Love Crime: इश्क का खूनी अंजाम

Love Crime: 25 वर्षीय जिकरा परवीन का पति कामधंधा करने दूसरे प्रदेश क्या गया, वह देवर दिलदार कुरैशी के लंगोटिया यार  27 वर्षीय मोहम्मद फैजान को प्यार करने लगी. फैजान ने न सिर्फ जिकरा बल्कि दिलदार की बहन को भी प्यार के जाल में फांस लिया था. फिर एक दिन इन के इश्क का ऐसा खूनी अंजाम हुआ कि…

जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में एक रोज दोपहर में दिलदार ने भाभी व दोस्त को हमबिस्तर होते देख लिया. यह देखने के बावजूद उस ने अपने गुस्से पर काबू रखा और दबे पांव घर से चला गया. चूंकि उस समय घर पर उस की बहन भी मौजूद थी, अत: दिलदार को यह भी शक हुआ कि बहन भी भाभी से मिली हुई है. उस के मन में भी फैजान के प्रति चाहत है. उस का भी नाजायज रिश्ता फैजान से हो सकता है.

सच्चाई जानने के बावजूद दिलदार ने एक बार फिर भाभी जिकरा परवीन व फैजान को समझाने का प्रयास किया, लेकिन वे दोनों नहीं माने और मनमानी करते रहे. बहन को समझाया तो वह अपनी भाभी का ही पक्ष लेने लगी. इतना ही नहीं, उस ने दोनों के नाजायज रिश्तों को भी नकार दिया. अपने आप को भी पाकीजा बताया. दिलदार तब समझ गया कि बहन मन्नू भी फैजान के प्रेमजाल में फंस चुकी है. भाभी जिकरा परवीन ने खानदान की इज्जत को खाक में मिलाया था और दोस्त मोहम्मद फैजान ने दोस्ती का छुरा उस की पीठ में घोंपा था, इसलिए दिलदार ने उन दोनों को सबक सिखाने की ठान ली. बहन के प्रेम संबंधों पर भी उसे शक था, अत: उसे भी सबक सिखाने का निश्चय किया.

16 जनवरी, 2026 की दोपहर दिलदार अपनी योजना के तहत हसवा कस्बे के बाजार पहुंचा. वहां उस ने एक दुकान से तेज धार वाला चापडऩुमा चाकू 500 रुपए में खरीदा और उसे कमर में खोंस कर रख लिया. इस के बाद शराब ठेके पर जा कर उस ने शराब पी, साथ ही शराब का एक क्वार्टर और खानेपीने का सामान सुरक्षित कर लिया.

दोपहर बाद लगभग 3 बजे दिलदार अपने दोस्त मोहम्मद फैजान के घर पहुंचा. उस समय वह घर पर ही था. दिलदार उसे क्रिकेट खेलने के बहाने करबला के पास बगीचे में ले गया. कुछ दूरी पर बगीचे में लड़के क्रिकेट खेल रहे थे. दिलदार ने फैजान से कहा कि पहले शराब पी कर मूड बना लेते हैं, फिर क्रिकेट खेलने चलेंगे. इस के बाद दोनों ने बगीचे में बैठ कर शराब पी.

नशा हावी होने पर दिलदार ने उस से पूछा, ”दोस्त, सचसच बताना कि भाभीजान से तुम्हारा नाजायज रिश्ता है या नहीं? क्या मेरी बहन से भी तुम्हारे ताल्लुकात हैं?’’

”तुम्हारी भाभी और मेरे बीच वही रिश्ता है जो एक बीवीशौहर के बीच होता है. तुम्हारी बहन से भी मेरे प्रेम संबंध हैं. वह भी मुझ पर जान छिड़कती है.’’ फैजान ने नशे में सच्चाई बयां कर दी.

जिकरा परवीन के अवैध संबंध से बेहद खफा था देवर दिलदार

फैजान की बात सुन कर दिलदार के तनबदन में आग लग गई. उस पर खून का भूत सवार हो गया. उस ने कमर में खोंसा चाकू निकाला और फैजान के गले पर वार कर दिया. फैजान जान बचा कर भागा, लेकिन चंद कदम की दूरी पर लडख़ड़ा कर गिर पड़ा. उस के बाद दिलदार ने फैजान के गले पर 2 और वार कर उस का गला रेत दिया.

फैजान कुछ देर तड़पा, फिर उस ने दम तोड़ दिया. हत्या किए जाने की भनक न क्रिकेट खेल रहे लड़कों को लगी और न ही किसी अन्य को. फैजान की हत्या करने के बाद दिलदार हाथ में खून सना चाकू लहराते हुए अपने घर पहुंचा. उस के सिर पर खून का भूत सवार था.

घर में उस समय उस की भाभी जिकरा परवीन व बहन मौजूद थी. अम्मी व छोटी बहन किसी काम से पड़ोस में गई थीं. घर में घुसते ही वह चीखा, ”भाभी… ओ भाभी…’’

2 खून के बाद…

दिलदार के चीखने की आवाज सुन कर जिकरा परवीन कमरे से बाहर आ गई. उसे देख कर दिलदार बोला, ”भाभी, मैं ने तुम्हारे यार फैजान को तो उस की सही जगह में पहुंचा ही दिया है. अब तुम्हारी बारी है.’’

देवर के रूप में साक्षात मौत को सामने देख कर जिकरा परवीन सिर से पांव तक कांप उठी. वह जान बचा कर छत की तरफ भागी, लेकिन दिलदार ने उसे आंगन में ही पकड़ लिया. फिर उस ने उस की पीठ व गरदन पर चाकू से कई प्रहार किए. जिकरा परवीन खून से सराबोर हो कर जमीन पर गिर पड़ी. कुछ पल बाद ही उस ने दम तोड़ दिया. इसी बीच भाभी की चीख सुन कर मन्नू उसे बचाने आई तो दिलदार उस पर भी टूट पड़ा और चाकू से हाथ, सिर व गरदन पर वार कर उसे घायल कर दिया.

मन्नू भी खून से लथपथ हो कर आंगन में धराशाई हो गई. कुछ देर बाद मांबेटी वापस आईं तो घर में खूनी खेल देख कर उन की रूह कांप गई. इस के बाद तो घरमोहल्ले में कोहराम मच गया. इसी बीच फैजान की लाश आम के बाग में पड़ी होने की खबर लगी तो मोहल्ले के लोग वहां पहुंच गए.

