Social Stories in Hindi : फरजी हार्ट स्पैशलिस्ट औपरेशन दनादन 7 मौतें

Social Stories in Hindi : गांवदेहात की गलीमोहल्ले में दुकान खोल कर बैठे झोलाछाप डाक्टरों के बारे में आप ने सुना होगा, लेकिन मध्य प्रदेश के जानेमाने मिशन अस्पताल में एक ऐसा फरजी कार्डियोलौजिस्ट पकड़ में आया है, जो न केवल हार्ट के मरीजों का इलाज कर रहा था, बल्कि दनादन सर्जरी भी करता था. जिला प्रशासन की नींद तब टूटी, जब इस की वजह से 7 मरीजों की मौत हो गई. आखिर कैसे चल रहा था इस का गोरखधंधा? 

13 जनवरी, 2025 की शाम को नवी कुरैशी की अम्मी रहीसा बेगम के सीने में दर्द उठा तो आननफानन में उन्हें मध्य प्रदेश के दमोह में स्थित सरकारी अस्पताल ले जाया गया. हालत सीरियस होने पर वहां डाक्टरों ने प्राथमिक उपचार कर उन्हें किसी प्राइवेट अस्पताल में हार्ट स्पैशलिस्ट को दिखाने की सलाह दे कर रेफर कर दिया. हार्ट का मामला था, लिहाजा नवी अपनी अम्मी को ले कर शहर के मिशन अस्पताल पहुंच गए. वहां ड्यूटी पर तैनात जो डाक्टर थे, उन्होंने शुरुआती जांच कर नवी से कहा, ”देखिए, पेशेंट को हार्ट अटैक आया है, इन्हें 72 घंटे इनवैस्टीगेशन में रखना होगा.’’

डाक्टर की बात सुन कर नवी घबरा गए. नवी कुरैशी को पता था कि एक साल पहले भी अम्मी को अटैक आया था, पर वह इलाज से ठीक हो गई थीं. ड्यूटी पर तैनात डाक्टर ने एक परची पर जांच लिखते हुए 50 हजार रुपए काउंटर पर जमा करवाने के निर्देश दिए. दूसरे दिन 14 जनवरी को उन की एंजियोग्राफी की गई तथा ईको की जांच के बाद डाक्टर ने नवी से कहा, ”मामला सीरियस है, पेशेंट की 2 नसें ब्लौक हो गई हैं, एक 92 परसेंट तो दूसरी 80 परसेंट तक. इन की सर्जरी करनी पड़ेगी, पैसों का इंतजाम कर लीजिए.’’

नवी ने जब डाक्टर से ईको की जांच रिपोर्ट मांगी तो उन्होंने नहीं दी. 2 दिन पैसों के इंतजाम में चक्कर काटने के बाद हार्ट स्पैशलिस्ट डाक्टर से मिले तो उन्होंने कहा कि ब्लौकेज है और इस का हल केवल औपरेशन है. 2 दिन बाद यानी 16 जनवरी को रहीसा  की एंजियोप्लास्टी हुई, जिस के दौरान उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया. मिशन अस्पताल में डा. एन. जौन कैम के द्वारा किए गए औपरेशन के दौरान नवी की अम्मी रहीसा की मौत हो गई. मिशन अस्पताल द्वारा दी गई डिस्चार्ज स्लिप पर 63 साल की रहीसा बेगम की मौत हार्टअटैक से होनी बताई गई थी.

यही वजह थी कि नवी के फेमिली वालों ने डैडबौडी का पोस्टमार्टम भी नहीं करवाया और डैडबौडी ले कर घर आ गए. इसी तरह दमोह के पटेरा में रहने वाले 68 साल के मंगल सिंह राजपूत को 3 फरवरी, 2025 की सुबह 6 बजे सीने में दर्द हुआ था. उन का छोटा बेटा जितेंद्र तुरंत उन्हें मिशन अस्पताल ले कर पहुंचा तो डाक्टर ने सामान्य चैकअप के बाद जितेंद्र से कहा, ”इन्हें मेजर अटैक आया है, तुरंत हार्ट सर्जरी करनी पड़ेगी. पैसों का बंदोबस्त कर लीजिए.’’

”लेकिन डाक्टर साहब, अभी तो हमारे पास इतना पैसा भी नहीं है.’’ घबराते हुए जितेंद्र बोला.

”इन का आयुष्मान कार्ड है क्या? यदि हो तो केवल जांच का पैसा लगेगा और  औपरेशन हो जाएगा.’’ डाक्टर ने कहा.

”हां साहब, आयुष्मान कार्ड तो है, मंगा लेते हैं घर से. आप औपरेशन की तैयारी कर लीजिए.’’ जितेंद्र ने इतना कह कर अपने बड़े भाई धर्मेंद्र को फोन कर के बता दिया कि पापा की हार्ट सर्जरी होनी है, आप तुरंत आयुष्मान कार्ड ले कर अस्पताल आ जाओ. इस के बाद सुबह करीब 11 बजे धर्मेंद्र आयुष्मान कार्ड ले कर अस्पताल पहुंचे, तब तक मंगल सिंह की सर्जरी हो चुकी थी. उस समय वह होश में थे, उन्होंने आंखें खोल कर हम से इशारे से बातचीत की, इसी दौरान अचानक वे तड़पने लगे तो डाक्टर और मौजूद स्टाफ ने घर वालों को वार्ड से बाहर कर दिया.

मंगल सिंह के दोनों बेटे और भतीजे शीशे से अंदर झांक रहे थे. अस्पताल का स्टाफ उन का सीना दबा रहा था. डाक्टरों ने बाहर से दवा मंगवाई, कुछ देर बाद स्टाफ ने कोरे कागज पर दस्तखत करवाते हुए कहा कि मरीज को वेंटिलेटर पर रखना है. अस्पताल में शाम 4 बजे तक वेंटिलेटर पर रख कर मरीज का इलाज चलता रहा. जब मंगल सिंह के बेटों ने वहां मौजूद कर्मचारियों से पूछा, तब उन्होंने बताया कि आप के मरीज की तो मौत हो चुकी है. इस के बाद कागजात तैयार कर अस्पताल प्रबंधन ने मंगल सिंह की डैडबौडी घर वालों के सुपुर्द कर दी.

 

 

इसी तरह सत्येंद्र सिंह राठौर निवासी लाडनबाग, हथना (दमोह), इजराइल खान, निवासी डा. पसारी के पास (दमोह), बुधा अहिरवाल निवासी बरतलाई, पटेरा (दमोह) भी मिशन अस्पताल में जा कर मौत का शिकार हुए. दमोह के मिशन अस्पताल में हार्ट सर्जरी को ले कर हुए एक बड़े खुलासे में एक युवक की हिम्मत काम आई. यदि युवक पहल नहीं करता तो शायद यह फरजी डाक्टर और भी कई लोगों की जान ले सकता था. मामले का खुलासा तब हुआ, जब दमोह जिले के बरी गांव का रहने वाला कृष्ण कुमार पटेल अपने दादा आशाराम पटेल को सीने में दर्द के इलाज के लिए 29 जनवरी, 2025 को मिशन अस्पताल ले कर पहुंचा

वहां पहुंचने पर उसे बताया गया कि 50 हजार रुपए जमा करो, उस के बाद ही डाक्टर आ कर मरीज की जांच करेंगे. इस के बाद फेमिली वालों ने तुरंत ही अस्पताल में पैसे जमा कराए. तब कहीं डा. एन. जौन केम ने दादाजी का चैकअप किया और एंजियोग्राफी करने के बाद बताया गया कि आशाराम पटेल को मेजर ब्लौकेज है और उन की सर्जरी करनी पड़ेगी. जब कृष्ण कुमार ने रिपोर्ट और जांच के वीडियो मांगे तो डाक्टर से उन की बहस हो गई. डाक्टर ने कोई भी रिपोर्ट और वीडियो देने से मना कर दिया. इस के बाद कृष्ण कुमार को संदेह हुआ कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है. लेकिन उस समय उस ने दादाजी को वहां से डिस्चार्ज करा कर जबलपुर ले जाना उचित समझा.

