एक और युग का अंत – भाग 1

महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर के थाना खकड़गंज के अंतर्गत आने वाली गुरुवंदन सोसायटी में रहने वाले डा. मुकेश चांडक के परिवार में पत्नी डा. प्रेमल चांडक के अलावा 2 बेटे ध्रुव और युग थे.

11 साल का ध्रुव छठवीं कक्षा में पढ़ता था तो 8 साल का युग तीसरी कक्षा में. मुकेश चांडक और प्रेमल चांडक दोनों ही दांतों के अच्छे डाक्टर थे, इसलिए उन की क्लिनिक भी बहुत अच्छी चलती थी.

उन की क्लिनिक भले ही सोसायटी से मात्र 5 मिनट की दूरी पर सैंट्रल एवन्यू रोड पर स्थित दोसर भवन चौराहे पर थी, लेकिन पतिपत्नी इतने व्यस्त रहते थे कि डा. मुकेश चांडक तो सुबह के गए देर रात को ही घर आ पाते थे, जबकि डा. प्रेमल को बच्चों को भी देखना होता था, इसलिए उन्हें बच्चों के लिए समय निकालना ही पड़ता था.

पति के अति व्यस्त होने की वजह से घरपरिवार की सारी जिम्मेदारी डा. प्रेमल चांडक को ही निभानी पड़ती थी, जिसे वह बखूबी निभा भी रही थीं. पत्नी की ही वजह से डा. मुकेश चांडक निश्चिंत हो कर सुबह से ले कर देर रात तक अपनी क्लिनिक पर बैठे रहते थे. उन का भरापूरा परिवार तो था ही, ठीकठाक आमदनी होने की वजह से वह सुखी और संपन्न भी थे.

पढ़ालिखा परिवार था, इसलिए बच्चे भी अपनी उम्र के हिसाब से कुछ ज्यादा ही होशियार और समझदार थे. दोनों भाई वाठोड़ा के सैंट्रल प्वाइंट इंगलिश स्कूल में पढ़ते थे. डा. प्रेमल चांडक को भले ही दोगुनी मेहनत करनी पड़ती थी, लेकिन वह भी खुश थीं. घर की जिम्मेदारी निभाने के साथसाथ वह क्लिनिक की जिम्मेदारी निभा रही थीं.

उस दिन डा. प्रेमल चांडक बच्चों के स्कूल से आने के समय क्लिनिक से घर लौट रही थीं तो सोसायटी के गेट पर खड़े सिक्योरिटी गार्ड ने जब उन्हें युग का स्कूल बैग थमाया तो उन्होंने गार्ड से पूछा, ‘‘युग कहां है?’’

‘‘शायद वह क्लिनिक पर गया होगा, क्योंकि बैग देते समय उस ने कहा था कि वह पापा के पास जा रहा है.’’ गार्ड ने कहा.

यह कोई नई बात नहीं थी. अक्सर वह सिक्योरिटी गार्ड को बैग दे कर क्लिनिक पर चला जाता था और वहां कंप्यूटर पर गेम खेलता रहता था. इसलिए डा. प्रेमल ने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया और यह सोच कर घर के कामों में लग गईं कि गेम खेल कर युग स्वयं ही समय पर घर आ जाएगा.

लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद भी युग घर नहीं आया तो डा. प्रेमल को हैरानी हुई. क्योंकि अब उन के भी क्लिनिक जाने का समय हो रहा था. युग जब क्लिनिक पर जाता था, उन के जाने के पहले ही आ जाता था. उन्होंने बड़े बेटे ध्रुव से उस के बारे में पूछा तो वह भी कुछ नहीं बता सका. बच्चा छोटा था, इसलिए प्रेमल घबरा गईं. उन्होंने पति को फोन किया तो पता चला कि युग वहां नहीं है.

डा. प्रेमल को लगा कि वह सोसायटी के अपने किसी दोस्त के यहां चला गया होगा. उन्होंने उस की तलाश सोसायटी में की. वह सोसायटी में भी नहीं मिला तो सोसायटी के गेट पर ड्यूटी पर तैनात सिक्योरिटी गार्डों से एक बार फिर उन्होंने उस के बारे में पूछा. वे भी युग के बारे में कुछ नहीं बता सके. जब युग का कहीं कुछ पता नहीं चला तो उन्हें घबराहट होने लगी.

बेटे के इस तरह अचानक गायब हो जाने से डा. प्रेमल रोने लगीं. यही हाल ध्रुव का भी था. बेटे के गायब होने की सूचना पा कर डा. मुकेश चांडक भी घर आ गए थे. उन्होंने सांत्वना दे कर पत्नी तथा बेटे को चुप कराया और खुद युग की तलाश में लग गए. उन का सोचना था कि छोटा सा बच्चा सोसायटी और क्लिनिक के अलावा और कहां जा सकता है.

डा. मुकेश चांडक के साथ घर के नौकर चाकर और सोसायटी के कुछ लोग भी युग की तलाश में लगे थे. जैसेजैसे समय बीत रहा था, सब की घबराहट बढ़ती जा रही थी. लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी जब युग के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो डा. मुकेश चांडक भी रो पड़े.

पूरी रात डा. मुकेश चांडक और उन के शुभचिंतक युग की तलाश करते रहे. जब इस तलाश का कोई लाभ नहीं मिला तो सलाह कर के तय किया गया कि अब पुलिस की मदद लेनी चाहिए. इस के बाद डा. मुकेश पत्नी और अपने कुछ शुभचिंतकों के साथ थाना लकड़गंज पहुंचे. थानाप्रभारी इंसपेक्टर एस.के. जैसवाल को युग का सारा विवरण दे कर उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी गई.

मामला हाईप्रोफाइल परिवार से जुड़ा था, इसलिए थानाप्रभारी इंसपेक्टर एस.के. जैसवाल ने तुरंत इस बात की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को देने के साथसाथ पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी. बच्चे की गुमशुदगी की सूचना मिलते ही पुलिस कमिश्नर के.के. पाठक और एडिशनल पुलिस कमिश्नर निर्मला देवी थाना लकड़गंज पहुंच गईं.

दोनों ही पुलिस अधिकारियों ने तत्काल नागपुर शहर के सभी थानों के थानाप्रभारियों को बुला कर मीटिंग की और जांच की एक रूपरेखा तैयार की. सिर्फ रूपरेखा ही नहीं तैयार की गई, बल्कि बच्चे की तलाश की जिम्मेदारी शहर के सभी थानों की पुलिस को सौंप दी गई. इस की वजह यह थी कि इस के पहले कुश कटारिया और हरेकृष्ण ठकराल की अपहरण कर के हत्या कर दी गई थी.

इस के बाद शहर में जिस तरह हंगामा होने के साथ पुलिस की किरकिरी हुई थी, वैसा कुछ पुलिस युग चांडक के मामले में नहीं होने देना चाहती थी. इसी वजह से शहर के सभी थानों की पुलिस, पुलिस अधिकारियों के निर्देशन में युग चांडक की तलाश में सरगर्मी से लग गई.

डा. मुकेश चांडक संभ्रांत और प्रतिष्ठित आदमी थे. उन की आर्थिक स्थिति भी काफी मजबूत थी. इस बात की जानकारी उन के नौकरोंचाकरों को ही नहीं, सोसायटी में काम करने वाले अन्य नौकरों तथा सिक्योरिटी गार्डों को भी थी. इस से पुलिस को यही लगा कि डा. मुकेश के बेटे युग का अपहरण या तो फिरौती के लिए किया गया है या फिर किसी ने दुश्मनी निकालने के लिए उसे उठा लिया है.

वैसे ज्यादा संभावना यही थी कि किसी ने मोटी रकम वसूलने के लिए युग का अपहरण किया है. लेकिन जब तक फिरौती के लिए कोई फोन न आ जाए, तब तक इस बात पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता था. पुलिस इस बात पर विचार कर ही रही थी कि अपहर्त्ता का फोन आ गया. उस ने युग को सकुशल रिहा करने के लिए डा. मुकेश चांडक से 15 करोड़ रुपए मांगे थे.

अपहरण का मामला सामने आते ही पुलिस अधिकारियों के कान खड़े हो गए. इस के बाद सभी पुलिस अधिकारी अपनेअपने अनुभव के अनुसार अपने सहयोगियों के साथ मिल कर अपहर्त्ताओं के बारे में जानकारी जुटाने में लगे. लेकिन इस मामले में कामयाबी मिली थाना गणेशपेठ के थानाप्रभारी सुधीर नंदनवार को. उन्होंने मात्र 12 घंटे में अपहर्त्ताओं को दबोच लिया था.

अपहर्त्ता का फोन आते ही थाना गणेशपेठ के थानाप्रभारी इंसपेक्टर सुधीर नंदनवार सतर्क हो गए थे. उन्होंने अपने सहायक असिस्टैंट इंसपेक्टर अनिल ताकसंदे, प्रदीप नागरे, योगेश छापेकर, मधुकर शिर्कें, प्रवीण गोरटे, राजेश ताप्रे, नीलेश धैवट और किशोर ताकरे को मिला कर अपनी एक टीम बनाई और अपहर्त्ता की तलाश में निकल पड़े.

गोवा की खौफनाक मुलाकात – भाग 1

नईनवेली मनपसंद दुलहन साथ हो तो दुनिया की हर शय, हर नजारा, हर जगह खूबसूरत लगने लगती है. मौका हनीमून का हो और जगह गोवा का  समुद्र तट तो फिर तो कहने ही क्या. …बलखाती समुद्र की लहरें. शीतल मंद बयार में झूमते नारियल के पेड़. छतरीदार पेड़ों से छन कर आए चुलबुले बालकों की तरह धरती पर लोटते धूप के टुकड़े. कहीं रंगीन रेस्तराओं के बाहर बड़ेबड़े छातों के नीचे गोल मेज के इर्दगिर्द सिमटे देशीविदेशी पर्यटक तो कहीं समुद्र किनारे खुले आसमान के नीचे रेत पर मस्ती में लेटी अर्धनग्न विदेशी सुंदरियां.

कहीं सजीधजी नावों और स्टीमरों पर समुद्र की सैर करते सैलानी तो कहीं समुद्र तटों पर हंसीठिठोली के साथ नहाते युवकयुवतियां. मस्ती ही मस्ती. ऊपर से मौसम अगर वसंत का हो तो फिर कहना ही क्या. सुबह की बेला में उगते सूरज का मनोहारी दृश्य हो या शाम के सूर्यास्त का समां, रंगरंगीले गोवा का हर दृश्य देख तनमन में मस्ती की लहर दौड़ जाती है. लगता है जैसे धरती पर स्वर्ग उतर आया हो.

अनुज और सोनम जब हनीमून मनाने गोवा पहुंचे तो उन्हें भी ऐसा ही लगा जैसे स्वर्ग में आ गए हों. कहां दिल्ली की शोरशराबे और प्रदूषण से आजिज मशीनी जिंदगी और कहां गोवा का सौंदर्य और शांति. आधे से अधिक दिन तो मुंबई से गोवा पहुंचने में ही निकल गया था. शाम को अंजुना बीच पर थोड़ा घूमने और समुद्र की चंचल लहरों के साथ थोड़ी मस्ती करने के अलावा उस दिन वे गोवा की रंगीन फिजाओं का ज्यादा आनंद नहीं ले सके.

लेकिन अगले दिन उन्होंने मनमाफिक मस्ती में गुजारा. गोवा में वह सब तो था ही जो मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों में होता है— एक से एक बढि़या रेस्तरां, क्रीड़ागृह, बड़ेबड़े होटल, बार, डिस्कोथेक और सजीधजी दुकानें. लेकिन दिल को मोहने वाले प्राकृतिक नजारों के अलावा वहां बहुत कुछ ऐसा भी था, जो दिल्ली या मुंबई जैसे महानगरों में नहीं होता.

मसलन केरल की नावों जैसे फ्लोटिंग पैलेस (तैरते महल), बलखातीं लहरें, दूर तक फैली रेत, हवा में झूमते झुकेझुके नारियल के पेड़ और बसंती बयार के साथ खेलती खिलीखिली चमकीली धूप. उस दिन उन दोनों ने खूब सैरसपाटा किया. लहरों से खेले, बीच पर नहाए, रेत में लेटे और बीच पर खुले रेस्तरां में खाना खाया.

अनुज और सोनम की शादी एक महीना पहले हुई थी. अनुज दिल्ली का रहने वाला था जबकि सोनम सिरसा, हरियाणा के एक संपन्न परिवार की बेटी. अनुज और सोनम की शादी दोनों परिवारों की सहमति से खूब धूमधाम से हुई थी.

अनुज के पिता चंद्रप्रकाश का दिल्ली में अपना व्यवसाय था. उन के 2 बेटों अनुज और नमित में अनुज बड़ा था. उस ने दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रैजुएशन किया था. पढ़ाई पूरी कर के वह पिता के काम में हाथ बंटाने लगा था. अनुज और सोनम को हनीमून के लिए गोवा जाना है, यह शादी के बाद ही तय हो गया था. रिजर्वेशन सहित उन के जाने की पूरी तैयारी कर दी गई थी.

अनुज के रिश्ते के एक चाचा विजयकरण मुंबई में रहते थे. अनुज और सोनम को मुंबई स्थित उन के घर जा कर रुकना था और वहां से गोवा जाना था. गोवा में उन के ठहरने और घूमने के लिए कार का इंतजाम करने की जिम्मेदारी विजयकरण ने ले रखी थी.

अनुज और सोनम दिल्ली से राजधानी एक्सप्रेस पकड़ कर मुंबई पहुंचे और अंधेरी स्थित विजयकरण के घर ठहरे. वहां इस नवदंपति का खूब स्वागत हुआ. विजयकरण ने अनुज और सोनम के मुंबई घूमने के लिए कार और ड्राइवर का इंतजाम कर दिया था. 3 दिन तक पतिपत्नी मुंबई की खासखास जगहों पर घूमे.

3 दिन मुंबई में रुकने के बाद अनुज और सोनम को गोवा जाना था. गोवा में विजयकरण के एक दोस्त विनोद अत्री सरकारी नौकरी में बड़े पद पर तैनात थे. विजयकरण ने उन्हें फोन कर के दोनों के लिए सेंट पैड्रो क्षेत्र में स्थित होटल में कमरा बुक करा दिया था.

साथ ही उन्होंने अपने दोस्त विनोद को कह भी दिया था कि वे बच्चों के घूमने के लिए कार और ड्राइवर का इंतजाम कर दें. अनुज को उन्होंने विनोद अत्री का फोन नंबर दे कर समझा दिया था कि गोवा पहुंच कर वह अपने वहां पहुंचने की सूचना उन्हें दे दे. वे कार और ड्राइवर भेज देंगे.

अनुज और सोनम बस द्वारा गोवा के लिए रवाना हो गए. उस समय उन के पास 50 हजार रुपए नकद और लगभग 2 लाख रुपए के जेवरात थे. गोवा के सेंट पैड्रो इलाके के एक होटल में अनुज और सोनम के लिए कमरा बुक था. बस से उतर कर वे सीधे होटल पहुंच गए और जाते ही विनोद अत्री को फोन कर दिया.

विनोद ने दोनों के घूमने के लिए ड्राइवर सहित कार भेज दी. उस दिन शाम को अनुज और सोनम अंजुना बीच घूमने गए. सफर की थकान थी, इसलिए उस दिन वे एकडेढ़ घंटे से ज्यादा नहीं घूम सके. ड्राइवर ने उन्हें होटल में छोड़ दिया और सुबह को आने की कह कर चला गया.

घर वालों के निर्देशानुसार अनुज और सोनम रोज शाम को अपनेअपने घर फोन करते थे. उस दिन भी उन्होंने दिल्ली और सिरसा फोन किए. साथ ही मुंबई फोन कर के विजयकरण को भी बता दिया कि वे लोग गोवा पहुंच गए हैं.

अगले दिन ड्राइवर कार ले कर होटल आ गया. उस दिन अनुज और सोनम ने गोवा की खूबसूरत वादियों और अंजुना व बामा बीच पर रेत की सतह पर चादर सी बिछाती समेटती लहरों का आनंद लिया. उन का वह पूरा दिन मौजमस्ती में गुजरा. लग रहा था जैसे कंकरीट के जंगल से निकल कर जन्नतएबहिश्त के किनारे आ बैठे हों.