फेमिली वालों ने फैजान का शव देखा तो उन की चीखें गूंजने लगीं. उन की चीखों से लोगों का कलेजा कांप उठा. मृतका जिकरा परवीन के पेरेंट्स को मौत की खबर लगी तो वे भी आ गए और बेटी का शव देख कर बिलख पड़े.

इधर डबल मर्डर करने के बाद दिलदार कुरैशी हसवा कस्बा चौकी पहुंचा. उस समय चौकी इंचार्ज वी.के. सिंह वहां मौजूद थे. दिलदार उन के पास पहुंचा और बोला, ”सर, मैं ने उन दोनों को मार डाला है.’’

दिलदार की बात सुन कर वी.के. सिंह चौंक पड़े, ”तूने किसे मार दिया? कहीं नशे में तो बकबक नहीं कर रहा है?’’

”सर, मैं नशे में जरूर हूं. लेकिन जो कह रहा हूं, वह सच है. मैं ने सचमुच अपनी भाभी जिकरा परवीन व उस के आशिक फैजान को मार डाला है. भाभी की लाश हमारे घर में तथा फैजान की लाश आम के बाग में पड़ी है. यकीन न हो तो जा कर देख लो. भाभी को बचाने आई अपनी बहन पर भी हमला किया. पता नहीं वह जिंदा है या वह भी मर गई?’’

रूह कपा देने वाली दिलदार की बात सुन कर चौकी इंचार्ज वी.के. सिंह ने उसे तुरंत हिरासत में ले लिया. इस के बाद डबल मर्डर की सूचना असोथर थाने के एसएचओ राजेंद्र सिंह को दी. सूचना पाते ही राजेंद्र सिंह पुलिस बल के साथ हसवा कस्बा आ गए और चौधराना मोहल्ला स्थित घटना वाले मकान पर जा पहुंचे. उस समय वहां भीड़ जुटी थी.

जिकरा परवीन के घर के बाहर जमा भीड़

मामले की गंभीरता को समझते हुए उन्होंने डबल मर्डर की सूचना पुलिस अधिकारियों को दी और निरीक्षण में जुट गए. घर के अंदर आंगन में एक महिला की लाश पड़ी थी, जबकि दूसरी युवती घायल अवस्था में पड़ी थी. राजेंद्र सिंह ने घायल युवती को इलाज के लिए जिला अस्पताल भिजवाया, लेकिन हालत गंभीर होने के कारण उसे हैलट अस्पताल कानपुर रेफर किया गया.

बाग में मिली लाश

एसएचओ राजेंद्र सिंह अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी अनूप कुमार सिंह, एएसपी महेंद्र पाल सिंह तथा सीओ (थरियांव) वीर सिंह पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया.

बाग में मिली मोहम्मद फैजान की लाश 

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. घर के अंदर आंगन में मृतका जिकरा परवीन खून से लथपथ पड़ी थी. उस की पीठ पर 3 घाव तथा गले पर 5 घाव थे. बदन के सारे कपड़े खून से सने थे. फर्श पर भी खून फैला था. मृतका की उम्र 25 वर्ष के आसपास थी. फोरैंसिक टीम ने भी घटनास्थल से सबूत जुटाए. मृतका जिकरा परवीन के ससुरालीजन मौके से फरार हो गए थे, लेकिन उस की अम्मी तहरून निशा व अब्बू फकीरे वहां मौजूद थे. वे दोनों बेटी के शव के पास बिलख रहे थे.

पुलिस अधिकारियों ने उन दोनों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि बेटी का शाम 4 बजे फोन आया था. तब उस ने कहा था कि उसे आ कर ले जाओ. लेकिन देर शाम खबर लगी कि बेटी के देवर दिलदार ने उस की हत्या कर दी और बहन को घायल कर दिया है. पता नहीं मेरी बेटी ने ऐसा कौन सा गुनाह किया था, जो उसे मार डाला. गुनहगार को सख्त सजा मिलनी चाहिए.

इस के बाद पुलिस अधिकारी आम के बगीचे में पहुंचे, जहां मोहम्मद फैजान की लाश पड़ी थी. लाश के पास मृतक के फेमिली वाले बिलख रहे थे. पुलिस अधिकारियों ने उन्हें सांत्वना दी, फिर बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया. मृतक की उम्र 27 वर्ष के आसपास थी. उस की हत्या बेरहमी से की गई थी. उस के गले में 3 बड़े घाव थे. चाकू से गला रेता गया था. कपड़ेे खून से तरबतर थे. जमीन पर भी खून था.

पुलिस अधिकारियों ने मृतक के अब्बू रुआब व चाचा मोहम्मद शमीम से घटना के बारे में पूछताछ की. इस पर उन्होंने बताया कि फैजान और दिलदार दोस्त थे. उन की दोस्ती नफरत में क्यों बदल गई, उन्हें पता नहीं. लेकिन हत्या के बाद पता चला कि दिलदार को शक था कि उस की भाभी और फैजान के बीच नाजायज रिश्ता था. शायद इसी शक में उस ने डबल मर्डर कर दिया. मृतक व मृतका के फेमिली वालों से पूछताछ के बाद एसपी अनूप कुमार सिंह ने एसएचओ राजेंद्र सिंह को आदेश दिया कि वह दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद आरोपी दिलदार कुरैशी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार करें.

एसपी के आदेश पर एसएचओ राजेेंद्र सिंह ने जिकरा परवीन व मोहम्मद फैजान के शव पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल फतेहपुर भेज दिए. इस के बाद फैजान के अब्बू रुआब उर्फ राजू की तहरीर पर बीएनएस की धारा 103(1) के तहत दिलदार कुरैशी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस की जांच, आरोपी के बयानों एवं मृतकों के परिजनों से की गई पूछताछ के आधार पर इश्क के खूनी खेल की जो सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई, इस प्रकार है.

दोनों भाई थे अपराधी

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर शहर का एक मुसलिम बाहुल्य मोहल्ला है— पीरनपुर. इसी मोहल्ले में फकीरे अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी तहरून निशा के अलावा 3 बेटियां थीं, जिस में जिकरा परवीन सब से छोटी थी. दोनों बड़ी बेटियों का निकाह हो चुका था. फकीरे छोटामोटा कामधंधा कर अपने परिवार का भरणपोषण करता था.

मृतका जिकरा परवीन की अम्मी तहरून

फकीरे की बेटी जिकरा परवीन अपनी बहनों में सब से खूबसूरत और होशियार थी. उस ने मोहल्ले के मदरसे से हाईस्कूल तक तालीम हासिल की थी. जिकरा परवीन 18 साल की हो गई थी. पेरेंट्स की अब एक ही ख्वाहिश थी कि जल्दी से कोई अच्छा लड़का देख कर उस का निकाह कर दिया जाए. इस के लिए फकीरे ने खोजबीन शुरू की तथा नातेरिश्तेदारों से भी कहा. काफी प्रयास के बाद एक रिश्तेदार ने मोहम्मद आमिर उर्फ बल्लू का नाम सुझाया.

आमिर उर्फ बल्लू के वालिद वाजिद कुरैशी, फतेहपुर जनपद के थरियांव थाने के हसवा कस्बे के चौधराना मोहल्ले में रहते थे. उन के परिवार में बीवी शकीला के अलावा 6 बेटे व 3 बेटियां थीं. उन का एक बेटा विदेश में था. वाजिद के 2 बेटे आमिर उर्फ बल्लू व दिलदार उस के साथ रहते थे. दोनों पशुओं की खरीदफरोख्त का व्यापार करते थे. आमिर व दिलदार दोनों अविवाहित थे.

अस्पताल में उपचाराधीन दिलदार की छोटी बहन मन्नू और मृतक फैजान के रोतेबिखलते फैमिली वाले

फकीरे ने जब आमिर उर्फ बल्लू को देखा तो उस ने उसे अपनी बेटी जिकरा परवीन के लिए पसंद कर लिया. इस के बाद 13 जून, 2019 को फकीरे ने जिकरा परवीन का निकाह आमिर उर्फ बल्लू के साथ कर दिया. जिकरा परवीन बेहद खूबसूरत थी. ससुराल में उस का चांद सा मुखड़ा जिस ने भी देखा, उसी ने उस के रूपयौवन की तारीफ की. आमिर उर्फ बल्लू भी खूबसूरत बीवी पा कर खुश था. उस ने कभी सोचा नहीं था कि उसे इतनी खूबसूरत बीवी मिलेगी.

निकाह के बाद जिकरा परवीन और आमिर ने बड़े प्यार से जिंदगी की शुरुआत की. दोनों एकदूसरे को बेहद चाहते थे. इसी चाहत में 3 साल कब बीत गए, पता ही न चला. इन 3 सालों में जिकरा परवीन 3 बेटियों की मां बन गई.

भाभी जिकरा परवीन और उस के प्रेमी मौहम्मद फैजान की हत्या का आरोपी दिलदार कुरैशी 

मोहम्मद आमिर उर्फ बल्लू अपने भाई दिलदार के साथ पशुओं के खरीदनेबेचने का व्यापार करता था. दोनों भाई अपराधी प्रवृत्ति के थे. उन का अकसर किसी न किसी से झगड़ा होता रहता था. थाना थरियांव में दोनों के खिलाफ मारपीट, हत्या का प्रयास, आम्र्स ऐक्ट व गोवध निवारण अधिनियम के तहत कई मुकदमे दर्ज थे. थरियांव थाने में दोनों भाइयों की हिस्ट्रीशीट खुली थी. पुलिस ने जब दोनों भाइयों पर शिकंजा कसा तो वह उत्तर प्रदेश के बजाय मध्य प्रदेश जा कर पशु तसकरी करने लगे. आमिर उर्फ बल्लू अब 2-4 माह में एक बार घर आता और कुछ दिन रह कर वापस चला जाता.

इसी तरह दिलदार भी घर आता और फिर कुछ माह रह कर भाई आमिर के पास चला जाता. दोनों भाइयों को सदैव पुलिस का डर बना रहता था. दिलदार कुरैशी का एक दोस्त था मोहम्मद फैजान. वह भी हसवा कस्बा के चौधराना मोहल्ले में रहता था. उन के घरों के बीच मात्र 200 मीटर का फासला था. फैजान के अब्बू रुआब उर्फ राजू टेलर थे.

रुआब के परिवार में पत्नी रोशन बानो के अलावा 2 बेटे मोहम्मद फैजान, मोहम्मद अरमान तथा 2 बेटियां थीं. रुआब खुद तो रायबरेली में रहते थे और वहीं टेलङ्क्षरग का काम करते थे, जबकि उन का परिवार हसवा कस्बे में ही रहता था. दिलदार और फैजान एक ही गली में खेलकूद कर बड़े हुए थे. दोनों बचपन के दोस्त थे. हाईस्कूल तक उन्होंने साथ ही पढ़ाई की थी. लेकिन दिलदार जब हाईस्कूल में फेल हो गया तो उस ने पढ़ाई बंद कर दी. इस के बाद वह अपराधिक गतिविधियों में लग गया.

लेकिन फैजान होनहार युवक था. उस ने इंटरमीडिएट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर ठाकुर युगराज सिंह महाविद्यालय में बीएससी में प्रवेश ले लिया था. वह पढ़ाई पूरी कर विदेश (सऊदी अरब) जाना चाहता था. दिलदार और फैजान के बीच गहरी दोस्ती थी. दोनों साथ खातेपीते व उठतेबैठते थे. उन को क्रिकेट खेलने का भी शौक था. दिलदार शराब का लती था. उस ने फैजान को भी इस की लत लगा दी थी. दिलदार तो इतना लती हो गया था कि जब उसे शराब नहीं मिलती तो वह नशे का इंजेक्शन लगा लेता था.

दोस्ती के नाते फैजान का दिलदार के घर आनाजाना लगा रहता था. घर आतेजाते ही एक रोज फैजान की नजर दिलदार की खूबसूरत भाभी जिकरा परवीन पर पड़ी. वह उसे चाहत भरी नजरों से देखता रहा और उस से रसभरी बातें करता रहा. जिकरा परवीन अब उस के दिल में रचबस गई थी और वह उस से प्यार करने लगा था.

खूबसूरती पर फिदा

जिकरा परवीन की खूबसूरती ने फैजान के दिल में हलचल मचा दी थी. अत: वह खिंचा हुआ उस के घर आ जाता था. जिकरा परवीन भी हंसतीबोलती थी. चूंकि दोनों ने आपस में देवरभाभी का रिश्ता बना रखा था, इसलिए उन में हंसीमजाक भी हो जाता था. एक रोज ऐसे ही हंसीमजाक के दौर में फैजान बोला, ”भाभी, तुम बहुत खूबसूरत हो. जी चाहता है कि…’’

फैजान के इतना कहने पर जिकरा परवीन ने मादक आंखों से उसे देखा और मुसकरा कर बोली, ”तुम्हारा क्या जी चाहता है फैजान?’’

”यही कि तुम्हारा चांद जैसा चेहरा हमेशा मेरी आंखों के सामने रहे.’’ फैजान ने दिल की बात जुबां पर ला दी.

