जी नहीं पाए प्यार करने वाले

आगरा का एक छोटा सा गांव है नगला लालजीत, जिस की आबादी मुश्किल से 5 सौ होगी. इस में कुशवाहा ज्यादा हैं, जबकि ठाकुरों के सिर्फ 4 घर हैं. इन में एक घर है हुकुम सिंह का. उन के परिवार में पत्नी शांति के अलावा 5 बेटे और एक बेटी थी. उन का सब से छोटा बेटा था नरेश, जो किसी मोबाइल कंपनी में सेल्समैन था.

इसी गांव का रहने वाला गिरिराज कुशवाहा शादीब्याह में खाना बनाने का ठेका लेता था. उस के परिवार में पत्नी जलदेवी के अलावा 3 बेटियां सीमा, रोशनी, भारती और 2 बेटे देवेश तथा योगेश थे. सीमा की शादी उस ने देवी रोड निवासी शैलेंद्र के साथ की थी तो उस से छोटी रोशनी की शादी आगरा के रहने वाले बंटू से. तीसरी बेटी भारती का अभी विवाह नहीं हुआ था. यह कहानी गिरिराज की इसी तीसरी बेटी भारती की है.

एक साल पहले तक हुकुम सिंह और गिरिराज कुशवाहा सुखशांति से रह रहे थे. उन के घरों के बीच ज्यादा दूरी नहीं थी. छोटा सा गांव है, इसलिए गांव का हर कोई एकदूसरे को जानता ही नहीं था, बल्कि सभी रिश्ते की डोर से बंधे थे, चाहे वह किसी भी जाति के हों.

भारती मात्र आठवीं तक पढ़ी थी, क्योंकि इस से आगे वह न पढऩा चाहती थी और न ही गिरिराज उसे पढ़ाना चाहता था. लेकिन एक पढ़ाई वह मांबाप से छिपछिप कर जरूर पढ़ रही थी. और वह थी इश्क की. इस पढ़ाई में उस के साथ था हुकुम सिंह का सब से छोटा बेटा नरेश.

किसी दिन नरेश और भारती की नजरें टकराईं तो उन के दिलों की धडक़नें बढ़ गईं. दोनों अलगअलग जाति के थे, लेकिन इश्क करने वाले कहां इस की परवाह करते हैं. प्यार दोनों को करीब ले आया और वे लुकछिप कर मिलने लगे. उन्हें मिलने में परेशानी भी नहीं होती थी, क्योंकि आजकल लगभग सभी के पास मोबाइल फोन है ही. यही मोबाइल फोन उन की भी मिलने में मदद कर रहा था. उन्हें जब मिलना होता, फोन कर के समय और जगह तय करते, उस के बाद तय समय और जगह पर मिल लेते.

भारती और नरेश प्यार ही नहीं कर बैठे, साथ जीने और मरने की कसमें भी खा लीं, लेकिन उन की जाति अलगअलग थी, इसलिए उन्हें पता था कि उन का यह सपना आसानी से पूरा नहीं होगा. इसलिए कभीकभी भारती नरेश से पूछती भी थी कि समाज के डर से कहीं वह उसे छोड़ तो नहीं देगा?

तब नरेश कहता, “भारती, मैं अपने घर वालों को छोड़ सकता हूं, पर तुम्हें नहीं छोड़ सकता.”

नरेश भले ही भारती को हर तरह से साथ देने का आश्वासन देता था, पर वह जानता था कि यह सब इतना आसान नहीं है. गांव में, वह भी दूसरे जाति की लडक़ी से शादी करना बहुत ही मुश्किल काम है. लेकिन उस का प्यार दीवानगी की हद तक पहुंच चुका था, इसलिए उस की अच्छाबुरा सोचने की समझ ही खत्म हो चुकी थी. न उसे घरपरिवार दिखाई दे रहा था और न समाज. उसे परिणाम की भी चिंता नहीं थी.

नरेश और भारती भले ही लुकछिप कर मिल रहे थे, लेकिन उन का यह प्यार गांव वालों की नजरों से छिपा नहीं रह सका. फिर एक दिन वही हुआ, जिस का डर था. भारती फोन पर नरेश से बातें कर रही थी, तभी गिरिराज ने उस की कुछ बातें सुन लीं. उस ने पूछा, “किस से बातें कर रही है?”

जवाब में भारती कुछ कहती, गिरिराज ने उस के हाथ से मोबाइल छीन लिया. उस में नरेश की फोटो लगी देख कर उस ने अपना सिर पीट लिया. उसे समझते देर नहीं लगी कि बेटी आशिकी में फंस गई है.

“यह सब क्या है?” गिरिराज ने फोटो दिखाते हुए पूछा, “तू नरेश से क्यों बातें करती है?”

भारती अंजान बनते हुए बोली, “पापा मैं तो अपनी सहेली से बातें कर रही थी, कभीकभी नेटवर्क की गड़बड़ी की वजह से किसी दूसरे को फोन ही नहीं लग जाता, बल्कि उस का फोटो भी आ जाता है.”

गिरिराज इतना बेवकूफ नहीं था, जितना भारती समझ रही थी. उस ने पूछा, “पहले तो यह बता, नरेश का नंबर तेरे मोबाइल में कैसे आया?”

“पड़ोसी है, अब पड़ोसी का नंबर मोबाइल में नहीं आएगा तो क्या दूसरे गांव वालों का आएगा?” भारती रुआंसी हो कर बोली.

गिरिराज को लगा कि वह बेटी के साथ ज्यादती कर रहा है. जब मोबाइल है तो उस में नंबर तो होंगे ही. रही बात नरेश की तो वह गांव का ही नहीं है, पड़ोसी भी है. मोबाइल का काम भी करता है. इसलिए उस का नंबर भारती के पास है तो बुरा क्या है. वह चुप हो गया.

गिरिराज भले ही चुप हो गया, लेकिन भारती कहां चुप होने वाली थी. वह उसी दिन नरेश से मिली और पूरी बात बता कर बोली, “आज तो किसी तरह बच गई, लेकिन इस तरह कब तक चलेगा. जो कुछ भी करना है, जल्दी करो.”

नरेश ने कहा, “पहले तो हम घर वालों से कहेंगे कि वे हमारी शादी कर दें. नहीं करेंगे तो मैं तुम्हें ले कर कहीं दूर चला जाऊंगा, जहां घर वाले पहुंच ही नहीं पाएंगे.”

भारती को नरेश पर पूरा विश्वास था, वह उस से अलग होना भी नहीं चाहती थी, इसलिए वह उस के साथ भागने को तैयार थी. लेकिन जब एक दिन गिरिराज ने बेटी को नरेश के साथ देख लिया तो उसे ममझते देर नहीं लगी कि बेटी ने उस से झूठ बोला था.

उस ने पत्नी से कहा, “भारती पर नजर रखो, उस का घर से बाहर निकलना बंद कर दो, वरना यह हमारी नाक कटवाने वाली है.”

इस के बाद भारती पर नजरों के पहरे लग गए. उस का बाहर आनाजाना बंद कर दिया गया. यही नहीं, सोचविचार कर गिरिराज ने बड़े दामाद शैलेंद्र को फोन कर के बुलाया और पूरी बात बता दी. इस पर शैलेंद्र ने कहा, “आप नरेश के पिता से मिलें और उन से कहें कि वह बेटे को समझाएं.”

गिरिराज ने हुकुम सिंह से शिकायत की तो उन्होंने नरेश को समझाने का आश्वासन ही नहीं दिया, बल्कि समझाया भी. लेकिन नरेश को तो जैसे ऐसे ही मौके की तलाश थी. उस ने कहा, “पापा, मैं भारती से प्यार करता हूं और उस से शादी करना चाहता हूं.”

“तुम्हारा दिमाग तो ठीक है,” हुकुम सिंह ने उसे डांटा, “ऐसा कतई नहीं हो सकता. एक तो वह गांव की है, दूसरे दूसरी जाति की है. तुम जानते हो गांव में ठाकुरों के सिर्फ 4 ही घर हैं. कुशवाहा ज्यादा हैं. अगर कुछ उल्टासीधा किया तो इस का खामियाजा पूरे परिवार को भुगतना पड़ेगा.”

बाप की इस बात से नरेश की समझ में आ गया कि भारती को भगा कर ले जाना ठीक नहीं है. क्योंकि अगर वह उसे भगा कर ले गया तो गांव के कुशवाहा उस के घर वालों का जीना हराम कर देंगे. अब उसे गांव में ही रह कर अपने और भारती के घर वालों को मनाना होगा.

नरेश ने गिरिराज को संदेश भिजवाया कि वह भारती से प्यार करता है और शादी करना चाहता है. वह वादा करता है कि भारती को खुश रखेगा. लेकिन जब यह संदेश गिरिराज को मिला तो वह उबल पड़ा. उस ने नरेश को तो कुछ नहीं कहा, लेकिन भारती की जम कर पिटाई कर दी. उस का कहना था कि उसी की वजह से आज उसे यह दिन देखना पड़ा है.

भारती की बहनों और बहनोइयों ने भी उसे समझाया. लेकिन उस ने साफ कह दिया कि वह शादी करेगी तो नरेश से, वरना पूरी जिंदगी कुंवारी रहेगी. हुकुम सिंह और उन की पत्नी शांति भी नरेश को समझा रहे थे कि वह ऐसा कोई काम न करे, जिस से परिवार को परेशानी हो.

इस आशिकी की वजह से दोनों परिवारों में काफी तनाव था. गांव भी इस आशिकी से अंजान नहीं था. गिरिराज ने बदनामी से बचने के लिए दिसंबर के पहले सप्ताह में गांव की पंचायत बुलाई. पंचायत में दोनों ही बिरादरी के लोग शामिल थे. सभी इस शादी के खिलाफ थे, इसलिए सभी ने नरेश और भारती को समझाया कि वे ऐसा न करें. उन के ऐसा करने से गांव की बदनामी तो होगी ही, आने वाली पीढ़ी पर भी इस का बुरा असर पड़ेगा.

लेकिन नरेश और भारती उन की बातों से सहमत नहीं थे. उन का कहना था कि वे नए जमाने के लोग हैं. वे अपनी खुशी देखते हैं, परंपरा नहीं. इस पर बुजुर्गों ने उन्हें डांट कर चुप करा दिया और कहा कि वे जो चाहते हैं, वैसा कतई संभव नहीं है.

“तो फिर ठीक है, आप सभी हमें हमारे हाल पर छोड़ दीजिए. हम अपनीअपनी दुनिया में एकदूसरे की यादों के सहारे जी लेंगे.” भारती ने कहा.

इस पर कुशवाहा नाराज हो गए. उन का कहना था कि बेटी को अविवाहित कैसे रखा जा सकता है. लेकिन भारती का बागी सुर मुखर हो उठा, “कुछ भी हो, मैं नरेश के अलावा किसी और से शादी नहीं कर सकती.”

दोनों की जिद को देखते हुए पंचायत ने फैसला किया कि इन्हें गांव से बाहर रिश्तेदारियों में भेज दिया जाए. गिरिराज को लगा कि बेटी ने उस का सिर झुका दिया है, इसलिए उस ने पंचायत के सामने कहा, “अगर ऐसा कुछ हुआ तो वह दोनों को काट कर रख देगा.”

ठाकुरों ने कोई जवाब नहीं दिया. उन का सोचना था कि कुछ दिन दोनों अलग रहेंगे तो सब ठीक हो जाएगा. उस समय यह किसी ने नहीं सोचा था कि गिरिराज ने जो कहा है, वह सचमुच ही वैसा कर डालेगा.

जो छिपा था, इस पंचायत के बाद पूरी तरह खुल गया. नरेश और भारती जो अब तक लुकछिप कर मिलते थे, वे खुलेआम मिलने लगे. शांति को बेटे की जान खतरे में लगी तो उस ने उसे बेटी के पास दिल्ली भेज दिया.

लेकिन पंचायत में जो हुआ था, उस से गिरिराज को लग रहा था कि उस की मूंछें नीची हो गई हैं. मूंछें उठाने के लिए उसे कुछ करना ही होगा. उस ने अपनी जाति के कुछ लोगों से बात की तो उन्होंने कहा कि बेटी को खत्म कर दो, सारा झंझट खत्म हो जाएगा. इज्जत भी बच जाएगी.

गिरिराज ने भारती को खत्म करने का इरादा तो बना लिया, लेकिन उसे लगा कि भारती की हत्या पर नरेश चुप नहीं बैठेगा. क्योंकि वह उसे जान से ज्यादा प्यार करता है. भारती की मौत का संदेह होते ही वह पुलिस के पास पहुंच जाएगा. जब इस बात पर गहराई से विचार किया गया तो उस के बड़े दामाद शैलेंद्र ने कहा, “दोनों को खत्म कर देते हैं. किसी ठाकुर में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह पुलिस के पास जा कर शिकायत करेगा.”

दामाद की बात गिरिराज को भी उचित लगी. लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था. गांव में कत्ल करने पर वे पकड़े जा सकते थे. इसलिए योजना बनी कि कहीं दूर ले जा कर दोनों को मारा जाए. इस के लिए भारती को विश्वास में लेना जरूरी था. घर वालों ने कोशिश भी शुरू कर दी. लेकिन भारती को विश्वास नहीं हो रहा था. उसे विश्वास तब हुआ, जब जलदेवी उस के लिए शादी का जोड़ा खरीद कर ले आई. इस के बाद भारती को लगा कि उस के घर वाले सचमुच शादी को तैयार हैं.

मां ने ही नहीं, पिता ने भी कहा, “हमारी समझ में आ गया है कि तू सचमुच नरेश को बहुत प्यार करती है. फिर इस में बुराई ही क्या है. नरेश है भी तो ऊंची जाति का. मुझे पहले लगता था कि वह धोखा दे देगा. लेकिन अब हमें उस पर भी विश्वास हो गया है. वह तुझ से शादी कर के तुझे सुखी रखेगा.”

भारती को पिता की बातों पर विश्वास तो नहीं हो रहा था, लेकिन उसे उस की बातों में कोई साजिश भी नजर नहीं आ रही थी. वह कुछ नहीं बोली तो गिरिराज ने कहा, “गांव में तो हम तेरी शादी करा नहीं सकते, क्योंकि गांव वाले यह शादी कतई नहीं होने देंगे. तू ऐसा कर, नरेश को प्रिंस के ढाबे पर बुला ले. हम उसे ले कर ग्वालियर के किसी मंदिर चलते हैं और वहीं तुम दोनों की शादी करा देते हैं.

नगला लालजीत गांव ग्वालियर के लिए जाने वाले हाईवे के किनारे बसा है. भारती जानती थी कि गांव वाले उस की शादी का विरोध कर रहे हैं. इसीलिए मम्मीपापा उस की शादी गांव से बाहर किसी मंदिर में करना चाहते हैं. उस ने नरेश को फोन कर के सारी बात बताई तो वह बहुत खुश हुआ.

किसी को कुछ बताए बगैर वह उसी रात प्रिंस के ढाबे पर पहुंच गया. गिरिराज पत्नी और भारती के साथ वहां पहले से मौजूद था. उस ने उसे गाड़ी में बैठाया और चल पड़ा. भारती और नरेश पिछली सीट पर एक साथ बैठे थे. वे सुनहरे भविष्य की कल्पनाओं में इस तरह खोए थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब गाड़ी मौजपुरा के जंगल में पहुंच गई.

वहां पहुंचते ही नरेश समझ गया कि ये लोग उस की शादी कराने नहीं, उन्हें मारने लाए हैं. क्योंकि पीछे से भारती का बहनोई शैलेंद्र मोटरसाइकिल से भी वहां पहुंच गया था. नरेश तो कुछ नहीं बोला, लेकिन भारती फट पड़ी, “तुम लोग इतने बड़े धोखेबाज निकलोगे, मैं ने सोचा भी नहीं था. इस से अच्छा तो तुम लोगों ने पैदा होते ही मेरा गला घोंट दिया होता. “

नरेश और भारती ने जिंदगी के लिए संघर्ष तो बहुत किया, लेकिन उन लोगों ने नरेश को उस के मफलर तथा भारती को उस की शाल से गला घोंट कर मार दिया. दोनों लाशें वहीं छोड़ कर सभी लौट आए. भारती के पास शिनाख्त लायक वैसे भी कुछ नहीं था, नरेश की जेबों से भी सब कुछ निकाल लिया गया था. सभी यह सोच कर निश्चिन्त थे कि पुलिस उन तक पहुंच नहीं पाएगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

अगले दिन राजस्थान के जिला धौलपुर के थाना मनियां के थानाप्रभारी रतन सिंह को जंगल में 2 लाशें पड़ी होने की सूचना मिली तो सहयोगियों के साथ वह वहां पहुंच गए. उन्होंने शिनाख्त के लिए दोनों लाशों की तलाशी ली तो लड़की के पास से तो कुछ नहीं मिला, लेकिन लड़के की जेब से परिचय पत्र मिल गया, जिस से पता चला कि वह आगरा के गांव नगला लालजीत का रहने वाला है.

लाशों पर चोटों के निशान के अलावा लड़के के गले पर मफलर और लड़की के गले पर शाल कसा हुआ था. इस से पुलिस को लगा कि इन्हें गला घोंट कर मारा गया है. हमउम्र लडक़ा-लड़की की लाशें होने की वजह से यह भी अंदाजा लगाया गया कि यह प्रेमी जोड़ा रहा होगा और घर वालों ने ही इन की हत्याएं की हैं.

राजस्थान पुलिस लाशों की खबर ले कर नगला लालजीत स्थित हुकुम सिंह के घर पहुंची तो हडक़ंप मच गया. वहीं पूछताछ में पता चला कि दूसरी लाश गांव के गिरिराज कुशवाहा की बेटी भारती की थी.

गांव में तो किसी ने कुछ नहीं बताया, लेकिन जब हाईवे पर बने टोल प्लाजा पर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज चेक की गई तो उस में गिरिराज और जलदेवी के साथ गाड़ी में बैठे नरेश और भारती दिख गए. इसी के आधार पर थाना मनियां पुलिस ने पतिपत्नी को हिरासत में ले लिया. पोस्टमार्टम के बाद दोनों लाशें घर वालों को सौंप दी गई थीं. गांव ला कर उन का अंतिम संस्कार कर दिया गया था.

थाने ला कर गिरिराज और जलदेवी से पूछताछ शुरू हुई. वे कोई पेशेवर अपराधी तो थे नहीं, जल्दी ही उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पुलिस जानती थी कि केवल ये दोनों नरेश और भारती की हत्या नहीं कर सकते. इस के बाद पुलिस ने उन से शैलेंद्र का भी नाम उगलवा लिया.

लेकिन शैलेंद्र डर के मारे फरार हो चुका था. पुलिस ने गिरिराज की निशानदेही पर नरेश का सामान, वह गाड़ी, जिस से भारती और नरेश को ले जाया गया था, बरामद कर ली थी. इस के बाद दोनों को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया था.

कथा लिखे जाने तक शैलेंद्र को भी गिरफ्तार कर के पुलिस ने जेल भेज दिया था. सभी जेल में बंद थे, किसी भी अभियुक्त की जमानत नहीं हुई थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

दूसरी शादी का दुखद अंत

एक क्रूर औरत की काली करतूत

एक क्रूर औरत की काली करतूत – भाग 4

जब सुमिक्षा का कहीं पता नहीं चला तो बुद्धिविलास कालोनी वालों के साथ थाना सिकंदरा पहुंचा और थानाप्रभारी आशीष कुमार सिंह से मिल कर सुमिक्षा की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

पुलिस ने भी सुमिक्षा की तलाश शुरू की. थानाप्रभारी ने अर्चना से भी पूछताछ की. इस पूछताछ में वह उन के सवालों का जवाब देने के बजाय बेटी को ढूंढ़ कर लाने की बात ज्यादा कर रही थी. वह कालोनी की औरतों के साथ थाने भी गई और वहां धमकी दी कि अगर उस की बेटी नहीं मिलती तो वह कुछ भी कर गुजरेगी.

मामला गंभीर था. पुलिस को सुमिक्षा का कोई सुराग नहीं मिल रहा था. थानाप्रभारी आशीश कुमार सिंह ने मंदिर और परिसर में बने बुद्धिविलास के घर का भी निरीक्षण किया. ऐसा उन्होंने इसलिए किया था, क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि अर्चना गायब बच्ची की सौतेली मां है. इस के अलावा उस की हरकतें भी उन्हें अजीब और संदिग्ध लगी थीं.

थानाप्रभारी आशीष कुमार सिंह को लग रहा था कि लड़की के गायब होने के पीछे उस की सौतेली मां का ही हाथ है. क्योंकि पूछताछ में उस ने पुलिस को बताया था कि पति के जाने के बाद उस ने खुद गेट बंद कर के ताला लगा दिया था. ऐसे में उतनी छोटी बच्ची ऊंची दीवारें फांद कर बाहर नहीं जा सकती थी.

थानाप्रभारी ने कालोनी वालों से अर्चना के व्यवहार के बारे में पता किया तो लोगों ने बताया कि अर्चना सुमिक्षा को बहुत परेशान करती थी. वह नहीं चाहती थी कि सौतेली बेटी उस के साथ रहे. पुलिस को बुद्धिविलास पर भी शक हो रहा था कि पत्नी के साथ वह भी मिला हो सकता है. लेकिन उस की हालत देख कर पुलिस का यह शक जल्दी ही दूर हो गया.

पुलिस को अर्चना पर पूरा शक था. लेकिन सुबूत न होने की वजह से उस पर हाथ नहीं डाल पा रही थी. यह भी निश्चित था कि अगर अर्चना ने सुमिक्षा की हत्या की थी तो लाश घर में ही कहीं छिपा रखी थी. इसलिए पुलिस ने डौग स्क्वायड भी बुलाया. लेकिन डौग स्क्वायड भी सुमिक्षा की लाश का पता नहीं लगा सके.

सुमिक्षा की गुमशुदगी की सूचना पा कर बुद्धिविलास के 2 भतीजे देवेंद्र और विकास भी आ गए थे. उन्होंने भी अर्चना से सुमिक्षा के बारे में पूछा, लेकिन उस ने उन्हें भी कुछ नहीं बताया. इस के बाद उस ने पुलिस को बताया कि एक ज्योतिषी ने उसे बताया है कि सुमिक्षा मथुरा में है. पुलिस की एक टीम मथुरा भी गई, लेकिन सुमिक्षा उन्हें वहां कहां मिलती. अगले दिन उस ने कहा कि उसे सपना आया है कि सुमिक्षा हाथरस में है. पुलिस टीम हाथरस भी गई.

पुलिस को पूरा विश्वास था कि सुमिक्षा को अर्चना ने ही गायब किया है. इसलिए पुलिस उस पर दबाव बनाने लगी. पुलिस के बढ़ते दबाव से डर कर अर्चना ने फोन कर के अपने पिता रमेश मिश्रा को बुला लिया और मौका मिलते ही रात में उन्हें बता दिया कि उस ने सुमिक्षा की हत्या कर दी है और घर के पास गड्ढा खोद कर उसे दफना दिया है.

बेटी के इस खुलासे से रमेश मिश्रा बुरी तरह डर गए. जैसेतैसे रात बिता कर सवेरा होते ही वह बेटे को ले कर राजामंडी रेवले स्टेशन पर पहुंच गए. वह अपने बेटे को इस झंझट से बचाना चाहते थे. उन का बेटे को इस तरह गुपचुप तरीके से ले कर निकल जाना संदेह पैदा कर रहा था.

देवेंद्र और विकास ने राजा मंडी स्टेशन जा कर उन्हें उस समय घेर लिया, जब वह गाड़ी में बैठ चुके थे. वे उन्हें घर ले आए. शिवपूजन से पूछताछ की गई. उस ने बताया कि वह तो सो गया था, इसलिए उसे सुमिक्षा के बारे में कुछ नहीं मालूम, लेकिन दीदी ने उस से कहा है कि पहले दिन उस ने पुलिस को जो बताया था, वही बात सब को बताना. वह सब से वही कहेगा.

24 सितंबर को सीओ हरिपर्वत अशोक कुमार सिंह ने बुद्धिविलास से कहा कि वह अर्चना के साथ सख्ती करे और बेटे की कसम दिला कर सचाई बताने को कहे. इस के बाद बुद्धिविलास ने अर्चना को मंदिर में देवी के सामने खड़ी कर के कहा कि वह बेटे के सिर पर हाथ रख कर कहे कि उसे सुमिक्षा के बारे में कुछ नहीं पता तो वह मान लेगा कि वह सच बोल रही है.

बेटे की कसम खाने की बात आई तो अर्चना टूट गई और उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने सुमिक्षा को बेहोश कर के जीवित ही गड्ढा खोद कर गाड़ दिया है.

सच्चाई जान कर बुद्धिविलास ने सिर पीट लिया. इस के बाद उस ने फोन कर के थाना सिकंदरा को सूचना दे दी. थानाप्रभारी आशीष कुमार सिंह पुलिस बल के साथ तुरंत मंदिर आ पहुंचे. उन्होंने गड्ढा खुदवा कर लाश निकलवाई तो लाश देख कर कालोनी की औरतें ही नहीं, आदमी भी रो पड़े.

मासूम बच्ची की लाश की स्थिति देख कर भीड़ बेकाबू हो गई और बुद्धिविलास सहित घर के सभी लोगों की पिटाई कर दी. पुलिस किसी तरह बचा कर अर्चना को महिला थाने ले आई. अर्चना का मैडिकल बड़े ही गुपचुप रूप से कराया गया. कालोनी की औरतें उसे मारने को तैयार थीं.

25 सितंबर को भारी पुलिस सुरक्षा में अर्चना को स्पेशल सीजेएम कृष्णचंद पांडेय की अदालत में पेश किया गया. उन्होंने उसे जेल भेज दिया. अदालत में मौजूद महिलाओं ने भारी पुलिस व्यवस्था के बावजूद अर्चना के मुंह में स्याही पोत दी.

अजय कौशिक और उन की पत्नी संध्या का कहना है कि अगर उन्हें जरा भी अहसास होता कि सौतेली मां अर्चना हत्यारिन भी हो सकती है तो वह बच्ची सुमिक्षा को अपने पास ही रख लेते.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

एक क्रूर औरत की काली करतूत – भाग 3

इस के बाद अर्चना अपनेआप ही ससुराल आ गई. आने पर जब उसे पता चला कि उस के जाने के बाद से सुमिक्षा संध्या के यहां रह रही है तो उस ने बुद्धिविलास से कहा कि अपनी बेटी को दूसरे के घर भेजने की क्या जरूरत थी. वह उसे तुरंत घर ले आए.

बुद्धिविलास सुमिक्षा को लेने संध्या के घर गया तो वह अपने घर आने को तैयार नहीं थी. संध्या पिता की मरजी के बगैर बच्ची को कैसे रोक सकती थीं, इसलिए उन्होंने सुमिक्षा को समझाबुझा कर उस के साथ भेज दिया.

उसी बीच बुद्धिविलास ने सुमिक्षा के नाम 50 हजार की एक एफडी कराई तो अर्चना को लगा कि बुद्धिविलास अपना सब कुछ सुमिक्षा को ही दे देगा. अगर ऐसा हुआ तो उस के बेटे का क्या होगा.

इस के बाद अर्चना ने बुद्धिविलास से कहसुन कर अपने छोटे भाई शिवपूजन को पढ़ने के लिए अपने पास बुला लिया. अर्चना ने उस का दाखिला आगरा में गौतम ऋषि इंटर कालेज में छठीं कक्षा में करवा दिया. शिवपूजन के आने से सुमिक्षा की परेशानी और बढ़ गई. अब भाईबहन, दोनों सुमिक्षा को परेशान करने लगे. भाई के आने से अर्चना के इरादे को और मजबूती मिली. मन ही मन वह सुमिक्षा से छुटकारा पाने की योजना बनाने लगी.

जब उस की योजना बन गई तो वह बुद्धिविलास के बाहर जाने का इंतजार करने लगी. योजनानुसार उस ने सुमिक्षा के प्रति अपना व्यवहार पूरी तरह बदल लिया था. वह सुमिक्षा से इस तरह प्यार का नाटक करने लगी, जैसे एक मां करती है. बुद्धिविलास को इस से हैरानी तो हुई, लेकिन सोचा शायद मायके वालों ने समझाया हो, इसलिए उसे सद्बुद्धि आ गई है.

एक दिन सुमिक्षा ने कोई शरारत की तो अर्चना ने कहा, ‘‘अब तुम बहुत शरारती हो गई हो. अगर तुम्हारा यही हाल रहा तो मैं तुम्हें गांव भेज दूंगी.’’

ऐसा अर्चना ने योजनानुसार कहा था. लेकिन सुमिक्षा डर गई. क्योंकि वह गांव नहीं जाना चाहती थी. अर्चना भी उसे गांव नहीं भेजना चाहती थी. यह तो उस की योजना का एक हिस्सा था. वह चाहती थी कि सुमिक्षा सब से बताए कि मम्मी उसे गांव भेज रही हैं. अपनी इस साजिश में अर्चना सफल भी रही. सुमिक्षा ने यह बात सांध्या कौशिक को बताई. उन्हें लगा कि अर्चना ने उसे डराने के लिए ऐसा कहा होगा. इसलिए उन्होंने उसे आश्वस्त किया कि वह डरे न, उसे कोई गांव नहीं भेजेगा.

एक दिन बुद्धिविलास ने कहा कि उन्हें मूर्तियों के लिए मुकुट खरीदने मथुरा जाना है तो अर्चना की आंखों में चमक आ गई. वह अपनी योजना को अंजाम देने की तैयारी करने लगी. पहला काम तो उस ने यह किया कि अपने आवास के पास खाली पड़ी जमीन में कई गड्ढे खोद डाले. दोपहर में बुद्धिविलास खाना खाने आया तो उन गड्ढों को देख कर पूछा, ‘‘अरे इतने गड्ढे क्यों खोद डाले हैं?’’

‘‘पेड़ लगाने हैं, इसीलिए खोदे हैं.’’ अर्चना ने कहा.

अर्चना की इस बात पर बुद्धिविलास को हैरानी हुई कि अचानक इस के मन में पेड़ लगाने की बात कहां से आ गई. यही सोच कर उस ने कहा, ‘‘तुम्हारे मन में अचानक पेड़ लगाने की बात कहां से आ गई?’’

‘‘टीवी में देखा था. उसी में देख कर सोचा कि मैं भी अपने घर के आसपास पेड़ लगा दूं तो हराभरा रहेगा.’’

21 सितंबर को बुद्धिविलास को मथुरा जाना था. उस से एक दिन पहले यानी 20 सितंबर को अर्चना ने सुमिक्षा से कहा कि वह संध्या से कह देगी कि अगले दिन वह उन के घर नहीं आ पाएगी. जब यह बात सुमिक्षा ने संध्या से कही तो उस ने पूछ लिया कि क्यों नहीं आएगी तो सुमिक्षा ने कहा कि उसे नहीं मालूम, मम्मी ने ऐसा कहने को कहा है.

अगले दिन 21 सितंबर को बुद्धिविलास 10 बजे के आसपास मथुरा के लिए निकल गया. पति के जाते ही अर्चना ने मंदिर परिसर का बाहरी गेट बंद कर के अंदर से ताला लगा दिया. इस के बाद रसोई में जा कर मैगी बनाई और सुमिक्षा को खाने के लिए दे कर खुद गड्ढा खोदने लगी.

भाई ने पूछा कि वह गड्ढा क्यों खोद रही है तो उस ने कहा, ‘‘तू अंदर जा कर सो जा, मैं क्या कर रही हूं, इस बात पर ध्यान न दे.’’

शिवपूजन जा कर सो गया. अर्चना ने साढ़े 3 फुट गहरा गड्ढा खोद डाला. गड्ढा खोद कर अर्चना अंदर पहुंची तो देखा सुमिक्षा बेहोश पड़ी थी. दरअसल उस ने मैगी में नशीली दवा मिला दी थी, इसलिए मैगी खा कर सुमिक्षा बेहोश हो गई थी.

अर्चना ने बेहोश पड़ी सुमिक्षा के दोनों हाथ पीछे बांध कर मुंह और नाक में कपड़ा ठूंस दिया. इस के बाद ऊपर से पौलीथिन लपेट कर उसे उठाया और गड्ढे में लेटा कर ऊपर से 2 थैली नमक डाल कर गड्ढे को ढक दिया. नमक उस ने इसलिए डाला था, ताकि लाश जल्दी गल जाए.

किसी को संदेह न हो, अर्चना ने गड्ढे के ऊपर पत्थर रख कर हवन कुंड बना दिया और उस के पास तुलसी का एक पेड़ लगा दिया. बुद्धिविलास के आने से पहले उस ने वहां दिया जला कर तमाम अगरबत्तियां भी सुलगा दीं.

शाम 7 बजे के आसपास बुद्धिविलास ने आते ही सुमिक्षा को आवाज दी. सुमिक्षा कहां से बोलती. उसे तो अर्चना ने ऐसी जगह भेज दिया था, जहां से कोई लौट कर नहीं आता. अर्चना ने कहा, ‘‘वह तो सुबह से ही गायब है.’’

‘‘क्या… सुबह से गायब है? तुम ने उसे ढूंढ़ा भी नहीं?’’ बुद्धिविलास थोड़ा गुस्से में बोला.

‘‘मुझे पता था, तुम यही कहोगे. तुम ने कैसे सोच लिया कि मैं ने उसे ढूंढ़ा नहीं. मैं ने सब जगह जा कर उसे ढूंढ़ा है, लेकिन किसी से पूछा नहीं. क्योंकि सब यही कहते कि सौतेली मां हूं, इसलिए मैं ने ही गायब कर दिया है. जब तुम इस तरह कह रहे हो तो दूसरे क्यों नहीं कहेंगे?’’ अर्चना ने रोते हुए कहा.

बुद्धिविलास उठा और पैर पटकते हुए घर से निकल गया. सीधे वह संध्या कौशिक के घर पहुंचा. जब उस ने उन से सुमिक्षा के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, ‘‘सुमिक्षा तो मुझ से कह गई थी कि आज वह मेरे घर नहीं आ पाएगी.’’

सुमिक्षा और कहीं नहीं जा सकती थी. साफ हो गया कि वह गायब हो गई है. थोड़ी ही देर में यह बात पूरी कालोनी में फैल गई. सभी एकदूसरे से पूछने लगे. इस से यह बात साबित हो गई कि सभी को सुमिक्षा से सहानुभूति थी. सभी उस की तलाश में लग गए. बुद्धिविलास पागलों की तरह अपना सिर पीट रहा था.

दूसरी शादी का दुखद अंत – भाग 3

शैफी मोहम्मद उर्फ शैफिया अपने 2 भाइयों अकबर, छोटा और 2 बहनों अकबरी तथा अन्ना के साथ रहता था. उस के बहन भाई सयाने हुए तो एकएक कर के उस ने सभी की शादियां कर दीं. पिता का इंतकाल हो चुका था, इसलिए यह जिम्मेदारी उसे ही निभानी पड़ी थी. उस की पत्नी रेशमा 3 बच्चों को जन्म दे कर चल बसी थी. बच्चे छोटे थे, इसलिए घर वालों के कहने पर उस ने दूसरी शादी कर ली.

दूसरी शादी उस ने एटा के थाना जलेसर के गांव ताज खेरिया के रहने वाले इमरान हुसैन की बड़ी बेटी जरीना से की थी. वह कुंवारी थी, इसलिए वह अपने ही जैसे किसी लड़के से शादी करना चाहती थी. लेकिन पिता की हैसियत उस के इस सपने का रोड़ा बन गई. शैफी का परिवार आर्थिक रूप से बहुत ज्यादा संपन्न था, इसीलिए इमरान हुसैन ने उम्र में बड़े और 3 बच्चों के बाद शैफी से उस का निकाह कर दिया था.

शैफी अधेड़ था, जबकि जरीना लड़की. जरीना के जवान होतेहोते शैफी बूढ़ा हो गया. एक बूढ़ा आदमी किसी जवान की इच्छा कैसे पूरी कर सकता है. ऐसा ही कुछ जरीना के साथ भी था. शैफी कभी भी जरीना की इच्छा पूरी नहीं कर सका. अधूरी इच्छाओं को पूरा करने के लिए ही जरीना वकील के साथ भाग निकली थी.