मखमली रेत पर बैठ कर वे दोनों सिर से सिर जोड़े घंटों समुद्र की बलखाती लहरों को निहारते रहे. समुद्र तट पर गुनगुनी धूप में लेटे उन विदेशी पर्यटकों को देखते रहे जो भारतीय मिट्टी में अपनी संस्कृति की गंध घोलने का प्रयास कर रहे थे. हनीमून का वह दिन उन के लिए यादगार बन गया.

अगले दिन सुबह को विनोद अत्री का ड्राइवर पिछले दिनों की तरह कार ले कर होटल पहुंच गया. अनुज और सोनम लगभग साढ़े 10 बजे होटल से निकले. इधरउधर घूमते हुए वे दोनों अंजुना बीच पहुंचे. कार अस्थाई पार्किंग में लगवाने के बाद दोनों बीच पर चले गए. ड्राइवर कार में बैठा उन के लौटने का इंतजार करता रहा.

सरकार से ज्यादा शक्तिशाली ड्रग्स तस्कर

दूर की सोच : प्यार या पैसा

मौज मजा बन गया सजा

बुझ गया आसमान का दीया

सीमा हैदर : प्रेम दीवानी या पाकिस्तानी जासूस

मौज मजा बन गया सजा – भाग 3

बलदाऊ यादव डा. सुनील के ही यहां था. थोड़ी देर में डा. अशोक कुमार भी मैडिकल कालेज परिसर स्थित डा. सुनील आर्या के आवास पर पहुंच गए. इस के बाद डा. अशोक कुमार अपनी गाड़ी से तो डा. सुनील आर्या ने अपनी गाड़ी में बलदाऊ को बैठा लिया. अविनाश चौहान शरीफ के साथ उस की गाड़ी में बैठ गया था.  सभी पनियरा डाक बंगले की ओर चल पड़े. सभी रात डेढ़ बजे के करीब वे लोग गेस्टहाऊस पहुंचे.

आराधना मिश्रा बाहर ही खड़ी रह गईं, जबकि डा. अशोक कुमार, डा. सुनील आर्या, शरीफ, अविनाश और बलदाऊ डाकबंगले के अंदर चले गए. अंदर पहुंच कर डा. अशोक कुमार ने अराधना के बारे में पूछा तो डा. आर्या ने कहा, ‘‘आराधना फ्रेश होने गई है. अभी आ जाएगी.’’

डा. अशोक कुमार वहीं पड़ी कुर्सी पर बैठ गए. इस के बाद उसी के सामने कुर्सी रख कर डा. आर्या भी बैठ गए. उस ने डा. अशोक कुमार को बातों में उलझा लिया तो शरीफ ने देशी तमंचा निकाल कर उस की कनपटी से सटाया और ट्रिगर दबा दिया. गोली लगते ही डा. अशोक कुमार लुढ़क कर छटपटाने लगा.

थोड़ी देर में वह खत्म हो गया तो डा. आर्या ने बलदाऊ से अपनी कार से तौलिया मंगा कर उस के सिर में लपेट दिया. इस के बाद लाश उठा कर शरीफ अहमद की इंडिका में रख दी गई. गेस्टहाउस से तकिए का कवर निकाल कर बलदाऊ ने फर्श पर फैला खून साफ किया और उस तकिए के कवर को भी रख लिया.

एक बार फिर तीनों कारें चल पड़ीं. उस समय रात के ढाई बज रहे थे. डा. अशोक कुमार की कार अविनाश चला रहा था तो लाश वाली गाड़ी में शरीफ के साथ बलदाऊ बैठा था. आराधना मिश्रा डा. सुनील आर्या की कार में थी. गोरखपुर के भटहट पहुंच कर लाश को शरीफ की गाड़ी से निकाल कर मृतक डा. अशोक कुमार की कार में डाला जाने लगा तो आराधना को पता चला कि डा. अशोक कुमार की हत्या कर दी गई है. वह डर गई, लेकिन बोली कुछ नहीं.

