महामिलन : दो जिस्म एक जान थे वो – भाग 2

राखावास में देवल, राठौर, नाड़ीबट्ट और नट आदि कई जातियों के लोग रहते थे. मौली और मानू दोनों ही नट जाति के थे. दोनों साथसाथ खेलतेकूदते बड़े हुए थे. दोनों के परिवारों का एक ही पेशा था—नाचगाना और भेड़बकरियां पालना.

मानू के पिता की झील में डूबने से मौत हो गई थी. घर में मां के अलावा कोई नहीं था. जब यह हादसा हुआ, मानू कुल 9 साल का था. पिता की मौत के बाद मां ने कसम खा ली कि वह अब जिंदगी भर न नाचेगी, न गाएगी. घर में 10-12 भेड़बकरियों के अलावा आमदनी का कोई साधन नहीं था. भेड़बकरियां मांबेटे का पेट कैसे भरतीं? फलस्वरूप घर में रोटियों के लाले पड़ने लगे. मानू को कई बार जंगली झरबेरियों के बेर खा कर दिन भर भेड़बकरियों के पीछे घूमना पड़ता.

मौली बचपन से मानू के साथ रही थी. वह उस का दर्द समझती थी. उसे मालूम था, मानू कितना चाहता है उसे. कैसे अपने बदन को जख्मी कर के झरबेरियों से कुर्ते की झोली भरभर लाल लाल बेर लाता था उस के लिए और बकरियों के पीछे भागतेदौड़ते उस के पांव में कांटा भी चुभ जाता था तो कैसे तड़प उठता था वह. खून और दर्द रोकने के लिए उस के गंदे पांवों के घाव पर मुंह तक रखने से परहेज नहीं करता था वह.

कोई अमीर परिवार मौली का भी नहीं था. बस, जैसेतैसे रोजीरोटी चल रही थी. मौली को जो भी घर में खाने को मिलता, उसे वह अकेली कभी नहीं खाती. बहाना बना कर भेड़बकरियों के पीछे साथ ले जाती. फिर किसी बड़े पत्थर पर बैठ कर अपने हाथों से मानू को खिलाती. मानू कभी कहता, ‘‘मेरे नसीब में भूख लिखी है. मेरे लिए तू क्यों भूखी रहती है?’’

तो मौली उस के कंधे पर हाथ रख कर, उस की आंखों में झांकते हुए कहती, ‘‘मेरी आधी भूख तुझे देख कर भाग जाती है और आधी रोटी खा कर. मैं भूखी कहां रहती हूं मानू.’’

इसी तरह भेड़बकरियां चराते, पहाड़ी ढलानों पर उछलकूद मचाते मानू 14 साल का हो गया था और मौली 12 साल की. दुनियादारी को थोड़ाबहुत समझने लगे थे दोनों. इस बीच मानू की मां उस के पिता की मौत के गम को भूल चुकी थी. उस ने गांव के ही एक दूसरे आदमी का हाथ थाम कर अपनी दुनिया आबाद कर ली थी. सौतेला बाप मानू को भी साथ रखने को तैयार था, लेकिन उस ने इनकार कर दिया.

मानू और मौली जानते थे, नाचगाना उन का खानदानी पेशा है. थोड़ा और बड़ा होने पर उन्हें यही पेशा अपनाना पड़ेगा. उन्हें यह भी मालूम था कि उन के यहां जो अच्छे नाचनेगाने वाले होते हैं, उन्हें राज दरबार में जगह मिल जाती है. ऐसे लोगों को धनधान्य की कमी नहीं रहती. हकीकतों से अनभिज्ञ वे दोनों सोचते, बड़े हो कर वे भी कोशिश करेंगे कि उन्हें राज दरबार में जगह मिल जाए.

एक दिन बकरियों के पीछे दौड़ते, पत्थर से टकरा कर मौली का पांव बुरी तरह घायल हो गया. मानू ने खून बहते देखा तो कलेजा धक से रह गया. उस ने झट से अपना कुरता उतार कर खून पोंछा. लेकिन खून था कि रुकने का नाम नहीं ले रहा था. मानू का पूरा कुरता खून से तर हो गया, पर खून नहीं रुका. चोट मौली के पैर में लगी थी, पर दर्द मानू के चेहरे पर झलक रहा था.

उसे परेशान देख मौली बोली, ‘‘कुरता खून में रंग दिया, अब पहनेगा क्या?’’

हमेशा की तरह मानू के चेहरे पर दर्द भरी मुसकान तैर आई. वह खून रोकने का प्रयास करते हुए दुखी स्वर में बोला, ‘‘कुरता तेरे पांव से कीमती नहीं है. 10-5 दिन नंगा रह लूंगा तो मर नहीं जाऊंगा.’’

काफी कोशिशों के बाद भी खून बंद नहीं हुआ तो मानू मौली को कंधे पर डाल कर झील के किनारे ले गया. मौली को पत्थर पर बैठा कर उस ने झील के पानी से उस का पैर धोया. आसपास झील का पानी सुर्ख हो गया, पर खून था कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था. कुछ नहीं सूझा तो मानू ने अपने खून सने कुरते को पानी में भिगो कर उसे फाड़ा और पट्टियां बदलबदल कर घाव पर रखने लगा.

उस की यह युक्ति कारगर रही. थोड़ी देर में मौली के घाव से खून बहना बंद हो गया. उस दिन मौली को पहली बार पता चला कि मानू उसे कितना चाहता है. मानू मौली का पांव अपनी गोद में रखे धीरेधीरे उस के घाव को सहला रहा था, ताकि दर्द कम हो जाए. तभी मौली ने उसे टोका, ‘‘खून बंद हो चुका है, मानू. दर्द भी कम हो गया. तेरे शरीर पर, धवले (लुंगी) पर खून के दाग लगे हैं. नहा कर साफ कर ले.’’

मौली का पैर थामे बैठा मानू कुछ देर शांत भाव से झील को निहारता रहा. फिर उस की ओर देख कर उद्वेलित स्वर में बोला, ‘‘झील के इस पानी में तेरा खून मिला है मौली. मैं इस झील में कभी नहीं नहाऊंगा…कभी नहीं.’’

थोड़ी देर शांत रहने के बाद मानू उस के पैर को सहलाते हुए गंभीर स्वर में बोला, ‘‘अपने ये पैर जिंदगी भर के लिए मुझे दे दे मौली. मैं इन्हें अपने हाथों से सजाऊंगा संवारूंगा.’’

‘‘मेरा सब कुछ तेरा है मानू,’’ मौली उस के कंधे पर हाथ रख कर उस की आंखों में झांकते हुए बोली, ‘‘सब कुछ. अपनी चीज को कोई खुद से मांगता है क्या?’’

पलभर के लिए मानू अवाक रह गया. उसे वही जवाब मिला था जो वह चाहता था. वह मौली की ओर देख कर बोला, ‘‘मौली, अब हम दोनों बड़े हो चुके हैं. अब और ज्यादा दिन इस तरह साथसाथ नहीं रह पाएंगे. लोग देखेंगे तो उल्टीसीधी बातें करेंगे. जबकि मैं तेरे बिना नहीं रह सकता. हमें ऐसा कुछ करना होगा, जिस से जिंदगी भर साथ न छूटे.’’

‘‘ऐसा क्या हो सकता है?’’ मौली ने परेशान से स्वर में पूछा तो मानू सोचते हुए बोला, ‘‘नाचनागाना हमारा खानदानी पेशा है न. हम वही सीखेंगे. तू नाचेगी गाएगी, मैं ढोलक बजाऊंगा. हम दोनों इस काम में ऐसी महारत हासिल करेंगे कि दो जिस्म एक जान बन जाएं. कोई हमें अलग करने की सोच भी न सके.’’

मौली खुद भी यही चाहती थी. वह मानू की बात सुन कर खुश हो गई.

मौली का पांव ठीक होने में एक पखवाड़ा लगा और मानू को दूसरा कुरता मिलने में भी. इस बीच वह पूरे समय नंगा घूमता रहा. आंधी, धूप या बरसात तक की चिंता नहीं की उस ने. उसे खुशी थी कि उस का कुरता मौली के काम तो आया.

मानू के पिता की ढफ घर में सही सलामत रखी थी. कभी उदासी और एकांत के क्षणों में बजाया करता था वह उसे. मौली का पैर ठीक हो गया तो एक दिन मानू उसी ढफ को झाड़पोंछ कर ले गया जंगल. मौली अपने घर से घुंघरू ले कर आई थी.

मानू ने एक विशाल शिला को चुन कर अपना साधनास्थल बनाया और मौली के पैरों में अपने हाथ से घुंघरू बांधे. उसी दिन से मानू की ढफ की ताल पर मौली की नृत्य साधना शुरू हुई जो अगले 2 सालों तक निर्बाध चलती रही. इस बीच ढफ और ढोलक पर मानू ने नएनए ताल ईजाद किए और मौली ने नृत्य एवं गायन की नईनई कलाएं.

अपनी अपनी कलाओं में पारंगत होने के बाद मौली और मानू ने होली के मौके पर गांव वालों के सामने अपनीअपनी कलाओं का पहला प्रदर्शन किया तो लोग हतप्रभ रह गए. उन्होंने इस से पहले न ऐसा ढोलक बजाने वाला देखा था, न ऐसी अनोखी अदाओं के  साथ नृत्य करने वाली.

कई गांव वालों ने उसी दिन भविष्यवाणी कर दी थी कि मौली और मानू की जोड़ी एक दिन राजदरबार में जा कर इस गांव का मान बढ़ाएगी.

समय के साथ मानू और मौली का भेड़बकरियां चराना छूट गया और नृत्यगायन पेशा बन गया. कुछ ही दिनों में इलाके भर में उन की धूम मच गई. आसपास के गांवों के लोग अब उन दोनों को तीजत्योहार और विवाह शादियों के अवसर पर बुलाने लगे. इस के बदले उन्हें धनधान्य भी काफी मिल जाता.