दिन, महीने और साल गुजर गए. धीरेधीरे ढाई साल बीत गए. शैफी के घर वाले जरीना को भूलने लगे थे कि तभी उन्हें उस का सुराग मिल गया था.

इसलामनगर की ही रहने वाली सबीना की शादी हाथरस में हुई थी. एक दिन हाथरस की साप्ताहिक हाट में खरीदारी करती हुई जरीना पर उस की नजर पड़ गई थी. उस समय वकील भी उस के साथ था. जरीना को देख कर सबीना चौंकी. क्योंकि इसलामनगर वालों को लगने लगा था कि जरीना शायद मर गई है. वह छिपछिप कर जरीना का पीछा करते हुए उस के कमरे तक जा पहुंची.

सबीना ने यह बात इसलामनगर में रहने वाले अपने भाइयों को बताई तो उन्होंने जरीना के हाथरस में होने की बात शैफी तक पहुंचा दी. शैफी मोहम्मद को जब पता चला कि जरीना वकील के साथ हाथरस में है तो वह सीधे थाना एत्माद्दौला जा पहुंचा. इस के बाद पुलिस को ले कर वकील के कमरे पर गया. शैफी ने वकील की जम कर पिटाई की और जरीना से अपने साथ चलने को कहा.

लेकिन जरीना ने शैफी के साथ आगरा जाने से मना कर दिया तो सभी को हैरानी हुई. पुलिस ने जबरदस्ती करनी चाही तो जरीना ने अपने और वकील के कोर्टमैरिज का प्रमाणपत्र दिखा दिया. थाना पुलिस चुपचाप लौट आई. शैफी बौखला उठा. शैफी ने जरीना को धमकी दी कि वह ऐसे हालात कर देगा कि वह वकील की भी नहीं रहेगी.

हाथरस से लौट कर शैफी ने भाई फुर्रा और पहली पत्नी के बेटे शमशेर के साथ मिल कर जरीना को सबक सिखाने की योजना बना डाली. फुर्रा और शैफी इस बात से बेहद क्षुब्ध थे कि एक अदना सा लौंडा उन के जैसे प्रभावशाली आदमी के घर की औरत को भगा ले गया. यह लगभग डेढ़ साल पहले की बात है.

इस के बाद योजना पर काम शुरू हो गया. सब से पहले शैफी ने अपनी बड़ी बेटी हसीना को फोन कर के जरीना के बारे में बता कर उस के पास आने जाने को कहा. इस के बाद हसीना शौहर के साथ जरीना के पास आने जाने ही नहीं लगी, बल्कि उस के यहां कईकई दिनों तक रुकने भी लगी.

हसीना ही नहीं, शमशेर और जरीना के अपने बच्चे भी उस के पास हाथरस आनेजाने लगे. इसी आनेजाने में वकील और शमशेर की अच्छी पटने लगी. इधर वकील की आर्थिक स्थिति काफी खराब हो चुकी थी. इसलिए उस ने शमशेर से कहीं अच्छी जगह काम दिलाने को कहा. वकील अच्छा मोटर मैकेनिक था, लेकिन जहां वह काम करता था, वहां ज्यादा काम नहीं आता था, इसलिए उस की ढंग की कमाई नहीं हो पाती थी.

शमशेर को ऐसे ही मौके की तलाश थी. वकील तो पुरानी बातें भूल चुका था, लेकिन शैफी, शमशेर और फुर्रा को उस समय का इंतजार था, जब वह वकील को ठिकाने लगा कर बदनामी का बदला ले सकें.

जुलाई में हसीना के बच्चे की मौत होने की वजह से जरीना उस के यहां चली गई तो घर में वकील अकेला ही रह गया. 25 जुलाई की सुबह शमशेर ने वकील को फोन किया कि अगर वह शाम को कोटला रोड आ जाए तो वह उस की मुलाकात एक वर्कशौप के मैनेजर से करा दे.

वकील को ठीकठाक काम की तलाश थी, इसलिए वह रात 8 बजे के आसपास कोटला रोड पहुंच गया. वकील से बातचीत होने के बाद शमशेर, पिता और चाचा को साथ ले कर हाथरस के लिए रवाना हो गया. 7 बजे के आसपास सभी कोटला रोड पहुंच कर वकील का इंतजार करने लगे. जै

से ही वकील वहां पहुंचा, शमशेर ने उस के पास जा कर कहा, ‘‘मैं शराब की बोतल ले कर आया हूं. आओ पहले मूड बना लेते हैं, उस के बाद मैनेजर से मिलने चलते हैं.’’

शराब की बोतल देख कर वकील से भी नहीं रहा गया और वह शमशेर के पीछेपीछे चल पड़ा. नजदीक ही घना जंगल था. जंगल में अंदर जाने के बजाय वहीं पत्थर पर दोनों बैठ गए. अंधेरा हो ही चुका था. शमशेर ने 2 पैग बनाए. वकील ने गिलास उठा कर जैसे ही मुंह से लगाया, शैफी ने पीछे से आ कर उस के सिर पर भारी पत्थर पटक दिया. पत्थर इतना भारी था कि उसी एक वार में वकील की मौत हो गई.

वकील की मौत के बाद उस की जेब का सारा सामान निकाल कर उसे वहीं बंबे के पास फेंक दिया. उस की शिनाख्त न हो सके, इसलिए उस के चेहरे को उसी पत्थर से कुचल दिया. नफरत की आग में जल रहे शैफी ने उस के पुरुषांग पर जूते से कई ठोकरें मारीं, जिस से वह क्षतिग्रस्त हो गया.

अब तक रात के 9 बज गए थे. तीनों वकील के शव को घसीट कर बंबे के पानी में फेंक देना चाहते थे, लेकिन तभी उन्हें किसी वाहन के आने की आवाज सुनाई दी तो वे लाश को वहीं छोड़ कर भाग निकले. शैफी ने वकील का मोबाइल और रुपए वहीं बंबे में फेंक दिया था.

काल डिटेल्स और लोकेशन से पता चला कि जरीना इस मामले में शामिल नहीं थी. क्योंकि उस के मोबाइल की लोकेशन मथुरा के मांट की ही थी. जरीना की लगभग एक सप्ताह से शमशेर, फुर्रा और शैफी से बात भी नहीं हुई थी. इस से पुलिस ने उसे छोड़ दिया. बाकी अभियुक्तों को पूछताछ के बाद कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक सभी अभियुक्त जेल में थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

प्रेमिका के लिए पत्नी का कत्ल – भाग 3

25 वर्षीया शानू हुस्न की साक्षात मूर्ति थी. दिलफेंक स्वभाव का जसवीर उस दिन के बाद किसी न किसी बहाने उस के घर जाने लगा. शानू को समझते देर नहीं लगी कि जसवीर उस की खूबसूरती का दीवाना हो चुका है और वह उस से नजदीकियां बढ़ाने को बेताब है.

बातों ही बातों में शानू जान गई कि जसवीर मोटा असामी है. उसे लगा कि अगर किसी तरह वह उस की बातों में आ गया तो वह उस के पैसों पर न केवल पूरी जिंदगी ऐश करेगी, बल्कि उस की जायदाद की मालकिन भी बन सकती है. यह सोच कर उस ने जसवीर की उम्र की परवाह न कर के उस से प्रेम में डूबी मीठीमीठी बातें करने लगी.

शानू ने निकटता बढ़ाने के लिए अपना मोबाइल नंबर जसवीर को दे दिया. फिर जसवीर शानू से फोन पर लंबीलंबी बातें करने लगा. कुछ ही दिनों में दोनों इतने नजदीक आ गए कि उन के बीच अंतरंग संबंध बन गए.

जसवीर ने सूखा छावनी में हरिओम के घर में एक कमरा किराए पर ले रखा था. वहां उस का एक दोस्त पिंकू रहता था. पिंकू के साथ वह प्रौपर्टी डीङ्क्षलग का धंधा करता था. शानू से मिलने के लिए यह जगह एकदम सुरक्षित थी. जसवीर जब भी बरेली आता, शानू को फोन कर के वहीं बुला लेता.

जब शानू को विश्वास हो गया कि जसवीर पूरी तरह उस के प्यार की गिरफ्त में आ चुका है और अब वह उस से हर जायजनाजायज मांगे पूरी करवा सकती है तो एक दिन प्यार के हसीन पलों के बीच उस ने जसवीर के आगे शादी का प्रस्ताव रख दिया. जसवीर को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई. उस ने शानू को आगोश में लेते हुए शादी के लिए हां कर दी. लेकिन उस ने यह भी कहा कि शादी के पहले उसे अपनी पत्नी गुरप्रीत को रास्ते से हटाना होगा.

शानू जसवीर के मुंह से पत्नी की हत्या के बाद शादी की बात सुन कर खुश हो गई. इस के बाद वह जब भी जसवीर से मिलती, उस के ऊपर शादी के लिए दबाव जरूर डालती.

