूजा के प्यार और साजिश की बलि चढ़ा बेचारा मनीष, जिस का गुनाह सिर्फ यह था कि वह दुनियादारी से ज्यादा वाकिफ नहीं था. वह शादी के पहले ही पत्नी को प्यार करने लगा था.

दरअसल, मीणा समाज में लड़कियों को जो आजादी मिली है, वह फैशनेबल कपड़े पहनने और कौस्मेटिक सामान खरीदने तक ही सीमित है. वे निजी फैसले नहीं ले सकतीं. अगर पूजा अपने पिता के फैसले का डट कर विरोध करती तो शायद खुद भी गुनाह से बच जाती और वीरेंद्र को भी बचा लेती. उस की बेवकूफी 3 परिवारों को ले डूबी.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित