मुश्किल से एक मिनट लगा होगा. कोठारी रामलाल के चैंबर से बाहर आ गया. उस वक्त उस का चेहरा पसीने से तर था, सांस फूली हुई थी. रूमाल से पसीना पोंछते हुए वह बाहर के गलियारे में निकल आया. औफिस का मुख्य दरवाजा डुप्लिकेट चाबी से खोल कर वह बाहर चला आया और दरवाजा बंद कर दिया. बाहर आते ही उसे टैक्सी मिल गई. टैक्सियां बदलते हुए वह दोपहर का शो खत्म होने के समय सिनेमाहाल के पास पहुंच गया. शो छूटा तो वह हाल से निकली भीड़ में शामिल हो गया और फिर भीड़ से निकल कर मैनेजर के चैंबर में जा पहुंचा. कुछ इस तरह जैसे फिल्म देख कर बाहर आया हो.
मैनेजर के केबिन में बैठ कर उस ने एक सिगरेट पी और फिर उस से विदा ले कर अपने औफिस आ पहुंचा. उस ने टैक्सी ड्राइवर से कहा, ‘‘तुम जरा ठहरो, मैं अभी लौटता हूं.’’
पल भर बाद कोठारी बदहवास दौड़ता हुआ बाहर आया और चिल्ला कर बोला, ‘‘खून, किसी ने उसे मार डाला. ड्राइवर, जल्दी चलो… थाने…’’
थाने पहुंच कर कोठारी ने बदहवासी के आलम में इंसपेक्टर को कत्ल की बात बताई, इंसपेक्टर कोठारी और 2 सिपाहियों के साथ तुरंत जिप्सी ले कर चल दिया.
औफिस में आते ही कोठारी निढाल भाव से एक कुरसी पर गिरते हुए बोला, ‘‘आप चैंबर में खुद जा कर देख लें. मुझ में उस भयानक दृश्य को दोबारा देखने की हिम्मत नहीं है.’’
इंसपेक्टर ने जा कर देखा. रामलाल गोयल का निर्जीव शरीर आराम कुरसी पर पड़ा हुआ था. उस की कनपटी पर गोली का निशान था और कनपटी से ले कर फर्श तक खून फैला था. गोली शायद अंदर ही रह गई थी. पुलिस का डाक्टर, फोटोग्राफर आदि आए. औफिस की तलाशी से कोई खास चीज नहीं मिली. जरूरी काररवाई के बाद इंसपेक्टर ने फोन कर के एंबुलेंस बुलवाई. साथ ही कोठारी से कहा, ‘‘मि. कोठारी, आप अपना बयान लिखवा दें. आगे की काररवाई आप की रिपोर्ट पर निर्भर करेगी.’’
कोठारी ने अटकअटक कर बदहवासी के आलम में अपना बयान लिखवाना शुरू किया, हवलदार उस का बयान नोट करता जा रहा था. कोठारी ने दिन भर की कहानी, मैटनी शो में सिनेमा जाने की बात और लौट कर यह भयानक दृश्य देख कर थाने जाने वगैरह की सारी बातें बयान में लिखवा दीं. हवलदार उस के बयान को पढ़ कर इंसपेक्टर को सुना ही रहा था कि औफस के आगे एक मोटरसाइकिल आ कर रुकी. मोटरसाइकिल खड़ी कर के एक छरहरे, मजबूत शरीर वाले व्यक्ति ने अंदर कदम रखा. कोठारी उसे जानता था.
वह मयंकमोहन था, पत्रकार और शौकिया जासूस. उसे देख कर कोठारी को फिर से पसीना आने लगा. वह सोचने लगा, यह बिना टांग अड़ाए नहीं मानेगा.
इंसपेक्टर ने पूछा, ‘‘कहां से आ रहे हैं मि. मयंक? यहां की गंध आप की नाक तक भी पहुंच गई क्या?’’
‘‘एक खास सिलसिले में थाने गया था, आप मिले नहीं. वहां पता लगा तो इधर आ गया. क्या मामला है?’’
मयंक ने बैठ कर सिगरेट सुलगाई. इंसपेक्टर ने कोठारी के मुंह से सुनी कहानी उसे सुना दी. फिर चैंबर में ले जा कर गोयल की लाश भी दिखाई. वह जानता था कि कई बार मयंक बड़े काम का साबित होता है. मयंक ने चेंबर, मेज पर रखे कागजात, नोटबुक और गोयल की लाश वगैरह का सूक्ष्म निरीक्षण किया. फिर वापस औफिस में आ गया.
इंसपेक्टर ने कोठारी का लिखवाया हुआ बयान खुद मयंक को पढ़ कर सुनाया. इस बीच मयंक चुपचाप सिगरेट के कश लेते हुए सुनता रहा. बीचबीच में वह कोठारी को देख रहा था. कोठारी बेचैन सा नजर आ रहा था. जब इंसपेक्टर बयान पढ़ चुका, तो कोठारी ने पूछा, ‘‘मुझे यहां कब तक बैठना होगा? मेरी तबीयत ठीक नहीं है. मैं घर जा कर आराम करना चाहता हूं.’’
‘‘बस, ऐंबुलेंस को आने दीजिए, आ ही रही होगी. हम डैड बौडी को भिजवा कर औफिस में ताला लगा कर सील कर देंगे. अभी आप को औफिस बंद रखना पड़ेगा,.’’
चपरासी लंच कर के कभी का लौट आया था. पुलिस ने उस का भी बयान लिया था. कोठारी ने उस की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘ताले सील की क्या जरूरत है? यह रहेगा यहां.’’
‘‘नहीं मि. कोठारी, मर्डर हुआ है यहां. जब तक हम किसी नतीजे पर नहीं पहुंच जाते हमें औफिस सील करना पड़ेगा. थोड़ी काररवाई और हो जाए तो आप चले जाइएगा. लेकिन आप शहर के बाहर नहीं जा पाएंगे.’’
कोठारी चुपचाप बैठा रहा.
मयंकमोहन इस बीच घूमघूम कर औफिस के ताले की चाबी के छेद, दरवाजे आदि को देख रहा था. इंसपेक्टर ने कहा, ‘‘मि. कोठारी, आप के बयान की पुष्टि हो ही जाएगी. कौन सी फिल्म देखी थी आप ने?’’ आप दोपहर वाले शो में प्लाजा सिनेमा में थे न?
‘‘जी हां, प्लाजा में मैं ने ‘सुनहरा तीर’ फिल्म देखी थी. यह क्या पता था कि आज ही यह मनहूस घटना घटेगी.’’
औफिस की बारीकी से छानबीन कर रहे मयंकमोहन ने कोठारी की बात सुनी तो उसे स्थिर दृष्टि से देखने लगा.
इंसपेक्टर ने पूछा, ‘‘आप के पास कोई सुबूत है कि आप ने आज ही वह फिल्म देखी है?’’
‘‘जी, मेरे पास आधा टिकट है,’’ कोठारी ने आधा टिकट निकाल कर दिखाते हुए इतमीनान से जवाब दिया, ‘‘सिनेमा का मैनेजर और वहां के गेटकीपर्स वगैरह मुझे जानते हैं. इत्तेफाक से आज मैं मैनेजर से भी मिला था.’’
मयंकमोहन के होंठों पर हलकी सी मुसकराहट उभर आई. उस ने इंसपेक्टर से पूछा, ‘‘डाक्टर तो देख कर गया है, उस के विचार से हत्या कब हुई होगी.’’
‘‘डाक्टर का अंदाजा है कि हत्या 12 से डेढ़ या 2 बजे के बीच हुई होगी.’’ वैसे आटोप्सी के बाद ठीक पता तो कल ही लगेगा.’’
एंबुलेंस आ गई. अटेंडेंटों ने बौडी को एंबुलेंस में रख दिया. एंबुलेंस चली गई.
इंसपेक्टर ने सिपाहियों से कहा, ‘‘औफिस में ताला और सील लगा दो.’’
मयंकमोहन ने टोका, ‘‘थोड़ा ठहरें, इंसपेक्टर साहब.’’
कोठारी ने इंसपेक्टर से कहा, ‘‘तो, मैं अब जा सकता हूं? यहां तो आप सील लगाएंगे.’’
‘‘जरा आप भी ठहरें मि. कोठारी, मुझे आप से कुछ बातें करनी हैं,’’ मयंक ने कहा.
अनिच्छा दिखाते कोठारी ने पूछा, ‘‘क्या बातें?’’
‘‘मि. कोठारी, आप आज दिन के 12 बजे से 3 बजे तक सिनेमा हाल में ही थे न?’’
‘‘बेशक,’’ कोठारी ने तपाक से जवाब दिया.
‘‘क्या आप मुझे फिल्म की कहानी संक्षेप में सुनाएंगे? फिल्म का नाम भी दोहराने की कृपा करें.’’
‘‘वह सब मैं इंसपेक्टर साहब को बता चुका हूं.’’ कोठारी बोला, तो मयंक ने अनुरोध किया, ‘‘बस, एक बार और. इंसपेक्टर साहब, प्लीज आप एक कागज पर इन का बयान दोबारा नोट कर लें.’’
कोठारी ने बताया, ‘‘फिल्म का नाम था ‘सुनहरा तीर.’ उस की कहानी भी दिलचस्प है.’’ वह संक्षेप में कहानी का सारांश बता कर बोला, ‘‘खास कर वह सीन, जब अंत में हीरो तीरों की बौछार में हीरोइन को घोड़े पर बैठा कर भागता है, बेजोड़ है.’’
‘‘कोठारी साहब, आप यह सब सचसच बता रहे हैं?’’ मयंक ने पूछा.
मगनलाल कोठारी का चेहरा लाल हो गया. वह कुछ बिगड़ कर बोला, ‘‘तो क्या आप को झूठ लग रहा है? आप तो ऐसे बात कर रहे हैं जैसे मैं ने ही खून किया हो?’’
‘‘नहीं, मैं ने ऐसा कब कहा,’’ मयंकमोहन ने इतमीनान से कहा, ‘‘मैं आप की बात पर पूरा विश्वास कर रहा हूं. बस, आप को गवाहों के सामने अपने इस बयान पर हस्ताक्षर करने होंगे.’’
‘‘मुझे कोई ऐतराज नहीं है.’’ कोठारी ने जोश में कहा.
क्रमशः
उस ने फटाफट कार की डिक्की बंद की और कार ले कर वहां से निकल गया. कार चलाते समय वह बारबार साइड मिरर में देख रहा था कि कहीं कोई उस का पीछा तो नहीं कर रहा. उस के दिमाग में बारबार यही बात घूम रही थी कि अपार्टमेंट में रहने वाले सभी लोग बाहर गए हुए थे तो वहां फायर किस ने किए?
वह रात उस ने होटल माउंटेन हाऊस में गुजारी और सुबह जल्दी न्यूयार्क के लिए रवाना हो गया. ट्रंक में क्या चीज रखी है, यह जानने के लिए उस की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी. न्यूयार्क पहुंचते ही उस ने डिक्की में रखे ट्रंक को खोला. अंदर एक सोने की अंगूठी मिली. उस पुरानी अंगूठी में एक बड़ा हीरा और उस के आसपास कई छोटे हीरे जड़े थे.
वह अंगूठी बहुत कीमती लग रही थी. निक ने अंगूठी जेब में रखी और ट्रंक डिक्की में ही बंद कर दिया. अंगूठी देख कर ग्लोरिया के मन में लालच आ गया. वह उस अंगूठी को अपने पास रखना चाहती थी, लेकिन निक ने यह कह कर उस से अंगूठी ले ली कि यह क्लाइंट या मालिक की अमानत है, वह उन्हें लौटा देगा.
रात साढ़े 9 बजे वह दिए गए पते पर ट्रंक पहुंचाने निकल गया. वह एक 4 मंजिला इमारत थी. अपार्टमेंट के मुख्य दरवाजे पर ताला लगा हुआ था. उसे विक्टर ने एक चाबी दे रखी थी. निक ने वह चाबी ताले में लगाई तो वह खुल गया. फिर दरवाजा खोल कर उस ने वह ट्रंक कमरे में रख दिया. जिस कमरे में ट्रंक रखा था वह हौलनुमा था और बेहद खूबसूरती से सजाया हुआ था.
ट्रंक रखने के बाद वह अपनी कार के पास पहुंचा तो वहां उसे विक्टर एलियानोफ मिला, जो कार से टेक लगा कर सिगरेट पी रहा था. निक को देखते ही बोला, ‘‘निक तुम अपने हुनर में माहिर हो. जी चाहता है कि तुम्हारे हाथ चूम लूं.’’
‘‘हाथ चूमने की जरूरत नहीं है. मुझे जो काम सौंपा गया था, पूरा कर दिया.’’
निक ने उस अंगूठी के बारे में विक्टर को कुछ नहीं बताया. उस ने सोचा कि विक्टर को अंगूठी के बारे में कुछ मालूम नहीं होगा. विक्टर ने एक मोटा लिफाफा निकाल कर उस की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘ये हैं तुम्हारे बाकी के 15 हजार डालर.’’
लिफाफा लेते हुए निक बोला, ‘‘मुझे ट्रंक में एक कीमती चीज मिली है.’’
विक्टर ने चौंक कर उसे देखते हुए कहा, ‘‘मेरी जानकारी के अनुसार ट्रंक खाली था तो तुम्हें उस में क्या चीज मिली?’’
‘‘हीरे जड़ाऊ एक अंगूठी थी उस में.’’
‘‘कहां है वो अंगूठी?’’
‘‘वह मेरे पास है मैं उसे उस के मालिक को वापस दूंगा. क्योंकि मैं केवल फालतू चीजें ही चोरी करता हूं, कोई कीमती चीज नहीं. यदि मैं अंगूठी रख लूंगा तो मुझ में और दूसरे चोरों में क्या फर्क रह जाएगा?’’
‘‘अगर तुम इतने ही शरीफ बनते हो तो लाओ अंगूठी मुझे दो, मैं उसे मालिक तक पहुंचा दूंगा.’’
‘‘नहीं, जब इसे चुरा कर मैं लाया हूं तो मैं ही पहुंचाऊंगा.’’
अगले दिन निक अखबार में छपी एक खबर पढ़ कर चौंक उठा. खबर में लिखा था कि न्यूपालिट में डकैती की वारदात कर लाखों रुपए के बहुत पुराने हीरेजवाहरात के जेवर लूट लिए. वारदात के समय डकैतों ने अपार्टमेंट के चौकीदार की गोली मार कर हत्या कर दी. इस मामले में पुलिस ने 3 लोगों को गिरफ्तार किया है जिन में एक लड़की भी शामिल है. पुलिस ने उन के पास से ट्रंक और कुछ लूटे हुए जेवरात बरामद कर लिए.
खबर पढ़ कर निक समझ गया कि यह सब विक्टर का ही कराधरा होगा. यानी विक्टर ने इस अपराध में उसे भी शामिल कर लिया. उस ने सोचा कि जिन 3 जनों को उसने फंसाया है वह उस के करीबी रिश्तेदार होंगे. निक ने विक्टर को फोन लगाया और मिलने के लिए कहा. विक्टर ने उसे बर्कशायर होटल के कमरा नंबर 787 में मिलने के लिए बुला लिया.
निक फटाफट तैयार हो कर होटल बर्कशायर पहुंच गया. विक्टर कमरे में बैठा टीवी देख रहा था. निक ने बैठते ही कहा, ‘‘मिस्टर विक्टर मैं यह जानना चाहता हूं कि जिन 3 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है, उन से आप का क्या रिश्ता है? चौकीदार को किस ने मारा?’’
यह सुनते ही विक्टर ने चेकबुक निकाली और 5 हजार डालर का एक चेक काट कर उसे देते हुए कहा, ‘‘मिस्टर निक, ये 5 हजार रखो और भूल जाओ कि तुम ने कोई ट्रंक चोरी किया था और कोई घटना घटी थी. हां, वह कीमती अंगूठी भी तुम रख लो.’’
उस की बात सुन कर निक चौंक गया. वह बोला, ‘‘अच्छा, तो वह मकान आप का ही है. मुझे पहले ही शक था.’’
‘‘हां, मकान मेरा ही है मगर मैं कह रहा हूं कि उन सब बातों को भूलने के लिए ही ये 5 हजार हैं.’’
निक ने सोचा कि विक्टर रकम के बूते उसे चुप कराना चाहता है. वह लालच में नहीं आया. उस ने वह चेक फाड़ दिया और कहा, ‘‘मामला 3 बेगुनाह लोगों का है जिन्हें आप ने कत्ल और डकैती के जुर्म में जेल भिजवाया है.’’
‘‘मिस्टर निक, अक्ल से काम लो अगर वो तीनों छूट जाएंगे तो फांसी का फंदा तुम्हारी गरदन में ही पड़ेगा. मैडिकल रिपोर्ट के मुताबिक चौकीदार की मौत का जो वक्त है उसी वक्त तुम मेरे घर में मौजूद थे. इसलिए कत्ल और डकैती के इल्जाम से तुम निकल नहीं पाओगे.’’
विक्टर की बात में दम था. निक सोचने पर मजबूर हो गया. तभी विक्टर बोला, ‘‘तुम्हें बहुत उत्सुकता है जानने की तो सुन लीजिए, जिस मकान में तुम ने चोरी की, वह हमारा पुश्तैनी मकान है. ऐना एलियानोफ मेरी सौतेली बहन है. मेरे पुरखे रूसी थे. मेरे दादा ऐलेक्स एलियानोफ फौज में जनरल थे. लेनिन के साथ कुछ गलतफहमी होने पर उन्हें रूस छोड़ना पड़ा था. 1921 में वह रूस से इस्तांबुल आ गए. वह खानदानी रईस थे. उन के पास काफी कीमती हीरेजवाहरात थे.
‘‘वह 1932 में न्यूपालिट आ गए. यहां मकान बना कर रहने लगे. सारा कीमती खजाना एक मजबूत संदूक में बंद कर के तहखाने में रख दिया. उस के बारे में किसी को कुछ पता नहीं था. लेकिन अपनी मौत से पहले दादा ने मेरे पापा को खजाने का राज बता दिया था. इस के बाद मेरे पिता ने एक अमेरिकन महिला से दूसरी शादी कर ली थी. ऐना एलियानोफ उस अमेरिकन महिला से पैदा हुई हमारी सौतेली बहन है.’’
निक ने टोका, ‘‘ऐना की मां कहां है?’’
‘‘ऐना की मां ने मेरे पिता से करीब 20 साल पहले तलाक ले लिया था. तलाक के बाद वह ऐना को ले कर न्यूयार्क चली गई थी. बाद में उसने किसी शख्स से दूसरी शादी कर ली.’’
‘‘फिर ये कीमती जेवर की चोरी का क्या मामला है?’’ निक ने पूछा.
‘‘मेरे पिता की मौत करीब एक हफ्ता पहले हुई थी. मरने से पहले उन्होंने खानदानी खजाने के बारे में मुझे बता दिया था. मुझ से गलती यह हुई कि सारी बातें मैं ने एक डायरी में नोट कर ली थीं. पिता की मौत की खबर सुन कर सौतेली बहन ऐना भी आ गई थी.
‘‘मैं यह देख कर हैरान रह गया कि पिता के अंतिम संस्कार के बाद ऐना घर में रखी अलमारियां और दराजें खंगालने लगी. वह शायद कोई दस्तावेज तलाश रही थी. इसी बीच उसे मेरी डायरी हाथ लग गई. डायरी पढ़ कर उस ने ट्रंक के खजाने का रहस्य जान लिया था. 2 रोज बाद उस ने अपने 2 साथियों के साथ मिल कर ट्रंक का ताला तोड़ कर सारे जेवर चुरा लिए.’’
‘‘आप के पास इस चोरी का क्या सुबूत है?’’ निक ने पूछा.
‘‘यही तो सारी मुसीबत है. मेरे पास कोई सुबूत नहीं है, पर मुझे पक्का यकीन है कि चोरी उसी ने की, मैं ने उसे अपनी डायरी पढ़ते देख लिया था.’’ उस ने बेबसी से कहा.
‘‘और आप ने ट्रंक मुझ से चोरी करवा कर ऐना के अपार्टमेंट में रखवा दिया. बाद में आप ने पुलिस को खबर कर दी. लेकिन एक बात समझ में नहीं आई कि चौकीदार का कत्ल किस ने किया?’’ निक बोला.
‘‘जाहिर है यह काम ऐना के साथियों ने किया होगा.’’ विक्टर एलियानोफ बोला.
‘‘यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही कि जब ऐना और उस के साथी चंद रोज पहले चोरी कर चुके थे, तो फिर दोबारा वहां जा कर कत्ल करने की क्या जरूरत थी?’’
‘‘उन्हें शक हुआ होगा कि चौकीदार ने चोरी करते देख लिया है या शायद वो कुछ और चुराने आए हों.’’ निक चुप रह गया. उस ने जेब से हीरे की अंगूठी निकाल कर विक्टर के हाथ पर रख दी और बाहर निकल गया.
क्रमशः
इस सनसनीखेज मामले की जांच में तत्परता दिखाना बहुत जरूरी था. क्योंकि अपहर्ता जयकरन को नुकसान पहुंचा सकते थे. दोपहर होतेहोते पुलिस को जयकरन के मोबाइल की काल डिटेल्स भी मिल गई. उस से पता चला कि उस की अंतिम लोकेशन दिल्ली-मेरठ रोड स्थित औद्योगिक क्षेत्र में थी. इस के बाद मोबाइल बंद हो गया था.
जबकि जयकरन के मोबाइल से फिरौती के लिए जो काल की गई थी, वह वहां से करीब 15 किलोमीटर दूर गालंद क्षेत्र से की गई थी. मोबाइल से सिर्फ एक वही काल हुई थी. इस के बाद मोबाइल बंद कर दिया गया था. इस का मतलब अपहर्ता बेहद चालाक थे. उन्होंने फिरौती के लिए न सिर्फ जयकरन के फोन का इस्तेमाल किया था, बल्कि स्थान भी बदल दिया था. संदिग्ध गतिविधियों के चलते पुलिस ने दीपक को रडार पर ले लिया.
उस के मोबाइल की जांच से पता चला कि वह मोदीनगर क्षेत्र का रहने वाला था. जांच के दौरान यह बात भी पता चली कि वह अपनी मां के साथ राजनगर स्थित छोटे बच्चों के रौयल किड्स प्ले स्कूल में रहता था. उस की मां चूंकि स्कूल में ही कर्मचारी थी, इसलिए इस परिवार को स्कूल में रहने के लिए जगह मिली हुई थी.
पुलिस को दीपक के 2 और नजदीकियों के ठिकाने पता चले. इन में एक था संदीप. उस के मोबाइल की लोकेशन जयकरन के मोबाइल की लोकेशन से मैच हो रही थी. संदीप के बारे में पुलिस तत्काल कोई खास जानकारी नहीं जुटा सकी. शक में मजबूती आते ही पुलिस सतर्क हो गई. अगर दीपक ही अपहर्ता था तो यह भी संभव था कि उस ने जयकरन को स्कूल स्थित घर पर ही छिपा कर रखा हो.
पुलिस अधिकारियों ने आपस में विचारविमर्श कर के अविलंब स्कूल में दबिश डालने का निर्णय लिया. एसपी अजयपाल शर्मा के नेतृत्व वाली टीम रौयल किड्स स्कूल पहुंची. उस वक्त दोपहर के 3 बजे थे. स्कूल के बच्चों की छुट्टी हो चुकी थी. अचानक पुलिस को वहां आया देख स्कूल की संचालिका रिचा सूद सकते में आ गईं. पुलिस को दीपक की मां अनीता भी वहीं मिल गईं. दीपक के बारे में पूछताछ करने पर वह बुरी तरह घबरा गईं.
“दीपक कहां है?” पुलिस ने पूछा.
“घर पर.” बताते हुए उस ने स्कूल कैंपस में पीछे की तरफ इशारा कर के बताया. वहां क्वार्टर बना हुआ था. पुलिस दनदनाती हुई वहां पहुंची तो वहां पहुंचते ही वह हुआ, जिस की किसी को उम्मीद नहीं थी. घर के अंदर से अचानक गोलियां चलनी शुरू हो गईं.
संभवत: क्वार्टर में मौजूद लोगों को अपनी घेराबंदी का अंदाजा हो गया था. इस पर पुलिसकॢमयों ने भी हथियार थाम कर पोजीशन ले ली. कुछ मिनटों तक दोनों तरफ से रुकरुक कर कई राउंड गोलियां चलीं. इस से आसपास के क्षेत्र में दहशत फैल गई और लोग एकत्र हो गए. पुलिसकॢमयों की निगाहें क्वार्टर पर जमी थीं. तभी ट्रैक सूट पहने एक युवक ने तेजी से क्वार्टर का दरवाजा खोला और बिजली जैसी फुरती से फायरिंग करता हुआ भागा. पुलिस ने उसे चेतावनी दी, “रुक जाओ, वरना गोली मार देंगे.”
युवक ने एक पल के लिए पीछे पलट कर देखा और फिर भागने लगा. इस पर पुलिस ने एक गोली उस के बाएं पैर पर दाग दी. गोली लगते ही वह नीचे गिर गया. उस के गिरते ही पुलिसकॢमयों ने उसे घेर लिया. पुलिस को उम्मीद थी कि वह दीपक होगा, लेकिन उस ने अपना नाम संदीप बताया.
“जयकरन कहां है?” जवाब में उस ने घर की तरफ इशारा कर दिया. पुलिस हथियार तान कर घर के अंदर दाखिल हुई, तो भौचक्की रह गई. पिस्टल से लैश 2 और युवक वहां मौजूद थे. लेकिन वह घबराए हुए थे. जयकरन एक कोने में बैठा थरथर कांप रहा था. उस के हाथपैर बंधे हुए थे.
पुलिस ने दोनों युवकों को गिरफ्त में ले कर जयकरन को बंधनमुक्त कराया. अपहर्ताओं को गिरफ्तार कर के जयकरन को सकुशल बरामद करना पुलिस के लिए बड़ी कामयाबी थी. मौके से गिरफ्तार किए गए दोनों युवकों में एक दीपक व दूसरा उस का छोटा भाई बिट्टू था. उन के कब्जे से पुलिस ने तीन पिस्टल, उन के मोबाइल व जयकरन का मोबाइल भी बरामद कर लिया. बेटे की बरामदगी की सूचना पर विवेक महाजन और उन की पत्नी भी मुठभेड़स्थल पर आ गए. जयकरन बहुत डरासहमा था. इस बीच पुलिस घायल युवक संदीप को अस्पताल ले गई.
पुलिस दीपक व बिट्टू को थाने ले आई. पुलिस ने डरीसहमी स्कूल संचालिका रिचा सूद, दीपक की मां अनीता और उस के सब से छोटे भाई आयुष को भी पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. पुलिस द्वारा गिरफ्तार युवकों व घायल संदीप से विस्तृत पूछताछ की गई तो राह से भटके युवाओं द्वारा रचित अपराध की चौंकाने वाली कहानी सामने आई.
दीपक का प्लेसमेंट एजेंसी का कमीशन पर आधारित काम था. उस के परिवार में मां अनीता के अलावा उस के छोटे भाई बिट्टू व आयुष थे. दीपक के पिता की वर्षों पहले मृत्यु हो गई थी. अनीता मेहनती और हिम्मती महिला थीं. उन्होंने परिवार को चलाने के लिए छोटीमोटी नौकरियां कर के बेटों को इस उम्मीद में पढ़ायालिखाया कि वे जिम्मेदारियां उठा कर घर को संभाल लेंगे. लेकिन इंसान सोचता कुछ है और होता कुछ और है.
अनीता ने आॢथक तंगियां भी देखी थीं और जमाने की कठोरता भी. वह मोदीनगर की भूपेंद्र कालोनी में रहती थीं. बाद में उन्होंने रौयल किड्स स्कूल में नौकरी कर ली थी. स्कूल परिसर में ही बने क्वार्टर में उन के रहने का भी इंतजाम हो गया तो वह तीनों बेटों के साथ वहां चली आईं. वहां आ कर दीपक ने एक कंपनी में कमीशन के आधार पर काम करना शुरू कर दिया था, लेकिन यह काम उसे छोटा लगता था.
पहला राज थैरपी सेंटर के लिए प्रभारी एसआई ओमवीर स्वाट टीम से बनाए गए. उन के साथ एसआई मोहित यादव, लेडी एसआई सुमित्रा रावत, हैडकांस्टेबल मनोज कुमार सभी थाना लिंक रोड, एसआई मोहित कुमार, कांस्टेबल योगेश, विपुल खोकर, अभय प्रताप, लेडी कांस्टेबल मंजू सभी पुलिस लाइंस, कांस्टेबल तरुण स्वाट टीम.
दूसरी टीम स्वाधिका थैरपी सेंटर के लिए प्रभारी एसआई आकाश तिवारी पुलिस लाइंस को बनाया गया. इस टीम में एसआई रोहित गुप्ता, कांस्टेबल नीतेश कुमार, लेडी कांस्टेबल एकता डबास सभी पुलिस लाइंस, मीना थाना लिंक रोड को शामिल किया गया.
तीसरी टीम के प्रभारी एसआई धु्रव सिंह पुलिस लाइंस को बनाया गया. उन के साथ एसआई नरेंद्र कुमार, कांस्टेबल पुष्पेंद्र शर्मा, लेडी कांस्टेबल सीमा मलिक और जौली सभी थाना लिंक रोड के अलावा एसआई विवेक कुमार पुलिस लाइंस को भी शामिल किया गया. यह टीम द हैवन थैरपी सेंटर के लिए गठित की गई.
चौथी टीम अरोमा थैरपी सेंटर के प्रभारी एसआई सौरव, पुलिस लाइंस के नेतृत्व में गठित की गई. इस टीम में मुनेश कुमार, थाना लिंक रोड, हेडकांस्टेबल निशांत स्वाट टीम, कांस्टेबल अंजेश कुमार थाना लिंक रोड, रवि यादव, लेडी कांस्टेबल राधा शर्मा पुलिस लाइंस, उर्वशी थाना लिंक रोड को शामिल किया.
पांचवीं टीम का प्रभारी एसआई विश्वेंद्र, पुलिस लाइंस को बनाया, जिस में एसआई यश कुमार थाना लिंक रोड, हैडकांस्टेबल महेश कुमार थाना लिंक रोड, कांस्टेबल अनुज पुलिस लाइंस, महिला कांस्टेबल रेणु चौहान पुलिस लाइंस, सीमा थाना लिंक रोड को शामिल किया गया. इस टीम को अरमान थैरेपी सेंटर के लिए नियुक्त किया गया.
छठी टीम के प्रभारी एसआई दिनेश कुमार यादव पुलिस लाइंस, कप्तान सिंह थाना लिंक रोड, हेडकांस्टेबल अरुण वीर थाना लिंक रोड, कांस्टेबल विपिन पुलिस लाइंस, महिला कांस्टेबल पूजा पुलिस लाइंस, शिवांगी को रायल स्पा सेंटर के लिए टीम में शामिल किया गया.
सातवीं टीम एस-2 थैरपी सेंटर के लिए प्रभारी एसआई संजय कुमार पुलिस लाइंस, चेतन कुमार थाना लिंक रोड, हैडकांस्टेबल जितेंद्र कुमार थाना लिंक रोड, सुमित पुलिस लाइंस, कांस्टेबल श्रीकृष्णा पुलिस लाइंस, लेडी कांस्टेबल लता शर्मा पुलिस लाइंस, गीता पुलिस लाइंस.
आठवीं टीम के प्रभारी इंसपेक्टर पुष्पराज सिंह थाना लिंक रोड, महिला एसआई सर्जना पुलिस लाइंस, कांस्टेबल नीरेश यादव, थाना लिंक रोड, कांस्टेबल मनीष थाना लिंक रोड, संजय कुमार, थाना लिंक रोड, हैडकांस्टेबल तहजीब खान स्वाट टीम, लेडी कांस्टेबल रेणु पुलिस लाइंस. यह टीम एस-2 थैरपी सेंटर के लिए नियुक्त की गई.
‘द रुद्रा थैरपी’ पैसिफिक माल के अंदर चल रहे स्पा सेंटरों पर दबिश तथा आवश्यक काररवाई के मद्ïदेनजर हिदायत दी गई कि मौके पर मौजूद महिलाओं की मर्यादा को ध्यान में रख कर सर्च अभियान एवं वैधानिक काररवाई की जाएगी. इस के बाद सभी की जामातलाशी ले कर यह सुनिश्चित किया गया कि किसी के पास कोई नाजायज वस्तु नहीं है.
पैसिफिक माल में पुलिस ने मारा छापा
ये टीमें रात 8 बज कर 20 मिनट पर द रुद्रा थैरपी पैसिफिक माल के सामने पहुंच गईं. वहां आनेजाने वाले लोगों को पुलिस रेड का गवाह बनाने के लिए पूछा गया, लेकिन कोई भी शख्स बेकार के लफड़े में फंसने को तैयार नहीं हुआ. सभी ने अपनेअपने तरीके से मजबूरी जाहिर कर के इंकार कर दिया. निराश हो कर टीमों ने साढ़े 10 बजे एक साथ आठों स्पा सेंटरों पर धावा बोल दिया.
पुलिस सर्च अभियान के दौरान स्पा सेंटर में प्रवेश करने वाली टीमों के प्रभारियों ने ऊंची आवाज में महिलाओं को अपने नग्न जिस्म ढंकने के लिए कहा. महिलाओं की मर्यादा रख कर उन्हें बंद केबिनों से बाहर निकाला गया. उन की जामातलाशी ली गई और उन के नामपते पूछ कर नोट किए गए. जो अय्याश लोग इन स्पा सेंटरों में मौजमस्ती करने आए थे, उन्हें हिरासत में ले लिया गया.
इन स्पा सेंटरों से कुल 60 युवतियां देह धंधे में लिप्त मिली थीं. इन्हें महिला सबइंसपेक्टर और महिला कांस्टेबल की हिरासत में दे कर सभी के नामपते नोट किए गए. इन की उम्र 19 साल से 22 साल थी. इन में कुछ युवतियां शादीशुदा भी थीं. इन के नामपते मर्यादा का ध्यान रख कर उजागर नहीं किए जा सकते.
जब इन से इस प्रकार का अनैतिक देह धंधा अपनाने का कारण पूछा गया तो सभी ने एक ही बात कही, “हम अपना घर खर्च या जरूरतें पूरी करने के लिए इन स्पा सेंटरों में नौकरी करने आई थीं. न जाने कैसे हमें बहलाफुसला कर हमारी अश्लील वीडियो स्पा मालिक अथवा मैनेजर द्वारा बना ली गई. उसे वायरल करने की धमकी दे कर हमें देह परोसने के लिए मजबूर किया गया. एक के बाद बारबार ऐसा होने लगा. हमें एक या आधा घंटे के लिए 3 से 5 हजार रुपए ग्राहक से ले कर उन के साथ सोने को मजबूर किया जाता रहा, इस में हमारी मरजी नहीं थी.”
गर्म गोश्त के धंधे में हुईं गिरफ्तारियां
इन स्पा सेंटरों के मालिक और मैनेजर पकड़ में आए, उन के नाम हैं— कुशल कुमार, प्रीत कौर, सुभाष कुमार, रोहित, रेनू, थे.
युवतियों के साथ मौजमस्ती करते हुए जिन पुरुषों को हिरासत में लिया गया, उन के नाम सुमित, अमित कुमार गुप्ता, राकेश, अमित कुमार, सागर सोनी, श्याम कुमार, नीरज कपूर, गुलफाम, ललित मोहन, मुशाहिद, सुनील, रोहित जैन, संदीप कुमार, विमल कुमार, सुनील कुमार, रवि कुमार, अश्वनी कुमार, मुकेश कुमार, नदीम कुरैशी, अनुज कुमार, राजेश कुमार, अजय कुमार, विष्णु, अबूजर, विशाल माथुर, मुनीश कुमार, प्रशांत वत्स, अभिषेक, आशुतोष भटनागर, आकाश कश्यप, प्रफुल्ल कुमार, गोरंगो बहेरा मोहन, रमेश चंद, सैंसर पाल सिंह, वसीम थे. ये सभी गाजियाबाद और आसपास के रहने वाले थे.
यह 41 लोग किसी न किसी रूप में रुद्रा पैसिफिक माल में चल रहे 8 स्पा सेंटरों से जुड़े हुए थे. पुलिस टीम ने इन्हें हिरासत में ले लिया.
छापे के दौरान स्पा सेंटरों के संचालक और मैनेजर गिरफ्तार
स्पा एस-2 का मालिक शाहिद, रायल स्पा का मालिक गौरव वर्मा, स्वातिका स्पा का मालिक दीपक, द हैवन थैरपी का मालिक विशाल उर्फ कपिल, राज थैरपी का मालिक ङ्क्षरकू व राजकुमार, अरोमा थेरपी का मालिक मोहन, अरमान थैरपी का मालिक पिंटू गिरि, रुद्रा थैरपी का मालिक राहुल चौधरी वहां से भाग से भाग गए.
इन सभी का जुर्म अनैतिक देह व्यापार निवारण अधिनियम 1956 की हद को पार करता है इसलिए इन्हें धारा 3/4/5/6 लगा कर विधिवत बंदी बनाने के लिए प्रयास किया जाएगा.
पुलिस ने स्पा सेंटरों के केबिनों से आपत्तिजनक हालत में मिली महिलाओं को पीडि़त मान कर उन्हें गवाह बना लिया गया. उन के सगेसंबंधियों और घर वालों को बुला कर उन की सुपुर्दगी में सौंप दिया जाएगा ताकि उन का उचित रीहैबिलिटेशन हो सके.
स्पा सेंटरों से अनेक आपत्तिजनक चीजें जैसे कंडोम, अश्लील उत्तेजक तसवीरें, जोश बढ़ाने वाली दवाइयां, 29 मोबाइल और एक लाख 7 हजार 358 रुपए बरामद हुए थे. उन्हें अलगअलग कपड़ों में रख कर सीलमोहर किया गया. गिरफ्तारी के समय माननीय सर्वोच्च न्यायालय व मानवाधिकार आयोग के आदेशोंनिर्देशों का भी पालन किया गया.
पुलिस ने सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर 25 मई, 2023 को कोर्ट में पेश किया, जहां से इन्हें जेल भेज दिया गया. डीसीपी विवेकचंद्र यादव ने इस काररवाई के बाद महाराजपुर पुलिस चौकी के इंचार्ज शिशुपाल सिंह को सस्पेंड कर दिया.
नाजनीन मुझे ले कर एक अलग टेबल पर बैठ गई. उस ने ढेर सारी चीजें और्डर कर दीं. वह मुझे वहां के तौरतरीके समझाती रही. मेरे बारबार मैडम कहने पर उस ने कहा, ‘‘यह मैडम कहना छोड़ो और मुझे नाम ले कर बुलाओ. मैं अब तुम्हारी बौस नहीं, दोस्त हूं.’’
हम क्लब से बाहर निकले तो उसने पूछा, ‘‘घर पर तुम्हारा कोई इंतजार तो नहीं कर रहा?’’
‘‘नहीं, मैं बिलकुल अकेला हूं.’’
‘‘तब तुम मेरे साथ मेरे घर चलो.’’
11 बजे के आसपास हम दोनों घर पहुंचे. मेरी हालत अजीब सी हो रही थी. घर पहुंचने पर पता चला कि अजहर अली कहीं बाहर गए हुए हैं. वह रात में आएंगे नहीं. कुछ देर रुक कर मैं जाने के लिए खड़ा हुआ, ‘‘नाजनीन, अब मुझे चलना चाहिए.’’
‘‘अब इतनी रात को तुम कहां जाओगे. तुम मेरे साथ आओ.’’ कह कर उस ने मेरा हाथ पकड़ा और खींच कर बेडरूम में ले आई. इतना शानदार बेडरूम मैं ने पहली बार देखा था. मुझे अजीब सी उलझन हो रही थी. मैं इतना भी बेवकूफ नहीं था कि एक खूबसूरत औरत के इशारे न समझ पाता.
वह मेरे एकदम करीब बैठी थी. मैं सोच रहा था कि क्या करूं? खुद को इस तूफान में बह जाने दूं या अपने बौस की इज्जत का खयाल करते हुए यहां से भाग निकलूं या इस औरत को अहसास दिलाऊं कि वह गलत कर रही है.
नाजनीन ने मेरे गले में बांहें डाल दीं. मैं एकदम से खड़ा हो गया. उस की बांहें हटाते हुए बेरुखी से कहा, ‘‘मैडम, आप जो कर रही हैं, यह ठीक नहीं है. मुझे जाने दीजिए. आप के शौहर ने मेरे लिए इतना कुछ किया है, इतना बड़ा ओहदा दिया है और मुझे जमीन से उठा कर आसमान पर बिठा दिया है, मैं उन की इज्जत से खिलवाड़ करूं, इतना भी अहसान फरामोश नहीं हूं.’’
‘‘बेवकूफ हो तुम.’’ नाजनीन गुस्से से चीखी, ‘‘यह सब मैं अजहर की रजामंदी से कर रही हूं. उन्हें सब पता है.’’
मैं चौंका, ‘‘क्या… उन्हें यह सब पता है?’’
नाजनीन तुनक कर बोली, ‘‘अब तुम जा सकते हो. चाहो तो कल अपने बौस से मेरी शिकायत कर देना. उस के बाद देखना, वह क्या कहते हैं?’’
मैं ने कहा, ‘‘यह सब मेरे उसूलों के खिलाफ है, इसलिए मैं जरूर कहूंगा.’’ कह कर मैं उसी वक्त अपने घर आ गया. मुझे नाजनीन पर गुस्सा आ रहा था कि कैसी बेशर्म औरत है, जो अपने शौहर की इज्जत नीलाम कर रही है. पूरी रात मैं उस बेबाक बेधड़क औरत के बारे में ही सोचता रहा.
अगले दिन मैं गुस्से में बौस के चैंबर में पहुंचा तो उन्होंने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘कहो, शहबाज, क्लब में कैसा लगा? मुबारक हो तुम्हें क्लब की मेंबरशिप मिल गई.’’
‘‘शुक्रिया सर, लेकिन मुझे आप से एक जरूरी बात करनी है.’’
‘‘कहो, क्या कहना चाहते हो?’’
‘‘सर, कल रात मैडम मुझे क्लब से सीधे अपने घर ले गईं.’’
‘‘मुझे मालूम है, उन्होंने मुझे सब बता दिया है.’’
‘‘सर, कल रात उन्होंने मेरे साथ कुछ ऐसा किया, जो उन्हें नहीं करना चाहिए था. वह सब बताते हुए मुझे शरम आती है.’’ मैं ने कहा.
‘‘मैं समझ गया, तुम क्या कहना चाहते हो. बैठ जाओ, मुझे तुम से कुछ खास बातें करनी हैं. शहबाज, मैं जो कहने जा रहा हूं, वह एक बहुत बड़ी ट्रेजिडी है. वादा करो, इस बात की चर्चा तुम किसी से नहीं करोगे.’’
‘‘जी सर, आप यकीन रखें, मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगा.’’
‘‘बात यह है कि मेरा खानदान बहुत बड़ा है और सब की नजरें हमारे ऊपर ही टिकी हैं. हमारी शादी को 7-8 साल हो गए हैं और अब तक हमारी कोई औलाद नहीं हुई है. यह बात हर किसी को बताई भी नहीं जा सकती. दरअसल मेरी मजबूरी यह है कि मैं औलाद पैदा करने के काबिल नहीं हूं.’’