सितंबर में किसी तरह गुरप्रीत को पता चल गया कि जसवीर का संबंध बरेली की किसी लडक़ी से है तो वह उस पर उस लडक़ी से संबंध तोडऩे के लिए दबाव डालने लगी. लेकिन जसवीर तो उसे ही रास्ते से हटाना चाहता था. इसलिए उस ने गुरप्रीत की हत्या की तैयारी कर ली. वह पिंकू उर्फ महेंद्र के साथ शानू से मिलने जौहरपुर गया. पिंकू जसवीर की हर बात का राजदार था.

शानू को ले कर वे सीबीगंज के परसाखेड़ा इंडस्ट्रियल एरिया पहुंचे, जहां तीनों ने गुरप्रीत को रास्ते से हटाने की योजना बना डाली. वहां से घर लौट कर जसवीर मौके की तलाश में लग गया. गुरप्रीत को विश्वास में लेने के लिए अब वह उस से प्यार से पेश आने लगा. जसवीर का बदला व्यवहार देख कर मासूम गुरप्रीत को लगा कि शायद जसवीर की अक्ल ठिकाने आ गई है. वह उस की बातों पर विश्वास करने लगी.

21 नवंबर को जसवीर ने गुरप्रीत से बच्चों से मिलने के लिए शहर चलने को कहा तो बच्चों से मिलने के लिए लालायित गुरप्रीत उस के साथ चलने को तैयार हो गई. इस के बाद जसवीर ने पिंकू को फोन कर के बता दिया कि वह कल गुरप्रीत को ले कर शहर आएगा, इसलिए वह उस की हत्या की पूरी तैयारी कर ले.

22 नवंबर को भी जसवीर ने सुबह पिंकू को फोन किया. इस के बाद अपनी योजना के अनुसार, वह सुबह 10 बजे गुरप्रीत को ले कर घर से निकला और फतेहगंज पश्चिमी होता हुआ मिलक पहुंचा. वहां जसवीर की मामी रहती थीं. कुछ देर वहां रुक कर वह फतेहगंज और सीबीगंज होता हुआ अपने बच्चों के पास छावनी हार्डमैन पहुंचा.

गुरप्रीत को बच्चों के पास छोड़ कर वह सूखा छावनी में पिंकू से मिला और उस से कहा कि वह शाम 6 बजे गुरप्रीत को अपनी मोटरसाइकिल से ले कर सोहरा होता हुआ घर की ओर जाएगा, वह नत्थू मुखिया के खेतों के पास उस से मिले. उसी सुनसान जगह पर गुरप्रीत की हत्या करनी है.

पिंकू को गुरप्रीत की हत्या की योजना समझा कर जसवीर बच्चों के पास लौट आया. शाम 6 बजे वह गुरप्रीत के साथ वापस घर जाने के लिए निकला तो रास्ते में फतेहगंज पश्चिमी चौराहे पर रुका. वहां उस ने कृष्णा से गन्ने के रुपए लिए. उसी बीच पिंकू पहले से तय योजना के अनुसार, अगरास जाने वाले रास्ते से कैथोला बेनीराम गांव के बाहर नत्थू मुखिया के खेतों के पास पहुंच गया और जसवीर के आने का इंतजार करने लगा.

जसवीर वहां पहुंचा तो पिंकू ने उसे हाथ दे कर रोक लिया. जसवीर ने गुरप्रीत को मोटरसाइकिल से उतरने के लिए कहा. अपनी हत्या से अनजान गुरप्रीत मोटरसाइकिल से उतर कर खड़ी हो गई. इस के बाद जसवीर ने अपनी मोटरसाइकिल खड़ी की और कमर में खोंसा तमंचा निकाल कर उस की कनपटी से सटा कर गोली चला दी. गोली लगते ही गुरप्रीत गिर कर तड़पने लगी. इस के बाद पिंकू ने तमंचा निकाला और गुरप्रीत के सीने में गोली मार दी.

इस के बाद पहले से तय योजना के अनुसार, पिंकू ने अपने तमंचे में दोबारा गोली भरी और जसवीर के कान के पास लगा कर गोली चला दी, ताकि पुलिस के सामने वह खुद को निर्दोष बता कर गुरप्रीत की हत्या का आरोप अपने पुराने दुश्मन नबी बख्श पर लगा सके. इस के लिए उस ने अपनी जान की भी परवाह नहीं की. जब पुलिस ने नबी बख्श को नहीं पकड़ा तो उस ने पेट के पास तमंचा सटा कर गोली मारी और थाने पहुंच गया. लेकिन पुलिस के सामने उस की यह चालाकी भी काम नहीं आई और वह पकड़ा गया.

अनिल कुमार सिरोही ने उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त उस का तमंचा नत्थू मुखिया के खेत के पास से बरामद कर लिया. इस के बाद उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. पुलिस ने मुकदमे में पिंकू और शानू का नाम भी जोड़ दिया है. शानू को धारा 120बी का अभियुक्त बनाया गया है.

कथा लिखे जाने तक पुलिस पिंकू और शानू को गिरफ्तार नहीं कर पाई थी. इस बीच अनिल कुमार सिरोही का तबादला हो गया था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

एक क्रूर औरत की काली करतूत – भाग 2

अर्चना भले ही नहीं चाहती थी कि सुमिक्षा वहां रहे, लेकिन अब तो उसे वहीं रहना था. आखिर वही हुआ, जैसा ऊषा ने कहा था. अर्चना पूरी तरह वैसी सौतेली मां निकली, जैसा सौतेली मांओं के बारे में कहा जाता है. मां के व्यवहार से परेशान मासूम सुमिक्षा अकसर मंदिर के बरामदे में उदास बैठी रहती.

एक तो कालोनी की महिलाओं को पता चल गया था कि सुमिक्षा मंदिर के पुजारी बुद्धिविलास की पहली पत्नी की बेटी है, दूसरे उस में ऐसा न जाने क्या आकर्षण था कि हर महिला उस की ओर आकर्षित हो जाती थी.

सुमिक्षा के आने के बाद अर्चना को बेटा पैदा हुआ, जिस का नाम उस ने सुचित रखा. भाई के पैदा होने से सुमिक्षा का ध्यान मां की ओर से हट कर भाई पर जम गया. वह भाई के साथ अपना दिल बहलाने लगी. लेकिन बेटा पैदा होने के बाद अर्चना और क्रूर हो गई.

मंदिर के पास ही बनी मातृछाया बिल्डिंग में रहने वाले दवा व्यापारी अजय कौशिक की पत्नी संध्या कौशिक भी पूजापाठ के लिए मंदिर आती रहती थीं. एक दिन संध्या पूजापाठ कर के मंदिर के सीढि़यां उतर रही थीं तो सीढि़यों पर उन्हें रोती हुई सुमिक्षा मिल गई. उन्होंने रोने की वजह पूछी तो सुमिक्षा ने बताया कि मम्मी ने मारा है.

संध्या को पता था कि सुमिक्षा की मां अर्चना सौतेली है, जो उसे परेशान करती है. इसलिए उन्हें सुमिक्षा पर दया आ गई और वह बुद्धिविलास से पूछ कर उसे अपने घर ले गईं. उस दिन सुमिक्षा ने अपनी प्यारीप्यारी बातों से संध्या का मन मोह लिया. इस के बाद पता नहीं क्यों उन के मन में आया कि अगर वह सुमिक्षा को अपना लें तो उन के बेटों को एक प्यारी सी बहन मिल जाएगी.

शाम को बुद्धिविलास सुमिक्षा को अपने घर ले गया, पर संध्या की ममता सुमिक्षा के साथ जुड़ चुकी थी. उस दिन के बाद संध्या को सुमिक्षा अपनी बेटी सी लगने लगी. मन की बात जब उन्होंने अपने पति अजय कौशिक से कही तो वह सोच में पड़ गए. पराई बेटी के प्रति पत्नी के मोह ने उन्हें चिंता में डाल दिया था. वह जानते थे कि संध्या को एक बेटी की कमी खलती है, लेकिन दूसरे की बेटी के प्रति इतना प्यार उन की समझ में नहीं आ रहा था.

उस दिन के बाद संध्या अक्सर सुमिक्षा को अपने घर ले आने लगी. इस बीच उन्होंने महसूस किया कि सुमिक्षा काफी बुद्धिमान है. अगर इसे कायदे से पढ़ायालिखाया जाए तो आगे चल कर यह कुछ कर सकती है.

लगातार आते रहने से मासूम सुमिक्षा ने अजय कौशिक के दिल में भी अपने लिए जगह बना ली. अब वह उन के घर को अपना घर समझने लगी और कौशिक दंपति को मम्मीपापा कहने लगी. संध्या ने उस का नया नाम बिट्टू रख दिया. कालोनी वालों को भी पता चल गया कि संध्या सुमिक्षा को बेटी की तरह मानती हैं.

संध्या ने बुद्धिविलास से कहा कि वह सुमिक्षा को पढ़ाना चाहती हैं. अगर वह बुरा न माने तो वह उस का दाखिला करा दें. बुद्धिविलास को भला क्यों बुरा लगता. बेटी पढ़लिख कर कुछ बन जाए, इस से अच्छा और क्या हो सकता था. उस ने हामी भर दी तो भागदौड़ कर के अजय कौशिक ने सुमिक्षा का दाखिला आगरा के जानेमाने कान्वेंट स्कूल सेंट फ्रांसिस स्कूल में करा दिया.

