Bhopal Crime News: अपने अपने दांव

Bhopal Crime News: दरोगा मोहन सक्सेना ने अंकित से पीछा छुड़ाने का दांव तो बहुत बढि़या चला था, लेकिन थाना बैरसिया पुलिस ने भी ऐसा दांव खेला कि उन का दांव फेल हो गया और वह साथियों के साथ पुलिस की पकड़ में आ ही गए…

17  जनवरी की बात है. जिला मुख्यालय भोपाल से कोई 40 किलोमीटर दूर बसे बैरसिया से हो कर विदिशा जाने वाले मार्ग पर पड़ने वाले गांव भोजापुरा के जंगल में कुछ लोगों ने एक युवक की सिर कुचली निर्वस्त्र पड़ी लाश देखी. उन्हीं में से किसी ने इस मामले की जानकारी थाना बैरसिया के थानाप्रभारी एच.सी. लाडिया को दे दी. मामला चूंकि हत्या का लग रहा था, इसलिए घटनास्थल के लिए रवाना होने से पहले थानाप्रभारी ने इस घटना की सूचना एसडीओपी बीना सिंह और एसपी भोपाल अरविंद सक्सेना को भी दे दी.

एच.सी. लाडिया पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे तो देखा कि मृतक 24-25 साल का था. उस के सिर पर चोट के निशान थे. कोई उसे पहचान न सके, इस के लिए भारी पत्थर से उस का सिर कुचल दिया गया था. खून सना पत्थर लाश के पास ही पड़ा था.

मृतक के कपड़े और अन्य सभी चीजें गायब थीं. इस से थानाप्रभारी ने यही अनुमान लगाया कि हत्यारे ने ऐसा इसलिए किया होगा, जिस से पुलिस को कोई सुराग न मिल सके. मृतक की पहचान भी नहीं हो सकी. पुलिस ने आसपास खोजबीन की तो कुछ ही दूरी पर एक बिना नंबर की नई कार आई-20 लावारिस खड़ी मिल गई. काफी पूछताछ के बाद भी जब आसपास कार का मालिक नहीं मिला तो मौके पर पहुंची एसडीओपी बीना सिंह ने कार का संबंध जंगल में मिली लाश से जुड़ा मान कर कार की तलाशी ली.

कार में मिले दस्तावेजों से पता चला कि वह कार शाजापुर निवासी निर्मला गौर की थी. पुलिस ने जब निर्मला से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि कार उन की ही है. उन का ड्राइवर अंकित यह कह कर कार ले गया था कि उसे अपने दोस्तों के साथ उज्जैन जाना है. निर्मला ने अंकित का जो हुलिया बताया था वह जंगल में मिली लाश से काफी मिल रहा था. निर्मला से अंकित का पता मिल गया था. पुलिस ने शाजापुर की इंदिरा कालोनी में रहने वाले उस के घर वालों को बुला कर लाश दिखाई तो उन्होंने उस की पहचान अंकित के रूप में कर दी.

लाश की पहचान हो जाने से पुलिस का सिरदर्द थोड़ा कम हो गया क्योंकि जांच की राह आसान हो गई थी. लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने और घटनास्थल की प्राथमिक काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने जांच शुरू की. जांच अधिकारी बनाया गया सबइंसपेक्टर भारत सिंह को. इस मामले के तार शाजापुर से जुड़े हो सकते थे, इसलिए एसडीओपी बीना सिंह के निर्देश पर टीआई एच.सी. लाडिया ने भारत सिंह के नेतृत्व में एक टीम शाजापुर भेजी. इस टीम में आरक्षक बृजमोहन व्यास और राजेश सोलंकी को विशेष रूप से शामिल किया गया.

स्थानीय पुलिस की मदद से भारत सिंह को अंकित के बारे में जो जानकारी मिली, उस में सब से खास बात यह थी कि निर्मला के यहां नौकरी करने से पहले अंकित पुलिस लाइन में तैनात एएसआई मोहन सक्सेना के घर पर ड्राइवर की नौकरी करता था. मोहन सक्सेना ने कुछ समय पहले ही उसे नौकरी से निकाल दिया था. वजह यह थी कि अंकित और मोहन सक्सेना के बेटे नितिन की पत्नी अनीता (बदला हुआ नाम) के साथ उस के न केवल अवैध रिश्ते बन गए थे, बल्कि दोनों के इश्क की चर्चा शाजापुर की गलियों में आम हो गई थी. मोहन सक्सेना ने एकदो बार अंकित को सार्वजनिक रूप से पुलिसिया रौब भी दिखाया था.

मोहन सक्सेना के यहां से निकाले जाने के बाद अंकित निर्मला के यहां नौकरी करने लगा था. लाश मिलने से एक दिन पहले वह दोस्तों के साथ उज्जैन जाने की बात कह कर निर्मला की कार ले कर निकला था. अब सवाल यह था कि अंकित भोजापुर कैसे पहुंच गया? भारत सिंह ने जब इस बारे में खोजबीन की तो पता चला कि 16 जनवरी की शाम को अंकित के साथ कार में तांत्रिक संजय व्यास को बैठे देखा गया था. उम्र का आधा शतक पूरा करने के करीब पहुंच चुका संजय शाजापुर का ही रहने वाला था.