मानू ने अपनी कमाई के पैसे जोड़ कर सब से पहले मौली के लिए चांदी के घुंघरू बनवाए. वह घुंघरू मौली को सौंपते हुए बोला, ‘‘ये मेरे प्यार की पहली निशानी है. इन्हें संभाल कर रखना. लोग घुंघरुओं को नाचने वाली के पैरों की जंजीर कहते हैं, लेकिन मेरे विचार से किसी नृत्यांगना के लिए इस से बढि़या कोई तोहफा नहीं हो सकता. तुम इन्हें जंजीर मत समझना. इन घुंघरुओं को तुम्हारे पैरों में बाधूंगा भी मैं, और खोलूंगा भी मैं.’’

मौली को मानू की बात भी अच्छी लगी और तोहफा भी. उस दिन के बाद से वही हुआ जो मानू ने कहा था. मौली को जहां भी नृत्यकला का प्रदर्शन करना होता, मानू खुद उस के पैरों में घुंघरू बांध कर ढोलक पर ताल देता. ताल के साथ ही मौली के पैर थिरकने लगते. जब तक मौली नाचती, मानू की निगाह उस के पैरों पर ही जमी रहती. प्रदर्शन के बाद वही अपने हाथों से मौली के पैरों के घुंघरू खोलता.

प्यार क्या होता है, यह न मौली जानती थी, न मानू. वे तो केवल इतना जानते थे कि दोनों बने ही एकदूसरे के लिए हैं. मरेंगे तो साथ, जिएंगे तो साथ. मौली और मानू अपने प्यार की परिभाषा भले ही न जानते रहे हों, पर गांव वाले उन के अगाध प्रेम को देख जरूर जान गए थे कि वे दोनों एकदूसरे के पूरक हैं. उन्हें उन के इस प्यार पर नाज भी था. किसी ने उन के प्यार में बाधा बनने की कोशिश भी नहीं की. मौली के मातापिता तक ने नहीं.

एक बार एक पहुंचे हुए साधु घूमते घामते राखावास आए तो गांव के कुछ युवकयुवतियां उन से अपना अपना भविष्य पूछने लगे. उन में मौली भी शामिल थी. साधु बाबा उस के हाथ की लकीरें देखते ही बोले, ‘‘तेरी किस्मत में राजयोग लिखा है. किसी राजा की चहेती बनेगी तू.’’

मौली ने कभी कल्पना भी नहीं की थी, मानू से बिछड़ने की. उस के लिए वह राजयोग तो क्या, सारी दुनिया को ठोकर मार सकती थी. उस ने हड़बड़ा कर पूछा, ‘‘मेरी किस्मत में राजयोग लिखा है, तो मानू का क्या होगा बाबा? …वह तो मेरे बिना…’’

साधु बाबा पलभर आंखें बंद किए बैठे रहे. फिर आंखें खोल कर सामने की झील की ओर निहारते हुए बोले, ‘‘वह इस झील में डूब कर मरेगा.’’

मौली सन्न रह गई. लगा, जैसे धरती आकाश एक साथ हिल रहे हों. न चाहते हुए भी उस के मुंह से चीख निकल गई, ‘‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता. मैं ऐसा नहीं होने दूंगी. मुझे मानू से कोई अलग नहीं कर सकता.’’

उस की बात सुन कर साधु बाबा ठहाका लगा कर हंसे. थोड़ी देर हंसने के बाद शांत स्वर में बोले, ‘‘होनी को कौन टाल सकता है बालिके.’’

बाबा अपनी राह चले गए. मौली को लगा, जैसे उस के सीने पर सैकड़ों मन वजन का पत्थर रख गए हों. यह बात सोचसोच कर वह पागल हुई जा रही थी कि बाबा की भविष्यवाणी सच निकली, तो क्या होगा. उस दिन जब मानू मिला तो मौली उसे खींचते हुए झील किनारे ले गई और उस का हाथ अपने सिर पर रख कर बोली, ‘‘मेरी कसम खा मानू, तू आज के बाद जिंदगी भर कभी इस झील में कदम तक नहीं रखेगा.’’

मानू को मौली की यह बात बड़ी अजीब लगी. वह उस की आंखों में झांकते हुए बोला, ‘‘यह कसम तो मैं ने उसी दिन खा ली थी, जब तेरा खून इस झील के पानी में मिल गया था. फिर भी तू कहती है तो एक बार फिर कसम खा लेता हूं… पर बात क्या है? इतनी घबराई क्यों है?’’

मानू के कसम खा लेने के बाद मौली ने बाबा की बात उसे बताई तो मानू हंसते हुए बोला, ‘‘तू इतना डरती क्यों है? जब मैं झील के पानी में कभी उतरूंगा ही नहीं तो डूबूंगा कैसे? कोई जरूरी तो नहीं कि बाबा की भविष्यवाणी सच ही हो.’’

साधु की भविष्यवाणी को सालों बीत चुके थे. इस बीच मौली 17 साल की हो गई थी और मानू 19 का. दोनों ही बाबा की बात भूल चुके थे.

…और तभी शिकार से लौटते राजा समर सिंह राखावास में रुके थे.

तो क्या साधु महाराज की भविष्यवाणी सच होने वाली थी? जानने के लिए पढ़ें कहानी का अगला भाग…

मनहूस कदम : खाली न गयी मजलूम की आह

मामी का जानलेवा प्यार – भाग 2

मानवेंद्र सिंह भी बरेली के थाना फतेहगंज (पूर्वी) के गांव निकसुआ का रहने वाला था. आरती के गांव के पास ही मानवेंद्र की ननिहाल थी. वह वहीं पर रह कर पढ़ता था. उस वक्त उस की उम्र भी कम ही थी. मानवेंद्र उस वक्त कक्षा 9 में पढ़ता था. मामा के घर रहते हुए ही उस की जानपहचान आरती से हुई थी.

कुछ समय बाद ही वह जानपहचान दोस्ती में बदली और फिर जल्दी ही दोनों के बीच प्यार हो गया. दोनों ही एकदूसरे को जीजान से चाहने लगे थे. समय के साथ बात यहां तक बढ़ी कि दोनों ने शादी करने का फैसला भी ले लिया था. उन के बीच जल्दी ही शारीरिक संबंध भी बन गए थे.

उन का प्यार ज्यादा दिनों तक समाज की नजरों से छिप न सका. जैसे ही इस बात की जानकारी आरती के घर वालों को हुई तो उन्होंने आरती को समझाने के बाद उस के घर से निकलने पर पाबंदी लगा दी थी. लेकिन आरती फिर भी मानवेंद्र से मिलने का कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेती थी. वह चोरीछिपे मानवेंद्र से मिलने लगी थी. जब उस के घर वालों को लगने लगा कि वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही है तो उन्होंने कम उम्र में ही उस की शादी करने का फैसला किया, जिस से समाज में उन की नाक न कटे.

उसी दौरान घर वालों ने 2019 में आरती की शादी बरेली जिले के शिवपुरी में रहने वाले रामवीर से कर दी. शादी के बाद आरती तो अपनी ससुराल चली आई थी. लेकिन मानवेंद्र सिंह के सपने टूट गए. प्रेमिका की तड़प में उस की हालत पागलों जैसी हो गई. उस ने कभी सोचा भी नहीं था कि उस के साथ जीनेमरने का वादा करने वाली उस की प्रेमिका एक दिन उसे बीच मंझधार में छोड़ कर यूं चली जाएगी. इस के बाद भी मानवेंद्र को उम्मीद थी कि वह एक न एक दिन वापस आएगी और फिर वह उसी के साथ शादी करेगा.

अनचाहा पति था रामवीर

आरती शादी के बाद जितने दिन भी ससुराल में रही, वह खुश नहीं रही. जबकि कई बार रामवीर ने उस से उस की परेशानी का कारण पूछने की कोशिश भी की, लेकिन उस ने अपना मुंह पूरी तरह से बंद ही रखा. शादी के बाद अनचाहे पति के साथ रात काटना उस की मजबूरी बन गई थी.

उस की शादी को काफी समय हो गया, लेकिन उस के दिल में रामवीर के लिए बिलकुल भी जगह नहीं बन पाई थी. हालांकि बाद में रामवीर को भी पता चल गया था कि वह मानवेंद्र के साथ शादी करना चाहती थी, लेकिन उस के घर वालों ने उस की मरजी के बिना ही उस की शादी उस के साथ कर दी थी.

शादी के कुछ समय बाद आरती एक बच्चे की मां भी बनी, लेकिन उस बच्चे का प्यार भी उसे उस परिवार से नहीं जोड़ पाया. रामवीर को उम्मीद थी कि आरती कुछ ही दिनों में मानवेंद्र को पूरी तरह से भूल जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका.

रामवीर शादी के कुछ ही दिनों बाद दिल्ली में काम करने चला गया. उस के जाते ही आरती ने मानवेंद्र को अपने घर बुलाना शुरू कर दिया था. ससुराल वालों को मानवेंद्र का आनाजाना खलने लगा तो उन्होंने आरती की शिकायत रामवीर से की. रामवीर उस की हरकतों से पहले ही परेशान था. फिर भी उस ने आरती को समझाने की कोशिश की, लेकिन आरती उस की एक बात भी सुनने का तैयार न थी.

इस बात को ले कर आरती और रामवीर में आए दिन कहासुनी होने लगी. यही नहीं, वह हर रोज ही ससुराल वालों की नजरों से बचते बचाते फोन पर प्रेमी मानवेंद्र से बात करती रहती थी. उसी सब के चलते रामवीर और आरती में विवाद रहने लगा था.

उसी दौरान आरती एक दिन मानवेंद्र से मिली और कहा, “इस वक्त रामवीर मुझे कुछ ज्यादा ही परेशान कर रहा है. वह तुम्हारे पर शक कर के तुम से मिलने को मना करता है. अब यह सब बरदाश्त के बाहर हो गया है. तुम्हें पता है कि मैं तो तुम्हीं से शादी करना चाहती थी, लेकिन मेरे घर वालों ने मेरी शादी उस बैल के साथ कर दी. इस में मेरा तो कोई दोष है नहीं.

“मैं ने तुम से पहले ही घर से भाग कर शादी करने को कहा था. लेकिन तुम हिम्मत नहीं जुटा पाए. इस के बावजूद मैं आज तक तुम्हें ही अपना पति मानती हूं. क्या तुम अपनी पत्नी के लिए एक छोटा सा काम नहीं कर सकते.’’

आरती की बात सुन कर मानवेंद्र ने कहा, “मैं भी कई साल से तुम्हें पाने के लिए तरस रहा हूं. बताओ, मुझे तुम्हें पाने के लिए क्या करना होगा?’’

“तुम्हें पता है कि रामवीर हम दोनों की मंजिल का कांटा है. मुझे पाने के लिए तुम्हें उस कांटे को हमेशा हमेशा के लिए दूर करना होगा.’’

आरती की बात सुनते ही मानवेंद्र सहम गया. फिर पल भर में उस ने कहा, “आरती, यह सब तो मैं नहीं कर पाऊंगा. अगर तुम चाहो तो अभी भी हमारे सामने एक रास्ता है, हम दोनों घर से भाग चलते हैं. फिर कहीं भी जा कर गुजरबसर कर ही लेंगे. कुछ समय गुजरने के बाद रामवीर भी तुम्हें भूल जाएगा. फिर हम दोनों घर वापस आ जाएंगे.’’

“नहीं, मैं घर से भाग कर तुम्हारे साथ शादी नहीं कर सकती. लगता है कि तुम मुझे पहले जैसा प्यार नहीं करते. अगर मुझे आज भी पहले की तरह प्यार करते तो यह कायरों वाली भाषा नहीं बोलते. अगर तुम्हें रामवीर की हत्या भी करनी पड़ी तो कुछ समय की जेल हो जाएगी. फिर मैं ही तुम्हें जेल से बाहर निकाल लाऊंगी. क्या तुम मेरे प्यार की खातिर जेल नहीं जा सकते?

“अगर तुम मुझे आज भी थोड़ा सा प्यार करते हो तो तुम रामवीर को किसी भी तरह से खत्म कर डालो. फिर हम दोनों शादी कर लेंगे. यदि तुम यह सब नहीं कर सकते तो आज के बाद मुझ से मिलने की कोई जरूरत नहीं,’’

आरती ने मानवेंद्र को हिम्मत जुटाते हुए बताया, “तुम उस की हत्या करने से डरो नहीं. मैं तुम्हें उस की हत्या करने का एक ऐसा रास्ता बताऊंगी कि कोई भी हम पर शक नहीं कर पाएगा.’’

पत्नी जब न बनी दोस्तों का बिछौना – भाग 3

सरिता मम्मी से छिपा गई हकीकत

कुछ समय बाद सरिता मायके गई तो उस का गिरा हुआ स्वास्थ्य देख कर उस की मम्मी को दुख हुआ. शादी के

पहले सरिता का खिला हुआ गुलाब सा चेहरा किसी लंबी बीमारी के मरीज जैसा मुरझा गया था. उस की आंखों के नीचे कालेकाले घेरे भी बन गए थे.

“यह तुझे क्या हो गया बेटी?’’ सरिता की मम्मी ने उस के सिर पर हाथ फेर कर पूछा, “तुझे ससुराल में कुछ तकलीफ है क्या, जो तेरी हालत ऐसी हो गई है?’’

“नहीं मम्मी, ऐसी कोई बात नहीं है,’’ सरिता फीकी मुसकराहट चेहरे पर लाती हुई बोली, “ससुराल में तो मैं बहुत खुश हूं.’’

दरअसल, सरिता नहीं चाहती थी कि वह ससुराल वालों की घटिया आदतों का बयान कर घर वालों को दुखी करे. इसलिए वह अपने दुखों का जहर खुद ही पी गई थी.

शादी के डेढ़ साल बाद सरिता ने एक बच्ची को जन्म दिया. इस का नाम उस ने अनिका रखा. अनिका के जन्म से सरिता तो खुश थी, लेकिन सासससुर व पति खुश न थे. ये लोग चाह रहे थे कि सरिता के बेटा पैदा हो. लेकिन जब बेटी पैदा हो गई तो उमा अकसर सरिता को जलीकटी सुनाने लगी. सरिता जवाब देती तो रमन उसे रुई की तरह धुन देता.

इन्हीं दिनों रमन में एक और बुराई घर कर गई. वह दोस्तों के साथ जुआ खेलने लगा. उस ने घर में पैसे देने भी बंद कर दिए. कभीकभी तो वह फैक्ट्री में मिलने वाले सारे पैसे जुए में हार जाता, जिस से घर में कलह होती. रामपाल सासबहू के झगड़े व बेटे की मारपीट से पहले ही परेशान था. इस जुए की मुसीबत ने उसे और विचलित कर दिया. इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए उस ने रमन को घर से बेदखल कर दिया.

इस के बाद रमन सरिता व बेटी अनिका के साथ अलग घर में रहने लगा. अलग होने के बाद सरिता तो खुश थी. क्योंकि उसे सास के तानों, झूठी शिकायतों और जलीकटी बातों से छुटकारा मिल गया था. लेकिन रमन खुश नहीं था, क्योंकि घरगृहस्थी का सारा बोझ अब उसी के कंधों पर आ गया था.

रमन पाल को फैक्ट्री में मामूली तनख्वाह मिलता था. उस से उस का घर का खर्च पूरा नहीं हो पाता था. वह खानेपीने का सामान चौबेपुर कस्बे की एक दुकान से लाता था. इस दुकान का मालिक अखिल पाल था. अखिल पाल रमन का बचपन का दोस्त था. आठवीं कक्षा तक दोनों साथसाथ पढ़े थे. रमन अलग रहने लगा तो अखिल उस के घर आनेजाने लगा. अखिल शराब पीने का आदी था.

दोस्त के कर्ज में दबता गया रमन

घर आतेजाते अखिल की नजर रमन की खूबसूरत पत्नी सरिता पर जमने लगी. रूपयौवन से भरपूर सरिता को अखिल पाल जब भी देखता तो मदहोश हो उठता था. रमन के घर आने पर अखिल की निगाहें सरिता को ही ढूंढा करती थीं.

सरिता को पाने के लिए धीरेधीरे उस ने रमन पर अपना जाल फेंकना शुरू कर दिया. अखिल ने मामूली तनख्वाह पाने वाले रमन को भी शराब आदि पीने का शौक लगा दिया. रमन पाल को जब भी पैसों की जरूरत होती तो अखिल से उधार ले लेता था. अखिल के कर्ज के नीचे दबे होने के कारण रमन उस की किसी बात से इंकार नहीं करता था.

सरिता को पाने की चाहत में अखिल ने अपने उधार के रुपए मांगने के बजाय उसे घर का सामान तथा पैसे भी देने शुरू कर दिए. शराब की महफिल भी रमन के घर जमने लगी. हालांकि रमन अखिल पाल की विशेष कृपा के पीछे उस के इरादे से वाकिफ था, लेकिन आराम, सुविधा व पैसे के लालच में फंसे रमन ने अखिल को सरिता के साथ बैठने व बतियाने की खुली छूट दे दी.

शुरू में तो सरिता ने इस इस ओर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब अखिल मनमानी करने लगा तो सरिता का माथा ठनका. शराब के नशे में जब एक रोज उस ने सरिता का हाथ पकड़ा और उस के साथ छेड़छाड़ करने लगा तो सरिता ने उस के गाल पर तमाचा जड़ दिया और उसे घर के बाहर खदेड़ दिया. अपमानित हो कर अखिल वहां से चला गया.

अखिल ने सरिता द्वारा की गई बेइज्जती की शिकायत रमन से की तो वह गुस्सा हो गया. शराब पी कर वह घर आया और सरिता की जम कर पिटाई कर दी. इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. रात को अकसर वह शराब पीने के बाद बात बेबात सरिता को पीटता और उस के साथ गालीगलौज करता. सरिता अच्छी तरह जानती थी कि रमन उस के साथ मारपीट अखिल के उकसाने पर करता है.

रमन सरिता को परोसना चाहता था दोस्तों के सामने

एक शाम शराब की बोतल ले कर अखिल अपने शराबी दोस्त रंजीत उर्फ गुल्लू के साथ रमन के घर आया. रमन उन दोनों से ऐसे गले मिला जैसे वे दोनों उस के सगे भाई हों. इस के बाद महफिल जमी और तीनों ने शराब पी. कुछ देर तीनों शोरशराबा करते रहे, फिर रमन घर के बाहर चला गया.

सरिता कमरे में अकेली थी और अपनी बेटी अनिका को थपकी दे कर सुलाने की कोशिश कर रही थी. तभी भड़ाक से दरवाजा खुला. सामने अखिल व रंजीत खड़े थे. उन दोनों की आंखों में वासना के डोरे तैर रहे थे. सरिता को उन दोनों ने दबोचना चाहा तो वह भाग कर रसोई में जा पहुंची. वे दोनों वहां भी आ पहुंचे.

बचाव के लिए सरिता ने रसोई में रखा चाकू उठा लिया और बोली, “चले जाओ वरना पेट में चाकू घुसेड़ दूंगी. भूल जाऊंगी कि तुम मेरे पति के दोस्त हो.’’

सरिता के ये तेवर देख कर अखिल और रंजीत डर गए. उन का नशा उड़नछू हो गया. कुछ देर बाद रमन घर वापस आया तो दोनों ने सरिता की शिकायत की.

इस पर रमन ने सरिता को फिर पीटा और बोला, “साली, हरामजादी, कुतिया तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे दोस्तों से भिड़ने की. हम तीनों एक प्याला, एक निवाला हैं. हर चीज मिलबांट कर खाते हैं. तुझे उन की बात मान लेनी चाहिए थी.’’

पति की बेहूदा बात सुन कर सरिता गुस्से से बोली, “लोग अपनी इज्जत बचाने के लिए दूसरों का खून तक कर देते हैं और एक तुम हो जो पत्नी को यारों के सामने परोसना चाहते हो. छि घिन आती है तुम पर. धिक्कार है तुम्हारी मर्दानगी पर.’’

यह सुनते ही रमन दांत पीसते हुए बोला, “मादरचो…रंडी. मुझे पाठ पढ़ा रही है. बेइज्जत कर रही है. आज मैं तेरी हड्डीपसली एक कर दूंगा.’’ कहते हुए रमन इंसान से हैवान बन गया. उस ने सरिता को पीटपीट कर उस की देह सुजा दी.

क्या होगा जब सरिता के पिता को रमन की सच्चाई पता लगेगी? जानने के लिए पढ़ें Family Crime Story का अंतिम भाग.

महामिलन : दो जिस्म एक जान थे वो – भाग 1

मनचाहा शिकार तो मिल गया, लेकिन शिकारी थक कर चूर हो चुका था. एक तो थकान, दूसरे ढलती सांझ और तीसरे 10 मील  का सफर. उस में भी 3 मील पहाड़ी चढ़ाई, फिर उतनी ही ढलान. समर सिंह ने पहाड़ी के पीछे डूबते सूरज पर निगाह डाल कर घोड़े की गरदन पर हाथ फेरा. फिर घोड़े की लगाम थामे खड़े सरदार जुझार सिंह की ओर देखा. उन की निगाह डूबते सूरज पर जमी थी.

समर सिंह उन्हें टोकते हुए थके से स्वर में बोले, ‘‘अंगअंग दुख रहा है, सरदार. ऊपर से सूरज भी पीठ दिखा गया. धुंधलका घिरने वाला है. अंधेरे में कैसे पार करेंगे इस पहाड़ी को?’’

जुझार सिंह थके योद्धा की तरह सामने सीना ताने खड़ी पहाड़ी पर नजर डालते हुए बोले, ‘‘थक तो हम सभी गए हैं हुकुम. सफर जारी रखा तो और भी बुरा हाल हो जाएगा. अंधेरे में रास्ता भटक गए तो अलग मुसीबत. मेरे खयाल से तो…’’ जुझार सिंह सरदार की बात का आशय समझते हुए बोले, ‘‘लेकिन इस बियाबान जंगल में कैसे रात कटेगी? हम लोगों के पास तो कोई साधन भी नहीं है. ऊपर से जंगली जानवरों का अलग भय.’’

पीछे खड़े सैनिक समर सिंह और जुझार सिंह की बातें सुन रहे थे. उन दोनों को चिंतित देख एक सैनिक अपने घोड़े से उतर कर सरदार के पास खड़ा हो गया. सरदार समझ गए, सैनिक कुछ कहना चाहता है.

उन्होंने पूछा तो सैनिक उत्साहित स्वर में बोला, ‘‘सरदार, अगर रात इधर ही गुजारनी है तो सारा बंदोबस्त हो सकता है. आप हुक्म करें.’’

‘‘क्या बंदोबस्त हो सकता है, मोहकम सिंह?’’ जुझार सिंह ने सवाल किया तो सैनिक दाईं ओर इशारा करते हुए बोला, ‘‘ये छोटी सी पहाड़ी है. इस के पार मेरा गांव है. बड़ी खूबसूरत और रमणीक जगह है उस पार. इस पहाड़ी को पार करने के लिए हमें सिर्फ एक 2 मील चलना पड़ेगा. 1 मील की चढ़ाई और 1 मील उस ओर की ढलान. रास्ता बिलकुल साफ है. अंधेरा घिरने से पहले हम गांव पहुंच जाएंगे. मेरे गांव में हुकुम को कोई तकलीफ नहीं होगी.’’

जुझार सिंह ने प्रश्नसूचक नजरों से समर सिंह की ओर देखा. वह शांत भाव से घोड़े की पीठ पर बैठे थे. उन्हें चुप देख सरदार ने कहा, ‘‘सैनिक की सलाह बुरी नहीं है हुकुम. रात भी चैन से बीत जाएगी और इस बहाने आप अपनी प्रजा से भी मिल लेंगे. जो लोग आप के दर्शन को तरसते हैं, आप को सामने देख पलकें बिछा देंगे.’’

और ऐसा ही हुआ भी. मोहकम सिंह का प्रस्ताव स्वीकार कर के जब समर सिंह अपने साथियों के साथ उस के गांव पहुंचे तो गांव वालों ने उन के आगे सचमुच पलकें बिछा दीं.

छोटा सा पहाड़ी गांव था राखावास. साधन विहीन. फिर भी वहां के लोगों ने अपने राजा के लिए ऐसे ऐसे इंतजाम किए, जिन की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. हुकुम के आने से मोहकम सिंह को तो जैसे पर लग गए थे. उस ने गांव के युवकों को एकत्र कर के सूखी मुलायम घास का आरामदेह आसन लगवाया. उस पर सफेद चादर बिछवाई. सरदार के लिए अलग आसन का प्रबंध किया और सैनिकों के लिए अलग. चांदनी रात थी, फिर भी लकडि़यां जला कर रोशनी की गई.

आननफानन सारा इंतजाम कराने के बाद गांव के कुछ जिम्मेदार लोगों को शिकार भूनने और बनाने की जिम्मेदारी सौंप कर मोहकम सिंह घोड़ा दौड़ाता हुआ 3 मील दूर समालखा गांव गया और वहां से वीरन देवल से 4 बोतल संतूरी ले आया. राजस्थान की बेहतरीन शराब जो केवल राजामहाराजाओं के लिए बनाई जाती थी.

अदना सा एक सिपाही कितने काम का साबित हो सकता है, यह बात समर सिंह को तब पता चली, जब अपने हाथों मारे गए शिकार के जायकेदार गोश्त और संतूरी का लुत्फ लेते हुए उन की नजर घुंघरू छनका कर मस्त अदाओं के साथ नाचती मौली पर पड़ी.

ऐसा रूपलावण्य, ऐसा अछूता सौंदर्य, ऐसा मदमाता यौवन और अंगअंग में ऐसी लोच समर सिंह ने पहली बार देखा था. उन के महल तक में नहीं थी ऐसी अनिंद्य सुंदरी. ऊपर से फिजाओं में रंग बिखेरती मौली का सधा हुआ स्वर और एक ही लय में बजते घुंघरुओं की रुनझुन. रहीसही कसर मानू की ढोलक की थाप पूरी कर रही थी. घुंघरुओं की रुनझुन और ढोलक की थाप को सुन लगता था, जैसे दोनों एकदूसरे के पूरक हों.

पूरक थे भी. मौली का सधा स्वर, घुंघरुओं की रुनझुन और मानू की ढोलक की थाप ही नहीं, बल्कि वे दोनों भी. यह अलग बात थी कि इस बात को गांव वाले जानते थे, पर समर सिंह और उस के साथी नहीं.

मौली और मानू खूब खुश थे. उन्हें यह सोच कर खुशी हो रही थी कि अपने राजा का मनोरंजन कर रहे हैं. इस के लिए उन दोनों ने अपनी ओर से भरपूर कोशिश भी की. लेकिन उन की सोच, उन के उत्साह, उन के समर्पण भाव और कला पर पहली बिजली तब गिरी, जब शराब के नशे में झूमते राजा समर सिंह ने मौली को पास बुला कर उस का हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘आज हम ने अपने जीवन में सब से बड़ा शिकार किया है. हमारी शिकार यात्रा सफल रही. ये रात कभी नहीं भूलेगी.’’

इस तरह मौली का हाथ कभी किसी ने नहीं पकड़ा था. मानू ने भी नहीं. मानू के हाथों का स्पर्श उसे अच्छा लगता था. लेकिन उस ने उस के पैरों के अलावा कभी किसी अंग को नहीं छुआ था. मौली के पैरों में भी उस के हाथों का स्पर्श तब होता था, जब वह अपने हाथों से उस के पैरों में घुंघरू बांधता था.

मौली को राजा द्वारा यूं हाथ पकड़ना अच्छा नहीं लगा. उस ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की तो समर सिंह उस की कलाई पर दबाव बढ़ाते हुए बोले, ‘‘आज के बाद तुम सिर्फ हमारे लिए नाचोगी, हमारे महल में. हम मालामाल कर देंगे तुम्हें. तुम्हें और तुम्हारे घर वालों को ही नहीं, इस गांव को भी.’’

घुंघरुओं की रुनझुन भी थम चुकी थी और ढोलक की थाप भी. सब लोग विस्मय से राजा की ओर देख रहे थे. कुछ कहने की हिम्मत किसी में नहीं थी. मानू भी अवाक बैठा था. मौली राजा से हाथ छुड़ाने की कोशिश करते हुए बोली, ‘‘मौली रास्ते की धूल है हुकुम…और धूल उन्हीं रास्तों पर अच्छी लगती है, जो उस की गगनचुंबी उड़ानों के बाद भी उसे अपने सीने में समेट लेते हैं. इस खयाल को मन से निकाल दीजिए हुकुम. मैं इस काबिल नहीं हूं.’’

समर सिंह ने लोकलाज की वजह से मौली का हाथ तो छोड़ दिया, लेकिन उन्हें मौली की यह बात अच्छी नहीं लगी.