”अच्छा,’’ जिकरा परवीन हंसने लगी, ”मैं तुम्हें इतनी हसीन लगती हूं.’’

”हां भाभी,’’ फैजान जिकरा परवीन का हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोला.

जिकरा परवीन का शौहर आमिर मध्य प्रदेश में पड़ा रहता था, अत: वह पुरुष सुख से वंचित थी. ऐसे में जवान फैजान का घर आना उस को अच्छा लगता था. उस की रसीली बातें उस के दिल में गुदगुदी पैदा करती थीं. अब उस की उमंगें भी छलांग मारने लगी थीं. वह भी फैजान की ओर आकर्षित होने लगी थी.

मौहम्मद फैजान और दिलदार के बीज जबरदस्त याराना था, लेकिन भाभी के साथ अवैध संबंधो ने जानी दुश्मन बना दिया

धीरेधीरे जिकरा परवीन और फैजान के दिल नजदीक आते गए. उन के बीच की दूरियां सिमटती गईं. एक रोज फैजान ने मुसकरा कर जिकरा परवीन की आंखों में देखा तो उन में उसे अजीब सी प्यास मचलती नजर आई. उस से रहा नहीं गया तो उस ने उसे बांहों में भर लिया. फिर तो तूफान तभी थमा, जब दोनों की हसरतें पूरी हुईं.

इस के बाद अकसर दोनों का मिलन होने लगा. दिलदार की बहन को भी फैजान का घर आना और बतियाना अच्छा लगता था. अत: वह भाभी की वफादार बन गई. वह भी फैजान को पसंद करती थी. वह फैजान के घर आनेजाने की जानकारी परिवार के किसी अन्य सदस्य को नहीं देती थी. जुलाई 2025 में दिलदार मध्य प्रदेश से आ कर घर में रहने लगा. आते ही दोनों के बीच दोस्ती फिर से कायम हो गई. दोनों की महफिल भी सजने लगी. कभीकभी फैजान और दिलदार की महफिल दिलदार के घर पर ही जम जाती. 2 महीने तक सब कुछ सामान्य रहा.

एक दिन दिलदार कुरैशी शाम को घर में दाखिल हुआ तो उस की नजर कमरे में बैठे मोहम्मद फैजान पर पड़ी. वह उस की भाभी जिकरा परवीन से हंसीठिठोली कर रहा था. जिकरा परवीन भी उस की बातों में सराबोर थी.

यह देख कर दिलदार का गुस्सा सातवें आसमान जा पहुंचा. वह दांत पीसते हुए बोला, ”भाभीजान, अपने यार से ही बतियाती रहोगी या फिर अपने देवर को भी चायपानी को पूछोगी.’’

दिलदार का कटाक्ष जिकरा परवीन के मन में कांटे की तरह चुभ गया. अत: वह गुस्से से बोली, ”कैसी बातें करते हो दिलदार? थोड़ा सोचसमझ कर बोला करो. मोहम्मद फैजान मेरा यार नहीं, गलीटोले के नाते देवर लगता है. वैसे भी फैजान तुम्हारा ही दोस्त है. तुम्हीं उस के साथ उठतेबैठते हो. गपशप लड़ाते हो और महफिल भी जमाते हो. दोष तुम्हारा और लांछन मुझ पर लगाते हो. उस का यहां आना तुम्हें इतना ही बुरा लगता है तो बेइज्जत कर के भगा दो, ताकि दोबारा इधर न आए.’’

”भाभीजान, तुम्हारी लोमड़ी वाली चाल को मैं अच्छी तरह समझता हूं. तुम चाहती हो कि मैं उस का बुरा बन जाऊं और तुम उस की भली बनी रहो. मैं भी उड़ती चिडिय़ा के पर गिन लेता हूं. तुम्हारे दिल में फैजान के लिए जो मोहब्बत है, उसे मैं अच्छी तरह जानता हूं. तुम्हारी ही वजह से यह बेशर्मों की तरह चला आता है. मुझ से मिलने का तो बहाना होता है.’’

दिलदार और जिकरा परवीन की बहस की भनक फैजान के कानों में पड़ी तो वह कमरे से निकल कर आंगन में आ गया और बोला, ”दिलदार भाई, लगता है तुम किसी से लड़ कर आए हो. इसलिए तुम्हारा मूड ठीक नहीं है और सारा गुस्सा भाभीजान पर उतार रहे हो. लेकिन दोस्त, तुम चिंता मत करो. तुम्हारा मूड ठीक करने के लिए मैं साथ में लालपरी लाया हूं. हलक में उतरते ही मूड ठीक हो जाएगा.’’

दिलदार कुरैशी शराब का लती था. फैजान ने शराब लाने की बात कही तो उस का सारा गुस्सा जाता रहा.

वह खुशी का इजहार करते हुए बोला, ”फैजान भाई, मैं भाभी से बहस नहीं कर रहा था, खानेपीने का सामान लाने की बात हो रही थी.’’ उस के बाद उस ने हांक लगाई, ”भाभीजान, कमरे में पानी, गिलास, नमकीन का इंतजाम कर दो. हम दोनों महफिल सजाएंगे.’’

देवर की हांक सुन कर जिकरा परवीन मन ही मन बुदबुदाई, ”कैसा देवर है. कुछ देर पहले चरित्र पर लांछन लगा रहा था, अपने दोस्त को भलाबुरा कह रहा था और अब देखो, शराब पार्टी की बात सुन कर कैसा गिरगिट की तरह रंग बदलने लगा है.’’

जिकरा परवीन ने कमरे में पानी, गिलास, नमकीन का इंतजाम किया. उस के बाद दिलदार और फैजान शराब पीने लगे. शराब पीते वक्त फैजान की निगाहें जिकरा परवीन पर ही टिकी रहीं. जिकरा परवीन भी मंदमंद मुसकरा कर फैजान का नशा बढ़ाती रही. दिलदार को मोहम्मद फैजान का घर आनाजाना नागवार लगता था, लेकिन गहरी दोस्ती के चलते वह फैजान से कुछ कह नहीं पाता था. हालांकि उस ने कई बार इस बाबत फैजान से टोकाटाकी की थी, लेकिन फैजान उस की बात अनसुनी कर जाता था.

दिलदार ने भाभी जिकरा परवीन को भी समझाया था और खानदान की इज्जत की दुहाई दी थी, लेकिन उस पर भी कोई असर नहीं पड़ रहा था. दिलदार कुरैशी को अब शक होने लगा था कि भाभी और दोस्त फैजान के बीच नाजायज रिश्ता है. दोनों मौका पा कर रंगरलियां मनाते हैं. शक का बीज दिलदार के मन में पड़ा तो उसे पनपते देर न लगी.