वहीं डा. सुनील आर्या ने अपनी कार अविनाश को दे कर आराधना को उस के साथ गोरखपुर भेज दिया. जबकि खुद शरीफ और बलदाऊ के साथ लाश को ठिकाने लगाने के लिए देवरिया की ओर चल पड़ा. इस के बाद देवरिया-सलेमपुर रोड पर स्थित वन विभाग की पौधशाला के पास डा. अशोक की लाश को फेंक दिया.

उसी के साथ उन्होंने तौलिया और तकिया का कवर भी फेंक दिया था. लाश तो ठिकाने लग गई थी, अब कार को ठिकाने लगाना था. कार ले जा कर उन्होंने जिला मऊ के थाना दक्षिण टोला के जहांगीराबाद में सड़क किनारे खड़ी कर दी. उस के बाद सभी गोरखपुर वापस आ गए.

तीनों से पूछताछ के बाद पुलिस ने बलदाऊ यादव को भी गिरफ्तार कर लिया था. इस के बाद शरीफ की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त 315 बोर का एक देशी पिस्तौल, 2 कारतूस, हत्या के समय पहने कपड़े बरामद कर लिए थे. कार में लगे खून के धब्बे के नमूने परीक्षण के लिए लखनऊ भेज दिए गए थे.

आराधना मिश्रा की डा. अशोक कुमार की हत्या में कोई भूमिका नहीं थी, इसलिए पुलिस ने उसे पूछताछ के बाद छोड़ दिया था. लेकिन गवाहों की सूची में उस का भी नाम था. पुलिस ने इस मामले में 34 लोगों को गवाह बनाया था.

अभियुक्तों के बयान और सभी गवाहों के गवाही होने में काफी अरसा लग गया. लगभग 13 सालों तक चले डा. अशोक कुमार की हत्या के मुकदमे का फैसला सुनाया गया 11 अप्रैल, 2014 को. न्यायमूर्ति श्री सुरेंद्र कुमार यादव ने डा. अशोक कुमार की हत्या का दोषी मानते हुए 52 पृष्ठों का अपना फैसला सुनाया था.

फैसले में अभियुक्त अविनाश चौहान, शरीफ अहमद, डा. सुनील आर्या तथा बलदाऊ यादव को आजीवन कारावास के साथ 10-10 हजार रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई थी. जुर्माना अदा न करने पर एक साल की अतिरिक्त सजा भोगनी होगी. सजा सुनाते ही सभी अभियुक्तों को पुलिस ने अपनी कस्टडी में ले कर जेल भेज दिया. अब चारों अभियुक्त हाईकोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं.

—कथा अदालत द्वारा सुनाए फैसले पर आधारित

नरभक्षी हो गया फिल्म आर्टिस्ट

मुंबई से करीब 12 सौ किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश के शाहपुर के लिए एक प्राइवेट बस चलती है. अमरकंटक एक्सप्रैस नाम की यह लग्जरी बस मुंबई से चलने के बाद पूरे 24 घंटे में शाहपुर पहुंच जाती है. इतनी लंबी यात्रा में ऊब गए यात्रियों के बीच छोटीमोटी कहासुनी तो होती ही रहती है. पर यह थोड़ी देर में शांत हो जाती है.

25 मई, 2023 को बस मुंबई से चल कर राजस्थान के कोटा शहर के नजदीक पहुंची तो 24 साल के युवक ने बस में हडक़ंप मचा दिया. किसी मामूली सी बात को ले कर उस की बगल की सीट पर बैठे यात्री से कहासुनी हो गई थी. इस मामूली सी बात में उस युवक को इतना गुस्सा आया कि बस को रोकवा कर अन्य यात्रियों को बीच में आना पड़ा.

परिस्थिति ऐसी बन गई कि एक ओर अकेला वह युवक था और दूसरी ओर बस के सभी पैसेंजर थे. 24 साल का वह युवक टीवी एक्टर की तरह सुंदर था. पर भयानक गुस्से में होने की वजह से उस का चेहरा विकृत हो गया था. उस की लाललाल आंखें और मुंह से टपकती लार देख कर सारे के सारे यात्री सहम गए थे. वह दांत भींच कर जोरजोर से कुछ बड़बड़ा रहा था. पर उस की ये बातें किसी की समझ में नहीं आ रही थीं.

