एक क्रूर औरत की काली करतूत – भाग 1

चित्रकूट के कर्बी के रहने वाले पंडित चंद्रलेख तिवारी के 3 बेटे और एक बेटी थी. बड़ा बेटा रामअवतार एलआईसी  का एजेंट था तो उस से छोटा शिवप्रसाद दूध का व्यवसाय करता था. सब से छोटा बुद्धिविलास शास्त्री की पढ़ाई कर के पिता की तरह पूजापाठ कराने लगा था. लेकिन वहां इस काम से इतनी आमदनी नहीं हो पाती थी, जितनी वह चाहता था. इसलिए वह कहीं बाहर जा कर यह काम करना चाहता था.

बुद्धिविलास थोड़ीबहुत कमाई करने लगा तो बड़े बेटों की तरह पंडित चंद्रलेख तिवारी ने उस की भी शादी चित्रकूट में पूजापाठ कराने वाले मंजूनाथ भारद्वाज की बेटी गौरा से कर दी. उन के 10 बच्चों में 7 बेटे और 3 बेटियां थीं. परिवार बड़ा होने की वजह से उन की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी. इसलिए गौरा की शादी खातेपीते परिवार में हो जाने से मंजूनाथ काफी खुश थे.

गौरा खूबसूरत भी थी और सलीके वाली भी. इसलिए जहां उसे पा कर बुद्धिविलास खुश था, वहीं खातापीता परिवार और प्यार करने वाला पति पा कर गौरा भी खुश थी. दोनों का दांपत्य हंसीखुशी से बीतने लगा. उन के प्यार का परिणाम भी जल्दी ही आ गया. दोनों एक बच्ची के मांबाप बन गए, जिस का नाम उन्होंने सुमिक्षा रखा था.

सुमिक्षा पूरी तरह मां पर गई थी. लेकिन उसे मां की गोद का सुख नहीं मिल सका. वह 5 महीने की थी, तभी दिल का दौरा पड़ने से गौरा की मौत हो गई थी. पत्नी से ही घर होता है. पत्नी ही नहीं रही तो बुद्धिविलास का कैसा घर. उस का घर तो उजड़ा ही, एक परेशानी और खड़ी हो गई कि 5 महीने की बेटी को पालेपोसे कैसे.

पत्नी की मौत से परेशान और दुखी बुद्धिविलास बेटी को ले कर काफी परेशान था.  लेकिन उस की यह परेशानी दूर कर दी उस की बहन ऊषा ने. उस की शादी पास के ही गांव छीबो में गिरिजा पांडेय के साथ हुई थी. वह अध्यापक थे. उन की आर्थिक स्थिति काफी सुदृढ़ थी. इसलिए बुद्धिविलास की बेटी सुमिक्षा को ऊषा अपने साथ ले गई.

सुमिक्षा की व्यवस्था हो गई तो बुद्धिविलास अपनी जिंदगी को ढर्रे पर लाने की कोशिश करने लगा. पत्नी की मौत की वजह से घर में उस का मन नहीं लग रहा था, इसलिए वह कहीं बाहर जा कर काम करना चाहता था. इस के लिए उस ने तमाम लोगों से कह भी रखा था. संयोग से उसी बीच उस के किसी परिचित ने बताया कि आगरा के थाना सिकंदरा के मोहल्ला पश्चिमपुरी में काली माता का एक मंदिर बन रहा है. उस मंदिर में एक पुजारी की जरूरत है.

बुद्धिविलास को काम की जरूरत थी ही, वह वहां पहुंच गया. वह पढ़ालिखा था ही, ट्रस्ट वालों ने उसे मंदिर की सेवादारी दे दी. मंदिर के आसपास रहने वाले संपन्न लोग थे, इसलिए मंदिर में चढ़ावा ठीकठाक चढ़ता था. इस के अलावा बुद्धिविलास पूजापाठ करा कर भी अच्छीखासी कमाई कर लेता था. पैसे आने लगे तो वह एक बार फिर गृहस्थी बसाने के बारे में सोचने लगा. रहने के लिए उसे मंदिर परिसर में ही 2 कमरों का मकान मिला था, इसलिए उसे रहने की भी कोई चिंता नहीं थी.

घर वाले तो उस के लिए पहले से ही चिंतित थे. इसलिए बुद्धिविलास के हामी भरते ही उस के लिए लड़की की तलाश शुरू हो गई. बुद्धिविलास के मंझले भाई शिवप्रसाद की पत्नी के एक रिश्तेदार रमेश मिश्रा अपनी बेटी अर्चना के लिए लड़का ढूंढ़ रहे थे. उन की संतानों में 7 बेटियां और एक बेटा था.

अर्चना उन में पांचवें नंबर पर थी. वह हाईस्कूल तक पढ़ी थी. बुद्धिविलास और अर्चना की उम्र में थोड़ा अंतर था, लेकिन रमेश मिश्रा की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, इसलिए वह अपनी बेटी की शादी बुद्धिविलास से करने को तैयार थे.

लेकिन जब अर्चना को पता चला कि जिस लड़के से उस की शादी हो रही है, उस की पहली पत्नी मर चुकी है और उसे एक बेटी है तो उस ने बुद्धिविलास से शादी करने से मना कर दिया. लेकिन जब रमेश मिश्रा ने अपनी मजबूरी जाहिर की तो वह किसी तरह शादी के लिए राजी हो गई. इस के बाद बुद्धिविलास की शादी अर्चना के साथ हो गई. यह सन 2012 की बात थी.

शादी के बाद बुद्धिविलास अर्चना को आगरा ले आया. पत्नी आ गई तो वह पहली पत्नी से पैदा बेटी सुमिक्षा को साथ रखने के बारे में सोचने लगा. वह चाहता था कि अब उस की बेटी उस के साथ रहे. सुमिक्षा अब तक 4 साल की हो चुकी थी. वह अपनी बहन के यहां गया और उस ने बहन से सुमिक्षा को साथ ले जाने के लिए कहा तो बहन ऊषा ने कहा, ‘‘जब यह 5 महीने की थी, तब से मैं इसे पाल रही हूं. अब यह मुझे अपनी बेटी की तरह लगती है. इसलिए अब इसे मेरे पास ही रहने दो. इस के चले जाने से मेरा भी मन नहीं लगेगा.’’

‘‘बहन तब इसे कोई पालने वाला नहीं था, इसलिए मैं ने इसे तुम्हें सौंप दिया था. अब इस की मां आ गई है. वह इसे अच्छी तरह पाल लेगी, इसलिए मैं इसे साथ ले जाना चाहता हूं.’’ बुद्धिविलास ने कहा.

‘‘भइया, मैं इस की बूआ हूं और यह मेरा खून है. सौतेली मां सौतेली ही होती है. वह इसे कभी वह प्यार नहीं दे पाएगी, जो मुझ से मिल रहा है. इसलिए इसे मेरे पास ही पड़ी रहने दो.’’

ऊषा ने तमाम तर्कवितर्क किए, पर बुद्धिविलास नहीं माना. वह कर भी क्या सकती थी. पराई बेटी को जबरदस्ती तो रख नहीं सकती थी, मन मार कर सुमिक्षा को उस के हवाले कर दिया.

बुद्धिविलास सुमिक्षा को अपने घर ले आया. चूंकि उस ने अर्चना को बताया नहीं था कि वह सुमिक्षा को लेने जा रहा है, इसलिए जब वह उसे ले कर घर पहुंचा तो अर्चना ने हैरानी से पूछा, ‘‘यह किसे ले आए?’’

‘‘किसे नहीं, यह हमारी बेटी सुमिक्षा है. अब यह हमारे साथ ही रहेगी.’’ बुद्धिविलास ने कहा.

‘‘क्यों, यह जहां रह रही थी, वहां कोई परेशानी थी क्या, जो इसे यहां ले आए?’’ अर्चना ने मुंह फुला कर पूछा.

‘‘यह वहां इसलिए रह रही थी, क्योंकि यहां इस की कोई देखभाल करने वाला नहीं था. अब तुम आ गई हो, इसलिए इसे यहां ले आया.’’

‘‘तो क्या तुम ने मुझ से शादी इस की देखभाल करने के लिए की थी?’’

‘‘भई, पत्नी बच्चों की देखभाल नहीं करेगी तो और कौन करेगा? तुम मेरी पत्नी हो तो तुम्हें ही मेरे बच्चों की देखभाल करनी होगी.’’ बुद्धिविलास ने कहा.

मांबाप में लड़ाई होते देख सुमिक्षा डर गई. उतनी दूर से सफर कर के आई सुमिक्षा को नाश्तापानी कराने के बजाय अर्चना नाराज हो कर दूसरे कमरे में जा कर सो गई.

प्रेमिका के लिए पत्नी का कत्ल – भाग 1

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला बरेली के थाना भोजीपुरा का एक गांव है कैथोला बेनीराम. जसवीर अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. गांव का वह बेहद संपन्न किसान था.

22 नवंबर को वह बरेली शहर में रह कर पढ़ रहे अपने तीनों बच्चों से मिलने जाने लगा तो पत्नी गुरप्रीत से कहा कि चाहे तो वह भी साथ चल सकती है. गुरप्रीत को भी तीनों बच्चों से मिले काफी समय हो गया था, इसलिए उस ने सोचा कि वह भी चली जाए. एक तो बच्चों से मुलाकात हो जाएगी, दूसरे वहां से वह अपनी जरूरत के सामान भी खरीद लेगी.

गुरप्रीत तैयार हो गई तो जसवीर उसे मोटरसाइकिल से बरेली ले गया. पहले गुरप्रीत ने खरीदारी की, उस के बाद दोनों बच्चों से मिलने गई. मम्मीपापा को साथ आया देख कर बच्चे काफी खुश हुए. बच्चों से मिलने में उन्हें काफी देर हो गई. गुरप्रीत की इच्छा बच्चों को छोड़ कर घर आने की नहीं हो रही थी, लेकिन जब अंधेरा होने लगा तो जसवीर ने उस से घर चलने को कहा.

गुरप्रीत को भी लगा कि देर करना ठीक नहीं है, इसलिए बच्चों को प्यार कर के वह पति के साथ मोटरसाइकिल से गांव की ओर चल पड़ी. जाड़े के दिनों में दिन छोटा होने की वजह से अंधेरा जल्दी घिर आता है. जसवीर जल्दी घर पहुंचना चाहता था, इसलिए वह खेतों के बीच बनी सडक़ से तेजी से घर की ओर चला जा रहा था.

रास्ता सुनसान था. जैसे ही वह गांव के पास नत्थू मुखिया के खेतों के नजदीक पहुंचा, 2 मोटरसाइकिल सवारों ने उसे ओवरटेक कर के अपनी मोटरसाइकिल उस के आगे अड़ा दी. मजबूरन जसवीर को अपनी मोटरसाइकिल रोकनी पड़ी. तभी एक और मोटरसाइकिल उस के पीछे आ कर इस तरह खड़ी हो गई कि वह उन लोगों से बच कर भाग न सके. दोनों मोटरसाइकिलों पर बैठे चारों लोग उतर कर उस के सामने आ गए.

जसवीर कुछ समझ पाता, उन में से एक ने तमंचा निकाल कर उस पर गोली चला दी. गोली उसे लगने के बजाय उस के सिर को छूते हुए निकल गई. उस ने दूसरी गोली चलाई तो वह उसे लगने के बजाय मोटरसाइकिल पर पीछे बैठी गुरप्रीत की कनपटी पर जा लगी. वह नीचे गिर कर तड़पने लगी.

सडक़ से थोड़ी दूरी पर जसवीर के चाचा नरेंद्र सिंह और मामा बलविंदर सिंह खेतों में पानी लगाए हुए थे. गोली चलने की आवाज सुन कर वे उस की ओर दौड़े तो उन्हें आते देख कर बदमाश भाग गए. जसवीर ने मोटरसाइकिल की हैडलाइट के उजाले में हमलावरों में से एक को पहचान लिया था. उस का नाम नबी बख्श था और वह उस से रंजिश रखता था. बाकी लोगों के चेहरों पर कपड़ा बंधा था, इसलिए वह उन्हें नहीं पहचान पाया था.

बदमाशों के भाग जाने के बाद जसवीर चाचा और मामा की मदद से बुरी तरह से घायल गुरप्रीत को अस्पताल ले जा रहा था कि रास्ते में उस की मौत हो गई. लाश अस्पताल में ही छोड़ कर वह थाना भोजीपुरा पहुंचा और थानाप्रभारी अनिल कुमार सिरोही को पूरी बात बताई.

अनिल कुमार सिरोही पुलिस बल ले कर जसवीर के साथ अस्पताल पहुंचे और लाश का निरीक्षण करने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद थाने आ कर जसवीर ने नबी बख्श और उस के 3 अज्ञात साथियों के खिलाफ जो तहरीर दी, उसी के आधार पर अपराध संख्या 637/2015 भादंवि की धारा 302/307 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

मुकदमा दर्ज होने के बाद अनिल कुमार सिरोही ने नामजद नबी बख्श और उस के साथियों को पकडऩे के लिए एक टीम बनाई, जिस में सबइंसपेक्टर गौरव बिश्नोई, कांस्टेबल धीरेंद्र सिंह, संजीव कुमार आदि को शामिल किया. इस का नेतृत्व वह खुद कर रहे थे. वह टीम के साथ नबी बख्श की तलाश में उस के घर पहुंचे तो वह घर पर ही मिल गया.

वह उसे हिरासत में ले कर थाने ले आए और जब उस से जसवीर पर जानलेवा हमला और उस की पत्नी की हत्या के बारे में पूछताछ शुरू की तो उस ने कहा कि जिस समय जसवीर घटना को अंजाम देने की बात कर रहा है, उस समय तो वह कुछ लोगों के साथ अपने घर पर था.

अनिल कुमार सिरोही ने जब नबी बख्श के बयान की उन लोगों से तसदीक की तो बात सही निकली. तब नबी बख्श ने कहा, ‘‘साहब, कुछ दिनों पहले औटो में बैठने को ले कर मेरा जसवीर से झगड़ा हुआ था. उस झगड़े में मारपीट भी हो गई थी. उसी मारपीट का बदला लेने के लिए जसवीर उसे और उस के साथियों को झूठे मुकदमे में फंसा रहा है.’’

अनिल कुमार सिरोही को नबी बख्श निर्दोष लगा तो उन्होंने उसे हिदायत दे कर छोड़ दिया. अब सवाल यह था कि नबी बख्श ने गुरप्रीत की हत्या नहीं की थी तो हत्या किस ने की थी? उस की जसवीर से क्या रंजिश थी?

गुरप्रीत के हत्यारों को पकडऩे की पुलिस के सामने कठिन चुनौती थी. थाना भोजीपुरा पुलिस गुरप्रीत के हत्यारों की तलाश कर ही रही थी कि पंचायत चुनाव पड़ गए, जिस से इस मामले पर वह ज्यादा ध्यान नहीं दे पाई. चुनाव खत्म होते ही अनिल कुमार सिरोही गुरप्रीत के हत्यारों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे कि 16 दिसंबर की शाम 4 बजे जसवीर घायल अवस्था में थाना भोजीपुरा पहुंचा. उस के पेट में गोली लगी थी, जहां से उस समय भी खून बह रहा था.

संयोग से गोली एकदम किनारे लगी थी. एक तरह से वह मौत के मुंह में जाने से बालबाल बचा था. इस बार भी उस ने गोली मारने का आरोप नबी बख्श पर लगाया. जसवीर ने भले ही नबी बख्श पर आरोप लगा कर तहरीर दी थी, लेकिन थानाप्रभारी ने इस बार नामजद मुकदमा दर्ज कराने के बजाय अपराध संख्या 680/2015 पर भादंवि की 307 के तहत अज्ञात हमलावर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था.

एक तो अनिल कुमार ने नबी बख्श को छोड़ दिया था, दूसरे इस बार जब उस के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज नहीं किया तो जसवीर को यह बात बड़ी नागवार गुजरी, लेकिन वह कुछ करने की स्थिति में नहीं था, इसलिए चुपचाप चला गया.

अनिल कुमार सिरोही की समझ में नहीं आ रहा था कि जसवीर आखिर ऐसा कर क्यों रहा है? वह जिस तरह हमलों में बारबार बचा जा रहा था, उस से उन्हें लगा कि कहीं वह खुद तो ऐसा नहीं कर रहा? जसवीर जिस तरह नबी बख्श पर आरोप लगा रहा था, उस से उन्हें उस पर शक हुआ.

दूसरी शादी का दुखद अंत – भाग 1

26 जुलाई, 2014 को जिला हाथरस कोतवाली सदर के प्रभारी बी.एस. त्यागी को सुबहसुबह सूचना मिली कि कोटा रोड पर नरहौली बंबे के पास एक युवक की लाश  पड़ी है. सूचना मिलने के थोड़ी देर बाद थानाप्रभारी बी.एस. त्यागी सिपाहियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

शुरुआती निरीक्षण से ही पता चल गया कि यह हत्या का मामला है. मृतक का चेहरा किसी भारी पत्थर से कुचल दिया गया था. शायद ऐसा शिनाख्त मिटाने के लिए किया गया था. तलाशी में भी उस के पास से ऐसा कुछ नहीं मिला, जिस से उस की शिनाख्त हो पाती. जब वहां इकट्ठा लोगों ने भी उसे पहचानने से मना कर दिया तो थानाप्रभारी बी.एस. त्यागी ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटाई और लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया.

हत्या का यह मामला हाथरस कोतवाली सदर में अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर लिया गया और अज्ञात युवक की हत्या के इस मामले की जांच एसएसआई रविंद्र कुमार को सौंप दी गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, मृतक मुसलिम था, जिस की हत्या किसी भारी पत्थर से कुचल कर की गई थी. मृतक के पुरुषांग को भी कुचला मसला गया था.

इस बात से मामले की जांच कर रहे रविंद्र कुमार को लगा कि हत्यारा मृतक से काफी नफरत करता रहा होगा. ऐसा अधिकतर अवैध संबंधों के मामले में ही होता है. इसलिए इसी बात को ध्यान में रख कर जांच बढ़ाई गई. लेकिन जांच तभी आगे बढ़ सकती थी, जब मृतक की शिनाख्त हो जाती.

संयोग से उन्हें मृतक की शिनाख्त के लिए ज्यादा परेशान नहीं होना पड़ा. 27 जुलाई की शाम को एक आदमी ने आ कर थानाप्रभारी बी.एस. त्यागी को बताया कि उस का किराएदार वकील 2 दिनों से गायब है. उस का फोन भी बंद है. पूछने पर जब उस आदमी ने वकील का हुलिया बताया तो वह हुलिया नरहौली के बंबे पर मिली लाश से पूरी तरह से मेल खा रहा था.

थानाप्रभारी बी.एस. त्यागी ने तुरंत उस आदमी को थाने की जीप से पोस्टमार्टम हाउस भिजवाया तो उस ने मृतक की शिनाख्त अपने किराएदार वकील के रूप में कर दी.

पूछताछ में उस आदमी ने बताया कि वकील ने लगभग 6 महीने पहले विष्णुपुरी स्थित उस के मकान में एक कमरा किराए पर लिया था, जिस में वह अपनी पत्नी के साथ रहता था. इस समय उस की पत्नी मथुरा के मांट में ब्याही अपनी बेटी की ससुराल गई हुई है.

उस आदमी से पुलिस को मृतक वकील की पत्नी का फोन नंबर मिल गया था. इसलिए पुलिस ने उसे वकील की हत्या की सूचना दे दी. लगभग दोढाई घंटे बाद मृतक की पत्नी थानाप्रभारी बी.एस. त्यागी के सामने हाजिर हुई तो उसे देख कर वह हैरान रह गए. क्योंकि उस की उम्र 45 साल से ज्यादा थी, जबकि मृतक वकील की उम्र 20 साल थी. पूछताछ में उस ने अपना नाम जरीना बताया.

मामला अजीबोगरीब था, 20 साल के युवक की 45-50 साल की पत्नी को देख कर सभी हैरान थे, लेकिन पुलिस को इस से क्या मतलब था? जरीना रोरो कर कह रही थी उस के शौहर की हत्या उस के पहले पति, बेटे और चचेरे देवर ने की है.

इस के बाद जरीना की तहरीर पर उस के शौहर वकील की हत्या का मुकदमा उस के पहले शौहर शैफी मोहम्मद, बेटे शमशेर और चचेरे देवर फुर्रा के खिलाफ दर्ज कर लिया गया.  लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने मृतक वकील के घर वालों को भी सूचना दे दी थी.

घर वालों ने हाथरस कोतवाली पहुंच कर वकील की हत्या का आरोप जरीना पर ही लगा दिया. वकील के बड़े भाई शब्बीर का कहना था कि जरीना ने ही अपने पहले शौहर शैफी मोहम्मद, देवर फुर्रा और बेटे शमशेर के साथ साजिश रच कर उस के भाई वकील की हत्या कराई है. उन्होंने वकील की हत्या के इस मामले में उसे भी अभियुक्त बनाया जाए.

इस के बाद हत्यारों में जरीना का नाम भी जोड़ दिया गया और कोतवाली में मौजूद जरीना को हिरासत में ले लिया गया. इस के बाद हाथरस पुलिस ने आगरा के इसलामनगर जा कर शैफी मोहम्मद, उस के भाई फुर्रा और बेटे शमशेर को भी गिरफ्तार कर लिया.

कोतवाली ला कर तीनों से पूछताछ शुरू हुई तो उन का कहना था कि 4 साल से वकील से न उस की मुलाकात हुई है, न कोई बातचीत. ऐसे में वे उस की हत्या कैसे कर सकते हैं. लेकिन जब थानाप्रभारी बी.एस. त्यागी ने उन के मोबाइल फोनों की काल डिटेल्स और लोकेशन उन के सामने रख दी तो तीनों ने वकील की हत्या का अपना अपराध स्वीकार करने के साथ हत्या के पीछे की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

मूलरूप से जिला हाथरस के सादाबाद के गांव जरिया की गढ़ी के रहने वाले हनीफ खां रोजीरोटी की तलाश में वर्षों पहले आगरा आ बसे थे. यह उस समय की बात है, जब आगरा में यमुना नदी के किनारे इसलामनगर मोहल्ला बस रहा था. हनीफ खां जब आगरा आए तब उन की 2 संतानें थीं. बाद में वह कुल 9 बच्चों के बाप बने, जिन में 4 बेटियां और 5 बेटे थे. वकील उन का सब से छोटा बेटा था. हनीफ जैसेतैसे बच्चों की शादी करते गए थे, सब अपनीअपनी पत्नियों के साथ अलग होते गए थे.

अंत में उन के साथ सब से छोटा बेटा वकील बचा. जिन दिनों वह हाईस्कूल में पढ़ रहा था, तभी हनीफ खां की तबीयत खराब हुई. पिता की देखरेख की वजह से वकील हाईस्कूल की परीक्षा नहीं दे सका. इस से भी दुखद यह रहा कि उस के अब्बू भी चल बसे.

हनीफ खां के इंतकाल के बाद वकील का कोई नहीं रह गया. उसे कभी एक भाई के यहां खाना पड़ता तो कभी दूसरे के यहां. कोई भी भाई उसे अपने साथ स्थाई रूप से रखने को तैयार नहीं था. पढ़ाई तो छूट ही गई थी, धक्के खाते हुए मोटर मैकेनिक का काम सीखने लगा. भाइयों ने मदद नहीं की तो ऐसे में उस की मदद के लिए आगे आए उसी मोहल्ले के रहने वाले शैफी मोहम्मद.

शैफी मोहम्मद का घर हनीफ खां के घर के ठीक सामने था. मोहल्ले में उस की गिनती संपन्न लोगों में होती थी. 3 बच्चों के पैदा होने के बाद उस की पत्नी की मौत हो गई. इस के बाद उस ने दूसरी शादी जरीना से की थी. जरीना से भी उसे 7 बच्चे हुए. जरीना ने बेशक अपनी कोख से 7 बच्चों को जन्म दिया था, लेकिन उसे देख कर कहीं से नहीं लगता था कि वह इतने बच्चों की मां होगी.

भांजी को प्यार के जाल में फांसने वाला पुजारी

देवर के इश्क़ में

भांजी को प्यार के जाल में फांसने वाला पुजारी – भाग 3

काफी भटकने के बाद भी लकड़ी की व्यवस्था नहीं हो सकी तो उस ने अप्सरा की जूतियां और कपड़े वहीं झाड़ियों में छिपा दिए. इस के बाद लाश उठा कर उस ने कार की डिक्की में रखा और मंदिर लौट आया. अब उस के सामने लाश को ठिकाने लगाने की समस्या थी.

वह काफी देर तक विचार करता रहा. सोचते हुए वह मंदिर के पीछे गया. मंदिर के पीछे राजस्व विभाग की पुरानी इमारत है. वह सोचतेविचारते हुए मंदिर के पीछे टहल रहा था कि उस की नजर राजस्व विभाग की उस पुरानी इमारत के सामने बने मेनहोल पर पड़ी. उस पर नजर पड़ते ही उस की समस्या हल हो गई.

साईंकृष्णा तुरंत मंदिर में आया और कार की डिक्की से लाश निकाल कर ले जा कर मेनहोल का ढक्कन हटा कर लाश उसी में डाल दी और ढक्कन बंद कर मंदिर में वापस आ गया. रात में ही उस ने कार साफ की और अप्सरा का हैंडबैग वगैरह जला कर उस की राख भी उसी मेनहोल में ले जा कर फेंक दी. फिर वह आराम से सो गया.

अगले दिन सुबह वह अप्सरा के घर गया तो उस की मां ने कहा, “अप्सरा को कल रात से ही फोन कर रही हूं. उस का फोन ही नहीं लग रहा है. जब भी फोन करो, स्विच्ड औफ बताता है.”

“यही पता करने तो मैं भी आया हूं. मैं ने भी फोन किया था. उस का फोन बंद ही बताए जा रहा था. कहीं उस का फोन चोरी तो नहीं हो गया. पर फोन चोरी होता तो अपनी किसी सहेली के फोन से फोन कर सकती थी.” साईंकृष्णा ने कहा.

दुर्गंध न आने का कर दिया पुख्ता इंतजाम

अप्सरा के घर से लौट कर पुजारी साईंकृष्णा मेनहोल के पास गया तो उसे लगा कि मेनहोल से लाश के सडऩे की बदबू आ रही है. उसे लगा कि अगर यह बदबू फैली और मेनहोल का ढक्कन उठा कर देखा गया तो वह फंस जाएगा. उस ने ढक्कन के किनारे सीमेंट और कंक्रीट लगा कर 2 ट्रक लाल मिट्टी मंगा कर मेनहोल के ढक्कन के ऊपर डलवा दी, जिस से ढक्कन पूरी तरह बंद हो गया. अब वह निश्चिंत हो गया.

इसी तरह इंतजार में पूरा दिन भी बीत गया और रात भी. जब अप्सरा का कुछ पता नहीं चला तो 5 जून, 2023 को दोपहर के बाद पुजारी साईंकृष्णा अप्सरा की गुमशुदगी दर्ज कराने थाना आरजीआईए पहुंच गया. वहां गुमशुदगी दर्ज कराने के बाद असलियत सामने आ गई और अप्सरा मर्डर केस में वह खुद ही पकड़ा गया. थाना शम्साबाद पुलिस ने वह पत्थर भी बरामद कर लिए, जिन से अप्सरा की हत्या की गई थी. गौशाला के पास से अप्सरा की जूतियां और कपड़े भी मिल गए थे.

पुलिस ने पुजारी अय्यागिरि वेंकट सूर्या साईंकृष्णा के खिलाफ हत्या (धारा 302) और सबूत मिटाने (धारा 120) के तहत मुकदमा दर्ज कर उसे रंगा रेड्डी कोर्ट में पेश किया, जहां से 14 दिनों के रिमांड पर लिया गया. रिमांड अवधि में पुलिस ने उस से पूछताछ कर कुछ और सबूत जुटाए. रिमांड अवधि पूरी होने पर उसे दोबारा अदालत में पेश किया गया, जहां से कातिल पुजारी को जेल भेज दिया गया.

पुजारी की पापलीला और अप्सरा की हत्या को ले कर मीडिया में अप्सरा की एक से एक फोटो के साथ पुजारी के फोटो दिखाए जा रहे थे. तभी इस मामले में एक और नया रहस्य निकल कर सामने आया.

अप्सरा और उस की मां अरुणा एक साल पहले ही हैदराबाद रहने आई थीं. इस के पहले दोनों चेन्नै में रहती थीं. अप्सरा की हत्या का समाचार सुन कर चेन्नै की धनलक्ष्मी राजा नाम की एक महिला ने सोशल मीडिया पर अप्सरा के फोटोग्राफ्स, वीडियो और आडियो डाल कर हडक़ंप मचा दिया.

सामने आई नई जानकारी

धनलक्ष्मी ने वीडियो वायरल कर के कहा था कि दुनिया में देर है पर अंधेर नहीं है. प्रकृति हर किसी को उस के कर्म की सजा देती है. मेरा एकलौता बेटा कार्तिक सौफ्टवेयर इंजीनियर था. उसे अप्सरा से प्यार हो गया. उस की सुंदरता पर वह ऐसा मोहित हुआ था कि मेरे मना करने के बावजूद उस ने उस रूपसुंदरी से विवाह कर लिया.

विवाह कर के घर आते ही अप्सरा ने हम दोनों को परेशान करना शुरू कर दिया था. मेरा बेटा तो सीधासादा था और वह महारानी हर शनिवार और रविवार को बाहर घूमने जाती और हद से ज्यादा खर्च कराती. इस मामले में उस की मां अरुणा भी बेटी का पक्ष ले कर मेरे बेटे को धमकाती. जब देखो तब लड़ाईझगड़ा कर के मांबेटी ने कार्तिक का जीना हराम कर दिया था.

एक दिन घर में थोड़ा ज्यादा झगड़ा हो गया. अप्सरा ऐसी बिफरी की मुझे और कार्तिक को गंदीगंदी गालियां देने लगी. कार्तिक को भी गुस्सा आ गया. उस ने अप्सरा पर हाथ उठा दिया. इस के बाद अप्सरा थाने चली गई और कार्तिक के खिलाफ तरहतरह के आरोप लगा कर शिकायत दर्ज करा दी. अप्सरा की सुंदरता देख कर पुलिस ने भी फटाफट मुकदमा दर्ज कर लिया और कार्तिक को गिरफ्तार कर के अदालत में पेश कर दिया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस के बाद अप्सरा अपनी मां के साथ चेन्नै से हैदराबाद चली गई.

करीब डेढ़ महीने बाद कार्तिक जमानत पर जेल से बाहर आया. जेल जाने से उस की नौकरी भी चली गई थी, जिस की वजह से वह भारी डिप्रेशन में आ गया. मां धनलक्ष्मी ने उसे बहुत समझाया, हिम्मत दी. पर अप्सरा ने उसे जिस तरह परेशान किया था, उस से वह इस हद तक टूट गया था कि वह इस हादसे से उबर नहीं पाया और जेल से बाहर आने के चौथे दिन उस ने फंदे से लटक कर आत्महत्या कर ली.

धनलक्ष्मी ने कार्तिक और अप्सरा के विवाह के जो फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल किए थे, उन्हें ले कर लोगों में यही चर्चा हो रही थी कि अप्सरा की वजह से जिस तरह कार्तिक की मां बिलख रही है, ठीक उसी तरह से बेटी के मौत हो जाने पर अब खुद अरुणा को भी बिलखना पड़ रहा है.

भांजी को प्यार के जाल में फांसने वाला पुजारी – भाग 2

हैदराबाद दक्षिण भारतीय फिल्मों और धारावाहिकों के लिए बहुत बड़ा गढ़ माना जाता है. अप्सरा भी फिल्मों और धारावाहिकों में काम कर के नाम और दाम कमाना चाहती थी. हैदराबाद में उस की जानपहचान वाला कोई नहीं था. वह ज्योतिष और भाग्य पर आंख मूंद कर भरोसा करती थी.

अप्सरा के भाग्य में फिल्मों और धारावाहिकों में काम करने का योग है कि नहीं, यह पता करने के लिए अप्सरा और उस की मां नजदीक स्थित बांगारू माइसम्मा मंदिर गई, जहां का पुजारी था अय्यागिरि वेंकट सूर्या साईंकृष्णा. साईंकृष्णा मंदिर का पुजारी तो था ही, वह एमबीए कर के बिल्डिंग निर्माण की ठेकेदारी भी करता था.

अरुणा और अप्सरा साईंकृष्णा से मिलीं. इस के बाद अप्सरा कुंडली दिखाने और भगवान के दर्शन के लिए मंदिर आने लगी. मंदिर में आतेआते अप्सरा की पुजारी से अच्छी जानपहचान हुई, फिर कुछ दिनों में दोस्ती हो गई. अब तक पुजारी का दिल अप्सरा पर आ चुका था. इस की वजह यह थी कि पुजारी वहां अकेला ही रहता था.

पुजारी को भांजी से हुआ प्यार

पुजारी साईंकृष्णा का दिल अप्सरा पर आया तो वह उस की हर तरह से मदद करने लगा. अप्सरा और उस की मां पर प्रभाव जमाने के लिए उस ने रिश्ता भी जोड़ लिया. अरुणा को उस ने मुंहबोली बहन बना लिया तो अप्सरा उस की भांजी हो गई. अप्सरा साईंकृष्णा को अन्ना कहती थी.

