दगाबाज सनम : हनीट्रैप में फंसे नेताजी – भाग 3

सुमन भी बच्ची नहीं थी, जो वह अवधेश की नजरों को न पहचानती. धीरेधीरे उसे अवधेश का इस तरह ताकना अच्छा लगने लगा था. अब तक सुमन 23 साल की हो चुकी थी. आकर्षक कदकाठी की सुमन बहुत अच्छी लगती थी. अवधेश तो पहली ही मुलाकात में उसे दिल दे चुका था. लेकिन सुमन को इस बात की जानकारी देर से हुई थी.

एक दिन सुमन अवधेश के पास किसी काम से गई तो वह उसे टकटकी लगाए देखता रहा. तब सुमन ने उसे टोका, ‘‘सर, आप मुझे इस तरह क्यों ताक रहे हैं?’’

अवधेश चाह कर भी दिल की बात नहीं छिपा सका. सुमन ने जब दोबारा अपना सवाल दोहराया तो उस ने सुमन का हाथ थाम कर दिल की बात कह दी, ‘‘सुमन, मैं तुम से प्यार करने लगा हूं. अगर तुम जैसी सुंदर लड़की मेरे जीवन में आई होती तो शायद मैं दुनिया का सब से खुशकिस्मत इंसान होता. लेकिन अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है. अगर तुम चाहो तो मेरी यह जिंदगी अभी संवर सकती है.’’

‘‘सर, आप यह कैसी बातें कर रहे हैं. कहां आप और कहां मैं. फिर आप शादीशुदा ही नहीं, बालबच्चेदार हैं. अगर आप की पत्नी और बच्चों को इस बारे में पता चल गया तो वे मेरे और आप के बारे में क्या सोचेंगे.’’ सुमन ने कहा.

‘‘तुम्हें इस की चिंता करने की जरूरत नहीं है. उन्हें कभी पता ही नहीं चल पाएगा. तुम सिर्फ यह बताओ कि तुम मुझ से प्यार करती हो या नहीं?’’ अवधेश ने कहा.

सुमन ने हामी में सिर हिला दिया तो अवधेश ने उस का हाथ अपनी दोनों हथेलियों के बीच ले कर सहलाते हुए कहा, ‘‘सुमन, तुम कितनी अच्छी हो. अब देखना मैं तुम्हारे लिए क्याक्या करता हूं. तुम्हें मैं वह हर खुशी दूंगा, जो अब तब तुम्हें नहीं मिली.’’

सुमन के कपोल लाल हो गए. उस ने आंखें झुका लीं तो अवधेश ने एक हाथ की अंगुलियों से उस की ठुड्डी ऊपर उठा कर कहा, ‘‘इस तरह शरमाने से तो तुम्हारी सुंदरता और बढ़ गई.’’

इस के बाद सुमन अकसर एकांत में अवधेश से मिलने लगी तो अवधेश ने इस का लाभ भी उठा लिया. अवधेश तो इस मामले का खिलाड़ी था. कुंवारी सुमन को भी जब एक बार शारीरिक सुख मिला तो वह इसे बारबार पाने के लिए बेचैन रहने लगी. यही वजह थी कि जब भी उसे मौका मिलता, वह अवधेश के पास पहुंच जाती.

सुमन अवधेश को खुश करने लगी तो अवधेश भी उस का हर तरह से खयाल रखने लगा. वह उसे अपनी कार में बैठा कर घुमाताफिराता, महंगे रेस्टौरेंटों में खाना खिलाता, उपहार खरीद कर देता. इस सब से सुमन को लगने लगा कि उस के जीवन में बहार आ गई है. अवधेश उसे इसी तरह जीवन का हर सुख देता रहेगा.

धीरेधीरे पूरा एक साल बीत गया. सुमन का अवधेश से तो प्रेमसंबंध चल ही रहा था, उसी बीच उस की दिल्ली के ही मंडावली के रहने वाले सुहैल खान से जानपहचान हुई तो वह उस से भी प्यार करने लगी. फिर उस ने घर वालों की मर्जी के खिलाफ जा कर उस से शादी कर ली.

सुहैल अकेला ही रहता था और गुजरबसर के लिए छोटामोटा काम करता था. सुमन ने भले ही सुहैल से शादी कर ली थी, लेकिन वह अवधेश को भूल नहीं पाई थी. उसे जब भी मौका मिलता था, वह अवधेश से मिलने पहुंच जाती थी. बड़े सपने देखने वाली सुमन की हर जरूरत अवधेश पूरी कर रहा था. घर पर पति नहीं होता था, सुमन उसे घर भी बुला लेती थी.

सुमन के पड़ोस में ही शालिनी रहती थी. 36 वर्षीया शालिनी के पति विजय सिंह की काफी पहले मौत हो चुकी थी. पति की मौत के बाद अपने गुजरबसर के लिए वह एक पत्रिका के औफिस में नौकरी करने लगी थी. पड़ोस में रहने की वजह से शालिनी और सुमन में जल्दी ही गहरी दोस्ती हो गई थी. दोस्त होने की वजह से दोनों एकदूसरे से अपने दिल की बात बता दिया करती थीं.

किसी दिन जब शालिनी ने अवधेश को सुमन के घर से निकलते देखा तो उत्सुकतावश उस के बारे में पूछ लिया. तब सुमन ने शालिनी से अपने और अवधेश के संबंधों के बारे में बता कर कहा कि यह आदमी बहुत पैसे वाला है. यह सुन कर शालिनी के दिमाग में तुरंत एक ऐसी योजना आई, जिस से अवधेश से मोटा माल मिल सकता था. उस ने तुरंत कहा, ‘‘यार सुमन, यह आदमी पैसे वाला है तो इस से तुझे क्या मिलता है. आता है, मुफ्त में मजा ले कर चला जाता है. यह तेरे पास तभी तक आएगा, जब तक इस का मन नहीं भरता. जिस दिन इस का मन भर जाएगा, दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फेंक देगा. यही नहीं, तुझे पहचानने से भी इंकार कर देगा.’’

‘‘क्या कह रही हो शालिनी? अवधेश ऐसा नहीं है.’’ सुमन ने कहा.

‘‘अभी तेरे पास आ रहा है न, इसलिए तुझे ऐसा लग रहा है.’’

‘‘तो फिर क्या किया जा सकता है? मैं उसे मना भी नहीं कर सकती, क्योंकि वह मेरी बहुत सी जरूरतें पूरी करता है.’’

‘‘ऐसा कर, तू ने उसे जो सुख दिया है, उस की कीमत वसूल कर ले.’’ शालिनी ने कहा, ‘‘अच्छा एक बात बता, तू उस से एक लाख रुपए मांगेगी तो क्या दे देगा?’’

‘‘नहीं देगा.’’ सुमन ने पूरे विश्वास के साथ कहा.

‘‘अब तू खुद ही सोच, किसी होटल में 4 रोटियां खिला दीं, 2-4 उपहार दे दिए और बदले में तेरे साथ मजे लेता रहा. उस मजे की यही कीमत है?’’ शालिनी ने समझाया.

शालिनी की इन बातों ने सुमन को सोचने पर मजबूर कर दिया. उसे सोच में डूबी देख कर शालिनी ने कहा, ‘‘सुमन तू मेरी बात मान तो मेरे पास ऐसे ठरकी लोगों को सबक सिखाने का एक रास्ता है.’’

‘‘वह क्या?’’ सुमन ने पूछा.

‘‘उस से मोटी रकम ऐंठ कर मस्ती से जी.’’ शालिनी ने कहा.

प्रेम की आग में भस्म – भाग 3

दीपक का एक दोस्त था वली, जिस के पास होंडा सिटी कार थी. दीपक पार्टी में जाने का बहाना कर के उस की कार मांग लाया. उस ने कार ला कर सुनील के घर के बाहर खड़ी कर दी. रात का खाना खाने के बाद सुनील ने रमा से बाहर घूमने जाने की बात कही तो वह चलने को तैयार हो गई.

12 नवंबर, 2013 की रात को सुनील रमा को होंडा सिटी कार में बैठा कर घूमने निकला. रमा उस वक्त काफी खुश थी. रमा को साथ ले कर सुनील चारकोप स्थित दीपक टाक के घर गया. सुनील ने उस से घूमने चलने को कहा तो वह बोला, ‘‘लौंग ड्राइव पर चलेंगे.’’

इस बात पर सुनील ने कोई आपत्ति नहीं की. लौंग ड्राइव के बहाने दीपक ने 5-5 लीटर की 2 खाली कैन और नायलौन की रस्सी का एक टुकड़ा कार में रख लिया. इस के बाद वे कार ले कर जिला ठाणे की तहसील भिवंडी की ओर चल दिए.

भिवंडी रोड पर जा कर दीपक टाक ने आदर्श पैट्रोल पंप से दोनों कैन पैट्रोल से भरवा लिए. इस के बाद ड्राइविंग सीट दीपक टाक ने संभाल ली. सुनील पीछे की सीट पर बैठ गया. इस बीच रमा ने घर लौट चलने को कहा तो वह बोला, ‘‘लौटने की इतनी जल्दी क्या है, इतने दिनों के बाद बाहर घूमने निकले हैं, घूमघाम कर आराम से लौटेंगे.’’

बातोंबातों में कार नासिक बाईपास रोड पर आ गई. तब तक रात के 12 बज गए थे. सडक़ सुनसान थी, सही मौका देख कर सुनील ने पीछे की सीट के पास पड़ी नायलौन की रस्सी उठाई और आगे की सीट पर बैठी रमा के गले में डाल कर तब तक कसता रहा, जब तक वह मर नहीं गई.

रमा की मौत हो चुकी थी. अब उन दोनों को उस की लाश ठिकाने लगानी थी. इस के लिए दीपक ने गाड़ी एक सुनसान जगह पर रोकी और दोनों ने रमा की लाश कार से निकाल कर सडक़ किनारे की खाई में डाल दी. इस के बाद उस पर पैट्रोल डाल कर आग लगा दी. फिर दोनों घर लौट आए.

कांताबाई ने जब कई महीने तक रमा को सुनील के साथ नहीं देखा तो सुनील से उस के बारे में पूछताछ की. लेकिन वह कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया. उस का कहना था कि रमा गर्भवती थी, इसलिए उस ने उसे विरार में अपने एक रिश्तेदार के यहां भेज दिया है. इस से कांताबाई के मन में तरहतरह की आशंकाएं उठने लगीं.

संदेह हुआ तो कांताबाई ने ओशिवारा थाने जा कर सुनील के खिलाफ बेटी को गायब करने की रिपोर्ट लिखा दी. जब सुनील को इस बात का पता चला तो गिरफ्तारी और पुलिस पूछताछ से बचने के लिए उस ने हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत ले ली. इस तरह सुनील कांगड़ा ओशिवारा थाने की पुलिस के चंगुल से तो बच गया, लेकिन वह नारपोली थाने की पुलिस की गिरफ्त से नहीं बच सका.

नारपोली पुलिस के नवनियुक्त सीनियर इंसपेक्टर अनिल आकड़े ने लगभग 2 साल पुरानी फाइल को खोला और 2 साल पहले मौत के घाट उतारी गई महिला की पहचान कराई और फिर हत्यारे तक पहुंच गए. रमा का हत्यारा सुनील तो गिरफ्तार हो गया, लेकिन दीपक टाक घर से फरार हो गया था. उसे पुलिस ने काफी खोजा, कई जगह दबिश दी, लेकिन वह हत्थे नहीं चढ़ा.

जब दीपक टाक का कोई पता नहीं चला तो पुलिस ने सुनील से मिलने आने वाली उस की पत्नी बिंदिया जो दीपक टाक की बहन थी, को थाने बुला कर उस का मोबाइल चैक किया. उस के मोबाइल के वाट्सऐप में दीपक टाक का फोटो मिल गया. यह भी पता चल गया कि वह अपनी बहन के संपर्क में था. पुलिस ने वह तसवीर ले कर वाट्सऐप से मुखबिरों के मोबाइल पर भेज दीं.

इस का नतीजा जल्दी ही सामने आ गया. सुनील कांगड़ा की गिरफ्तारी के 15 दिनों बाद पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली कि दीपक टाक अपनी पत्नी के साथ घाटकोपर के फीनिक्स मौल में फिल्म देखने आने वाला है. सूचना महत्त्वपूर्ण थी. अनिल आकड़े अपनी पुलिस टीम के साथ वहां पहुंचे और दीपक टाक को गिरफ्तार कर लिया. 26 वर्षीय दीपक को गिरफ्तार कर के थाना नारपोली लाया गया. पुलिस ने उसे मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर पूछताछ के लिए 7 दिनों का पुलिस रिमांड लिया.

रिमांड के दौरान उस से पूछताछ की गई तो उस ने अपना गुनाह कबूल कर लिया. उस की निशानदेही पर पुलिस ने वह होंडा सिटी कार भी बरामद कर ली, जिस में रमा कांगड़ा की हत्या की गई थी.

सुनील कांगड़ा और दीपक टाक से विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने उन के विरुद्ध भादंवि की धारा 302, 315, 201 और 34 के तहत केस बनाया और दोनों को अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. फिलहाल दोनों जेल में हैं. इस केस की तफ्तीश इंसपेक्टर प्रकाश पाटिल कर रहे हैं.

अय्याश फर्जी जज की ठगी – भाग 2

अंडर ट्रेनिंग जज बता कर आशीष ने रसूखदार लोगों से अच्छे संबंध तो बना लिए, लेकिन उन्हें कैसे भुनाया जाए, यह बात उस की समझ में नहीं आ रही थी. उस के पिता हरियाणा अर्बन डेवलपमेंट अथौरिटी (हुडा) में नौकरी कर चुके थे.   वह जानता था कि हुडा का प्लौट पाने के लिए तमाम लोग लालायित रहते हैं. लेकिन सभी चाहने वालों को प्लौट नहीं मिल पाते. गुड़गांव में वैसे भी जमीन के रेट आसमान छू रहे हैं. प्लौट दिलाने के नाम पर लोगों से पैसे ऐंठने की योजना उसे सही लगी.

उस ने कई लोगों को इस झांसे में ले लिया. हुडा के प्लौट दिलाने के नाम पर उस ने उन से लाखों रुपए ऐंठ लिए. चूंकि अब उस के पास पैसे आ चुके थे, इसलिए अपना रुतबा दिखाने के लिए उस ने हथियारबंद 2 बौडीगार्ड रख लिए. उन में से एक को वह 20 हजार रुपए और दूसरे को 25 हजार रुपए महीने वेतन देता था.

उस ने अपने बारे में यह कहना शुरू कर दिया कि उस का ट्रेनिंग पीरियड खत्म हो चुका है. अब उस की पोस्टिंग जज के पद पर हो गई है. दूसरी पत्नी निशा के लिए उस ने सेक्टर-53 स्थित ग्रांड रेजीडेंसी सोसाइटी में एक आलीशान फ्लैट किराए पर ले लिया तो वहीं प्रेमिका मेनका के लिए इसी सेक्टर की गुडलक सोसाइटी में एक फ्लैट किराए पर ले लिया. इस फ्लैट पर उस ने कई नौकर भी रख लिए.

रुतबा दिखाने के लिए वह महंगी लग्जरी कार महीने भर के लिए किराए पर लेता और उस पर नीली बत्ती लगा कर बाडीगार्डों के साथ शहर में घूमता था. पूछने पर वह अपनी तैनाती पड़ोसी जिले में होने की बात कह देता था. इस तरह गुड़गांव में लोग उसे जज के रूप में जानने लगे थे.

जब रसूखदार लोगों से उस के संबंध बन गए तो उस ने हुडा के प्लौट आदि दिलाने के नाम पर ठगी करनी शुरू कर दी. बताया जाता है कि इस ठगी से उस ने करोड़ों रुपए कमाए.

जिस तरह वह पैसे कमाता था, उसी तरह अपना रुतबा दिखाने के लिए खर्च भी करता था. उस की शानोशौकत देख कर लोग उस पर जल्द यकीन कर लेते थे. हिसार में रहने वाली ब्याहता के बजाय वह गुड़गांव में रहने वाली निशा और मेनका पर ज्यादा पैसे खर्च करता था. एक बात और जिस तरह उस की ब्याहता को निशा और मेनका के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, उसी तरह निशा को भी पता नहीं था कि उस का पति किसी मेनका के साथ लिवइन रिलेशन में रह रहा है.