जानवर की तरह हो गया हिंसक

उस के नजदीक जाने की किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी. क्योंकि जो भी उस के नजदीक जाने की हिम्मत करता था, वह उसे कुत्ते की तरह काटने को दौड़ता था. एक पैसेंजर ने उसे पकडऩे की हिम्मत दिखाई तो वह युवक एकाएक आक्रामक हो गया और उस ने उस पैसेंजर पह हमला बोल कर उस के हाथ में दांतों से काट लिया. उस पैसेंजर के हाथ से खून बहने लगा.

इस के बाद सभी पैसेंजरों ने ड्राइवर और कंडक्टर से कहा कि इस तरह आक्रामक हो चुके इस युवक को यहीं छोड़ो और बाकी लोगों को ले कर जल्दी निकलो. उस आदमी का विचित्र और आक्रामक व्यवहार ड्राइवर ने भी देखा था, इसलिए उस ने सभी को जल्दी बस में बैठने का इशारा किया.

वह युवक तो जुनून में आ कर गिर पड़ा था और न जाने क्याक्या बक रहा था. उसे उस समय जैसे दुनिया जहान का भान ही नहीं था. इसी का फायदा उठा कर बाकी पैसेंजर बस में चढ़ गए तो ड्राइवर ने बस चला दी. वह युवक चीखते हुए बस के पीछे दौड़ा, पर अंत में थक कर रोड पर ही गिर पड़ा.

25 मई, 2023 दिन शुक्रवार को राजस्थान के जिला पाली के गांव सरधाना की 64 साल की शांतिदेवी पहाड़ियों पर अपनी बकरियां चराने गई थीं. शांतिदेवी के पति नानुलाल खेती का काम कर रहे थे. शाम 4 बजे शांतिदेवी बकरियां ले कर घर आ रही थीं तो गांव के ही प्रताप बहादुर के खेत में सब्जी लेने चली गई. उन्होंने खेत से भिंडी तोड़ कर साड़ी के पल्लू में बांधी और घर की ओर चल पड़ीं.

नोचनोच कर खा गया बुजुर्ग महिला को

रास्ते में वह गुंदियावाड़ी पर पहुंचीं तो सामने से चले आ रहे एक युवक को देख कर उन्हें हैरानी हुई. उस युवक का चेहरा धूप में तप कर लाल हो गया था. वह केवल पैंट पहने था. उस के शरीर के ऊपरी हिस्से पर कोई कपड़ा नहीं था. उस के मुंह से लार टपक रही थी. उसे हैरानी से देखते हुए शांतिदेवी आगे बढ़ गईं. वह मुश्किल से 5 कदम बढ़ी होंगी कि वह युवक उन के पीछे आया और एक बड़ा सा पत्थर उठा कर उन के सिर पर दे मारा. यह प्रहार इतना तेज था कि शांतिदेवी जमीन पर गिर पड़ीं और उन की सांस अटक गई.

10 मिनट बाद उधर से जा रहे अमर सिंह ने एक अजीब नजारा देखा. नजदीक जा कर उन्होंने वह नजारा देखा तो उन का कलेजा कांप उठा. शांतिदेवी की लाश को एक युवक कंधे से पकड़ कर उन के चेहरे का मांस नोचनोच कर खा रहा था. शांतिदेवी के चेहरे की अब मात्र हड्डियां ही दिखाई दे रही थीं.

युवक का चेहरा खून से लाल था. उस के मुंह पर मांस के टुकड़े चिपके थे. कचरकचर मांस खाने में तल्लीन उस युवक को लगा कि कोई आया है तो उस ने सिर ऊंचा कर के अमर सिंह की ओर देखा. खून से लथपथ पूरा चेहरा और आंखों में हिंसक पशु जैसी चमक देख कर अमर सिंह डर गया. वह भाग कर प्रताप बहादुर के खेत पर गया और 10-12 लोगों को इकट्ठा कर के घटनास्थल पर पहुंचा.