जबलपुर में एक निजी अस्पताल में उन की जांच कराई तो पता चला कि इतने ब्लौकेज नहीं हैं, जितने दमोह में बताए जा रहे थे. वहां पर एंजियोप्लास्टी कराने के बाद वह दमोह आ गए. फिर उस ने बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष एडवोकेट दीपक तिवारी से मुलाकात की तथा पूरे साक्ष्य एकत्र करने के बाद उन्होंने मानव अधिकार आयोग, एसपी तथा डीएम साहब से मामले की शिकायत की. लेकिन पुलिस ने समय पर न तो मामला दर्ज किया और न ही आरोपी डाक्टर के खिलाफ कोई जांच की. पुलिस जांच करती या आरोपी डाक्टर पर कोई केस दर्ज करती, इस के पहले ही डाक्टर अस्पताल छोड़ कर फरार हो गया.

इसी बीच राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने जब प्रशासन को नोटिस जारी किए तब आननफानन में सीएमएचओ डा. मुकेश जैन ने कथित डाक्टर के खिलाफ कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज कराई.

प्रयागराज में पकड़ा गया फरजी डाक्टर

इस पूरे मामले में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डा. मुकेश जैन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं. बताया जाता है कि डा. मुकेश जैन पहले नरसिंहपुर जिले में सिविल सर्जन के पद पर पदस्थ रह चुके हैं. उस दौरान फरजी डा. एन. जौन केम ने वहां पर अपनी प्रैक्टिस चालू की थी. वहीं पर दोनों का परिचय हुआ था. शायद इसी वजह से सीएमएचओ ने समय पर रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई. लेकिन जैसे ही मानव अधिकार आयोग ने नोटिस जारी किया तो मजबूरन सीएमएचओ को फरजी डाक्टर के खिलाफ पुलिस में केस दर्ज कराना पड़ा.

दिसंबर 2024 से फरवरी 2025 तक के 3 महीने में मिशन असपताल में हुई 7 मौतों के मामले में जब डाक्टर पर एफआईआर दर्ज हुई तो दमोह जिले के एसपी श्रुतकीर्ति सोमवंशी ने डाक्टर को पकडऩे के लिए एक टीम गठित कर साइबर टीम की मदद ली. फरजी डाक्टर की मोबाइल लोकेशन उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में मिली. 7 अप्रैल की शाम करीब 4 बजे टीम प्रयागराज पहुंची तो आरोपी का मोबाइल बंद मिला. इधर, दमोह साइबर टीम के राकेश अठया और सौरभ टंडन लगातार डाक्टर की लोकेशन ट्रैस कर रहे थे. लोकेशन के आधार पर पुलिस टीम प्रयागराज पहुंच गई और स्थानीय पुलिस की मदद से औद्योगिक थाना क्षेत्र इलाके में ओमेक्स अदनानी बिल्डिंग के एक फ्लैट में छिपे डा. एन. जौन कैम को गिरफ्तार कर लिया.

दमोह ले जा कर एसपी श्रुतकीर्ति सोमवंशी ने उस से सघन पूछताछ की. नरेंद्र विक्रमादित्य उर्फ डा. नरेंद्र जौन केम को पुलिस रिमांड पर ले कर उस के गृह निवास कानपुर पहुंची, जहां से कई चौंकाने वाले सच निकल कर सामने आए. एसपी श्रुतकीर्ति सोमवंशी ने बताया, ”नरेंद्र जौन केम के निवास से कई फरजी दस्तावेज मिले हैं, जिस में आधार कार्ड, कई तरह की स्टैंप और कई तरह के फरजी डाक्यूमेंट्स शामिल थे. हालांकि उस के पिता के मुताबिक आरोपी डाक्टर का संपर्क ज्यादातर उस के परिवार से नहीं रहा. वह अपने घर बहुत कम आताजाता था.’’

डाक्टर के दस्तावेजों से पता चला कि उस ने दार्जिलिंग मैडिकल कालेज से  एमबीबीएस की पढ़ाई की थी और पहले ही अटेंप्ट में उस का पीएमटी निकल गया था. इस के बाद उस ने पहली बार नोएडा में प्रैक्टिस शुरू की थी. लेकिन 2013 में उस के द्वारा उपचार में कोताही और फरजीवाड़ा सामने आने के बाद इंडियन मैडिकल एसोसिएशन ने 2014 से 2019 तक उस का रजिस्ट्रैशन कैंसिल कर दिया था. इस अवधि में उस ने हैदराबाद तथा कई अन्य जगहों पर भी अलगअलग नाम से प्रैक्टिस की थी. उस के पिता ने पुलिस को बताया कि नरेंद्र पढऩे में शुरू से ही बहुत होशियार था और लंदन की जार्जिस यूनिवर्सिटी के डा. एन. जौन केम से काफी प्रभावित था. वह उन्हें अपना आदर्श मानता था, इसलिए उन के नाम पर इस ने अपना नाम नरेंद्र जौन केम रख लिया.

पुलिस को उस के घर से कई रिसर्च पेपर भी बरामद हुए. उस के घर में एक पूरी की पूरी लैब बनी हुई थी. वहां से पुलिस ने कई सारी फरजी डिग्रियां और दस्तावेज बरामद किए. जो रिसर्च पेपर बरामद किए गए, उस में इस ने संपादन भी किया. घर से जो चीजें बरामद हुईं, वे फरजी पाई गईं. उस ने पूछताछ में भी यह बात कबूल की. नरेंद्र विक्रमादित्य 2004 से ले कर 2009 तक यूएस में रहा और वहां से इस ने एमडी की डिग्री करने की बात कही है. वह अभी भी इस बात पर कायम है कि उस की सभी डिग्रियां असली हैं. लेकिन अभी तक की जांच में इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी है. इस संबंध में पुलिस संबंधित यूनिवर्सिटीज और मैडिकल कालेज से संपर्क कर कर रही है.

पुलिस को जांच में ऐसे कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं जिस से कि पता चल सके कि इस ने बाहर के मैडिकल कालेज या यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की हो. इस ने केवल एमबीबीएस किया है. उस के बाद की इस की सभी डिग्रियां फरजी हैं. सीएमएचओ मुकेश जैन ने फरवरी माह में मिशन अस्पताल में हुई सभी सर्जरी और डाक्टर्स की जानकारी अस्पताल मैनेजमेंट से मांगी थी, लेकिन अस्पताल मैनेजमेंट ने डा. नरेंद्र जौन केम के बारे में कोई जानकारी नहीं दी. इस की रिपोर्ट 5 मार्च, 2025 को दमोह कलेक्टर सुधीर कोचर को दी गई थी.

दूसरी बार फिर मिशन अस्पताल से डाक्टर के डाक्यूमेंट मांगे गए, तब जो डाक्यूमेंट दिए, उस में बताया गया कि आरोपी डाक्टर ने कोलकाता यूनिवर्सिटी से एमबीबीएस और एमडी की डिग्री की है और कार्डियोलौजी की डिग्री पुडुचेरी से की है. सभी डाक्यूमेंट्स का वेरिफिकेशन करने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने सागर मैडिकल कालेज को पत्र लिखा, लेकिन उन का जवाब आया कि वहां कार्डियोलौजिस्ट नहीं है. इसलिए जबलपुर मैडिकल कालेज से जांच की मांग कीजिए. इस के बाद 4 अप्रैल, 2025 को जबलपुर मैडिकल कालेज टीम को जांच के लिए पत्र लिखा गया.

सीएमएचओ मुकेश जैन ने बताया, मैडिकल कालेज जबलपुर की टीम ने जब डाक्टर की डिग्री की जांच की तो उस में पुडुचेरी विश्वविद्यालय के चांसलर के रूप में पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के हस्ताक्षर थे. इस बात का सत्यापन करने के लिए जब टीम ने पूर्व राष्ट्रपति हामिद अंसारी के हस्ताक्षर चैक किए तो डिग्री में मौजूद हस्ताक्षर और ओरिजिनल हस्ताक्षर में अंतर मिला. इस से स्पष्ट हो गया कि आरोपी डाक्टर की कार्डियोलौजिस्ट की डिग्री फरजी है.

अस्पताल पर ऐसे कसा शिकंजा

नियमानुसार मध्य प्रदेश में प्रैक्टिस करने के लिए डाक्टर को एमपी सरकार के स्वास्थ्य विभाग में रजिस्ट्रैशन कराना आवश्यक होता है, लेकिन एमपी में डा. कैम रजिस्टर्ड नहीं है. उस के जो दस्तावेज मिले हैं, उस में उस ने आंध्र प्रदेश का रजिस्ट्रैशन लगाया है, लेकिन आंध्र प्रदेश के मैडिकल बोर्ड में भी उस के रजिस्ट्रैशन संबंधी कोई दस्तावेज नहीं पाए गए हैं. मध्य प्रदेश के दमोह में फरजी डाक्टर द्वारा की गई हार्ट सर्जरी और उस से जुड़ी 7 मौतों के मामले में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग  के सदस्य प्रियांक कानूनगो 16 अप्रैल, 2025 को दमोह पहुंचे. आयोग के सदस्य प्रियांक कानूनगो ने मृतकों के फेमिली वालों से मुलाकात कर जिला प्रशासन और खासतौर पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी पर गंभीर आरोप लगाए.

उन्होंने कहा कि जो तथ्य सामने आए हैं, उन में सीएमएचओ डा. मुकेश जैन की लापरवाही स्पष्ट रूप से उजागर हो रही है. इस फरजी डाक्टर ने दिसंबर 2024 को दमोह के मिशन अस्पताल में फरजी दस्तावेजों के जरिए नियुक्ति पाई. इस दौरान अस्पताल ने उसे ठीक से जांच किए बिना 8 लाख रुपए प्रतिमाह वेतन देने का कौन्ट्रैक्ट भी किया. चौंकाने वाली बात यह है कि यह अस्पताल सरकार की आयुष्मान भारत स्कीम के तहत गरीबों का इलाज भी करता था. ऐसे में फरजी डाक्टर ने सार्वजनिक फंड्स का लंबे समय तक नुकसान किया और अस्पताल प्रशासन को इस की भनक तक नहीं लगी.

आरोपित डाक्टर ने लंदन के कार्डियोलौजिस्ट डा. एन. जौन कैम के नाम पर ढाई महीने में 15 हार्ट औपरेशन किए. साल 2024 के दिसंबर महीने से फरवरी 2025 के बीच हुए इन औपरेशनों में 7 मरीजों की मौत हो गई.  इस बात का खुलासा तब हुआ, जब एक मरीज के फेमिली वालों को शक हुआ, फिर उन्होंने शिकायत की. इस के बाद मामला मानवाधिकार आयोग तक पहुंचा.

कौन हैं असली प्रोफेसर जौन कैम?

बीते कई दिनों से देश की सुर्खियों में रहने वाला दमोह का मिशन अस्पताल दरअसल ईसाई मिशनरी द्वारा संचालित है. इसी अस्पताल के प्रबंधन ने बिना किसी जांचपड़ताल के एक हार्ट स्पैशलिस्ट की सेवाएं लेनी शुरू कर दीं. प्रदेश के मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव के सख्त निर्देश के बाद हुई काररवाई को अंजाम देते हुए स्वास्थ्य विभाग ने मिशन अस्प्ताल का लाइसेंस निलंबित कर दिया है. जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डा. मुकेश जैन ने बताया कि मिशन अस्पताल के लाइसेंस की अवधि 31 मार्च 2025 तक थी.

नियमानुसार अस्पताल को लाइसेंस रिन्यूवल के लिए पोर्टल पर अप्लाई करना था, मिशन अस्प्ताल ने अप्लाई भी किया था, लेकिन उस मेंकमियां पाई गईं, जिस वजह से अस्पताल का लाइसेंस निलंबित किया गया है. डा. जैन के मुताबिक अस्पताल प्रबंधन को निर्देश दिए गए हैं कि 3 दिनों के भीतर वो यहां एडमिट मरीजों को डिस्चार्ज कर दे और यदि गंभीर मरीज हैं तो उन्हें जिला अस्पताल में दाखिल कराएं. दमोह में 7 मरीजों की जान का दुश्मन बना नरेंद्र विक्रमादित्य यादव एक फरजी डाक्टर ही नहीं है, बल्कि वह बड़ा शातिर बदमाश भी है. उस ने जिस विदेशी डाक्टर की पहचान चुराई, वह असल में प्रोफेसर जौन कैम हैं.

जौन कैम लंदन के सेंट जार्ज यूनिवर्सिटी में क्लिनिकल कार्डियोलौजी के एमेरिटस प्रोफेसर हैं. फरजी एन जौन कैम (नरेंद्र विक्रमादित्य यादव) की सच्चाई सामने आने के बाद फैक्ट चेक वेबसाइट बूम ने असली जौन कैम से मामले को ले कर बात की तो उन्होंने कहा, ”नरेंद्र विक्रमादित्य यादव उन की पहचान का दुरुपयोग कर रहा था.’’ वह उन के njohncamm.com नाम से एक वेबसाइट भी चलाता था और @njohncamm नाम से उस का एक्स (पहले ट्विटर) हैंडल भी था. हालांकि, अब इसे सस्पेंड कर दिया गया है.

फरजी डा. एन जौन कैम जो वेबसाइट चलाता था, उस पर कई बड़े दावे किए गए हैं. वेबसाइट के अनुसार उस ने एमबीबीएस और एमडी की डिग्री भारत से की है. वहीं, 2001 में सेंट जौर्ज हौस्पिटल लंदन (यूके) से एमआरसीपी (Member, Royal College of Physicians) की डिग्री पूरी की. 2002 में सेंट जार्जेस हौस्पिटल, लंदन में इंटरवेंशनल कार्डियोलौजिस्ट के रूप में जौइन किया और प्रशिक्षण लिया. इस के बाद ब्रिटिश हार्ट एसोसिएशन की सदस्यता मिली और फिर उसे ब्रिटिश मैडिकल जर्नल में समीक्षा बोर्ड का संपादक नियुक्त किया गया. 2004 में आरएफयूएमएस नार्थ शिकागो में डा. जेफरी बी लैकियर के अंडर में फेलोशिप भी पूरी की. साथ ही अब तक प्राइमरी एंजियोप्लास्टी समेत 18 हजार से अधिक जटिल कार्डियोवैस्कुलर सर्जरी की हैं.

करीब 5 साल पहले एक ट्विटर अकाउंट के जरिए यह पहचान चोरी सामने आई थी, जिस में आरोपी ने खुद को डा. जौन कैम बता कर कई विवादास्पद राजनीतिक बयान दिए थे. मिशन अस्पताल में हुई 7 मौतों के बाद स्वास्थ्य विभाग की जांच रिपोर्ट में सामने आया कि फरजी दस्तावेजों के जरिए कैथलैब का अवैध रूप से संचालन हो रहा था. इस आधार पर पुलिस ने 9 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है. दमोह के एएसपी संदीप मिश्रा ने  बताया, ”मिशन अस्पताल में जिस कैथलैब को सील किया गया था, जब उस की जांच मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी द्वारा गठित टीम ने की तो पाया कि कैथलैब का अवैध रूप से संचालन हो रहा था.

जिला अस्पताल में पदस्थ डा. अखिलेश दुबे के फरजी हस्ताक्षर कर के कैथलैब संचालन की अनुमति बनाई गई थी. जिस में कुछ मरीजों की एंजियोग्राफी एवं एंजियोप्लास्टी करना पाया गया.’’

स्वास्थ्य विभाग द्वारा की गई शिकायत के आधार पर कोतवाली में बीएनएस की धारा 318 (4), 336 (2), 340 (2), 105, 3, 5 मध्य प्रदेश उपचार एवं रूजोपचार अधिनियम रजिस्ट्रीकरण एवं अधिज्ञापन अधिनियम 1973 एवं नियम 1997 2021 की धारा 12 के तहत केस दर्ज किया गया. जिन 9 लोगों को मामले में आरोपी बनाया गया है, उन में असीम, फ्रैंक हैरिसन, इंदु, जीवन, रोशन, कदीर यूसुफ, डा. अजय लाल, संजीव लैंबर्ट तथा विजय लैंबर्ट के नाम शामिल हैं. मिशन अस्पताल में फरजी डिग्री के सहारे कार्डियोलौजिस्ट बन कर मरीजों की जान से खेलने वाले डा. नरेंद्र यादव को 7 अप्रैल, 2025 को प्रयागराज से गिरफ्तार करने के बाद 18 अप्रैल की दोपहर जिला कोर्ट में पेश किया गया.