रात बड़े ऐशोआराम से गुजरी. मोहकम सिंह और गांव वालों ने हुकुम तथा उन के साथियों की खातिरतवज्जो में कोई कसर न उठा रखी थी. सुबह जब सूरज की किरणों ने पहाड़ से उतर कर राखावास की मिट्टी को छुआ तो वहां का कणकण निखर गया.

राजा समर सिंह ने उस गांव का प्राकृतिक सौंदर्य देखा तो लगा जैसे स्वर्ग के मुहाने पर बैठे हों. मौली की तरह ही खूबसूरत था उस का गांव. चारों ओर खूबसूरत पहाडि़यों से घिरा, नीलमणि से जलवाली आधा मील लंबी झील के किनारे स्थित. पहाड़ों से उतर कर आने वाले बरसाती पानी का करिश्मा थी वह झील.

रवाना होने से पहले समर सिंह ने मौली के मांबाप को तलब किया. दोनों हाथ जोड़े आ खड़े हुए तो समर सिंह बोले, ‘‘तुम्हारी बेटी महल की शोभा बनेगी. उसे ले कर महल आ जाना. हम तुम्हें मालामाल कर देंगे.’’

‘‘मौली को हम महल ले आएंगे हुकुम,’’ मौली के मांबाप डरते सहमते बोले, ‘‘नाचनागाना हमारा पेशा है, पर मौली के साथ मानू को भी आप को अपनी शरण में लेना पड़ेगा. उस के बिना तो मौली का पैर तक नहीं उठ सकता.’’

‘‘हम समझे नहीं.’’ समर सिंह ने आश्चर्यमिश्रित स्वर में पूछा तो मौली के पिता बोले, ‘‘मौली और मानू बचपन के साथी हैं. नाचगाना भी दोनों ने साथसाथ सीखा. बहुत प्यार है दोनों में. मौली तभी नाचती है, जब मानू खुद अपने हाथों उस के पांव में घुंघरू बांध कर ढोलक पर थाप देता है. आप लाख साजिंदे बैठा दें मौली नहीं नाचेगी हुकुम…इस बात को सारा इलाका जानता है.’’

‘‘हमारे लिए भी नहीं?’’ समर सिंह ने अपमान का सा घूंट पीते हुए गुस्से में कहा तो मौली के पिता बोले, ‘‘आप के लिए नाचेगी हुकुम…जरूर नाचेगी. लेकिन उस के साथ मानू का होना जरूरी है. सारा गांव जानता है, मौली और मानू दो जिस्म एक जान हैं. अलग कर के सिर्फ दो लाशें रह जाएंगी. उन्हें अलग करना संभव नहीं है.’’

‘‘तुम्हारे मुंह से बगावत की बू आ रही है…और हमें बागी बिलकुल पसंद नहीं.’’ समर सिंह गुस्से में बोले, ‘‘मौली को खुद महल ले कर आते तो हम मालामाल कर देते तुम्हें, लेकिन अब हम खुद उसे साथ ले कर जाएंगे. जा कर तैयार करो उसे. यह हमारा हुक्म है.’’

अच्छा तो किसी को नहीं लगा, लेकिन राजा की जिद के सामने किस की चलती? वही हुआ, जो समर सिंह चाहते थे. रोतीबिलखती मौली को उन के साथ जाने को तैयार कर दिया गया. विदा बेला में मौली ने पहली बार मानू का हाथ थाम कर कहा, ‘‘मौली तेरी है मानू, तेरी ही रहेगी. राजा इस लाश से कुछ हासिल नहीं कर पाएगा.’’

मानू के होंठों से जैसे शब्द रूठ गए थे. वह पलकों में आंसू समेटे चुपचाप देखता रहा. आंसू और भी कई आंखों में थे, लेकिन राजा के भय ने उन्हें पलकों से बाहर नहीं आने दिया. अंतत: मौली राखावास से राजा के साथ विदा हो गई.

क्या मौली महलों में रह कर मानू को भूल जाएगी? जानेंगे कहानी के अगले अंक में…

मामी का जानलेवा प्यार – भाग 1

आरती के गांव के पास ही मानवेंद्र सिंह की ननिहाल थी. वह वहीं पर रह कर पढ़ता था. उस वक्त वह कक्षा 9 में पढ़ रहा था. पड़ोस में मामा के घर रहते हुए ही उस की जानपहचान आरती से हो गई थी.

कुछ समय बाद ही वह जानपहचान दोस्ती में बदली और फिर जल्दी ही दोनों के बीच प्यार हो गया. दोनों ही एकदूसरे को जीजान से चाहने लगे थे. समय के साथ बात यहां तक बढ़ी कि दोनों ने शादी करने का फैसला भी ले लिया था. उन के बीच जल्दी ही शारीरिक संबंध भी बन गए थे.

इस बात की जानकारी आरती के घर वालों को हुई तो उन्होंने आरती को समझाने के बाद उस के घर से निकलने पर पाबंदी लगा दी थी. वह चोरीछिपे मानवेंद्र से मिलने लगी थी. जब उस के घर वालों को लगने लगा कि वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही है तो उन्होंने कम उम्र में ही उस की शादी करने का फैसला किया.

उसी दौरान घर वालों ने 2019 में आरती की शादी बरेली जिले के शिवपुरी में रहने वाले रामवीर से कर दी. आरती शादी के बाद जितने दिन भी ससुराल में रही, वह खुश नहीं रही. शादी के बाद अनचाहे पति के साथ रात काटना उस की मजबूरी बन गई थी क्योंकि वह तो मानवेंद्र से प्यार करती थी.

बरेली के थाना फतेहगंज (पूर्वी) क्षेत्र के गांव शिवपुरी निवासी रामवीर 20 सितंबर, 2023 को टिसुआ में नौकरी की तलाश के लिए निकला था, लेकिन वह देर रात तक घर नहीं पहुंचा तो उस के घर वालों को उस की चिंता सताने लगी थी. उन्होंने कई बार उस के मोबाइल पर बात करने की कोशिश की, लेकिन उस का मोबाइल बंद आ रहा था. उस के बाद उन्होंने उसे हर जगह तलाशा, लेकिन उस का कहीं भी अतापता नहीं चला.

अगले ही दिन सुबह किसी ने उन्हें बताया कि रामवीर की बाइक महेशपुरा रेलवे क्रौसिंग के पास पड़ी हुई है. यह जानकारी मिलते ही रामवीर का भाई अशोक बाइक देखने पहुंचा तो वह रामवीर की ही निकली. उस के कुछ ही देर बाद पता चला कि देर शाम एक युवक की ट्रेन से कट कर मौत हो गई. उस की लाश रेलवे ट्रैक के पास ही पड़ी हुई है.

यह जानकारी मिलते ही अशोक तुरंत ही रेलवे लाइनों में पड़ी लाश को देखने पहुंच गया. वहां पर पहले से ही राजकीय रेलवे पुलिस (जीआरपी) के जवान मौजूद थे. जीआरपी अपनी काररवाई में लगी हुई थी, तभी अशोक ने उस लाश को पहचानते हुए बताया कि मृतक उस का भाई रामवीर है, जो रात से गायब था. रामवीर की लाश 2 हिस्सों में कटी हुई थी, जिसे देख कर लग रहा था कि उस ने जानबूझ कर ही रेलवे ट्रैक पर लेट कर अपनी जान दी होगी.

देखते ही देखते आसपास के क्षेत्र में रामवीर के रेल से कट कर आत्महत्या करने वाली बात फैल गई. उस की मौत की खबर सुन कर उस की पत्नी आरती भी घटनास्थल पर पहुंची. वहां पहुंचते ही आरती ने रोनाधोना शुरू कर दिया था. घर वालों ने उसे जैसेतैसे कर के चुप कराया.

शव की शिनाख्त हो जाने के बाद जीआरपी पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम के बाद लाश उस के घर वालों को सौंप दी गई. हालांकि पुलिस रामवीर की मौत को आत्महत्या मान रही थी. लेकिन उस का भाई अशोक जीआरपी की बात से सहमत नहीं था.

उस ने बरेली के थाना फतेहगंज (पूर्वी) के एसएचओ ओमप्रकाश गौतम से मिल कर बताया कि शाम को उस के भाई को किसी ने फोन किया था. फोन आते ही वह बाइक ले कर घर से निकला था. इसी कारण उसे शक है कि उस ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि किसी ने उस की जानबूझ कर रेल के सामने धक्का दे कर हत्या की है.

भाई अशोक की तरफ से पुलिस ने धारा 302, 120बी, 34 भादंवि के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. रिपोर्ट दर्ज होते ही पुलिस ने काररवाई शुरू कर दी. एसपी (देहात) मुकेश चंद्र मिश्र इस केस को सुलझाने के लिए पुलिस की एक टीम गठित की. जिस में एसएचओ ओमप्रकाश गौतम, एसआई इशरत अली खां, कांस्टेबल पूजा, शिवांशु पांडेय आदि को शामिल किया गया था.

पुलिस ने सब से पहले मृतक रामवीर के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि रामवीर के मोबाइल पर अंत में किसी मानवेंद्र नामक व्यक्ति का फोन आया था. पुलिस ने रामवीर के घर वालों से मानवेंद्र के बारे में जानकारी ली तो वह मृतक का गांव के रिश्ते का भांजा निकला. पुलिस को एक बार तो लगा कि एक भांजा मामा की हत्या क्यों करेगा. फिर भी पुलिस ने मानवेंद्र को पूछताछ के लिए थाने बुलाया.