अप्सरा मंदिर आती ही रहती थी. तभी साईंकृष्णा को भांजी अप्सरा से प्यार हो गया. साईंकृष्णा ने रिश्ते की आड़ में उस पर डोरे डालतेडालते आखिर उसे अपने प्रेम जाल में फंसा ही लिया. साईंकृष्णा शादीशुदा था और उस के 2 बच्चे भी थे. परंतु उस की पत्नी बच्चों के साथ गांव में रहती थी. इसलिए यहां पुजारी को अप्सरा के साथ रंगरलिया मनाने का खुला मौका मिल गया था.

मंदिर परिसर में पुजारी के लिए कमरा बना था. उसी कमरे में अप्सरा साईंकृष्णा से मिलती थी. अप्सरा को पूरी उम्मीद थी कि पुजारी साईंकृष्णा उस से विवाह कर के उसे पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेगा. इसलिए उस से संबंध बढ़ाने में उसे कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई, लेकिन जब उसे पता चला कि पुजारी तो शादीशुदा ही नहीं, बल्कि 2 बच्चों का बाप भी है तब उसे तकलीफ तो बहुत हुई, पर उस ने न पुजारी का साथ छोड़ा और न ही उस की पत्नी बनने की उम्मीद छोड़ी.

अप्सरा लगातार पुजारी साईंकृष्णा से मिलती रही, पर अब वह उस पर दबाव बनाने लगी कि वह अपनी पत्नी को छोड़ कर उस से विवाह कर ले. साईंकृष्णा अप्सरा को झूठे आश्वासन दे कर उस का शारीरिक शोषण करता रहा. उन के अवैध संबंधों की भनक किसी को नहीं लगी.

अप्रैल, 2023 के अंतिम सप्ताह में अप्सरा ने साईंकृष्णा को बताया कि वह प्रैग्नेंट है. उस ने कहा कि वह इस बच्चे को जन्म देगी. यह सुन कर साईंकृष्णा घबरा गया. उस ने गर्भपात कराने की सलाह दी. अप्सरा ने मना करते हुए कहा, “मैं अपनी पहली संतान की हत्या का पाप कतई नहीं करूंगी.”

पर चालाक साईंकृष्णा ने अप्सरा को उलटीसीधी पट्टी पढ़ा कर, समझाबुझा कर गर्भपात करा ही दिया. इस के बाद अप्सरा आक्रामक हो गई और पुजारी पर विवाह के लिए दबाव डालने लगी. अब इस बात को ले कर दोनों के बीच खूब कहासुनी भी होने लगी.

अप्सरा की धमकी से डर गया पुजारी

जल्दी ही अप्सरा की समझ में आ गया कि इस पुजारी को केवल उस के शरीर में रुचि है. इसे न उस की जिंदगी से कोई मतलब है न उस की भावनाओं से. वह उसे खिलौने की तरह खेल कर किनारे कर देना चाहता है. वह उसे पत्नी नहीं बनाना चाहता यानी उस से विवाह नहीं करना चाहता.

फिर तो अप्सरा रणचंडी बन गई. उस ने साईंकृष्णा को चेतावनी देते हुए कहा, “मेरी यह आखिरी चेतावनी है. अगर तुम ने मुझ से विवाह नहीं किया तो इसी मंदिर में बैठ कर तुम्हारे पराक्रम की पूरी कथा सभी को सुनाऊंगी, अखबारों में छपवाऊंगी, वीडियो बना कर वायरल करूंगी. मेरा तो जो होना होगा, वह होगा ही, पर तुम्हारी भी इज्जत की ऐसीतैसी कर के रहूंगी.”

अब पुजारी को अप्सरा अप्सरा नहीं, बला लगने लगी थी. अब रातदिन वह इसी सोच में डूबा रहने लगा कि किस तरह इस बला से छुटकारा पाए. अप्सरा अब पूरी तरह बिंदास हो कर पुजारी को धमकियां दे रही थी, इसलिए वह बुरी तरह घबराया हुआ था.

आखिर काफी मानसिक परेशानी झेल कर उस ने अप्सरा से हमेशाहमेशा के लिए छुटकारा पाने का उपाय खोज ही लिया. उस ने गूगल पर सर्च किया कि इंसान को कैसे मारा जाए.

योजना के अनुसार, 3 जून, 2023 को उस ने अप्सरा को मनाने के बाद कहा, “चलो, आज लांग ड्राइव पर चलते हैं. चलते हुए रास्ते में विचार करते हैं. फिर शायद कोई रास्ता निकल ही आए.”

अप्सरा को भला क्यों ऐतराज होता. फिर पुजारी साईंकृष्णा के मन में क्या खिचड़ी पक रही है, उसे कहां पता था. वह सहज तैयार हो गई. अप्सरा ने पुजारी के कहने पर घर में मां को बताया कि उसे सहेलियों के साथ भद्राचलम जाना है. उस की सारी सहेलियां शम्साबाद में मिलेंगी. मामा यानी पुजारी साईंकृष्णा उसे अपनी कार से शम्साबाद तक छोड़ देंगे.

पुजारी ने लिखी मौत की स्क्रिप्ट

3 जून, 2023 को पुजारी साईंकृष्णा ने अप्सरा को उस के घर से कार में बिठा लिया और शम्साबाद की ओर चल पड़ा. वह शम्साबाद जाने के बजाय अप्सरा को कार में बैठा कर घुमाता रहा. अप्सरा को नींद की गोलियां खाने की आदत थी. नींद की गोली खा कर कार में बैठेबैठे जब अप्सरा को नींद आ गई तो साईंकृष्णा ने देर रात को शम्साबाद के पहले ही सुलतानपल्ली के गौशाला के पास सुनसान जगह में कार रोक दी. वह इस जगह को पहले ही देख गया था.

कार रुकी तो अप्सरा की आंखें खुल गईं. उस ने कहा, “यह कहां कार रोक दी?”

“अपना निर्णय सुनाने के लिए.” साईंकृष्णा ने कहा, “मैं ने खूब सोचविचार कर तय कर लिया है कि मुझे तुम से विवाह नहीं करना है. तुम से जो हो सके तुम कर लो. हमारा विवाह किसी भी हालत में संभव नहीं है.”

पुजारी का यह फैसला सुनते ही अप्सरा भडक़ उठी. वह हाथापाई पर उतर आई तो साईंकृष्णा ने उसे जोर से धक्का दिया. वह जमीन पर गिर पड़ी. इस के बाद उस ने कार में रखा एक बड़ा पत्थर उठाया और दांत भींच कर पूरी ताकत से अप्सरा के सिर पर दे मारा, जिस से उस का सिर फूट गया. उस के सिर से खून बहने लगा, लेकिन साईंकृष्णा अप्सरा के सिर पर उस पत्थर से तब तक वार करता रहा, जब तक वह मर नहीं गई. वह कार में 2 पत्थर साथ ले कर ही आया था.

पुजारी ने अप्सरा की हत्या कर के पत्थर से उस का चेहरा इस तरह कुचल दिया था कि लाश मिलने पर भी पहचानी न जा सके. इस के बाद उस ने वहां आसपास लकडिय़ों की तलाश की ताकि लाश को यहीं जला दे.

जीजा के चक्रव्यूह में साली

‘‘जीजू, हम लोगों को इस तरह मिलते हुए करीब एक साल हो चुका है. आखिर इस तरह हम लोग चोरीछिपे कब तक मिलते रहेंगे. अगर घर वालों को हमारे संबंधों के बारे में पता चल गया तो क्या होगा? इस से पहले कि किसी को हमारे संबंधों के बारे में पता चले, तुम पापा से बात कर के मेरा हाथ मांग लो वरना मुझे ही कुछ करना पड़ेगा.’’ कविता ने अपने जीजा वीरेंद्र दयाल से कहा.

‘‘कविता तुम चिंता मत करो. मौका आने दो, मैं पापा से बात कर लूंगा. लेकिन मुझे नहीं लगता कि तुम्हारी बड़ी बहन के रहते वह तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में दे देंगे. मैं खुद इसी उलझन में हूं कि इस मामले को कैसे सुलझाऊं.’’ वीरेंद्र दयाल ने कहा.

‘‘मैं कुछ नहीं जानती. तुम्हें यह बात क्लियर करनी पड़ेगी कि मेरे साथ शादी करोगे या नहीं? यह सब तुम्हें पहले सोचना चाहिए था. पहले तो बड़े लंबेचौड़े वादे करते थे. कहते थे कि तुम्हारे लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं. वो वादे कहां गए. इस का मतलब तो यह हुआ कि तुम मेरी इज्जत से खिलवाड़ करने के लिए मुझे बहकाते रहे.’’