इस दौरान डाक्टर के वकील सचिन नायक ने आरोपी के जब्त मोबाइल के लिए कोर्ट से गुहार लगाते हुए कहा कि मेरे मुवक्किल का फोन वापस दिलाया जाए, ताकि वह वकील की फीस दे सके. इस पर सहायक लोक अभियोजक एडीपीओ संजय रावत ने कहा कि मोबाइल की अभी फोरैंसिक जांच होनी है. इस के बाद कोर्ट ने यह मांग खारिज कर दी और आरोपी डाक्टर को 5 दिन की पुलिस रिमांड पर भेज दिया. उसे पहले 5 दिन और फिर 4 दिन की रिमांड पर लिया. कथा लिखने तक आरोपी तथाकथित डा. नरेंद्र विक्रमादित्य यादव उर्फ डा. एन जौन कैम से पुलिस पूछताछ कर रही थी.

दिल्ली में पकड़ी गई 12वीं पास फरजी डाक्टर

देश के फरजी झोलाछाप डाक्टर केवल गांवकस्बों में ही नहीं हैं, महानगर भी इन से अछूते नहीं हैं. अप्रैल 2025 में देश की राजधानी दिल्ली में एक फरजी महिला डाक्टर को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने गिरफ्तार किया था. फरजी डाक्टर दिल्ली की संगम विहार कालोनी में रहने वाली किरण श्रीवास्तव है, जिस की उम्र 48 साल है. जांच में पाया गया कि महिला डाक्टर सिर्फ 12वीं पास है और उस ने मैडिकल दस्तावेजों में जालसाजी कर के फरजी बीएएमएस डिग्री बिहार से हासिल की दिखाई. उस के आधार पर क्लीनिक खोल लिया.

दिल्ली क्राइम ब्रांच के डीसीपी आदित्य गौतम ने मामले की जानकारी देते हुए बताया कि विकास नगर रणहौला में रहने वाले रमेश कुमार ने इस फरजी डाक्टर के खिलाफ केस दर्ज कराया था. शिकायत में कहा गया कि 2009 में रमेश की गर्भवती पत्नी को पेट दर्द की समस्या थी, जिस के कारण उस ने महिला डाक्टर के पास उसे क्लीनिक में भरती कराया था. फरजी डाक्टर ने पत्नी को क्लीनिक में भरती कर इलाज किया और डिस्चार्ज कर दिया, लेकिन पेट दर्द से छुटकारा नहीं मिल सका. रमेश ने अपनी पत्नी को दोबारा क्लीनिक में भरती कराया तो डाक्टर ने कहा कि महिला की सर्जरी करानी होगी.

उक्त महिला डाक्टर ने पत्नी की सर्जरी की और उसे घर भेज दिया. कुछ दिनों बाद पत्नी की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई और इलाज के दौरान उस ने दम तोड़ दिया. रमेश ने इस की शिकायत पुलिस में कर दी. जांच में पता चला कि महिला के पास किसी तरह की वैध डिग्री नहीं थी. उस ने बीएएमएस की जाली डिग्री बनवाई थी और उसी के आधार पर क्लीनिक खोला था. पुलिस ने इस मामले में तथाकथित महिला डा. किरण श्रीवास्तव को गिरफ्तार कर लिया. कुछ दिनों में उसे जमानत भी मिल गई. जमानत मिलने के बाद फरजी महिला डाक्टर कोर्ट में हाजिर नहीं हुई तो 2016 में अदालत ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया.

दिल्ली क्राइम ब्रांच की टीम ने उसे गिरफ्तार करने के लिए जाल बिछाया. सूचना के आधार पर पुलिस ने ग्रेटर कैलाश-2 में छापेमारी कर आरोपी महिला को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में किरण श्रीवास्तव ने बताया कि साल 2005-06 में वह दिल्ली के उत्तम नगर इलाके में एक डाक्टर के पास असिस्टेंट के रूप में काम करती थी. उस क्लीनिक में उस ने बेसिक इलाज करना सीख लिया था. इस के बाद उस ने बीएएमएस की फरजी डिग्री ले कर अपना क्लीनिक रणहौला में खोल लिया, जहां वो स्त्रीरोग संबंधी रोगों का इलाज किया करती थी.

ओटी टेक्नीशियन कराता था महिलाओं की डिलीवरी

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उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में ओटी टेक्नीशियन ने खुद को डाक्टर बता कर 14 महिलाओं की सीजेरियन डिलीवरी कर डाली. 15वें औपरेशन में महिला की मौत हो गई, तब उस की असलियत सामने आई. इस का पता चलते ही टेक्नीशियन और अस्पताल संचालक पतिपत्नी फरार हो गए. गुस्साए फेमिली वालों ने अस्पताल में हंगामा किया. शुरुआती जांच में पता चला कि अस्पताल संचालक पतिपत्नी नारमल डिलीवरी को जटिल बता कर पेशेंट को डराते थे. कहते थे कि पेट में बच्चा टेढ़ा है, फिर सर्जन के नाम पर ओटी टेक्नीशियन को बुला कर औपरेशन करवा कर पैसे भी वसूल करते थे.

चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि अस्पताल भी बिना लाइसेंस के चल रहा था. यहां कोई भी डिग्रीधारी डाक्टर नहीं था. बांसगांव गोहली बसंत निवासी 28 साल की रेनू की दूसरी डिलीवरी होनी थी. 27 अप्रैल, 2025 की शाम को उसे प्रसव पीड़ा हुई तो रेनू के पति दिनेश कुमार ने इस की सूचना गांव की आशा कार्यकर्ता गंगोत्री से मिला. आशा दीदी ने सरकारी एंबुलेंस की मदद से रविवार शाम करीब 4 बजे सरकारी अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में उसे भरती कराया. 2 घंटे लगातार इलाज होने के बाद डिलीवरी नहीं हुई तो सरकारी अस्पताल के डाक्टर ने उसे जिला अस्पताल रेफर कर दिया.

मगर आशा दीदी गंगोत्री ने रेनू को जिला अस्पताल न ले जा कर बघराई में स्थित श्री गोविंद हौस्पिटल में ले जा कर भरती करा दिया. यहां पर बघराई गांव निवासी अस्पताल संचालक अमरीश राय और उस की पत्नी ने फेमिली वालों को डराया. कहा कि पेट में बच्चा टेढ़ा है, जल्द से जल्द डिलीवरी करानी पड़ेगी. यह सुन कर फेमिली वाले डर गए और औपरेशन के लिए राजी हो गए. पतिपत्नी ने रात 9 बजे ओटी टेक्नीशियन पन्नालाल को बुलाया और मरीज के घर वालों से कहा, ”यही हमारे अस्पताल के सर्जन हैं.’’

इस के बाद ओटी टेक्नीशियन ने औपरेशन किया, महिला ने बेटे को जन्म दिया, लेकिन इस के बाद उस की तबीयत बिगडऩे लगी. प्लेटलेट्स तेजी से गिरने लगीं. दूसरे दिन 28 अप्रैल की सुबह हौस्पिटल का वही टेक्नीशियन मरीज को कार से ले कर दूसरे अस्पताल में भरती कराने निकल गया. इस बीच ज्यादा खून बहने से रास्ते में ही रेनू ने दम तोड़ दिया. यह खबर मिलते ही टेक्नीशियन और अस्पताल संचालक पतिपत्नी फरार हो गए. मामला उजागर होने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने श्री गोविंद हौस्पिटल पर काररवाई के बाद खजनी इलाके के अवैध तरीके से संचालित श्री हरि मैडिकल सेंटर को भी सील कर दिया.

वहीं लापरवाही से औपरेशन कर प्रसूता की मौत के मामले में 3 आरोपियों गगहा जगरनाथपुर निवासी कथित डा. पन्नालाल दास, उस के बेटे नीरज और गोहली बसंत की आशा कार्यकर्ता गंगोत्री देवी को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भिजवा दिया है. Social Stories in Hindi

UP Crime : मांबेटी को जलाया जिंदा

UP Crime : उत्तर प्रदेश के कानपुर (देहात) जनपद के रूरा थाने से 5 किलोमीटर दूर मैथा ब्लौक के अंतर्गत एक बड़ी आबादी वाला गांव है मड़ौली. अकबरपुर और रूरा 2 बड़े कस्बों के बीच लिंक रोड से जुड़े ब्राह्मण बाहुल्य इसी गांव में कृष्ण गोपाल दीक्षित सपरिवार रहते थे. उन के परिवार में पत्नी प्रमिला के अलावा 2 बेटे शिवम, अंश तथा एक बेटी नेहा थी. कृष्ण गोपाल दीक्षित के पास मात्र 2 बीघा जमीन थी. इसी जमीन पर खेती कर और बकरी पालन से वह अपना परिवार चलाते थे. बेटे जवान हुए तो वह भी पिता के काम में सहयोग करने लगे.