आशीष सेफ गेम खेल रहा था. वह निशा और मेनका को देश के अलगअलग स्थानों की सैर कराता. उन्हें फाइवस्टार होटलों में ले जाता. इस तरह वह अपनी मौजमस्ती पर दोनों हाथों से पैसे खर्च कर रहा था. कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति गलत काम करने में चाहे कितनी भी चालाकी क्यों न बरते, एक न एक दिन उस की सच्चाई लोगों के सामने आ ही जाती है.

मेनका आशीष पर शादी के लिए दबाव डाल रही थी, लेकिन वह उसे लगातार टालता आ रहा था. वह उसे शादी टालने की कोई खास वजह भी नहीं बता पा रहा था. इस से मेनका को उस पर शक हो गया. मेनका एक तेजतर्रार महिला थी. वह आशीष के बारे में जानकारी जुटाने लगी कि आखिर ऐसी क्या वजह है, जो आशीश उसे लगातार टालता आ रहा है. इसी खोजबीन में उसे पता चला कि वह पहले से शादीशुदा है और उस की एक नहीं 2-2 बीवियां हैं. यह भी जानकारी मिली कि वह आशीष बिश्नोई नहीं, बल्कि आशीष सेन है.

यह जानकारी पाते ही वह आशीष पर भड़क गई कि उस ने उस से इतना बड़ा झूठ क्यों बोला? आशीष ने उसे लाख समझाने की कोशिश की कि जिन शादीशुदा बीवियों की वह बात कर रही है, उन के पास वह जाता ही कहां है. वे तो केवल नाम की हैं.

लेकिन मेनका अपनी जिद पर अड़ी रही. उस ने कहा कि अब वह उस से शादी तभी करेगी, जब वह दोनों पत्नियों को तलाक  दे देगा. यह बात फ्लैट से बाहर निकलती तो इलाके में आशीष की जमीजमाई साख को बट्टा लग सकता था. इसलिए वह किसी भी तरह मेनका को मनाने में जुट गया. उस ने मेनका को भरोसा दिलाया कि वह दोनों पत्नियों को तलाक दे कर जल्दी ही उस से शादी कर लेगा.

आशीष ने मेनका को उस समय शांत तो करा दिया, लेकिन वास्तव में वह उस से शादी नहीं करना चाहता था. इस की जगह वह उस से छुटकारा पाने के उपाय खोजने लगा. एक दिन उस ने अपनी कार की चाबी के छल्ले में मिनी वीडियो कैमरा लगा कर डैशबोर्ड पर रख दिया. इस के बाद उस ने कार में मेनका के साथ शारीरिक संबंध बनाए.

उस अश्लील फिल्म के जरिए वह मेनका पर दबाव बनाने लगा. जब भी मेनका पत्नियों को तलाक देने की बात कहती, वह उस अश्लील फिल्म को इंटरनेट पर डालने की धमकी देता. मेनका ने शादी करने के मकसद से ही उस की तरफ प्यार का कदम बढ़ाया था, लेकिन इस की जगह उस का शारीरिक और मानसिक शोषण हुआ. वह खुद को ठगा महसूस कर रही थी. चूंकि उसे डर था कि अगर वह इंटरनेट पर फिल्म डाल देगा तो बदनामी की वजह से वह किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी, इसलिए उस ने अपनी जुबान बंद रखी.

मेनका का मुंह बंद कराने के बाद आशीष ने उस की जगह निशा को महत्त्व देना शुरू कर दिया. यह बात मेनका को चुभ गई. उस ने तय कर लिया कि अब वह चुप नहीं बैठेगी. यही तय कर के वह 7 अगस्त, 2014 को गुड़गांव सेक्टर 17-18 के थाने पहुंच गई और थानाप्रभारी को लिखित तहरीर दे कर आशीष बिश्नोई उर्फ आशीष सेन के खिलाफ कानूनी काररवाई करने की मांग की. मेनका की तरफ से रिपोर्ट लिख कर सेक्टर-46 की क्राइम ब्रांच (सीआईए) ने आशीष को हिसार स्थित उस के घर से गिरफ्तार कर लिया था.

पुलिस ने आशीष सेन उर्फ आशीष बिश्नोई से मेनका के साथ बनाई गई अश्लील फिल्म की 3 सीडी, एक पेनड्राइव, कुछ नकली कोर्ट पेपर, 2 नकली ड्राइविंग लाइसेंस, एक शस्त्र लाइसेंस के साथ नीली बत्ती लगी एक फार्च्युनर कार भी बरामद की, जो उस ने 60 हजार रुपए प्रति महीने के किराए पर ले रखी थी. चूंकि उस के खिलाफ सेक्टर 17-18 थाने में रिपोर्ट दर्ज हुई थी, इसलिए पूछताछ के बाद उसे थाना पुलिस के हवाले कर दिया गया.

दगाबाज सनम : हनीट्रैप में फंसे नेताजी – भाग 2

अपनी करनी पर अवधेश पछता रहा था. उस का दिमाग काम नहीं कर रहा था. काफी देर तक वह उसी तरह बैठा सोचता रहा कि अब क्या करे. काफी सोचविचार के बाद दिमाग कुछ दुरुस्त हुआ तो उस ने उठ कर कपडे़ पहने और खुद को दुरुस्त कर के क्षेत्रीय थाना सेक्टर-39 जा पहुंचा.

थानाप्रभारी धर्मेंद्र चौधरी से मिल कर उस ने अपना परिचय दे दिया. लेकिन सच्चाई बताने के बजाय उस ने एक दूसरी ही कहानी बता कर थाना सेक्टर-39 रिपोर्ट दर्ज करा दी. उस ने थानाप्रभारी को बताया, ‘‘पिछले कई दिनों से कोई फोन कर के मुझ से मिलने की गुजारिश कर रहा था. मैं ने उसे औफिस में आ कर मिलने को कहा. लेकिन औफिस आने में उस ने असमर्थता व्यक्त की.

जब वह बारबार मिलने के लिए कहने लगा तो मैं ने उस से मिलने का मन बना लिया. उसी से मिलने के लिए मैं 11 बजे के करीब नोएडा स्थित जीआईपी मौल अपनी गाड़ी से पहुंच गया. तय प्रोग्राम के अनुसार वहां गेट के बाहर खड़े हो कर उस का इंतजार करने लगा. उसे फोन किया तो इस बार दूसरी ओर से किसी महिला की आवाज आई. महिला की आवाज सुन कर मैं चौंका.’’

महिला ने कहा, ‘‘आप इंतजार कीजिए. मैं थोड़ी देर में पहुंच रही हूं.’’

थोड़ी देर बाद एक लड़की आ कर अवधेश की कार के पास खड़ी हो गई. वह उसे पहचानता नहीं था. उस ने उसे पहचानने की कोशिश की, लेकिन पहचान नहीं सका. लड़की कार का दरवाजा खोल कर उस की बगल वाली सीट पर बैठ कर बोली, ‘‘सर, मैं आप से पहली बार मिल रही हूं, लेकिन मैं अपनी इस पहली मुलाकात को यादगार बनाना चाहती हूं.’’

लड़की ने उसे काफी प्रभावित किया था. वह उस की बात पर विचार कर ही रहा था कि तभी लड़की के मोबाइल पर किसी का फोन आया. लड़की ने फोन रिसीव कर के कहा, ‘‘मैं अभी एक जरूरी मीटिंग में हूं, बाद में फोन करना.’’

इतना कह कर लड़की ने फोन काट दिया. इस के बाद उस ने कहा, ‘‘सर, मैं आप की जनभावना पार्टी में शामिल हो कर पार्टी की कार्यकर्ता बनना चाहती हूं, क्योंकि राजनीति में मुझे बहुत रुचि है.’’

वह लड़की अभी उस से बातें कर रही थी कि 2 लड़के आ कर वहां खड़े हो गए. उन के साथ एक महिला भी थी. उन तीनों को देख कर अवधेश की कार में बैठी लड़की ने हाथ हिलाते हुए कहा, ‘‘आइए, मैं आप लोगों का ही इंतजार कर रही थी.’’