अब तक शांतिदेवी की मात्र खोपड़ी बची थी. लाठीडंडा ले कर आए लोगों की भीड़ देख कर वह युवक लाश छोड़ कर भागा. उस युवक के भागने की गति इतनी तेज थी कि करीब डेढ़ किलोमीटर दूर जा कर उन लोगों ने उसे पकड़ा. लेकिन उसे जिस ने भी पकड़ा, उसे उस ने कुत्ते की तरह काटा. लोग उस की पिटाई करने लगे. पर मार खाने के बाद भी उस का जुनून कम नहीं हुआ.

हत्या करने वाले नरभक्षी की बात सुन कर थाना जैतरन के एसएचओ धोलाराम परिहार अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर आ पहुंचे. उस युवक ने पकड़ने आए 3 पुलिस वालों को भी काट लिया. उसे पुलिस वालों ने किसी तरह बांधा. थाने ला कर शांतिदेवी के बेटे वीरम की ओर से उस के खिलाफ हत्या और मानव मांस खाने की रिपोर्ट दर्ज की गई.

पुलिस ने उस की तलाशी ली तो उस की पैंट की जेब से मुंबई से मध्य प्रदेश के शाहपुर की बस की एक टिकट, 22 रुपए, आल इंडिया फिल्म ऐंड टीवी एसोसिएशन, मुंबई का आईडी और उस का आधार कार्ड मिला. मुंबई के पवई में रहने वाले इस 24 वर्षीय युवक का नाम सुरेंद्र ठाकुर था. एसोसिएशन के आईडी कार्ड से पता चला कि सुरेंद्र कुमार फिल्म और टीवी आर्टिस्ट है.

सुरेंद्र को बड़ी मानसिक बीमारी है, यह खयाल आते ही पुलिस उसे तुरंत पाली के बांगर अस्पताल ले गई. पूरी बात जान कर मैडिसिन विभाग के इंचार्ज डा. प्रवीण गर्ग ने बताया कि अगर पेशेंट ने मानव मांस खाया है तो हाइड्रोफोबिया नामक मानसिक बीमारी का शायद अपने देश का यह पहला मामला होगा.

सुरेंद्र ने जिनजिन गांव वालों और पुलिस वालों को काटा था, उन सभी को एंटी रेबीज की वैक्सीन लगवाने के लिए कहा गया. इस के बाद बांगर अस्पताल में सुरेंद्र का इलाज शुरू हुआ. वह अभी भी आक्रामक था, इसलिए डाक्टर कोरोना काल में जो पीपीई किट पहन कर कोरोना रोगियों का इलाज करते थे, वही पीपीई किट पहन कर सुरेंद्र का इलाज कर रहे थे. फिर भी उस ने 2 डाक्टरों को काट लिया.

सुरेंद्र की बिगड़ती हालत देख कर उसे 27 मई, 2023 को पुलिस बंदोबस्त और डाक्टरों की देखभाल में जोधपुर के एम.जी. अस्पताल ले जाया गया, जहां मनोचिकित्सकों और न्यूरोलौजी की टीम ने सुरेंद्र का इलाज शुरू किया. डा. राजश्री बोहरा ने पत्रकारों को बताया कि सुरेंद्र का इलाज अंधेरे कमरे में करना पड़ता है.

पता चला कि सुरेंद्र को हाइड्रोफोबिया हुआ था. इस के रोगी को पानी और रोशनी से डर लगता है. यह बीमारी किसी रेबीज वाले जानवर यानी कि कुत्ता, भेडिय़ा, सियार, लोमड़ी, चमगादड़ आदि के काटने के बाद एंटी रेबीज की वैक्सीन न लेने से होती है. अगर इस का समय से इलाज हो गया यानी वैक्सीन लग गई तब तो ठीक है वरना बाद में बचना मुश्किल हो जाता है.

इस बीमारी वाला आदमी अगर किसी को काट लेता है तो उसे भी वैक्सीन लेनी पड़ती है. इस बीमारी वाला आदमी से डर से कांपता रहता है. इसे इंसेफेलाइटिस या जापानी बुखार भी कहा जाता है. इस में आदमी गुस्से पर काबू नहीं रख पाता.

23 मई, 2023 की सुबह इलाज के दौरान नरभक्षी सुरेंद्र की मौत हो गई थी. पुलिस उस के घर वालों के बारे में पता कर रही है. आधार कार्ड में जो पता लिखा था, वहां उस का कोई नहीं मिला है.