कृष्ण गोपाल के घर के ठीक सामने अशोक दीक्षित का मकान था. अशोक दीक्षित के परिवार में पत्नी सुधा के अलावा 3 बेटे गौरव, अखिल व अभिषेक थे. अशोक दीक्षित दबंग व संपन्न व्यक्ति थे. उन के पास खेती की अच्छीखासी जमीन थी. इस के अलावा उन के 2 बेटे गौरव व अभिषेक फौज में थे. संपन्नता के कारण ही गांव में उन की तूती बोलती थी. उन के बड़े बेटे गौरव का विवाह रुचि दीक्षित के साथ हो चुका था. रुचि खूबसूरत थी. वह अपनी सास सुधा के सहयोग से घर संभालती थी.

घर आमनेसामने होने के कारण अशोक व कृष्ण गोपाल के बीच बहुत नजदीकी थी. दोनों परिवारों का एकदूसरे के घर आनाजाना था. अशोक की पत्नी सुधा व कृष्ण गोपाल की पत्नी प्रमिला की खूब पटती थी, लेकिन दोनों के बीच अमीरीगरीबी का बढ़ा फर्क था. कृष्ण गोपाल व उस के परिवार के मन में सदैव गरीबी की टीस सताती रहती थी.

मड़ौली गांव से लगभग एक किलोमीटर दूर सडक़ किनारे ग्राम समाज की भूमि पर कृष्ण गोपाल दीक्षित का पुश्तैनी कब्जा था. सालों पहले इस वीरान पड़ी भूमि पर कृष्ण गोपाल के पिता चंद्रिका प्रसाद दीक्षित व बाबा ने पेड़ लगा कर कब्जा किया था. बाद में पेड़ों ने बगीचे का रूप ले लिया. इसी बगीचे में कृष्ण गोपाल ने एक कमरा बना लिया था और सामने झोपड़ी डाल ली थी. इसी में वह रहते थे और पशुपालन करते थे.

भू अभिलेखों में ग्राम समाज की यह जमीन गाटा संख्या 1642 में 3 बीघा दर्ज है, जिस में से एक बीघा भूमि पर कृष्ण गोपाल का कब्जा था. लेकिन जो 2 बीघा जमीन थी, उस पर कृष्ण गोपाल किसी को भी कब्जा नहीं करने देता था. उस पर भी वह अपना अधिकार जमाता था. कृष्ण गोपाल ही नहीं, गांव के दरजनों लोग ग्राम समाज की जमीन पर काबिज हैं. किसी ने खूंटा गाड़ कर कब्जा किया तो किसी ने कूड़ाकरकट डाल कर. किसी ने कच्चापक्का निर्माण करा कर कब्जा किया तो किसी ने सडक़ किनारे दुकान बना ली. इस काबिज ग्राम समाज की भूमि पर किसी ने अंगुली नहीं उठाई और आज भी काबिज हैं.

सिपाही लाल ने शुरू किया विवाद…

लेकिन कृष्ण गोपाल की काबिज भूमि पर आंच तब आई, जब गांव के ही सिपाही लाल दीक्षित ने गाटा संख्या 1642 की 2 बीघा में से एक बीघा जमीन अपनी बेटी रानी के नाम तत्कालीन ग्रामप्रधान के साथ मिलीभगत कर पट्टा करा दी. रानी का विवाह रावतपुर (कानपुर) (UP Crime) निवासी रामनरेश के साथ हुआ था. लेकिन उस की अपने पति से नहीं पटी तो वह मायके आ कर रहने लगी थी. उस का पति से तलाक हुआ या नहीं, यह तो पता नहीं चला, पर उस का पति से लगाव खत्म हो गया था.

यह बात सन 2005 की है. सिपाही लाल ने बेटी के नाम पट्ïटा तो करा दिया, लेकिन वह कृष्ण गोपाल के विरोध के कारण उस पर कब्जा नहीं कर पाया. बस यही बात कृष्ण गोपाल के पड़ोसी अशोक दीक्षित को चुभने लगी. दरअसल, रानी रिश्ते में अशोक की बहन थी. वह चाहते थे कि रानी पट्टे वाली जमीन पर काबिज हो. इस मामले को ले कर अशोक दीक्षित ने परिवार के अनिल दीक्षित, निर्मल दीक्षित, गेंदनलाल व बढ़े बउआ को भी अपने पक्ष में कर लिया. अब ये लोग कृष्ण गोपाल के विपक्षी बन गए और मन ही मन रंजिश मानने लगे.

अशोक दीक्षित का बेटा गौरव दीक्षित फौज में था. उसे भी इस बात का मलाल था कि उस के पिता रानी बुआ को पट्टे वाली जमीन पर काबिज नहीं करा पाए. वह जब भी छुट्टी पर गांव आता, वह कृष्ण गोपाल के परिवार को नीचा दिखाने की कोशिश करता. एक बार उस ने शिवम की बहन नेहा के फैशन को ले कर भद्दी टिप्पणी कर दी. इस पर नेहा और उस की मां प्रमिला ने उसे तीखा जवाब दिया, जिस से वह तिलमिला उठा.

कृष्ण गोपाल दीक्षित के दोनों बेटे शिवम व अंशु भी दबंगई में कम न थे. दोनों विश्व हिंदू परिषद के सक्रिय सदस्य थे. विहिप के धरनाप्रदर्शन में दोनों भाग लेते रहते थे. दोनों भाई आर्थिक रूप से भले ही कमजोर थे, लेकिन खतरों के खिलाड़ी थे. अब तक शिवम की शादी शालिनी के साथ हो गई थी. वह पुश्तैनी मकान में रहता था. दिसंबर, 2022 में गौरव छुट्टी पर आया तो एक रोज सडक़ किनारे एक दुकान पर किसी बात को ले कर उस की अंशु से तकरार होने लगी. तकरार बढ़ती गई और दोनों एकदूसरे को देख लेने की धमकी देने लगे.

इस घटना के बाद गौरव ने फैसला कर लिया कि वह कृष्ण गोपाल व उस के बेटों को सबक जरूर सिखाएगा और उन की अवैध कब्जे वाली ग्राम समाज की भूमि को मुक्त करा कर ही दम लेगा. इस के बाद गौरव ने अपने पिता अशोक दीक्षित व परिवार के अन्य लोगों के साथ कान से कान जोड़ कर सलाह की और पूरी योजना बनाई. योजना के तहत गौरव ने लेखपाल अशोक सिंह चौहान से मुलाकात की. पहली ही मुलाकात में दोनों एकदूसरे से प्रभावित हुए. कारण, अशोक सिंह चौहान भी पहले फौज में था. रिटायर होने के बाद उसे लेखपाल की नौकरी मिल गई थी.

चूंकि दोनों फौजी थे, अत: जल्द ही उन की दोस्ती हो गई. इस के बाद गौरव ने लेखपाल को पैसों का लालच दे कर उसे अपनी मुट्ठी में कर लिया. योजना के तहत ही गौरव ने अपने पिता अशोक दीक्षित के मार्फत परिवार के एक व्यक्ति गेंदनलाल दीक्षित को उकसाया और उसे शिकायत करने को राजी कर लिया. गेंदन लाल ने तब दिसंबर के अंतिम सप्ताह में एक प्रार्थनापत्र कानपुर (देहात) की डीएम नेहा जैन को दिया. इस प्रार्थना पत्र में उस ने लिखा कि मड़ौली गांव के निवासी कृष्ण गोपाल दीक्षित व उस के बेटों ने ग्राम समाज की भूमि पर अवैध कब्जा कर कमरा बना लिया है व झोपड़ी भी डाल ली है. इस जमीन को खाली कराया जाए.

गेंदन लाल को बनाया मोहरा…

गेंदन लाल के इस शिकायती पत्र पर डीएम नेहा जैन ने काररवाई करने का आदेश एसडीएम (मैथा) ज्ञानेश्वर प्रसाद को दिया. ज्ञानेश्वर प्रसाद ने इस संबंध में जानकारी लेखपाल अशोक सिंह चौहान से जुटाई तो पता चला कि कृष्ण गोपाल जिस जमीन पर काबिज है, वह जमीन ग्राम समाज की है.

