Crime Stories: नामो नामो और भेड़िया

Crime Stories: नामो मर्द का बच्चा था, उस ने गांव में ललकार कर कहा था कि वह अपनी एक टांग के बदले में दुश्मनों की एक लाश जरूर गिराएगा. वह तो ऐसा नहीं कर सका, पर…

एक दिन मैं अपने क्वार्टर में नाश्ता कर रहा था कि थाने से एक कांस्टेबल आया. उस ने आते ही बताया कि थाने से 2 ढाई मील दूर के एक गांव में हत्या हो गई है. मैं चाहता तो अपने हिसाब से आराम से जाता, लेकिन तब थानेदारों की ऐसी आदत नहीं थी. दूसरे अंगरेजों का जमाना था, जो ऐसे मामलों में लापरवाही बरदाश्त नहीं करते थे. इस के अलावा जल्दी पहुंचने का एक फायदा यह होता था कि घटनास्थल पर पैरों के निशान और दूसरे तमाम सबूत आराम से मिल जाते थे.

तैयार हो कर मैं सिपाही के साथ थाने पहुंचा तो वहां 3 आदमी मेरे इंतजार में बैठे थे. उन में से एक को मैं जानता था. वह उस गांव का नंबरदार था, जहां घटना घटी थी. दूसरे 2 लोगों में एक मृतक का भाई था. बातचीत से वह किसी सम्मानित परिवार का लगता था. उस ने अपना नाम मुख्तार बताया था और मरने वाले का नाम बख्तियार.

मुख्तार के बताए अनुसार, घटना कुछ इस तरह घटी थी. बख्तियार अपने खलिहान में सोया हुआ था. वहां सोने की वजह यह थी कि गेहूं की कटी फसल खेत में पड़ी थी. बख्तियार के बारे में उस ने बताया कि वह फौज का रिटायर हवलदार था. उस के पास सिंगल बैरल बंदूक थी, जिसे वह अपने पास रख कर सोता था. सुबह गांव का एक आदमी उधर से गुजरा तो उस ने देखा कि बख्तियार के धड़ का निचला हिस्सा चारपाई पर है और अगला हिस्सा चारपाई से नीचे गिरा पड़ा है.

बख्तियार को उस हालत में देख कर वह आदमी उस के पास तक गया तो उस ने देखा, चारपाई के नीचे खून जमा है. वह आदमी भाग कर मुख्तार के पास आया और उस ने यह बात मुख्तार को बताई तो वह गांव के नंबरदार को साथ ले कर खलिहान पहुंचा. बख्तियार मर चुका था, इसलिए दोनों बख्तियार के लड़के को साथ ले कर थाने आ गए. जब मैं सिपाहियों के साथ मौकाएवारदात पर पहुंचा, वहां काफी लोग इकट्ठा हो चुके थे. हमें देख कर लोग इधरउधर हो गए. मैं ने आगे बढ़ कर लाश का निरीक्षण किया. मृतक चारपाई से आधा लटका हुआ था, उस के दोनों हाथ आगे की ओर कुछ इस तरह फैले थे, जैसे मरने से पहले उस ने किसी चीज को पकड़ने की कोशिश की हो.

उस का चेहरा मिट्टी से लिथड़ा हुआ था. लाश से कुछ दूरी पर एक सिंगल बैरल बंदूक पड़ी थी. मृतक की आंखें खुली थीं. वह सुंदर पट्ठा जवान था. चेहरे से ही लगता था कि वह दबदबे वाला आदमी था. मेरे कहने पर 2 सिपाहियों ने लाश को सीधा कर के चारपाई पर लिटा दिया. मृतक के सीने और पेट पर खून जमा था. चाकू के 2 घाव सीने पर और एक लंबा घाव पेट पर था. सीने के घाव दिल के पास थे. मैं ने अंदाजा लगाया कि चाकू से दिल कट गया होगा, जिस से उस की मौत हो गई है.

सारी बातें नोट कर के मैं आसपास का निरीक्षण करने लगा. मैं ने हर चीज को बहुत बारीकी से देखी, लेकिन मुझे वहां कोई सबूत नहीं मिला. इस के बाद मैं ने पैरों के निशानों पर गौर किया तो एक ओर से एक आदमी के पैरों के निशान चारपाई की ओर आए थे. वे केवल आने के निशान थे, जाने के नहीं. इस से मैं ने अनुमान लगाया कि ये निशान मृतक के होंगे. मैं ने चारपाई की ओर घूम कर देखा तो सिरहाने की ओर मुझे एक जूते का निशान दिखाई दिया. वह दाएं जूते का निशान था. इस का मतलब यह था कि हत्यारा मृतक के सिरहाने की ओर से खेत से हो कर आया था. मैं आगे बढ़ा तो मुझे यह देख कर हैरानी हुई कि केवल दाएं पैर के जूते के निशान थे, बाएं पैर के जूते का कोई निशान नहीं था.

मैं ने बैठ कर ध्यान से देखा तो दाएं पैर के जूते के बराबर एक गोल सा निशान था, जो उस निशान के साथ चल रहा था. यह लाठी या बैसाखी का निशान हो सकता था. इस का मतलब हत्यारा बाईं टांग से लंगड़ा था, जो लाठी या बैसाखी के सहारे चलता था. मैं ने चारपाई के आसपास की जमीन को देखा, इन निशानों के अलावा वहां कोई और निशान नहीं था. इस का मतलब हत्यारा अकेला था. मैं ने कागजी काररवाई पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और मृतक के बड़े भाई मुख्तार को नंबरदार के घर बुलवा लिया. नंबरदार ने बताया कि मृतक अंग्रेजी फौज में हवलदार था. लड़ाई खत्म होने के 3 महीने बाद वह रिटायर हो कर घर आ गया था. वह दबंग आदमी था और गांव में दबदबा रखता था.

संपन्न घराने का बख्तियार फौज में पैसों के लिए नहीं, बल्कि मिलिट्रीमैन कहलाने के लिए भरती हुआ था. मैं नंबरदार से बात कर ही रहा था कि मृतक का बड़ा भाई मुख्तार आ गया. मैं ने नंबरदार को बाहर भेज कर उसे अंदर बुलाया. दुख जताने के बाद मैं ने पूछा, ‘‘मृतक की किसी से दुश्मनी तो नहीं थी या इधर किसी से उस का झगड़ा तो नहीं हुआ था?’’

मुख्तार ने जवाब दिया, ‘‘हम दुश्मनी रखने वाले लोग हैं जी, हमारे यहां छोटेमोटे लड़ाईझगड़े तो होते ही रहते हैं. असल लड़ाई नहर पार के एक परिवार से है. उन के साथ कई बार लाठीडंडे चल चुके हैं.’’

‘‘क्या यह दुश्मनी इस हद तक है कि हत्या की नौबत आ जाए? क्या उन लोगों में इतनी हिम्मत है कि तुम्हारे घर में आ कर वे हत्या कर सकें?’’ मैं ने पूछा.

उस ने कहा, ‘‘दुश्मनी तो ऐसी ही है जी, वे लोग मारनेमरने से नहीं डरते.’’

‘‘दुश्मनी की वजह?’’

‘‘वास्तव में गलती हमारे ही आदमी की है. हम ने माफी भी मांगी, लेकिन उन लोगों का रवैया इतना बेइज्जती वाला था कि न चाहते हुए भी बात बढ़ गई और लाठियांडंडे और कुल्हाडि़यां तक चल गईं, जिस में कुछ उन के आदमी घायल हुए, कुछ हमारे.’’

‘‘थाने तक बात पहुंची थी?’’ मैं ने यह बात सोच कर पूछी थी कि थाने में उस लड़ाई का रिकौर्ड होगा.

मुख्तार ने बताया कि दोनों पक्षों में से कोई थाने नहीं गया था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘क्या उन लोगों में कोई ऐसा आदमी है, जिस की बाईं टांग कटी हुई हो या बाईं टांग से लंगड़ाता हो.’’

‘‘बिलकुल है मलिकजी, लेकिन आप यह क्यों पूछ रहे हैं?’’ उस ने कहा.

‘‘मौकाएवारदात से पैरों के जो निशान मिले हैं, उन में दाईं टांग के जूते के निशान हैं, जबकि बाईं टांग के जूते की जगह बैसाखी या लाठी के निशान हैं.’’

मुख्तार ने बताया, ‘‘उस लंगड़े का नाम इनामुल्लाह है और वह नामो के नाम से मशहूर है. मुझे यकीन है कि हत्यारा वही है.’’

मैं ने पूछा, ‘‘यह बात तुम इतने यकीन से पैरों के निशान की वजह से कह रहे हो?’’

‘‘यह बात नहीं है. इस की वजह यह है कि नामो की टांग हमारे साथ हुई लड़ाई में ही कटी थी,’’ मुख्तार ने कहा, ‘‘बड़ा ही जीवट वाला लड़का है, लड़ाई में हमारे किसी आदमी की कुल्हाड़ी उस की टांग में ऐसी लगी कि टांग की हड्डी कट गई. पहले तो वह गांव के झोलाछाप डाक्टरों से इलाज कराता रहा, जब टांग ठीक नहीं हुई तो शहर के अस्पताल गया. तब तक टांग में जहर फैल गया था. मजबूरी में डाक्टरों को उस की टांग काटनी पड़ी. गांव लौट कर उस ने कहा था कि दुश्मनों के एक आदमी को मार कर वह इस का बदला लेगा.’’

मुख्तार, जब्बार और बख्तियार, तीनों भाई संपन्न जमींदार थे. गांव में उन का दबदबा था. मुख्तार सब से बड़ा था, उस से छोटा जब्बार और बख्तियार सब से छोटा. मुख्तार का एक बेटा और 3 बेटियां थीं, जबकि जब्बार का एक बेटा था. जब वह 10 साल का था, तभी जब्बार हैजे से मर गया था. उस के बेटे को दोनों भाइयों ने मिल कर पाला था. उस का नाम गुलाम हुसैन था, लेकिन सब उसे गामो कहते थे, गामो एकदम स्वस्थ और काफी सुंदर था. गामो को शुरू से ही पहलवानी का शौक था. वह गांव की कबड्डी की टीम का लीडर था. आसपास के गांवों में उस की धूम थी. उस की कबड्डी की टीम दूसरे गांवों में भी खेलने जाया करती थी.

नहर पार वालों से उन का कांटेदार मुकाबला होता था. गामो के कारण उस के गांव की टीम का पलड़ा भारी रहता था. एक बार गामो की टीम नहर पार वाले गांव में कबड्डी खेलने गई और मैच जीत लिया. रास्ते में मालटा का एक बाग पड़ता था. जब वे बाग के पास से गुजर रहे थे तो उन्हें बाग की ओर से एक अधेड़ औरत आती दिखाई दी. उस औरत ने गामो के पास आ कर कहा कि वह उस से अकेले में बात करना चाहती है.

वह औरत उसे मालटा के बाग में ले गई. बाग में गहरा अंधेरा था. गामो को एक पेड़ के नीचे कोई खड़ा दिखाई दिया. अंधेरे की वजह से दूर से यह पता नहीं चला कि वह मर्द है या औरत. जब वह पास पहुंचा तो उस ने देखा कि वह एक सुंदर लड़की थी. गामो ने पीछे मुड़ कर उस औरत को देखा तो वह गायब थी.

‘‘तुम्हें मैं ने ही बुलाया है, बुरा तो नहीं लगा?’’ लड़की ने पूछा.

गामो ने कहा, ‘‘बुरा तो नहीं लगा, लेकिन मुझे यहां क्यों बुलाया है?’’

‘‘मेरा नाम फातिमा है, दिल के हाथों मजबूर हो कर मैं तुम से मिलना चाहती थी.’’

गामो ने उसे समझाया कि इस तरह वह बदनाम हो जाएगी, इसलिए वह उस का खयाल दिल से निकाल दे और वापस चली जाए.

‘‘औरत हो कर मैं ने इतना बड़ा कदम उठा लिया और तुम मर्द हो कर भी डर रहे हो. चाहो तो साफसाफ कह दो कि मैं तुम्हें अच्छी नहीं लगी. इस के बाद मैं कभी तुम्हारे रास्ते में नहीं आऊंगी.’’ फातिमा ने कहा.

गामो ने कहा, ‘‘तुम बहुत सुंदर हो फातिमा, मुझे अच्छी भी लगती हो, लेकिन तुम अपनी इज्जत का खयाल करो और वापस चली जाओ.’’

‘‘मुझे गलत मत समझना गामो, मैं तुम से सच्चा प्रेम करती हूं. मैं इस शर्त पर वापस जाऊंगी कि तुम मुझ से दोबारा मिलने का वादा करो, वरना मैं तुम्हारे पीछेपीछे तुम्हारे घर तक पहुंच जाऊंगी.’’

गामों ने उस से मिलने का वादा कर लिया. इस के बाद दोनों रोज मालटा के उसी बाग में मिलने लगे. गामो घोड़ी पर बैठ कर नहर पार से आ कर फातिमा से मिलता था. उन के मिलने की यह बात ज्यादा दिनों तक परदे में नहीं रह सकी. गामो और फातिमा के प्रेम के चर्चे पूरे गांव में फैल गए. जब इस बात की जानकारी फातिमा के घर वालों को हुई तो वे मरनेमारने को तैयार हो गए. उन्होंने फातिमा का घर से निकलना बंद कर दिया. इस के बावजूद फातिमा किसी न किसी तरह गामो से मिलने पहुंच जाती थी. फातिमा के बाप और भाइयों ने उस की पिटाई भी की, लेकिन वह नहीं मानी.

फातिमा की बिरादरी वालों ने ऐलान कर दिया कि अगर गामो उन के गांव के पास भी दिखाई दिया तो वे उस के हाथपांव तोड़ कर उसे हमेशा के लिए अपाहिज बना देंगे. इस पूरे मामले की जानकारी गामो के ताऊ और चाचा को हुई तो उन्होंने उसे समझाया कि वह यह चक्कर छोड़ दे. वह न तो पार वाले गांव में जाए और न ही फातिमा से मिलने की कोशिश करे. उस ने कहा कि अगर उस का रिश्ता फातिमा के घर भेजा जाए तो वह उन की बात मान लेगा.

लेकिन दोनों परिवार एक ही टक्कर के थे, इसलिए गामो की बात नहीं मानी गई. उन्हीं दिनों में बख्तियार फौज से आया था. उस के भाई मुख्तार ने कुछ आदमियों को तैयार कर के उस से कहा कि वह पार के गांव में जा कर गामो के लिए फातिमा के रिश्ते की बात करे. बख्तियार उन लोगों के साथ नहर पार कर के गांव पहुंचा तो गांव वालों ने उन की आवभगत की. सभी ने पूरे मामले पर बात कर के गामो के ताऊ मुख्तार की ओर से माफी मांगी. लेकिन जैसे ही इन लोगों ने फातिमा के रिश्ते की बात की, वे एकदम से बिगड़ गए. फातिमा की बिरादरी वालों ने कहा कि वे फातिमा का नाम भी न लें. सभी वापस आ गए. यह सुन कर गामो ने कहा कि कुछ भी हो, वह फातिमा को हासिल कर के रहेगा. उस के लिए उसे कुछ भी करना पड़े.

कुछ दिनों बाद गामो गांव से गायब हो गया. उसे सब जगह तलाशा गया, लेकिन वह कहीं नहीं मिला. 2 दिन बीत गए तो गामो के घर वालों को लगा कि गामो नहर पार वालों के हत्थे चढ़ गया है. उन्होंने 2 लोगों को नहर पार के गांव भेजा कि चुपके से पता करें कि गामो वहां तो नहीं पहुंचा. उन्होंने वापस आ कर बताया कि वह वहां नहीं है. अब उन के लिए गामो चिंता का विषय बन गया.

चौथे दिन फातिमा के गांव के लोग कुल्हाड़ी, भाले, लाठी और दूसरे हथियार ले कर गामो के गांव आ पहुंचे. उन का कहना था कि गामो को उन के हवाले करो. कुछ मिनटों में गामो की बिरादरी वाले भी हथियार ले कर मैदान में आ गए. बात खुली तो पता चला कि फातिमा रात के किसी वक्त घर से गायब हो गई थी. उन्हें पूरा यकीन था कि फातिमा गामो के साथ ही गई है. मुख्तार ने उन लोगों को बताया कि गामो तो 3 दिनों से गायब है, वे खुद ही उसे तलाश रहे हैं. फातिमा के घर वाले यह बात मानने को तैयार नहीं थे. उन का कहना था कि गामो गांव में ही कहीं छिपा है और फातिमा उसी के साथ है.

बात बढ़ कर मारपीट तक जा पहुंची तो दोनों ओर के 5-6 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए. इसी लड़ाई में नामो की टांग पर कुल्हाड़ी लग गई थी, जिस की वजह उसे टांग से हाथ धोना पड़ा था. यहीं से दोनों परिवारों में दुश्मनी हो गई थी. मैं ने इस पर चिंतन किया तो लगा कि हत्या का कारण संभवत: यही है. मैं ने मुख्तार से 2-4 बातें और पूछीं, जो तफ्तीश के लिए जरूरी थीं. मुख्तार ने फातिमा की बिरादरी के एकएक आदमी का नाम ले कर हत्या का शक जताया. मैं ने उस का पूरा बयान लिख लिया. मेरे लिए यह आसान हो गया कि अब इधरउधर देखने के बजाय तफ्तीश एक ओर करनी थी.

कागजी काररवाई पूरी कर के मैं फातिमा के गांव पहुंचा और उस गांव के नंबरदार को ले कर नामो के घर गया. वहां हमें एक बैठक में बिठाया गया. कुछ देर बाद एक आदमी बैसाखी के सहारे चलता हुआ अंदर आया. उसे देख कर ही मैं समझ गया कि यही नामो है. वह बड़ा सुंदर और सजीला जवान था. ऐसे जवान को बैसाखी के सहारे चलते देख मुझे दुख हुआ.

मैं ने कहा, ‘‘सचमुच तुम मर्द हो, तुम ने अपना वचन पूरा कर के दिखा दिया.’’

‘‘कौन सा वचन?’’ उस ने हैरानी से पूछा, ‘‘आप किस वचन की बात कर रहे हैं जी?’’

मैं ने कहा, ‘‘याद करो नामो, जब तुम्हारी एक टांग कटी थी तो तुम ने रोनेधोने के बजाय ललकारते हुए कहा था कि अपनी एक टांग के बदले दुश्मन की एक लाश गिराओगे.’’

उस ने अपनी कनपटी पर अंगुली मारते हुए कहा, ‘‘ओह हां, वह तो मैं ने गुस्से में कह दिया था. लड़ाईझगड़े में घाव तो आते ही रहते हैं. मेरी टांग तो मेरी गलती के कारण कटी थी. शहरी डाक्टर ने कहा था कि अगर गांव के किसी झोलाछाप को न दिखा कर सीधे शहर आ जाते तो टांग ठीक हो सकती थी.’’

‘‘तो तुम ने अपनी टांग का बदला ले ही लिया?’’ मैं ने उस की बात को नजरअंदाज कर के कहा.

‘‘कैसा बदला जी,’’ उस ने परेशान होते हुए कहा, ‘‘मैं ने किस से बदला ले लिया?’’

‘‘इतना परेशान क्यों होते हो नामो, एक टांग वाला होते हुए भी तुम ने दुश्मन के घर में जा कर उस पर वार किया.’’ मैं ने कहा.

नामो की हालत देखने वाली थी. वह आंखें फाड़फाड़ कर मेरी ओर देख रहा था. अगर 2 टांग वाला होता तो शायद एकदम से उठ कर खड़ा हो जाता, लेकिन एक टांग का होने की वजह से वह कुरसी पर बैठेबैठे इधरउधर हिल रहा था.

‘‘आप क्या कह रहे हैं.’’ उस ने सिटपिटा कर कहा, ‘‘मैं ने किसी दुश्मन पर वार नहीं किया. आप किस दुश्नम की बात कर रहे हैं?’’

‘‘तुम अच्छी तरह जानते हो मैं किस दुश्मन की बात कर रहा हूं.’’ मैं ने उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘गामो को भूल गए, रात को गामो के चाचा की हत्या कर दी गई है. यह बताओ कि यह काम तुम ने अकेले किया या तुम्हारे साथ कोई और भी था?’’

मुझे उम्मीद थी कि मेरी बात सुन कर नामो उछल पड़ेगा और जोरशोर से मना करेगा. लेकिन उस ने कोई विशेष प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. उस ने कहा, ‘‘मैं गामो के चाचा की हत्या क्यों करने लगा? लेकिन हां, अगर कभी गामो सामने आ गया तो उस की हत्या जरूर करूंगा. और हां, हत्या कर के छिपाऊंगा भी नहीं, सीधा आप के पास चला आऊंगा.’’

‘‘अगर तुम मुझे साफसाफ बता दो तो मैं तुम्हारे बचाव के लिए रास्ता निकाल लूंगा. अगर नहीं मानोगे तो फिर मैं खुद ही साबित कर दूंगा कि यह हत्या तुम ने ही की है. उस के बाद मुझ से किसी भलाई की उम्मीद न रखना.’’

अभी मैं नामो से पूछताछ कर रहा था कि कांस्टेबल ने बताया कि नामो की बिरादरी के कुछ लोग मुझ से मिलना चाहते हैं. मैं ने कहा कि अभी किसी को भी अंदर मत आने दो. मैं अपराधी को उस समय कोई छूट नहीं देना चाहता था.

‘‘घटनास्थल पर तुम्हारे पैरों के निशान देखे गए हैं.’’ मैं ने उस के पैरों की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘इस तरह के निशान और किसी के हो ही नहीं सकते, दाएं जूते का निशान और बाएं जूते की जगह बैसाखी का निशान. अब भी मना करोगे कि हत्या तुम ने नहीं की?’’

मेरी बात के जवाब में नामो कसम खाखा कर खुद को निर्दोष बताने लगा. लेकिन मैं उस की कोई बात मानने को तैयार नहीं था. पुलिस वाले अगर कसमों पर ऐतबार करने लगें और रोनेधोने से डर जाएं तो अपराधी जेल जा ही नहीं सकते. मैं ने घटनास्थल से मिलने वाले निशानों के मोल्ड बनवा लिए थे. वहां जमीन नर्म थी, निशान बिलकुल साफ दिखाई दे रहे थे. वे देसी जूते के निशान थे, जो देहात में ज्यादातर लोग पहनते थे. अब मुझे नामो के निशान से घटनास्थल पर पाए गए निशानों का मिलान करना था.

‘‘हत्या करने वाला हथियार कहां है, खुद दे दोगे तो ठीक रहेगा, नहीं तो घर की तलाशी ले कर मैं खुद बरामद कर लूंगा.’’

‘‘जब मैं ने हत्या ही नहीं की तो हथियार कहां से बरामद कराऊं.’’ नामो ने लगभग रोनी सूरत बनाते हुए कहा, ‘‘अगर तलाशी लेने का ही शौक है तो ले लो.’’

इस से मैं ने अनुमान लगाया कि हथियार घर में नहीं है. हत्या करने के बाद या तो इस ने नहर में फेंक दिया है या कहीं दबा दिया है. फिर भी मैं ने तलाशी लेने का फैसला किया. मैं ने कांस्टेबल को बुला कर कहा कि नामो के रिश्तेदारों को अंदर भेज दे. 3 आदमी अंदर आए, जो सम्मानित लग रहे थे. उन में से एक फातिमा का पिता था, दूसरा जो उम्र में सब से बड़ा था, वह नामो का पिता था. तीसरा नामो का ससुर था. मैं ने उन्हें पूरी जानकारी दे कर कहा कि वे नामो से कह दें कि वह अपना अपराध स्वीकार कर ले और हत्या का हथियार बरामद करा दे.

नामो ने अपराध स्वीकार करने से मना कर दिया. मैं ने उस के घर की तलाशी लेने के लिए 2 कांस्टेबल लगा दिए. नामो अपने मातापिता से अलग रहता था. एक गली छोड़ कर दूसरी गली में उस के मातापिता का घर था. इस से भी मैं ने अनुमान लगाया कि नामो का बाप झूठ बोल रहा है कि नामो सारा दिन अपने घर से नहीं निकला था. दोनों के घरों में काफी दूरी थी. मैं ने नामो को गिरफ्तार कर लिया, उस के घर की बारीकी से तलाशी ली गई. टीन के एक संदूक से एक बड़ा चाकू निकला, जो एक कपड़े में लपेट कर रखा था. यह कमानीदार चाकू था, जो उन दिनों अपराधी लोग रखा करते थे.

इस के अलावा एक बरछे का फल निकला, जो जरूरत पड़ने पर बांस में लगाया जा सकता था. मैं ने दोनों हथियार अपने कब्जे में ले लिए. मैं नामो को ले कर थाने आ गया. अब मुझे पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार था. नामो की काररवाई कर के मैं दूसरे केसों में उलझ गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उस में हत्या का समय रात ढाई बजे के करीब लिखा था. मौत का कारण वही था, जो मैं ऊपर लिख चुका हूं. चाकू या कटार के वार से मृतक का दिल 2 जगह से कट गया था. पेट में गहरा घाव था, जिस से पेट की आंतें कट गई थीं.

मैं ने चाकू और बरछी मैडिकल टेस्ट के लिए भेज दीं, ताकि पता लग सके कि उन हथियारों पर खून के धब्बे तो नहीं थे. शाम तक रिपोर्ट आ गई, जिसे देख कर मैं चकरा गया. लिखा था कि दोनों हथियारों पर खून का कोई निशान नहीं मिला. शाम तक मृतक की लाश भी आ गई, जो कानूनी काररवाई कर के मृतक के घर वालों को सौंप दी गई. मैं समझ गया कि नामो ने हत्या कर के हथियार कहीं फेंक दिया है. अब उस से उगलवाना था कि हथियार कहां फेंका है? मैं ने एक कांस्टेबल से कहा कि वह नामो को हवालात से निकाल कर मेरे पास ले आए. अचानक मुझे मौकाएवारदात पर पाए गए निशानों का खयाल आ गया. कांस्टेबल उसे ले कर आ गया.

मैं ने कांस्टेबल को समझाया कि वह नामो को थाने के सहन में ले जा कर 10 कदम चलवाए और उस के बाद हवालात में बंद कर दे. कांस्टेबल मेरी बात समझ गया. उस ने उस के पैरों के निशान ले लिए और मुझे आ कर बता दिए. घटनास्थल पर मिले जूते के निशानों में जूते की तली में एड़ी की ओर ऐसा निशान उभरा था, जैसे जूता घिस गया हो और वहां चमड़े का टुकड़ा लगवाया गया हो. मैं ने नामो के खुरों के निशान देखे तो वे घटनास्थल पर पाए जाने वाले खुरों से बिलकुल अलग थे. मैं ने बैसाखी के निशान देखे तो वे भी अलग लगे. मैं ने अपने कमरे में जा कर कांस्टेबल को बुला कर कहा कि वह नामो को मेरे पास ले आए. वह उसे ले आया.

‘‘मैं तुम पर कोई दबाव नहीं बनाऊंगा, लेकिन तुम हत्या करना स्वीकार कर लो तो फायदे में रहोगे. एक बात याद रखो, यह आखिरी मौका है, इस के बाद मुझ से कोई उम्मीद मत रखना. घटनास्थल पर तुम्हारे खुरे मौजूद हैं, हत्या का कारण भी साफ है. तुम्हारे खिलाफ सबूत भी मजबूत हैं, बोलो बयान दोगे या नहीं?’’

‘‘मेरा बयान वही है, जो पहले दिया था. जब मैं ने हत्या की ही नहीं तो क्या बयान दूं. अगर मैं ने हत्या की होती तो मैं खुद थाने आ कर पेश हो जाता. अल्लाह गवाह है, वह मेरी मदद जरूर करेगा.’’

मुझे उस की बात में सच्चाई दिखाई दे रही थी. झूठा आदमी बयान देता है तो पता चल जाता है और सच बोलने वाले का चेहरा अलग ही पहचाना जाता है. मैं अपना शक दूर किए बिना नामो को छोड़ना नहीं चाहता था. मैं ने सोचा कि जरूरी नहीं कि नामो ने हत्या के समय यही जूते पहने हों. मैं ने एक कांस्टेबल से कहा कि वही नामो के घर जा कर उस के सारे जूते ले आए. साढ़े 11 बजे का समय. मुझ से एक कांस्टेबल ने कहा कि नामो का ससुर और बाप मिलना चाहता है. उन्होंने मेरे पास आ कर कहा कि वे नामो से मिल कर मुझ से बात करना चाहते हैं. मैं ने कहा कि अभी तफ्तीश चल रही है, इसलिए वे उस से नहीं मिल सकते.

नामो के बाप ने मेरे आगे हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘नामो पर दया करें मलिकजी. आप जो कहेंगे, आप की सेवा कर देंगे. अल्लाह ने हमें बहुत कुछ दिया है.’’

‘‘सेवा जरूर बताऊंगा, पहले मैं काम पूरा कर लूं. आप ऐसा करें, नामो से कहें मुझे सब कुछ सचसच बता दे. फिर मैं आप को सेवा बताऊंगा.’’

मेरी बात सुन कर वे एकदूसरे का मुंह देखने लगे. इतने में वह कांस्टेबल आ गया, जिसे मैं ने नामो के घर भेजा था. उस ने मुझे इशारे से बताया कि वह काम कर लाया है. मैं ने नामो के बाप और ससुर से कहा कि वे अच्छी तरह सोच लें, उस के बाद बताएं. उस के बाद मैं ने उन्हें भेज दिया. कांस्टेबल एक थैले में डाल कर 5 जोड़ी जूते ले आया था. उन में एक को छोड़ कर सभी जूते नए थे. पुराने जूते की तली में एक तला लगा हुआ था. मैं कांस्टेबल को ले कर उस जगह गया, जहां नामो के जूते के निशान थे. मैं ने कांस्टेबल से कहा कि वह नामो के दाएं पैर का जूता पहन कर कच्ची जमीन पर चले.

वह 8-10 कदम चला. मैं ने उन निशानों को ध्यान से देखा तो वे भी उन निशानों से थोड़े अलग थे. इस से मैं समझ गया कि नामो निर्दोष है. उस के अपराधी न निकलने से मेरी सारी मेहनत बेकार जा रही थी. मैं ने मुखबिरों को बुला कर आसपास के गांवों में ऐसे आदमी को ढूंढ़ने को कहा, जिस का बायां पैर कटा हुआ हो या फिर बाएं पैर की जगह वह बैसाखी के सहारे चलता हो. इस सारी काररवाई के बाद मैं ने नामो को छोड़ दिया. लेकिन उस से कह दिया था कि वह गांव से बाहर न जाए. अगर कहीं जाना हो तो थाने में बता कर जाए. अब मैं मुखबिरों के सहारे था. ऐसे आदमी को ढूंढ़ना कोई मुश्किल काम नहीं था.

मुखबिरों की कोशिश के बावजूद आसपास के गांवों में ऐसा कोई आदमी नहीं मिला. इस तरह 5 दिन बीत गए और मेरी तफ्तीश एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी. मैं हताश हो चला था. मैं अपने एसआई महेंद्र को नामो को लाने के लिए भेजने की सोच ही रहा था कि एक मुखबिर थाने आ गया. वह एक आदमी को साथ लाया था. मुखबिर ने बताया कि यह आदमी साथ वाले गांव में रहता है. जिस रात बख्तियार की हत्या हुई थी, उस की दूसरी सुबह यह एक शादी में गया था. रात को जब यह वापस आया तो इसे बख्तियार की हत्या की खबर मिली.

उसे यह भी पता चला कि पुलिस को एक ऐसे आदमी की तलाश है, जो बाईं टांग से लंगड़ा हो. इस आदमी ने बताया कि उस ने इस तरह का लंगड़ा आदमी घटना से एक दिन पहले देखा था. यह बात मुखबिर के कान में पड़ी तो वह उसे मेरे पास ले आया. मैं ने उस से पूरी बात बताने के लिए कहा. उस का नाम रूपकुमार था. उस के बताए अनुसार, वह घटनास्थल वाले गांव के साथ वाले गांव में रहता था. घटना से एक दिन पहले वह गांव के एक सिरे पर स्थित परचून की दुकान से कुछ सामान लेने गया था. वह दुकान एक रिटायर्ड फौजी की थी, जो विश्वयुद्ध में बर्मा के एक युद्ध क्षेत्र में घायल हो गया था. उस के घाव कुछ इस तरह के थे कि उस का दायां बाजू बेकार हो गया था. सब लोग उसे फौजी दुकानदार कहते थे.

रूपकुमार जब सौदा ले कर दुकान से निकलने लगा तो अचानक फौजी के घर का दरवाजा खुला. एक आदमी बैसाखी के सहारे घर से निकला और रूपकुमार को देख कर तुरंत अंदर चला गया. रूपकुमार ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया. उस से अगले दिन रूपकुमार अपने एक रिश्तेदार की शादी में चला गया. जब वह शादी से लौट कर आया तो उसे पता चला कि पास वाले गांव में एक आदमी की हत्या हो गई है. उस ने जब यह सुना कि पुलिस को एक लंगड़े हत्यारे की तलाश है तो उसे उस फौजी दुकानदार के घर से निकलने वाले लंगड़े की याद आ गई. उस ने लोगों से उस के बारे में बताया. बात फैलतेफैलते मेरे मुखबिर के कान तक पहुंची और वह उसे मेरे पास ले आया.

मैं ने रूपकुमार से कहा, ‘‘अगर वह लंगड़ा तुम्हारे सामने आ जाए तो क्या तुम उसे पहचान लोगे?’’

उस ने कहा, ‘‘मैं ने एक पल के लिए देखा था. लेकिन मैं उसे पहचान लूंगा, क्योंकि उस के चेहरे पर एक लंबा घाव का निशान था.’’

‘‘क्या तुम पूरे विश्वास से कह सकते हो कि उस की बाईं टांग नहीं थी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं जी,’’ वह कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘मुझे ऐसा शक है कि वह अपनी दाईं टांग पर खड़ा था और उस की बैसाखी बाईं ओर थी. मैं ने एसआई महेंद्र को बुला कर कहा कि वह फौजी दुकानदार को अपने साथ ले आए.

2 घंटे बाद महेंद्र सिंह फौजी को ले आया. उस का नाम प्रकाश नारायण था, लेकिन लोग उसे फौजी कहते थे. वह मेरे कमरे में आया. सांवले रंग का वह साधारण सा आदमी था. शक्ल से गरीब घराने का लगता था. वह कुछ घबराया हुआ लग रहा था. उस ने हाथ जोड़ कर मुझे प्रणाम किया और एक ओर खड़ा हो गया. मैं ने उसे बैठने के लिए कहा. वह बैठ गया तो उस से इधरउधर की बातें करने के बाद मैं ने पूछा, ‘‘वह लंगड़ा कहां है?’’

मेरा सवाल सुन कर प्रकाश ऐसा बिदका जैसे किसी ने सुई चुभो दी हो. वह हैरानी से मेरा मुंह देखने लगा. मैं ने सोच लिया कि उसे संभलने का मौका नहीं दूंगा.

उस ने कहा, ‘‘आप किस लंगड़े की बात कर रहे हैं, मैं समझा नहीं?’’

‘‘वही लंगड़ा, जिस के साथ मिल कर तुम ने हवलदार बख्तियार की हत्या की है.’’

यह सुनते ही प्रकाश ऐसे उछला, जैसे मैं ने उस पर बम फेंक दिया हो.

‘‘मेरे सामने झूठ बोलने की कोशिश मत करना प्रकाश, मेरे पास ऐसे कई गवाह हैं, जिन्होंने उस लंगड़े को तुम्हारे घर आतेजाते देखा है. अगर तुम ने झूठ बोला तो मैं तुम्हारा क्या हाल बनाऊंगा, सोच भी नहीं सकते. तुम्हारा एक हाथ तो बेकार है ही, दूसरा भी तोड़ दूंगा. फिर भीख मांगते फिरोगे.’’

वह हकला कर बोला, ‘‘मैं ने हत्या नहीं की है सर.’’

‘तो फिर किस ने की है?’’

‘‘जी, गुल्लू ने की है.’’ प्रकाश ने बड़ी मुश्किल से कहा.

‘‘यह गुल्लू कौन है, सीधी तरह उस का नाम बताओ?’’ मैं ने सख्ती से कहा.

‘‘उस का नाम गुलजार है, उसी को लंगड़ा गुल्लू कहते हैं.’’

‘‘हत्या के समय तुम उस के साथ थे?’’ मैं ने यह बात इसलिए कही कि वह मौके का गवाह हो सकता था..

‘‘नहीं सर,’’ उस ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘आप मुझ से चाहे जैसी कसम ले लें, हत्या के वक्त मैं उस के साथ नहीं था. वह अकेला ही था.’’

मैं ने प्रकाश से पूछा, ‘‘गुल्लू की बख्तियार से क्या दुश्मनी थी?’’

‘‘पुरानी बात है सर, गुल्लू ने अपना बदला लिया है. हवलदार की ही वजह से उस की टांग कटी थी.’’

प्रकाश ने जो बात बताई, उस के अनुसार, गुल्लू भी फौज में था और वह बख्तियार के साथ युद्ध में अगले मोरचे पर तैनात था. गुल्लू हवलदार के अधीनस्थ था. उस जमाने में हवलदार के अधीन 5 जवान हुआ करते थे. जंग जोरों पर थी. प्रकाश गुल्लू और 3 सिपाही बख्तियार के अधीन थे. एक दिन जापानियों का जोरदार हमला हो रहा था, बम बारिश की तरह बरस रहे थे. हवलदार बख्तियार ने गुल्लू को कोई काम बता कर कहा कि वह जा कर उस काम को करे. गुल्लू ने कहा कि हमले का जोर कम हो जाएगा तो वह उस काम को कर देगा.

हवलदार बहुत सख्त फौजी था, अनुशासन में रह कर काम करता था, अपनी बात मनवाने का आदी था. उस ने कहा, ‘‘यह काम अभी करो, मेरा आदेश है, नहीं तो तुम्हारे विरुद्ध काररवाई की जाएगी.’’

गुल्लू न चाहते हुए भी मोर्चे से बाहर चला गया. वह अभी कुछ दूर ही गया होगा कि एक गोला उस के पास आ कर फटा, जिस का एक छोटा टुकड़ा उस के मुंह पर लगा और दूसरा उस के घुटने पर. घाव इतना गहरा था कि डाक्टरों को उस की टांग काटनी पड़ी. गुल्लू को फौज से रिटायर कर दिया गया. इस घटना के लिए गुल्लू बख्तियार को ही जिम्मेदार मानता था. उस ने तभी प्रण कर लिया था कि वह उस से इस का बदला जरूर लेगा. कुछ दिनों बाद प्रकाश भी घायल हो कर गांव आ गया. गुल्लू को पता था कि प्रकाश हवलदार के साथ वाले गांव में रहता है.

प्रकाश और गुल्लू के पत्र के माध्यम से संबंध बने हुए थे. गुल्लू ने उस से कह रखा था कि बख्तियार जब भी गांव आए, उसे सूचित कर दे. जिन दिनों हवलदार बख्तियार गांव आया हुआ था. प्रकाश किसी काम से उस के गांव गया तो उसे पता चला कि वह गांव आया हुआ है. उस ने चिट्ठी लिख कर गुल्लू को हवलदार के गांव आने के बारे में बता दिया. गुल्लू प्रकाश के गांव आ गया और उस के घर में छिप गया. वह इतनी दूर से घोड़ी पर आया था. घटना वाली रात गुल्लू ने प्रकाश को बताया कि वह हवलदार का काम तमाम करने जा रहा है और वहीं से अपने गांव चला जाएगा.

गुल्लू अपनी घोड़ी पर बैठ कर रात को ही चला गया, अगले दिन प्रकाश को पता चला कि बख्तियार की हत्या हो गई है. मैं ने प्रकाश से गुल्लू के गांव का पता पूछा. उस ने जो पता बताया, वह मेरे थाने से 6-7 मील दूर था और मेरे इलाके में नहीं आता था. मैं ने प्रकाश का पूरा बयान लिखा और उसे गिरफ्तार कर के हवालात में बंद कर दिया.

मैं समय नष्ट करना नहीं चाहता था. मैं ने 2 कांस्टेबलों को साथ लिया और गुल्लू को गिरफ्तार करने चल दिया. मैं उस इलाके के थानेदार से मिला. वह एक सिख था. उस का नाम गजेंद्र सिंह था, उस ने मेरी बड़ी आवभगत की. मैं ने उसे अपने आने के बारे में बताया.

‘‘आप जलपान करें मलिकजी, आप का मुलजिम आप को मिल जाएगा.’’ कह कर उस ने एक हैडकांस्टेबल और 2 सिपाहियों को इस आदेश के साथ गुल्लू के गांव भेज दिया कि वे उसे गिरफ्तार कर के थाने ले आएं.

आधे घंटे बाद हैडकांस्टेबल और सिपाही एक आदमी को ले आए. मैं उसे देखते ही समझ गया कि यही गुल्लू है. वह दाईं टांग से बैसाखी पर चल रहा था. वे लोग उसे तांगे पर बिठा कर लाए थे. मैं ने देखा कि उस के चेहरे पर गहरे लंबे घाव का निशान था. गुल्लू ने वैसी ही जूती पहनी हुई थी. मैं ने उस की जूती उतरवा कर देखी तो उस के नीचे तला लगा हुआ था. गजेंद्र सिंह ने कानूनी काररवाई पूरी कर के अपराधी मेरे हवाले कर दिया. मैं उसे ले कर अपने थाने लौट आया.

रात को मैं ने गुल्लू को अपने कमने में बुलाया तो हैडकांस्टेबल ने उसे मेरे सामने ला कर खड़ा कर दिया. उस की आंखें नींद से भारी हो रही थीं. मैं ने हैडकांस्टेबल को इशारा किया कि इसे सोने मत देना. जैसे ही उसे झपकी आती, वह उस के बाल पकड़ कर जोरदार झटका देता. मैं ने उसे खड़ा रखने को कहा.

‘‘तुम अपनी गिरफ्तारी का कारण समझ गए हो गुल्लू,’’ मैं ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें ऐसे ही गिरफ्तार नहीं किया, मेरे पास तुम्हारे खिलाफ पक्के सबूत हैं और गवाह भी. तुम ने हवलदार बख्तियार की हत्या की है, मौकाएवारदात पर तुम्हारी जूतियों के निशान मिले हैं. इस के अलावा तुम्हारे दोस्त प्रकाश ने सब कुछ उगल दिया है और हत्या का कारण भी बता दिया है. अब तुम्हारे पास हत्या की बात स्वीकार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है.’’

‘‘हां, उस भेडि़ए की हत्या मैं ने ही की है.’’ उस ने नींद से पीछा छुड़ाने के लिए अपने सिर को झटका देते हुए कहा, ‘‘मैं ने उस से बदला ले लिया है. अब मैं जिंदा नहीं रहना चाहता. पूछो, क्या पूछते हो?’’

मैं ने उसे अपने सामने कुरसी पर बिठा दिया. उस ने अपना काफी लंबा बयान दिया, जिसे मैं यहां छोटा कर के बता रहा हूं.

बात उन दिनों की थी, जब विश्वयुद्ध जोरों पर था. जो भी हृष्टपुष्ट जवान दिखाई देते थे, उसे भरती कर लिया जाता था. गरीब घर का गुल्लू जवान था. उस का बाप दूसरों की जमीन ले कर बटाई पर खेती करता था. गुल्लू को यह काम पसंद नहीं था. गुल्लू भी फौज में भर्ती हो गया. उस ने सोचा कि साल, 2 साल में पैसा इकट्ठा हो जाएगा तो शादी कर लेगा. गुल्लू के 2 बड़े भाई थे, जो विवाहित थे. जब लड़ाई ने जोर पकड़ा तो गुल्लू की यूनिट को अगले मोर्चे पर जाने का आदेश मिला. वह बर्मा का मोर्चा था.

जापानी फौज तेजी से आगे बढ़ती हुई बर्मा तक पहुंच गई थी. प्रकाश भी इसी यूनिट में था. गुल्लू और प्रकाश में दोस्ती हो गई थी. बख्तियार इस यूनिट का हवलदार था. प्रकाश और गुल्लू उस के अधीन सिपाही थे. हवलदार बख्तियार बहुत सख्त था. जब वह गुस्से से बात करता था तो उस की आवाज ऐसी निकलती थी, जैसे कोई भेडि़या गुर्रा रहा हो.

प्रकाश और गुल्लू अकसर उस की सख्ती का निशाना बनते थे. गुल्लू तो उस से इतना तंग आ चुका था कि एक दिन उस ने प्रकाश से कहा कि किसी दिन गोलाबारी के बीच वह इस भेडि़ए को गोली मार देगा. लेकिन उसे इस का मौका कभी नहीं मिला. उस के बाद वह घटना घट गई, जिस में उस की टांग चली गई. गुल्लू बेकार हो कर घर आ गया. लंगड़ा होने के साथसाथ चेहरे पर जो घाव आए थे, उस से वह बदसूरत हो गया था. उस की हालत देख कर उस की बूआ ने उस से रिश्ता तोड़ने के लिए कह दिया. गुल्लू को इस का बहुत दुख हुआ. इतना ही नहीं, उस की मंगेतर ने भी कह दिया कि एक लंगड़े और बदसूरत आदमी के साथ वह पूरा जीवन नहीं गुजार सकती.

गुल्लू इस सब का जिम्मेदार बख्तियार को मानता था. वह उस से इतनी अधिक घृणा करने लगा कि अगर उस का बस चलता तो जंग में ही उसे गोली मार देता. उस के एक महीने बाद प्रकाश भी घायल हो कर घर आ गया. दोनों में पक्की दोस्ती हो गई. खतोखिताबत होने लगी. गुल्लू को पता था कि बख्तियार प्रकाश के साथ वाले गांव में रहता है. उस ने प्रकाश से कह रखा था कि जब भी बख्तियार घर आए, उसे जरूर सूचना दे दे. युद्ध समाप्त हो गया तो हवलदार बख्तियार रिटायर हो कर अपने गांव आ गया. प्रकाश को पता चला तो उस ने गुल्लू को पत्र द्वारा सूचना दे दी.

सूचना मिलते ही गुल्लू एक घोड़ी पर सवार हो कर प्रकाश के घर आ गया. घर से चलते समय उस ने एक लंबा तेज धार वाला चाकू अपने पास रख लिया था. दिन के समय प्रकाश और गुल्लू घोडि़यों पर सवार हो कर बख्तियार के गांव चले गए. वे गांव के अंदर न जा कर बाहर से चक्कर काट कर खेतों की ओर चले गए. प्रकाश ने यह पता कर लिया था कि बख्तियार रात को खेतों में सोता है और उस के पास एक बंदूक भी है, जिसे वह अपने पास रखता है.

प्रकाश ने दूर से गुल्लू को वह खेत दिखा दिए, जहां बख्तियार सोता था. गुल्लू को जगह दिखा कर वह वापस आ गया. अब गुल्लू बेचैनी से रात का इंतजार करने लगा. आधी रात के समय वह प्रकाश के घर से निकला. दोनों के बीच यह तय हुआ था कि अगर गुल्लू हवलदार की हत्या करने में कामयाब हो गया तो वापस नहीं आएगा और अगर कामयाब नहीं हुआ तो फिर प्रकाश के घर आ जाएगा. आधी रात का समय था. जब गुल्लू बख्तियार के गांव के बाहर होता हुआ खेतों की तरफ पहुंचा. उस ने दूर से देखा तो हवलदार एक चारपाई पर सोता दिखाई दिया. वह अपनी घोड़ी को धीरेधीरे चला कर खेत के किनारे पहुंच गया. वहां से वह हवलदार की ओर बढ़ा. हवलदार उस वक्त गहरी नींद सोया हुआ था.

गुल्लू किसी तरह की आहट किए बिना हलवदार के सिर की ओर पहुंच गया. सिर की ओर इसलिए कि अगर उस की आंख खुल भी जाए तो वह दिखाई न दे. उस ने बैसाखी जमीन पर रखी और चाकू निकाल कर हवलदार के सीने में भोंक दिया. चाकू लगने पर हवलदार एक झटके के साथ उठा और उस के मुंह से भयानक चीख निकली. उस ने बाएं हाथ से बंदूक पकड़ी, लेकिन तब तक गुल्लू ने चाकू का दूसरा वार कर दिया. बंदूक हवालादार के हाथ से छूट कर जमीन पर गिर पड़ी. गुल्लू उस समय बदले की भावना से पागल हो गया था. उस ने तीसरा वार हवलदार के पेट पर कर के पेट फाड़ दिया.

हवलदार मुंह के बल आधा चारपाई से नीचे गिर गया, जबकि उस का आधा धड़ चारपाई पर ही रहा. इस से उस की जान निकल गई. गुल्लू ने खून से सना चाकू हवलदार के कपड़ों से साफ कर के अपनी जेब में रख लिया. फिर बैसाखी उठाई और घोड़ी पर सवार हो कर अपने गांव चला गया. मैं ने उस से पूछा कि वह चाकू कहां है, जिस से हवलदार की हत्या की थी? उस ने बताया कि घर में मचान पर फेंक दिया था. मैं ने उस का पूरा बयान लिख कर उस के हस्ताक्षर करा लिए और उसे ले कर चाकू बरामद करने चला गया. उस के गांव पहुंच कर नंबरदार और 2 सम्मानित व्यक्तियों को साथ ले कर गुल्लू के घर गया, जहां गुल्लू ने मचान से चाकू बरामद करा दिया.

मैं ने गुल्लू को मैजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के उस का बयान करा दिया. गुल्लू ने वही बयान मजिस्ट्रैट के सामने भी दिया. मौके का कोई गवाह नहीं था. अगर गुल्लू अपने बयान से पलट जाता तो बच जाता. लेकिन उसे अब जिंदा रहने में कोई रुचि नहीं थी. उस ने बताया कि अपंग होने के कारण उस के भाई और भाभियां उसे बोझ समझते हैं. सेशन जज ने गुल्लू को मृत्युदंड दिया, जबकि प्रकाश को उस का साथ देने के लिए 5 साल के कारावास की सजा दी. हाईकोर्ट में गुल्लू के बाप ने अपील की, जहां उस के मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया गया. गुल्लू की जान बचने पर उस के बाप को खुशी हुई, लेकिन गुल्लू को कोई खुशी नहीं हुई थी. Crime Stories

 

Jaipur Crime: पैसे के खेल में मिली जेल

Jaipur Crime: जयपुर स्थित पुलिस चौकी रेनवाल मांजी के इंचार्ज सत्यपाल ने करीब डेढ़ लाख के इनामी बदमाश नंदू और उस के साथियों को 10 लाख रुपए ले कर छोड़ दिया होता तो पुलिस का एक दूसरा चेहरा कभी सामने न आता, लेकिन पुलिस ने सत्यप्रकाश का गेम ऐसा बिगाड़ा कि बदमाश तो जेल गए ही, मोटी रकम का सपना देखने वाले 3 पुलिस वाले भी नप गए.

29 अप्रैल की दोपहर को यही कोई डेढ़-पौने 2 बज रहे थे. गरमी ऐसी जैसे आसमान से आग बरस रही हो. ऊपर से लू चल रही थी. भयानक गरमी और लू के बावजूद गुड़गांव पुलिस जयपुर के भांकरोटा-जयसिंहपुरा रोड पर दिल्ली के नंबर वाली एक फौर्च्युनर गाड़ी का पीछा कर रही थी. पुलिस की गाड़ी में 4-5 लोग सवार थे, जबकि दिल्ली के नंबर की जिस गाड़ी का वे पीछा कर रहे थे, उस में 3 लोग सवार थे.

गुड़गांव पुलिस आगे वाली उस गाड़ी का पीछा करते हुए भांकरोटा चौराहे से करीब आधा किलोमीटर दूर जयसिंहपुरा के पास उस गाड़ी के एकदम करीब पहुंच गई. इस से फौर्च्युनर में सवार लोगों को लगा कि वे घिर गए हैं. अपने आप को घिरा देख उन्होंने गाड़ी रोक दी और पीछा कर रही गुड़गांव पुलिस की गाड़ी पर फायरिंग करनी शुरू कर दी. जवाब में पुलिस ने भी 8-10 राउंड गोलियां चलाईं. फिल्मी स्टाइल में दिनदहाड़े सरेआम मेनरोड पर गोलियां चलने से उधर से वाहनों से गुजर रहे लोग और राहगीर दहशत में आ गए. ट्रैफिक रुक गया और लोग जान बचाने के लिए इधरउधर भागने लगे.

इस बीच गुड़गांव पुलिस ने फायरिंग करने वाले बदमाशों में से एक को पहचान लिया था. वह दिल्ली का नंबर वन मोस्टवांटेड अपराधी कपिल सांगवान उर्फ नंदू था. उस पर करीब डेढ़ लाख रुपए का इनाम घोषित था. उस की दिल्ली पुलिस के साथसाथ हरियाणा पुलिस को भी तलाश थी. सड़क पर मची भगदड़ का फायदा उठाते हुए बदमाश अपनी गाड़ी में सवार हो कर सड़क के किनारे खड़े एक टैंपो को टक्कर मारते हुए भाग निकले. गुड़गांव पुलिस उन का पीछा करने के लिए गाड़ी मोड़ ही रही थी कि तभी एक ट्रक उन की गाड़ी के सामने आ गया. ट्रक निकल गया तो गुड़गांव पुलिस ने फिर से बदमाशों की गाड़ी का पीछा किया.

पुलिस को बदमाशों की गाड़ी भांकरोटा से मुहाना जाने वाले समानांतर रास्ते पर 2-3 सौ मीटर दूर दिखाई दी, लेकिन कुछ दूर जाने के बाद बदमाशों की गाड़ी जगदगुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत यूनिवर्सिटी के पास पुलिस की आंखों से ओझल हो गई. गुड़गांव पुलिस ने कुछ देर तक इधरउधर घूम कर बदमाशों की तलाश की, लेकिन उन का कोई पता नहीं चला.

थकहार कर गुड़गांव पुलिस ने इस बात की सूचना आला अधिकारियों को देने के साथ यह भी बता दिया कि मोस्टवांटेड अपराधी नंदू भी उन में शामिल था. इस के बाद गुड़गांव पुलिस के अधिकारियों ने तुरंत जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल से फोन पर बात की. बातचीत से पता चला कि गुड़गांव पुलिस ने बदमाशों की तलाश में अपने आने की सूचना जयपुर पुलिस को नहीं दी थी. खैर, जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने दिल्ली और हरियाणा के कुख्यात अपराधी नंदू के जयपुर में होने और बदमाशों द्वारा फायरिंग किए जाने की घटना को गंभीरता से लिया. उन्होंने तुरंत पूरे जयपुर में कड़ी नाकेबंदी करवा दी.

भांकरोटा, जयसिंहपुरा, नेवटा सहित आसपास के इलाकों में जयपुर पुलिस की क्यूआरटी व एटीएस के अलावा कई थानों की पुलिस ने पूरे शहर की घेराबंदी कर ली. राजस्थान की राजधानी जयपुर से बाहर जाने वाले सभी रास्तों पर पुलिस ने कड़ी निगरानी शुरू कर दी. खासतौर से दिल्ली रोड और सीकर रोड पर बदमाशों के भागने की आशंका को देखते हुए पुलिस की विशेष टीमें लगाई गईं. जयपुर पुलिस उस दिन दोपहर से ले कर रात तक सड़कों पर डटी रही, साथ ही भांकरोटा, जयसिंहपुरा व मुहाना आदि इलाकों में गश्त भी करती रही, लेकिन फायरिंग कर के भागने वाले बदमाशों के बारे में कोई सुराग नहीं मिला.

हालांकि यह गुड़गांव पुलिस का मामला था, लेकिन दिल्ली और हरियाणा के कुख्यात अपराधी नंदू और उस के साथियों के जयपुर में होने और पुलिस पर फायरिंग कर के भागने की घटना से जयपुर पुलिस कमिश्नर चिंतित हो उठे थे. चिंता की एक खास वजह यह भी थी कि करीब सवा महीने पहले 21 मार्च को राजस्थान के कुख्यात अपराधी और मोस्टवांटेड आनंदपाल तथा उस के गुर्गे नागौर में पुलिस पर गोलियां बरसा कर भाग निकले थे. इस घटना से राजस्थान पुलिस की काफी छीछालेदर हुई थी. इसलिए जयपुर पुलिस नंदू के मामले में किसी तरह की लापरवाही नहीं बरतना चाहती थी.

दरअसल, गुड़गांव पुलिस ने इस घटना से 1-2 दिन पहले लूट के आरोप में 2 बदमाशों को गिरफ्तार किया था. उन से पूछताछ में पता चला था कि नंदू अपने कुछ साथियों के साथ जयपुर में है. इसी सूचना के आधार पर गुड़गांव पुलिस की क्राइम ब्रांच के सबइंसपेक्टर सुरेंद्र और सतीश कुमार के साथ उन की टीम 29 अप्रैल को जयपुर आई थी. गुड़गांव पुलिस को कपिल सांगवान उर्फ नंदू की एक लग्जरी कार की लूट के मामले तलाश में थी.

मोस्टवांटेड नंदू की इस कहानी में उसी दिन एक नया मोड़ आ गया. भांकरोटा चौराहे के पास जयसिंहपुरा रोड पर गुड़गांव पुलिस से मुठभेड़ के बाद नंदू अपने दोनों साथियों के साथ फौर्च्युनर गाड़ी से भाग रहा था, तभी डिग्गी रोड पर रेनवाल मांजी पुलिस चौकी के सामने वाली सड़क पर उन की गाड़ी का एक टायर फट गया. टायर फटने के बावजूद बदमाश अपनी गाड़ी को तेजी से भगा कर ले जा रहे थे. टायर फटने से उछलती हुई दौड़ रही गाड़ी को देख कर एक टायर पंक्चर बनाने वाले युवक को शक हुआ. उस ने यह बात पुलिस चौकी के पास स्थित पैट्रोल पंप के मालिक कैलाश चौधरी को बताई तो वह अपने पैट्रोल पंप के केबिन से बाहर निकल आए. बाहर आ कर उन्होंने देखा, कार रोक कर उस में 3 लड़के उतरे और अपने बैग ले कर तेजी से भागने लगे.