इतना कह कर अजहर अली ने एक लंबी सांस ली और सिर झुका लिया.
मेरे बौस ने एक बहुत बड़ी बात मेरे सामने कह दी थी. उस समय बौस काफी मजबूर और बेबस लग रहे थे. मेरे लिए भी यह बात किसी आघात से कम नहीं थी.
मुझे खामोश देख कर उन्होंने कहा, ‘‘तुम मेरी बात समझ रहे हो न? हमें एक बच्चे की सख्त जरूरत है, जो नाजनीन की कोख से पैदा हुआ हो. हम बच्चा अडौप्ट भी नहीं करना चाहते.’’
‘‘सर, आप बच्चे के लिए दूसरी शादी तो कर सकते हैं.’’ मैं ने कहा.
‘‘बेवकूफी वाली बात मत करो. कमजोरी मुझ में है. दूसरी या तीसरी शादी से क्या होगा?’’
‘‘हां, यह बात भी सही है.’’ मैं ने झेंप कर कहा.
‘‘अब तुम समझ गए होगे कि हम क्या चाहते हैं. मैं ने महीनों तुम्हारे बारे में सोचा, उस के बाद नाजनीन से बात की. तब फैसला लिया गया कि औलाद तुम्हारे जरिए प्राप्त कर ली जाए.’’ अजहर अली ने कहा.
मुझे झटका सा लगा, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’
‘‘बिलकुल हो सकता है. तुम मेरे बच्चे के बाप हो, यह राज केवल हम तीनों को पता होगा. और हां, इस बात की जानकारी किसी अन्य को नहीं होनी चाहिए. बच्चा पैदा होने के बाद तुम्हारा नाजनीन से कोई संबंध नहीं रहेगा.’’ अजहर अली ने सख्त लहजे में कहा.
‘‘सर, कम से कम आप को मुझ से एक बार पूछ तो लेना चाहिए था कि क्या मैं इस सौदे के लिए तैयार हूं?’’ मैं ने कहा.
‘‘अगर तुम अक्लमंद हो तो मना नहीं करोगे. फिर इस में तुम्हारा नुकसान ही क्या है? तुम मैनेजर हो गए हो. तुम्हारा वेतन 3 गुना हो गया है, गाड़ीबंगला के साथ तुम्हें एक खूबसूरत औरत मिल रही है.’’ यह कहते हुए अजहर अली की जुबान लड़खड़ा गई थी.
‘‘लेकिन सर, मुझे अफसोस है कि इतना सब मिलने पर भी मैं यह सब नहीं कर सकता.’’
‘‘प्लीज, मेरी बात मान लो शहबाज. इसी में हम सब की भलाई है. अगर तुम ने मना कर दिया तो मैं किसे पकड़ूंगा? मैं ने तुम पर भरोसा किया था, इसीलिए इतनी बड़ी बात तुम से कह दी. अब मेरे घर और खानदान को तुम्हीं बरबादी से बचा सकते हो. अगर इतनी मेहरबानी तुम मुझ पर कर दो तो अच्छा रहेगा.’’
इस के बाद मुझे उन पर रहम आने लगा था. वह मुझे बहुत बेबस लग रहे थे. उन्होंने मेरे सामने ऐसी बात कह दी थी कि मैं मना नहीं कर सकता था. मैं ने कहा, ‘‘सर, एक काम हो सकता है.’’
‘‘कहो, क्या हो सकता है?’’ उन्होंने बेताबी से पूछा.
‘‘सर, आप मैडम को तलाक दे दीजिए.’’ मैं ने कहा.
‘‘क्या बेकार की बात करते हो, इस से क्या होगा?’’
‘‘सर, आप मेरी पूरी बात तो सुन लीजिए. आप को तलाक इस तरह देना है कि किसी को पता न चले. मैडम आप के साथ ही रहेंगी. इद्दत (तलाक के बाद जितने दिनों तक शादी नहीं हो सकती) के बाद मैं उन से निकाह कर लूंगा. यह उचित और इसलामी तरीका है. इस में कुछ गलत भी नहीं है.’’
‘‘हां, यह तरीका भी ठीक है.’’ अजहर अली ने राहत की सांस ली.
‘‘सर, इस में मुझे भी इत्मीनान रहेगा कि मैं ने कोई गलत काम नहीं किया है. आप का काम हो जाने के बाद मैं मैडम को तलाक दे दूंगा. इस तरह आप की बात भी रह जाएगी और आप का मकसद भी पूरा हो जाएगा.’’
‘‘लेकिन यह सब होगा कैसे?’’
‘‘बहुत ही खामोशी से हो जाएगा, किसी को कानोकान खबर नहीं होगी.’’ मैं ने कहा.
अजहर अली ने चुपचाप नाजनीन को तलाक दे दिया. इद्दत के दौरान वह अपने घर पर ही रहीं, इसलिए किसी को कुछ पता नहीं चला. इद्दत के बाद नाजनीन से उसी तरह चुपचाप मेरा निकाह हो गया, जिस तरह तलाक हुआ था. नाजनीन की जिंदगी में यह रात पहले भी आ चुकी थी, लेकिन मेरी तो पहली शादी थी, इसलिए मेरे लिए पहली रात खास थी.
खलील मंगी गहरे सांवले रंग का ऊंचापूरा सेहतमंद कसरती बदन का मालिक था. कहने को तो वह बिल्डर था, लेकिन असल में वह जमीन माफिया था. रोजाना शाम को वह एक आधुनिक ‘हेल्थ एंड फिटनेस’ क्लब में वर्जिश करने जाता था. उसी क्लब के एक हिस्से में महिलाएं भी वर्जिश करती थीं. दुआ अली भी इसी क्लब में वर्जिश के लिए आती थी, लंबीछरहरी, खूबसूरत, जवानी में कदम रख चुकी 15 साल की मासूम सी लड़की दुआ मंगी को पसंद आ गई.
मंगी ने उस से दोस्ती की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहा. एक दिन पार्किंग में मंगी ने दुआ के कंधे पर हाथ रख दिया तो गुस्से में दुआ ने उसे एक थप्पड़ जड़ दिया. इस के बाद तो उस ने जबरदस्ती दुआ को बांहों में उठाया और अपनी गाड़ी में डाल कर भाग निकला. दुआ चीखतीचिल्लाती रही, लेकिन उस की मदद के लिए कोई नहीं आया. अगले दिन दुआ का रौंदा बेजार शरीर शहर के मशहूर पार्क में पड़ा मिला. जिंदगी की डोर काटने से पहले उसे बड़ी ही बेरहमी से कई बार बेआबरू किया गया था.
दुआ को उठा कर कार में डालते हुए खलील मंगी को कई लोगों ने देखा था, इसलिए शकशुबहा की कोई गुंजाइश नहीं थी. दुआ का भाई शाद अली फौज में अफसर था इसलिए तुरंत काररवाई कर के मंगी को गिरफ्तार कर लिया गया. बाद में मंगी ने रसूख व पैसे का जोर दिखाया, कुछ गवाह जान के खौफ से पीछे हट गए तो कुछ ने पैसे ले कर बयान बदल दिए यानी उन्हें खरीद लिया गया. पैसे के ही जोर पर मैडिकल रिपोर्ट भी बदलवा दी गई और अब वह जालिम कातिल किसी और दुआ के लिए बददुआ बनने के लिए रिहा हो कर आ रहा था.
जज आफाक अहमद आ कर अपनी सीट पर बैठ चुके थे. पेशकार ने पहले से ही टाइप की हुई फैसले की फाइल सामने रख दी थी. अदालत में दोनों ओर के वकीलों के अलावा बार काउंसिल के सदर कामरान पीरजादा, मीडिया के कुछ प्रतिनिधि, दुआ अली के कुछ रिश्तेदार, खलील मंगी का बड़ा भाई और सुरक्षा से जुड़े चंद लोगों के अलावा किसी अन्य को दाखिल होने की इजाजत नहीं थी.
अंदर आने वाले हर शख्स की बड़ी बारीकी से तलाशी ली गई थी. मीडिया वालों का हर सामान चेक किया गया था. बम डिस्पोजल स्क्वायड ने भी अदालत के कमरे को खूब अच्छी तरह से चैक किया गया था. डीएसपी रंधावा और इंसपेक्टर गुलाम भट्टी खुद भी काफी चौकन्ने थे.
दीवार पर लगी घड़ी ने 11 बजने की घोषणा की. जज आफाक अहमद ने मेज के सामने खड़े सफाई वकील को बैठने के लिए कह कर चश्मा ठीक किया. उस के बाद उन्होंने फैसला सुनाना शुरू किया, ‘‘हालात, वाकयात और गवाहों के बयानों से अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि खलील मंगी वल्द जलील मंगी बेगुनाह है.’’
यह फैसला नहीं, एक खंजर था, जिस ने दुआ के प्यारों की जान निकाल दी थी. उन की उम्मीदों का कत्ल कर दिया था. उन के चेहरों पर दुख और आंखों से आंसू उमड़ पड़े थे. जबकि मंगी के भाई का चेहरा खुशी से चमक उठा था.
दोनों भाइयों ने विजयी भाव से एक दूसरे को देखा. रंधावा और भट्टी की नजर वहां उपस्थित हर शख्स की हर हरकत पर थी. वह लम्हा आने ही वाला था, जिस का दावा किया गया था. वैसे तो हर तरफ सुकून था. उन्हें यकीन था कि कैप्टन शाद अली ने भटकाने के लिए वह दावा किया था. यकीनन वह वापसी पर मंगी पर हमला करेगा.
जज आफाक अहमद ने एक बार फिर चश्मे को ठीक किया. उस के बाद एक नजर मंगी पर डाल कर बोले, ‘‘इसी बुनियाद पर अदालत खलील मंगी वल्द जलील मंगी को बाइज्जत बरी करने का हुक्म देती है.’’
खलील मंगी ने खुशी से बेकाबू हो कर अपने दोनों हाथ ऊपर किए. उसी पल मीडिया वालों के कैमरे उस पर चमकने लगे. तभी वह अचानक लड़खड़ाया. बगल में खड़े सिपाही ने उस के मुंह से निकली सिसकारी सुनी. मंगी का एक हाथ सीने पर गया और उसी के साथ वह कटघरे की रेलिंग से टकराया. रेलिंग टूट गई और वह जज की मेज के सामने जा गिरा. पलभर के लिए जैसे सन्नाटा पसर गया. रंधावा ने हैरानी से पलकें झपकाईं. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह जो देख रहा है, वह हकीकत है या भ्रम हो रहा है.
एक साथ कई तरह की आवाजें गूंजी. लेकिन सब से अलग और तेज आवाज मंगी के भाई की थी. वह चीख कर अपने भाई की ओर दौड़ा. लेकिन इंसपेक्टर गुलाम भट्टी ने उसे बीच में ही पकड़ लिया, ‘‘खुद पर काबू रखो.’’
जज आफाक अहमद उठे और अदालत से लगे अपने चैंबर में चले गए. सुरक्षा में लगे लोग हरकत में आ गए. ऐंबुलैंस के लिए फोन किया जा चुका था. मंगी का भाई बेकाबू हो रहा था. उसे जबरदस्ती बाहर ले जाया गया. बाकी लोगों को उन की जगहों पर बैठा कर तलाशी ली जाने लगी.