लेखपाल अशोक सिंह चौहान घूसखोर था. वह कोई भी काम बिना घूस के नहीं करता था. उस की निगाह अवैध कब्जेदारों पर ही रहती थी. जो उसे पैसा देता, उस का कब्जा बरकरार रहता, जो नहीं देता उन को धमकाता. मड़ौली के ग्राम प्रधान मानसिंह की भी उस से कहासुनी हो चुकी थी. उन्होंने उस की शिकायत भी डीएम साहिबा से की थी. लेकिन उस का बाल बांका नहीं हुआ. उस ने अधिकारियों को गुमराह कर अपना उल्लू सीधा कर लिया था. मैथा ब्लाक में एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद भी उस के जायजनाजायज काम में लिप्त रहते थे.

13 जनवरी, 2023 को बिना किसी नोटिस के एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद की अगुवाई में राजस्व विभाग की एक टीम कृष्ण गोपाल के यहां पहुंची और ग्राम समाज की भूमि पर बना उस का कमरा ढहा दिया. कमरा ढहाए जाने के पहले कृष्ण गोपाल ने एसडीएम (मैथा) के पैरों पर गिर कर ध्वस्तीकरण रोकने की गुहार लगाई, लेकिन वह नहीं पसीजे. लेखपाल अशोक सिंह चौहान तो उन्हें बेइज्जत ही करता रहा. एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद ने कृष्ण गोपाल से कहा कि 5 दिन के अंदर वह अपनी झोपड़ी भी हटा ले, वरना इसे भी ढहा दिया जाएगा. काररवाई के दौरान एक मैमो भी बनाया गया, जिस में गवाह के तौर पर 15 ग्रामीणों के हस्ताक्षर कराए गए.

14 जनवरी, 2023 को पीडि़त कृष्ण गोपाल दीक्षित व उन के घर के अन्य लोग लोडर से बकरियां ले कर माती मुख्यालय धरना देने पहुंच गए. समर्थन में विहिप नेता आदित्य शुक्ला व गौरव शुक्ला भी पहुंच गए. पीडि़त परिजनों ने आवास की मांग की तो अफसरों ने उन्हें माफिया बताया. माफिया बताने पर विहिप नेताओं का पारा चढ़ गया. उन्होंने सर्दी में गरीब का घर ढहाने व प्रशासन की संवेदनहीनता पर नाराजगी जताई. उन की एडीएम (प्रशासन) केशव गुप्ता से झड़प भी हुई.

दूसरे दिन पीडि़तों की आवाज दबाने के लिए तहसीलदार रणविजय सिंह ने अकबरपुर कोतवाली में शांति भंग की धारा में कृष्ण गोपाल दीक्षित, उन की पत्नी प्रमिला, बेटों शिवम व अंशु, बेटी नेहा व बहू शालिनी तथा सहयोग करने वाले विहिप नेता आदित्य व गौरव शुक्ला के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया.

14 जनवरी, 2023 को ही लेखपाल अशोक सिंह चौहान ने थाना रूरा में कृष्ण गोपाल व उन के दोनों बेटों के खिलाफ एक मुकदमा दर्ज कराया, जिस में उस ने लिखा, ‘13 जनवरी को प्रशासन अवैध कब्जा हटाने गया था. उस वक्त कृष्ण गोपाल व उन के बेटे शिवम व अंशु प्रशासन से गालीगलौज करते हुए मारपीट पर उतारू हो गए थे. जोरजोर से झगड़ा करने लगे थे. गांव के लोगों को सरकारी कर्मचारियों पर हमला करने के लिए उकसाने लगे थे. वह कहने लगे कि यहां से भाग जाओ वरना बिकरू वाला कांड अपनाएंगे.’

लेखपाल की तहरीर के आधार पर रूरा पुलिस ने रिपोर्ट तो दर्ज कर ली थी, लेकिन किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया. दूसरी तरफ इस मामले के खिलाफ पीडि़त कृष्ण गोपाल ने तहसील अकबरपुर में वाद दायर किया, जिस की सुनवाई की तारीख 20 फरवरी निर्धारित की गई.

बदले की भावना से चलाया बुलडोजर…

मड़ौली गांव में दरजनों लोग ग्रामसमाज की भूमि पर काबिज थे, उन की भूमि पर प्रशासन का बुलडोजर नहीं चला, लेकिन बदले की भावना से तथा मुट्ïठी गर्म होने पर कृष्ण गोपाल को निशाना बनाया गया. पर कृष्ण गोपाल भी जिद्ïदी था. उस ने कमरा ढहाए जाने के बाद उसी जगह पर ईंटों का पिलर खड़ा कर उस पर घासफूस की झोपड़ी बना ली थी. यही नहीं, उस ने हैंडपंप को ठीक करा लिया था और शिव चबूतरे को भी नया लुक दे दिया था.

कृष्ण गोपाल दीक्षित को 5 दिन में जगह को कब्जामुक्त करने का अल्टीमेटम प्रशासनिक अधिकारियों ने दिया था, लेकिन 2 सप्ताह बीत जाने के बावजूद भी उस ने जगह खाली नहीं की थी. दरअसल, कृष्ण गोपाल ने तहसील में वाद दाखिल किया था और सुनवाई 20 फरवरी को होनी थी. इसलिए वह निश्चिंत था और जगह खाली नहीं की थी. लेखपाल अशोक सिंह चौहान व अन्य प्रशासनिक अधिकारी जमीन कब्जा मुक्त न होने से खफा थे. लेखपाल उन के कान भी भर रहा था और उन्हें गुमराह भी कर रहा था. अत: प्रशासनिक अधिकारियों ने कृष्ण गोपाल की झोपड़ी भी ढहाने का मन बना लिया.

13 फरवरी, 2023 की शाम 3 बजे एसडीएम (मैथा) ज्ञानेश्वर प्रसाद, कानूनगो नंदकिशोर, लेखपाल अशोक सिंह चौहान और एसएचओ दिनेश कुमार गौतम बुलडोजर ले कर मड़ौली गांव पहुंचे. साथ में 15 महिला, पुरुष पुलिसकर्मी भी थे. लोडर चालक दीपक चौहान था. अचानक इतने अधिकारियों और पुलिस को देख कर झोपड़ी में आराम कर रहे कृष्ण गोपाल और उन की पत्नी प्रमिला बाहर निकले. प्रशासनिक अधिकारियों ने जमीन पर अवैध कब्जा बताते हुए उन से तुरंत जगह खाली करने को कहा.

इस पर प्रमिला, उन के बेटे शिवम व बेटी नेहा ने कहा कि कोर्ट में उन का वाद दाखिल है और सुनवाई 20 फरवरी को है. लेकिन पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी नहीं माने. उन्होंने जगह को तुरंत खाली करने की चेतवनी दी. इस के बाद शिवम अपने पिता के साथ झोपड़ी का सामान निकाल कर बाहर रखने लगा. इसी समय एसडीएम (मैथा) ज्ञानेश्वर प्रसाद ने बुलडोजर चालक दीपक चौहान को संकेत दिया कि वह काररवाई शुरू करे. बुलडोजर शिव चबूतरा ढहाने आगे बढ़ा तो एसएचओ (रूरा) दिनेश गौतम ने उसे रोक दिया. वह चबूतरे पर चढ़े. उन्होंने शिवलिंग व नंदी को प्रणाम कर माफी मांगी फिर चबूतरे से उतर आए. उन के उतरते ही बुलडोजर ने चबूतरा ढहा दिया और मार्का हैंडपंप को उखाड़ फेंका.

जीवित भस्म हो गईं मांबेटी…

अब तक प्रमिला के सब्र का बांध टूट चुका था. उन्हें लगा कि अधिकारी उन की झोपड़ी नेस्तनाबूद कर देंगे. वह पुलिस व लेखपाल से भिड़ गईं. उस ने लेखपाल अशोक सिंह चौहान के माथे पर हंसिया से प्रहार कर दिया. फिर वह बेटी नेहा के साथ चीखती हुई बोली, ‘‘मर जाऊंगी, लेकिन कब्जा नहीं हटने दूंगी.’’

इस के बाद वह नेहा के साथ झोपड़ी के अंदर चली गई और दरवाजा बंद कर लिया. महिला पुलिसकर्मियों ने दरवाजा खुलवाने का प्रयास किया, लेकिन दरवाजा नहीं खुला. इधर प्रशासनिक अधिकारियों को लगा कि मांबेटी ध्वस्तीकरण रोकने के लिए नाटक कर रही हैं. उन्होंने झोपड़ी गिराने का आदेश दे दिया. बुलडोजर ने छप्पर ढहाया तो झोपड़ी में आग लग गई. हवा तेज थी. देखते ही देखते आग ने विकराल रूप धारण कर लिया.