लेकिन शक के आधार पर वह कोई भी फैसला नहीं लेना चाहता था. वह दोनों को रंगेहाथ पकडऩा चाहता था, अत: वह चोरीछिपे दोनों पर नजर रखने लगा. उस ने अपना शक किसी को भी जाहिर नहीं होने दिया. अपनी योजना के तहत दिलदार कुरैशी ने 16 जनवरी, 2026 को बारीबारी से दोनों की हत्या कर दी और बहन को भी जख्मी कर दिया. इस के बाद पुलिस के समक्ष समर्पण कर दिया.

17 जनवरी, 2026 को पुलिस ने आरोपी दिलदार कुरैशी को फतेहपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखने तक आरोपी की बहन कानपुर के हैलट अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रही थी. Love Crime

 

 

Politics : क्रिकेट, सियासत, इश्क और इमरान

Politics : शर्मीले स्वभाव के इमरान खान ने क्रिकेट के मैदान में न सिर्फ अपनी अलग पहचान बनाई, बल्कि देश का नाम भी रोशन किया. राजनीति में उन्हें सफलता नहीं मिली, लेकिन अब 62 साल की उम्र में उन्होंने ऐसा कौन सा काम किया कि वह फिर से चर्चाओं में आ गए. बचपन से ही शर्मीले रहे इमरान खान जब 1982 में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के कप्तान बनाए गए थे, तब भी वह बहुत शर्मीले थे. यह बात उस समय देखने को मिलती थी,

जब वह टीम की बैठकों में बोलने से बचने की कोशिश करते थे. लेकिन यह बात उन के ताजे फैसले से मेल नहीं खाती, जिस के तहत उन्होंने टीवी पत्रकार और 3 बच्चों की मां रेहम खान से शादी कर ली. शर्मीले स्वभाव के 62 साल के इमरान खान के इस कदम पर उन के जानने वाले भी आश्चर्यचकित हो गए हैं.

इमरान खान के इस प्यार और शादी के मायने को उन के समर्थक उन के बहुआयामी व्यक्तित्व से जोड़ कर देखने लगे हैं. इमरान के पिता इकरामुल्लाह खान नियाजी लाहौर में सिविल इंजीनियर थे, जबकि मामा माजिद खान और जावेद के नाम अपने जमाने के कामयाब क्रिकेटरों में शुमार थे. इन्हीं से पे्ररणा लेते हुए इमरान का झुकाव भी क्रिकेट की तरफ हो गया था. निस्संदेह इमरान बेइंतहा खूबसूरत थे और आज 62 की उम्र में भी दिखते हैं. इस की वजह उन का पश्तून नियाजी शेरमनरवेल जनजाति का होना है, जो अपनी गोरी रंगत और कदकाठी के कारण जानीपहचानी जाती है. भारत में ऐसे लंबे व चौड़ी छाती वाले मुसलमानों के लिए बोलचाल में पठान शब्द का संबोधन किया जाता है.

इमरान का परिवार खासा प्रतिष्ठित था. पिता अधिकांश वक्त अपनी नौकरी में व्यस्त रहते थे. जिस के चलते वह अपनी मां शौकत खानम के काफी नजदीक थे. 4 बहनों के अकेले भाई इमरान की शुरुआती पढ़ाई लाहौर के सेंट्रल स्कूल में हुई थी. स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया, जहां उन्होंने रायल ग्रामर स्कूल वर्सेस्टर में दाखिला लिया. सन 1972 में उन्होंने औक्सफोर्ड के केबल कालेज से राजनीति, अर्थशास्त्र और दर्शनशास्त्र विषयों की पढ़ाई की. पढ़ाई के दौरान भी उन पर क्रिकेट का जुनून हावी रहा. जब भी मौका मिलता, वह मैदान में अभ्यास करने चले जाते थे.

लगातार अभ्यास से इमरान का प्रदर्शन भी निखर रहा था. पाकिस्तान में रहते उन्होंने 16 साल की उम्र में प्रथम श्रेणी का मैच खेला था. इसी दौरान वह अपनी घरेलू टीम लाहौर-ए, लाहौर-बी और लाहौर ग्रींस से भी खेले थे, लेकिन उन्हें बड़ा मौका सन 1973 में मिला, जब वह औक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की ब्लू क्रिकेट टीम के लिए चुने गए. 70 के दशक में 2 प्रमुख एशियाई देशों भारत व पाकिस्तान में क्रिकेट का बुखार शवाब पर था. 1971 से 1976 तक इमरान ने काउंटी क्रिकेट खेला, जहां से उन की पहचान एक मध्यम तेज गेंदबाज की बनी. पाकिस्तान आ कर वह दाऊद इंडस्ट्रीज के अलावा पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस के लिए खेले.

गरदन तक झूलते बाल, असामान्य लंबा कद, सिकुड़ी मगर बोलती आंखें और रौबदार चेहरा उन की पहचान बन चुका था. इमरान ऐसे युवा थे, जो पाश्चात्य संस्कृति और इस्लामिक परंपराओं की कशमकश में फंसे थे. वह दोनों संस्कृतियों से प्रभावित थे. पश्चिम का खुलापन उन की आंखों को लुभाता था तो वहीं पाकिस्तान की बंदिशें दिमाग को हिलाती थीं. 1971 में पाकिस्तानी टीम की तरफ से उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ अपना पहला टेस्ट मैच बर्मिंघम में खेला. उन की शुरुआत भले ही उल्लेखनीय नहीं रही, लेकिन उन का व्यक्तित्व क्रिकेट प्रेमियों के दिलोदिमाग पर छा गया था. उन की तेज गेंदों से दुनिया भर के बल्लेबाज खौफ खाने लगे थे.

दरअसल वह एशिया के पहले तेज गेंदबाज थे, जिस के पास गति के साथ दिशा भी थी और उस के लिए 4 फील्डर तक स्लिप में तैनात किए जाते थे. गेंद को हवा में स्विंग कराने की कला में वह माहिर हो गए थे. इमरान के खेल का रंग अब दुनिया में जमने लगा था. हालांकि उन्हें बल्लेबाजी के लिए छठवें नंबर पर भेजा जाता था. उस क्रम में भी उन्होंने कई दफा अच्छे रन बटोरे जिस से उन्हें आल राउंडर कहा जाने लगा और उन की तुलना इंग्लैंड के हरफनमौला खिलाड़ी इयान बौथम से की जाने लगी. यह बात उन के लिए बड़े ही गर्व और उपलब्धि वाली थी. उस समय पाकिस्तानी टीम और क्रिकेट, दोनों जावेद मियांदाद के नाम से जाने पहचाने जाते थे.