दुआ के बूढ़े चाचा और बहनोई के चेहरे पर एक अजीब सी खुशी और सुकून था. उन के हाथ दुआ के लिए उठे हुए थे. वे दिल से खुद के शुक्रगुजार थे. मंगी का जिस्म कुछ झटके खा कर शांत पड़ गया था. होंठों पर नीला झाग उभर आया था. दुआ अली का मुजरिम खत्म हो गया था.
कैप्टन शाद अली अपने दावे में कामयाब हो गया था. मंगी के सीने पर दाईं ओर एक सुई जैसा बड़ा सा तीर घुसा था, जो बहुत घातक जहर में बुझा हुआ था. ताज्जुब की बात यह थी कि उस तीर को वहां कैसे और किस ने उस पर चलाया था? ये दिमाग को चकराने वाले सवाल थे. ऐंबुलैंस आ चुकी थी. पुलिस हेडक्वार्टर से इन्वैस्टीगेशन टीम आने वाली थी, इसलिए अदालत के कमरे को बंद कर दिया गया था.
सभी लोगों की अच्छी तरह से तलाशी ले ली गई थी. इन्वैस्टीगेशन टीम की काररवाई के बाद मंगी की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. कुछ देर बाद आफाक अहमद अपना ब्रीफकेस ले कर निकलने लगे तो रंधावा के पास आ कर धीरे से बोले, ‘‘वह अपने मकसद में कामयाब हो गया. मैं ने कहा था न कि यह तुम्हारे लिए एक यादगार केस होगा.’’
रंधावा खामोश रहे. उन का दिमाग तेजी से चल रहा था. गाड़ी आई और आफाक अहमद बैठ कर चले गए. इंसपेक्टर भट्टी और डीएसपी रंधावा सिर जोड़े बैठे थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब कैसे हुआ?
पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. स्पेशल इन्वैस्टीगेशन टीम की भी शुरुआती रिपोर्ट आ गई थी. उस के अनुसार मंगी के सीने में वह जहरीला तीर, बिलकुल सामने से 6 फुट की ऊंचाई से चलाया गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मंगी की मौत बेहद घातक जहर से हुई थी. मंगी का कद 6 फुट 1 इंच था. इस के अलावा मुल्जिमों का कटघरा जमीन से करीब 8 इंच ऊंचा था.
उस के सामने गवाहों वाला कटघरा था. उस के सामने दीवार थी, जिस पर एक घड़ी टंगी थी. कटघरे, दीवार घड़ी आदि सभी चीजों को अच्छे से चैक किया गया था. बाद में भी उन में किसी तरह की कोई गड़बड़ी नहीं मिली थी. अब सवाल यह था कि क्या कैप्टन शाद अली जादू की टोपी पहन कर अदालत के कमरे में आया और मंगी को मार कर आराम से चला गया. इन सवालों ने पुलिस को परेशान कर दिया था.
रंधावा ने पता कर लिया था कि शाद अली उस जहर और हथेली की साइज की अल्ट्रामाडर्न एरोगन चलाने वाले दस्ते से जुड़ा था. जहरीले तीर के चलने के स्थान और ऊंचाई को देख कर अदालत में मौजूद सभी लोग शक के दायरे से बाहर हो गए थे.
क्रमशः
मतलब यह कि चाहतों के हिंडोले में झूलती उम्र की मंजिलें तय करती रही. जब मैं छठी क्लास में थी, तब बड़ी आपा का रिश्ता तय हो गया. उन्हें मैट्रिक के बाद स्कूल से उठा लिया गया, क्योंकि हमारी बिरादरी में लड़कियों को इस से ज्यादा पढ़ाने का रिवाज नहीं था. हमारे खानदान में बिरादरी से बाहर शादी का भी रिवाज नहीं था. बड़ी आपा की शादी के बाद अम्मी ने फौरन ही छोटी आपा की रुखसती की तैयारी शुरू कर दी. वह बचपन से ही ताया अब्बा के बेटे से जोड़ दी गई थी. मेरे 8वीं पास करतेकरते दोनों बहनें विदा हो कर अपनेअपने घर की हो चुकी थीं.
मैट्रिक में आतेआते मुझ पर बहार आ गई. मैं ने ऐसा रूपरंग और कद निकाला कि मैट्रिक करते ही दरवाजे पर रिश्तों की लाइन लग गई. अम्मी का इरादा तो यही था कि मैट्रिक के बाद मुझे भी घर से रुखसत कर दिया जाए, लेकिन मैं अभी और आगे पढ़ना चाहती थी. इसलिए मैं ने अम्मी से छिप कर अब्बू से कालेज में दाखिले की जिद शुरू कर दी. पहले उन्होंने इनकार कर दिया, मगर फिर राजी हो गए.
लेकिन यह बात खुलते ही अम्मी ने हंगामा खड़ा कर दिया. वह मेरे आगे पढ़ने के हक में नहीं थीं. अब्बू ने उन्हें किसी न किसी तरह राजी कर लिया. मैट्रिक में मेरी बहुत अच्छी पोजीशन आई थी, इसलिए बेहतरीन कालेज में दाखिले में कोई मुश्किल पेश नहीं आई. उस कालेज में ज्यादातर बड़े घरानों की लड़कियां पढ़ती थीं. मुझे उस माहौल में आ कर ऐसा महसूस हुआ, जैसे मैं किसी तालाब से निकल कर विशाल समुद्र में आ गई थी.
कालेज में अगरचे एक से बढ़ कर एक हसीन लड़कियां मौजूदी थीं, मगर उन की सुंदरता मेरे हुस्न के आगे फीकी पड़ गई. अलबत्ता उन की बेबाकियां और बातें मुझे दांतों तले अंगुली दबा लेने पर मजबूर कर देतीं. फिर मैं धीरेधीरे उन से घुलमिल गई. लड़कियां जब अपने चाहने वालों की दीवानगी के अंदाज बयान करतीं तो मैं उन के मुंह देखती रह जाती. यह हकीकत थी कि मेरी खूबसूरती के बावजूद किसी लड़के ने मुझे चाहत का पैगाम नहीं दिया था.
कालेज में मेरा दूसरा साल था. मेरी क्लासफेलो नाजिया की सालगिरह थी और मैं उस जलसे में खासतौर पर तैयार हो कर गई थी. यही वजह थी कि वहां मौजूद हर निगाह कुछ क्षणों के लिए मुझ पर जम कर रह गई. नाजिया करोड़पति बाप की औलाद थी और उस दावत में आई हुई लड़कियां कीमती कपड़ों और बेशकीमती जेवरातों से जगमगा रही थीं.
फिर भी एक नौजवान की निगाहें बारबार मुझ पर ही टिक जाती थीं. लंबा कद, बर्जिशी जिस्म, हल्के घुंघराने बाल, सुर्खी मिली रंगत और चमकती आंखें. वह हाथ में कैमरा लिए तसवीरें खींच रहा था. मैं ने महसूस किया कि बारबार कैमरे की फ्लैश मुझ पर पड़ रही थी. उस की निगाहों की गर्मी मैं फासले से भी महसूस कर रही थी. मेरे होंठों पर एक गुरूरभरी मुसकराहट फैल गई. जल्दी ही परिचय का मौका भी आ गया. वह केक की प्लेट उठाए चला आया.
‘‘आप तो कुछ खा ही नहीं रही हैं मिस!’’ उस ने गहरी नजर से मेरा जायजा लिया.
‘‘गुल.’’ मैं ने कनफ्यूज हो कर अधूरा नाम बताया.
‘‘बहुत खूब. आप बिलकुल गुल (फूल) जैसी ही हैं. मुझे राहेल कहते हैं.’’ उस ने मेरी आंखों में झांकते हुए कहा.
उसी वक्त नाजिया वहां आ गई.
‘‘राहेल! तुम इस से मिले? मेरी बेस्टफ्रेंड गुलनार है.’’
‘‘मिल ही तो रहा हूं.’’ वह बोला और मैं ने अपने चेहरे पर रंग बिखरता हुआ महसूस किया.
फिर मुझे पता ही नहीं चला कि कब हम बेतकल्लुफी की सीमा में दाखिल हो गए. जाते समय उस ने चुपके से कागज की एक चिट मेरे हाथ में पकड़ा दी, जो मैं ने हथेली में दबा ली. घर पहुंचते ही धड़कते दिल के साथ वह चिट देखी. उस पर एक फोन नंबर लिखा था. उस रात नींद मेरी आंखों से गायब हो गई थी. नतीजे में सुबह कालेज न जा सकी. सारा दिन व्याकुल सी रही. रात हुई तो सब के सोने के बाद टेलीफोन उठा कर अपने कमरे में ले आई. कांपती अंगुलियों से चिट पर लिखा हुआ नंबर डायल किया. पहली ही घंटी पर रिसीवर उठा लिया गया.
‘‘हैलो!’’ मैं ने धीरे से कहा.
‘‘मुझे यकीन था कि आप फोन जरूर करेंगी.’’ दूसरी तरफ से आवाज आई. मेरे स्वाभिमान को धक्का सा लगा और मैं ने बात किए बिना फोन काट दिया. मगर अगली रात को फिर फोन करने से खुद को रोक न सकी, हालांकि कोई अंदर से मुझे खबरदार कर रहा था कि गुल यह खेल मत शुरू कर.
मैं ने गोलमोल शब्दों में उसे अपने दिल की हालत कह सुनाई और उस ने अपनी बेताबियों का खुल कर इजहार किया. यह कच्ची उम्र की जुनूनी मोहब्बत थी, जो नफानुकसान के खयाल से बेपरवाह होती है. इसलिए जब उस ने मुझे कहीं बाहर मिलने को कहा तो मैं सोचेसमझे बिना तैयार हो गई.
उस ने तजवीज पेश की कि मैं कालेज से किसी बहाने छुट्टी ले कर बाहर आ जाऊं. फिर हम दोनों किसी रेस्त्रां में चलेंगे. मुझे एहसास ही नहीं था कि मैं एक अजनबी की मोहब्बत के नशे में डूब कर मांबाप की इज्जत को दांव पर लगा रही हूं. बस मुझे एक ही अहसास था कि शहजादों जैसी खूबसूरती रखने वाला शख्स मेरी मोहब्बत में गिरफ्तार है.
साथ जीनेमरने की कसमों ने मुझे उस के जादू में जकड़ लिया था. पहली मुलाकात में, जो एक रेस्त्रां के फैमिली केबिन में हुई. उस ने वादा किया कि अपनी तालीम पूरी होते ही वह अपने वालिदैन को हमारे घर भेजेगा. उस के बाद मैं हर तीसरेचौथे रोज उस से इसी तरह बाहर मिलती रही.