भांजा ही निकला कातिल

मानवेंद्र ने पुलिस को बताया कि उस ने तो केवल मामा को शराब पिलाने के लिए ही फोन किया था. उस के बाद मामा मेरे पास आए और फिर दोनों ने एक साथ बैठ कर शराब भी पी. बाद में मामा अपनी बाइक ले कर वहां से चले गए थे. मामा ने रेल से कट कर आत्महत्या क्यों की, उसे कुछ नहीं पता.

लेकिन पुलिस को जानकारी मिली थी कि वह अकसर रामवीर की अनुपस्थिति में उस के घर आताजाता था, जिस से उस के परिवार वालों को पूरा शक था कि जरूर मानवेंद्र और आरती के बीच कुछ खिचड़ी पक रही थी. उसी शक के आधार पर फिर पुलिस ने आरती के मोबाइल की काल डिटेल्स निकाली तो पता चला कि आरती ने मानवेंद्र का फोन आने से कुछ समय पहले ही उस से बात की थी. जिस से पुलिस को पूरा शक हो गया था कि जरूर मानवेंद्र से मिल कर ही आरती ने अपने पति को मौत की नींद सुला दिया है.

इस मामले को शक की निगाहों से देखते हुए पुलिस ने फिर मानवेंद्र से सख्ती से पूछताछ की तो वह जल्दी ही टूट गया. मानवेंद्र ने स्वीकार किया कि रामवीर मामा की पत्नी के साथ उस के अवैध संबंध थे, जिस के चलते रामवीर अपनी पत्नी पर शक करने लगा था. इतना ही नहीं, वह अपनी पत्नी को भलाबुरा कहते हुए मारतापीटता था. पति की हरकतों से परेशान हो कर आरती ने ही उसे मौत की नींद सुलवा दिया.

इस जानकारी के मिलते ही पुलिस ने मानवेंद्र के साथसाथ मृतक की पत्नी आरती को भी हिरासत में ले लिया था. दोनों को हिरासत में लेने के बाद पुलिस घटनास्थल पर पहुंची, जहां से शराब के कुछ खाली पव्वे और डिस्पोजल गिलास भी बरामद किए.

आरोपियों और रामवीर के घर वालों से पूछताछ के दौरान इस केस की कहानी जो उभर कर सामने आई, वह दिल को दहला देने वाली थी. रामवीर की मौत की साजिश रचने वाली कोई और नहीं बल्कि उस की पत्नी आरती थी.

शादी से पहले ही थे मानवेंद्र से संबंध

उत्तर प्रदेश के जनपद बरेली के फतेहगंज (पूर्वी) के शिवपुरी गांव में रहता था रामवीर का परिवार. रामवीर का सामान्य परिवार था. उस के पापा शिवराज सिंह के पास न तो कोई जुतासे की जमीन थी और न ही कोई सरकारी नौकरी. वह अपने गांव के खेतों में ही मेहनतमजदूरी कर के परिवार का पालनपोषण करते आ रहे थे.

उन के 2 बेटे थे. बड़ा रामवीर और उस से छोटा अशोक. कई साल पहले रामवीर की शादी शाहजहांपुर के तिलहर थाना क्षेत्र के गांव धुनकपुर निवासी आरती से हुई थी. आरती की शादी कम उम्र यानी 16 साल में ही हो गई थी. उसी दौरान शादी से पहले ही उस की मुलाकात मानवेंद्र से हुई थी.

पत्नी जब न बनी दोस्तों का बिछौना – भाग 2

रमन पाल शक के दायरे में था. यह बात इंसपेक्टर एस.एन. सिंह भी अपने सीनियर अधिकारियों को बता चुके थे, अत: डीएसपी तनु उपाध्याय व एएसपी राजेश कुमार पांडेय ने रमन पाल को सामने बिठा कर सरिता की हत्या के बारे में पूछताछ की.

शुरू में लगभग 2 घंटे तक वह पुलिस अधिकारियों को गुमराह करता रहा और बदमाशों द्वारा सरिता का अपहरण व हत्या की बात कहता रहा, लेकिन जब डीएसपी तनु उपाध्याय ने कड़ा रुख अपनाया तो रमन पाल टूट गया. फिर सरिता की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया.

रमन पाल ने बताया कि उस ने सरिता की हत्या का षडयंत्र अपने 3 दोस्तों रंजीत उर्फ गुल्लू, अखिल पाल व सौरभ गौतम के साथ मिल कर रचा था. उन तीनों ने ही अपहरण का नाटक किया, फिर हम सब ने मिल कर सरिता को मार डाला. ये तीनों चौबेपुर कस्बा में पुराने शराब ठेका के पास रहते हैं.

हत्या की निकली हैरतअंगेज कहानी

रंजीत, अखिल व सौरभ को गिरफ्तार करने के लिए इंसपेक्टर एस.एन. सिंह की अगुवाई में पुलिस टीम बनाई गई. इस टीम ने शाम 5 बजे रंजीत, अखिल व सौरभ के घर दबिश दी, लेकिन तीनों अपने घर से फरार थे. इसी बीच किसी ने इंसपेक्टर एस.एन. सिंह को फोन पर सूचना दी कि रंजीत उर्फ गुल्लू अपने दोस्त अखिल पाल के साथ बेला विधूना रोड पर स्थित शिवली नहर पुल पर मौजूद हैं.

इस सूचना पर पुलिस टीम शिवली नहर पुल पर पहुंची और रंजीत व अखिल को गिरफ्तार कर लिया. उन दोनों को थाने लाया गया. थाने की हवालात में जब उन दोनों ने रमन पाल को देखा तो समझ गए कि अब उन के बचने का कोई रास्ता नहीं है. अत: उन दोनों ने भी हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया. सौरभ फरार हो गया था.

एसएचओ एस.एन. सिंह ने सरिता की हत्या का खुलासा करने व आरोपियों को गिरफ्तार करने की जानकारी एसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति को दी तो उन्होंने तुरंत आननफानन में पुलिस लाइन में प्रैसवार्ता आयोजित की और हत्या का खुलासा कर दिया.

चूंकि हत्यारोपियों ने अपहरण व हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था, अत: एसएचओ एस.एन. सिंह ने मृतका के पिता कमलेश पाल की तरफ से भादंवि की धारा 364/302/120बी के तहत रमन पाल, रंजीत उर्फ गुल्लू, अखिल पाल तथा सौरभ के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा इन्हें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

इन से की गई पूछताछ में एक ऐसी नारी की कहानी सामने आई, जो पति को सब कुछ मानती रही और उस के जुल्म सहती रही. उस की इसी कमजोरी का फायदा उठा कर उस का पति हैवान बन गया और उस ने पत्नी को मौत की नींद सुला दिया.

उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जिले का एक चर्चित कस्बा है- रूरा. यह उत्तर रेलवे का बड़ा स्टेशन भी है. व्यापारिक कस्बा होने के कारण यहां ज्यादातर एक्सप्रेस गाड़ियों का स्टापेज है. रूरा कस्बे से 3 किलोमीटर दूर एक गांव है- गहलों. कमलेश पाल इसी गांव का निवासी है. उस के परिवार में पत्नी विमला के अलावा 2 बेटियां तथा एक बेटा लाखन था. कमलेश पाल किसान था. किसानी से ही वह परिवार का भरणपोषण करता था. बड़ी बेटी के वह हाथ पीले कर चुका था. भाईबहनों में सरिता छोटी थी.

गरीब की दौलत उस की इज्जत होती है. कमलेश पाल भी गरीब था. सरिता उस की इज्जत थी. इस पर किसी की बुरी नजर पड़े, उस के पहले ही वह उस के हाथ पीले कर के निश्चिंत हो जाना चाहता था. अत: वह अपनी खूबसूरत और भोलीभाली बेटी के लिए सही लड़के की तलाश में जुट गया था. काफी दौड़भाग के बाद उस के कदम रमन पाल के घर जा कर रुके.

रमन के पिता रामपाल कानपुर नगर के थाना चौबेपुर के गांव पनऊपुरवा के रहने वाले थे. परिवार में पत्नी उमा पाल के अलावा 2 बेटे अमन व रमन थे. अमन का विवाह हो चुका था. वह गुड़गांव (हरियाणा) में किसी फैक्ट्री में काम करता था और वहीं अपने परिवार के साथ रहता था.

रमन अविवाहित था. वह चौबेपुर कस्बा स्थित लोहिया स्टार लिंगर फैक्ट्री में सफाई कर्मचारी था. कुछ उपजाऊ खेती की जमीन भी थी, जिस की रामपाल खुद देखभाल करता था. कुल मिला कर उस की आर्थिक स्थिति ठीकठाक थी.

रमन पाल सरिता के मुकाबले कम पढ़ालिखा था और उम्र में भी बड़ा था. लेकिन घर की माली हालत ठीक समझ कर व उसे काम पर लगा देख कर कमलेश पाल ने रमन को अपनी बेटी सरिता के लिए पसंद कर लिया था. फिर सामाजिक रीतिरिवाज से 17 फरवरी, 2018 को सरिता का विवाह रमन के साथ हो गया.

सरिता को किया जाने लगा प्रताड़ित

ससुराल आने के 2 दिन बाद तो सरिता को ऐसा नहीं लगा था कि वह कहीं नई जगह आ गई है. घर में आए मेहमानों के सामने सास का व्यवहार सरिता की उम्मीदों से अधिक अच्छा था, परंतु तीसरे ही दिन सुबहसुबह सास के तेवर बदले हुए थे. सास का वह रूप देख कर सरिता का मन आशंका से कांप उठा था.

डरतेडरते उस ने हिम्मत कर के सास से पूछा, “मुझ से कुछ गलती हो गई क्या मम्मी?’’

“गलती तुझ से नहीं मुझ से हुई है, जो तेरे कंगाल बाप की चिकनीचुपड़ी बातों में आ गई.’’

“ऐसा क्या किया है मेरे पापा ने, जो आप उन्हें मेरे सामने इस तरह बोल रही हैं.’’