‘‘नहीं कविता, ऐसी बात नहीं है. तुम मुझे गलत मत समझो. मैं आज भी तुम से उतना ही प्यार करता हूं. मगर इस समय मैं दुविधा में फंसा हूं. तुम मेरे मन की स्थिति को समझने की कोशिश करो.’’

‘‘देखो जीजू, टालतेटालते कई महीने हो चुके हैं. मैं अब और ज्यादा इंतजार नहीं कर सकती. मैं तुम्हें 15 दिन का समय देती हूं. इन 15 दिनों में अगर तुम ने पापा से मेरा हाथ नहीं मांगा तो मैं खुद अपना घर हमेशा के लिए छोड़ कर तुम्हारे घर आ जाऊंगी.’’ कविता ने धमकी दी.

‘‘नहीं कविता, ऐसा मत करना. मैं कोई न कोई रास्ता निकाल लूंगा.’’ वीरेंद्र दयाल ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी. वीरेंद्र जानता था कि कविता बहुत जिद्दी स्वभाव की है. वह एक बार मन में जो ठान लेती थी, उसे पूरा कर के ही मानती थी. इसी वजह से वीरेंद्र उस से परेशान रहता था.  कविता ने अपने जीजा को 15 दिन के अंदर घर वालों से शादी की बात करने का अल्टीमेटम दिया था. इस से पहले कि वीरेंद्र दयाल अपने सासससुर से बात करता, कविता रहस्यमय तरीके से गायब हो गई.

दरअसल 5 फरवरी, 2014 को शाम 4 बजे के करीब कविता बाजार जाने को कह कर घर से निकली थी. जब वह 2 घंटे तक घर नहीं लौटी तो मां ने उस का फोन मिलाया, लेकिन उस का फोन बंद मिला. उन्होंने ऐसा कई बार किया. फोन हर बार बंद मिला. बेटी का मामला था. इस से वह घबरा गईं. वीरेंद्र सिंह उस समय तक अपनी ड्यूटी से नहीं लौटे थे. मां ने बेटी के अभी तक घर न लौटने वाली बात पति को फोन से बता दी.

शाम का अंधेरा घिर आया था. जवान बेटी के घर न लौटने पर वीरेंद्र सिंह को भी चिंता हो रही थी. घर पहुंचने के बाद उन्होंने अपने स्तर से उसे ढूंढना शुरू कर दिया, लेकिन उस के बारे में कोई खबर नहीं मिली. अंत में वह आदर्श नगर स्थित पुलिस चौकी पहुंचे और चौकीप्रभारी कुलदीप सिंह को बेटी के गायब होने की जानकारी दी.

चौकीप्रभारी ने कविता की गुमशुदगी दर्ज करने के बाद यह सूचना अपने अधिकारियों को दे दी और कविता के हुलिए के साथ गुमशुदगी की खबर पुलिस कंट्रोल रूम द्वारा बल्लभगढ़ जिले के सभी थानों को प्रसारित करा दी. इस के साथ ही इस मामले की जांच एएसआई लाजपत को सौंप दी.

कविता 20-22 साल की थी. वह इतनी नादान नहीं थी कि उस के कहीं खो जाने की संभावना हो. ऐसे में 2 ही बातें हो सकती थीं. एक यह कि उस का किसी ने फिरौती के लिए अपहरण किया हो, दूसरी यह कि वह अपने किसी बौयफ्रेंड के साथ कहीं चली गई हो.   पूरी रात गुजर गई, लेकिन कविता घर नहीं लौटी. उस के घर वाले उस के इंतजार में ऐसे ही बैठे रहे. इस से पहले वह बिना बताए इतनी देर तक कभी गायब नहीं रही थी. इसलिए घर वालों के दिमाग में उसे ले कर तरहतरह के खयाल आ रहे थे.

उधर पुलिस भी अपने स्तर से कविता के बारे में पता लगाने की कोशिश कर रही थी. पुलिस ने उस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. उस में एक फोन नंबर ऐसा मिला, जिस पर कविता की काफी ज्यादा और देर तक बातें होती थीं. उस नंबर के बारे में कविता के घर वालों से पूछा गया तो पता चला वह नंबर कविता के जीजा वीरेंद्र दयाल का है.

चूंकि वीरेंद्र दयाल उन का रिश्तेदार था, इसलिए घर वालों को उन दोनों की बातों पर कोई आश्चर्य नहीं था. अलबत्ता पुलिस को उन के बीच होने वाली लंबी बातों पर शक जरूर हुआ.  चूंकि कविता के मातापिता ने अपने दामाद पर कोई शक वगैरह नहीं जताया था, इसलिए पुलिस ने उस समय वीरेंद्र दयाल से पूछताछ करना जरूरी नहीं समझा. लेकिन उस पर शक जरूर बना रहा.

देखतेदेखते कविता को रहस्यमय तरीके से गायब हुए 15 दिन बीत गए. उस के घर वालों का रोरो कर बुरा हाल था. उधर पुलिस को भी कविता के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल रही थी. अंतत: उस का पता लगाने के लिए एक पुलिस टीम बनाई गई, जिस में एसआई कुलदीप, एएसआई लाजपत, हेडकांस्टेबल संजीव सिंह आदि को शामिल किया गया.

एसआई कुलदीप ने कविता के पिता वीरेंद्र सिंह से कहा, ‘‘अब तक जो भी जांच की गई है, उस में घूमफिर कर शक आप के दामाद वीरेंद्र दयाल पर ही जा रहा है. इसलिए उन से पूछताछ करने पर आप को ऐतराज नहीं करना चाहिए.’’

‘‘ऐतराज की कोई बात नहीं है, लेकिन आप खुद सोचिए कि वह हमारे दामाद हैं, हमें नहीं लगता कि वह ऐसा कुछ कर सकते हैं, जिस से हमारे परिवार को ठेस लगे. हमारे घर के बाहर के जो लोग शक के दायरे में आ रहे हैं, आप उन से पूछताछ कीजिए.’’ वीरेंद्र सिंह बोले.

‘‘अगर वीरेंद्र दयाल से पूछताछ करने के बाद हमें कोई जानकारी नहीं मिलती तो हम उसे छोड़ देंगे.’’ चौकीप्रभारी ने कहा.

चौकीप्रभारी ने वीरेंद्र सिंह को काफी समझाया. इस का नतीजा यह हुआ कि वह अपने दामाद वीरेंद्र दयाल को 21 फरवरी, 2014 को साथ ले कर पुलिस चौकी आदर्श नगर आ गए.   कुलदीप सिंह ने वीरेंद्र दयाल से कविता के बारे में मालूमात की तो वह यही बताता रहा कि उसे कविता के बारे में कोई जानकारी नहीं है और उस के गायब होने के कई दिनों पहले से उस की उस से कोई बात नहीं हुई थी.

चौकीप्रभारी के पास कविता और वीरेंद्र दयाल के फोन नंबरों की काल डिटेल्स थी. इसलिए वीरेंद्र दयाल ने उन से जो बात बताई उस पर चौकीप्रभारी को शक हुआ. क्योंकि 4 फरवरी को शाम करीब साढ़े 5 बजे उस की कविता से बात हुई थी. उस काल की डिटेल जब वीरेंद्र दयाल को दिखाई गई तो उस के चेहरे का रंग उड़ गया. वह उस रिकौर्ड को झुठला नहीं सकता था.

उस की इस घबराहट को चौकीप्रभारी भांप गए. उन्होंने कहा, ‘‘तुम्हें कविता के बारे में सब पता है. अब बेहतर यही होगा कि तुम उस के बारे में सचसच बता दो, वरना…’’

सच्चाई यह थी कि वीरेंद्र दयाल को पता था कि कविता कहां है, इसलिए उस ने सोचा कि अगर उस ने पुलिस को नहीं बताया तो वह पिटाई कर के सच उगलवा लेगी. इसलिए इस से पहले कि पुलिस उस के साथ सख्ती करे, उस ने सच्चाई उगलते हुए कहा, ‘‘सर मैं ने कविता को मार दिया है.’’

उस की बात सुन कर चौकीप्रभारी चौंके, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो?’’

‘‘सर, मैं सच कह रहा हूं. उस ने मेरे सामने ऐसे हालात खड़े कर दिए थे कि उस की हत्या करने के अलावा मेरे सामने कोई दूसरा चारा नहीं था.’’ वीरेंद्र दयाल ने कहा.

‘‘उस की लाश कहां है?’’