जावेद आक्रामक बल्लेबाज तो थे ही, साथ ही उद्दंड भी थे. इस के विपरीत इमरान का शर्मीलापन उन्हें नम्र साबित करता था. डे्रसिंगरूम में भी इमरान अकसर अकेले रहते थे. इंग्लैंड के दिग्गज क्रिकेटर कैरी पैकर ने जब वर्ल्ड क्रिकेट शृंखला की शुरुआत की थी, तब इमरान भी उन के कैंप में शामिल हुए थे. कैरी पैकर ने समानांतर क्रिकेट शुरू कर दुनिया भर को हिला दिया था. कैरी कैंप में जाने से भी इमरान का नाम कामयाब खिलाडि़यों में शुमार किया जाने लगा था, मगर एक तेज गेंदबाज की मुहर उन के नाम पर साल 1978 में लगी. पर्थ में तेज गेंदबाजों की एक प्रतियोगिता में उन्होंने 139.7 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गेंद फेंकी. यह गति तत्कालीन तेज गेंदबाजों आस्ट्रेलिया के जियाफ थौमसन और वेस्टइंडीज के माइकल होल्डिंग से कम थी, लेकिन डेनिस लिली और एंटी राबर्ट्स से ज्यादा थी.

2 साल के अंदर ही इमरान खान एक विश्वस्तरीय क्रिकेटर के रूप में स्थापित हो चुके थे. उन की सफलता से पाकिस्तानी टीम का भी आत्मविश्वास बढ़ गया था. विरोधी टीम में इमरान के नाम की खासी दहशत रहती थी. उन की काबिलियत को देखते हुए सन 1982 में उन्हें पाकिस्तानी क्रिकेट टीम की कप्तानी सौंपी गई. इस पर दुनिया भर के समीक्षक, विश्लेषक और खिलाड़ी हैरान रह गए कि जावेद मियांदाद जैसे सधे कप्तान की जगह इमरान को लाना कहीं जल्दबाजी तो नहीं. मगर यह जल्दीबाजी नहीं, वक्त की जरूरत थी. जल्दी ही इमरान ने इस फैसले को सही ठहराते हुए अंगे्रजों को 28 साल बाद उन की ही धरती पर हराने का श्रेय ले लिया.

कैरियर की सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजी भी उन्होंने कप्तान रहते हुए श्रीलंका के खिलाफ 1982 में लाहौर में की थी. जब महज 58 रन दे कर उन्होंने 8 विकेट झटके थे. इस शृंखला में इमरान ने तूफानी बल्लेबाजी भी की थी. इसी साल अपने परंपरागत प्रतिद्वंद्वी भारत के खिलाफ भी उन्होंने 6 टेस्ट मैचों में 40 विकेट ले कर चमत्कारिक प्रदर्शन किया था. इसी दौरान इमरान की पिंडली में फ्रैक्चर हो गया, जिस की वजह से उन्हें तकरीबन ढाई साल तक क्रिकेट से दूर रहना पड़ा. फ्रैक्चर इतना घातक था कि शुरू में डाक्टरों ने उन की वापसी की उम्मीद छोड़ दी थी. लेकिन यह इमरान की क्रिकेट के प्रति लगन और दृढ़ इच्छाशक्ति ही थी कि 1984 में उन्होंने शानदार वापसी की.

1987 का वर्ल्ड कप भारत पाकिस्तान ने संयुक्त मेजबानी में आयोजित किया था, जिस से पूरा एशिया रोमांचित था. उम्मीद और चर्चा यह थी कि कोई मेजबान देश ही यह खिताब हासिल करेगा. इस में भारत की संभावनाएं ज्यादा थीं, क्योंकि कपिल देव के नेतृत्व में 1983 का वर्ल्ड कप जीतने के बाद उस के हौसले बुलंद थे. लेकिन दोनों ही मेजबान टीमें सेमीफाइनल के आगे नहीं पहुंच पाईं. पाकिस्तानी टीम की उस हार और प्रदर्शन से इमरान इतने हताश हो गए थे कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने की घोषणा कर दी. इमरान द्वारा लिए गए इस फैसले से उन के समर्थकों को बड़ा धक्का लगा. साथ ही सरकार भी सोचने के लिए मजबूर हो गई, क्योंकि उस समय हालात यह थे कि इमरान खान के बिना पाकिस्तान क्रिकेट की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी.

राष्ट्रपति जियाउल हक के आग्रह पर इमरान खान ने दोबारा कप्तानी संभाली और पाकिस्तान क्रिकेट को फिर एक बेहतर मुकाम पर ला खड़ा किया. यह विश्व क्रिकेट का पहला मौका था, जब किसी राष्ट्रपति ने खिलाड़ी से खेलते रहने का आग्रह किया था. इमरान का प्रदर्शन भी पहले के मुकाबले काफी अच्छा हो गया था. जिस का परिणाम यह रहा कि 1988 का वेस्टइंडीज का दौरा भी इमरान के नाम रहा. वहां उन्होंने 3 टेस्ट मैचों में 23 विकेट लेने का कारनामा कर दिखाया था, जिस में  वह मैन औफ द सीरीज रहे थे.

यह इमरान के क्रिकेट जीवन का उत्तरार्ध था, जो क्रिकेट की भाषा में स्वर्णिम ही कहा जाएगा. क्योंकि उसी दौरान सन 1992 में उन के नेतृत्व में वर्ल्ड कप पाकिस्तान ने जीता तो रातोंरात इमरान महानायक बन गए थे. अब तक क्रिकेट से परे इमरान के व्यक्तिगत जीवन में चर्चा लायक कोई बड़ा विवाद नहीं था. लेकिन भारतीय फिल्म अभिनेत्री जीनत अमान से कथित रोमांस करने पर वह चर्चाओं में आ गए. जीनत अमान अपने वक्त की बिंदास अभिनेत्री थीं, जिस ने परंपरागत भारतीय स्त्री की छवि को फिल्मों के जरिए छोड़ा था. राजकपूर की ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ फिल्म में किए गए अभिनय को दर्शक कभी नहीं भुला सकते.