अवधेश कुछ समझ पाता, उस के पहले ही बगल में बैठी लड़की अपनी ओर का दरवाजा खोल कर जैसे ही उतरी, तुरंत उस का परिचित युवक उस की जगह पर बैठ गया. दोनों महिलाएं पीछे की सीट पर बैठ गईं तो दूसरा युवक अवधेश को धकेल कर ड्राइविंग सीट पर बैठ गया.

अब वह दोनों युवकों के बीच फंस गया था. उन लोगों ने उसे चुप रहने की धमकी दे कर उस की कार तेज रफ्तार से भगा दी. चलती गाड़ी में ही उन्होंने उस के पर्स से 12 हजार रुपए निकाल लिए. थोड़ी दूर जाने के बाद उसे जान से मारने की धमकी दे कर उसे भी कार से उतार दिया और खुद कार ले कर फरार हो गए. उस के बाद किसी तरह पूछतेपाछते हुए वह थाने तक पहुंचा है. इतना सब बता कर अवधेश ने अपनी कार दिलाने की गुजारिश की.

बात पूरी होतेहोते अवधेश की आंखें छलक पड़ी थीं. उसे इस तरह परेशान देख कर थानाप्रभारी ने उसे आश्वासन दे कर अपराध संख्या 19/2014 पर भादंवि की धारा 392, 386, 120बी, 34 के तहत मुकदमा दर्ज करा कर इस मामले की जांच जीआईपी के चौकीप्रभारी सबइंसपेक्टर विवेक शर्मा के नेतृत्व में एक टीम बना कर सौंप दी. उन की इस टीम में कांस्टेबल सिंकू चौधरी, ओमप्रकाश राय, सुदेश कुमार और महिला कांस्टेबल चित्रा चौधरी को शामिल किया गया था.

सबइंसपेक्टर विवेक शर्मा ने उस मोबाइल नंबर पर फोन मिलाया तो वह बंद मिला. उन्होंने उस नंबर को सर्विलांस पर लगवाने के साथ उस की आईडी निकलवाई तो पता चला कि वह नंबर सुहैल खान के नाम था, जो मकान नंबर बी-17डी, मेनरोड, मंडावली, दिल्ली में रहता था. पुलिस अवधेश को साथ ले कर उस पते पर पहुंची तो वहां उसे सुमन मिली.

अवधेश ने सुमन को पहचान कर पुलिस को बताया कि दोनों महिलाओं में एक यही थी. पुलिस सुमन को नोएडा ले आई. पूछताछ में सुमन ने अपने अन्य साथियों के बारे में बता दिया. इस के बाद पुलिस ने उस के साथियों मनोज कुमार, नीरज और शालिनी की तलाश में कई जगहों पर छापे मारे, लेकिन वे पुलिस के हाथ नहीं लगे. शायद उन्हें सुमन के पकड़े जाने की भनक लग गई थी, इसलिए वे अपनेअपने ठिकानों से फरार हो चुके थे.

सुमन से की गई पूछताछ में अवधेश मिश्रा को लूटने और ब्लैकमेल करने की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी.

दरअसल अवधेश मिश्रा ने अपने लूटे जाने के बारे में पुलिस को जो बताया था, वह पूरी तरह से सच नहीं था. उस की कार और रुपए जरूर अभियुक्त ले गए थे, लेकिन उस ने अपने अपहरण की कोशिश की जो बात पुलिस को बताई थी, वह झूठ थी. इस मामले में सच्चाई यह थी.

इस कहानी की शुरुआत 5-6 साल पहले से हुई थी. तब सुमन की शादी नहीं हुई थी. 33 वर्षीया सुमन अपने परिवार के साथ दिल्ली के पांडवनगर के गणेशनगर में रहती थी. उस के पड़ोस में ही मूलरूप से झारखंड का रहने वाला अवधेश मिश्रा भी अपने परिवार के साथ रहता था. 45 वर्षीय अवधेश मिश्रा इलाके का जानामाना आदमी था. इस की वजह यह थी कि वह ‘जनभावना पार्टी’ का राष्ट्रीय अध्यक्ष था.

सुमन भाईबहनों में सब से बड़ी थी, इसलिए घर या बाहर के कामों के लिए ज्यादातर उसे ही बाहर जाना पड़ता था. जब कभी किसी सरकारी दफ्तर का काम होता था, वह काम आसानी से हो जाए, इस के लिए वह अवधेश मिश्रा की मदद लेती थी. चूंकि अवधेश नेता था, इसलिए कैसा भी काम होता था, वह एक बार में ही करवा देता था.

लगातार अवधेश से मिलने की वजह से सुमन की उस से अच्छी जानपहचान हो गई थी. सुमन देखने में भी ठीकठाक थी और पढ़ीलिखी होने की वजह से बातें भी ढंग से करती थी. इसलिए अवधेश जब उसे देखता, उस का दिल उस के लिए मचल उठता था. यही वजह थी कि वह उसे चाहत से एकटक ताकता रहता था.

प्रेम की आग में भस्म – भाग 2

उस ने रमा कांगड़ा हत्याकांड की जो कहानी बताई, वह स्तब्ध कर देने वाली थी.

रमा धनगांवकर के पिता तभी गुजर गए थे, जब वह 4 साल की थी. पति की मौत के बाद कांताबाई धनगांवकर ने अपनी चारों बेटियों को अपने दम पर पालापोसा और पढ़ायालिखाया. कांताबाई धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी. वक्त के साथ उस ने चारों बेटियों की शादियां भी कर दीं. रमा उन की सब से छोटी बेटी थी और लाडली भी. शायद इसी वजह से वह ससुराल से ज्यादा मायके में रहती थी. इसी बात को ले कर उस के और पति के बीच मतभेद बढ़े और नौबत तलाक तक आ गई.

तलाक के बाद रमा अपनी मां के पास रहने लगी. सुनील कांगड़ा का परिवार उसी कालोनी में रहता था, जिस में धनगांवकर परिवार रहता था. दोनों के घरों के बीच करीब 2 सौ कदम की दूरी थी. सुनील कांगड़ा और रमा धनगांवकर साथसाथ खेलकूद कर बड़े हुए थे. दोनों ने महानगर पालिका के स्कूल में पढ़ाई भी साथसाथ की थी.

25 वर्षीया रमा धनगांवकर सुंदर ही नहीं, स्वभाव से चंचल भी थी. उस में कुछ ऐसा आकर्षण था कि कोई भी उस की ओर आकर्षित हो सकता था. 27 वर्षीय सुनील कांगड़ा सुंदर और हृष्टपुष्ट था. उस के पिता आजाद कांगड़ा एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे. लेकिन नौकरी के दौरान ही उन्हें लकवा मार गया था, जिस की वजह से कंपनी ने उन्हें रिटायर कर दिया था.

सुनील की एकलौती बहन की शादी हो चुकी थी. घर में मां, पिता और छोटा भाई ही थे. छोटा भाई भी चूंकि लकवे का शिकार था, इसलिए घरपरिवार की सारी जिम्मेदारी सुनील पर आ गई थी. उस ने परिवार का खर्च उठाने के लिए बीएमसी (मुंबई महानगर पालिका) में नौकरी कर ली थी.

सुनील कांगड़ा रमा से सीनियर था, लेकिन दोनों एक स्कूल में पढ़े थे. सीनियर होने के नाते सुनील पढ़ाईलिखाई में रमा की मदद किया करता था. इसी नाते दोनों के बीच बचपन से ही भावनात्मक लगाव था. दोनों एकदूसरे के घर भी आतेजाते थे. उम्र के साथसाथ दोनों का एकदूसरे के प्रति लगाव भी बढ़ता गया. पढ़ाई के बाद भी न तो दोनों का मिलनाजुलना कम हुआ और न ही भावनात्मक लगाव. जब दोनों जवान हुए तो उन का भावनात्मक लगाव प्यार में बदल गया और दोनों छिपछिप कर मिलने लगे.