‘‘लाश मैं ने आगरा कैनाल में डाल दी थी.’’

आगरा कैनाल यमुना नदी से निकाली गई है. यह दिल्ली के मदनपुर खादर से शुरू हो कर मथुरा, आगरा होते हुए राजस्थान के भरतपुर तक जाती है. वीरेंद्र दयाल ने पुलिस को बताया कि उस ने 5 फरवरी, 2014 को कविता की लाश आगरा कैनाल में फेंकी थी.   यानी लाश डाले हुए उसे 15 दिन हो चुके थे. पुलिस ने सोचा कि इस बीच लाश जहां भी पुलिया आदि के पास रुकी होगी, उस क्षेत्र की पुलिस ने उसे बरामद किया होगा.

इसलिए चौकीइंचार्ज कुलदीप ने आसपास के थानों में फोन कर के किसी लड़की की लाश बरामद होने के बारे में जानकारी मांगी. पता चला कि पलवल के सदर थाने के सबइंस्पेक्टर मोहम्मद इलियास ने 8 फरवरी, 2014 को रजवाहा, गोपालगढ़ की पुलिया के पास से एक अज्ञात लड़की की लाश बरामद की थी.  शिनाख्त के लिए उस लाश को रोहतक पीजीआई की मोर्चरी में रखवाया गया था. 4-5 दिनों बाद भी जब उस की शिनाख्त नहीं हो पाई तो 12 फरवरी को उस लाश का अंतिम संस्कार कर दिया गया था.

जिस लड़की की लाश सदर पुलिस ने बरामद की थी, उस के कपड़े आदि सदर थाने में रखे थे. चौकीप्रभारी कुलदीप, एएसआई लापजत, हेडकांस्टेबल संजीत सिंह कविता के पिता वीरेंद्र सिंह को ले कर थाना सदर पहुंचे. वहां एसआई मोहम्मद इलियास ने उन्हें उस अज्ञात लड़की की लाश के फोटो, कपड़े आदि दिखाए.

कपड़े देखते ही वीरेंद्र सिंह रो पड़े. क्योंकि वह कपड़े उन की बेटी कविता के थे. जिस दामाद को वीरेंद्र सिंह अपने बेटे की तरह मानते थे, उस के द्वारा बेटी की हत्या करने पर उन्हें बहुत दुख हुआ. पुलिस चौकी लौटने के बाद जब वीरेंद्र दयाल से पूछताछ की गई तो उस ने कविता की हत्या की जो कहानी बताई, वह कुछ इस तरह थी.

दिल्ली से सटे राज्य हरियाणा का एक जिला है बल्लभगढ़. इसी जिले के सुभाषनगर में बीरेंद्र सिंह अपने परिवार के साथ रहते थे. वह ग्रेटर नोएडा के सूरजपुर स्थित यामाहा कंपनी में नौकरी करते थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटियां थीं. बड़ी बेटी रेनू की शादी वह 4 साल पहले फरीदाबाद के सेक्टर-8 में रहने वाले धर्मपाल दयाल के बेटे वीरेंद्र दयाल से कर चुके थे.

वीरेंद्र दयाल दिल्ली स्थित एक शिपिंग कंपनी में नौकरी करता था. वह 1 बेटी का बाप भी बन चुका था.  वीरेंद्र सिंह की छोटी बेटी कविता अच्छी नौकरी के लिए पढ़ाई में जुटी थी. वह बीसीए कर रही थी. बीसीए के बाद उस की इच्छा एमसीए करने की थी. लेकिन इस से पहले ही उस के साथ घटी एक घटना ने उस के अरमानों पर पानी फेर दिया.

पढ़ाई के समय ही हर छात्र या छात्रा अपने मन में सोच लेता है कि उसे पढ़लिख कर क्या बनना है. बाद में वह अपने सपनों को हकीकत में बदलने की कोशिश करता है. कविता ने भी कंप्यूटर के क्षेत्र में अपना भविष्य बनाने के सपने देखे थे. उसी के अनुसार वह अपनी पढ़ाई भी कर रही थी.

उसी दौरान उस के जीजा वीरेंद्र दयाल ने उसे अपने प्रेमजाल में फांस लिया. कविता के अंदर अभी दुनियादारी की इतनी समझ नहीं थी. वह तो उस की बातों में फंस कर सच में उस से मोहब्बत करने लगी थी. उसे क्या पता था कि जीजा उस की इज्जत से खिलवाड़ करने के लिए उसे अपनी मीठीमीठी बातों में फांस रहा है.

इस का नतीजा यह हुआ कि दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए. करीब एक-डेढ़ साल पहले तक दोनों के बीच संबंध जारी रहे. दोनों फोन पर अकसर देर तक बातें करते रहते थे. वीरेंद्र दयाल ने उसे झांसा दे रखा था कि वह रेनू के रहते हुए भी उस से शादी कर लेगा. कविता इसी उम्मीद में थी कि जीजा उस के साथ शादी जरूर करेगा.

कविता जब भी वीरेंद्र दयाल से शादी के लिए कहती, वह कोई न कोई बहाना बना कर टालता रहता. कुछ दिनों तक तो वह उस पर विश्वास करती रही, लेकिन जब उस के सब्र का बांध टूटने लगा तो उस ने जीजा पर शादी का दबाव बढ़ा दिया.

वह जल्द से जल्द शादी करने की जिद करने लगी. वीरेंद्र दयाल फंस चुका था. उस की हालत ऐसी हो गई थी कि वह कविता से न तो शादी कर सकता था और न ही उस से पीछा छुड़ा सकता था. उसे यह उम्मीद नहीं थी कि कविता उस के गले की हड्डी बन जाएगी. उस ने यही सोच कर उस से संबंध बनाए थे कि मौजमस्ती करने के बाद वह उस से किनारा कर लेगा. लेकिन यहां दांव उलटा पड़ गया था.

चूंकि वीरेंद्र दयाल पहले से ही शादीशुदा और एक बेटी का बाप था. पत्नी को वह छोड़ नहीं सकता था और पत्नी के रहते वह उस की छोटी बहन कविता को रख नहीं सकता था. जबकि हालात एक म्यान में 2 तलवार रखने के बन गए थे. अब उस के सामने एक ही रास्ता था कि वह दोनों में से एक को हमेशा के लिए रास्ते से हटा दे. यही उपाय उसे ठीक लगा.

अंतत: सोचविचार कर उस ने पत्नी के बजाय साली कविता का ही काम तमाम करने का फैसला कर लिया. उस का सोचना था कि कविता को ठिकाने लगा कर उस की गृहस्थी पहले की तरह चलती रहेगी. पूरी योजना बनाने के बाद वीरेंद्र दयाल ने 4 फरवरी, 2014 को कविता को फोन कर के 5 फरवरी को बल्लभगढ़ बस स्टैंड के पास मिलने को कहा.

अगले दिन वीरेंद्र दयाल मोटरसाइकिल से निर्धारित जगह पर पहुंच गया. तय समय पर कविता भी वहां पहुंच गई. दोनों मोटरसाइकिल से इधरउधर घूमते रहे. वीरेंद्र दयाल को अपना मंसूबा पूरा करने के लिए अंधेरा होने का इंतजार था.

शाम 7 बजे के करीब वह उसे ले कर फरीदाबाद सेक्टर-18 पहुंच गया और वहां आगरा कैनाल के किनारे बैठ कर बातें करने लगा.  कविता जीजा के मंसूबे से अनजान थी. उसी दौरान मौका पा कर वीरेंद्र दयाल ने कविता की चुनरी से गला घोंट दिया. कुछ ही पलों में उस की मौत हो गई. इस के बाद आननफानन में उस ने उस की लाश आगरा कैनाल में फेंक दी.

उसे उम्मीद थी कि नहर से लाश बह कर कहीं दूर निकल जाएगी और उस पर किसी को शक भी नहीं होगा. लाश को ठिकाने लगा कर वह अपने घर लौट गया. कविता के घर वाले जब उसे ढूंढ रहे थे तो वीरेंद्र दयाल भी उन के साथ रह कर उसे ढूंढने का नाटक करता रहा.

वीरेंद्र दयाल से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उस की मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली. चौकीइंचार्ज कुलदीप ने उस से विस्तार से पूछताछ के बाद न्यायालय में पेश कर के उसे जेल भेज दिया. फिर तफ्तीश करने के बाद उन्होंने 11 मार्च, 2014 को इस मामले की चार्जशीट न्यायालय में पेश कर दी. कथा संकलन तक अभियुक्त वीरेंद्र दयाल की जमानत नहीं हो सकी थी.

—कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

भांजी को प्यार के जाल में फांसने वाला पुजारी – भाग 1

तेलंगाना के हैदराबाद शहर के थाना राजीव गांधी इंटरनैशनल एयरपोर्ट (थाना आरजीआईए) में 5 जून, 2023 दिन सोमवार की सुबह एक साधु जैसे कपड़े पहने हुआ आदमी पहुंचा. उस की उम्र यही कोई 35-36 साल थी. तंदुरुस्त शरीर, सफेद धोती, काले बाल और दाढ़ी, गले में माला, माथे पर बड़ा सा तिलक और उस के हाथ में मोबाइल था. उस ने एसएचओ टी.के. रेड्डी को नमस्कार किया तो जवाब में उन्होंने भी नमस्कार कर के उसे सामने पड़ी कुरसी पर बैठने का इशारा किया.

कुरसी पर बैठते ही उस ने कहा, “सर मैं बांगारू माइसम्मा मंदिर का पुजारी हूं. मेरा नाम अय्यागिरि वेंकट सूर्या साईंकृष्णाहै.”

इस के बाद उस ने दोनों हाथ जोड़ कर कहा, “सर, कल से मेरी भांजी गायब है. उसी के गायब होने की रिपोर्ट लिखाने आया हूं. उस की गुमशुदगी दर्ज कर के उसे खोज दीजिए प्लीज.”

“फोटो लाए हैं उस का?” एसएचओ टी.के. रेड्डी ने पूछा.

“जी सर, मैं उस का फोटो साथ लाया हूं. उस का नाम कुरूंगाती अप्सरा है. उम्र 30 साल और लंबाई 5 फुट 7 इंच है.” अप्सरा का फोटो मेज पर रखते हुए साईंकृष्णा ने कहा.

एसएचओ ने फोटो पर एक नजर डाली. अप्सरा सचमुच अप्सरा जैसी ही सुंदर थी.

एसएचओ ने फोटो देखते हुए पूछा, “अप्सरा कैसे और कहां से गायब हुई? पूरी बात विस्तार से बताइए?”

एक लंबी सांस ले कर पुजारी साईंकृष्णा ने कहा, “सर, मेरा घर और मंदिर सरूरनगर में है. मेरी बहन और भांजी भी सरूरनगर में ही रहती थीं. 3 जून शनिवार को अप्सरा को अपनी सहेलियों के साथ भद्राचलम जाना था. सारी सहेलियां शम्साबाद में बस स्टैंड पर मिलने वाली थीं. इसलिए उस ने मुझ से वहां छोड़ आने के लिए कहा.”

एसएचओ साईंकृष्णा की बातें ध्यान से सुन रहे थे. याद करते हुए साईंकृष्णा ने आगे कहा, “मैं ने अप्सरा को उस के घर से ले कर शम्साबाद पहुंचा दिया. इस के बाद सुबह से उस का फोन बंद बता रहा है. वह भद्राचलम भी नहीं पहुंची है और न अभी तक घर ही लौट कर आई है. पता नहीं वह कहां गई? कहीं रास्ते से उसे किसी ने उठा तो नहीं लिया? कुछ समझ में नहीं आता. उस की मां के साथ मैं ने उसे सब जगह तलाश लिया है, पर उस का कहीं कुछ पता नहीं चला. अब सर, जो कुछ कर सकते हैं आप ही कर सकते हैं.”

अप्सरा के फोटो को घूरते हुए एसएचओ ने पूछा, “कहीं किसी लड़के से प्रेम वगैरह तो नहीं था? घर में मां से लड़ाईझगड़ा तो नहीं होता था?”

“जी नहीं, ऐसी कोई बात नहीं थी. अप्सरा अपने काम से काम रखने वाली लड़की है.” साईंकृष्णा ने कहा.

“यह तुम्हारी सगी भांजी है?” एसएचओ ने पूछा.

एसएचओ के इस सवाल के जवाब में ‘न’ में सिर हिलाते हुए साईंकृष्णा ने कहा, “इस की मां अरुणा को मैं धर्म बहन मानता हूं. इसी रिश्ते से भांजी हुई. बाकी खून का कोई संबंध नहीं है.”

मामला थोड़ा विचित्र लगा, इसलिए कुछ सोचते हुए एसएचओ टी.के. रेड्डी ने कहा, “आप की शिकायत यहां दर्ज कर के थाना शम्साबाद को ट्रांसफर करनी पड़ेगी, क्योंकि घटना उसी इलाके की है. इसलिए इनवैस्टीगेशन वही लोग करेंगे.”

30 वर्षीया सुंदर युवती की गुमशुदगी का मामला था, इसलिए शिकायत मिलते ही थाना शम्साबाद पुलिस की टीम अप्सरा की खोज में लग गई. साईंकृष्णा के बताए अनुसार, सरूरनगर से अपनी कार में बैठा कर उस ने उसे शम्साबाद में बस स्टैंड पर उतारा था. सरूरनगर से शम्साबाद 21 किलोमीटर दूर है.

पुलिस की एक टीम सरूरनगर से शम्साबाद के बीच लगे सीसीटीवी की फुटेज की जांच करने में लग गई थी. सरूरनगर में साईंकृष्णा अप्सरा को कार में बैठाते तो दिखाई दिया, पर शम्साबाद में कहीं अप्सरा साईंकृष्णा की कार से उतर रही हो, ऐसा एक भी दृश्य वहां की सीसीटीवी फुटेज में दिखाई नहीं दिया.

टीम के सदस्यों ने यह जानकरी थाना शम्साबाद के एसएचओ को दी तो उन्होंने साईंकृष्णा को थाने बुला कर एक बार फिर पूरी जानकारी देने को कहा. इस बार थोड़ीथोड़ी देर में साईंकृष्णा अपना बयान बदलने लगा. उस के इस तरह बारबार बयान बदलने से एसएचओ को शक हुआ कि यह पुजारी निर्दोष तो बिलकुल नहीं लग रहा. इस की बात पूरी तरह सच बिलकुल नहीं है.

तब उन्होंने पुजारी से पूछा, “तुम ने अप्सरा को कहां उतारा था, वह एग्जैक्ट जगह बताओ.”

एसएचओ (शम्साबाद) के इस सवाल पर पुजारी थोड़ा बेचैन हुआ और बारबार बयान बदलने लगा. अब एसएचओ का शक विश्वास में बदलने लगा. उन्होंने सवाल पल सवाल करने शुरू किए तो पुजारी साईंकृष्णा ज्यादा देर तक अपने बयान पर टिका नहीं रह सका और सच्चाई उगल दी.

उस ने पुलिस को बता दिया कि अप्सरा अब इस दुनिया में नहीं है. उस ने खुद उस की हत्या कर के लाश मेनहोल में डाल दी है. उस की यह बात सुनते ही वहां मौजूद सभी पुलिसकर्मी चौंक गए. पुलिस को सब से पहले अप्सरा की लाश बरामद करनी थी, इसलिए पुलिस ने साईंकृष्णा को घटनास्थल पर ले जा कर घटना का रिकंस्ट्रक्शन कराया.

चूंकि पुजारी ने मेनहोल में लाश डालने के बाद उस के ऊपर 2 ट्रक मिट्टी डलवा दी थी, इसलिए पुलिस ने मेनहोल की मिट्टी हटवा कर अप्सरा की लाश निकलवा कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. पोस्टमार्टम के बाद अप्सरा की लाश उस की मां अरुणा को सौंप दी गई. मां ने उस का अंतिम संस्कार करा दिया.

अभिनेत्री बनना चाहती थी अप्सरा

फिर 9 जून, 2023 को पुलिस ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर पुजारी साईंकृष्णा को पत्रकारों के सामने पेश किया. इस प्रैस कौन्फ्रैंस में साईंकृष्णा ने अप्सरा हत्याकांड में अपना अपराध स्वीकार करते हुए उस की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

अप्सरा पहले अपनी मां अरुणा के साथ चेन्नै में रहती थी. वहां उस का विवाह भी हो गया था, लेकिन पति ने आत्महत्या कर ली थी तो अप्सरा अकेली पड़ गई. अप्सरा खूबसूरत तो थी ही, उसे अभिनय में रुचि भी थी. इसलिए वह मां के साथ हैदराबाद आ गई. यहां सरूरनगर की वेंकट कालोनी में किराए का मकान ले कर मांबेटी रहने लगीं. घर खर्च चलाने के लिए अप्सरा ने प्राइवेट नौकरी कर ली.

दर्द जब हद से गुजर जाए