उन लड़कों के भागने से आसपास के लोगों को शक हुआ तो कुछ लोगों ने उन्हें थोड़ी दूर दौड़ा कर धांधो की ढाणी के पास पकड़ लिया. इस बीच, वहीं चाय की दुकान करने वाले एक आदमी ने रेनवाल मांजी पुलिस चौकी को इस मामले की सूचना दे दी. लोगों ने जिस जगह तीनों युवकों को पकड़ा था, वह जगह पुलिस चौकी से करीब आधा किलोमीटर दूर थी, इसलिए 5 मिनट में ही चौकी से 2 सिपाही निर्मल और कालूराम मोटरसाइकिल से वहां आ पहुंचे. दोनों सिपाही उन लड़कों के हावभाव देख कर ही समझ गए कि ये कोई भले आदमी नहीं हैं. सिपाहियों ने वहां मौजूद लोगों से कहा कि इन्होंने जयपुर में एक्सीडेंट किया है, इसीलिए इन की गाड़ी का बंपर टूट गया है और टायर भी फट गया है. उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है, पुलिस इन से पूछताछ कर के भागने के कारणों का पता लगा लेगी.

इस तरह वहां जमा लोगों को भरोसा दे कर दोनों सिपाही तीनों युवकों को रेनवाल मांजी पुलिस चौकी ले गए. यह दोपहर करीब 3 बजे की बात है. सिपाही निर्मल और कालूराम तीनों युवकों को ले कर रेनवाल मांजी पुलिस चौकी पहुंचे तो चौकीप्रभारी एएसआई सत्यप्रकाश वहां मौजूद थे. यह चौकी जयपुर ग्रामीण जिला पुलिस के थाना फागी के अंतर्गत आती है. चौकीप्रभारी सत्यप्रकाश ने तीनों युवकों के बैगों की तलाशी ली तो उन में से पिस्तौल और कारतूस के अलावा कुछ रकम भी मिली. पिस्तौल और कारतूस देख कर सत्यप्रकाश समझ गए कि ये तीनों वही अपराधी हैं, जिन के लिए जयपुर पुलिस ने नाकेबंदी कर रखी है.

जयपुर पुलिस का वायरलैस मैसेज पहले ही चौकी पर पहुंच चुका था, जिस में कहा गया था कि दिल्ली और हरियाणा का मोस्टवांटेड नंदू गुड़गांव पुलिस पर फायरिंग कर के अपने 2 साथियों के साथ एक फौर्च्युनर गाड़ी में भागा है. नंदू की तलाश में कड़ी नाकेबंदी की जाए. चौकीप्रभारी ने एक क्रेन बुलवा कर तीनों युवकों की फटे टायर वाली फौर्च्युनर गाड़ी खिंचवा कर चौकी पर मंगवा ली थी. सत्यप्रकाश ने तीनों के नामपते पूछे तो उन में एक ने अपना नाम नवीन राठी तो दूसरे ने हिमांशु छिल्लर और तीसरे ने सचिन छिंकारा बताया. हथियारों के बारे में वे कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे पाए. सत्यप्रकाश को पता चल चुका था कि ये युवक और कोई नहीं, नंदू और उस के साथी हैं.

इस बात को पुख्ता करने के लिए उन्होंने थोड़ी सख्ती की तो तीनों युवकों में से एक स्मार्ट से युवक ने सत्यप्रकाश से सीधेसीधे कहा, ‘‘देखो साहब, मेरा नाम नवीन राठी नहीं, बल्कि नंदू है. ये दोनों मेरे साथी हैं. हरियाणा का एक गैंग हमारे पीछे पड़ा है. वे लोग हमें मार देंगे. आप हमें छोड़ दो, बोलो कितना पैसा चाहिए? इस के अलावा हम तीनों को जयपुर पुलिस भी तलाश रही है. यह नाकेबंदी हमारे लिए ही हो रही है.’’

वह गांव की पुलिस चौकी थी. चौकीप्रभारी सत्यप्रकाश खेलाखाया पुलिस वाला था. उसे पता था कि तीनों ही मोटी मुर्गियां हैं, इसलिए उस ने नंदू की आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘ठीक है, हम तुम को बचा लेंगे. लेकिन इस के लिए तुम्हें 30 लाख रुपए देने होंगे.’’

‘‘इंचार्ज साहब, कभी 30 लाख रुपए गिने भी हैं या सिर्फ जुबान से कह दिया?’’ नंदू ने कुटिलता से कहा, ‘‘2-4 लाख की बात हो तो कहो, वरना 5-7 दिन जेल में रह लेंगे. उस के बाद जमानत हो जाएगी. हमारे लिए जेल आनाजाना कोई नई बात नहीं है.’’

सत्यप्रकाश समझ गए कि तीनों बदमाश पैसे तो दे देंगे, लेकिन सौदेबाजी करनी पड़ेगी. उन्होंने पुलिसिया भाषा में सौदेबाजी की तो नंदू 10 लाख रुपए देने पर राजी हो गया. चौकी पर सत्यप्रकाश के अलावा 2 सिपाही निर्मल और कालूराम भी थे. उन्हें भी सारी बातें पता थीं. सत्यप्रकाश ने दोनों सिपाहियों को अपने विश्वास में ले कर उन्हें 3-3 लाख रुपए में राजी कर लिया. इतनी रकम के लिए दोनों सिपाही अपनी जुबान बंद रखने को तैयार हो गए.

सत्यप्रकाश और नंदू के बीच सौदेबाजी हो गई तो नंदू ने गुड़गांव के अपने एक साथी को फोन कर के कहा, ‘‘मैं जयपुर से बोल रहा हूं. यहां जयपुर पुलिस ने हमें पकड़ लिया है. 10 लाख रुपए ले कर आ जाओ, नहीं तो ये लोग हमें गिरफ्तार कर लेंगे.’’

इसी के साथ नंदू ने उसे यह भी बता दिया कि किस आदमी से 10 लाख रुपए मिलेंगे. साथ ही यह भी बता दिया कि 10 लाख रुपए ले कर रेनवाल मांजी पुलिस चौकी आना है. पुलिस से सौदा होने के बाद नंदू और उस के साथियों की चिंता और तनाव थोड़ा कम हुआ. खुद को रिलैक्स महसूस करते हुए उन्होंने सोचा कि जान बची तो लाखों पाए. सौदेबाजी के बाद नंदू और उस के साथियों की चौकीइंचार्ज और दोनों सिपाहियों से दूरियां खत्म हो गईं. नंदू ने सत्यप्रकाश से कह कर चायनाश्ता मंगवाया. तीनों बदमाश चौकी में ही मेहमान की तरह कुर्सियों पर आराम करने लगे.

सत्यप्रकाश के कहने पर पुलिस चौकी के रसोइए मानसिंह ने उन तीनों के लिए रात का खाना बनाया तो उन्होंने रात करीब साढ़े 8 बजे डिनर किया. इस के बाद तीनों पुलिस चौकी में बने इंचार्ज के रेस्टरूम में आराम करने लगे. बीचबीच में वे अपने साथियों से मोबाइल पर बात भी कर रहे थे. चौकी का एक सिपाही कमरे के बाहर पहरा दे रहा था. दूसरी ओर एडिशनल सीपी (क्राइम) प्रफुल्ल कुमार के निर्देश और डीसीपी (क्राइम) डा. विकास पाठक के नेतृत्व में गठित जयपुर पुलिस की विशेष टीमें हरियाणा पुलिस पर फायरिंग कर के भागे तीनों बदमाशों की तलाश में जुटी थीं.

इन्हीं पुलिस टीमों में से एक को जगदगुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत यूनिवर्सिटी के पास मल्टीस्टोरी फ्लैट्स में हरियाणा के कुछ युवकों के रहने और दिल्ली के नंबरों की गाडि़यों के आनेजाने की जानकारी मिली. इस जानकारी के आधार पर पुलिस टीम ने रात करीब साढ़े 7 बजे एक फ्लैट पर छापा मारा. फ्लैट की तलाशी में सिम का रैपर, मोबाइल का खाली डिब्बा और कई ऐसे दस्तावेज मिले, जिन से पता चला कि इस फ्लैट में कपिल सांगवान उर्फ नंदू रहता था.

रैपर से पुलिस को मोबाइल का नंबर मिल गया. उस नंबर को पुलिस ने सर्विलांस पर लगाया तो उस की लोकेशन रेनवाल के आसपास आ रही थी. इस के बाद पुलिस की एक टीम रेनवाल इलाके में नंदू और उस के साथियों की तलाश में लग गई. इस पुलिस टीम ने रेनवाल मांजी चौकी के भी 2-3 चक्कर लगाए, पर न तो वहां कोई फौर्च्युनर गाड़ी नजर आई और न ही नंदू और उस के साथी.

इस पुलिस टीम ने रेनवाल मांजी पुलिस चौकी में जाने की जरूरत इसलिए महसूस नहीं की क्योंकि अगर कोई संदिग्ध बदमाश पकड़े जाते तो अब तक पूरे जयपुर में वायरलैस गूंज रहे होते और वहां तमाम आला अफसरों का जमावड़ा लग गया होता. दूसरा कारण यह था कि चौकीइंचार्ज सत्यप्रकाश ने नंदू और उस के साथियों की फौर्च्युनर गाड़ी को झाडि़यों में इस तरह छिपा दिया था कि बाहर से देखने पर वह किसी को नजर नहीं आ रही थी.

नंदू का मोबाइल सर्विलांस पर लगा होने की वजह से पुलिस को यह पता चल गया कि गुड़गांव से कुछ लोग 10 लाख रुपए ले कर जयपुर आ रहे हैं. साथ ही यह भी कि पैसा लाने वालों में से एक का नाम गजराज सिंह है. पुलिस ने उन के फोन टेप करने शुरू किए. गुड़गांव से आ रहे लोगों की लोकेशन जयपुर-दिल्ली रोड की आ रही थी.

इस जानकारी के आधार पर जयपुर पुलिस ने दिल्ली रोड पर लगी नाकेबंदी सख्त करवा दी, साथ ही दिल्ली और हरियाणा के नंबर वाली गाडि़यों की तलाशी सख्ती से ली जाने लगी. नाकेबंदी के दौरान क्राइम ब्रांच एवं दक्षिणी जिले की स्पैशल पुलिस टीम ने जयपुर के पास थाना मुहाना की टीलावाला चौकी के पास एक गाड़ी रोकी. उस गाड़ी में 3 लोग सवार थे. गाड़ी की तलाशी में एक बैग मिला, जिस में 10 लाख रुपए भरे थे. पुलिस ने गाड़ी में सवार तीनों लोगों से पूछताछ की तो उन्होंने अपने नाम गजराज सिंह, परमजीत सिंह और पंकज बताए.

इन तीनों से सख्ती से पूछताछ की गई तो जयपुर ग्रामीण जिले की रेनवाल मांजी पुलिस का भांडा फूट गया और पुलिस का एक दूसरा ही चेहरा सामने आ गया. उन तीनों ने बताया कि नंदू और उस के साथियों को जयपुर ग्रामीण जिले की पुलिस ने पकड़ रखा है और उन्हें छोड़ने के लिए 10 लाख रुपए मांगे हैं. नंदू ने ही उन्हें फोन कर के 10 लाख रुपए लाने को कहा था. ये रुपए ले कर वे रेनवाल मांजी पुलिस चौकी जा रहे थे. उन्होंने यह भी बताया कि नंदू और उस के साथी रेनवाल पुलिस चौकी पर ही हैं.

जांच में लगी पुलिस टीमों ने यह बात अपने उच्चाधिकारियों को बताई. अब जयपुर पुलिस को बेहद सावधानी बरतनी थी, क्योंकि मामले में पुलिस का दूसरा चेहरा सामने आ गया था, साथ ही रेनवाल मांजी चौकी पुलिस को पता चलने पर नंदू और उस के साथियों की जान का खतरा भी हो सकता था. इस के अलावा नंदू की गुड़गांव से आए उस के साथियों से मोबाइल पर बातचीत जारी रखवानी थी, ताकि नंदू या रेनवाल मांजी चौकी पुलिस को यह शक न हो कि 10 लाख रुपए ला रहे उस के साथियों को पुलिस ने पकड़ लिया है.

जब इस बात की जानकारी जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल को हुई तो उन्होंने रणनीति बना कर रेनमाल मांजी पुलिस चौकी पर छापा मारा. इस के लिए पुलिस टीम ने रात के 12 बजे का समय चुना था. नंदू और उस के दोनों साथी इंचार्ज के कमरे में आराम करते मिल गए. चौकीइंचार्ज सत्यप्रकाश और दोनों सिपाही निर्मल और कालूराम भी वहीं थे. पुलिस ने नंदू और उस के साथियों को तो पकड़ा ही, साथ ही चौकीइंचार्ज सत्यप्रकाश और दोनों सिपाहियों को भी हिरासत में ले लिया.

जयपुर पुलिस द्वारा आधी रात को मारे गए छापे से नंदू और उस के साथियों के अलावा चौकी के तीनों पुलिसकर्मी भी हैरान थे कि यह सब अचानक कैसे हो गया? जब जयपुर पुलिस ने बाहर गाड़ी में बैठे गुड़गांव से आ रहे गजराज सिंह, परमजीत सिंह और पंकज को बाहर निकाला तो उन की समझ में आ गया कि इन्हीं लोगों से पुलिस को उन के रेनवाल मांजी चौकी में होने की जानकारी मिली होगी. एक ही दिन में नंदू के आपराधिक जीवन में यह तीसरा मोड़ आया था.

इस बीच एक और घटना घट गई. हुआ यह कि शुरुआती पूछताछ के बाद जयपुर पुलिस ने 30 अप्रैल को रेनवाल मांजी चौकीइंचार्ज सत्यप्रकाश और दोनों सिपाहियों निर्मल और कालूराम को भांकरोटा थाना पुलिस के हवाले कर दिया. तीनों आरोपी भी उसी थाने में थे. हालांकि एक तरह से वे अपराधी थे, लेकिन उन्हें हवालात में नहीं रखा गया था. इसलिए तीनों पुलिस की नजरों के बीच थाने में इधरउधर घूम रहे थे.

इस का फायदा उठा कर एएसआई सत्यप्रकाश टहलतेटहलते शाम को थाने से बाहर निकल कर फरार हो गया. उसे भागने का मौका भी मिला तो उस वक्त जब जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल कमिश्नर औफिस में नंदू और उस के साथियों के पकड़े जाने की जानकारी देने के लिए प्रैस कौन्फ्रैंस कर रहे थे. उस समय थाना भांकरोटा के थानाप्रभारी हेमेंद्र शर्मा कमिश्नर औफिस में ही थे. कहा जाता है कि सत्यप्रकाश किसी परिचित की कार से भागा था, लेकिन पुलिस ने सत्यप्रकाश को 20 घंटे बाद अगले दिन एक मई को बीकानेर से पकड़ लिया. इस से जयपुर पुलिस की लाज बच गई.

अपराधियों से मिलीभगत करने के आरोप में जयपुर आईजी हेमंत प्रियदर्शी ने एएसआई सत्यप्रकाश और दोनों सिपाहियों निर्मल और कालूराम को निलंबित कर दिया. यह अलग बात है कि अगर सत्यप्रकाश, निर्मल और कालूराम अपराधियों को छोड़ने के एवज में सौदेबाजी न करते तो उन्हें प्रमोशन तो मिलता ही, नंदू और उस के साथी बदमाशों पर पुलिस की ओर से घोषित करीब 2 लाख रुपए की इनाम की राशि भी मिल सकती थी.

नंदू के जीवन में एक ही दिन में 3 मोड़ आने के बाद भी उस की परेशानी खत्म नहीं हुई थी. पहले हरियाणा पुलिस से मुठभेड़ हुई. उस में बचा तो ग्रामीणों ने पुलिस को सौंप दिया. पुलिस से सौदेबाजी की तो भी किस्मत धोखा दे गई. खुद के साथ उस के साथी भी पकड़े गए. गुड़गांव से मंगाए 10 लाख रुपए भी गए और रुपए लाने वाले भी पुलिस के हत्थे चढ़ गए. दिल्ली और हरियाणा में गैंग के लोगों को जब पता चला कि नंदू सहित उन के 6 साथियों को जयपुर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है तो गिरोह के 4 लोग उन की जमानत के लिए 5 लाख रुपए ले कर 1 मई को जयपुर पहुंचे. नंदू की किस्मत यहां भी धोखा दे गई. वे चारों भी पुलिस के हत्थे चढ़ गए.

पुलिस ने उन्हें दौलतपुरा टोल के पास नाकेबंदी के दौरान पकड़ लिया. वे हरियाणा के नंबर की टाटा सफारी में सवार थे. उन की गाड़ी में बिना लाइसैंसी रिवौल्वर, 10 जिंदा कारतूस और 5 लाख रुपए नकद मिले. पकडे़ गए आरोपियों में अजय कुमार जाट, संदीप जाट, राजन जाट और सतपाल जाट शामिल थे. ये चारों हरियाणा के झज्जर के रहने वाले थे. इन में सतपाल उस गजराज सिंह का भाई था, जो गुड़गांव से नंदू को छुड़वाने के लिए 10 लाख रुपए ले कर जयपुर जा रहा था.

नंदू गिरोह के हौसले इतने बुलंद थे कि जयपुर पुलिस द्वारा 6 साथियों के पकड़े जाने के बाद भी सतपाल ने पकड़ने वाले पुलिस इंसपेक्टर से कहा, ‘‘हमें तो गजराज और उस के साथियों की जमानत करानी है. इस में मदद कर के जो चाहो, मिल जाएगा.’’

जयपुर पुलिस ने हरियाणा पुलिस पर फायरिंग कर के भागे नंदू और उस के दोनों साथियों सचिन छिंकारा व गुलशन उर्फ हिमांशु छिल्लर से पूछताछ की और 1 मई को उन्हें मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश कर के 3 मई तक पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि पूरी होने पर थाना भांकरोटा पुलिस ने 3 मई को उन्हें फिर से अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में भेजने का आदेश दिया गया. बाद में दिल्ली पुलिस की अर्जी पर अदालत ने तीनों को प्रोडक्शन वारंट पर दिल्ली पुलिस को सौंप दिया.

जयपुर पुलिस ने रेनवाल मांजी चौकी के गिरफ्तार एएसआई सत्यप्रकाश तथा सिपाही निर्मल और कालूराम को भी न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया. नंदू के गिरोह के उन 7 लोगों को भी जेल भेज दिया गया, जो 10 लाख रुपए और 5 लाख रुपए ले कर आए थे. रिमांड अवधि के दौरान पूछताछ में नंदू और उस के साथियों के अपराधों के साथ जयपुर को अपनी शरणस्थली बनाने का जो खुलासा हुआ, वह इस प्रकार था.

कपिल सांगवान उर्फ नंदू दिल्ली के 10 मोस्टवांटेड अपराधियों में नंबर वन है. मूलरूप से हरियाणा स्थित महेंद्रगढ़ जिले के नांगल चौधरी पुलिस थानाक्षेत्र के नांगल वाली गांव के रहने वाले सूरजभान के बेटे नंदू का दिल्ली पुलिस के रिकौर्ड में स्थाई पता आरजेड-81बी, नंदा एन्कलेव, नजफगढ़, दिल्ली दर्ज है. 20 वर्षीय नंदू पर दिल्ली पुलिस की ओर से करीब डेढ़ लाख रुपए का इनाम घोषित है.

नंदू के खिलाफ दिल्ली के विभिन्न पुलिस थानों में हत्या, हत्या के प्रयास, लूट और एक्सटौर्शन आदि के 10 मुकदमे दर्ज हैं. इन के अलावा हरियाणा के जींद सिटी व गुड़गांव में भी उस के खिलाफ मुकदमे दर्ज हैं. नंदू और उस के साथियों पर विभिन्न थानों में 8 हत्याओं के मामले दर्ज हैं. वह बीए औनर्स का छात्र है और पिछले 3 सालों से आपराधिक वारदातें कर रहा है. नंदू का बड़ा भाई ज्योति सांगवान उर्फ बाबा भी कुख्यात अपराधी है. उस के खिलाफ दिल्ली एवं अन्य राज्यों में हत्या सहित कई गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं. उस के साथी सचिन छिंकारा पर भी दिल्ली पुलिस की ओर से 50 हजार रुपए का इनाम घोषित है.

मासूम सा दिखने वाला नंदू इतना खूंखार है कि गोली चलाना और किसी की हत्या कर देना, उसे तमाशा लगता है. वह अपने दुश्मनों से ज्यादा उन के परिवार के लिए खतरनाक है. नंदू ने अपने गिरोह के साथ 20 दिसंबर, 2015 की रात ढाई बजे के करीब दिल्ली में नजफगढ़ के पास छावला इलाके में कुख्यात अपराधी मंजीत महाल के गैंग के सदस्य और घुम्मनहेड़ा के रहने वाले नफे सिंह उर्फ मंत्री के पिता हरिकिशन, मां कमला और पत्नी शर्मिला को गोलियां मार कर उन की हत्या का प्रयास किया था. इन में से हरिकिशन की मौत हो गई थी, जबकि दोनों महिलाएं गंभीर रूप से घायल हो गई थीं. हरिकिशन दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड हैडकांस्टेबल थे.

इस मामले में नंदू के साथ गुलशन और सचिन भी थे. दरअसल मंजीत महाल गैंग के नफे सिंह उर्फ मंत्री व अन्य लोगों ने उसी रात दीनपुर इलाके में 11 बजे के करीब सुर्रखपुर निवासी नंदू के जीजा सुनील उर्फ डाक्टर की गोली मार कर हत्या कर दी थी. जीजा की हत्या की सूचना मिलते ही उसी रात नंदू ने बदला लेने के लिए आरोपी नफे सिंह के पिता की हत्या कर दी थी.

नफे सिंह के पिता हरिकिशन सिंह की हत्या करने के अगले दिन नंदू अपने साथियों गुलशन और सचिन के साथ जयपुर आ गया था. जयपुर के एक होटल में उन्होंने पार्टी कर के अपने दुश्मन के बाप की हत्या का जश्न मनाया और फिर जयपुर में ही अपना ठिकाना बना लिया. यहां रहने के लिए उस ने वैशालीनगर में थाने के पीछे की गली में किराए का फ्लैट लिया. यहां रहते हुए वह दिल्ली और हरियाणा भी जाता रहा. उस के साथी भी उस से मिलने जयपुर आते रहे. जयपुर में नंदू नवीन राठी के नाम से रहता था, जबकि गुलशन ने अपना नाम हिमांशु छिल्लर रख लिया था. दोनों ने इन्हीं नामों की आईडी की भी व्यवस्था कर ली थी.

इसी साल 11 जनवरी के दूसरे सप्ताह में नंदू अपने साथियों के साथ दिल्ली गया. उस ने शिकारपुर गांव के रहने वाले 45 वर्षीय विनोद और 19 वर्षीय उस के बेटे कमल की उन के घर में ही हत्या कर दी. पुलिस जांच में पता चला कि विनोद उस धर्मेंद्र उर्फ माडू के पिता थे, जो 20 दिसंबर की रात नंदू के जीजा सुनील उर्फ डाक्टर की हत्या के समय हत्यारों के साथ था. कमल धर्मेंद्र का छोटा भाई था. नंदू और उस के साथियों के हाथों मारे गए विनोद और कमल न तो किसी आपराधिक गैंग में शामिल थे और न ही उन के खिलाफ कोई मामला दर्ज था. कहा जाता है कि नंदू घर में मौजूद 2 बच्चों को भी मारना चाहता था, लेकिन साथियों ने उसे ऐसा करने से मना कर दिया था. सुनील उर्फ डाक्टर की हत्या में शामिल आरोपी धर्मेंद्र को क्राइम ब्रांच ने 31 दिसंबर, 2015 को गिरफ्तार कर लिया था.

विनोद और उस के बेटे कमल की हत्या के बाद नंदू और उस के साथी जयपुर आ कर वैशालीनगर वाले फ्लैट में रहने लगे थे. शक होने पर मकान मालिक ने उन से अपना फ्लैट खाली करा लिया तो उस ने जयपुर के मुहाना के जयसिंहपुरा स्थित ओमेगा रेजीडेंसी अपार्टमेंट में 203 नंबर का फ्लैट किराए पर ले लिया था. उस के साथ 2-3 साथी भी वहां रहते थे. नंदू व उस के साथियों ने फ्लैट मालिक से खुद को स्टूडेंट बताया था.

अपार्टमेंट के गार्ड ने पुलिस को बताया कि नंदू उर्फ नवीन और उस के साथी 2-3 दिन में एक बार फ्लैट से निकलते थे. खानेपीने का सामान ये लोग रात को लाते थे. इन से मिलने के लिए हरियाणा व दिल्ली नंबरों के गाडि़यों में लड़के आते थे. नंदू ज्यादातर खुद ही खाना बनाता था. वे फ्लैट की साफसफाई भी खुद ही करते थे. फ्लैट मालिक ने इन का पुलिस सत्यापन नहीं कराया था. बाद में भेद खुलने पर जयपुर की थाना मुहाना पुलिस ने जयसिंहपुरा निवासी केदार शर्मा को गिरफ्तार कर लिया था. यह फ्लैट तेलंगाना निवासी रिटायर्ड कर्नल शिशिर कुमार का था. कर्नल ने फ्लैट की देखभाल की जिम्मेदारी केदार शर्मा को सौंप रखी थी. केदार ने इन किराएदारों का पुलिस सत्यापन नहीं कराया था.

जयपुर में रहने के दौरान नंदू और उस के साथियों का कोई आपराधिक मामला पुलिस के सामने नहीं आया है. इस बारे में नंदू और उस के साथियों ने पुलिस को बताया कि दिल्ली और हरियाणा पुलिस उन के खिलाफ तेजी से काररवाई कर रही थी, जिस से बचने के लिए उन्होंने जयपुर को अपना ठिकाना बना लिया था. वे जयपुर में कोई अपराध कर के पुलिस की नजरों में नहीं आना चाहते थे. पुलिस को फ्लैट की तलाशी में कुछ ऐसा सामान मिला है, जिस से लगता है कि फ्लैट में युवतियों का भी आनाजाना था. नंदू और उस के साथियों ने अय्याशी के लिए लड़कियां लाने की बात कबूल की है.

मुठभेड़ की इस घटना के 5 दिनों पहले 24 अप्रैल को संस्कृत यूनिवर्सिटी के पास नंदू के किराए के फ्लैट से करीब 400 मीटर दूरी पर 20-21 साल की एक युवती का अधजला शव मिला था. इस लाश की शिनाख्त नहीं हुई है. थाना मुहाना पुलिस इस मामले की जांच कर रही है. पुलिस ने नंदू और उस के साथियों से युवती के अधजले शव के बारे में भी पूछताछ की है, लेकिन अभी खुलासा नहीं हुआ है. पुलिस को शक है कि यह लाश नंदू और उस के साथियों की महिला मित्र की हो सकती है.

हालांकि नंदू और उस के साथियों ने इस बात से इनकार किया है. पूछताछ में नंदू के जयपुर की एक युवती से संबंध होने की बात सामने आई है. नंदू की उस युवती से सोशल साइट के माध्यम से बातचीत होती रहती थी. पुलिस उस युवती के बारे में जानकारी जुटा रही है.

पुलिस जांच में पता चला है कि बड़े भाई ज्योति सांगवान उर्फ बाबा के अपराधी होने की वजह से ही कपिल सांगवान उर्फ नंदू अपराध की दुनिया में आया था. कुछ समय पहले बड़ा भाई हत्या के एक मामले में भोंडसी जेल चला गया तो नंदू ने गिरोह की कमान संभाल ली. इस गिरोह का दिल्ली, हरियाणा में उगाही और नशीले ड्रग्स का काम है. हरियाणा पुलिस से मुठभेड़ के दौरान जिस फौर्च्युनर कार से नंदू और उस के साथी भागे थे, वह कार गुड़गांव से लूटी गई थी.

हरियाणा पुलिस इसी कार लूट के मामले में जयपुर आई थी. नंदू और उस के साथी दिल्ली और हरियाणा में हाईवे पर लग्जरी गाडि़यां भी लूटते थे. नंदू पर 7 गाडि़यां लूटने का आरोप है. गिरोह द्वारा लूटी गई एक एसयूवी कार की सड़क दुर्घटना हो गई तो ये उसे छोड़ कर भाग गए थे. कोई बड़ी वारदात करने के बाद भी ये लोग गाडि़यों को लावारिस छोड़ कर भाग जाते थे. नंदू का सब से विश्वासपात्र गुलशन उर्फ हिमांशु छिल्लर है. वह कार भगाने में माहिर है. गुलशन की वजह से ही नंदू और उस के साथी कई बार पुलिस की पकड़ से बच निकले थे. सचिन छिंकारा भी नंदू का खास है. अधिकांश बड़ी वारदातों में वह नंदू के साथ रहा है.

पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल के अनुसार, 30 अप्रैल को पकड़े गए 6 अपराधियों (नंदू और उस के दोनों साथियों के अलावा इन्हें छुड़ाने आए 3 लोग) से एक पिस्तौल, 6 कारतूस, पौइंट 38 स्मिथ ऐंड वेसन रिवौल्वर, 6 कारतूस, एक लाइसैंसी और्डिनेंसी रिवौल्वर और 10 लाख रुपए जब्त किए गए हैं. इस के बाद इन अपराधियों की जमानत कराने के लिए आ रहे लोगों से एक अवैध रिवौल्वर, 10 कारतूसों के अलावा 5 लाख रुपए जब्त किए गए हैं.

रिवौल्वर, कारतूस और रकम झज्जर निवासी अजय कुमार उर्फ अजय खत्री से बरामद हुई है. अजय के 3 साथियों झज्जर निवासी संदीप उर्फ नगड़, सतपाल उर्फ डिल्लुआ और राजन को काररवाई के दौरान उत्पात मचाने के आरोप में धारा 151 सीआरपीसी के तहत गिरफ्तार किया गया है. संदीप उर्फ नगड़ नंदू और उस के साथियों को छुड़ाने के लिए 10 लाख रुपए लाते समय पकड़े गए गजराज का सगा भाई है. हरियाणा पुलिस पर फायरिंग के सिलसिले में भी इन लोगों पर भांकरोटा थाने में मुकदमा दर्ज किया गया है.

नंदू और उस के साथियों को छोड़ने के लिए 10 लाख रुपए में सौदा करने वाले एएसआई सत्यप्रकाश एवं सिपाही निर्मल और कालूराम को पुलिस की सेवा से बर्खास्त करने की काररवाई शुरू कर दी गई है. पुलिस महानिदेशक मनोज भट्ट ने उन के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने के लिए अधिकारियों को निर्देश दिए हैं. विभागीय जांच इसलिए की जा रही है, ताकि वे अदालत में अरजी लगा कर बिना जांच किए बर्खास्त करने का हवाला दे कर फिर बहाल न हो सकें.

इस पूरे मामले में आरोपी पुलिसकर्मियों सत्यप्रकाश और दोनों सिपाहियों का कहना है कि उन्होंने गैलेंट्रीवार्ड लेने के लिए नंदू और उस के साथियों को छिपा दिया था. वे इन के पूरे गिरोह को पकड़ना चाहते थे, इसीलिए जयपुर पुलिस को इस की सूचना नहीं दी थी. हालांकि इस के उलट जयपुर पुलिस का कहना है कि सर्विलांस के दौरान टेप किए गए अपराधियों के मोबाइल पर हुई बातों में 10 लाख रुपए दे कर छोड़ने की बात साफ सुनाई दे रही है. बहरहाल, नंदू और उस के साथियों की गिरफ्तारी से जयपुरवासियों और दिल्ली तथा हरियाणा पुलिस को भले ही राहत मिली है, लेकिन इस से पुलिस और अपराधियों के चेहरे भी बेनकाब हो गए हैं, साथ ही चिंता की यह बात भी सामने आई है कि जयपुर और आसपास के इलाके कुख्यात अपराधियों की शरणगाह बनते जा रहे हैं.

राजस्थान पुलिस का कहना है कि नंदू कुख्यात अपराधी आनंदपाल से भी ज्यादा खूंखार है. आनंदपाल ने राजस्थान पुलिस को परेशान कर रखा है. 3 सितंबर, 2015 को नागौर पेशी से अजमेर लौटते समय कुख्यात आनंदपाल पुलिस की मिलीभगत से भाग निकला था. उस के बाद 21 मार्च को नागौर में पुलिस की आनंदपाल से मुठभेड़ हुई, जिस में एक जवान की मौत हो गई थी. इस के बाद भी वह पुलिस को चकमा दे गया था. उस ने राजस्थान पुलिस का चैन छीन रखा है. Jaipur Crime

 

Contract Killing Story: मास्टर माइंड – औरत की हत्या

Contract Killing Story: कहा जाता है कि महेशचंद की पत्नी और तीनों बेटियों की हत्या आशा शर्मा ने कराई थी, लेकिन सबूतों के अभाव में 3 साल बाद वह जेल से छूट गई. आश्चर्य की बात यह है कि 7 साल बाद आशा शर्मा की उसी 16 अप्रैल को हत्या हो गई, जिस 16 अप्रैल को उस ने 4 लाशें बिछवाई थीं.

आशा शर्मा के कत्ल की कीमत एक लाख रुपए तय हुई थी. 20 हजार रुपए मदन को एडवांस दे दिए गए थे, बाकी काम हो जाने पर दिए जाने थे. एडवांस की रकम ले कर मदन जैसे ही अपनी दुकान पर पहुंचा, उस के मोबाइल की घंटी बज उठी. उस ने जेब से मोबाइल निकाल कर स्क्रीन पर नंबर देखा तो चौंका. फोन आशा शर्मा का था. वही आशा शर्मा, जिस के कत्ल की वह सुपारी ले कर आया था. पहले तो उस ने सोचा फोन रिसीव ही न करे, लेकिन वह जानता था कि जब तक फोन नहीं उठाएगा तब तक वह बारबार फोन करती रहेगी. आखिर मन मार कर उस ने फोन रिसीव कर के ‘हैलो’ कहा.

वह आगे कुछ बोलता, इस से पहले ही दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘हाय हैंडसम, ले आए मुझे मारने की सुपारी? तुम्हें शर्म नहीं आई, मेरी जान की कीमत 1 लाख रुपए लगाते हुए. एडवांस भी कुल 20 हजार. अरे 5-10 लाख लिए होते तो मुझे भी खुशी होती.’’

आशा शर्मा की बात सुन कर मदन घबरा गया. घबराने की बात थी भी. अभीअभी सौदा हुआ था और आशा को पता चल गया था. मदन के चेहरे पर घबराहट के चिह्न साफ नजर आ रहे थे, मुंह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे. उसे चुप देख कर दूसरी ओर से आशा ने ही कहा, ‘‘घबराओ मत, मैं किसी से नहीं कहूंगी. बस तुम एक घंटे के अंदरअंदर मेरे शास्त्रीनगर वाले घर पर आ जाओ. और हां, अगर तुम नहीं आए तो महेश और उस की बीवी मुन्नी के साथ थाने में खड़े नजर आओगे.’’

मदन की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या बोले. उसे चुप देख आशा गुर्राने जैसी आवाज में बोली, ‘‘मेरी आवाज सुन कर तेरी पैंट गीली हो गई क्या? घबरा मत, मैं घर पर अकेली हूं. जल्दी आना, मुझे ज्यादा इंतजार करने की आदत नहीं है.’’

अपनी बात कह कर आशा शर्मा ने झटके से फोन काट दिया. मदन की समझ में नहीं आ रहा था कि करे तो क्या करे. न तो वह आशा शर्मा से अंजान था और न आशा शर्मा उस से. दोनों एकदूसरे की नसनस को जानते थे. कुछ नहीं सूझा तो मदन दुकान को भूल कर अपने दोस्त बौबी के घर जा पहुंचा. उस ने बौबी को पूरी बात बता कर सलाह मांगी. बौबी भी आशा शर्मा से अंजान नहीं था. रायमशविरे के बाद तय हुआ कि दोनों दोस्त साथसाथ आशा के घर जाएंगे.

मदन और बौबी आशा के शास्त्रीनगर स्थित घर जा पहुंचे. उन्हें देखते ही आशा शर्मा के होठों पर विजयी मुसकान फैल गई. वह फिल्म शोले के गब्बर सिंह वाले स्टाइल में बोली, ‘‘आओ महारथी, आओ. कौन सा हथियार लाए हो मेरी जान लेने के लिए?’’

कुछ बोलने की हिम्मत नहीं थी, फिर भी मदन ने हिम्मत जुटा कर लड़खड़ाती आवाज में कहा, ‘‘आप को मारने की हिम्मत कौन कर सकता है? हवाई घोड़े दौड़ाना अलग बात है और किसी की जान लेना अलग बात.’’

‘‘जानती हूं, तुम्हें भी और मेरी जान की सुपारी देने वाली को भी.’’ आशा सोफे की ओर इशारा कर के बोली, ‘‘बैठ जाओ, फिर बात करेंगे. मुझे कोई जल्दी नहीं है, न मरने की न मारने की. और हां, डरो मत. मैं बिलकुल अकेली हूं. चाहो तो घर में घूम कर देख लो. चुहिया की जात तक नहीं है यहां.’’

मदन और बौबी बिना बोले सोफे पर बैठ गए. आशा ने दोनों के चेहरों को गौर से देखा फिर बोली, ‘‘मुन्नी ने मेरे कत्ल की कीमत सिर्फ 1 लाख लगाई है, यह मेरी बेइज्जती है, नाकाबिलेबर्दाश्त. मैं इस गेम को बदलना चाहती हूं. मैं तुम लोगों को 50 लाख रुपए दूंगी, लेकिन इस के बदले में तुम्हें मुन्नी और उस की तीनों बेटियों की हत्या करनी होगी. बोलो, क्या कहते हो?’’

मदन और बौबी दोनों ही समझ नहीं पा रहे थे कि वे क्या जवाब दें. उन्हें चुप देख कर आशा शर्मा ने ही कहा, ‘‘यही सोच रहे हो न कि मैं 50 लाख कहां से लाऊंगी? अरे बड़ा सीधा सा गणित है, मुन्नी और उन की बेटियों के मरते ही मैं महेश की पत्नी बन जाऊंगी, करोड़ों की मालकिन. उस के बाद 50 लाख या 1-2 करोड़ रुपए की कीमत क्या रह जाएगी मेरे लिए.’’

मदन और बौबी इस के बाद भी कुछ नहीं बोले तो आशा शर्मा ने एक और दांव खेला. वह अपने दोनों पांव सेंट्रल टेबल पर रखते हुए बोली, ‘‘काम हो जाने के बाद हमारा पैसे का लेनदेन तो खत्म हो जाएगा लेकिन मैं तुम्हारे लिए हाजिर रहूंगी.’’

सेंट्रल टेबल पर पैर रखने से आशा शर्मा की साड़ी घुटनों तक खिसक गई थी. उस के खुले दूधिया पैर इशारा समझने के लिए काफी थे. डरेसहमे मदन और बौबी की निगाहें उस के पैरों पर ही जमी थीं. आशा शर्मा ने कुछ इस अंदाज में बात की थी कि जरा सी देर में माहौल सामान्य हो गया. आशा ने मदन और बौबी के सामने ऐसा चारा डाला कि वे उस की बात मानने को तैयार हो गए. मोटी रकम और अपने जिस्म का लालच दे कर उस औरत ने पूरी बाजी ही पलट दी.

जब मदन और बौबी आशा के घर से निकले तो उन की नजरों के सामने निशाने के रूप में मुन्नी देवी और उस की तीनों बेटियों के चेहरे घूम रहे थे. उन्होंने सोच लिया था कि उन्हें क्या करना है. और इस के ठीक चौथे दिन मुन्नी और उस की तीनों बेटियों का कत्ल हो गया. उस दिन तारीख थी 16 अप्रैल, 2009. इस चौहरे हत्याकांड की तह तक जाने से पहले आप को बताते चलें कि इस घटना के 7 साल बाद 16 अप्रैल, 2016 को आशा शर्मा का भी कत्ल हो गया. कातिल था उस का अपना पति सुनील शर्मा. खास बात यह कि मृतका के पति सुनील ने ही अपने घर का पता बता कर पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी थी. वहां से इस की जानकारी थाना गांधी पार्क को दी गई थी.

अपने वरिष्ठ अधिकारियों को बता कर थानाप्रभारी संजय पांडेय अपनी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. सुनील शर्मा का घर गली नंबर 3, शास्त्रीनगर, नौरंगाबाद में था. चूंकि उस ने पुलिस कंट्रोल रूम को अपना पता बता दिया था, इसलिए पुलिस को उस के घर पहुंचने में कोई परेशानी नहीं हुई. वहां पहले ही तमाम लोग एकत्र हो गए थे. हत्या मकान के फर्स्ट फ्लोर पर हुई थी. पुलिस ऊपर पहुंची तो वहां एक कमरे में 40 साल की एक महिला की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. उस का हत्यारा सुनील शर्मा वहीं खड़ा था. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. लाश के पास ही 17 साल की एक लड़की और 12 साल का लड़का खड़ा रो रहा था. ये दोनों मृतका और सुनील के बच्चे थे.

पूछताछ में उन्होंने बताया कि मम्मी 3 साल जेल में रह कर आई थीं. जब से वह जेल से लौटी थीं, तभी से पापा उन के साथ कलह करते थे. दोनों की छोटीछोटी बातों पर लड़ाई होती थी. आज मम्मी को अकेला पा कर उन्होंने उन की हत्या कर दी. इस बीच खबर पा कर एसपी (सिटी) अंशुल गुप्ता और सीओ (द्वितीय) सोमदत्त भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. लोहे की जिस रौड से सुनील ने आशा के सिर पर वार किए थे, वह वहीं पड़ी थी. पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले लिया था.

पुलिस ने प्राथमिक काररवाई के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी और वहां मौजूद लोगों से पूछताछ की. गिरफ्तार किए गए सुनील शर्मा को थाने भेज दिया गया. उसी दिन मृतका की 17 वर्षीया बेटी प्रियंका की ओर से पिता के खिलाफ मां की हत्या का मुकदमा दर्ज कराया गया. अगले दिन सुनील को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. पोस्टमार्टम के बाद आशा की लाश उस के घर वालों को सौंप दी गई. उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया. इस मामले की जांच की जिम्मेदारी खुद थानाप्रभारी संजय पांडेय ने ली.

आशा और सुनील शर्मा की शादी सन 1998 में हुई थी. आशा जितनी खूबसूरत थी उतनी ही शोख और चंचल भी. सुनील जितना कमाता था, उस से गुजरबसर तो हो जाता था, लेकिन आशा के फैशन और शौक शृंगार के लिए पैसे नहीं बचते थे. कालांतर में जब घर में एक बेटी और बेटा आ गए तो घर का खर्चा बढ़ गया. पति को समझानेबुझाने के बाद आशा ने खुद घर से बाहर निकलने का फैसला किया, ताकि परिवार के बढ़े खर्चों को साधने के लिए कोई काम ढूंढ़ सके.

नौकरी के लिए इधरउधर धक्के खाने के बजाय आशा ने एलआईसी एजेंट बनने का फैसला किया. इस की 2 वजहें थीं. एक तो वह अपनी खूबसूरती के बूते पर लोगों को प्रभावित कर के उन्हें एलआईसी की पालिसियां बेच सकती थी, दूसरे चूंकि यह फुलटाइम जौब नहीं था, इसलिए अपने बच्चों के लिए भी समय निकाल सकती थी. अपनी इसी सोच के चलते वह एलआईसी एजेंट बन गई. बहरहाल अपने रूपयौवन और अदाओं के बूते पर उस ने काफी लोगों को एलआईसी की पालिसियां बेचीं, जिस की वजह से उसे अच्छा कमीशन मिलने लगा.

जून, 2007 में आशा की मुलाकात अलीगढ़ के थाना गांधी पार्क के मोहल्ला गांधीनगर निवासी एक्सपोर्टर महेशचंद से हुई. उन से वह एलआईसी की पालिसी के चक्कर में मिली थी. आशा खूबसूरत भी थी और जवान भी. ऊपर से उस की कातिल अदाएं. महेशचंद पहली ही मुलाकात में उस के दीवाने हो गए.

मर्दों की नजरों को बखूबी पहचानने वाली आशा ने जल्दी ही उन्हें शीशे में उतार लिया. महेशचंद उस के प्रति थोड़े उदार दिखाई दिए तो आशा ने उन्हें मोटी रकम की पालिसी कराने के लिए राजी कर लिया. इस के लिए महेशचंद ने उसे अगले दिन नौरंगाबाद स्थित अपनी फैक्ट्री में बुलाया. उन्होंने आशा से कहा, ‘‘फार्म भर लाना, मैं साइन कर के चैक दे दूंगा. और हां, लंच हमारे साथ ही करना.’’

जातेजाते आशा ने अनौपचारिक होते हुए अपनी तरफ से पहल की, ‘‘सिर्फ लंच, हम ने तो सोचा था कि आप डिनर भी कराएंगे.’’

‘‘माफ करें आशाजी, यह हमारी गलती है.’’ महेशचंद हंसते हुए बोले, ‘‘भला ऐसा कौन होगा जो आप के साथ डिनर नहीं करना चाहेगा. हम तो चाहते हैं, आप हमारे साथ हर रोज डिनर करें.’’

आशा हंसते हुए जाने लगी तो महेशचंद ने पूछा, ‘‘तो डिनर का न्यौता मंजूर है?’’

‘‘बिलकुल मंजूर है.’’ आशा बोली, ‘‘आप बुलाएं और हम न आएं, ऐसे तो हालात नहीं हैं.’’

आशा चली गई. महेशचंद सोच रहे थे कि उन्होंने चिडि़या को फंसाने के लिए जो दाना डाला, वह उस ने चुग लिया है. उधर आशा सोच रही थी कि यहां तो मुर्गा खुद ही अपनी गर्दन पर छुरी चलवाने के लिए तैयार हो गया है.

लंच भी हुआ, डिनर भी और पालिसी भी हो गई. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई. महेशचंद ने उसे घर बुला कर अपनी पत्नी और बच्चों से न केवल मिलवाया, बल्कि उन की भी पालिसियां करवा दीं. इस के बाद आशा शर्मा का उन के परिवार में आनाजाना हो गया. महेशचंद के बच्चे उसे आंटी कहते थे. आशा भी उन्हें खूब लाड़ लड़ाती थी. धीरेधीरे वह उन के परिवार की सदस्य जैसी बन गई. इस बीच महेशचंद और आशा के अवैध संबंध बन गए थे.

हार्डवेयर कारोबारी महेशचंद का एक्सपोर्ट का भी काम था. उन के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी. वह आशा को ले कर होटलों में जाने लगे. वहां एंट्री रजिस्टर में वह आशा को पत्नी लिखते थे. इतना ही नहीं, उन्होंने आशा के लिए थाना क्वारसी के नंगला तिकोना की संगम विहार कालोनी में एक शानदार मकान भी खरीद दिया था. इस मकान में सारी सुखसुविधाएं मौजूद थीं. इस के बाद महेशचंद का ज्यादातर समय पत्नी और परिवार की जगह आशा के साथ गुजरने लगा. महेशचंद की सीधीसादी पत्नी को अपने पति और आशा के संबंधों पर तब शक हुआ, जब आशा महेशचंद के बेटे गौरव की शादी में अपनी मनमरजी चलाने लगी और महेशचंद उस की हां में हां मिलाते रहे.

कोठी की रंगाईपुताई किस रंग की हो, कपड़ेजेवर कैसे खरीदे जाएं, रिसैप्शन के मेन्यू में क्याक्या खास चीजें जरूरी हैं, सब जगह आशा की चल रही थी. हद तो तब हो गई, जब शादी वाले दिन रस्मोरिवाज में मां की जगह आशा ने पूरे रौब के साथ दखलअंदाजी की. मुन्नी देवी का शक तब विश्वास में बदल गया, जब शादी में आए फोटोग्राफर एवं वीडियोग्राफर मदन ने मुन्नी देवी के सामने एक अलग ही हकीकत बयान की. उस ने बताया कि महेशचंद ने आशा को संगम विहार में एक मकान खरीद कर दे रखा है, जहां दोनों अकसर साथसाथ रहते हैं.

मुन्नी के अनुरोध पर मदन ने वह मकान दिखा भी दिया. मुन्नी ने पासपड़ोस के लोगों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि वहां एक पतिपत्नी रहते हैं, पति कहीं बिजनैस करता है, जबकि पत्नी बनीठनी घूमती है. मुन्नी ने उन लोगों को महेशचंद और आशा के फोटो दिखाए तो उन्होंने इस बात की तसदीक कर दी कि उस मकान में वह दोनों रहते हैं.

फोटोग्राफर मदन भी रसिया स्वभाव का था. पहले आशा शर्मा उस के पास आती रहती थी, लेकिन जब से वह महेशचंद के संपर्क में आई थी, तब से उस ने मदन को भाव देना बंद कर दिया था. मदन ने उस पर धौंस जमाने की कोशिश की तो आशा ने उसे सीधेसीधे धमकी दे दी. इसी बात को ले कर महेश उस से खार खाता था. यही कारण था, जिस की वजह से उस ने मुन्नी के सामने महेशचंद और आशा शर्मा की हकीकत का भंडाफोड़ किया था.

बाद में मदन ने ही मुन्नी देवी को आशा शर्मा को अपने रास्ते से हटाने का सुझाव दिया था. इस के लिए उस ने एक लाख का खर्चा बताया. मुन्नी तैयार हो गई तो उस ने 20 हजार रुपए एडवांस भी ले लिए. मुन्नी को यह पता नहीं था कि आशा ने उस के घर में भी अपने जासूस लगा रखे हैं. जब मुन्नी और मदन के बीच आशा की हत्या की सौदेबाजी हो रही थी, तभी पड़ोस में ही रहने वाली मुन्नी की देवरानी मधु ने दोनों की बातें सुन ली थीं. उसी ने फोन कर के यह बात आशा शर्मा को बता दी थी. आशा और मधु के संबंध गौरव की शादी में गहराए थे. बाद में वह महेशचंद के घर का हर राज आशा शर्मा को बताने लगी थी.

आशा शर्मा को मुन्नी देवी और मदन के षडयंत्र का पता चला तो उस ने फोन कर के मदन को अपने शास्त्रीनगर वाले घर पर बुलाया. मदन को आशा शर्मा की धमकी याद थी. वैसे भी वह खतरनाक औरत थी. ऊपर से उस के पीछे की शह थी. मदन की उस के पास जाने की हिम्मत न हुई तो वह अपने दोस्त बौबी को साथ ले कर उस के पास पहुंचा. वे दोनों आशा के पास पहुंचे तो आशा ने अपने रूपयौवन के बूते पर पल भर में पूरी बाजी पलट दी.

16 अप्रैल, 2009 को एक्सपोर्टर महेशचंद शर्मा की गांधीनगर स्थित कोठी में मुन्नी देवी और उन की 3 बेटियों की हत्या कर दी गई. तीनों अविवाहित बेटियों में पूनम 22 साल की थी, ममता 20 साल की और कीर्ति 17 साल की. जब ये हत्याएं हुईं, तब महेशचंद और उन का बेटा गौरव इंगलैंड गए हुए थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पूनम और कीर्ति के साथ बलात्कार की भी पुष्टि हुई, जांच में हत्याओं का कारण लूटपाट बताया गया.

थाना गांधीनगर में यह मामला भादंवि की धारा 394, 302, 120बी और 376 के तहत दर्ज हुआ. इस संबंध में पुलिस ने महेशचंद को संदेह के दायरे में रखते हुए इस केस की मास्टरमाइंड आशा शर्मा के अलावा मदन, बौबी, मुन्नी देवी की देवरानी मधु, मनोज और अजीत को गिरफ्तार किया. लेकिन बाद में पुलिस ने महेशचंद को क्लीन चिट दे दी. इस मामले में 3 सालों तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी. बताया जाता है कि क्लीनचिट मिलने के बाद महेशचंद प्रेयसी आशा को छुड़ाने की कोशिश में लग गए.

इस मामले का फैसला आया 21 सितंबर, 2012 को. चूंकि एक ही परिवार के 4 लोगों की नृशंस हत्या हुई थी, इसलिए लोगों को उम्मीद थी कि इस मामले में कम से कम आशा शर्मा को सजाएमौत जरूर मिलेगी. चूंकि यह चर्चित मामला था, इसलिए उस दिन अलीगढ़ कोर्ट में तमाम लोग मौजूद थे. मीडियाकर्मी भी आए हुए थे. एडीजे (तृतीय) इंद्रप्रीत सिंह जोश ने अपने फैसले में मदन, मधु, बौबी, मनोज और अजीत को आजीवन कारावास की सजा सुनाई. जबकि सबूतों के अभाव में आशा शर्मा को बरी कर दिया गया. न्यायाधीश महोदय ने जांच अधिकारी नवाब सिंह की जांच पर भी सवाल उठाए.

बहरहाल, आशा शर्मा का न्याय खुद ब खुद हो गया. 7 सालों बाद उसी 16 अप्रैल को उस के ही पति ने उस की हत्या कर दी. थाना गांधी पार्क में उस की बेटी प्रियंका ने अपने पिता सुनील कुमार शर्मा पर मां की हत्या का आरोप लगाते हुए केस दर्ज कराया. सुनील ने चूंकि खुद ही पुलिस को सूचना दी थी, सो गिरफ्तारी के बाद उस ने अपना जुर्म कबूलने में भी देरी नहीं लगाई. पुलिस ने उसे अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. आश्चर्य की बात यह थी कि जिस तरह मुन्नी देवी और उस की बेटियों की हत्याएं की गईं थीं, वैसे ही आशा शर्मा की हत्या भी हुई. वैसी ही जघन्यता के साथ.

लेखक -कुंवर शैलेश बिट्टन            

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Suspicious Death Case: दिल्ली मेट्रो के लेडीज वाशरूम में मिला शव, मची सनसनी

Suspicious Death Case: एक हैरान कर देने वाली घटना ने दिल्ली में सनसनी फैला दी है. मेट्रो स्टेशन के एक लेडीज वाशरूम से एक संदिग्ध हालात में शव मिलने की खबर ने हर किसी को चौंका दिया. सूचना मिलते ही लोगों में डर और जिज्ञासा दोनों फैल गए. आखिर यह व्यक्ति कौन था और वह वहां कैसे पहुंचा, यह सवाल सभी के मन में उठने लगे. आइए जानते हैं इस पूरे मामले की पूरी कहानी विस्तार से.

मामला दिल्ली के इंद्रलोक मेट्रो स्टेशन का है, जहां शनिवार की शाम अचानक हलचल बढ़ गई. स्टेशन के भीतर स्थित लेडीज वाशरूम से एक व्यक्ति का शव बरामद होने की जानकारी सामने आई.
इस घटना के बाद पूरे मेट्रो परिसर में अफरातफरी का माहौल बन गया. मौके पर पहुंची मेट्रो पुलिस ने स्थिति को संभालते हुए जांच प्रक्रिया शुरू कर दी.

पुलिस के अनुसार, 25 अप्रैल, 2026 की शाम लगभग साढ़े 5 बजे मेट्रो थाना नेताजी सुभाष प्लेस (एनएसपी) को एक कौल प्राप्त हुई. कौल करने वाले ने बताया कि इंद्रलोक मेट्रो स्टेशन के वाशरूम का दरवाजा काफी समय से अंदर से बंद है और वहां से तेज बदबू आ रही है. सूचना मिलते ही पुलिस की टीम बिना देर किए मौके पर पहुंच गई और स्थिति का जायजा लिया. जब पुलिस ने जांच की तो पाया कि वाशरूम अंदर से बंद था. काफी प्रयासों के बावजूद दरवाजा नहीं खुला, जिस के बाद उसे तोड़ना पड़ा.

दरवाजा खुलते ही अंदर का दृश्य देखकर सभी सन्न रह गए. करीब 40 साल के एक व्यक्ति का शव फंदे से लटका हुआ पाया गया, जो बेहद चौंकाने वाला था.
शुरुआती जांच में यह बात सामने आई कि मृतक शायद उसी टायलेट कौंप्लेक्स में काम करने वाला केयरटेकर था.

एक व्यक्ति ने पुलिस को बताया कि उस ने उसे आखिरी बार करीब 2 दिन पहले देखा था. इस के बाद से वह नजर नहीं आया था, जिस से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि शव 2 दिन पुराना हो सकता है. मामले की गंभीरता को देखते हुए क्राइम टीम को भी जांच के लिए बुलाया गया.
फिलहाल पुलिस ने शव को कब्जे में ले कर दिल्ली के बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर हौस्पिटल की मोर्चरी में 72 घंटे के लिए सुरक्षित रखवा दिया है.

मेट्रो प्रशासन की मदद से मृतक की पहचान की कोशिश जारी है. पुलिस ने भारतीय नागरिक संहिता (BNS) की धारा 194 के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है. अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि यह आत्महत्या का मामला है या इस के पीछे कोई और रहस्य छिपा हुआ है. Suspicious Death Case

Delhi Crime News: 2 लाख के विवाद में खूनी खेल – टेंट कारोबारी के हाथ काट डाले

Delhi Crime News: एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिस ने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया है. मामूली पैसों के विवाद इतनी खतरनाक हो गया कि एक मेहनतकश कारोबारी की जिंदगी खतरे में पड़ गई. सवाल यही है कि क्या यह हमला सिर्फ बकाया रकम का नतीजा था या इस के पीछे कोई और गहरी रंजिश छिपी हुई है? यह कहानी न सिर्फ डराती है, बल्कि यह भी सिखाती है कि छोटे विवाद कब खतरनाक मोड़ ले सकते हैं.