सुमिक्षा स्कूल जाने लगी. स्कूल में सभी को यही लगता था कि वह अजय कौशिक की बेटी है. सुमिक्षा को पढ़ाई में दिलचस्पी थी, उस की राइटिंग भी बहुत अच्छी थी. अजय कौशिक ने सुमिक्षा का ट्यूशन भी कालोनी की टीचर विजय कुलश्रेष्ठ के यहां लगवा दिया था. सुमिक्षा अक्सर संध्या से सौतेली मां के अत्याचारों के बारे में बताती रहती थी.

सुमिक्षा का एक अच्छे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ना अर्चना को जरा भी अच्छा नहीं लग रहा था. सौतेली बेटी के प्रति लोगों का स्नेह उस के मन में ईर्ष्या पैदा कर रहा था. उस ने यह भी महसूस किया था कि बुद्धिविलास अभी भी अपनी पहली पत्नी को भुला नहीं पाया है. उसे लगता था कि जब तक सुमिक्षा उस के साथ रहेगी, तब तक वह पहली पत्नी को भुला भी नहीं पाएगा. इसलिए वह किसी भी तरह सुमिक्षा से छुटकारा पाने के बारे में सोचने लगी.

इस के बाद अर्चना सुमिक्षा को पहले से ज्यादा परेशान करने लगी. डर की वजह से सुमिक्षा पिता से कुछ कहने की हिम्मत नहीं कर पाती थी. लेकिन कालोनी की अन्य औरतों को जब पता चला कि अर्चना इधर सुमिक्षा को कुछ ज्यादा ही परेशान करने लगी है तो उन्होंने इस बात की शिकायत बुद्धिविलास से कर दी.

जब बुद्धिविलास को पता चला कि अर्चना सुमिक्षा को परेशान करती है तो वह बेचैन हो उठा. वह बेटी के लिए ही उसे ब्याह कर लाया था. गुस्से में उस ने अर्चना की पिटाई कर दी.

पति की इस हरकत से अर्चना को बहुत गुस्सा आया. सुमिक्षा से वह वैसे ही नफरत करती थी, इस घटना से उस की नफरत और बढ़ गई. उस ने निश्चय कर लिया कि अब वह सुमिक्षा से छुटकारा पा कर ही चैन की सांस लेगी. इस के बाद वह पति से नाराज हो कर मायके चली गई.

अर्चना के जाने के बाद संध्या सुमिक्षा को अपने घर ले गई. जब सुमिक्षा संध्या के घर महीने भर से ज्यादा रह गई तो संध्या का मन हुआ कि वह सुमिक्षा को कानूनी तौर पर गोद ले लें. इस के लिए उन्होंने बुद्धिविलास से बात की, लेकिन वह तैयार नहीं हुआ.

दूसरी ओर अर्चना मायके पहुंची तो घर वालों की लगा कि वह घूमने आई होगी. लेकिन जब अर्चना ने कहा कि अब वह ससुराल नहीं जाएगी तो रमेश मिश्रा ने कहा, ‘‘बेटी की शादी कर के मांबाप यह सोच लेते हैं कि वे उस से मुक्त हो गए. मैं भी तुम से मुक्त हो चुका हूं. इसलिए अब तुम्हारे लिए इस घर में कोई जगह नहीं है.’’

मायके में अर्चना को कोई कामधाम तो करना नहीं होता था, इसलिए अपना समय वह टीवी पर आने वाले धारावाहिक देख कर बिताती थी. उन में कुछ आपराधिक कहानियों वाले धारावाहिक भी थे. उन्हीं में से कोई धारावाहिक देख कर उस ने सौतेली बेटी सुमिक्षा से छुटकारा पाने का उपाय खोज लिया.

दूसरी शादी का दुखद अंत – भाग 2

जरीना के घर वालों ने शैफी से उस की शादी उस की संपन्नता की वजह से की थी. शैफी 3 बच्चों का बाप था, जबकि जरीना कुंवारी थी. जरीना भले ही शैफी के 7 बच्चों की मां बन गई थी, लेकिन वह शैफी से न कभी तन से संतुष्ट हुई, न मन से. उस ने अपनी जवानी कसमाहट में निकाल दी थी. उस की भावना का जो ज्वार उफान मारता था, शैफी कभी उसे शांत नहीं कर पाया था.

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा. शैफी ने पहली पत्नी से पैदा हुई संतानों का विवाह कर दिया. बड़ी बेटी हसीना का विवाह उस ने मथुरा के मांट कस्बे में किया तो बड़े बेटे शमशेर का विवाह आगरा के ही बाईपुर में किया था.

जरीना शैफी की पहली पत्नी के बेटे शमशेर को अपनी पत्नी के साथ कमरे में सोते देखती तो उस के मन में आता कि अगर उस का विवाह किसी हमउम्र के साथ हुआ होता तो वह भी इसी तरह उस के साथ कमरे में लेटी होती. ऐसा ही कुछ सोचतेसोचते उस की नजर घर के सामने रहने वाले हनीफ खां के बेटे वकील पर पड़ी, जो जवानी की दहलीज पर कदम रख रहा था.

वकील और उस की उम्र का अंतर इसी बात से लगाया जा सकता है कि जरीना की शादी के 2 साल बाद वकील पैदा हुआ था. वकील उम्र के उस दौर से गुजर रहा था, जब औरतें बहुत आकर्षित करती हैं. इस उम्र में अच्छेबुरे और रिश्तेनातों का भी खयाल नहीं रहता. आदमी की यह उम्र जल्द ही भटका देने वाली होती हैं.

जरीना की नजरें वकील पर पड़ीं तो उस ने उसे हुस्न के लटकेझटके दिखाने शुरू किए. महिला देह के आकर्षण में बंधे वकील को भटकते देर नहीं लगी. जरीना की देह को पाने के लिए उस का मन मचल उठा. पिता की मौत के बाद वकील के भाइयों ने घर का बंटवारा कर लिया था. वकील के हिस्से में भी एक कमरा आया था, जिस में वह अकेला ही रहता था. वही कमरा वकील और जरीना के मिलने का साधन बना.

पिता की मौत के बाद वकील का कोई निश्चित ठौर ठिकाना नहीं रहा था तो शैफी ने उस के खानेपीने की व्यवस्था अपने यहां करवा दी थी. कभी वह उन के घर जा कर खाना खा लेता था तो कभी जरीना उस के कमरे पर जा कर खाना दे आती थी. ऐसे ही पलों में दोनों का एकदूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ा था और परिणामस्वरूप उन के बीच अवैध संबंध बन गए थे.

दोनों मौके का फायदा उठा रहे थे. कोई उन पर शक भी नहीं करता था. इस की वजह दोनों की उम्र का अंतर था. जरीना की उम्र वकील की उम्र से दोगुनी से अधिक थी. दोनों मांबेटे जैसे लगते थे.

धीरेधीरे महीनों बीत गए. जरीना को प्रेमी से छिपछिप कर मिलना अच्छा नहीं लगता था. वह प्रेमी के साथ खुल कर मौजमजा करना चाहती थी. शैफी उस की जो इच्छाएं पूरी नहीं कर सका था, अब वह अपने आशिक के साथ पूरी कर लेना चाहती थी. लेकिन यह तभी संभव था, जब दोनों साथ रहें.

जरीना वैसे भी शैफी से बुरी तरह ऊब चुकी थी. इसी का नतीजा था कि उस ने अपनी आधी से भी कम उम्र के प्रेमी वकील के साथ भागने का निश्चय कर लिया. अपने शरीर के आकर्षण की बदौलत उस ने प्रेमी वकील को इस के लिए भी राजी कर लिया. वकील अकेला तो था ही, शायद इसीलिए जरीना ने जब उस से भागने को कहा तो वह खुशीखुशी तैयार हो गया.

योजना बनी और फिर उसी योजना के अनुसार एक दिन हैदराबाद जाने की बात कह कर वकील अपने कमरे पर ताला लगा कर जरूरत का सारा सामान अपने साथ ले कर चला गया.

वकील ने घर में भले ही हैदराबाद बताया था, लेकिन वह हाथरस गया था, जहां पहले ही उस ने मोहल्ला वालापट्टी में कमरा किराए पर ले रखा था. आगरा वाले कमरे का सामान उस ने वहां पहुंचा दिया. वह अपने साथ ऐसा कोई सामान नहीं ले गया था, जिस से लोग उस पर शक करते. वकील के जाने के 15 दिनों बाद अचानक एक दिन जरीना भी घर से गायब हो गई.

जरीना का इस तरह अचानक घर से गायब हो जाना हैरानी वाली बात थी. 7 बच्चों की मां जरीना के बेटे बेटियों में 2 की तो शादी भी हो चुकी थी. सालभर पहले वह नानी भी बन चुकी थी, इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता था कि किसी के प्रेम में पागल हो कर वह पति और बच्चों को छोड़ कर भाग गई होगी. 45-50 वर्षीया जरीना का अपने शौहर शैफी से कोई झगड़ा वगैरह भी नहीं हुआ था. वह किसी पराई औरत के प्यार में पागल भी नहीं था कि घर में किसी तरह का क्लेश रहा हो.