जल्दी ही वह समय भी आ गया जब रमा और सुनील एकदूसरे को जीवनसाथी के रूप में देखने लगे. दोनों को ही ऐसा लगता था, जैसे वे बने ही एकदूसरे के लिए हैं. इस सब के चलते ही दोनों ने साथसाथ जीनेमरने की कसमें खा ली थीं.

रमा और सुनील के बीच पक रही प्यार की खिचड़ी की भनक जब रमा की मां को लगी तो उस ने यह बात अपनी तीनों बेटियों से बताई. मां और तीनों बहनों ने मिल कर रमा को ऊंचनीच समझाया, परिवार की इज्जत का वास्ता दिया, समाज का डर दिखाया तो रमा की सोच में थोड़ा बदलाव आ गया. रमा का मन बदल गया है, यह सोच कर मां और बहनों के प्रयास से रमा की शादी दूर की एक रिश्तेदारी में कर दी गई. यह अक्तूबर, 2005 की बात है. रमा ससुराल चली गई. उस का पति भी ठीकठाक था.

सुनील ने इसे रमा की बेवफाई समझा. लेकिन धीरेधीरे उस की समझ में यह बात आ गई कि इस के पीछे रमा की कोई मजबूरी रही होगी. समय के साथ वह रमा को भूलने की कोशिश करने लगा. इस में वह काफी हद तक कामयाब भी रहा. अंतत: मई, 2007 में उस ने कांदीवली, मुंबई की बिंदिया से शादी कर के अपनी गृहस्थी बसा ली.

बिंदिया भी सुंदर और सुशील थी. वह सुनील के साथसाथ पूरे परिवार का खयाल रखती थी. समय के साथसाथ सुनील एक प्यारी सी बच्ची का पिता भी बन गया. घरगृहस्थी सब ठीम चल रही थी कि सुनील की जिंदगी में रमा तूफान बन कर फिर आ गई.

सन 2010 में रमा अपने पति से तलाक ले कर अपनी मां के पास आ गई और वहीं रहने लगी. यह बात सुनील को पता चली तो 5 सालों से उस के सीने में दबी प्यार की चिंगारी फिर से सुलगने लगी. यही हाल रमा का भी था. चाहत चूंकि दोनों ओर थी, इसलिए जल्दी ही दोनों ने एकदूसरे से मिलनाजुलना शुरू कर दिया. दोनों नजरें बचा कर साथसाथ घूमनेफिरने लगे. इतना ही नहीं, दोनों ने फिर से एक होने का सपना देखना शुरू कर दिया.

कांताबाई को पता चला तो उस ने रमा को समझाया कि सुनील शादीशुदा और एक बच्ची का पिता है, इसलिए उस से दूर रहे. लेकिन रमा ने मां की बात पर ध्यान न दे कर सन 2011 में सुनील से कोर्टमैरिज कर ली. सुनील ने इस शादी को अपनी पत्नी और परिवार से छिपा कर रखा. कुछ समय तो सब ठीक चलता रहा, लेकिन यह बात छिपी न रह सकी.

जब यह बात सुनील की पत्नी को पता चली तो घर में आए दिन झगड़ा होने लगा. एक तो घर की कलह, ऊपर से पूरे परिवार का बोझ, इस सब से सुनील परेशान रहने लगा. समस्या यह थी कि न तो वह अपने परिवार को छोड़ सकता था और न रमा को.

इसी बीच सन 2013 में जब रमा गर्भवती हो गई तो उस का मानसिक संतुलन और भी बिगड़ गया. वह नहीं चाहता था कि रमा मां बने. उस ने रमा को गर्भपात कराने के लिए समझाया, लेकिन रमा इस के लिए तैयार नहीं हुई. इस पर रमा ने सुनील को काफी डांटाफटकारा. यह बात सुनील को बहुत बुरी लगी. आने वाली संतान को ले कर सुनील और रमा के बीच विवाद इतना बढ़ा कि रमा के प्रति सुनील के मन में समाया प्यार नफरत में बदल गया. वह रमा को अपनी जिंदगी से निकाल फेंकने की बात सोचने लगा.

आखिर सुनील ने तय कर लिया कि अब वह रोजरोज की कलह से मुक्ति पा कर रहेगा. फैसला कर लेने के बाद सुनील ने चारकोप, कांदीवली में रहने वाले अपने साले यानी पत्नी बिंदिया के भाई दीपक टाक से बात की. दीपक को यह बात कुछ जमी नहीं, उस ने सुनील को आड़े हाथों लिया, साथ ही मना भी कर दिया कि वह इस मामले में उस का साथ नहीं देगा.

इस पर सुनील ने भावनात्मक कार्ड खेलते हुए कहा, ‘‘तुम समझ नहीं रहे हो दीपक, उस के जिंदा रहने से तुम्हारी बहन का भविष्य खतरे में पड़ सकता है, साथ ही बच्चों का भी.’’

दीपक टाक उस के भावनात्मक जाल में फंस कर उस का साथ देने को तैयार हो गया. उस के तैयार होते ही दोनों ने रमा को ठिकाने लगाने की योजना बना ली. उन की योजना के अनुसार एक कार की जरूरत थी, ताकि रमा को मुंबई के बाहर ले जा कर ठिकाने लगाया जा सके.

अय्याश फर्जी जज की ठगी – भाग 1

6 अगस्त, 2014 को हरियाणा के जिला गुड़गांव के सेक्टर 17-18 थाने में एक महिला थानाप्रभारी  से मिली. 26-27 साल की वह महिला पहनावे से अच्छे परिवार की लग रही थी. तीखे नयननक्श वाली बेहद खूबसूरत उस महिला ने अपना नाम मेनका बताया था. जैसा उस का नाम था वैसी ही वह खूबसूरत भी थी.

थानाप्रभारी को अपना परिचय देने के बाद उस ने बताया कि उस के प्रेमी आशीष बिश्नोई ने उस की अश्लील फिल्म बना रखी है. उस फिल्म के जरिए वह उसे काफी दिनों से ब्लैकमेल कर रहा है. इस के अलावा फरजी जज बन कर उस ने गुड़गांव के तमाम लोगों से करोड़ों रुपए भी ठगे हैं.

मामला गंभीर था, थानाप्रभारी ने इस मामले से पुलिस उपायुक्त को अवगत कराया चूंकि अपराध महिला के साथ हुआ था, इसलिए पुलिस उपायुक्त ने रिपोर्ट दर्ज कर के शीघ्र ही उचित काररवाई करने के निर्देश दिए.

निर्देश मिलते ही थानाप्रभारी ने आशीष बिश्नोई पुत्र रामकिशन, निवासी सेक्टर-13 हिसार के खिलाफ भादंवि की धाराओं 419, 420, 467, 468, 471, 506 व 66ई/72 आईटी एक्ट के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

आशीष वर्तमान में गुड़गांव सेक्टर-53 स्थित गुडलक सोसाइटी और ग्रांड रेजीडेंसी में रह रहा था. लेकिन उस ने ये दोनों फ्लैट खाली कर दिए थे. फ्लैट खाली कर के वह कहां गया, यह किसी को पता नहीं था. आशीष के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज होने के बाद संयुक्त पुलिस आयुक्त (क्राइम) विवेश शर्मा ने इस मामले की जांच में सेक्टर-46 की सीआईए (क्राइम ब्रांच) टीम को भी लगा दिया.

सीआईए के इंसपेक्टर यशवंत सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई गई, जिस में एसआई सुरेंद्र सिंह, दिलीप सिंह, सुरेश कुमार, हेडकांस्टेबल राजवीर सिंह, संदीप कुमार, बिजेंद्र सिंह, कांस्टेबल नरेश आदि को शामिल किया गया. सीआईए टीम के पास आशीष के गुड़गांव और हिसार के पते थे. पुलिस ने त्वरित काररवाई करते हुए उस के गुड़गांव वाले फ्लैटों पर दबिश दी. वह वहां नहीं मिला तो पुलिस टीम 7 अगस्त को हिसार स्थित उस के घर पहुंच गई.

घर पर आशीष बिश्नोई के पिता रामकिशन मिले. आशीष उस समय शहर में कहीं गया हुआ था. कुछ देर बाद वह घर लौटा तो पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. आशीष ने पुलिस पर रौब जमाने की कोशिश तो की, लेकिन उस की एक न चली.