यह घटना दक्षिणपश्चिमी दिल्ली के द्वारका क्षेत्र के डाबड़ी स्थित विजय एन्क्लेव की है, जहां 32 वर्षीय टेंट और हलवाई का काम करने वाले लोकेश गुप्ता पर जानलेवा हमला किया गया. आरोप है कि पैसे मांगने पहुंचे लोकेश पर इतनी बेरहमी दिखाई गई कि उन के हाथ तक काट दिए गए. गंभीर हालत में उन्हें पहले पास के अस्पताल ले जाया गया और बाद में बेहतर इलाज के लिए एम्स में भरती कराया गया, जहां उन की हालत नाजुक बनी हुई है.

पुलिस के मुताबिक, 24 अप्रैल, 2026 की रात करीब साढ़े 8 बजे पीसीआर कौल के जरिए घटना की जानकारी मिली. मौके पर पहुंची टीम ने लोकेश को लहूलुहान हालत में पाया. शुरुआती जांच में सामने आया कि अजय पाल नाम के व्यक्ति ने अपनी बेटी की शादी के लिए लोकेश से टेंट का काम कराया था, जिस की कुल रकम करीब ढाई लाख रुपए तय हुई थी. आरोप है कि इस में से करीब 2 लाख रुपए अब भी बाकी थे, जिन्हें लेने के लिए लोकेश आरोपी के घर पहुंचे था.

बताया जा रहा है कि पैसों को ले कर दोनों पक्षों में बहस शुरू हुई, जो देखते ही देखते हिंसक झगड़े में बदल गई. इसी दौरान अजय पाल और उस के साथियों ने मिलकर लोकेश पर हमला कर दिया और धारदार मशीन (ग्राइंडर) से उस के हाथ काट दिए.

पुलिस ने मौके से सबूत जुटाकर मामला दर्ज कर लिया है और आरोपियों की तलाश जारी है. इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है और आगे की जांच जारी है. Delhi Crime News

Haryana Crime Story: मोहब्बत बनी मौत

Haryana Crime Story: अविवाहित मुकेश की फेसबुक द्वारा 2 बच्चों की मां निशा से दोस्ती हुई तो दोनों एकदूसरे से प्यार ही नहीं करने लगे, बल्कि घर छोड़ कर भाग भी गए. लेकिन निशा को अपनी गलती का अहसास हुआ तो वह वापस आ गई. मुकेश को प्रेमिका की यह बेवफाई पसंद नहीं आई और वह उस का खून कर बैठा….

हरियाणा के जिला पानीपत के थाना शहर की राजीव कालोनी में ज्यादातर वे लोग रहते हैं, जो वहां की छोटीबड़ी कंपनियों में काम करते हैं. यहां की आबादी का एक हिस्सा ऐसा भी है, जो बतौर किराएदार रहता है. चोरीचकारी और मारपीट जैसे अपराधों को छोड़ दें तो इस कालोनी में कभी ऐसी कोई बड़ी वारदात नहीं हुई कि यहां के लोग दहल उठते.

लेकिन कब, कहां और किस प्रकार का अपराध घट जाए, इस बात को पहले से कौन जानता है. 3 फरवरी, 2016 की दोपहर को इस कालोनी में जो सनसनीखेज वारदात हुई, उस ने न सिर्फ पुलिस वालों को हैरान कर दिया, वहां रहने वालों को भी डरा दिया. दरअसल, कालोनी के ही एक सिरफिरे नौजवान ने सरेआम चाकू से एक महिला की गला काट कर बेरहमी से हत्या कर दी थी. हैरानी और खौफ पैदा करने वाली बात यह थी कि हत्यारा महिला की लाश के पास ही कुर्सी डाल कर आराम से बैठा था. लोगों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए वह चाकू लहरा कर अंजाम भुगतने की धमकी दे रहा था.

दिल दहलाने वाले इस खूनी मंजर और हत्यारे की धमकी के डर का आलम यह था कि कोई भी आगे बढ़ने की हिममत नहीं जुटा पा रहा था. हत्यारा कह रहा था, ‘‘यह सिर्फ मेरे लिए बनी थी, लेकिन इस ने मेरी होने से मना कर दिया, इसलिए इसे जिंदा रहने का कोई हक नहीं रह गया था.’’

घटना की सूचना पा कर थाना शहर के थानाप्रभारी सुरेश कुमार, किला चौकीइंचार्ज प्रवीण कुमार और महिला एसआई नीलम आर्य पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गई थीं. थोड़ी देर में डीएसपी दलबीर सिंह भी आ गए थे. घटनास्थल की हालत देख कर पुलिस वालों के भी रोंगटे खडे़ हो गए थे. मृतका खून से लथपथ पड़ी थी. लाश के पास ही कुर्सी डाले हत्यारा बैठा था. पुलिस को देख कर वह थोड़ा सतर्क हो गया था. पुलिस ने आगे  बढ़ कर कहा, ‘‘चाकू फेंक कर खुद को कानून के हवाले कर दो. यही तुम्हारे लिए ठीक भी रहेगा.’’

इस से युवक को गुस्सा आ गया. उस ने लाश की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘खबरदार, कोई भी आगे बढ़ा तो उस का भी यही अंजाम कर दूंगा, जो इस का किया है.’’

उस की इस धमकी से पुलिसकर्मियों के भी कदम ठिठक गए. थानाप्रभारी ने उसे समझाना चाहा, ‘‘हमारी बात तो सुनो…’’

उन की बात पूरी होती, उस के पहले ही वह चिल्लाया, ‘‘कहा न, कोई आगे नहीं आएगा. अगर कोई आगे आया तो मैं अपनी गर्दन काट लूंगा.’’

कह कर उस ने चाकू अपनी गर्दन पर रख दिया. उस युवक की इस हरकत से पुलिस अधिकारी सकते में आ गए. वे समझ गए कि इस के सिर पर खून सवार है. इस स्थिति में यह कुछ भी कर सकता है. इसलिए पुलिस उसे समझातीबुझाती रही. मृतका की सास और उस का पति जोरजोर से रो रहे थे. जब युवक को लगा कि अब वह बच नहीं पाएगा तो उस ने कहा, ‘‘चलो, पहले लाश उठाओ.’’

पुलिस जैसे ही आगे बढ़ी, उसी बीच उस ने अपने हाथ की कलाई पर चाकू से वार कर लिया. खून की धार फूट पड़ी. ऐसे में ही पुलिस ने चकमा दे कर उसे पकड़ लिया और फुर्ती से चाकू छीन लिया. इस के बाद तुरंत अपनी जीप से अस्पताल पहुंचाया. पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि इतनी बड़ी घटना आखिर घटी क्यों थी? इस बारे में पुलिस ने पूछताछ की तो पता चला कि जिस युवक ने खौफनाक तरीके से फिल्मी अंदाज में यह हत्या की थी, उस का नाम मुकेश था. मृतका का नाम निशा था.

जिस समय यह वारदात हुई थी, मृतका निशा छत पर कपड़े फैलाने गई थी. उसी बीच मुकेश चाकू ले कर वहां आ गया. वह सीधे छत पर गया और निशा का हाथ पकड़ कर नीचे खींच लाया. वह उस से साथ चलने को कह रहा था. निशा ने मना किया तो उस ने उस का गला काट दिया. सास ने बहू को बचाने की कोशिश तो की, लेकिन बचा नहीं सकी. बहरहाल, पुलिस ने शव का पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद मृतका के पति संजय वर्मा की तहरीर पर हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. हत्या में प्रयुक्त चाकू बरामद कर लिया गया. प्राथमिक उपचार के बाद पुलिस ने मुकेश को कस्टडी में ले लिया और थाने ला कर विस्तार से पूछताछ की.

मुकेश, निशा के घर वालों और पड़ोसियों से पूछताछ में एक ऐसे सिरफिरे आशिक की चौंकाने वाली कहानी निकल कर सामने आई, जो फेसबुक से करीब आई निशा को हमेशा के लिए अपनी बनाने की जिद पर अड़ा था, जबकि उस के प्यार में पड़ कर वादे करने वाली निशा हालात बदलने पर बदल चुकी थी. खूबसूरत और बनसंवर कर रहने वाली 30 वर्षीया निशा संजय वर्मा की पत्नी थी. संजय एक पावरलूम फैक्ट्री में नौकरी करता था. उस के 2 बेटे, 8 साल का आदी और 6 साल का वंश था. उस के मातापिता भी साथ रहते थे. वैसे तो ये लोग मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बलरामपुर के रहने वाले थे, लेकिन लगभग 15 सालों से पानीपत में रह रहे थे. परिवार में खुशियों का बसेरा था. वक्त अपनी गति से चल रहा था.

मूलत: बिहार का रहने वाला 22 वर्षीय मुकेश भी कालोनी में किराए पर रहता था और अमन भवन चौक स्थित एक फैक्ट्री में कपड़ा सिलाई का काम करता था. चूंकि वह संजय के घर के नजदीक रहता था, इसलिए अक्सर उस की नजरें निशा पर पड़ जाती थीं. धीरेधीरे उस की खूबसूरती उसे भाने लगी. फिर तो वह उसे देखने के बहाने तलाशने लगा. निशा जल्दी ही उस की मंशा भांप गई. 3 महीने पहले मुकेश ने निशा को फेसबुक पर फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजी तो उस ने सहर्ष स्वीकार कर ली. इस के बाद दोनों एकदूसरे के दोस्त बन गए.

दोनों के बीच चैटिंग होने लगी. निशा किस डगर पर चल चुकी है, यह बात परिवार का कोई नहीं जानता था. चैटिंग और मोबाइल पर होने वाली बातों से दोस्ती गहराई तो मुकेश निशा से प्यार करने लगा. एक दिन मौका पा कर उस ने प्यार का इजहार भी कर दिया. निशा ने नासमझी दिखाई और परिवार के बारे में सोचे बगैर उस के प्यार पर अपने प्यार की मोहर लगा दी. दिलों में प्यार का पौधा अंकुरित हुआ तो वे एकदूसरे के खयालों में डूबे रहने लगे. जल्दी ही चोरीछिपे दोनों की मुलाकातों का सिलसिला भी चल निकला.

मुकेश रसिया किस्म का युवक था. निशा से मुलाकात होती तो वह उस की इतनी तारीफें करता था कि वह खुशी से फूली नहीं समाती. पति और प्रेमी में फर्क होता है. घरपरिवार की जिम्मेदारियों में पति वह प्रेम प्रदर्शित नहीं कर पाता, जो मुकेश करता था. यह एक बड़ी सच्चाई है कि परिवार सिर्फ प्रेम करने से नहीं चलता. उस के लिए पैसों की भी जरूरत पड़ती है, जिसे हासिल करने के लिए काम करना पड़ता है. संजय परिवार के लिए समर्पित था, जिस के लिए वह मेहनत भी खूब करता था. उसी के बलबूते घर चल रहा था.

दूसरी ओर मुकेश अविवाहित था. उस के पास समय ही समय था. वह निशा से मीठीमीठी बातें कर के अपना वक्त बिता रहा था. एक समय ऐसा भी आया, जब दोनों के बीच मर्यादा की दीवारें टूट गई. मुकेश और निशा एकदूसरे का सान्निध्य पा कर खुश थे. अनैतिक रिश्तों की गर्त ऐसी होती है, जिस पर कदम बढ़ा कर पीछे हटाना मुश्किल होता है. वक्त के साथ निशा और मुकेश के रिश्ते गहराते गए. ऐसे रिश्ते छिपाए नहीं छिपते. उड़तेउड़ते खबर संजय तक पहुंची, पत्नी के किस्से सुने तो उस ने उस से बात की. लेकिन वह साफ मुकर गई.

प्रेमिल रिश्तों में मुकेश और निशा ने साथ जीने और मरने की कसमें खाईं थीं. मुकेश ने तय कर लिया था कि वह निशा से विवाह कर के उसे अपने साथ रखेगा. सोच को साकार करने के लिए 7 दिसंबर, 2015 को वह निशा को ले कर भाग गया. बहू की इस हरकत से वर्मा परिवार को भारी बदनामी का सामना करना पड़ा. संजय ने किला चौकी में निशा की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा कर सच्चाई पुलिस को बता दी. मोबाइल लोकेशन के जरिए 5 दिनों में ही घर वालों और पुलिस ने निशा को खोज निकाला.

दोनों फरीदाबाद में रह रहे थे. 11 दिसंबर को पुलिस दोनों को पकड़ कर ले आई. इस के बाद दोनों पक्षों के लोग इकट्ठा हुए. निशा को भी समझाया गया और मुकेश को भी. दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया. तय हुआ कि निशा अपने घर रहेगी और मुकेश उसे परेशान नहीं करेगा. निशा का मन बदल जाए और मुकेश भी उसे परेशान न करे, इस के लिए संजय ने उसे दिल्ली स्थित उस के मायके पहुंचा दिया. लेकिन इस तरह भला कब तक चलता. संजय की मां शीला बुजुर्ग थीं, बच्चे स्कूल जाते थे. घर के तमाम काम होते थे, कौन संभालता.

जनवरी के अंतिम सप्ताह में संजय निशा को घर ले आया. घर वालों ने एक बार फिर उसे जमाने की ऊंचनीच समझाई. उस ने वादा किया कि अब वह ऐसा कोई काम नहीं करेगी, जिस से परिवार की बदनामी हो. उस ने मन ही मन तय भी कर लिया कि अब वह मुकेश से कोई वास्ता नहीं रखेगी. दूसरी ओर मुकेश को पता चला कि निशा आ गई है तो वह उस से मिलने की कोशिश करने लगा. उस ने कई बार मोबाइल से फोन किया, लेकिन निशा ने उस का कोई जवाब नहीं दिया. उस ने निशा को देखने के लिए उस के घर के बाहर के कई चक्कर लगाए, लेकिन निशा की नजर उस पर पड़ती तो वह उसे नजरअंदाज कर देती.

निशा के इस बदलाव ने उसे बेचैन कर दिया. निशा शादीशुदा थी और अपनी गलतियों को सुधार रही थी. मुकेश को भी खुद में सुधार लाना चाहिए था, लेकिन वह निशा पर अपना पूरा हक समझने लगा था. उस ने साथ जीनेमरने की जो कसमें खाई थीं, उन्हें वह भुला नहीं पा रहा था. निशा की उपेक्षा से वह बुरी तरह आहत होता जा रहा था. एक बार मौका देख कर उस ने निशा से कहा, ‘‘निशा, क्या हो गया है तुम्हें, तुम मुझ से बात क्यों नहीं करतीं?’’

‘‘मुकेश मेरी मजबूरियों को समझो. और मुझे भूल जाओ. अब मैं शादीशुदा हूं.’’

मुकेश तड़प उठा, ‘‘कैसी बात कर रही हो, मैं तुम्हारे बिना जिंदा नहीं रह सकता. मुझे तुम्हारा साथ चाहिए.’’

‘‘अब यह नहीं हो सकता मुकेश,’’ कहने के साथ निशा ने चेतावनी दी, ‘‘मुझे आइंदा परेशान करने की कोशिश मत करना, वरना ठीक नहीं होगा.’’

मुकेश बुरी तरह हताश हो गया. उस की हालत हारे हुए जुआरी सी हो गई. निशा की बेरुखी से उस की रातों की नींद उड़ गई. उस के सिर पर निशा को हासिल करने का जुनून सवार था, लेकिन उस के सारे प्रयास विफल हो रहे थे. वह दिनरात इसी बारे में सोचता रहता था. यही वजह थी कि उस ने मन ही मन खतरनाक निर्णय ले लिया कि अगर निशा ने उस की बात नहीं मानी तो वह उसे किसी और की भी नहीं रहने देगा. इस के बाद उस ने एक चाकू का इंतजाम किया और निशा से आखिरी बार बात करने की ताक में रहने लगा.

3 फरवरी की दोपहर निशा नहाधो कर कपड़े फैलाने छत पर गई तो मुकेश की नजर उस पर पड़ गई. अपने कपड़ों में चाकू छिपा कर वह संजय के घर में दाखिल हो गया. उस समय निशा की सास शीला रसोई में थीं. वह सीधे छत पर पहुंच गया. उसे सामने पा कर निशा सकपका गई, ‘‘त…त…तुम यहां कैसे आए?’’

‘‘निशा मुझे तुम से आखिरी बार बात करनी है.’’

‘‘लेकिन मुझे तुम से कोई बात नहीं करनी.’’

मुकेश को गुस्सा आ गया. उस ने ताव में निशा का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘बात तो तुम्हें करनी होगी. तुम मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें हमेशा खुश रखूंगा.’’

‘‘छोड़ो मुझे, तुम पागल हो गए हो क्या?’’

‘‘हां, मैं तुम्हारे प्यार में पागल हो गया हूं.’’ कह कर वह निशा को खींच कर नीचे ले आया.

शीला ने यह नजारा देखा तो हक्कीबक्की रह गईं. उन्होंने मुकेश को रोकना चाहा तो उस ने चाकू निकाल कर उन्हें पीछे हटने को मजबूर कर दिया. इस के बाद उस ने चाकू दिखा कर निशा से पूछा, ‘‘बोलो, साथ चलोगी या नहीं?’’

‘‘मैं कहीं नहीं जाऊंगी, छोड़ो मुझे.’’

निशा ने खुद को उस के चंगुल से छुड़ाने की कोशिश की तो वह आपा खो बैठा और पलक झपकते चाकू से उस की गर्दन पर घातक वार कर दिया. निशा फर्श पर गिर पड़ी और कुछ ही सैकेंड में उस ने दम तोड़ दिया. शीला चीखीचिल्लाईं तो आसपास के लोग आ गए. लेकिन मुकेश हाथ में चाकू लिए कुर्सी डाल कर वहीं बेखौफ हो कर बैठ गया और सब को धमकाने लगा. उस की धमकी से डर कर कोई उसे पकड़ने का साहस नहीं कर सका. उस के बाद सूचना पा कर पुलिस आ गई.

विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने अगले दिन मुकेश को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हो सकी थी. निशा उस के प्यार में न पड़ी होती और अपने बहके कदमों को वक्त रहते संभाल लिया होता तो यह नौबत कभी न आती. मुकेश ने भी निशा को जबरन हासिल करने की कोशिश न की होती तो उस का भविष्य चौपट न होता. अब उस की जिंदगी जेल में ही कटेगी. Haryana Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Crime Stories: अधूरी चाहत

Hindi Crime Stories: कृष्णा ने अपने जीवन में भले ही कुछ भी झेला हो, लेकिन साइको बन कर उस ने नववाहिताओं के साथ जो कुछ किया, वह ठीक नहीं था. अगर पुलिस ने इतनी मशक्कत न की होती तो शायद 2-4 नवविवाहिताएं और …

कीमती सुंदर आभूषणों का आकर्षण हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करता है पर क्या कोई आभूषणों का इतना दीवाना हो सकता है कि उन की चाह में कई हत्याएं कर डाले. मंदिर प्रांगण में नवविवाहिता की लाश मिलने से पटियाला और उस के आसपास के जिलों में दहशत का माहौल बन गया था. गोविंदगढ़ के लक्ष्मीनारायण मंदिर में सुबह की आरती के बाद करीब 10 बजे मंदिर के पुजारी राधेश्याम वहां की सफाई कर रहे थे. सफाई करते हुए वह मंदिर के बगीचे के पास पहुंचे तो बगीचे में एक पेड़ के सहारे एक नवविवाहिता को बैठी देख कर चौंके.

दूर से देखने से लग रहा था, जैसे वह काफी थकी होने की वजह से आराम करने के लिए पेड़ का सहारा ले कर बैठ गई हो. लेकिन ऐसा नहीं था. राधेश्याम जब उस के नजदीक पहुंचे तो पता चला वह युवती मृत थी. इस का मतलब लाश को इस तरह पेड़ के सहारे टिकाया गया था कि दूर से वह पेड़ के सहारे बैठी लगे. मृत युवती की उम्र 26-27 साल थी. उस की दोनों टांगें आगे की ओर फैली थीं और दोनों हाथ दाएंबाएं नीचे की ओर लटक रहे थे. युवती की गरदन दाएं कंधे पर लुढ़की हुई थी और पीठ पेड़ के सहारे टिकी थी.

पुजारी राधेश्याम ने अपना हाथ युवती की नाक के पास ले जा कर देखा. युवती की सांसें थम चुकी थीं. उन्होंने तुरंत इस घटना की सूचना स्थानीय थाना सिटी पुलिस को दे दी. कुछ ही देर में थाना सिटी के थानाप्रभारी इंसपेक्टर अनिल कोहली सहयोगियों के साथ मंदिर पहुंच गए.

अब तक वहां काफी लोग इकट्ठा हो गए थे. अनिल कोहली ने भीड़ को हटा कर लाश का निरीक्षण किया. मृतका काफी खूबसूरत थी. देखने से ही वह किसी अच्छे घर की लग रही थी.उस ने दुलहन के कपड़े पहन रखे थे. हाथों पर लगी मेहंदी एवं चूड़ा देख कर यही लगता था कि उस की शादी हाल ही में हुई है. लेकिन हैरानी की बात यह थी कि मृतका के शरीर पर एक भी गहना नहीं था. हां, गहने पहनने के निशान जरूर दिखाई दे रहे थे. यह चौंकाने वाली बात थी. लाश का निरीक्षण करतेकरते ही अनिल कोहली ने मंदिर के पुजारी से पूछा, ‘‘आप इसे जानते हैं?’’

‘‘जी, मैं इस के बारे में केवल इतना ही जानता हूं कि यह रोजाना शाम की आरती में शामिल होने मंदिर आती थी. कल शाम की आरती में भी आई थी. लेकिन कल यह दुलहन की तरह सजधज कर आई थी. और काफी सारे गहने भी पहने हुए थी. इसे देख कर मुझे हैरानी भी हुई. मैं ने पूछना भी चाहा था, पर जब तक मैं खाली हुआ तब तक यह चली गई थी. बाकी यह कौन है, कहां की रहने वाली है, यह मैं कुछ नहीं जानता. बस इतना कह सकता हूं कि यह पिछले लगभग 4 महीनों से बिना नागा मंदिर में आ रही थी.’’

पुजारी की बातों से अनिल कोहली को भी हैरानी हुई कि जब वह युवती इतने सारे गहने पहन कर आई थी तो गहने कहां गए? कहीं गहनों के लिए ही तो उस की हत्या कहीं की गई? उन्होंने क्राइम टीम बुलवा कर लाश के फोटो कराए. इस के बाद जो भी संभव थे, सबूत जुटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दिया गया.

मृतका के फोटो हर छोटेबड़े अखबार में छपवा कर पुलिस ने लोगों से उस की शिनाख्त की अपील की. यही नहीं, मृतका के पैंफ्लेट छपवा कर शहर के प्रमुख स्थानों और बाजारों में चिपकवा दिए गए. इस का नतीजा यह निकला कि 3 दिनों बाद दोपहर को अधेड़ आयु का एक पुरुष एक युवक को साथ ले कर थाने आया. पुरुष ने बताया कि मृतका उस की बेटी है. उस का नाम वंदना बंसल था. करीब 6 महीने पहले उस की शादी हंस बंसल से हुई थी. शादी के बाद से ही वंदना परेशान रहने लगी थी, क्योंकि उस का पति शराब पी कर उस के साथ मारपीट करता था. यही नहीं, उस के किसी अन्य युवती से भी संबंध थे.

वंदना ने उसे उस युवती के साथ पकड़ लिया था. उस दिन से हंस ने घर आना छोड़ दिया था. वह दिनरात उसी युवती के पास पड़ा रहता था. वंदना घर में अकेली रहती थी. वंदना की मां ने यह भी बताया कि उस दिन शाम को वह घर से पूरे गहने पहन कर बाहर निकली थी. घर से निकलते समय उस ने कहा था कि वह मंदिर की आरती में जाएगी. वहां से वह हंस के पास जाएगी और उसे समझाएगी. वंदना उस दिन लाखों रुपए के गहने पहने थी. वंदना की मां की बातें सुन कर अनिल कोहली को लगा कहीं हंस ने ही तो पीछा छुड़ाने के लिए वंदना को ठिकाने नहीं लगा दिया. संभव है कि हत्या कर के उस ने वंदना के गहने उतार लिए हों और लाश को मंदिर प्रांगण में छोड़ दिया हो.

अनिल कोहली ने हंस के बारे में पता किया. पटियाला रोड पर उस की फोम के गद्दे बनाने की फैक्ट्री थी. लेकिन जब से वह रूबी नाम की औरत के चक्कर में पड़ा था, तब से फैक्ट्री जाने के बजाय ज्यादातर रूबी के यहां ही पड़ा रहता था. अनिल कोहली ने वंदना की मां शारदा से रूबी का पता लिया और उस के घर पहुंच गए. हंस उन्हें वहीं मिल गया. पुलिस को देख कर हंस ने दीवार फांद कर भागने की कोशिश की, लेकिन भागने से पहले ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया. थाने लाक र उस से पूछताछ की गई तो उस ने वंदना की हत्या करने से इनकार कर दिया.

अनिल कोहली ने उस से हर तरह से पूछताछ कर ली, लेकिन वहएक ही रट लगाए रहा कि उस ने वंदना की हत्या नहीं की. इस बीच अनिल कोहली ने अपने मुखबिरों से भी हंस के बारे में पता कर लिया था. उन्होंने बताया था कि हंस लगभग एक महीने से अपने घर यानी वंदना के पास नहीं गया था. हंस के खिलाफ कोई ठोस सबूत न मिलने से अनिल कोहली को उसे छोड़ना पड़ा. धीरेधीरे लोग वंदना की हत्या के मामले को भूलने लगे. अनिल कोहली भी लगभग इस मामले को भूल गए थे. इस बीच उन का उस थाने से ही नहीं, 2 अन्य थानों से भी तबादला हो चुका था. लेकिन लगभग 6 महीने बाद अखबार में एक खबर पढ़ कर उन्हें वंदना की हत्या वाला मामला याद आ गया.

खबर के अनुसार हनुमान मंदिर परिसर के पास सुनसान जगह पर एक नवविवाहिता मृत पाई गई थी. अनिल कोहली ने पूरा समाचार पढ़ा तो उन्हें लगा कि इस युवती की मौत भी ठीक उसी तरह से हुई थी, जैसे वंदना की हुई थी. उन्होंने तुरंत थानाप्रभारी से संपर्क किया. वहां के थानाप्रभारी थे इंसपेक्टर सुमित सूद. सुमित सूद के अनुसार, मृतका का नाम रजनी था और वह अपने घर में अकेली ही रहती थी. उस का पति विदेश में नौकरी करता था. बूढ़े सासससुर गांव में रहते थे. मंदिर के पुजारी से पूछताछ करने पर केवल यही पता चला कि रजनी पिछले 6 महीने से बिना नागा शाम की आरती में आती थी.

लाश मिलने वाले दिन से एक दिन पहले वाली शाम को भी वह आरती में आई थी. उस दिन उस ने बहुत सारे गहने पहन रखे थे. पुजारी ने उसे टोका भी था कि जमाना बहुत खराब है, उसे इतने गहने पहन कर घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए. वंदना और रजनी की मौत में समानता यह थी कि पोस्टमार्टम के अनुसार दोनों की मौत दम घुटने से हुई थी. इस से अंदाजा लगाया गया कि दोनों हत्याओं के पीछे किसी एक ही आदमी का हाथ है और मकसद शायद कीमती गहने लूटना था.

लेकिन लाख प्रयास के बाद भी हत्यारे का कोई सुराग नहीं मिला. दोनों ही थानाप्रभारियों ने अपनेअपने क्षेत्र के मुखबिरों को लगा रहा था. इन दोनों मामलों की जांच चल ही रही थी कि एक और नई खबर आ गई. खन्ना रोड पर नीलो नहर के किनारे बने साईं मंदिर के पास एक नवविवाहिता की लाश ठीक उसी तरह पाई गई, जिस तरह वंदना और रजनी की लाशें मिली थीं.

पुलिस जीजान से हत्यारे तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी पर कोई नतीजा नहीं निकल रहा था. सच्चाई यह थी कि पुलिस अपराधी से कई कदम पीछे थी. पुलिस इस मामले को तंत्रमंत्र से भी जोड़ कर देख रही थी. इसलिए क्षेत्र के सभी तांत्रिकों से पूछताछ करने के अलावा पुलिस ने उन के पीछे अपने मुखबिर भी लगा रहे थे. कोई नतीजा न निकलते देख पुलिस को लगने लगा कि इन हत्याओं का मकसद कुछ और ही है.