“अच्छा, तो तेरा 2 दिन में ही इतना रुतबा हो गया कि मैं तेरे सामने तेरे दो कौड़ी के बाप को कुछ कहने की   हिम्मत न कर सकूं. तुझे सुनना ही है तो सुन अपने बाप की करतूत. उस ने मेरे बेटे का शादी में अपमान  किया है. हमारी हैसियत के मुताबिक उसे मोटरसाइकिल तो देनी ही चाहिए थी.

“शायद तुझे नहीं मालूम कि कई लोग मेरे घर के चक्कर काट रहे थे, जो लाखों रुपए का सामान देने का वादा कर रहे थे, लेकिन हमारी ही किस्मत फूटी थी, जो हम तेरे बाप की चिकनीचुपड़ी बातों में आ कर ठगे गए.’’ उमा तमक कर एक ही सांस में बोल गई.

यह सब सुन कर सरिता को ऐसा लगा, जैसे किसी ने उस के कानों में गर्म शीशा उड़ेल दिया हो. उसे सारा घर घूमता हुआ नजर आया. वह धम्म से वहीं जमीन पर बैठ गई. उस की आंखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा. उस दिन सरिता को पहली बार अपनी सास का असली चेहरा दिखा था. उस के पिता ने उस की शादी में अपनी हैसियत के अनुसार बहुत कुछ दिया था. जबकि शादी के पहले उस के सासससुर दहेज विरोधी थे और शादी के बाद कितना अंतर आ गया था उन के रवैए में. सरिता इसे अपने भाग्य का क्रूर मजाक ही समझ रही थी.

उधर उमा पाल बराबर बड़बड़ाए जा रही थी, “चल उठ, सुबहसुबह यह रोधो कर किसे नखरे दिखा रही है?’’

अपनी मां को चिल्लाते देख कर रमन पाल कमरे में आ गया था. उस ने उमा से पूछा था, “मम्मी, क्या हो गया, क्यों चिल्ला रही हो?’’

“क्या बताऊं बेटा, हमारे तो भाग्य ही फूट गए. मैं ने बहू से रसोई में काम करने को क्या कह दिया, इस ने तो मुझे ही बुराभला कह डाला.’’ उमा पाल भोली बन कर बेटे को बताने लगी थी.

उमा का इतना कहना था कि रमन पाल बिफर पड़ा. उस ने आव देखा न ताव घुटने में मुंह छिपा कर रो रही सरिता का चेहरा बाल पकड़ कर ऊपर उठाया और बोला, “2 कौड़ी की लड़की, तेरी इतनी हिम्मत कि इस घर में आते ही मेरी मां का अपमान करे. मैं तुझे तभी माफ करूंगा, जब तू मेरी मां के पैर पकड़ कर अपनी गलती की माफी मांगेगी.’’ इतना कहने के साथ ही रमन ने सरिता को अपनी मां के पैरों पर ढकेल दिया.

सरिता ने रोतेरोते सास से पूछा, “मम्मी, क्यों आप एक के बाद एक झूठ बोल कर मुझ से कलह कर रही हो. मैं ने कब आप से कुछ कहा. आप ही तो खुद मुझे व मेरे घर वालों को बुराभला कह रही थीं कि उन्होंने दहेज में मोटरसाइकिल नहीं दी. रसोई में काम करने की बात आप ने मुझ से कहां कही?’’

उमा कुटिल मुसकान लिए चुप रही. रमन ही गुस्से में बोला, “अगर मेरी मां ने तुझे यह सब कहा तो क्या गलत कहा. यदि तेरे बाप को मेरी हैसियत का खयाल होता तो शादी में मुझे बाइक जरूर देते.’’

सरिता तड़प कर बोली, “नहीं देंगे मेरे पिता मोटरसाइकिल. एक पैसा भी मैं उन से नही मांगूंगी. यदि मुझे तुम्हारे व तुम्हारे बेटे की ऐसी सोच का पता होता तो मैं भी शादी के लिए कभी हां न करती.’’

सरिता की इस बात को चुनौती मान कर रमन कमीनेपन पर उतर आया. उस ने सरिता पर लातघूंसों की बरसात शुरू कर दी. सरिता चुपचाप मार खाती रही. उस के सभी सुहाने सपने टूट गए थे. इस के बाद तो यह क्रम ही बन गया. सास झूठी शिकायत करती और रमन सरिता को बुरी तरह पीट देता था.

क्यों रमन अपने नई ब्याहता पत्नी पर इस कदर जुल्म करता था? क्या सरिता चुपचाप ये जुल्म सहती रहेगी? पढ़ें इस क्राइम स्टोरी के अगले अंक में.

सूटकेस में बंद हुआ लिवइन रिलेशन

लेडी कांस्टेबल मर्डर का कालगर्ल कनेक्शन – भाग 5

अभियुक्तों की हुई गिरफ्तारी

क्राइम ब्रांच ने पवन को गिरफ्तार किया और उस फोटो को दिखा कर पूछा कि यह फोटो किस की है तो पवन ने राजपाल का नाम लिया. उस के बताए पते से राजपाल को भी उठा कर क्राइम ब्रांच के औफिस लाया गया.

थोड़ी सी सख्ती करते ही राजपाल ने बताया, “सर, यह सिम मेरे नाम से है, जो मैं ने राबिन को इस्तेमाल को दे दिया था. पवन मेरा दोस्त है, उस का कोई रोल इस सिम के मामले में नहीं है. उस का मैं ने आधार कार्ड इस्तेमाल किया था.”

“राबिन कहां रहता है?”

राजपाल ने राबिन का पता बता दिया. एक घंटे में राबिन को क्राइम ब्रांच की टीम पकड़ कर ले आई. उस से भी थोड़ी सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने बता दिया कि सारा खेल सुरेंद्र जीजा का है. उसी ने उसे अरविंद बना कर एक कालगर्ल के साथ भिन्नभिन्न होटलों में भेजा और मोनिका के डाक्यूमेंट वहां छोडऩे का प्लान बनाया ताकि होटल वाले मोनिका के परिवार वालों को यकीन दिला सके कि मोनिका जिंदा है.”

“मोनिका कहां है?”

“उस की मेरे जीजा ने गला घोंट कर 2 साल पहले हत्या कर दी थी.”

इस रहस्योद्घाटन पर इंसपेक्टर राजीव कक्कड़ ने गहरी सांस ली. उन्होंने सुरेंद्र राणा को गिरफ्तार करने के लिए सितंबर, 2023 के आखिरी सप्ताह में ही टीम को अलीपुर भेजा. वह घर पर ही मिल गया. उसे हिरासत में ले कर क्राइम ब्रांच औफिस लाया गया तो उस के चेहरे पर पसीने की असंख्य बूंदे छलक आई थीं. सुरेंद्र राणा ने आसानी से अधिकारियों के समक्ष कुबूल कर लिया कि उसी ने मोनिका की गला दबा कर 8 सितंबर, 2021 के दिन हत्या कर दी थी.

“मोनिका की हत्या तुम ने क्यों की?” राजीव कक्कड़ ने पूछा.

“मैं उसे चाहने लगा था. मैं उसे पाना चाहता था, इसलिए झूठ बोल कर कि मैं कुंवारा हूं, मैं ने मोनिका को किसी तरह शादी के लिए राजी कर लिया था, लेकिन वह 8 सितंबर को मेरा घर देखने के इरादे से अलीपुर पहुंच गई. उसे गांव में घुसता देख मैं डर गया.

“मोनिका को मेरे बीवीबच्चों का पता चल जाता तो मेरी सारी प्लानिंग फेल हो जाती. मैं अपनी कार ले कर मोनिका के सामने गया और उसे जबरन कार में बिठा कर कहा, ‘मां शहर गई हैं. घर में ताला बंद है. आओ, थोड़ा घूम आते हैं, तब तक मां आ जाएंगी.’

“मैं मोनिका को बुराड़ी की ओर यमुना पुश्ता पर ले गया. एक सुनसान जगह कार रोक कर मैं ने मोनिका को नीचे उतारा और पानी की तरफ बढ़ते हुए मोनिका की गरदन दबोच ली. वह मर गई तो मैं ने वहीं पर गड्ढा खोद कर उस की लाश दबा दी थी. उस के ऊपर पत्थर डाल दिए.”

इंसपेक्टर कक्कड़ ने पूछा, “2 साल तक तपस्या को तुम बहकाते रहे कि मोनिका जीवित है. शादी कर के अपने पति के साथ खुश है. ऐसा तुम क्यों कर रहे थे?”

“सर, मैं तपस्या के दिल में यह बात बिठा देना चाहता था कि मोनिका जिंदा है और वह शरम के कारण सामने नहीं आ रही है. मैं ने अपने साले राबिन के साथ एक कालगर्ल को अलगअलग होटलों में भेज कर मोनिका की आईडी वहां छुड़वा कर तपस्या को यह जताना चाहा कि मोनिका जीवित है. और होटल वाले यह भी बताएं कि दोनों पतिपत्नी के रूप में उन के होटल में रुके थे.”

“सर, मैं ने मोनिका के फोन से उस की वायस रिकौर्ड को अपने फोन में ले ली थी. एक सौफ्टवेयर की मदद से मैं मोनिका के शब्दों को वाक्य में बनाता और तपस्या को मोनिका के फोन से फोन कर के वह वायस सुनाता ताकि तपस्या समझे मोनिका बोल रही है और जीवित है.”

“इस के पीछे तुम्हारा क्या मकसद था सुरेंद्र?”

“यही कि तपस्या अपनी बहन मोनिका को जीवित समझे और यह मान ले कि मोनिका शरम के कारण वापस नहीं आ रही है. तपस्या उसे भुला देती तो पुलिस भी मामले से पीछे हट जाती और मोनिका की हत्या का राज राज ही बना रह जाता.”