हिरासत में ले कर पुलिस टीम गुड़गांव लौट आई. सीआईए औफिस में जब उस से मेनका द्वारा लगाए गए आरोपों की बाबत पूछताछ की गई तो वह पुलिस को गुमराह करने की कोशिश करता रहा. लेकिन जब उस के साथ सख्ती की गई तो उस ने स्वीकार किया कि उस का नाम आशीष बिश्नोई नहीं बल्कि आशीष सेन है. आशीष ने यह भी माना कि उस ने अपनी प्रेमिका मेनका की ब्लू फिल्म बनाई थी.

शादीशुदा होते हुए भी 2 अन्य युवतियों को अपने प्रेम जाल में फांस कर उन के साथ लिवइन रिलेशन में रहने से ले कर नकली जज बनने तक की आशीष ने जो कहानी बताई, वह बड़ी ही दिलचस्प निकली.

33 वर्षीय आशीष सेन हरियाणा के हिसार के सेक्टर-13 में रहने वाले रामकिशन सेन का बेटा था. ग्रैजुएशन करने के बावजूद वह बेरोजगार था. उस के पिता हुडा में ड्राफ्ट्समैन थे और मां सिंचाई विभाग में नौकरी करती थीं. खेतीकिसानी के अलावा मांबाप कमा रहे थे, इसलिए घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. बीए पास करने के बाद पिता ने उस की शादी कर दी.

शादी के बाद वैसे तो आशीष का सारा खर्च घर वाले उठाते थे, लेकिन उन सब के अलावा कुछ खर्चे होते हैं, जिन्हें पूरा करने की मांग पत्नी पति के अलावा और किसी से नहीं करती. इसी के मद्देनजर आशीष ने नौकरी तलाशनी शुरू कर दी. इसी बीच फरजी आईडी कार्ड से मोबाइल सिमकार्ड खरीदने के आरोप में उसे जेल जाना पड़ा. यह सन 2004 की बात है.

कुछ दिन जेल में रह कर आशीष रिहा हो कर घर आ गया था. जेल जाने पर आशीष सुधरने के बजाय और ज्यादा दबंग हो गया था. उस की पत्नी 2 बच्चों की मां बन चुकी थी, जिस से उस के खर्चे और ज्यादा बढ़ गए थे. वह नौकरी की तलाश में सन 2006 में हिसार से गुड़गांव आ गया.

कोशिश करने के बाद भी आशीष को ढंग की नौकरी नहीं मिली. उस के पास हलके वाहन चलाने का ड्राइविंग लाइसेंस था. वह कार चलाना जानता ही था. उसी दौरान एक जानने वाले के सहयोग से उस की नौकरी गुड़गांव के ही एक काल सेंटर में ड्राइवर के पद पर लग गई.

वहां दो-ढाई साल नौकरी करने के दौरान ही उस के निशा नाम की एक लड़की से प्रेम संबंध हो गए. खुद के शादीशुदा होते हुए भी उस ने निशा से 2009 में एक मंदिर में शादी कर ली और उस के साथ गुड़गांव में किराए पर कमरा ले कर रहने लगा. उस ने निशा से खुद को अविवाहित बताया था.

हिसार में रह रही उस की पत्नी को इस बात की तनिक भी भनक नहीं लगी कि उस के पति ने उस से विश्वासघात करते हुए गुड़गांव में दूसरी शादी कर ली है. वह 10-15 दिन में पत्नी से मिलने हिसार पहुंच जाता था. पत्नी जब उस के साथ गुड़गांव चलने की बात कहती तो वह बहाना बना देता कि वहां उस के पास रहने की कोई व्यवस्था नहीं है, वह खुद दोस्त के पास रहता है. बहरहाल, आशीष दोनों बीवियों के बीच बड़ी चालाकी से सामंजस्य बैठाए रहा. इस बीच निशा एक बेटी की मां बन चुकी थी.

आशीष अक्सर जींद कोर्ट जाता रहता था. वहां पर कुछ लोगों से उस के अच्छे संबंध भी बन गए थे. कोर्ट आनेजाने से वह यह बात समझ गया था कि जज का रुतबा बड़ा होता है. उस के दिमाग में एक आइडिया आया कि क्यों न फरजी जज बन कर लोगों से मोटा पैसा कमाया जाए. क्योंकि ड्राइवर की नौकरी से उस की आकांक्षाएं पूरी होती नजर नहीं आ रही थीं. इसी बात को ध्यान में रख कर उस ने कई जोड़ी महंगे कपड़े लिए और शहर के धनाढ्य लोगों में घुसपैठ बनाने की कोशिश करने लगा.

वह बड़ेबड़े होटलों में होने वाली पार्टियों में बिना बुलाए शरीक होने लगा. पार्टियों में वह जिन लोगों से मिलता, अपना परिचय अंडर ट्रेनिंग जज के रूप में देता. इसी दौरान उस की मुलाकात मेनका से हुई. मेनका से भी उस ने खुद को अंडर ट्रेनिंग जज बताया था. उस से मिल कर मेनका बहुत प्रभावित हुई. दोनों के बीच दोस्ती हुई और फोन पर देर तक बातें होने लगीं.

दगाबाज सनम : हनीट्रैप में फंसे नेताजी – भाग 1

अपनी सफेद रंग की डीएल-13 सीसी 2442 नंबर की होंडा इमेज कार के इंडीकेटर जलाए अवधेश मिश्रा जीआईपी मौल की पार्किंग में सब से अलग  खड़ी किए ड्राइविंग सीट पर बैठा बेचैनी से पहलू बदल रहा था. कभी उस की नजर गाड़ी के दोनों ओर लगे मैजिक मिरर पर जाती तो कभी कलाई घड़ी या फिर बगल की सीट पर रखे मोबाइल फोन पर. बेचैनी काफी बढ़ गई तो वह होंठों ही होंठों में बड़बड़ाया, ‘किसी भी चीज की एक हद होती है, 10 बजे आने को कहा था, 11 बज रहे हैं. न खुद आई और न फोन किया. मैं फोन करता हूं तो उठाती भी नहीं है.’

न जाने कितनी बार अवधेश के मन में आया कि अब उसे वापस चले जाना चाहिए. लेकिन सुमन से मिलने की लालसा उसे रोक देती कि थोड़ी देर और इंतजार कर ले. शायद वह आ ही जाए. ऐसा करतेकरते उसे लगा कि अब उसे चले जाना चाहिए, वह नहीं आएगी. उस ने कार स्टार्ट भी कर ली. लेकिन तभी उस की नजर मैजिक मिरर पर गई तो पीछे से सुमन आती दिखाई दे गई. सुमन को आते देख उस का गियर पर गया हाथ रुक गया. सुमन करीब आई और कार का दरवाजा खोल कर उस की बगल वाली सीट पर बैठते हुए बोली, ‘‘आई एम रियली वैरी सौरी. क्या करती, ट्रैफिक जाम में इस तरह से फंस गई कि समय पर पहुंच ही नहीं सकी.’’

‘‘तुम फोन नहीं कर सकती थी तो कम से कम मेरा ही फोन उठा लिया होता. मन को संतोष हो जाता.’’ अवधेश ने झल्ला कर कहा.

‘‘सौरी तो कह दिया, अब क्या मेरी जान ले कर संतोष होगा.’’ सुमन ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘अच्छा, अब यह बताओ कि चलना कहां है?’’ अवधेश ने पूछा.

‘‘हम ने जहां चलने के लिए पहले से तय कर रखा है.’’ सुमन ने अवधेश की आंखों में आंखें डाल कर मुसकराते हुए कहा.

‘‘इस का मतलब आज पूरी तैयारी कर के आई हो. ठीक है, वहीं चलते हैं. आज का तुम्हारा पूरा दिन मेरे लिए है न?’’ अवधेश ने पूछा.

‘‘हां भई, अब चलो. वैसे भी देर हो गई है. और देर मत करो.’’ बेचैन सी होते हुए सुमन ने कहा.

‘‘ठीक है बाबा, चल रहा हूं.’’ कह कर अवधेश ने गाड़ी आगे बढ़ा दी.