इमरान जीनत का रोमांस कथित हो कर रह गया, क्योंकि इन संबंधों का दोनों ने न कभी खंडन किया और न ही स्वीकारा. इसी दौरान यह भी चर्चा होने लगी कि कालेज जीवन में बेनजीर भुट्टो से उन की शादी होने वाली थी. इमरान 40 साल के हो चुके थे, लेकिन अविवाहित थे. लोगों में इस बात की जिज्ञासा पैदा हो गई कि वे शादी क्यों नहीं कर रहे? 1992 का साल क्रिकेटर इमरान के लिए उपलब्धियों के साथसाथ विवादों से भी भरा रहा. विश्वकप जीतने के बाद उन्होंने जो भाषण दिया, वह विवादित था. भाषण में उन्होंने क्रिकेट से ज्यादा अपने भविष्य की बातें कही थीं, जिन में प्रमुख थीं खुद के द्वारा कैंसर अस्पताल बनाया जाना. पूरे भाषण को इमरान ने खुद पर केंद्रित रखा तो पाकिस्तान में उन का विरोध भी शुरू हो गया.

चूंकि इमरान क्रिकेट से संन्यास लेने की घोषणा कर चुके थे, इसलिए उन्होंने अपनी आलोचनाओं पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि वह और आक्रामक हो कर दूसरे रूप में सामने आए. वह समाजसेवा में जुट गए. विवादों और विरोधाभासों के बीच उन्हें उसी साल पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान हिलाल-ए-इम्तियाज से सम्मानित किया. 1995 तक इमरान समाजसेवा में लगे रहे. क्रिकेट से वह कट चुके थे, लेकिन विभिन्न समाचार पत्रों में स्तंभ लिखने और क्रिकेट कमेंट्री करने का उन का सिलसिला जारी रहा. इसी बीच उन की मां शौकत खानम की मृत्यु हो गई, जिस से वह काफी व्यथित रहने लगे थे.

इमरान ने कैंसर पीडि़तों की मदद करने के लिए एक धर्मार्थ संस्था शौकत खानम मेमोरियल ट्रस्ट की स्थापना की. इस ट्रस्ट के लिए इमरान ने क्रिकेट की अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा तो लगाया ही, साथ ही लोगों से सार्वजनिक रूप से चंदा भी इकट्ठा किया. इमरान यूनिसेफ के लिए खेलों के विशेष प्रतिनिधि तो रह ही चुके थे, साथ ही उन्हें पाकिस्तान, श्रीलंका और थाईलैंड में स्वास्थ्य व टीकाकरण कार्यक्रम का ब्रांड एंबेसेडर भी बनाया गया.

लेकिन इतने से वह संतुष्ट और खुश नहीं थे. अब तक वह काफी दौलत और शोहरत कमा चुके थे, लेकिन एक छटपटाहट उन के भीतर थी. बदलाव की जो चाहत या हसरत उन के दिल में थी, उस के पूरे होने का रास्ता सियासत से हो कर ही जाता था. इस के लिए वह खुद को पुख्ता करना चाहते थे. उन्होंने एक तकनीकी महाविद्यालय भी स्थापित किया. उन के द्वारा किए गए काम चर्चित हुए, लेकिन चर्चा की मियाद पानी के बुलबुले सरीखी थी. इसी बीच उन्होंने अपनी शादी का ऐलान कर डाला. उन की शादी की खबर महत्त्वपूर्ण इसलिए हो गई थी, क्योंकि उन की होने वाली पत्नी मुसलमान नहीं, बल्कि ईसाई थी. उस का नाम था जेमिमा गोल्ड स्मिथ. जेमिमा एक खूबसूरत युवती थी और बेहद आकर्षक और अल्हड़ रोमांटिक मिजाज की.

यह शादी दुनिया भर में चर्चा का विषय रही थी. जिस की कई वजहें थीं, जिन में पहली वजह उन की उम्र का बड़ा अंतर था. इमरान तब 42 साल के थे और जेमिमा महज 21 साल की थी. बेहद संपन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि की मालकिन जेमिमा इस हद तक इमरान पर मरती थी कि उस ने इमरान की धर्म परिवर्तन की शर्त झट से कुबूल कर ली थी. दिलचस्प बात यह थी कि 16 मई, 1995 को शादी के दिन ही उस ने पेरिस में इमरान के साथसाथ इसलाम भी अपना लिया था.

इस शादी पर कानूनी मुहर 21 जून, 1995 को लगी. दोनों ने इंग्लैंड में रिचमंड रजिस्टर औफिस में कानूनी तौर पर भी एकदूसरे को अपना लिया. यूरोपियन संस्कृति में पलीबढ़ी जेमिमा बहुत ज्यादा परिपक्व नहीं थी. उस के पास जिंदगी और दुनिया का महज 21 साल का तजुर्बा था. वह एक उम्रदराज दिग्गज क्रिकेटर की दीवानी थी और उसे पति के रूप में पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार थी, इसलिए उस ने अपना धर्म परिवर्तन कर लिया था. लेकिन आने वाली दुश्वारियों का अंदाजा उसे नहीं था. हालांकि 1996 में उस ने पहले बेटे सुलेमान को जन्म दिया और 1999 में दूसरा बेटा कासिम हुआ. जेमिमा गोल्डस्मिथ ने इसलाम और पाकिस्तान के तौर तरीकों से तालमेल बैठाने की बहुत कोशिश की. लेकिन वह खुद को सहज नहीं पा रही थी.

इमरान के लिए यह वाकई कठिन वक्त था, जेमिमा अपनी मरजी से बारबार इंग्लैंड चली जाती थी. यह बात इमरान को पसंद नहीं थी. लिहाजा इसी बात पर दोनों के बीच अनबन और खटपट शुरू हुई, जो साल 2004 में तलाक पर जा कर खत्म हुई. रसूखदार और संपन्न घराने की जेमिमा को लगा हो या न लगा हो, पर इमरान को उस तलाक से सदमा लगा था. अब इमरान के बारे में इन खबरों को मीडिया तूल देने लगा था कि 1990 में ब्रिटेन के एक कूटनीतिज्ञ की बेटी सीता व्हाइट द्वारा उन पर लगाया यह आरोप सच था कि वह उस की बेटी टीरियन के पिता हैं. इस आरोप को इमरान ने सार्वजनिक रूप से नकार दिया था, लेकिन सीता अदालत तक जा पहुंची.