8 महीने में बिलकुल इसी तरह की विभिन्न थानों में 5 हत्याएं हो चुकी थीं. इन हत्याओं से दहशत का माहौल बन गया था. सभी थानों की पुलिस पर अधिकारियों का काफी दबाव था. समाजसेवी संस्थाएं और जनता ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़े करने शुरू कर दिए थे. मीडिया वाले फजीहत किए हुए थे. अन्य थानाप्रभारी श्री अनिल कोहली और सुमित सूद काफी परेशान थे. क्योंकि अब तक उन के हाथों कोई कड़ी नहीं लगी थी. सभी पुलिस अधिकारी मिल कर हत्यारे तक पहुंचने की कोशिश में लगे थे.

एक दिन अनिल कोहली और सुमित सूद मिले तो सुमित सूद ने कहा, ‘‘कोहली साहब, मुझे लगता है इन सभी हत्याओं के पीछे किसी एक आदमी का हाथ नहीं है. शिकार ढूंढ़ना, उसे घटनास्थल तक ले जाना और हत्या करना एक आदमी के वश की बात नहीं हो सकती. मेरे खयाल से यह 3-4 लोगों का गिरोह है.’’

‘‘भई, इस मामले में मैं अभी कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूं. मुझे हैरानी इस बात की है कि आरती के समय वहां कितने लोग मौजूद होते हैं, उन के बीच से कोई किसी औरत को इस तरह कैसे अपने साथ ले जाता है.’’ अनिल कोहली ने कहा, ‘‘मजे की बात यह है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार सभी हत्याओं में मौत की वजह दम घुटना बताया गया था, जबकि किसी भी लाश के गले पर दबाने का कोई निशान नहीं मिला है.’’

‘‘हां, यह चौंकाने वाली बात है.’’ सुमित सूद ने कहा, ‘‘लगता है, इन हत्याओं को अभी तक हम ठीक से समझ ही नहीं पाए हैं.’’

सभी पुलिस अफसरों ने तमाम बातों पर विचारविमर्श कर के अपनेअपने थाने के होशियार पुलिसकर्मियों को बुला कर निर्देश दिए कि वे शहर के सभी मंदिरों में जा कर वहां के पुजारियों से मिलें और उन से कहें कि किसी नवविवाहिता को गहने पहन कर आई देखें तो तुरंत पुलिस को सूचना दें. यही नहीं मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को भी कहें कि अगर उन्हें किसी पर शक होता है तो उस पर नजर तो रखे ही, पुजारी या पुलिस को भी बताएं.

यह बात मंदिर के पुजारियों से कही जाती, उस के पहले ही के पंचमुखी हनुमान मंदिर के पीछे सुनसान जगह पर एक और नवविवाहिता की लाश बिलकुल वैसी ही हालत में मिली. इस मामले में अंतर सिर्फ इतना था कि यह लाश सुनसान जगह  पर मिली थी, इस के अलावा लाश के आगे एक छोटा सा हवनकुंड भी बना था और वहां पूजासामग्री और फूल आदि भी पड़े थे. उन्हीं सब के बीच एक छोटी सी प्याली में एक चम्मच कोई रसायन भी रखा था.

वहां मिली चीजों को सावधानी के साथ कब्जे में ले कर पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. हैरानी वाली बात यह थी कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इस बार भी मौत की वजह दम घुटना ही बताया गया. घटनास्थल से बरामद सभी चीजों को फोरैंसिक लैब भेजा गया तो वहां से आई जांच रिपोर्ट में प्याली में मौजूद रसायन में पोटैशियम साइनाइड मिला पाया गया था. इस का मतलब था पूजा के बाद प्रसाद के बहाने या किसी और तरह से मृतका को साइनाइड दिया गया था. साइनाइड एक ऐसा जहर है, जिसे जीभ पर रखते ही आदमी दम घुटने से मर जाता है. कहा जाता है, उसे खाने वाला उस का स्वाद तक नहीं बता पाता.

इस मामले के बाद दोनों पुलिस अफसरों को जांच का एक सूत्र मिल गया. उन्हें इस बात की भी जानकारी हो गई. इस के पहले हुई हत्याओं में भी साइनाइड का इस्तेमाल किया गया था. इस से पुलिस ने यह भी अंदाजा लगाया कि इन हत्याओं के पीछे उसी आदमी का हाथ है, जो आसानी से सायनाइड प्राप्त कर सकता है. आखिर ऐसा आदमी कौन हो सकता है?

पुलिस ने सायनाइड के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि सायनाइड का उपयोग लोहे के कारखानों में डाई टैंपर करने या निकल आदि में किया जाता है. मंडी गोविंदगढ़ एक ऐसा शहर था, जहां लोहे के तमाम कारखाने थे. वहां कैमिकल बेचने वाले की भी कमी नहीं थी. उन सभी के यहां जाजा कर पूछताछ करना आसान नहीं था, पर पुलिस को हत्यारे तक पहुंचना था, इसलिए उस ने यह भी किया.

पुलिस चूंकि जल्द से जल्द हत्यारे तक पहुंचना चाहती थी, इसलिए पूरे जोश के साथ इस काम में जुट गई. पुलिस की अब तक की सारी जांच बेकार गई थी. शहर के सभी बड़े मंदिरों में सीसीटीवी कैमरे लगवाने के साथसाथ पुलिस ने उन की फुटेज खंगालने के लिए एक स्पैशल टीम बना दी, जो लगातार अपना काम कर रही थी.

सब इंसपेक्टर अजीत सिंह ने एक दिन अपनी ड्यूटी के दौरान देखा कि पिछले 3-4 दिनों से एक अधेड़ उम्र की साध्वी किले वाले शिवमंदिर में आ कर बैठती है. वह आनेजाने वाले दर्शनार्थियों को इस तरह देखती थी, जैसे उन में से किसी को तलाश रही हो, दर्शनार्थी भले ही उसे प्रणाम करें, लेकिन वह किसी से बात नहीं करती थी. हां, आरती में वह जरूर शामिल होती थी. उस वक्त उस की नजरें नवविवाहिताओं पर ही टिकी रहती थीं. आरती खत्म होने पर वह उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करती थी.

अजीत सिंह को उस साध्वी पर शक हुआ, क्योंकि उस का व्यवहार रहस्यमयी था. उन्होंने यह बात अमित कोहली और सुमित सूद को बताई. वीडियो फुटेज देख कर दोनों पुलिस अफसरों के निर्देश पर साध्वी पर नजर रखी जाने लगी. लेकिन अचानक वह साध्वी गायब हो गई. शायद उसे अपने ऊपर नजर रखे जाने का पता चल गया था. लेकिन अब पुलिस के पास इतना कुछ था कि वह साध्वी तक पहुंच सकती थी. फुटेज में एक युवती साध्वी के चरणस्पर्श कर के उस के पास बैठ कर बातें करती भी दिखाई दी थी.

अमित कोहली और सुमित सूद ने 2 पुलिस टीमें बना कर 2 अलगअलग कामों पर लगा दीं. एक टीम को साध्वी का फोटो कैमिकल बेचने वालों को दिखा कर पता करना था कि वह औरत उन के यहां सायनाइड खरीदने तो नहीं आती. दूसरी टीम को उस युवती के बारे में पता करना था, जो फुटेज में साध्वी के पैर छू कर बातें करती दिखाई दे रही थी.

दूसरी वाली पुलिस टीम ने उस युवती का पता लगा लिया. उस का नाम ममता जिंदल था. वह जिंदल शूज कंपनी के मालिक तरुण जिंदल की पत्नी थी. ममता को पूरे मामले के बारे में बता कर साध्वी से मिलने की वजह पूछी गई तो उस ने बताया कि उस की शादी 5 साल पहले हुई थी, लेकिन अभी तक कोई बच्चा नहीं हुआ है. डाक्टरों के अनुसार, पतिपत्नी संतान पैदा करने में सक्षम थे. संतान के लिए दोनों ने कोशिश भी बहुत की, पर कुछ नहीं हुआ.

संतान के लिए ही वह रोज मंदिर जाती थी. एक दिन जब वह मंदिर जा रही थी तो उस साध्वी ने रोक कर कहा, ‘‘संतान के लिए परेशान हो न? संतान की वजह से ही तुम्हारा पति तुम्हें छोड़ने की तैयारी कर रहा है. लेकिन वह नासमझ यह नहीं जानता कि तुम एक नहीं, 7 बच्चों को जन्म दोगी, जो पूरी दुनिया में तुम्हारा नाम रोशन करेंगे.’’

‘‘मांजी, क्या ऐसा संभव है?’’ ममता ने हैरानी से पूछा तो साध्वी ने कहा, ‘सब कुछ संभव है मेरी बच्ची.’

इस के बाद आंखें बंद कर के वह कुछ देर सोचती रही, उस के बाद बोली, ‘‘लेकिन बेटी, इस राह में एक अड़चन है. तुम्हें महापतिव्रत अनुष्ठान करना होगा, जिस के लिए तुम्हें रात 10 और 11 बजे के बीच नवविवाहिता की तरह सजधज कर मेरे साथ पूजा करनी होगी. अगर तुम ने यह पूजा नहीं की तो संतान से तो वंचित रहोगी ही, कुछ दिनों में तुम्हारे पति की भी मौत हो जाएगी. पति की मौत के बाद ससुराल वाले तुम्हें घर से निकाल देंगे.’’

ममता के बताए अनुसार, साध्वी की बातों में न जाने कैसा आकर्षण था कि मात्र 3-4 मुलाकातों में ही वह अमावस्या की रात को होने वाली पूजा की तैयारी में जुट गई. वह साध्वी कौन है, कहां रहती है, उस का नाम क्या है? ममता को कोई जानकारी नहीं थी. उस का कहना था कि शाम की आरती में जब वह मंदिर जाती थी तो साध्वी मंदिर के सामने वाले पीपल के पेड़ के नीचे चबूतरे पर ध्यान लगाए बैठी रहती थी.

ममता से मिली जानकारी के आधार पर दोनों पुलिस अफसरों को यह तो पता चल ही गया कि सारी घटनाएं अंधविश्वास की वजह से हुई थीं. लेकिन साध्वी अभी उन की पहुंच से काफी दूर थी. फिर भी पुलिस हाथ धो कर साध्वी के पीछे पड़ गई. इस बीच पहली टीम को पता चला कि दिलापुर गांव की कृष्णा कैमिकल बेचने वाले शंभू के यहां से 2 महीने पहले सायनाइड ले गई थी. कृष्णा के बारे में पता लगाने के लिए पुलिस ने मुखबिरों को लगाया तो पता चला कि कृष्णा का घर शहर से जुड़े गांव जगतारा के पूर्वी छोर पर एकांत में बना था.

जब गांव वालों से उस के बारे में पता किया गया तो लोगों ने बताया कि लगभग 40-42 साल पहले कृष्णा का विवाह रामजीलाल सुनार से हुआ था. वह सर्राफों के लिए गहने बनाने का काम करता था. न जाने क्यों अचानक उस ने आत्महत्या कर ली. यह उस की शादी के 6-7 महीने बाद की बात है. उस समय कृष्णा की उम्र 19-20 साल थी. पति की मौत के बाद वह पागल हो गई थी.

चूंकि गांव में उस का कोई और नहीं था, इसलिए गांव वालों ने उस का इलाज करवाया. वह ठीक हो गई तो उस का घर बेच कर गांव वालों ने गांव के छोर पर उस के लिए एक कोठरी बनवा दी, क्योंकि इलाज के बाद भी वह पड़ोसियों और राहगीरों से झगड़ा करती थी. अब कृष्णा की उम्र लगभग 60 साल थी और वह पूजापाठ और तीर्थयात्रा कर के अपना समय गुजार रही थी. उस समय वह तीर्थयात्रा पर गई थी. पुलिस ने कृष्णा के घर के पास सादे कपड़े में 2 सिपाही लगा दिए. अमित कोहली ने सरपंच की मौजूदगी में कृष्णा की कोठरी का ताला तोड़ कर तलाशी की तो वहां रखे एक बक्से से सोनेचांदी तथा हीरों के तमाम गहने बरामद हुए. बाद में जिन की शिनाख्त भी हो गई.

अचानक एक रात कृष्णा अपने घर पहुंची तो पुलिस उसे पकड़ कर थाने ले आई. थाने में की गई पूछताछ में उस ने बिना किसी विरोध के अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस का कहना था कि उस ने उन सभी औरतों को मुक्ति के लिए परलोक भेजा था और आगे भी वह ऐसा ही करती रहेगी. उस की इन बातों से पूछताछ करने वाले पुलिस अधिकारियों को लगा कि उस की दिमागी हालत ठीक नहीं है. क्योंकि बात करतेकरते वह जुनूनी हो जाती थी. उसे मनोचिकित्सक को दिखाया गया तो डाक्टर ने बताया कि वह दिमाग की एक खतरनाक बीमारी से ग्रस्त है. इस का यह रोग इतना पुराना है कि ठीक नहीं हो सकता. लेकिन लगातार इलाज चलता रहा तो इसे फौरी तौर पर राहत जरूर मिलेगी.

कृष्णा के गांव के बुजुर्गों से पूछताछ में उस के साध्वी बन कर नवविवाहिताओं की हत्या करने की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी-

कृष्णा बहुत ही गरीब परिवार की थी. बचपन से ले कर जवानी तक का सफर उस ने बड़े अभावों में गुजरा था. उस के मांबाप उसे छोड़ कर कहीं और चले गए थे. गांव वालों ने मिल कर उसे पालपोस कर उसे बड़ा किया और रामजीलाल से उस की शादी कर दी. रामजीलाल गहने बनाने का अच्छा कारीगर था. वह भी अकेला था, क्योंकि उस के मांबाप बचपन में ही मर गए थे. दूर के रिश्तेदार ने उसे पालपोस कर गहने बनाना सिखा दिया था.

बचपन से अभावों में जीने वाली कृष्णा का मन करता था कि वह अच्छेअच्छे कपड़े पहने, जिन के साथ गहने भी हों, पर पति के घर में उसे यह सब नहीं मिला. रामजीलाल भले ही गहने बनाने का अच्छा कारीगर था, लेकिन वह पत्नी के लिए एक भी गहना नहीं बना सका था. शादी के 4 महीने बाद हरियाणा के जिला जींद के कस्बा सफीदो में एक रईस जमींदार ने बेटी की शादी थी. जमींदार ने बेटी के लिए गहने बनाने के लिए रामजीलाल को बुलाया. काम काफी लंबा था, इसलिए रामजीलाल पत्नी सहित जमींदार के घर पहुंच गया. उन्हीं के यहां रहते हुए रामजीलाल बड़ी सफाई से एकएक गहना बना रहा था. लगभग सभी आभूषण तैयार हो गए थे.

एक रात कृष्णा को न जाने क्या सूझा कि उस ने रामजीलाल द्वारा बनाए सभी गहनों को पहन कर खुद को नईनवेली दुलहन की तरह सजाया और घर से निकल कर सड़क पर किसी महारानी की तरह टहलने लगी. रामजीलाल उस दिन गहनों की सफाई के लिए सामान लेने शहर गया था. संयोग से उसी समय जमींदार उधर से निकला तो कृष्णा को गहनों से लदीफंदी देख कर उसे लगा कि उस ने बेटी के लिए जो गहने बनवाए हैं, कृष्णा उन्हें चोरी कर के भाग रही है. ऐसा सोचने की एक वजह यह भी थी कि देर रात हो जाने के बाद भी तब तक रामजीलाल शहर से नहीं लौटा था. जबकि उसे शाम तक ही लौट आना था.

जमींदार कृष्णा को पकड़ कर हवेली ले गया और उस से सारे गहने उतरवा कर उसे बांध दिया गया. कृष्णा रोरो कर सफाई देती रही, पर उस की किसी ने नहीं सुनी. रामजीलाल के लौटने पर बिना कुछ पूछे इसी तरह उसे भी चोर ठहरा दिया गया. उसी रात जमींदार ने मजदूरी के नाम पर रामजी लाल को कुछ रुपए दिए और धक्के मार कर पतिपत्नी को गांव से भगा दिया. रामजीलाल ने कभी सपने में नहीं सोचा था कि उस की इस तरह बेइज्जती होगी.

रामजीलाल भले ही गरीब था, लेकिन बहुत ही ईमानदार और खुदगर्ज था. उसे कृष्णा की यह नादानी और अपनी बेइज्जती बरदाश्त नहीं हुई और घर आ कर उस ने आत्महत्या कर ली. पति के इस तरह मौत को गले लगाने से कृष्णा पागल हो गई. क्योंकि उसे लगता था कि यह सब उसी की वजह से हुआ था. गांव वालों ने उस का इलाज तो करवाया, पर वह पूरी तरह से ठीक नहीं हुई थी. इलाज के बाद कृष्णा अजीब सी जुनूनी हो गई थी. उस पर कीमती गहने पहनने का जुनून सा सवार हो गया था. उसी के लिए उस ने यह रास्ता चुना था. सायनाइड के बारे में उसे पता था. क्योंकि सोनाचांदी साफ (शुद्ध) करते समय उस का पति इस का इस्तेमाल करता था, उसी ने बताया था कि यह बहुत ही खतरनाक जहर है.

इलाज के बाद कृष्णा तीर्थयात्रा पर निकली तो उस ने देखा कि साधुओं के पास तमाम दुखियारे आते हैं और बड़ी श्रद्धाभाव से उन के द्वारा बताए उपाय करते हैं. यही देख कर उस ने अपनी एक योजना बनाई और घर लौट आई. गांव में कृष्णा साधारण औरतों की तरह रहती थी, लेकिन शहर जा कर वह किसी धर्मशाला या ऐसे मंदिर में अपना डेरा डालती थी, जहां यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था होती थी. इस के बाद वह साध्वी वेश में किसी बड़े मंदिर के पास किसी पीपल या बरगद के पेड़ या एकांत में ध्यान लगा कर बैठ जाती थी. आरती के समय वह नवविवाहिताओं के चेहरे पर आने वाले भावों से अंदाजा लगा कर अपना शिकार चुनती थी.

इस के बाद वह उस के घर का पता लगा कर नौकरनौकरानी या पड़ोसियों से उस के बारे में पता लगाती और उसे फंसाने का जाल बिछाती. उन की कमजोरी जान कर उसे दूर करने के उपाय के नाम पर पूजा के बहाने मंदिर या मंदिर के पास कहीं सुनसान जगह पर बुलाती और सायनाइड मिला चरणामृत पिला कर उन की हत्या कर देती. फिर वह उस के सारे गहने उतार कर अपने गांव चली जाती. गांव में वह हफ्ता 10 दिन उन गहनों को पहन कर अपनी कुंठा शांत करती. इस के बाद उन्हें घर के आंगन में बने कच्चे मिट्टी के चूल्हे के नीचे दबा कर पुन: नए शिकार की तलाश में निकल पड़ती.

पुलिस ने उस की निशानदेही पर वे गहने बरामद कर के उसे अदालत में पेश किया, तो जज के सामने भी उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा कि भविष्य में भी वह इसी तरह औरतों को मुक्ति दिलाती रहेगी. कृष्णा की मनोदशा देख कर जज ने उसे मनोरोगी घोषित करते हुए इलाज के लिए मैंटल अस्पताल भेजने का आदेश दिया. कुछ लोगों का कहना है कि सजा से बचने के लिए कृष्णा ढोंग रच रही थी, पर मनोरोग विशेषज्ञों का कहना है कि वह गंभीर मानसिक रोग से ग्रस्त है. Hindi Crime Stories

—सत्य घटना पर आधारित

Village Stories: वह पागल नहीं था

Village Stories: मास्टर अब्दुर्रहमान की हरकतों से सभी को यही लगता था कि वह पागल हो गया है. लेकिन ऐसा कुछ नहीं था. उसे उस औरत के धोखा देने का ऐसा सदमा लगा था कि उस की हालत पागलों सी हो गई थी.

अब्दुर्रहमान प्राइमरी स्कूल का अध्यापक था. वह जिस स्कूल में पढ़ाता था, वह शहर के किनारे ऐसी जगह पर था, जहां आसपास जड़ीबूटियों से इलाज करने वाले बंजारे डेरा डाले रहते थे. वह जब भी खाली होता, उन बंजारों के पास चला जाता और कईकई घंटे उन के पास बैठा रहता. कभीकभी वह छुट्टी के दिन भी उन के पास चला जाता और पूरा का पूरा दिन वहीं गुजार देता.

ये बंजारे जड़ीबूटियों से दवाएं बनाते थे और जहां कहीं भी डेरा लगाते, आसपास के रहने वाले लोग उन के पास इलाज के लिए आ जाते थे. उन के पास जड़ीबूटियों के ऐसे नुस्खे और दवाइयां होती थीं, जो बाजार की दुकानों में नहीं मिलती थीं. कुछ बीमारियों में उन की दवाएं इतना सटीक फायदा करती थीं, जिन का इलाज बड़ेबड़े डाक्टर भी नहीं कर पाते थे.

मास्टर अब्दुर्रहमान उन बंजारों के बीच अपना काफी समय बरबाद करता था, इसलिए लोग उस की हंसी उड़ाते थे कि पता नहीं इन बंजारों के बीच इस मास्टर को क्या मिलता है, जो वह अपना इतना समय बरबाद करता है. जबकि अब्दुर्रहमान का कहना था कि इन बंजारों के पास ऐसीऐसी दवाएं हैं, जो मुरदों में भी जान डाल सकती हैं. जब लोग उन से कहते कि अगर ये इतने ही होशियार हैं तो दरदर भटकते क्यों हैं? मास्टर अब्दुर्रहमान के पास उन की इस बात का कोई जवाब नहीं होता था.

कभी मन में आता तो हंसते हुए यह जरूर कह देते, ‘भटकना तो इन का पेशा है. घूमघूम कर ही तो ये जड़ीबूटियां खोज कर लाते हैं और उन से दवाएं बनाते हैं. अगर ये होशियार नहीं हैं तो लोग इन के पास दवा लेने आते क्यों हैं. उन्हें फायदा होता है, तभी तो आते हैं.’ अब्दुर्रहमान की गरमियों की डेढ़ महीने की छुट्टियां और सर्दियों की 10 दिनों की छुट्टियां उन्हीं बंजारों के बीच गुजरती थीं. इस से लोगों ने अंदाजा लगाया कि बंजारों ने उसे अपना चेला बना लिया है. क्योंकि वह उन की बहुत खिदमत करता था. कभी वह उन के लिए गांव से दूध या छाछ ले कर जाता तो कभी सब्जियां.

एक दिन लोगों ने देखा, मास्टर अब्दुर्रहमान के आंगन में उपलों का ढेर जल रहा है. वह उस आग को दूर पलंग पर बैठा ध्यान से देख रहा था. जब लोगों ने पूछा कि यह क्या कर रहे हो तो उस ने कहा, ‘‘दवा बन रही है. इन उपलों के बीच जड़ीबूटियां हैं, जो जल कर भस्म हो जाएंगी. उस के बाद उस भस्म से दवा बनेगी. दवा क्या, अमृत बनेगा. जो उस दवा को पूरे परहेज के साथ एक सप्ताह खा लेगा, उसे कोढ़ और चेचक कभी नहीं होगा.’’

इस के बाद दवाएं बनाना मास्टर अब्दुर्रहमान का शौक ही नहीं रहा, बल्कि जुनून बन गया. वह वैज्ञानिकों की भांति तरहतरह के प्रयोग करता रहता था. मास्टर अब्दुर्रहमान की बीवी ने उस के लगभग सभी दोस्तों से कहा कि वे किसी भी तरह उस का ध्यान इस ओर से हटाएं, पर मास्टर ने किसी की नहीं सुनी. अब्दुर्रहमान ने दवाएं तो तमाम बना डालीं, लेकिन उस से इलाज कराने को कोई तैयार नहीं था. संयोग से एक रात अचानक गांव के एक 2 साल के बच्चे की तबीयत खराब हो गई. वह बारबार सीने पर हाथ रख कर जोरजोर से रो रहा था. ऐसा लग रहा था, जैसे उसे दौरा पड़ा हो.

कोई उपाय न देख बच्चे का बाप उसे मास्टर अब्दुर्रहमान के पास ले गया. उस ने बच्चे की नब्ज देखी, चेहरा देखा उस के बाद कहा कि इसे निमोनिया है. उस ने अपनी बनाई एक दवा उसे दी. 3-4 घंटे बाद बच्चे को ऐसा पसीना आया, जैसे उस के शरीर का सारा पानी निकल गया हो. इस के बाद बच्चे का रोनातड़पना बंद हो गया. मास्टर की दवा से वह बच्चा 3 दिनों में चंगा हो गया. इस के बाद मास्टर के यहां भीड़ लगने लगी. लोगों को फायदा भी हो रहा था.

मास्टर अपने यहां आने वाले मरीजों को जो दवाएं देता था, उन के नुस्खे उस ने उन्हीं बंजारों से सीखे थे. धीरेधीरे उस के यहां सब तरह के मरीज आने लगे. कुछ ही दिनों में मास्टर अब्दुर्रहमान ठीकठाक वैद्य बन गया. लेकिन जब भी उसे पता चलता कि बंजारे आए हैं, वह उन के पास जरूर पहुंच जाता. जब वह अच्छाखासा वैद्य बन गया तो उस ने नौकरी छोड़ दी. उसे पैसा कमाने की उतनी फिक्र नहीं थी, जितनी इल्म हासिल करने की थी. कभी वह किसी जड़ीबूटी की तलाश में निकल जाता तो कईकई दिनों घर से बाहर रहता. और जब वापस आता तो अजीबअजीब तरह की जड़ीबूटियां ले कर आता.

कभीकभी उस के पास कोई ऐसा भी मरीज आ जाता, जिस के मर्ज को वह समझ नहीं पाता. तब वह साफ कह देता कि इसे शहर के अस्पताल ले जाओ, क्योंकि वह रोग के बारे में जाने बिना दवा नहीं देता था. आजकल के डाक्टरों की तरह इंसानों को जानवर नहीं समझता था. सरकारी अस्पताल में पढ़ेलिखे डाक्टर होते थे, इसलिए उन गरीब मरीजों को उन के पास भेज देता था. मास्टर अब्दुर्रहमान का घर एक तरह से दवाखाना बन गया था. दूसरे गांवों से भी मरीज उस के पास दवा लेने आते थे. बगल के गांव की एक बहुत ही खूबसूरत औरत अकसर उस के पास दवा लेने आती थी. उस की उम्र 27-28 साल रही होगी. वह ऊंचे खानदान की शादीशुदा औरत थी.

वह नौकरानी के साथ घोड़ागाड़ी से आती थी. उस औरत को ले कर गांव में तमाम तरह की अफवाहें फैली हुई थीं. उन्हीं अफवाहों में एक यह भी थी कि यह औरत जितनी चालाक और होशियार है, उस का शौहर उतना ही सीधासादा है. मास्टर अब्दुर्रहमान उस की बड़ी तारीफें करता था. ईद पर उस ने मास्टर अब्दुर्रहमान को कपड़ों का जोड़ा और पगड़ी दी थी. उस के बच्चों को भी पैसे दिए थे.

एक दिन सुबहसुबह खबर आई कि उस औरत का शौहर मर गया है. इस में हैरानी की कोई बात नहीं थी, क्योंकि मौत तो किसी की भी हो सकती है. लेकिन यहां हैरानी की बात यह थी कि थोड़ी देर में पुलिस आ गई थी. इस का मतलब था, वह अपनी मौत नहीं मारा था. मामला कुछ गड़बड़ था, तभी पुलिस आई थी. इलाके के दरोगा ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए शहर के अस्पताल भिजवा दिया. पता चला कि मरने वाले के रिश्तेदारों ने शक जाहिर किया था कि वह किसी बीमारी से नहीं मरा, बल्कि उसे जहर दे कर मारा गया है. उस की बीवी की कोशिश थी कि जल्दी से जल्दी उस का अंतिम संस्कार कर दिया जाए, लेकिन मरने वाले के रिश्तेदारों ने लाश का चेहरा देखा तो थाने चले गए और पुलिस को बुला लाए थे.

पुलिस ने शक के आधार पर मृतक की बीवी और नौकरानी को हिरासत में ले लिया था. अगले दिन मास्टर अब्दुर्रहमान को भी थाने बुलाया गया था. शाम को दरोगा सिपाहियों की पूरी टीम के साथ मास्टर अब्दुर्रहमान के घर आया तो पुलिस के साथ वह भी था. उसे हथकड़ी लगी हुई थी. पति को उस हालत में देख कर उस की बीवी और बच्चे रोने लगे. लेकिन मास्टर अब्दुर्रहमान कुछ नहीं बोला.