बातें करते हुए दोनों 15-20 मिनट में निठारी स्थित ‘सूर्या गेस्टहाउस’ जा पहुंचे. अवधेश ने गेस्टहाउस में कमरा बुक कराया और सुमन के साथ कमरे में चला गया. अवधेश कमरे में पहुंचा ही था कि सुमन ने पर्स से मोबाइल निकाला और कोने में जा कर बात करने लगी. उसे फोन पर बात करते देख अवधेश ने कहा, ‘‘कहा तो था कि आज का पूरा दिन मेरे लिए है. यह बीच में कौन आ गया, फोन कर के किस से बात कर रही हो?’’

सुमन ने फोन काट कर कहा, ‘‘सौरी, कुछ जरूरी काम था, फोन कर के उसी के लिए कह रही थी. अब न किसी को फोन करूंगी, न किसी का फोन रिसीव करूंगी. चाहो तो इसे अपने पास रख लो.’’ सुमन ने अपना मोबाइल फोन अवधेश की ओर बढ़ाते हुए कहा.

‘‘इसे अपने पास ही रखो.’’ अवधेश ने कमरे में पडे़ बेड पर बैठ कर जूते उतारते हुए कहा.

जूते वगैरह उतार कर दोनों ने हाथमुंह धोए और बेड पर आ कर बैठे ही थे कि चायनाश्ता आ गया. चायनाश्ते का आर्डर अवधेश कमरा बुक कराते समय ही दे आया था. चायनाश्ता करने के बाद लड़का बरतन उठाने आया तो अवधेश ने खाने का आर्डर देते हुए कहा. ‘‘खाना 2 बजे ले आना. और हां, इस बीच बिलकुल डिस्टर्ब मत करना.’’

इस तरह एकांत में अवधेश सुमन से बहुत दिनों बाद मिला था, इसलिए वह उस के साथ का एक भी पल बेकार नहीं जाने देना चाहता था. उस ने अपने तो कपड़े उतारे ही, सुमन के भी कपड़े उतार कर उसे बांहों में भर लिया. अवधेश सुमन को पा कर दीनदुनिया भूलता, उस के पहले ही कमरे में होने वाली चहलपहल सुन कर वह एकदम से सुमन से अलग हो गया.

उस ने दरवाजे की ओर देखा तो उसे कमरे के अंदर 2 युवक और एक महिला दिखाई दी. उन में से एक युवक के हाथों में वीडियो कैमरा था. उन्हें देख कर अवधेश सन्न रह गया. वह समझ गया कि बंद कमरे में उस ने सुमन के साथ जो किया है, वह सब कैमरे में रिकौर्ड हो चुका है. झटके से उस ने खुद को चादर से ढका और गुस्से में बोला, ‘‘तुम लोग कौन हो और इस कमरे में यह क्या कर रहे हो?’’

तीनों खिलखिला कर हंसने लगे. अवधेश उन्हें हैरानी से ताक रहा था. सुमन उस के बगल से उठी और आराम से कपड़े पहन कर उन्हीं तीनों के बगल जा खड़ी हुई. उस ने भी हंसी में उन लोगों का साथ दिया तो अवधेश को समझते देर नहीं लगी कि यह सब सुमन का ही कियाधरा है. उस ने सुमन को घूरते हुए कहा, ‘‘तो यह सब तुम्हारी साजिश थी?’’

‘‘बड़ी जल्दी समझ गए.’’ सुमन ने कुटिल मुसकान बिखेरते हुए कहा.

अवधेश नादान नहीं था. उसे पता था कि यह सब क्यों किया गया है. इसलिए उन के कुछ कहने से पहले ही उस ने पूछा, ‘‘तुम लोग चाहते क्या हो?’’

‘‘पहले तो हम तुम्हें लूटना चाहते हैं.’’ कह कर उन लोगों ने अवधेश की पैंट से पर्स निकाल उस में रखे 12 हजार रुपए निकाल कर अपनी जेब में रख लिए. इस के बाद उस की कार की चाबी ले कर दोनों में से एक युवक ने कहा, ‘‘हम जो चाहते हैं, अब तुम वह सुनो. किसी को कुछ बताए बगैर तुम्हें हम लोगों को 4 लाख रुपए देने होंगे. अगर तुम ने पैसे नहीं दिए तो हम ने तुम्हारी सुमन के साथ जो वीडियो बनाई है, वह ‘यूट्यूब’ पर डाल देंगे. इस के बाद तुम्हारा यह खेल सारी दुनिया देखेगी.

‘‘यही नहीं, हम एक काम और करेंगे. इस में से कुछ फोटो बनवा कर तुम्हारी पत्नी को भी दे आएंगे. वह भी देख लेगी कि उस के पतिपरमेश्वर क्याक्या करते हैं. अगर तुम्हारा मन इतने से भी नहीं भरेगा तो इस फिल्म को टीवी पर चला कर सब को दिखा देंगे. तब तुम इस तरह बदनाम हो जाओगे कि किसी को मुंह दिखने लायक नहीं रहोगे. अब तुम जानो कि तुम्हें अपनी इज्जत प्यारी है या 4 लाख रुपए. तुम हमें पैसे दे दो, हम तुम्हें यह फिल्म वापस कर देंगे.’’

‘‘अगर तुम लोगों ने ऐसा किया तो मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगा.’’ अवधेश ने हाथ जोड़ कर कहा.

‘‘अगर तुम मुंह दिखाने लायक रहना चाहते हो तो 4 लाख रुपए दे दो.’’ उसी युवक ने कहा.

‘‘4 लाख रुपए… इतनी बड़ी रकम का इंतजाम मैं कहां से करूंगा?’’ अवधेश गिड़गिड़ाया.

‘‘बदनामी से बचना है, तो रुपयों का इंतजाम करना पड़ेगा.’’ इस बार सब ने एक साथ कहा.

अवधेश मिन्नतें करता रहा, लेकिन उन लोगों पर कोई असर नहीं हुआ. उन में से एक ने अवधेश की चादर खींच कर कहा, ‘‘जब अय्याशी कर रहे थे तो तुम्हें पता नहीं था कि पैसे कहां से आएंगे. सारा मजा मुफ्त में ही लेना चाहते थे.’’

इस के बाद उसी युवक ने अवधेश के पास आ कर उस के गाल पर जोरदार थप्पड़ मार कर कहा, ‘‘एक बात का ध्यान रखना. अगर तुम पुलिस के पास गए तो तुम्हारी यह फिल्म सारी दुनिया देखेगी.’’

इस के बाद अवधेश को उसी तरह छोड़ कर वे चारों हंसते हुए कमरे से बाहर निकल गए. अवधेश की कार की चाबी भी वे साथ ले गए थे. गेस्टहाऊस की पार्किंग में खड़ी उस की कार को ले कर वे चले गए.

प्रेम की आग में भस्म – भाग 1

21 नवंबर, 2013 की सुबह के 6 बजे थे. मुंबई से सटे ठाणे जिले की तहसील भिवंडी के नारपोली थाने के असिस्टैंट इंसपेक्टर माले की नाइट ड्यूटी खत्म होने वाली थी. वह चार्ज दे कर घर जाने की सोच ही रहे थे कि ओवली गांव के रहने वाले कैलाश पाटिल थाने आ पहुंचे. पाटिल काफी घबराए हुए थे. उन्होंने माले को बताया, ‘‘मैं मौर्निंग वाक के लिए जा रहा था तो नासिक बाईपास रोड के किनारे वाली पाइप लाइन के पास खाई में एक महिला की अधजली लाश पड़ी दिखाई दी.’’

कैलाश पाटिल की सूचना की गंभीरता को देखते हुए असिस्टैंट इंसपेक्टर माले ने इस मामले से अपने सीनियर इंसपेक्टर डी.वी. पाटिल को अवगत कराया, साथ ही कंट्रोल रूम को भी यह सूचना दे दी. डी.वी. पाटिल ने माले से इस मामले की रिपोर्ट दर्ज कराने को कहा और खुद इंसपेक्टर प्रकाश पाटिल व पुलिस टीम को साथ ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

जब पुलिस टीम घटनास्थल पर पहुंची तो वहां काफी भीड़ एकत्र थी. पुलिस ने भीड़ को हटा कर लाश और घटनास्थल की जांच की. वहां पड़ी लाश 25-26 साल की महिला की थी. लाश को कुछ इस तरह से जलाया गया था कि मृतका को पहचाना न जा सके. उस के दोनों हाथ और पांव चिपके हुए थे. लाश के पास ही नायलौन की एक मजबूत रस्सी पड़ी थी. यह बात साफ थी कि पहले मृतका का गला घोंटा गया था और बाद में लाश पर पैट्रोल डाल कर जला दिया गया था.