अदालत में उस ने इस आरोप को साबित भी कर दिया. इस के बाद इमरान ने भी सच स्वीकारने में भलाई समझी थी. इस से इमरान की अब तक की पाकसाफ इमेज धूमिल हो गई. जेमिमा से तलाक के बाद इमरान अपने बेटों से मिलने जाते रहे, लेकिन वे स्वाभाविक तौर पर मां के ज्यादा करीब थे, इसलिए उन्हें बेटों का रूखापन ही मिला. अब उन पर उम्र भी हावी होती दिख रही थी. गालों पर पड़ती झुर्रियां इस की गवाही देने लगी थीं. एक वक्त ऐसा भी आया कि लोगों ने इमरान पर ध्यान देना कम कर दिया.

इमरान अब अकेले थे. लिहाजा उन्होंने एक और चौंका देने वाला फैसला राजनीति में आने का कर डाला. सियासी शुरुआत धमाकेदार रही. इमरान ने बहाव के विपरीत जाने का रास्ता चुनते हुए सत्ताधारी नेताओं की खिंचाई शुरू कर दी. परवेज मुशर्रफ और आसिफ अली जरदारी उन के निशाने पर रहते थे.  ब्रिटेन और खासतौर से अमेरिकी विदेश नीति की इमरान ने जम कर आलोचना की लोगों ने इस का स्वागत किया. फिर क्या था, देखते ही देखते इमरान सरकार विरोधी वक्तव्य देने वाले नेता बन गए. उन से युवा तो सहमत हुए ही, साथ ही महिलाएं भी प्रभावित होने लगीं. पाकिस्तान के कट्टरपंथियों ने उन के पश्चिम विरोधी बयानों को हाथोंहाथ लिया.

लोकप्रियता मिलते देख इमरान ने अपने समर्थकों की भीड़ इकट्ठा कर 21 अप्रैल, 1998 को पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ (पीटीआई) नाम की राजनीतिक पार्टी बना डाली. उन्होंने नारा दिया ‘न्याय, मानवता और आत्मसम्मान’. पीटीआई का हल्ला खूब मचा, लेकिन चुनावी असफलताओं ने यह साबित कर दिया कि जनता इमरान के साथ नहीं है, वह गुजरे कल के एक कामयाब और लोकप्रिय क्रिकेटर को देखने के लिए ही इकट्ठा होती है. यह बात सन 2002 के आम चुनावों में साबित भी हो गई, जब पीटीआई को पूरे 1 फीसदी वोट भी नहीं मिले और 272 सीटों में से वह केवल एक ही सीट जीत पाई. वह सीट भी खुद इमरान की मियांवाली की थी.

जल्द ही इमरान की छवि अमेरिका विरोधी नेता की हो गई. जिस का एक मतलब यह भी निकाला जाने लगा कि वह कट्टर मुसलिम हैं. इस के बाद इमरान खुलेआम कहने लगे थे कि पाकिस्तान अमेरिका का गुलाम हो चला है. इन बयानों की पाकिस्तान में मिलीजुली प्रतिक्रिया हुई. इमरान इस से और उत्साहित हुए और इतने हुए कि मार्च, 2006 में अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश के पाकिस्तान दौरे का उन्होंने विरोध करने की ठान ली. लेकिन मुशर्रफ सरकार ने जार्ज बुश के दौरे के समय इमरान को इस्लामाबाद में उन के घर में नजरबंद कर दिया. इस से इमरान और सुर्खियों में आए.

2007 में परवेज मुशर्रफ ने इमरजेंसी लगाई तो इमरान खान सब से पहले नजरबंद किए जाने वाले नेताओं में से एक थे. मुशर्रफ की निगाह में वह एक देशद्रोही थे, जिस की सजा मृत्युदंड थी. कोई अनहोनी होती इस के पहले ही इमरान अचानक पाकिस्तान से गायब हो गए और लंबे वक्त तक फरार रहे. हालात सामान्य हुए तो वह फिर से पाकिस्तान लौट आए. वह कभी लोकतंत्र की बात करते तो कभी कट्टरवाद की. कई मौके ऐसे भी आए, जिन से उन का मौकापरस्त होना साबित हुआ. क्रिकेट के मैदान पर राज करने वाले इमरान राजनीति में गच्चा खा गए. वह चर्चित तो हुए पर सफल नहीं हो पाए. जिस से उन्हें एक सफल और स्पष्ट विचारधारा वाला नेता नहीं माना गया.

इसी बीच 62 साल के इमरान खान की रेहम खान नाम की एक टीवी पत्रकार से शादी की अफवाहें उड़ने लगीं, जिन का उन्होंने कभी खंडन नहीं किया. जेमिमा से तलाक के बाद राजनैतिक जीवन में आने पर वह अकसर कहा करते थे कि अब शादी तभी करूंगा, जब नया पाकिस्तान बना लूंगा. नया पाकिस्तान तो नहीं बना, लेकिन दिसंबर, 2014 में उन्होंने रेहम से शादी कर ली. यह भी दिलचस्पी की बात है कि इमरान से तलाक के बाद जेमिमा पत्रकारिता करने लगी थीं और रेहम खान पहले से ही टीवी पत्रकार थीं. वह बीबीसी की एंकर थीं और इन दिनों वह डान न्यूज में कार्यरत हैं. 41 साल की रेहम खान 3 बच्चों की मां हैं और अपने डाक्टर पति से तलाक ले चुकी हैं.

लीबिया में जन्मी रेहम के मातापिता पाकिस्तानी हैं और पिछले साल पाकिस्तान में बसने से पहले वह लंदन में रहती थीं. दिलचस्प इत्तफाक यह है कि दूसरी बार भी इमरान और दूसरी पत्नी रेहम खान के बीच उम्र का फर्क 21 साल का है. नवाज शरीफ का भी सार्वजनिक विरोध करते रहने वाले इमरान का भविष्य और अगला कदम क्या होगा, इस का अंदाजा कोई नहीं लगा पा रहा है. इमरान के बचेखुचे समर्थक उन के इस फैसले से पूरी तरह खुश नहीं हैं, वजह रेहम का पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होना भी है, जिस के तहत वह भड़काऊ पोशाकें पहनती हैं. स्थिरता और इमरान, नदी के 2 पाटों की तरह हैं, जो कभी आपस में मिलते नहीं. क्रिकेट, समाजसेवा और राजनीति के अलावा इमरान अब इश्क और शादियों के लिए भी जाने जाने लगे हैं.

62 की उम्र में शादी पर ऐतराज जताना उन के साथ ज्यादती होगी, पर उन की पार्टी का भविष्य खतरे में है. इमरान को नजदीक से जानने वालों को इस बात की आशंका है कि कहीं वह बीवीबच्चों के साथ सुकून से रहने के लिए राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान कर के सभी को फिर से चौंका न दें. Politics