सुरेंद्र राणा ने जुर्म कुबूल कर लिया था. उसे कोर्ट में पेश कर के 5 दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड अवधि में सुरेंद्र ने यमुना किनारे दबाया मोनिका का कंकाल में तब्दील हो चुका शव बरामद करवा दिया. शव को डीएनए टेस्ट के लिए उस की मां का ब्लड ले कर लैब में भेज दिया गया. फोरैंसिक जांच के बाद ही पता चलेगा कि बरामद कंकाल मोनिका यादव का है भी या नहीं.

कंकाल मोनिका का हुआ तो वह परिजनों को अंतिम क्रियाकर्म के लिए सौंप दिया जाएगा. सुरेंद्र राणा, उस के साले राबिन और जयपाल को पुलिस ने जेल भेज दिया. मोनिका का फोन और बैग पुलिस ने कब्जे में ले लिया है. तीनों को कठोर से कठोर सजा दिलवाने के लिए पुलिस पुख्ता सबूत एकत्र करने में लगी हुई थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

लेडी कांस्टेबल मर्डर का कालगर्ल कनेक्शन – भाग 4

दिन गुजरते गए, मोनिका सामने तो नहीं आई. ऋषिकेश, मसूरी आदि होटलों में मोनिका के द्वारा कोई न कोई डाक्यूमेंट छोडऩे की सूचना तपस्या को जरूर मिलती रही और तपस्या कभी अकेली, कभी सुरेंद्र के साथ उन होटलों में जा कर मोनिका के डाक्यूमेंट घर ले कर आती रही. इस से उसे यह विश्वास तो होने लगा कि मोनिका ठीक है और पति के साथ सैरसपाटा कर रही है. लेकिन तपस्या पूरी तरह आश्वस्त नहीं हुई.

इतना ही नहीं, 2021 में ही एक दिन तपस्या को मोनिका का दिल्ली के अरुणा आसफ अली अस्पताल में कोरोना वैक्सीन लगवाने का सर्टिफिकेट भी मिला. इस के अलावा मोनिका के बैंक खाते से भी लेनदेन होते रहने के सबूत मिले.

2 साल ऐसे ही गुजर गए, लेकिन तपस्या इन सब से संतुष्ट नहीं थी, क्योंकि मोनिका सामने नहीं आ रही थी. उसे मामला गड़बड़ लग रहा था. आखिर एक दिन तपस्या दिल्ली पुलिस कमिश्नर संजय अरोड़ा से मिलने पहुंच गई.

उस ने पुलिस कमिश्नर को बताया, “सर, मेरी बहन मोनिका यादव 2 साल से लापता है. वह पहले थाना मुखर्जी नगर में कांस्टेबल के पद पर तैनात थी. सन 2020 में उस ने यूपी पुलिस में सबइंसपेक्टर का एग्जाम पास कर लिया था, इसलिए उस ने दिल्ली पुलिस की नौकरी छोड़ दी और मुखर्जी नगर के पीजी में रह कर यूपीएससी की तैयारी कर रही थी. 8 सितंबर, 2021 के दिन वह अचानक लापता हो गई है. मैं ने पुलिस में रिपोर्ट की थी, लेकिन थोड़ी जांच के बाद पुलिस ने फाइल बंद कर दी है.”

“क्यों?” पुलिस कमिश्नर ने पूछा.

“सर, मोनिका किसी अरविंद नाम के युवक के साथ शादी कर के घूम रही है. उस के द्वारा उन होटलों जैसे ऋषिकेश, देहरादून, मसूरी आदि जगहों में डाक्यूमेंट छोड़े जा रहे हैं. वह मैं वहां जा कर लाती रही हूं, लेकिन इन 2 सालों में मोनिका ने न हमें फोन किया है, न सामने आई है.

“इस से मुझे संदेह है कि मोनिका अब नहीं है. मुझे उस की चीजों से गुमराह किया जा रहा है. मेरे पिता ब्रह्मपाल यूपी पुलिस में एसआई के पद पर थे. एक अपराधी को बस में दबोचने गए थे, बदमाश ने गोली चला दी, जिस से वह शहीद हो गए थे. मोनिका ही घर संभाल रही थी, उसी पर घर की उम्मीदें टिकी हुई थीं सर. आप उस की तलाश करवाने की कृपा करें.”

“ठीक है. मैं मोनिका का केस क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर करवा देता हूं. तुम निश्चिंत रहो, क्राइम ब्रांच उसे जरूर ढूंढ निकालेगी.”

क्राइम ब्रांच को सौंपी जांच

पुलिस कमिश्नर ने क्राइम ब्रांच के स्पैशल कमिश्नर रविंद्र यादव को फोन कर के मोनिका यादव का केस उन्हें सौंप कर संक्षिप्त में सारी बातें बता दीं. रविंद्र यादव ने यह केस रोहिणी क्राइम ब्रांच के हाथ सौंप दिया.

क्राइम ब्रांच ने 12 अप्रैल, 2023 को मोनिका की गुमशुदगी को अपहरण की धारा 365 आईपीसी में तरमीम कर दी. डीसीपी संजय भाटिया की देखरेख में जांच की जिम्मेदारी इंसपेक्टर राजीव कक्कड़ को सौंपी गई. उन्होंने अपनी टीम के साथ जांच शुरू की.

वह तपस्या से मिले. तपस्या से इंसपेक्टर राजीव कक्कड़ को मालूम हुआ कि मोनिका यूपीएससी की तैयारी कर रही थी. इंसपेक्टर राजीव कक्कड़ को तपस्या ने सभी होटल जहां कहीं मोनिका ठहरी थी और उस के द्वारा डाक्यूमेंटस छोड़े गए थे, उन का नाम बता दिया.

तपस्या ने यह भी बताया कि मोनिका ने 2-3 बार उसे फोन किया था, लेकिन ज्यादा नहीं बोली. एक बार उस के कथित पति अरविंद ने फोन कर के बताया था कि मोनिका उस के साथ गुडग़ांव में है, उन्होंने शादी कर ली है.

इंसपेक्टर अपनी टीम के साथ तपस्या द्वारा बताए गए होटलों में गए. उन्होंने रिसैप्शन काउंटर पर लगे सीसीटीवी कैमरों की उस दिन की फुटेज हासिल की. जिसजिस दिन मोनिका उन होटलों में रुकी थी, सभी जगह की फुटेज ले कर वह दिल्ली आ गए.

उन्होंने तपस्या को अपने औफिस में बुला कर ऋषिकेश, देहरादून, मसूरी के होटलों के रिसैप्शन पर खड़े अरविंद और मोनिका की वह सीसीटीवी फुटेज दिखा कर तपस्या से कहा, “होटल वाले इन दोनों को अरविंद और मोनिका बता रहे हैं. इसे देख कर बताइए, यह आप की बहन मोनिका ही है?”

तपस्या ने देखा तो चौंक कर बोली, “सर, यह मोनिका नहीं है. मोनिका की तसवीर मेरे मोबाइल में है. आप देख लीजिए.”

बहन ने क्राइम ब्रांच को दिए सबूत

तपस्या ने मोबाइल निकाला तो इंसपेक्टर कक्कड़ मुसकरा कर बोले, “मेरे पास मोनिका की तसवीर है. मुझे पूरा शक था कि फुटेज में नजर आ रही युवती मोनिका नहीं है. फिर भी तसल्ली के लिए आप को बुलाया गया.”

“सर, मुझे शक है कि किसी ने मोनिका को कत्ल कर दिया है और 2 साल से उस की चीजें यहांवहां फेंक कर मुझे बेवकूफ बनाया है. आप साथ में खड़े इस युवक का पता लगाइए.”

“तपस्याजी, हमें भी अब शक है कि मोनिका की हत्या कर दी गई है.” इंसपेक्टर कक्कड़ गंभीर स्वर में बोले, “आप को अरविंद ने फोन किया. क्या वह नंबर आप की काल डिटेल में होगा.”

तपस्या ने वह नंबर इंसपेक्टर को दे दिया. कुछ सोच कर तपस्या ने कहा, “सर, सुरेंद्र राणा मुझ पर कई बार यह दबाब बनाने की कोशिश करवा रहा है कि मैं मोनिका को जीवित मान लूं और भूल जाऊं, क्योंकि वह अब शादी कर के अपनी जिंदगी जी रही है.”

“ओह!” इंसपेक्टर कक्कड़ ने होंठों को गोल सिकोड़ा, “वह इस मामले में रुचि क्यों ले रहा है?”

“दरअसल, मोनिका उस से प्यार करती थी. सुरेंद्र राणा उस से शादी करने वाला था.”

इसपेक्टर कक्कड़ मुसकराए, “सुरेंद्र राणा शादीशुदा और बालबच्चेदार है. वह पत्नी के साथ अलीपुर में रहता है.”

“ओह!” तपस्या चौंकी, “इतना बड़ा धोखा हमारे साथ…”

“मुझे अब इस नंबर को उपयोग करने वाले व्यक्ति तक पहुंचना है, जो आप को फोन करता है. और हां, तब तक आप सुरेंद्र राणा से दूर रहेंगी. समझ रही हैं न?”

“जी हां.” तपस्या ने सिर हिलाया.

इंसपेक्टर कक्कड़ ने तपस्या को जाने को कहा और उस नंबर के उपभोक्ता का पता निकालने के लिए एक हवलदार को फोन सेवा प्रदाता कंपनी भेज दिया.

एक घंटे में ही हवलदार पूरी डिटेल्स निकाल कर ले आया. यह नंबर किसी पवन नाम के व्यक्ति के नाम पर था, लेकिन यहां एक गड़बड़ यह थी कि आधार कार्ड तो पवन का लगाया गया था, फोटो किसी और व्यक्ति की थी जो आधार से मेल नहीं खा रही थी.