पूरे परिवार ने जरीना को कहांकहां नहीं खोजा, लेकिन उस का कोई सुराग नहीं मिला. शैफी उत्तर प्रदेश के शहर आगरा के थाना एत्माद्दौला के मोहल्ला इसलामनगर का रहने वाला था. मोहल्ले में उस की गिनती एक तरह से संपन्न और प्रभावशाली लोगों में होती थी. इसलिए दुख की इस घड़ी में पूरा मोहल्ला उस के साथ था. जरीना की खोजखबर में सभी उस की मदद कर रहे थे.

कई दिन बीत गए और जरीना का कुछ पता नहीं चला तो मोहल्ले के कुछ वरिष्ठ और प्रभावशाली लोगों के साथ वह थाना एत्माद्दौला पहुंच गया. थाना पुलिस ने जरीना की गुमशुदगी दर्ज कर ली और कहा कि वह तो जरीना को तलाश करेगी ही, वह खुद भी उस की तलाश करता रहे. यह 4 साल पहले की बात है.

पुलिस को जरीना की क्या चिंता थी, जो उस के पीछे भागती. लेकिन शैफी की तो पत्नी थी, इसलिए वह लगातार उस की तलाश करता रहा. अगर जरीना अपना मोबाइल फोन साथ ले गई होती तो उस के लोकेशन के आधार पर थाना पुलिस शायद उस का पता लगा लेती. लेकिन जरीना का फोन उस के बैड पर पड़ा मिला था.

दिन, हफ्ते, महीने ही नहीं, पूरे ढाई साल गुजर गए, जरीना का कुछ पता नहीं चला. वह जिंदा है या मर गई, इस बात का भी कुछ पता नहीं चला था. उस का इस तरह रहस्यमय ढंग से गायब हो जाना मोहल्ले वालों के लिए हैरानी की बात थी.

प्रेमिका के लिए पत्नी का कत्ल – भाग 2

गुरप्रीत की पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, गोली उसे कनपटी से सटा कर मारी गई थी. जबकि जसवीर का कहना था कि बदमाशों ने मोटरसाइकिल रुकवा दूर से उस पर और गुरप्रीत पर गोली चलाई थी. जसवीर और नबी बख्श के बयानों की सच्चाई पता लगाने के लिए उन्होंने दोनों के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई.

उन्होंने दोनों की काल डिटेल्स की जांच की तो जसवीर की काल डिटेल्स में 2 मोबाइल नंबर ऐसे मिले, जिन पर बहुत ज्यादा फोन किए गए थे. उन्होंने उन नंबरों की भी काल डिटेल्स निकलवाई तो उसे देख कर उन्हें लगा कि यह सारा खेल जसवीर का ही खेला है. उन्होंने सबइंसपेक्टर गौरव बिश्नोई के नेतृत्व में कुछ पुलिस वालों को जसवीर को गिरफ्तार करने भेज दिया. गौरव बिश्नोई जसवीर के घर पहुंचे तो वह घर में ही मिल गया. वह उसे पकड़ कर थाने ले आए.

अनिल कुमार सिरोही ने जसवीर से पूछताछ शुरू की तो एक बार फिर उस ने सारा आरोप नबी बख्श के ऊपर मढऩे की कोशिश की, लेकिन जब उसे उस के दोस्त पिंकू उर्फ महेंद्र और उस की काल डिटेल्स और मोबाइल फोन की लोकेशन दिखाई गई तो उस के चेहरे का रंग उड़ गया. उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने जो बयान दिया, उस के अनुसार गुरप्रीत की हत्या की कहानी कुछ इस तरह सामने आई.

बरेली के थाना भोजीपुरा के गांव कैथोला बेनीराम के रहने वाले लक्खा सिंह के बेटे जसवीर सिंह की गिनती इलाके के प्रतिष्ठित और संपन्न किसानों में होती थी. उस की सौ बीघा खेतों में लहलहाती फसल स्वयं उस की संपन्नता की कहानी बयां करती थी. हर साल गन्ने की खेती से उसे लाखों की रकम मिलती थी.

18 साल पहले उस की शादी बिलासपुर की रहने वाली गुरप्रीत कौर से हुई थी. गुरप्रीत बेहद खूबसूरत थी. उस की जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर जसवीर फूला नहीं समा रहा था. दूसरी ओर गुरप्रीत भी जसवीर जैसे बांके छैलछबीले नौजवान को जिंदगी के हमसफर के रूप में पा कर अपने मातापिता की पसंद पर गर्व कर रही थी कि जिन्होंने अपनी चांद जैसी गोरी और फूल जैसी खूबसूरत बेटी के लिए हजारों में नहीं, बल्कि लाखों में एक सुखीसंपन्न दामाद ढूंढ़ा था.

जसवीर से शादी के बाद गुरप्रीत को ऐसा लगा, जैसे उस की सारी मनोकामना पूरी हो गई है. जसवीर के घर किसी चीज की कमी नहीं थी. गुरप्रीत पति से जिस भी चीज की मांग करती, वह उस की हर मांग को पलक झपकते पूरा कर देता था. क्योंकि पत्नी की खुशी में ही वह अपनी खुशी समझता था. उन का दांपत्य हंसीखुशी से गुजर रहा था.

देखतेदेखते कई साल गुजर गए. इस बीच गुरप्रीत 3 बच्चों की मां बन गई. उस के तीनों बेटों के नाम गुरुशांत, रौकी और शैंकी थे. बच्चे जैसेजैसे बड़े हुए, जसवीर ने उन की पढ़ाई की व्यवस्था बरेली शहर के एक नामी स्कूल में कर दी. गुरप्रीत और जसवीर चाहते थे कि उन के तीनों बेटे पढ़लिख कर उन का नाम रौशन करें.

शादी के कुछ सालों बाद जसवीर के रंगढंग में बदलाव आने लगा तो गुरप्रीत को ङ्क्षचता हुई, क्योंकि जसवीर शराब पीने के साथसाथ दूसरी औरतों में रुचि लेने लगा था. उस ने पति को खानदान की इज्जत की दुहाई देते हुए समझाने की कोशिश की, लेकिन उस पर पत्नी की बातों का कोई असर नहीं हुआ. वह हमेशा शराब और शबाब में डूबा रहने लगा.

गुरप्रीत ने पहले जसवीर को प्यार से समझाबुझा कर रास्ते पर लाने की कोशिश की, लेकिन जब उस की आदत में कोई सुधार नहीं हुआ तो वह उस की बुराइयों का विरोध करते हुए उस से लडऩेझगडऩे लगी. जसवीर अब तक इस सब का आदी हो चुका था, इसलिए गुरप्रीत का रोकनाटोकना उसे अच्छा नहीं लगता था. उस का मानना था कि वह उस की सारी जरूरतें पूरी कर

देता है, उसे किसी चीज की कमी नहीं होने देता है तो वह बेवजह उस के रास्ते में टांग अड़ाती है. मर्दों के तो 10 तरह के शौक होते हैं, फिर उस के पास कमी ही किस चीज की है. जब उस के पास इतनी दौलत है तो उसे जिंदगी में सारे शौक पूरे कर लेने चाहिए.

शादी के इतने सालों बाद और 3 बच्चे होने से गुरप्रीत में अब पहले वाली खूबसूरती नहीं रह गई थी. जबकि जसवीर कमउम्र की खूबसूरत लड़कियों के साथ मौजमस्ती करना चाहता था. इस के लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता था. गुरप्रीत को गांव के किसी न किसी से पति की हरकतों के बारे में पता चल ही जाता था. उस समय तो वह पति की करतूतें सुन कर खून का घूंट पी कर रह जाती, लेकिन जब जसवीर घर आता तो वह उस की जम कर खबर लेती.

ऐसा रोजरोज होने से जसवीर का मन गुरप्रीत की ओर से उचट गया, अब वह घर आने से भी कतराने लगा. जबकि गुरप्रीत पति से पहले जैसा प्यार चाहती थी. लेकिन घर से बाहर मौजमस्ती कर के लौटे जसवीर के शरीर में इतनी ताकत नहीं होती थी कि वह पत्नी को संतुष्ट कर सके. वैसे भी अब उस की उम्र 55 साल के करीब थी. इस उम्र में वह जोश कहां होता है, जो जवानी के शुरुआती दिनों में होता है. नतीजतन गुरप्रीत कौर की सारी रात करवटों में बीत जाती.

अगले दिन वह पति की उलटीसीधी हरकतों का विरोध करते हुए उसे ऐसा करने से रोकने की कोशिश करती. लेकिन पत्नी के लाख विरोध के बावजूद जसवीर पर कोई असर नहीं पड़ रहा था. वह वही करता था, जो उस के मन में आता था.

दौलत के मद में चूर जसवीर अपनी अय्याशियों और शौक के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहता था. एक साल पहले उस की मुलाकात बरेली के थाना सीबीगंज के गांव जौहरपुर के रहने वाले ड्राइवर बालकराम से हुई. दोनों की दोस्ती परवान चढ़ी तो एक दिन वह बालकराम के साथ उस के घर चला गया. वहां उस की सयानी बेटी शानू उस के सामने आई तो जसवीर की आंख फटी की फटी रह गई.