अगरचे मैं बड़ी कामयाबी से इस सारे सिलसिले को घर वालों की नजरों से छिपाए हुए थी, मगर कुदरत ने माताओं को एक खूबी दे रखी है, जो उन्हें अपनी बेटियों की बदलती अवस्था से आगाह रखती है. शायद मेरी खुशी, गालों के दमकते हुए गुलाबों और आंखों में उतरे सपनों ने उन्हें सचेत कर दिया. वह अकसर टटोलती निगाहों से मुझे देखतीं. उन के शक की वजह से मैं राहेल से मिलनेजुलने में सावधानी बरतने लगी. मगर उस समय धमाका हो गया, जब मेरा फस्ट ईयर का नतीजा आया और मैं 4 परचों में फेल हो गई.
क्रमशः
मैक्स बीयर बार में सैक्स रैकेट चलने की सूचना मिलते ही नौदर्न टाउन थाने के सबइंस्पैक्टर भीमा सिंह ने अपने दलबल के साथ वहां छापा मारा. वहां किसी शख्स के जन्मदिन का सैलिब्रेशन हो रहा था. खचाखच भरे हाल में सिगरेट, शराब और तेज परफ्यूम की मिलीजुली गंध फैली हुई थी. घूमते रंगीन बल्बों की रोशनी में अधनंगी बार डांसरों के साथ भौंड़े डांस करते मर्द गदर सा मचाए हुए थे. सब इंस्पैक्टर भीमा सिंह हाल में घुसा और चारों ओर एक नजर फेरते हुए तेजी से दहाड़ा, ‘‘खबरदार… कोई अपनी जगह से नहीं हिलेगा. बंद करो यह तमाशा और बत्तियां जलाओ.’’
तुरंत बार में चारों ओर रोशनी बिखर गई. सबकुछ साफसाफ नजर आने लगा. सब इंस्पैक्टर भीमा सिंह एक बार डांसर के पास पहुंचा और उसे ऊपर से नीचे तक देखते हुए एक जोरदार तमाचा उस के गाल पर मारा. वह बार डांसर गिर ही पड़ती कि भीमा सिंह ने उसे बांहों का सहारा दे कर थाम लिया और बार मालिक को थाने में मिलने का आदेश देते हुए वह उस बार डांसर को अपने साथ ले कर बाहर निकल गया. भीमा सिंह ने सोचा कि उस लड़की को थाने में ले जा कर बंद कर दे, फिर कुछ सोच कर वह उसे अपने घर ले आया. उस रात वह बार डांसर नशे में चूर भीमा सिंह के बिस्तर पर ऐसी सोई, जैसे कई दिनों से न सोई हो.
दूसरे दिन भीमा सिंह ने उसे नींद से जगाया और गरमागरम चाय पीने को दी. उस ने चालाक हिरनी की तरह बिस्तर पर पड़ेपड़े अपने चारों ओर नजर फेरी. अपनेआप को महफूज जान उसे तसल्ली हुई. उस ने कनखियों से सामने खड़े उस आदमी को देखा, जो उसे यहां उठा लाया था. भीमा सिंह उस बार डांसर से पुलिसिया अंदाज में पेश हुआ, तो वह सहम गई. मगर जब वह थोड़ा मुसकराया, तो उस का डर जाता रहा और खुल कर अपने बारे में सबकुछ सचसच बताने लगी कि वह जामपुर की रहने वाली है.
वह पढ़ीलिखी और अच्छे घर की लड़की है. उस के पिता ने उस की बहनों की शादी अच्छे घरों में की है. वह थोड़ी सांवली थी, इसलिए उस की अनदेखी कर दी. इस से दुखी हो कर वह एक लड़के के साथ घर से भाग गई. रास्ते में उस लड़के ने भी धोखा देते हुए उसे किसी और के हाथ बेचने की कोशिश की. वह किसी तरह से उस के चंगुल से भाग कर यहां आ गई और पेट पालने के लिए बार में डांस करने लगी.
भीमा सिंह बोला, ‘‘तुम्हारे जैसी लड़कियां जब रंगे हाथ पकड़ी जाती हैं, तो यही बोलती हैं कि वे बेकुसूर हैं.
‘‘ठीक है, तुम्हारा केस थाने तक नहीं जाएगा. बस, तुम्हें मेरा एक काम करना होगा. मैं तुम्हारा खयाल रखूंगा.’’
‘‘मुझे क्या करना होगा ’’ उस बार डांसर के मासूम चेहरे पर चालाकी के भाव तैरने लगे थे.
भीमा सिंह ने उसे घूरते हुए कहा, ‘‘तुम मेरे लिए मुखबिरी करोगी.’’ उस बार डांसर को अपने बचाव का कोई उपाय नहीं दिखा. वह बेचारगी का भाव लिए एकटक भीमा सिंह की ओर देखने लगी. भीमा सिंह एक दबंग व कांइयां पुलिस अफसर था. रिश्वत लिए बिना वह कोई काम नहीं करता था. जल्दी से वह किसी पर यकीन नहीं करता था. भ्रष्टाचार की बहती गंगा में वह पूरा डूबा हुआ था.
लड़कियां उस की कमजोरी थीं. शराब के नशे में डूब कर औरतों के जिस्म के साथ खिलवाड़ करना उस की आदतों में शुमार था. भीमा सिंह पकड़ी गई लड़कियों से मुखबिरी का काम कराता था. लड़कियां भेज कर वह मुरगा फंसाता था. पकड़े गए अपराधियों से केस रफादफा करने के एवज में उन से हजारों रुपए वसूलता था. शराब के नशे में कभीकभी तो वह बाजारू औरतों को घर पर भी लाने लगा था, जिस के चलते उस की पत्नी उसे छोड़ कर मायके में रहने लगी थी.
इस बार डांसर को भी भीमा सिंह यही सोच कर लाया था कि उसे इस्तेमाल कर के छोड़ देगा, पर इस लड़की ने न जाने कौन सा जादू किया, जो वह अंदर से पिघला जा रहा था.
भीमा सिंह ने पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है ’’
‘‘रेशमा.’’
‘‘जानती हो, मैं तुम्हें यहां क्यों लाया हूं ’’
‘‘जी, नहीं.’’
‘‘क्योंकि थाने में औरतों की इज्जत नहीं होती. तुम्हारी मोनालिसा सी सूरत देख कर मुझे तुम पर तरस आ गया है. मैं ने जितनी लड़कियों को अब तक देखा, उन में एक सैक्स अपील दिखी और मैं ने उन से भरपूर मजा उठाया. मगर तुम्हें देख कर…’’
भीमा सिंह की बातों से अब तक चालाक रेशमा भांप चुकी थी कि यह आदमी अच्छी नौकरी करता है, मगर स्वभाव से लंपट है, मालदार भी है, अगर इसे साध लिया जाए… रेशमा ने भोली बनने का नाटक करते हुए एक चाल चली.
‘‘मैं क्या सचमुच मोनालिसा सी दिखती हूं ’’ रेशमा ने पूछा.
‘‘तभी तो मैं तुम्हे थाने न ले जा कर यहां ले आया हूं.’’
रेशमा को ऐसे ही मर्दों की तलाश थी. उस ने मन ही मन एक योजना तैयार कर ली. एक तिरछी नजर भीमा सिंह की ओर फेंकी और मचल कर खड़ी होते हुए बोली, ‘‘ठीक है, तो अब मैं चलती हूं सर.’’ ‘‘तुम जैसी खूबसूरत लड़की को गिरफ्त में लेने के बाद कौन बेवकूफ छोड़ना चाहेगा. तुम जब तक चाहो, यहां रह सकती हो. वैसे भी मेरा दिल तुम पर आ गया है,’’ भीमा सिंह बोला.
‘‘नहींनहीं, मैं चाहती हूं कि आप अच्छी तरह से सोच लें. मैं बार डांसर हूं और क्या आप को मुझ पर भरोसा है ’’
‘‘मैं ने काफी औरतों को देखा है, लेकिन न जाने तुम में क्या ऐसी कशिश है, जो मुझे बारबार तुम्हारी तरफ खींच रही है. तुम्हें विश्वास न हो, तो फिर जा सकती हो.’’ रेशमा एक शातिर खिलाड़ी थी. वह तो यही चाहती थी, लेकिन वह हांड़ी को थोड़ा और ठोंकबजा लेना चाहती थी, ताकि हांड़ी में माल भर जाने के बाद ले जाते समय कहीं टूट न जाए.
वह एकाएक पूछ बैठी, ‘‘क्या आप मुझे अपनी बीवी बना सकते हैं ’’
‘‘हां, हां, क्यों नहीं. मैं नहीं चाहता कि मैं जिसे चाहूं, वह कहीं और जा कर नौकरी करे. आज से यह घर तुम्हारा हुआ,’’ कह कर भीमा सिंह ने घर की चाबी एक झटके में रेशमा की ओर उछाल दी. रेशमा को खजाने की चाबी के साथ सैयां भी कोतवाल मिल गया था. उस के दोनों हाथ में लड्डू था. वह रानी बन कर पुलिस वाले के घर में रहने लगी. भीमा सिंह एक फरेबी के जाल में फंस चुका था.
अगले दिन रेशमा ने भीमा सिंह को फिर परखना चाहा कि कहीं वह उस के साथ केवल ऐशमौज ही करना चाहता है या फिर वाकई इस मसले पर गंभीर है. कहीं वह उसे मसल कर छोड़ न दे. फिर तो उस की बनीबनाई योजना मिट्टी में मिल जाएगी. रेशमा घडि़याली आंसू बहाते हुए कहने लगी, ‘‘मैं भटक कर गलत रास्ते पर चल पड़ी थी. मैं जानती थी कि जो मैं कर रही हूं, वह गलत है, मगर कर भी क्या सकती थी. घर से भागी हुई हूं न. और तो और मेरे पापा ने ही मेरी अनदेखी कर दी, तो मैं क्या कर सकती थी. मैं घर नहीं जाना चाहती. मैं अपनी जिंदगी से हारी हुई हूं.’’
‘‘रेशमा, तुम अपने रास्ते से भटक कर जिस दलदल की ओर जा रही थी, वहां से निकलना नामुमकिन है. तुम ने अपने मन की नहीं सुनी और गलत जगह फंस गई. खैर, मैं तुम्हें बचा लूंगा, पर तुम्हें मेरे दिल की रानी बनना होगा,’’ भीमा सिंह उसे समझाते हुए बोला. ‘‘तुम मुझे भले ही कितना चाहते हो, लेकिन मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती. मैं बार डांसर बन कर ही अपनी बाकी की जिंदगी काट लूंगी. तुम मेरे लिए अपनी जिंदगी बरबाद मत करो. तुम एक बड़े अफसर हो और मैं बार डांसर. मुझे भूल जाओ,’’ रेशमा ने अंगड़ाई लेते हुए अपने नैनों के बाण ऐसे चलाए कि भीमा सिंह घायल हुए बिना नहीं रह सका.
‘‘यह तुम क्या कह रही हो रेशमा अगर भूलना ही होता, तो मैं तुम्हें उस बार से उठा कर नहीं लाता. तुम ने तो मेरे दिल में प्यार की लौ जलाई है.’’ रेशमा के मन में तो कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी. उस ने भीमा सिंह को अपने रूपजाल में इस कदर फांस लिया था कि वह आंख मूंद कर उस पर भरोसा करने लगा था. भीमा सिंह के बाहर जाने के बाद रेशमा ने पूरे घर को छान मारा कि कहां क्या रखा है. वह उस के पैसे से अपने लिए कीमती सामान खरीदती थी.