पुलिस ने क्राइम टीम और डौग स्क्वायड को घटनास्थल पर बुला कर सबूत ढूंढने की कोशिश की, साथ ही घटनास्थल का भी बारीकी से निरीक्षण किया. प्राथमिक काररवाई निपटाने के बाद डी.वी. पाटिल ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए आईजीएम अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद इस मामले की जांच इंसपेक्टर प्रकाश पाटिल को सौंप दी.

घटनास्थल पर कोई भी ऐसा सबूत नहीं मिला था जिस से मृतका की पहचान हो पाती. वारदात की स्थिति से प्रकाश पाटिल ने अनुमान लगाया कि मृतका संभवत: तहसील भिवंडी की रहने वाली नहीं थी. हत्या का केस दर्ज हो चुका था. जबकि मृतका के बारे में कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली थी. इस पर प्रकाश पाटिल ने कंट्रोल रूम के माध्यम से ठाणे, मुंबई और नवी मुंबई के सभी थानों को मृतका की उम्र और हुलिया बता कर वायरलैस मैसेज भिजवा दिया, ताकि कहीं से कोई महिला गायब हो तो उस की सूचना मिल सके.

इस के साथ ही अगले दिन के समाचारपत्रों में घटनास्थल और मृतका का जली अवस्था का फोटो, हुलिया और उम्र के बारे में भी छपवा दिया गया. लेकिन इस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. इस बीच मृतका की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई थी, जिस में उस की मौत का कारण दम घुटने से सांस का अवरुद्ध होना बताया गया था. इस रिपोर्ट में उसे 7 माह की गर्भवती बताया गया था.

काफी कोशिशों के बाद भी पुलिस न तो मृतका का पता लगा पाई और न उस के हत्यारों का. समय के साथ यह मामला ठंडा पड़ता गया. कुछ और समय बीता तो इस केस की फाइल ठंडे बस्ते में चली गई. देखतेदेखते लगभग 2 साल बीत गए. इस बीच नारपोली पुलिस थाने के सीनियर इंसपेक्टर डी.वी. पाटिल का तबादला हो गया. उन की जगह मार्च, 2015 में नए सीनियर इंसपेक्टर आए अनिल आकड़े.

अनिल आकड़े ने जब पेंडिंग पड़े केसों की फाइलें खुलवाईं तो इस केस की फाइल भी उन के सामने आ गई. उन्होंने इस केस का अध्ययन किया. उन्हें इस में काफी संभावनाएं नजर आईं. पूरे केस को देखनेसमझने के बाद इंसपेक्टर अनिल आकड़े ने इस केस के विवेचनाधिकारी इंसपेक्टर प्रकाश पाटिल को बुला कर उन से उन की विवेचना के बारे में विस्तार से बात की. प्रकाश पाटिल से पूरी बातें जान कर अनिल आकड़े ने ठाणे के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त दाभांडे और सहायक पुलिस आयुक्त चंद्रकांत जोशी से विचारविमर्श किया और इस केस की फाइल फिर से खोल दी.

इस केस की जांच के लिए सीनियर इंसपेक्टर अनिल आकड़े ने अपनी तफ्तीश की दिशा तय करने के बाद पुलिस की 2 टीमें तैयार कीं. इन टीमों में प्रकाश पाटिल के अलावा असिस्टैंट इंसपेक्टर लक्ष्मण राठौर, हैडकांस्टेबल संजय भोसले, सत्यवान मोहिते, विक्रम उदमले वगैरह को शामिल किया.

इस केस में सब से बड़ी समस्या थी मृतका की पहचान की. क्योंकि बिना उस की पहचान के तफ्तीश को आगे बढ़ाना संभव नहीं था. मृतका की पहचान के लिए पुलिस की दोनों टीमों ने अपनेअपने मुखबिरों का सहारा लिया. थोड़ा समय तो लगा, पर मेहनत रंग लाई. एक मुखबिर ने पुलिस को बताया कि जिस औरत की 2 साल पहले हत्या कर के लाश को जला दिया गया था, उस का नाम रमा सुनील कांगड़ा था और वह जोगेश्वरी पश्चिम में रहती थी. उस ने यह भी बताया कि उस की गुमशुदगी जोगेश्वरी ओशिवारा थाने में दर्ज कराई गई थी. यह गुमशुदगी उस की मां कांताबाई धनगांवकर ने दर्ज कराई थी.

यह पता चलते ही अनिल आकड़े अपनी टीम के साथ जोगेश्वरी ओशिवारा थाने जा पहुंचे. वहां उन्होंने थानाप्रभारी सुभाष खानविलकर और इस मामले के जांच अधिकारी सबइंसपेक्टर ढवले से इस संबंध में विस्तार से बात की. उन्होंने बताया कि रमा की मां कांताबाई धनगांवकर ने अपनी बेटी की गुमशुदगी 21 मार्च, 2015 को लिखाई थी, जिस में उस ने संदेह व्यक्त किया था कि रमा को संभवत: उस के पति सुनील कांगड़ा ने मार डाला है, क्योंकि वह पिछले डेढ़ सालों से उसे रमा से नहीं मिलवा रहा था. पुलिस ने इस संबंध में सुनील से पूछताछ भी की थी, लेकिन उसे गिरफ्तार इसलिए नहीं किया गया, क्योंकि उस पर कोई अभियोग नहीं बन रहा था.

पता चला कि कांताबाई धनगांवकर और सुनील कांगड़ा दोनों ही जोगेश्वरी (पश्चिम) की यूसुफ हनीफ कालोनी, आदर्शनगर में रहते थे. इस जानकारी के आधार पर अनिल आकड़े अपनी पुलिस टीम के साथ यूसुफ हनीफ कालोनी जा कर कांताबाई से मिले. पूछताछ करने पर उस ने बताया कि उस की बेटी करीब 2 सालों से गायब है. वह रमा के पति सुनील कांगड़ा से पूछती है तो वह झूठ बोल कर पीछा छुड़ा लेता है. उस ने थाने में बेटी की गुमशुदगी भी लिखाई और उस की हत्या का संदेह भी जाहिर किया, लेकिन पुलिस कुछ नहीं कर पाई.

पुलिस ने कांताबाई को मृतका के फोटो दिखाए, लेकिन वह चूंकि बुरी तरह जली अवस्था में थी, इसलिए कांताबाई पहचान नहीं पाई. कांताबाई से पूछताछ के बाद पुलिस टीम सुनील कांगड़ा के घर पहुंची. पता चला कि पुलिस पूछताछ और गिरफ्तारी से बचने के लिए उस ने मुंबई हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत ले रखी थी. इस से पुलिस को पूरा विश्वास हो गया कि नारपोली थानाक्षेत्र में जो लाश मिली थी, वह रमा कांगड़ा की ही थी और सुनील कांगड़ा किसी न किसी रूप में उस की हत्या से जुड़ा हुआ था.

सुनील कांगड़ा ने चूंकि हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत ले रखी थी, इसलिए पुलिस उस से पूछताछ नहीं कर सकती थी. इस स्थिति से निपटने के लिए पुलिस ने उस के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि उसे अग्रिम जमानत सितंबर, 2015 तक के लिए मिली हुई थी. इस पर पुलिस ने उस की घेराबंदी का इंतजाम कर दिया, ताकि वह फरार न हो सके.

जैसे ही उस की जमानत की अवधि समाप्त हुई, नारपोली थाने की पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. उसे थाने ला कर विधिवत पूछताछ की गई तो वह पुलिस को गुमराह करता रहा. उस ने यहां तक कह दिया कि वह किसी रमा को नहीं जानता. लेकिन जब उस के साथ सख्ती की गई तो वह टूट गया और अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

बेईमान प्यार : बेमौत मारा गया परिवार

सिरफिरे का प्यार : बना गले की फांस