आग की लपटों के बीच मांबेटी धूधू कर जलने लगी. कृष्ण गोपाल चिल्लाता रहा कि पत्नी और बेटी झोपड़ी के अंदर है. परंतु अफसरों ने नहीं सुनी और जलता छप्पर जेसीबी से और दबवा दिया. इस से उन का निकल पाना तो दूर, दोनों को हिलने तक का मौका नहीं मिला और दोनों जल कर भस्म हो गईं.

कृष्ण गोपाल व उन का बेटा शिवम मां व बहन को बचाने किसी तरह झोपड़ी में घुस तो गए. लेकिन वे उन दोनों तक नहीं पहुंच पाए. आग की लपटों ने उन दोनों को भी झुलसा दिया था. शिवम बाहर खड़ा चीखता रहा, ‘‘हाय दइया, कोउ हमरी मम्मी बहना को बचा लेऊ.’’ पर उस की चीख अफसरों ने नहीं सुनी. वे आंखें मूंदे खतरनाक मंजर देखते रहे.

इधर मड़ौली गांव के लोगों ने कृष्ण गोपाल के बगीचे में आग की लपटें देखीं तो वे उस ओर दौड़ पड़े. वहां का भयावह दृश्य देख कर ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा और वे पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारियों पर पथराव करने लगे. ग्रामीणों का गुस्सा देख कर पुलिस व अफसर किसी तरह जान बचा कर वहां से भागे. ग्रामीणों का सब से ज्यादा गुस्सा लेखपाल पर था. उन्होंने उस की कार पलट दी और तोड़ डाली. वे कार को फूंकने जा रहे थे, लेकिन कुछ समझदार ग्रामीणों ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया.

सूर्यास्त होने से पहले ही मांबेटी के जिंदा जलने की खबर जंगल की आग की तरह मड़ौली व आसपास के गांवों में फैल गई. कुछ ही देर बाद सैकड़ों की संख्या में लोग घटनास्थल पर आ पहुंचे. लोगों में भारी गुस्सा था और वह शासनप्रशासन मुर्दाबाद के नारे लगाने लगे थे. शिव चबूतरा तोड़े जाने से लोगों में कुछ ज्यादा ही रोष था. इस बर्बर घटना की जानकारी पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को हुई तो चंद घंटों बाद ही एसपी (देहात) बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति, एएसपी घनश्याम चौरसिया, एडीजी आलोक सिंह, आईजी प्रशांत कुमार, कमिश्नर डा. राजशेखर तथा डीएम (कानपुर देहात) नेहा जैन आ गईं और उन्होंने घटनास्थल पर डेरा जमा लिया.

कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पुलिस अधिकारियों ने भारी संख्या में पुलिस व पीएसी बल बुलवा लिया. कमिश्नर डा. राजशेखर, एडीजी आलोक सिंह तथा आईजी प्रशांत कुमार ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तथा कृष्ण गोपाल व उन के बेटों को धैर्य बंधाया. निरीक्षण के बाद अधिकारियों ने मृतक मांबेटी के घर वालों से पूछताछ की. मृतका प्रमिला के पति कृष्ण गोपाल ने अफसरों को बताया कि एसडीएम (मैथा), कानूनगो व लेखपाल बुलडोजर ले कर आए थे. उन के साथ गांव के अशोक दीक्षित, अनिल, निर्मल व बड़े बउआ और गांव के कई अन्य लोग भी थे. ये लोग अधिकारियों से बोले कि आग लगा दो तो अफसरों ने आग लगा दी. हम और हमारा बेटा उन दोनों को बचाने में झुलस गए. लेकिन उन्हें बचा नहीं पाए और वे आग में जल कर खाक हो गईं. कृष्ण गोपाल के बेटे शिवम दीक्षित ने भी इसी तरह का बयान दिया.

दोषियों को बचाने में जुटा प्रशासन…

अधिकारियों ने कुछ ग्रामीणों से भी पूछताछ की. राजीव द्विवेदी नाम के व्यक्ति ने बताया कि अशोक दीक्षित का बेटा गौरव दीक्षित फौज में है. वह दबंग है. उसी ने पूरी साजिश रची. उस के साथ गांव के कुछ लोग हैं. इस में एसडीएम, एसएचओ और लेखपाल भी मिले हैं. डीएम साहिबा अपने कर्मचारियों को बचा रही हैं. ग्रामीणों ने बताया कि इस पूरे मामले में प्रशासन दोषी है. अफसरों ने पैसा लिया है. वह जबरदस्ती कब्जा हटाने पर अड़े हुए थे. उन्होंने कहा मृतका प्रमिला की बेटी नेहा की शादी तय हो गई थी. उस की अब डोली की जगह अर्थी उठेगी. प्रमिला भी समझदार महिला थी. उस ने कभी किसी का अहित नहीं सोचा.

ग्रामीण व मृतका के परिजन जहां अफसरों को दोषी ठहरा रहे थे, वहीं प्रशासनिक अफसर उन का बचाव कर रहे थे. जिलाधिकारी नेहा जैन ने इस मामले पर सफाई देते हुए कहा कि अतिक्रमण हटाने के लिए राजस्व टीम पुलिस के साथ मौके पर पहुंची थी. महिलाएं आईं और रोकने का प्रयास किया. लेखपाल पर हंसिया से अटैक भी किया. इस के बाद मांबेटी ने झोपड़ी के अंदर जा कर आग लगा ली.

कानपुर (देहात) के एसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति ने कहा, ‘‘एसडीएम व अन्य कर्मचारी अवैध कब्जा हटाने गए थे. इस दौरान कुछ लोग विरोध कर रहे थे. महिला व उन की बेटी भी विरोध में शामिल थी. विरोध करतेकरते उन दोनों ने खुद को झोपड़ी के अंदर बंद कर लिया. थोड़ी देर बाद झोपड़ी के अंदर आग लग गई. इस में महिला व उन की बेटी की मौत हो गई. आग लगी या लगाई गई, इस की जांच होगी.’’

पूछताछ के बाद रूरा पुलिस थाने में मृतका प्रमिला के बेटे शिवम दीक्षित की तहरीर के आधार पर मुअसं 38/2023 पर भादंवि की धारा 302/307/429/436/323 व 34 के तहत 11 नामजद, 15 पुलिसकर्मियों व 13 अन्य के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई. नामजद आरोपियों में एसडीएम (मैथा) ज्ञानेश्वर प्रसाद, लेखपाल अशोक कुमार सिंह चौहान, रूरा प्रभारी निरीक्षक दिनेश गौतम, कानूनगो नंद किशोर, जेसीबी चालक दीपक चौहान, मड़ौली गांव के अशोक दीक्षित, अनिल दीक्षित, निर्मल दीक्षित, गेंदन लाल, गौरव दीक्षित व बढ़े बउआ के नाम थे. मामले की जांच थाना अकबरपुर के इंसपेक्टर प्रमोद कुमार शुक्ला को सौंपी गई.

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद शासन ने एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद को सस्पेंड कर दिया तथा 2 आरोपियों जेसीबी चालक दीपक चौहान व लेखपाल अशोक सिंह चौहान को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. सस्पेंड एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद व थाना रूरा के एसएचओ दिनेश गौतम भूमिगत हो गए. अन्य आरोपियों की धरपकड़ के लिए 5 पुलिस टीमें लगा दी गईं.  इधर जल कर खाक हुई मांबेटी का मामला प्रदेश की राजधानी लखनऊ तक पहुंचा तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भावुक हो उठे. उन्होंने पीडि़त परिवार को हरसंभव मदद का आश्वासन दिया तथा अपनी टीम को लगा दिया. यही नहीं, उन्होंने पूरे घटनाक्रम की जानकारी अफसरों से ली और सख्त काररवाई का आदेश दिया.

इसी कड़ी में भाजपा की क्षेत्रीय विधायक व राज्यमंत्री प्रतिभा शुक्ला देर रात घटनास्थल मड़ौली गांव पहुंचीं. उन्होंने पीडि़त परिवार को धैर्य बंधाया फिर कहा, ‘‘मैं इस क्षेत्र की विधायक हूं और यहां ऐसी बर्बर घटना घट गई. महिलाओं के साथ अत्याचार हुआ. ऐसे में मेरा कल्याण विभाग में होना बेकार है. जब हम अपनी बेटी और मां को नहीं बचा पा रहे. पहले घर के बाहर निकालते फिर गिराते. जमीन तो यूं ही पड़ी है. आगे भी पड़ी रहेगी. कोई कहीं नहीं ले जा रहा है.’’