मास्टर के घर की तलाशी ली गई. लेकिन किसी को पता नहीं चला कि मास्टर के घर क्या मिला. थोड़ी देर बाद पुलिस मास्टर को ले कर चली गई. अगले दिन पता चला कि मास्टर की निशानदेही पर पुलिस ने एक शीशी बरामद की थी. उसी शीशी से उस ने उस खूबसूरत औरत की नौकरानी को जहर दिया था. नौकरानी ने उस से यह कह कर जहर मांगा था कि घर में चूहे बहुत परेशान कर रहे हैं, इसलिए चूहों को मारने वाला जहर चाहिए. मास्टर अब्दुर्रहमान ने 2 लोगों की मौजूदगी में उसे वह जहर दिया था. पुलिस ने उन दोनों को भी इस मामले में गवाह बनाया था. इस से यह बात साफ हो गई थी कि उस औरत ने अपने शौहर को जो जहर दिया था, उसे चूहों को मारने के बहाने मास्टर अब्दुर्रहमान से हासिल किया गया था.

औरत वाकई बहुत हसीन थी. मास्टर अब्दुर्रहमान के पास आती भी रहती थी. मास्टर ऐसा आदमी नहीं था कि वह किसी जवान और हसीन औरत से प्रभावित हो कर कोई उलटासीधा काम कर बैठता. लेकिन कानून की निगाहें कुछ और ही होती हैं. कानून तो यह देखता है कि एक आदमी जहर से मर गया है और जहर देने वाली ने जहर किस आदमी से हासिल किया है.

मास्टर अब्दुर्रहमान का जुर्म यह था कि उस ने जहर दिया था. दूसरे उस ने वैद्यकी की पढ़ाईलिखाई भी नहीं की थी. पुलिस ने चालान बना कर उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस की वजह यह थी कि उस औरत की नौकरानी ने अपने बयान में कहा था कि मास्टर अब्दुर्रहमान के कहने पर वह जहर ले गई थी. उसे क्या पता था कि उस की मालकिन ने वह जहर किसे दिया, जबकि उस औरत ने नहीं कबूला था कि वह जहर उसी ने शौहर को दिया था.

इस के बाद लोग सोचने लगे कि आखिर उस औरत ने शौहर को जहर क्यों दिया? उन्हें लगता था कि औरत किसी लड़के को चाहती रही होगी, जबकि उस की शादी किसी और से हो गई होगी. लेकिन यहां यह मामला नहीं था. औरत किसी को भी नहीं चाहती थी. उस ने उसे शौहर के रूप में कबूल भी कर लिया था. कोई परेशानी भी नहीं थी. शौहर बिलकुल सीधासादा, एकदम बुद्धू था. बीवी को रौब में रखने के बजाय वह बीवी के रौब में रहना पसंद करता था. उस के पास जमीन भी काफी थी. साथ ही ऊंची जाति वाला भी था.

औरत का शौहर जिस तरह का था, देहातों में इस तरह के लोग सीधेसादे और बुद्धू नहीं होते. वे हुक्म में रहने के बजाय हुक्म चलाते हैं. लेकिन यहां मामला उल्टा था. औरत खूबसूरत, चंचल और जिंदादिल थी. जबकि शौहर में मर्दों वाली रौब और अकड़ नहीं थी. औरत ने किसी तरह 3 साल तो उस के साथ गुजार लिए. आखिर वह अपने इस शौहर से तंग आ गई, क्योंकि उस की सहेलियां उस का मजाक उड़ाती थीं. वह शौहर से खिंचीखिंची रहने लगी. 4 साल बीत गए, कोई बच्चा भी नहीं हुआ. इस के बाद गांव का एक आदमी औरत को अच्छा लगने लगा. वह उस की बिरादरी का भी था.

शौहर को पहले तो पता ही नहीं चला कि उस के घर में क्या हो रहा है? जब उसे पता चला तो उस ने उस आदमी को अपने घर आने से रोक दिया. एकाएक वह मर्द बन गया, जबकि औरत उसे नौकर से ज्यादा कुछ नहीं समझती थी. एक दिन शौहर ने उसे रंगेहाथों पकड़ लिया तो दोनों की जम कर पिटाई की. इस के बाद उस ने औरत पर पाबंदी लगा दी. घर से बाहर जाना बंद कर दिया. नौकरानी उस पर नजर रखती थी. इसी तरह 4-5 महीने बीत गए. औरत को कोई तकलीफ हुई तो शौहर से इजाजत ले कर वह मास्टर अब्दुर्रहमान के पास आनेजाने लगी. नौकरानी उस के साथ आतीजाती थी. इस के बाद उस ने नौकरानी से मास्टर के यहां से जहर मंगा कर एक रात शौहर को दूध में पिला दिया.

वह जिस आदमी से मिलतीमिलाती थी, वह भी पकड़ा गया था. इस तरह पुलिस ने इस मामले में 3 लोगों को मुल्जिम बनाया था, एक वह औरत, मास्टर अब्दुर्रहमान और तीसरा उस का दोस्त, जिसे प्रेमी भी कह सकते हैं. मुकदमा चला, इस्तगासा इतना कमजोर था कि सेशन कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए तीनों को छोड़ दिया. दरअसल बाद में मास्टर पलट गया था. उस ने अदालत में कहा कि उस ने जहर दिया ही नहीं था. वह देसी वैद्य है, दवाएं देता है, जिस से जिंदगी मिलती है. जिंदगी देने वाला जहर दे कर किसी की जिंदगी क्यों लेगा?

मास्टर अब्दुर्रहमान छूट तो गया, लेकिन इस घटना से उसे ऐसा सदमा लगा था कि जेल से आने के बाद वह एकदम खामोश हो गया. गांव के लोगों ने उसे जेल से छूटने की मुबारकबाद दी तो उस ने कहा, ‘‘किस बात की मुबारकबाद? मेरे जहर से एक आदमी की मौत हुई है. मेरे ऊपर एक हत्या का पाप चढ़ गया है.’’

उस ने उन तमाम दवाओं, जिन्हें न जाने कितनी मेहनत से तैयार किया था, उन तमाम जड़ीबूटियों को जिन्हें उस ने न जाने कहांकहां भटक कर इकट्ठा किया था, एक गड्ढा खोद कर गाड़ दिया. हर किसी ने उसे समझाया कि उस ने उस आदमी को मारने के लिए जहर नहीं दिया था, उस ने तो चूहे मारने के लिए जहर दिया था, इस में उस का कोई दोष नहीं है. लेकिन मास्टर ने किसी की एक नहीं सुनी.

गांव का जब भी कोई आदमी बीमार होता, मास्टर के पास आता और दवा बना कर देने को कहता. लेकिन मास्टर तो जैसे किसी की सुनता ही नहीं था. वह जहां भी बैठता, एक ही बात पर दुख जताता रहता कि उसी के जहर से वह आदमी मरा था. नौकरी उस ने पहले ही छोड़ दी थी. दवा दे कर जो 4 पैसे कमाता था, वह भी बंद कर दिया था. खेतीबाड़ी थी नहीं, इसलिए बीवीबच्चे भूखे मरने लगे.

इस के बावजूद मास्टर ने कुछ नहीं किया. मजबूरी में बीवीबच्चों को ले कर मायके चली गई. मास्टर हमेशा गुमसुम बैठा रहता था, कोई कुछ खाने को देता तो ठीक, वरना उसे खाने की भी चिंता नहीं थी. गांव वालों को लगने लगा कि मास्टर पागल हो गया है.

जबकि सही बात यह थी कि वह पागल नहीं था. गांव के एकदो लोगों से वह कभीकभी कुछ बातें कर लेता था. उन्हीं बातों से लगता था कि मास्टर पागल नहीं है. उसे गहरा सदमा लगा है. एक दिन शाम को वह गांव के मुखिया रहमान अली के सामने से गुजर रहा था तो उन्हें देख कर रुक गया. मुखिया से भी वह कभीकभी अपने मन का दुख कह देता था. उस दिन कुरते की जेब से एक शीशी निकाल कर वह मुखिया को दिखाते हुए मरीजों की सी मद्धिम आवाज में धीरे से बोला, ‘‘इस शीशी में जहर है, इसे मैं ने ही तैयार किया है. मैं रोज उधर जाता हूं, लेकिन वह मिलती ही नहीं.’’

‘‘कौन नहीं मिलती?’’ रहमान अली ने पूछा.

‘‘अरे वही, जिस ने अपने पति को जहर दे कर मारा था. ऐसा कर के उस ने मुझे बदनाम कर दिया था न.’’

‘‘वह मिल जाएगी तो क्या करोगे?’’

‘‘यह नहीं बताऊंगा.’’ कह कर मास्टर चला गया.

एक दिन मास्टर उसी औरत के गांव की ओर से चला आ रहा था तो रास्ते में वह मिल गई. मास्टर को देख कर वह उस के पास आ गई. मास्टर भी यही चाहता था. पास आ कर औरत ने पूछा, ‘‘हकीमजी, इधर कहां से आ रहे हैं?’’

‘‘पीर साहब की मजार से आ रहा हूं, उन के पास पानी दम कराने गया था.’’ मास्टर ने जेब से एक शीशी निकालक                                                                                                                                    रदिखाते हुए कहा, ‘‘यह दम किया हुआ पानी है. इसे पीने से सारी मुश्किलें खत्म हो जाती हैं. लो इस में से थोड़ा पानी तुम भी लो. तुम्हारी भी सारी मुश्किलें खत्म हो जाएंगी.’’

मास्टर उसे जहर पिला कर मारना चाहता था. सोचा कि इस औरत ने जिस तरह धोखे में रख कर उस पर कलंक का टीका लगाया है, उसी तरह धोखे में रख कर वह इसे खत्म कर देगा. कातिल को मौत की सजा मिलनी ही चाहिए.nऔरत ने हाथ फैलाए तो मास्टर ने उसे वह शीशी दे दी. औरत जैसे ही शीशी मुंह के पास ले गई, मास्टर को न जाने क्या सूझा कि उस ने झपट कर शीशी छीन ली. औरत डर गई. उस ने पूछा, ‘‘आप ने शीशी क्यों छीन ली?’’

मास्टर कुछ नहीं बोला. शीशी का ढक्कन बंद कर के उसे जेब में डाल लिया. औरत ने कहा, ‘‘लगता है, पागल हो गए हो?’’

‘‘आज नहीं तो कल जरूर पागल हो जाऊंगा.’’ मास्टर ने कहा.

शायद मास्टर को लगता था कि उस औरत को मार कर उसे चैन मिल जाएगा. लेकिन उस ने तो उस के मुंह तक पहुंचे जहर को छीन लिया था. अगले दिन सुबह गांव वाले मसजिद से नमाज पढ़ कर निकल रहे थे, तभी पता चला कि मास्टर अपने घर के बरामदे में पड़ा है. मास्टर अकेला ही था, इसलिए गांव का मुखिया होने के नाते रहमान अली गांव के कुछ बुजुर्गों को साथ ले कर उस के घर पहुंच गए. चूंकि उन्हें मास्टर के बारे में सब पता था, इसलिए संदेह होने पर उन्होंने तकिए के नीचे हाथ फेरा. वहां कुछ नहीं मिला. चारपाई के नीचे देखा तो उन्हें वह शीशी नजर आ गई, जिस में जहर था. शीशी खाली थी. इस तरह मास्टर अब्दुर्रहमान ने खुद को बदनामी से मुक्त कर लिया था. Village Stories

 

Crime Story: खतरनाक मंसूबे में शामिल लड़की

Crime Story: गलती सुरजीत की बहन सुधा की थी, लेकिन उस की गलती मान कर उसे समझाने के बजाय सुरजीत ने अपने अहं और झूठी शान की खातिर एक निर्दोष को ही फंसाने का खतरनाक मंसूबा बना लिया था.

बात उतनी बड़ी नहीं थी, लेकिन इतनी छोटी भी नहीं थी कि हलके में लिया जाता. उस के पीछे का मकसद और साजिश इतनी खतरनाक थी कि पूरी घटना जानने के बाद मैं दंग रह गया था. इस बात ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया था कि आजकल के बच्चे छोटीछोटी बातों को ले कर इतने बड़ेबड़े मंसूबे कैसे बना लेते हैं?

उस दिन मैं थोड़ी देर से थाने पहुंचा था. इस की वजह यह थी कि मेरे बेटे के स्कूल में सालाना समारोह था, इसलिए मुझे वहां जाना पड़ा था. थाने पहुंच कर मैं ने ड्यूटी अफसर परमजीत सिंह को बुला कर पूछा, ‘‘कोई खास बात तो नहीं है?’’

‘‘जी कोई खास बात नहीं, बस एक…’’

परमजीत बात पूरी कर पाता, मुख्य मुंशी गुरजीत सिंह कुछ फाइलें ले कर हस्ताक्षर कराने आ गया. मैं ने फाइलों पर दस्तखत करते हुए परमजीत सिंह को हाथ से बैठने का इशारा किया. वह मेरे सामने पड़ी कुरसी पर बैठ गए. सभी फाइलों पर दस्तखत कर के मैं ने मुंशी से 2 चाय भिजवाने को कहा. मुंशी चला गया तो मैं परमजीत से मुखातिब हुआ, ‘‘हां, तो तुम क्या कह रहे थे?’’

‘‘सर, लगभग 12 बजे टोल नाके पर तैनात हमारे थाने के पुलिसकर्मियों के पास एक लड़की भागतीहांफती आई. उस की हालत बता रही थी कि किसी बात को ले कर वह काफी परेशान थी.  पुलिसकर्मियों ने आगे बढ़ कर उस की उस हालत की वजह पूछी तो उस ने हांफते हुए कहा कि वह सतलुज नदी में कोई पूजा सामग्री फेंकने आई थी. सामग्री फेंक कर जैसे ही वह लौटी 2 लड़कों ने उसे पकड़ लिया और जबरदस्ती खींच कर खेतों में ले गए, जहां उन्होंने उस के साथ जबरदस्ती की. लड़कों ने उस का मुंह दबा रखा था, जिस से वह चीख भी नहीं सकी.’’

परमजीत इतनी बात कर चुप हुआ तो पूरी बात जानने के लिए मैं ने कहा, ‘‘आगे क्या हुआ?’’

‘‘लड़की ने अपना नाम जीतो बताया था. उस की बात सुन कर हवलदार चरण सिंह और इंद्र सिंह ने फोन द्वारा मुझे घटना की सूचना दे कर खुद जीतो द्वारा बताए गए खेत की ओर चल पड़े. उन के खेतों में पहुंचने तक मैं भी मोटरसाइकिल से वहां पहुंच गया.’’

जीतो का कहना था कि वे लड़के अभी यहीं कहीं छिपे होंगे, इसलिए हम सभी लड़कों की तलाश करने लगे. थोड़ी तलाश की तो 2 लड़के सतलुज किनारे एक झाड़ी के पास बैठे मिल गए. जीतो ने उन की शिनाख्त करते हुए कहा कि इन दोनों ने उस के साथ दुष्कर्म नहीं किया, इन्होंने केवल छेड़छाड़ की थी. दुष्कर्म करने वाला कोई और लड़का था.

‘‘तो क्या 3 लड़के थे?’’ मैं ने पूछा तो परमजीत ने कहा, ‘‘जी सर, दुष्कर्म करने वाला तीसरा लड़का भाग गया था. सर, मैं जीतो और उन दोनों लड़कों को थाने ले आया हूं. अब आप बताइए कि आगे क्या किया जाए?’’

‘‘अरे भई करोगे क्या, लड़की का मैडिकल कराओ, बयान लो और उस फरार लड़के के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के उसे पकड़ो और क्या करोगे. वैसे ये सब रहने वाले कहां के है. दुष्कर्म कर के जो लड़का भागा है, उस का क्या नाम है, वह कहां रहता है?’’ मैं ने पूछा.

मेरी इस बात पर परमजीत कुछ परेशान सा हो गया. मैं ने आंखों से आगे बताने का इशारा किया तो उस ने कहा, ‘‘सर, इन दोनों लड़कों के नाम तो नरेश और कुलदीप हैं. दुष्कर्म कर के जो लड़का भागा है. उस का नाम राज है और वह आप के दोस्त पत्रकार अमन सिंह का बेटा है.’’

‘‘क्या… अमन का बेटा राज?’’ मैं चौंका. पत्रकार अमन सिंह सचमुच मेरा अच्छा दोस्त था. वह निहायत ही शरीफ और शांतिप्रिय आदमी था. झूठ से उसे सख्त नफरत थी. उस ने कभी झूठी खबरें नहीं लिखी थीं.

अपने काम से काम रखने वाला अमन अपनी नेकनीयती की वजह से हमेशा आर्थिक तंगी से जूझता रहता था. उस के सिखाए दर्जनों लड़के दुनियादारी के मजे कर रहे थे, लेकिन वह वैसा नहीं बन पाया था. मैं ने दिमाग पर जोर डाला तो मुझे याद आया कि अमन के बेटे का नाम राज ही है, क्योंकि 2-3 महीने पहले अमन किसी मामले में मुझ से सलाह लेने आया था, तब उस ने बेटे का नाम ले कर कोई चर्चा की थी. तब मुझे पता चला था कि उस के बेटे का नाम राज है.

मैं हैरान था कि अमन जैसे शरीफ आदमी का बेटा इस तरह का काम कैसे कर सकता है? लेकिन आज के समय में किसी के बारे में कोई राय रखना उचित नहीं है. जरूरी नहीं कि बाप शरीफ हो तो बेटा भी शरीफ ही हो. बहरहाल, अमन को उस दिन मेरे पास आना था, क्योंकि उसे कुछ रुपयों की जरूरत थी. 2 दिन पहले उस ने फोन कर के  मुझ से कहा था तो मैं ने उसे उस दिन आ कर रुपए ले जाने के लिए कहा था. वह किसी भी समय आ सकता था. मैं सोचने लगा कि अमन जब अपने बेटे की इस करतूत के बारे में सुनेगा तो उस पर क्या गुजरेगी?

‘‘उन दोनों लड़कों को ले आओ.’’ मैं ने कहा.

मेरे कहने पर परमजीत सिंह ने नरेश और कुलदीप को ला कर मेरे सामने खड़ा कर दिया. दोनों देखने में ही आवारा लग रहे थे. उन्हें देख कर मैं सोच भी नहीं सकता था कि ऐसे घटिया लड़कों से राज की दोस्ती हो सकती है. फिर भी मैं ने पूछा, ‘‘सचसच बताओ, क्या बात है?’’

नरेश थोड़ा तेज दिखाई दे रहा था. उसी ने कहा, ‘‘सर, हम ने उसे मना किया था. कहा कि छेड़छाड़ की बात और है, लेकिन वह नहीं माना. लड़की को पकड़ खेत में ले गया और लड़की की इज्जत खराब कर दी.’’

‘‘वह सब तो ठीक है, लेकिन उस लड़के का नाम क्या है, कौन है वह?’’

‘‘सर, उस का नाम राज है. उस के पापा पत्रकार हैं. उन का नाम अमन सिंह है. राज एक फाइनैंस कंपनी में असिस्टैंट मैनेजर है.’’

इस के बाद उस ने वही सब मुझे भी बताया, जो उस ने परमजीत को बताया था. नरेश के साथी कुलदीप ने भी वही सब बताया था, जो नरेश ने बताया था. मैं उन से पूछताछ कर ही रहा था कि अमन आ पहुंचा. मुझ से हाथ मिला कर वह मेरे सामने कुरसी पर बैठ गया तो मैं ने शिकायती लहजे में कहा, ‘‘तुम्हारे बेटे ने जो किया है, मुझे उस से ऐसी उम्मीद कतई नहीं थी. तुम ने यही सब सिखाया है उसे?’’

‘‘मेरा बेटा… आप मेरे किस बेटे की बात कर रहे हैं?’’

‘‘राज की और किस की..?’’

‘‘क्यों, क्या किया राज ने?’’ अमन ने हैरानी से पूछा.

‘‘एक लड़की के साथ जबरदस्ती की है.’’

‘‘जबरदस्ती… क्या मतलब?’’

‘‘भई एक लड़की के साथ दुष्कर्म किया है राज ने.’’ मैं ने आवाज पर जोर दे कर कहा.

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं? कहां किस के साथ दुष्कर्म किया है? राज ऐसा कतई नहीं कर सकता.’’ अमन ने जिद सी करते हुए कहा.

‘‘ऐसा नहीं कर सकता तो क्या मैं झूठ बोल रहा हूं. पूछो राज के इन साथियों से.’’ मैं ने नरेश और कुलदीप की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘अपने इन्हीं साथियों के साथ उस ने घटना को अंजाम दिया है. दोनों उसी के दोस्त हैं.’’

‘‘आप यह क्या कह रहे हैं. ये आवारा लड़के राज के दोस्त कतई नहीं हो सकते. राज के सिर्फ 3 दोस्त हैं, जिन्हें मैं अच्छी तरह से जानता हूं. तुम इन सड़कछाप लड़कों को राज का दोस्त कह दोगे तो क्या मैं मान लूंगा.’’

दुष्कर्म के मामले में राज का नाम आने से अमन काफी नाराज था. उस ने खीझते हुए कहा, ‘‘अच्छा, अब बात समझ में आई, मैं ने आप से कुछ रुपए मांगे थे, नहीं देने का मन था तो मना कर देते. मेरे बेटे पर इस तरह का झूठा आरोप लगाने की क्या जरूरत थी? सच ही कहा गया है, पुलिस वाले की न दोस्ती अच्छी होती है और न दुश्मनी.’’

‘‘अमन ये तुम क्या बेकार की बातें कर रहे हो? मैं कुछ भी नहीं कह रहा हूं. जो कुछ भी कह रहे हैं, वह ये लड़के और वह लड़की कह रही है, जिस के साथ राज ने दुष्कर्म किया है. रही बात पैसों की तो उस के लिए मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था. तुम्हें रुपए देने के लिए ही तो मैं ने बुलाया था.’’

‘‘मुझे अब आप की कोई मदद नहीं चाहिए. आप मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए.’’

मैं खामोश हो गया. अमन सिर झुकाए किसी सोच में डूबा बैठा रहा. कुछ देर बाद मैं ने अमन को प्यार से समझाया. लड़की को बुला कर पूरी बात उस के सामने कहलवाई. नरेश और कुलदीप से भी बात कराई. तब जा कर बात उस की समझ में आई.

वह कुछ देर शांत बैठा रहा. उस के बाद अचानक जेब से मोबाइल फोन निकाला और किसी से बात करने लगा. उस की बातचीत से समझ में आया कि उस ने राज को फोन किया था और अपने 2-4 दोस्तों के साथ आने को कहा था. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि अमन करना क्या चाहता है. मैं ने अमन के लिए चाय मंगाई. चाय पी कर हम सभी चुपचाप बैठे रहे. वहां की खामोशी बता रही थी कि कोई किसी से बात नहीं करना चाहता. लगभग आधे घंटे बाद अमन के फोन की घंटी बजी. फोन रिसीव कर के उस ने कहा, ‘‘आ जाओ.’’

इस के बाद अमन उस से मुखातिब हुआ, ‘‘इन तीनों से कहो कि अभी जो लड़के आएंगे, उन में पहचान कर बताएं कि राज कौन है, जिस ने इस लड़की के साथ जबरदस्ती की है.’’

अमन के इतना कहतेकहते 6 लड़के मेरे औफिस में आ कर खड़े हो गए. सभी लड़के नरेश और कुलदीप से एकदम अलग पढ़ेलिखे और अच्छे घरों के लग रहे थे. मैं ने सब से पहले जीतो से कहा, ‘‘बताओ, इन लड़कों में से कौन राज है, जिस ने तुम्हारे साथ जबरदस्ती की है?’’

मेरी बात सुन कर वह बगलें झांकने लगी. मैं ने डांटा तो हड़बड़ा कर उस ने एक लड़के की ओर इशारा कर दिया. मेरे कहने पर परमीत सिंह ने उस लड़के को खड़ा कर दिया. इस के बाद मैं ने नरेश और कुलदीप से कहा कि वे बताएं कि उन में इन का दोस्त राज कौन है?’’

जीतो की तरह वे भी एकदूसरे का मुंह देखने लगे. मैं ने डांटते हुए कहा, ‘‘अब पहचान कर बताओ न तुम्हारा दोस्त राज कौन है?’’

दोनों हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगे, ‘‘साहब, हम नहीं जानते कि इन में से राज कौन है? हमें तो राज का नाम लेने के लिए रुपए दिए गए थे.’’

‘‘जी साहब,’’ नरेश और कुलदीप के सच उगलते ही जीतो ने भी बीच में सच उगल दिया, ‘‘ये सच कह रहे हैं साहब. राज को दुष्कर्म के मामले में फंसाने के लिए हम सभी को रुपए दिए गए थे. मैं न तो राज को जानती हूं और न मैं ने कभी उसे देखा है.’’

इस के बाद उन तीनों ने जो बताया, उसे सुन कर मैं हैरान रह गया. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि आज की युवा पीढ़ी को यह क्या हो गया है, जो छोटीछोटी बातों पर इतने खतरनाक मंसूबे बना लेती हैं. इस के बाद जीतो, नरेश और कुलदीप से की गई पूछताछ में इस फरजी दुष्कर्म की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस तरह थी.

राज जिस फाइनैंस कंपनी में काम करता था, उसी में उस के साथ ही किशोरीलाल भी काम करता था. उस का काम लोन पास करवाना था. वह सीधासादा पारिवारिक आदमी था. इसलिए राज उस की बहुत इज्जत करता था. इस के अलावा एक वजह यह भी थी कि वह उस के पिता की उम्र का था.

किशोरीलाल की एक जवान बेटी थी सुधा, जो ग्रैजुएशन कर के उन दिनों घर में बैठी थी. वह पोस्टग्रैजुएशन करना चाहती थी, लेकिन एडमिशन में देरी थी. किशोरीलाल ने सोचा कि सुधा पूरे दिन घर में बैठी बोर होती रहती है, क्यों न इस बीच अस्थाई रूप से उसे अपनी कंपनी में लगवा दे. मन भी बहलता रहेगा, 4 पैसे कमा कर भी लाएगी. उस ने इस विषय पर राज से बात की तो उसे भला क्या ऐतराज होता. जहां 40-50 लड़केलड़कियां काम कर रहे थे, वहां एक और सही. सुधा ने फाइनैंस कंपनी जौइन कर ली. वह खुले विचारों वाली आधुनिक युवती थी. बातचीत में किसी से भी जल्दी घुलमिल जाना और दोस्ती कर लेना उस की फितरत थी.

स्कूल में पढ़ते समय से ही उस की कई लड़कों से दोस्ती थी. उन में से किसी एक ने उसे धोखा भी दिया था. बहरहाल राज को देखते ही वह उस की ओर आकर्षित हो गई थी, क्योंकि राज के खूबसूरत होने के साथसाथ कंपनी में भी उस की बड़ी इज्जत थी. कोई न कोई बहाना बना कर सुधा राज के नजदीक जाने की कोशिश करने लगी. इस कोशिश में उस ने घुमाफिरा कर कई बार उस से प्यार करने का इशारा किया. उस ने उस से यहां तक कह दिया कि वह एक लड़के से प्यार करती थी, लेकिन उस ने उसे धोखा दे दिया था. अब मांबाप उस की शादी करना चाहते हैं, लेकिन वह अभी शादी नहीं करना चाहती.

राज ने उस की कोशिश को नाकाम करते हुए उसे समझाया कि उसे इन बातों पर ध्यान न दे कर अपने काम पर ध्यान देना चाहिए. फिर अभी उसे आगे की पढ़ाई भी करनी है. उसे अपना कैरियर बनाना है. अभी उस का पूरा जीवन पड़ा है. उसे इस तरह की फिजूल की बातें दिमाग में नहीं लाना चाहिए. राज की बातों पर गौर किए बगैर सुधा सुधरने के बजाय मैसेज करने लगी. उन संदेशों में वह राज से सलाह मांगती कि अब उसे क्या करना चाहिए, साथ ही बीचबीच में प्यार के इजहार वाले मैसेज भी कर देती थी.

सुधा के इन संदेशों से परेशान हो कर राज ने उसे संदेश भेजा कि वह उस का समय बरबाद न करे, जैसा उस ने उसे समझाया है, वह वैसा ही करे. संयोग से किसी दिन सुधा का फोन उस के भाई सुरजीत के हाथ लग गया. उस ने मैसेज बौक्स में बहन के भेजे मैसेज देखे तो गुस्से से पागल हो उठा. उस ने बहन को समझाने के बजाय राज को सबक सिखाने का इरादा बना लिया. जबकि राज का इस मामले में कोई दोष नहीं था. बहन से उस ने कुछ कहना इसलिए उचित नहीं समझा, क्योंकि वह उस की फितरत को जानता था. उस ने मैसेज वाली बात मांबाप को भी बता दी थी.

यह सब सुन कर किशोरीलाल तो इतना शर्मिंदा हुए कि उन्होंने नौकरी पर जाना ही बंद कर दिया. सुधा की भी नौकरी छुड़वा दी गई. सुरजीत ने राज को सबक सिखाने के लिए थाने के अपने एक परिचित हवलदार को कुछ रुपए दे कर कहा कि राज उस की बहन से छेड़छाड़ कर के उसे परेशान करता है. वह उसे किसी झूठे मुकदमे में फंसा कर जेल भिजवा दे.