भीमा सिंह को कोई शक न हो, इस के लिए वह पूरे घर को साफसुथरा रखने की कोशिश करती थी. भीमा सिंह को भरोसे में ले कर रेशमा अपना काम कर चुकी थी. अब भागने की तरकीब लगाते हुए एक शाम उस ने भीमा सिंह की बांहों में झूलते हुए कहा, ‘‘एक अच्छे पति के रूप में तुम मिले, इस से अच्छा और क्या हो सकता है. मैं तो जिंदगीभर तुम्हारी बन कर रहना चाहती हूं, लेकिन कुछ दिनों से मुझे अपने घर की बहुत याद आ रही है.
‘‘मैं तुम्हें भी अपने साथ ले जाना चाहती थी, मगर मेरे परिवार वाले बहुत ही अडि़यल हैं. वे इतनी जल्दी तुम्हें अपनाएंगे नहीं.
‘‘मैं चाहती हूं कि पहले मैं वहां अकेली जाऊं. जब वे मान जाएंगे, तब उन लोगों को सरप्राइज देने के लिए मैं तुम्हें खबर करूंगी. तुम गाड़ी पकड़ कर आ जाना.
‘‘ड्रैसिंग टेबल पर एक डायरी रखी हुई है. उस में मेरे घर का पता व फोन नंबर लिखा हुआ है. बोलो, जब मैं तुम्हें फोन करूंगी, तब तुम आओगे न ’’
‘‘क्यों नहीं जानेमन, अब तुम ही मेरी रानी हो. तुम जैसा ठीक समझो करो. जब तुम कहोगी, मैं छुट्टी ले कर चला आऊंगा,’’ भीमा सिंह बोला. रेश्मा चली गई. हफ्ते, महीने बीत गए, मगर न उस का कोई फोन आया और न ही संदेश. भीमा सिंह ने जब उस के दिए नंबर पर फोन मिलाया, तो गलत नंबर बताने लगा.
भीमा सिंह ने जब अलमारी खोली, तो रुपएपैसे, सोनेचांदी के गहने वगैरह सब गायब थे. घबराहट में वह रेशमा के दिए पते पर उसे खोजते हुए पहुंचा, तो इस नाम की कोई लड़की व उस का परिवार वहां नहीं मिला. भीमा सिंह वापस घर आया, फिर से अलमारी खोली. देखा तो वहां एक छोटा सा परचा रखा मिला, जिस में लिखा था, ‘मुझे खोजने की कोशिश मत करना. तुम्हारे सारे पैसे और गहने मैं ने पहले ही गायब कर दिए हैं.
‘मैं जानती हूं कि तुम पुलिस में नौकरी करते हो. रिपोर्ट दर्ज कराओगे, तो खुद ही फंसोगे कि तुम्हारे पास इतने पैसे कहां से आए तुम ने पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी कब की ’ भीमा सिंह हाथ मलता रह गया.
मगनलाल कोठारी बहुत खुश था. इंडियन काफी हाउस से नाश्ता कर के वह हलके स्वर में सीटी बजाते हुए धीरेधीरे कनाटप्लेस की ओर जा रहा था. उसे केवल एक घंटे का समय बिताना था. एक घंटा बाद टिकट ले कर उसे प्लाजा सिनेमा में फिल्म देखनी थी.
हकीकत में उसे फिल्म नहीं देखनी थी बल्कि यह उस की योजना का हिस्सा था. उसे बस सिनेमा हाल में टिकट ले कर घुसना भर था ताकि वह अपनी मौजूदगी पक्की कर ले कि वह 12 से 3 बजे वाले शो में फिल्म देख रहा था.
40-42 साल का मगनलाल कोठारी खुद को बहुत होशियार समझता था. सचमुच वह चतुर चालाक था भी. दिल्ली में वह पिछले 6 सालों से कारोबार कर रहा था और उस में सफल भी था. लेकिन जब से उस ने एक पंजाबी युवती से शादी की थी तब से उस की सोच कुछ टेढ़ी हो गई थी. अब वह अपने पूरे कारोबार का एकछत्र मालिक बनने की सोचने लगा था, लेकिन उस की राह का कांटा था रामलाल गोयल, उस का पार्टनर.
रामलाल गोयल स्वभाव का अच्छा व्यक्ति था. व्यवसाय में ज्यादातर पैसा भी उसी का लगा हुआ था. अच्छे पार्टनर की तरह उसे कोठारी पर पूरा भरोसा था. कोठारी और गोयल ने सालों पहले पार्टनरशिप में बिजनैस शुरू किया था जो अच्छाभला चल रहा था. रामलाल गोयल करीब 50 साल का था लेकिन अविवाहित और अकेला. वह अपना खाली समय सिनेमा, टीवी और पत्रपत्रिकाओं वगैरह से बिताता था.
जबकि कोठारी के मनोरंजन के साधन कुछ और ही थे. उस के मनोरंजन का साधन होती थीं औरतें. वह चूंकि शादीशुदा था, इसलिए अपने इस शौक को वह बड़ी सावधानी से छिपाने का अभ्यस्त हो गया था. कोठारी की परेशानी यह थी कि रामलाल गोयल को बिना अपने रास्ते से हटाए वह सारे कारोबार का अकेला मालिक नहीं बन सकता था.
उसे रास्ते से हटाने के बारे में वह इसलिए भी सोचता था क्योंकि गोयल वैसे तो अकेला था लेकिन मध्यप्रदेश के उस के पैतृक घर में उस के भाई वगैरह थे. यह अलग बात है वह काफी पहले उन से संबंध तोड़ चुका था और दिल्ली में अकेला रह रहा था. कोठारी सोचता था कि अगर गोयल उस की राह से हट जाता है तो वह सारे कारोबार का अकेला मालिक बन जाएगा.
थोड़ी देर पहले कोठारी अपनी पत्नी और उस के रिश्ते के ममेरे भाई के साथ बाजार में था. उसे अपना यह साला सख्त नापसंद था. वह बिल्कुल नहीं चाहता था कि उस की खूबसूरत बीवी लफंगे टाइप के उस साले से मिलेजुले, पर पत्नी का दिल न दुखे इसलिए उसे यह बर्दाश्त करना पड़ता था. उन लोगों ने करोलबाग में कुछ खरीददारी की थी और जब वापस लौटने लगे थे तो कोठारी एक आदमी से मिलने का बहाना बना कर कनाट प्लेस आ गया था और इधरउधर घूम कर इंडियन काफी हाउस में जा बैठा था.
थोड़ी देर बाद जब दोपहर के शो का समय हो गया तो वह अपनी योजनानुसार प्लाजा सिनेमा की ओर चल दिया. वहां उसे अपने परिचित सिनेमा मैनेजर से मिलना था, फिर टिकट लेना था और अपने जानकार गेटकीपर को ठीक से अपना चेहरा दिखा कर हाल में घुस जाना था. फिर सब की आंख बचा कर उसे चुपके से हाल से निकल कर अपना काम करना था. इस के बाद, फिल्म समाप्ति पर उसे सिनेमा हाल से बाहर निकलने वाली भीड़ में शामिल हो कर मैनेजर से दो बातें कर के वापस लौट आना था.
मगन लाल कोठारी ने अपनी योजना पर कई दिनों तक काफी सोचविचार किया था. इस से 2-3 दिन पहले उस ने बिना अपने परिचित मैनेजर से मिले चुपके से जा कर सिनेमा हाल में लगी फिल्म देख ली थी और उस की कहानी भी अच्छी तरह याद कर ली थी.
सिनेमा हाल के पास वाली दुकान से सिगरेट खरीद कर वह कश लेता हुआ मैनेजर के औफिस में गया. मैनेजर ने उस का बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया. फिर बैठने का इशारा करते हुए पूछा, ‘‘क्यों मि. कोठारी, फिल्म देखेंगे न?’’
‘‘हां भई, इसीलिए तो आया हूं. जरा टिकट मंगवा दीजिए.’’ कोठारी ने पैसे देने चाहे तो मैनेजर ने आजीजी से कहा, ‘‘पैसों की क्या बात है, आप चलें, मैं बैठा देता हूं.’’
‘‘देखो भाई,’’ कोठारी बोला, ‘‘घोड़ा घास से दोस्ती नहीं करता. दोस्ती हम दोनों की है, मालिक का क्यों नुकसान करते हो?’’
मैनेजर मुसकरा कर रह गया, वह कोठारी की आदत जानता था. उस ने चपरासी से ड्रेस सर्किल की एक टिकट मंगवा दी. कोठारी गेट से हाय हैलो कर के अंदर चला गया. फिल्म शुरू होने से पहले बत्तियां बुझ गईं. हाल में अंधेरा छाते ही कोठारी एक्जिट की ओर बढ़ गया. उस वक्त उस ने नकली दाढ़ी मूंछें लगा रखी थीं जो उस ने पिछले दिन ही खरीदी थीं. उस वक्त 2-3 युवक अंदर आ रहे थे. उस ने इस का लाभ उठाया. फलस्वरूप उसे गेटपास भी नहीं लेना पड़ा. गेटकीपर उसे पहचानता था, लेकिन वह उस वक्त दूसरी ओर पीठ किए खड़ा था इसलिए कोठारी को देख नहीं सका.
सिनेमा हाल के पिछवाड़े की गली उसे मालूम थी, उसी से वह सड़क पर आ गया. वहां से एक टैक्सी ले कर वह सीधा अपने औफिस आया जो साउथ ऐक्सटेंशन के पास था. वह जानता था, कि औफिस 1 से 3 बजे तक बंद रहता है. दरअसल इस बीच रामलाल दोपहर में लंच करने के लिए पास ही के रेस्तरां में जाता था और फिर लौट कर 3 बजे तक औफिस में ही आराम करता था. औफिस का चपरासी 2 बजे भोजन करने अपने घर जाता था. उस के लौटने का समय हो रहा था. कोठारी ने हाथ में रूमाल लपेट कर चाबी से औफिस का मुख्य दरवाजा खोला और अंदर घुस कर दरवाजा फिर से बंद कर दिया.
उस ने धीरे से जेब थपथपाई, फिर आगे बढ़ गया. रामलाल गोयल के चैंबर का दरवाजा खुला हुआ था. धीरे से थोड़ा सा परदा हटा कर उस ने अंदर झांका. रामलाल फाइलों से लदी मेज के पार आराम कुर्सी पर मुंह खोले खर्राटे ले रहा था. कोठारी के होंठों पर कुटिल मुसकान फैल गई. वह सोचने लगा कितना आसान है किसी का खून करना. लोग बिना वजह घबराते हैं. अगर योजना सही हो तो कोई दिक्कत नहीं होती. पर योजना भी तो परफेक्ट होनी चाहिए. कोठारी दबे पांव अंदर चला गया.
क्रमशः