गांव वालों का फूटा आक्रोश…

पुलिस अधिकारी मांबेटी के शवों को रात में ही पोस्टमार्टम हाउस भेजने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन पीडि़त घर वालों व गांव वालों ने शव नहीं उठाने दिए. उन्होंने एक मांग पत्र कमिश्नर डा. राजशेखर को सौंपा और कहा कि जब तक उन की मांगें पूरी नहीं होती वह शव नहीं उठने देंगे. उन्होंने मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री को भी घटनास्थल पर आने की शर्त रखी. पीडि़त परिजनों ने जो मांग पत्र कमिश्नर को सौंपा था, उन में 5 मांगें थी.

1- मृतक परिवार को 5 करोड़ रुपए का मुआवजा,

2-मृतका के दोनों बेटों को सरकारी नौकरी,

3-मृतका के दोनों बेटों को आवास,

4- परिवार को आजीवन पेंशन तथा

5- दोषियों को कठोर सजा.

चूंकि पीडि़त परिवार की मांगें तत्काल मान लेना संभव न था, अत: अधिकारियों ने पीडि़त परिवार को समझाया और उनकी मांगों को शासन तक पहुंचाने की बात कही, लेकिन परिजन अपनी बात पर अड़े रहे. उन्होंने राज्यमंत्री प्रतिभा शुक्ला की भी बात नहीं मानी. लाचार अधिकारी मौके पर ही डटे रहे और मानमनौवल करते रहे.

14 फरवरी, 2023 की सुबह कानपुर नगर/देहात से प्रकाशित समाचार पत्रों में जब मांबेटी की जल कर मौत होने की खबर सुर्खियों में छपी तो पूरे प्रदेश में राजनीतिक भूचाल आ गया. कांग्रेस पार्टी प्रमुख राहुल गांधी, सपा प्रमुख अखिलेश यादव तथा बसपा प्रमुख मायावती ने जहां ट्वीट कर योगी सरकार की कानूनव्यवस्था पर तंज कसा तो दूसरी ओर इन पार्टियों के नेता घटनास्थल पर पहुंचने को आमादा हो गए. लेकिन सतर्क पुलिस प्रशासन ने इन नेेताओं को घटनास्थल तक पहुंचने नहीं दिया. किसी विधायक को उन के घर में नजरबंद कर दिया गया तो किसी को रास्ते में रोक लिया गया.

एसआईटी के हाथ में पहुंची जांच…

इधर 24 घंटे बीत जाने के बाद भी जब घर वालों तथा गांववालों ने मांबेटी के शवों को नहीं उठने दिया तो कमिश्नर डा. राजशेखर ने प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक से वीडियो काल कर पीडि़तों की बात कराई. उपमुख्यमंत्री ने मृतका के बेटे शिवम दीक्षित से कहा कि आप हमारे परिवार के सदस्य हो. पूरी सरकार आप के साथ खड़ी है. दोषियों के खिलाफ केस दर्ज हो गया है और कड़ी से कड़ी काररवाई होगी. उन्हें ऐसी सख्त सजा दिलाएंगे कि पुश्तें याद रखेंगी.

डिप्टी सीएम बात करतेकरते भावुक हो गए. उन्होंने शिवम से कहा कि आप कतई अकेला महसूस न करें, जिन्होंने तुम्हारी मांबहन को तुम से छीना है, उन्हें इस का खामियाजा भुगतना पड़ेगा. इस घटना से हम सभी द्रवित है. इस के बाद उन्होंने शिवम की पत्नी शालिनी तथा भाई अंशु से भी बात की और उन्हें धैर्य बंधाया. डिप्टी सीएम से बात करने के बाद पीडि़त परिवार शव उठाने को राजी हो गया. इस के बाद पुलिस अधिकारियों ने मांबेटी के शवों के पोस्टमार्टम हेतु माती भेज दिया. शाम साढ़े 6 से साढ़े 7 बजे के बीच 3 डाक्टरों (डा. गजाला अंजुम, डा. शिवम तिवारी तथा डा. मुनीश कुमार) के पैनल ने वीडियोग्राफी के बीच पोस्टमार्टम किया.

मांबेटी के अंतिम संस्कार के बाद पुलिस ने आरोपी अशोक दीक्षित के घर रात 2 बजे छापा मारा, लेकिन घर पर महिलाओं के अलावा कोई नहीं मिला. पुलिस टीम ने महिलाओं से पूछताछ की तो गौरव की पत्नी रुचि दीक्षित ने बताया कि उन के परिवार का इस केस से कोई लेनादेना नहीं है. उन के पति गौरव दीक्षित फौज में है. वह श्रीनगर में तैनात है. उन का देवर अभिषेक दीक्षित राजस्थान में फौज में है. छोटा देवर अखिल 29 जुलाई से घर से लापता है. उन के ससुर अशोक दीक्षित खेती करते हैं. रुचि ने पुलिस टीम की अपने पति गौरव से फोन पर बात भी कराई.

आरोपी अशोक दीक्षित की पत्नी सुधा दीक्षित ने पुलिस को बताया कि उन के पति व बेटों को इस मामले में साजिशन फंसाया जा रहा है. इधर शासन ने भी मांबेटी की मौत को गंभीरता से लिया और जांच के लिए अलगअलग 2 विशेष जांच टीमों (एसआईटी) का गठन किया. पहली टीम का गठन डीजीपी हाउस लखनऊ द्वारा किया गया.5 सदस्यीय इस टीम में हरदोई के एसपी राजेश द्विवेदी को अध्यक्ष, हरदोई सीओ (सिटी) विकास जायसवाल को विवेचक बनाया गया. जबकि हरदोई के कोतवाल संजय पांडेय, हरदोई महिला थाने की एसएचओ राम सुखारी तथा क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर रमेश चंद्र पांडेय को शामिल किया गया.

दूसरी विशेष जांच टीम (एसआईटी) का प्रमुख कमिश्नर डा. राजशेखर व एडीजी आलोक सिंह को बनाया गया और विवेचक कन्नौज के एडीएम (वित्त एवं राजस्व) राजेंद्र कुमार को बनाया गया. इस टीम को भी तत्काल प्रभाव से जांच के आदेश दिए. एसआईटी की दोनों टीमें मड़ौली गांव पहुंची और जांच शुरू की. एसपी राजेश द्विवेदी की टीम ने घटनास्थल का निरीक्षण किया फिर पीडि़त परिवार के लोगों से पूछताछ कर बयान दर्ज किए. टीम ने गांव के प्रधान व कुछ अन्य लोगों से भी जानकारी जुटाई. टीम ने थाना अकबरपुर व रूरा में पीडि़तों के खिलाफ दर्ज रिपोर्ट का भी अध्ययन किया. टीम ने उन 15 लोगों को भी नोटिस जारी किया जो गवाह के रूप में दर्ज थे.

दूसरी विशेष जांच टीम ने भी जांच शुरू की. डा. राजशेखर की टीम ने लगभग 60 लोगों की लिस्ट तैयार की और उन्हें जिला मुख्यालय पर शिविर कार्यालय निरीक्षण भवन में बयान दर्ज कराने को बुलाया. टीम ने कुछ मोबाइल फोन नंबर भी जारी किए, जिस पर कोई भी व्यक्ति घटना से संबंधित बयान दर्ज करा सके.

बहरहाल, कथा लिखने तक एसआईटी की जांच जारी थी. रूरा पुलिस ने गिरफ्तार आरोपी लेखपाल अशोक सिंह चौहान व चालक दीपक चौहान को माती कोर्ट में पेश किया, जहां से उन दोनों को जिला जेल भेज दिया गया. आरोपी एसएचओ दिनेश गौतम व एसडीएम ज्ञानेश्वर प्रसाद भूमिगत हो चुके थे. अन्य आरोपियों को पकडऩे के लिए पुलिस प्रयासरत थी. मृतका प्रमिला के दोनों बेटों शिवम व अंशु को 5-5 लाख रुपए की सहायता राशि शासन द्वारा प्रदान कर दी गई थी तथा उन्हें सुरक्षा भी मुहैया करा दी गई थी.

-कथा पुलिस सूत्रों तथा पीडि़त परिवार से की गई बातचीत पर आधारित