हवलदार, जिस का नाम जसबीर था, ने फोन कर के राज को थाने बुलाया. फोन पर उस ने राज को धमकाते हुए कहा था कि थाने में उस के खिलाफ रेप का मुकदमा दर्ज है. अगर वह थाने नहीं आया तो वह उसे उस के औफिस से गिरफ्तार कर लेगा. समझदारी दिखाते हुए राज ने यह बात अपने पत्रकार पिता अमन सिंह को बता दी, साथ ही सुधा द्वारा भेजे गए संदेशों के बारे में भी बता दिया. अमन इस बारे में मेरे पास सलाह लेने आया. मेरे पास आने से पहले उस ने हवलदार जसबीर सिंह को फोन कर के अपना परिचय दे कर पूछा था कि उस के बेटे राज से उसे ऐसा क्या काम है, जो वह उसे थाने बुला रहा है.

पत्रकार एसोसिएशन के अध्यक्ष ने भी फोन कर के हवलदार जसबीर सिंह से यही बात पूछी तो उस दिन के बाद उस ने राज को कभी फोन नहीं किया. इस के बाद अमन सिंह इस मामले को सुलझाने के लिए राज की कंपनी के मैनेजर से मिले. उन्होंने किशोरीलाल को औफिस में बुलवाया, जिस से आमनेसामने बैठ कर बातचीत हो सके और जो भी गलतफहमी हो दूर की जा सके. तय समय पर राज, अमन सिंह और किशोरीलाल मैनेजर की केबिन में इकट्ठा हुए. किशोरीलाल के साथ उस की पत्नी और बेटा सुरजीत भी आया था.

सुरजीत के बारे में जैसा मुझे पता चला था, उस के हिसाब से वह अपनी मां के लाड़प्यार में बिगड़ा आवारा किस्म का लड़का था. वह दिन भर गुंडागर्दी और आवारागर्दी किया करता था. वह खुद को किसी तीसमार खां से कम नहीं समझता था. बातचीत शुरू हुई तो सुरजीत और उस की मां किशोरीलाल को चुप करा कर जोरजोर से बोल कर राज पर झूठे आरोप लगाने लगे. बात यहीं तक सीमित नहीं रही, वे उसे सजा दिलाने की बात कर रहे थे. अंत में मैनेजर साहब को हस्तक्षेप करना पड़ा. उन्होंने कहा, ‘‘मैं राज को 5 सालों से जानता हूं. वह कैसा है, यह तुम लोगों को बताने की जरूरत नहीं है. रही बात सुधा की तो उसे भी 10 दिनों में जान लिया. फायदा इसी में है कि बात को यहीं खत्म कर दिया जाए.’’

उस दिन समझौता तो हो गया, लेकिन जातेजाते सुरजीत ने राज को धमकाते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हें देख लूंगा.’’

यह बात भी यहीं खत्म हो गई. उस दिन जो समझौता हुआ था, सुरजीत उस से बिलकुल खुश नहीं था. वह राज को सजा दिलाना चाहता था. सजा भी ऐसी कि वह मुंह दिखाने लायक न रहे. 2 महीने तक शांत रहने के बाद सुरजीत ने राज को सबक सिखाने के लिए एक योजना बनाई. उस योजना में उस ने कालगर्ल जीतो और 2 आवारा लड़कों नरेश तथा कुलदीप को शामिल किया. उस ने उन से कहा कि योजना सफल होने पर वह उन्हें मोटी रकम देगा.

उस की योजना के अनुसार, नरेश को किसी सुनसान जगह पर जीतो के साथ शारीरिक संबंध बनाना था. उस के बाद जीतो थाने जा कर शिकायत दर्ज कराती कि उस के साथ दुष्कर्म हुआ है. जीतो पुलिस को उस जगह ले जाती, जहां दुष्कर्म हुआ था. नरेश और कुलदीप वहीं छिपे रहेंगे, जिन्हें पुलिस दुष्कर्म का साथी मान कर थाने ले आती. थाने आ कर जीतो बताती कि इन दोनों ने दुष्कर्म नहीं किया, इन्होंने केवल छेड़छाड़ की थी. दुष्कर्म इन के दोस्त ने किया था, जो भाग गया है. पुलिस जब नरेश और कुलदीप से उन के दोस्त का नाम पूछती तो वे उस का नाम राज बता कर उस का मोबाइल नंबर देते हुए उस के बारे में पूरी जानकारी दे देते.

जीतो के बयान और नरेश तथा कुलदीप की गवाही के आधार पर पुलिस राज के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कर के उसे जेल भिजवा देगी, क्योंकि जीतो के मैडिकल में इस बात की पुष्टि हो जाती कि उस के साथ शारीरिक संबंध बनाया गया है. छेड़छाड़ के आरोप में तुरंत दोनों की जमानत हो जाती, जबकि दुष्कर्म के आरोप में राज को जेल भेज दिया जाता. इस काम के लिए सुरजीत ने नरेश और कुलदीप को 5-5 हजार रुपए तथा जीतो को 10 हजार रुपए एडवांस भी दिए थे. इतने ही रुपए उन्हें तब और मिलने थे, जब वे रिपोर्ट की कौपी सुरजीत को देते. यह सारी कारगुजारी सुरजीत की बनाई थी.

बहरहाल, मैं ने परमजीत सिंह से उन तीनों के बयान दर्ज कर के जीतो को अस्पताल ले जा कर मैडिकल कराने को कहा. इस के बाद मैं ने थाना मानावाला से हवलदार जसबीर को बुलवा कर पूछा, ‘‘यह राज वाला क्या मामला है?’’

उस ने सब कुछ सचसच बता दिया. उस ने कहा कि वह न राज को जानता है और न ही उसे उस के द्वारा की गई किसी छेड़छाड़ की बात मालूम है. सुरजीत ने उसे रुपए दे कर राज पर झूठा मुकदमा दर्ज कराने के लिए कहा था. लेकिन बीच में राज के पत्रकार पिता के आ जाने से वह राज पर कोई काररवाई नहीं कर सका था. जसबीर ने यह भी बताया था कि उस के बाद भी सुरजीत उस के पास आया था और कह रहा था कि वह चाहे जितने रुपए ले ले, लेकिन राज पर दुष्कर्म का केस बना कर उसे जेल भिजवा दे. लेकिन उस ने उसे साफ मना कर दिया था. शायद इसीलिए वह उस का थानाक्षेत्र छोड़ कर अपने मंसूबे को पूरे करने के मेरे थानाक्षेत्र में आया था.

मैं ने जसबीर की मुलाकात राज और अमन सिंह से भी कराई और उसे पूरी कहानी बताई. इस के बाद मैं ने उस से कहा कि सुरजीत ने राज के खिलाफ अपनी बहन से छेड़छाड़ की जो झूठी रिपोर्ट दी थी, उस पर वह उस के खिलाफ काररवाई करे. जसबीर इस के लिए तैयार हो गया.

अब तक परमजीत सिंह जीतो का मैडिकल करवा कर लौट आए थे. इस के बाद मैं ने नरेश, कुलदीप और जीतो से पूछा, ‘‘इस के बाद सुरजीत ने तुम लोगों से क्या करने को कहा था?’’

‘‘उस ने कहा था कि रिपोर्ट दर्ज होने के बाद मैं उसे फोन करूं. इस के बाद वह आता और रिपोर्ट की कापी ले कर मेरे बाकी रुपए देता.’’ जीतो ने कहा.

‘‘ठीक है, तुम उसे फोन कर के बताओ कि रिपोर्ट दर्ज हो गई है. पुलिस राज को पकड़ने उस के औफिस गई है.’’

मेरे कहने पर जीतो ने सुरजीत को फोन कर के वही सब कहा, जो मैं ने उसे समझाया था. सुरजीत ने जीतो से आधे घंटे बाद मेन बाईपास चौक पर मिलने को कहा. मैं ने परमजीत सिंह और जसबीर के नेतृत्व में एक टीम तैयार की और जीतो के साथ सुरजीत को पकड़ने के लिए भेज दी. दरअसल, मुझे सुरजीत पर बहुत गुस्सा आ रहा था. इसलिए नहीं कि राज मेरे दोस्त अमन सिंह का बेटा था, गुस्सा इस बात पर आ रहा था कि बहन की गलती मान कर उसे समझाने के बजाय वह एक निर्दोष को सजा दिलवाना चाहता था, वह भी सिर्फ अपने अहं और झूठी शान के लिए. इस तरह के लोग एक तरह से समाज पर कलंक हैं और घृणा के पात्र बन जाते हैं.

बहरहाल, सुरजीत को पकड़ने गई टीम खाली हाथ लौट आई. वह बाईपास पर नहीं आया. पुलिस टीम उस के घर भी गई, लेकिन वह घर पर नहीं मिला. जीतो ने कई बार फोन कर के उस से बात करने की कोशिश की, लेकिन उस ने अपना फोन बंद कर दिया था. शायद उसे पुलिसिया काररवाई की भनक लग गई थी. वह फरार हो गया था. बहरहाल, जीतो, नरेश और कुलदीप के खिलाफ मैं ने काररवाई करनी शुरू कर दी. नरेश पर मैं ने जीतो से दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करना चाहा तो जीतो और नरेश मेरे पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाने लगे.

नरेश ने जीतो के साथ शारीरिक संबंध तो बनाए ही थे, जो मैडिकल रिपोर्ट से भी स्पष्ट हो गए थे. लेकिन जीतो ने कहा, ‘‘साहब, हम से गलती हो गई है, हमें माफ कर दें. यह संबंध मेरी मरजी से बने थे.’’

जीतो के इस नए बयान पर मैं ने नरेश के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करने के बजाय इम्मोरल ट्रैफिकिंग एक्ट (देह व्यापार) का मुकदमा दर्ज कर उन्हें हिरासत में ले लिया. कुलदीप के खिलाफ मैं ने जीतो से छेड़छाड़ का मुकदमा दर्ज किया. अगले दिन तीनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जमानत मिल गई.

यह संयोग की ही बात थी कि राज मेरे पत्रकार दोस्त का बेटा था, वरना सुरजीत अपनी घिनौनी योजना को अंजाम दे कर एक भले लड़के को जेल भिजवा कर उस पर एक ऐसा कलंक का टीका लगा देता, जो पूरी जिंदगी न छूटता. इस से उस का जीवन भी अंधकारमय हो जाता. Crime Story

 

—कथा सत्य घटना पर आधारित, पात्रों के नाम बदले गए हैं.

 

Hindi Stories: एक अनूठी प्रेम कहानी – बाजीराव मस्तानी

Hindi Stories: संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ आई और सफल भी रही. निस्संदेह लोगों ने इस प्रेमकहानी को पसंद किया. लेकिन सच यह है कि बाजीराव और मस्तानी के प्रेम को उस जमाने में कोई समझ नहीं पाया था, इसीलिए उन के अपनों ने ही उन्हें एक नहीं होने दिया. फिर भी ये दोनों पात्र ऐतिहासिक आईने में अमर हैं.

प्रेम कहानियां मानव मन को हमेशा से प्रभावित करती रही हैं. कुछ प्रेम कहानियां तो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो कर अमर भी हो गई हैं. लेकिन यह दुख की ही बात है कि मराठा पेशवा बाजीराव प्रथम और उन की प्रेमिका मस्तानी की अद्भुत प्रेम कथा के बारे में हम उतना नहीं जानते, जितना हमें जानना चाहिए 18वीं सदी के इन ऐतिहासिक पात्रों ने भारत के भाग्य का फैसला किया था.

पेशवा बाजीराव मराठा साम्राज्य के ऐसे नायक थे, जिन्होंने अपने बहुत कम समय के शासनकाल में मराठा साम्राज्य को महाराष्ट्र की सीमा से निकाल कर पूरे हिंदुस्तान में फैला दिया था. इस अजेय योद्धा के रणकौशल और वीरता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 39 साल की उम्र में 41 युद्ध लड़े और किसी भी युद्ध में पराजित नहीं हुए. बाजीराव की बहादुरी को देखते हुए उन्हें ‘इंडियन नेपोलियन’ कहना गलत नहीं होगा. वैसे नेपोलियन कई युद्धों में पराजित हुआ था, लेकिन बाजीराव प्रथम हमेशा अजेय रहे.

सन 1720 में मुगल सम्राट औरंगजेब की मौत के बाद उत्तर भारत में ही नहीं दक्खिन में भी राजनीतिक शून्यता का आलम छा गया था, जिसे पेशवा बाजीराव ने एक झटके में दूर कर के दिल्ली पर मराठों का कब्जा कायम कर दिया था. मुगल सम्राट और सूबेदार जिन्हें अपनी बारूदी ताकत पर नाज था, बाजीराव प्रथम के रहमोकरम पर जीने को मजबूर हो गए थे.

मस्तानी के प्रेम में व्याकुल रहे बाजीराव इस बात का प्रमाण हैं कि उन्होंने अपने प्रेम को पवित्र रखा, उसे कभी वासना में नहीं डूबने दिया. वह ऐसा दौर था, जब ज्यादातर राजा, नवाब, रासरंग में डूब कर रंगरेलियां मनाने में व्यस्त रहते थे, लेकिन बाजीराव के लिए उन की प्रेमिका मस्तानी कभी भी उन की कमजोरी नहीं बनीं, बल्कि उन के अदम्य साहस, पराक्रम में पलपल की हमसफर और प्रेरणास्रोत रहीं.

बाजीराव और मस्तानी की प्रेम कहानी जानने से पहले हमें उन के बारे में जान लेना चाहिए. बाजीराव प्रथम चितपावन ब्राह्मण कुल के पराक्रमी योद्धा थे, जिन्होंने अपनी वंश परंपरा की उपलब्धियों में चार चांद लगा दिए थे. सन 1707 के बाद छत्रपति मराठा सम्राट की हैसियत दिनोंदिन गिरती जा रही थी. तभी अष्टप्रधान मंत्रिमंडल के प्रधानमंत्री पेशवा सत्ता के सिरमौर बन गए. शिवाजी ने जिस मराठा स्वराज की नींव रखी थी, उन के बाद उन के उत्तराधिकारी उतने योग्य साबित नहीं हो सके. जबकि पेशवाओं ने इन कमियों को अपनी काबिलियत बना लिया था.

बालाजी विश्वनाथ ने जो सपना देखा था, उसे उन के योग्य पुत्र बाजीराव ने तूफान की गति से पूरा कर दिखाया. जब मुगल सत्ता पतन पर थी, तभी सन 1720 में बाजीराव प्रथम ने मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली. उस समय की स्थिति को देखसमझ कर उन्होंने घोषणा कर दी कि मुगल वृक्ष अब पतन की ओर है, इस की शाखाओं को काटने के बजाय इस की जड़ों पर प्रहार कर के पूरे वृक्ष को ही उखाड़ फेंका जाए तो बेहतर होगा.

इस के बाद मराठा जांबाज सेनापतियों की सैनिक टुकडि़यों ने पूरे उत्तर भारत को रौंदना शुरू कर दिया. मराठा सैनिकों के घोड़ों के टापों से सुदूर उत्तर भारत की रियासतें धूल के गुबार से ढकती चली गईं. मुगल सम्राट मुहम्मद शाह रंगीला, हैदराबाद के पहले निजाम चिन किलीज खां, और अवध के नवाब ने बाजीराव की फौज को दिल्ली की ओर जाने से रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन उन की कोशिश नाकाम रही. बात तब की है जब उत्तर भारत, खासकर मुगल दरबार, जो उस समय के कमजोर शासक की करतूतों से षड्यंत्रों का अड्डा बना हुआ था, की कमजोरी का फायदा उठा कर मुगल सेनापति अन्य रियासतों पर कब्जा करने के मंसूबे पाल रहे थे.

बाजीराव की प्रेमिका मस्तानी को ले कर इतिहास में तरहतरह की बातें कही जाती हैं, लेकिन ज्यादातर लोगों का कहना है कि मस्तानी छत्रसाल की फारसी बेगम की बेटी थी. कुछ लोग उसे हैदराबाद के नवाब की दरबारी नर्तकी भी मानते हैं. मस्तानी उत्तर मध्यकाल की बहुत ही खूबसूरत शख्सियत थी, जिस की मिसाल कहीं नहीं थी. मस्तानी अपने अद्वितीय सौंदर्य, संगीत और नृत्यकला के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी तीरंदाजी, घुड़सवारी, तलवारबाजी और रणकौशल के लिए भी इतिहास में अमर है. बाजीराव के साथ उस ने तमाम युद्ध अभियानों में अपना पराक्रम दिखाया. युद्ध के मैदान में उस का साहस, वीरता और कौशल बाजीराव जैसा ही था, जो खुद असंभव रणनीति बना कर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने में माहिर था.

जाहिर है ऐसी काबिलियत की धनी मस्तानी बाजीराव के दिलोदिमाग में छा गई होगी. पहले परिचय के साथ ही प्रेम की जो कहानी शुरू हुई, वह मरते दम तक जरा भी मंद नहीं पड़ी. दोनों जैसे एकदूसरे को पा कर धन्य हो गए थे. बाजीराव का जीवन युद्धों में बीत रहा था. लेकिन मस्तानी ने महिला हो कर भी उन नाजुक घडि़यों में हमेशा बाजीराव का साथ दिया था. इस प्रेमकथा एक सच यह भी है कि बाजीराव का साथ निभाने के लिए मस्तानी को बहुत कष्ट उठाने पड़े थे.

प्यार अगर सच्चा हो तो उस में कष्ट कोई मायने नहीं रखते. कुछ ऐसी ही बातें बाजीराव और मस्तानी के प्रेम में नजर आती हैं. बारूदों की गंध, तलवारों की टंकारों और खून से लथपथ युद्ध के मैदानों में भी प्रेम की सुकोमल भावनाओं की उपस्थिति सचमुच बहुत विलक्षण लगती है. शायद ऐसे माहौल में भी बाजीराव और मस्तानी कुछ पल निकाल कर एकदूसरे को प्रेमिल सहारा देते थे. मस्तानी ने बाजीराव के सपनों में बाधा खड़ी करने के बजाय मराठा साम्राज्य के चमत्कारिक प्रसार में योगदान किया था. लेकिन 18वीं सदी का रूढि़वादी समाज और शाही सोच प्रेम की भावनाओं को समझने में कतई समर्थ नहीं रहे. इसीलिए उन के रास्तों में लोगों, खासकर करीबी लोगों ने अनगिनत बाधाएं खड़ी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

मस्तानी के बारे में एक मान्यता यह भी है कि वह गुजरात के मुगल सूबेदार शुजाअत खां की दरबारी नर्तकी थी. 1724 में जब चिमनाजी अप्पा ने गुजरात पर हमला किया तो वह शुजाअत खां को मार कर मस्तानी को लूट लाया. बाद में मस्तानी को उस ने पेशवा बाजीराव की सेवा में सौंप दिया. गुजराती लोक गीतों में उसे अफगानी गुर्जर नर्तक जाति की माना जाता है. उसे ‘भवन कांचरी’ नृत्यांगना भी कहा जाता है. यहीं से वह छत्रसाल की रक्षा के लिए बाजीराव के साथ बुंदेलखंड गई. जैतपुर के युद्ध में उस के अदम्य साहस से खुश हो कर छत्रसाल ने उसे अपनी बेटी बना लिया था.

दूसरी मान्यता यह है कि मस्तानी राजपूत राजा छत्रसाल की ईरानी बेगम की बेटी थी. बचपन से ही उस ने नृत्य संगीत और शाही जिंदगी के हर रंग और अच्छेबुरे पहलुओं को जिया और सहा. सन 1728 में जब इलाहाबाद के मुगल सूबेदार मुहम्मद खां बंगश ने बुंदेलखंड पर हमला कर के छत्रसाल के बेटे जगतराज को बंदी बना लिया. इस स्थिति में बुजुर्ग राजपूत शासक ने मुहम्मद खां बंगश के सामने घुटने टेकने के बजाय उसे सबक सिखाने के लिए पेशवा बाजीराव प्रथम को सहायता प्रस्ताव भेजा.

बाजीराव तुरंत अपनी सेना सहित छत्रसाल की मदद के लिए आए और जैतपुर के युद्ध में उन्होंने मुहम्मद खां बंगश को बुरी तरह हरा दिया. इसी युद्ध में पहली बार बाजीराव ने मस्तानी को लड़ते देखा था, उसी समय वह उस के रूपसौंदर्य के साथसाथ उस के हुनर और काबिलियत पर फिदा हो गए थे. पहली नजर का यह प्यार आजीवन चला. छत्रसाल ने झांसी, ओरछा, बांदा की जागीर के साथसाथ बाजीराव के शादी के प्रस्ताव पर अपनी बेटी का हाथ भी उन्हें थमा दिया.

बाजीराव और मस्तानी एकदूसरे पर मर मिटे थे. बाजीराव उसे अपने साथ पूना ले आए, लेकिन मजहब की दीवारों और षड्यंत्रोंकुचक्रों ने उन का जीना मुहाल कर दिया. दोनों का अटूट प्रेम किसी से बरदाश्त नहीं हुआ. सन 1739 में नाना साहेब, चिमना जी अप्पा, राधा देवी और काशीबाई के षड्यंत्र सफल हुए. परिणामस्वरूप पेशवा को युद्ध अभियान में अकेले पूना से बाहर जाना पड़ा. उन की अनुपस्थिति में इन लोगों ने मस्तानी को पूना के पार्वती बाग में कैद कर लिया. बाजीराव इस खबर से भले ही टूट गए, लेकिन मस्तानी ने हिम्मत नहीं हारी.

किसी तरह आजाद हो कर मस्तानी पटास पहुंची. बाजीराव उसे सामने देख कर बहुत खुश हुए. लेकिन यह अंतिम मिलन ज्यादा देर तक नहीं चल सका. मस्तानी के पीछेपीछे पेशवा की मां राधा देवी और पटरानी काशी बाई भी पटास पहुंच गए और बाजीराव प्रथम पर दबाव डालना शुरू किया. एक तरफ मां की डांटफटकार और मराठा साम्राज्य की सौगंध दिलाई जा रही थी तो दूसरी तरफ काशीबाई के अविरल आंसू बाजीराव को धर्मसंकट में डाल रहे थे. भारी मन से बाजीराव ने मस्तानी को खुद से दूर कर के पूना भेज दिया. इस बिछोह का बाजीराव पर गहरा असर पड़ा.

एक ओर युद्ध उन्हें चैन नहीं लेने दे रहे थे, दूसरी ओर परिवार के लोग जिंदगी के खालीपन को बढ़ाने पर आमादा थे. जिन की वजह से बाजीराव को अपनी रूहानी प्रेरणा और ताकत मस्तानी को खुद से अलग करना पड़ा. बाजीराव मस्तानी की प्रेमकहानी ने भारतीय राजनीति को बहुत ही प्रभावित किया है लेकिन दुख की बात यह है कि यह प्रेम कहानी इतिहास के पन्नों में ही दर्ज हो कर खो गई. मस्तानी नफरत की शिकार होती चली गई. पावल में बनी उस की खंडहरनुमा कब्र को देख कर शायद ही कोई विश्वास कर सके कि यहां वह शख्सियत चिर निद्रा में दफन है, जिस की जिंदगी ने हिंदुस्तान के इतिहास की दशा और दिशा को बदल कर रख दिया था.

बाजीराव की मां राधा देवी, पत्नी काशीबाई, भाई चिमनाजी अप्पा और पुत्र अंजाने में इस प्रेम के दुश्मन बन बैठे थे. सच्चा प्यार कभी आसान नहीं होता, इसलिए बाजीराव और मस्तानी ने इस चुनौती को हंसतेहंसते स्वीकार किया था. सभी जानते हैं कि बाजीराव, मस्तानी को बुंदेलखंड से पूना ले आए थे. उस समय पेशवा पूना से और छत्रपति सतारा से अपना काम संभालते थे.

चूंकि मस्तानी की मां छत्रसाल की फारसी मुसलिम बेगम थीं, इसलिए मस्तानी को मराठा समाज कभी स्वीकार नहीं कर पाया. स्वयं बाजीराव का कट्टर ब्राह्मण समाज इस विवाह को मान्यता देने को तैयार नहीं था. बाजीराव के लिए यह स्थिति बहुत कठिन थी. एक ओर घरसमाज का विरोध था, दूसरी ओर मराठा साम्राज्य की पूरी जिम्मेदारी. वह चक्की के 2 पाटों के बीच फंस कर तड़पते रहे. एक तरफ मस्तानी का अनन्य प्रेम था, तो दूसरी ओर मराठा साम्राज्य के सपने थे, जिन्हें पूरा करना उन की सब से बड़ी प्राथमिकता थी. सन 1734 ई में उन्होंने मस्तानी के लिए अलग महल बनवाया. जहां उन्होंने इबादत के लिए मसजिद भी बनवाई थी. यह आज भी देखी जा सकती है.

बाजीराव ने मस्तानी से विवाह कर के उसे ब्याहता पत्नी का सम्मान दिया था. पटरानी चूंकि काशीबाई थी, इसलिए वह अपने ईर्ष्यालु स्वभाव की वजह से बाजीराव के कंधे से कंधा मिला कर साथ नहीं दे पाईं. उस समय समाज को पूरी तरह से दरकिनार करना पेशवा बाजीराव जैसे शक्तिशाली पुरुष के लिए भी संभव नहीं था. अप्रैल 1740 में बाजीराव जब अपने 1 लाख सैनिकों के साथ युद्ध के लिए दिल्ली आ रहे थे तो उन की सेना ने इंदौर के पास खरगोन में पड़ाव डाला. वहीं पर बाजीराव को तेज बुखार आया, जिस की वजह से उन की मृत्यु हो गई. वहीं पर नर्मदा नदी के किनारे उन का अंतिम संस्कार किया गया. बाद में सिंधिया ने वहां उन की याद में छतरी बनवाई.

मातापिता की मौत के बाद शमशेर बहादुर की परवरिश उस की सौतेली मां काशीबाई ने की थी. शमशेर बहादुर ने मराठा साम्राज्य के विस्तार में अपनी वीरता का परिचय भी दिया था. सिर्फ 39 साल की आयु में बाजीराव ने जीवन के सब रंग देख लिए थे. एक तरफ पेशवा के रूप में उन्होंने आकाश की बुलंदियों को छुआ तो दूसरी ओर पारिवारिक अंतर्कलह ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ कर रख दिया था.

बाजीराव की मौत की खबर को मस्तानी सहन नहीं कर सकी और फिर जल्दी ही उस की भी जीवनलीला समाप्त हो गई. कहा जाता है कि इस दुखद खबर से व्यथित हो कर उस ने हीरा निगल लिया था, जिस से उस की मृत्यु हो गई थी. कुछ इतिहासकार उस की मौत की वजह विषपान मानते हैं. पूना से 65 किलोमीटर दूर पावल में मस्तानी की कब्र आज भी देखी जा सकती है.

इस प्रेम कहानी का दुखद अंत यह साबित करता है कि समाज चाहे कितना भी विकसित हो जाए, लेकिन सोच अथवा नजरिए को बदलने का संघर्ष सभी को करना पड़ता है. योग्यता भी अक्सर दकियानूसी सोच के आगे घुटने टेक देती है. बाजीराव चाहते तो अन्य योद्धाओं की तरह भोगविलास का जीवन व्यतीत कर सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने प्रेम को सम्मान देने की कोशिश की और मरते दम तक इसी संघर्ष में बहादुरी से जूझते रहे.

यह भी दुख की ही बात है कि मस्तानी का चरित्र चित्रण अधूरा है. इतिहास में बहुत कम लोगों ने उस के बारे में लिखा है. उस समय के ऐतिहासिक दस्तावेज शायद इस घटना को मराठा गौरव के विपरीत मान कर इसे दबाने के लिए मौन रहे, लेकिन इश्क और मुश्क कब छिपे हैं? एक न एक दिन दुनिया उन की हकीकत से रूबरू हो ही जाती है. इसीलिए इतिहास में इन गुम पात्रों को फिल्मी रूपहले परदे पर साकार करने की कोशिशें भी होती रही हैं, लेकिन इस में इतिहास को किस तरह पेश किया जाता है यह अलग विषय है.

यहां काशीबाई के चरित्र की चर्चा किए बगैर यह कहानी अधूरी रहेगी. देखने में तो काशीबाई घोर स्वार्थी और षड्यंत्रकारी लगती थी, लेकिन इस में उस का क्या दोष था? वह बाजीराव की पटरानी थी. पति पर उस का हक था. वह अपने पति के प्रेम को पाने के लिए हमेशा तरसती रही. काशीबाई जिस हक की हकदार थी, वह उसे कभी नहीं मिला.

इसीलिए उस ने जो कुछ भी किया, वह उस समय की परिस्थितियों के अनुकूल ही था. काशीबाई में मानवीय चरित्र की अनेक कमियां हो सकती हैं, लेकिन यह भी सच है कि उस ने भी बाजीराव को दिल की गहराइयों से चाहा था. लेकिन उस की चाहत की कभी कद्र नहीं हुई. बाजीराव और मस्तानी नायकनायिका बन गए, जबकि काशीबाई खलनायिका बन कर इतिहास के अंधेरों में खो गई. Hindi Stories