कुछ साल पहले तक संजय सहकारी कोऔपरेटिव बैंक में चपरासी की नौकरी करता था. लेकिन वह किले स्थित बड़ वाले जिंद बाबा की भक्ति में ऐसा डूबा कि उस ने नौकरी तक छोड़ दी. वह हरे रंग के कपड़े पहनने के साथ गले में मूंगामोती और बड़ेबड़े हकीक पत्थरों की माला पहन कर तांत्रिक बन गया. संजय खुद को तांत्रिक और जिंद बाबा का शार्गिद बताता था. धीरेधीरे उस के पास लोगों की भीड़ लगने लगी थी.

हर बृहस्पतिवार को वह किले में बड़ वाले जिंद बाबा की मजार पर बैठता था. उस दिन बड़ी संख्या में स्त्रीपुरुष उस के पास अपनी समस्याएं ले कर आते थे. भोजापुर के जंगल में जहां अंकित की नग्न लाश मिली थी, वहां कुछ पूजा सामग्री भी पड़ी मिली थी. उस वक्त पुलिस ने इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था, लेकिन तांत्रिक का नाम सामने आते ही भारत सिंह समझ गए कि अंकित का हत्यारा कौन हो सकता है? पुलिस ने तांत्रिक संजय व्यास को थाने बुला कर उस से पूछताछ शुरू की तो वह खुद को निर्दोष बताता रहा.

उस का कहना था कि घटना वाले दिन वह शाजापुर में ही था, लेकिन जब पुलिस ने उसे बताया कि उस दिन उस के मोबाइल की लोकेशन भोजापुर बैरसिया में थी तो उस से कुछ जवाब देते नहीं बना. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. उस से मिली जानकारी के आधार पर थाना बैरसिया पुलिस शाजापुर जा कर पुलिस लाइन में तैनात एएसआई मोहन सक्सेना और उस के बेटे नितिन को भी गिरफ्तार कर के ले आई. तीनों से पूछताछ में अंकित के कत्ल की कहानी सामने आ गई. शाजापुर पुलिस लाइन में तैनात एएसआई मोहन सक्सेना रिटायरमेंट के करीब थे. उन के बाकी बच्चे तो अपनेअपने काम में लग गए थे, लेकिन बेटा नितिन मानसिक रूप से कमजोर होने के कारण बेरोजगार था.

रोजगार से लगाने के लिए मोहन सक्सेना ने उसे एक इंडिका कार दिलवा दी थी, जिसे वह टैक्सी के रूप में चलवाने लगा था. इस के लिए इंदिरा कालोनी के रहने वाले 24 वर्षीय अंकित को उन्होंने ड्राइवर के तौर पर रखा हुआ था. नितिन की शादी पास के गांव की रहने वाली अनीता से हुई थी. अपनी मानसिक दशा की वजह से नितिन को पत्नी से कोई भावनात्मक लगाव नहीं था. उस के लिए पत्नी केवल रात बिताने का साधन मात्र थी. पति के व्यवहार से दुखी अनीता पतिपत्नी के संबंधों में उस का साथ तो देती रही, लेकिन उसे कभी भी वह दिल से प्यार नहीं कर सकी.

नितिन के प्रति अनीता के मन में भरी नफरत उस के हावभाव से ही झलकती थी, जिसे अंकित समझ चुका था. अंकित अनीता की खूबसूरती और चंचलता का दीवाना तो था ही, उसे लगा कि अगर वह थोड़ी सी हिम्मत करे तो अनीता से उस की दोस्ती हो सकती है. हकीकत यह थी कि अनीता पहले से ही मन ही मन अंकित को पसंद करती थी. यह अलग बात थी कि घर की बहू होने के नाते उस में इतनी हिम्मत नहीं थी कि अपनी ओर से पहल कर सके. उधर अंकित के मन में जब यह खयाल आया तो उस ने अनीता की तरफ कदम बढ़ाने शुरू कर दिए. उस के बढ़ते कदमों का मतलब समझ कर अनीता ने भी उसे सकारात्मक संकेत देने शुरू कर दिए.

अनीता की ओर से इशारा मिलने पर अंकित ने तेजी से कदम बढ़ाए. संयोग से उसी बीच अनीता के ससुर मोहन सक्सेना को लकवा मार गया. फलस्वरूप वह ज्यादातर घर में ही रहने लगे. इस से अनीता और अंकित को बातचीत का मौका कम ही मिल पाता था. चूंकि मोहन सक्सेना चलनेफिरने से लाचार हो गए थे, इसलिए उन्हें हर जगह कार से लाना ले जाना पड़ता था. इसी चक्कर में अंकित का घर में आनाजाना कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था. लकवा मारने पर मोहन सक्सेना डाक्टर की दवाइयों के साथसाथ तांत्रिक संजय व्यास से भी झाड़फूंक करवा रहे थे.

इसे दवाओं का असर कहें या संजय व्यास की झाड़फूंक, मोहन सक्सेना को लाभ हुआ और वह खुद चलनेफिरने लगे. दूसरी ओर घर आनेजाने में अंकित लगातार अनीता के करीब होता गया. लगभग साल भर पहले एक दिन मौका पा कर उस ने अनीता से अपने मन की बात कह दी. अनीता ने भी आगे बढ़ कर उसे गले लगा लिया. जल्द ही न केवल दोनों का चोरीछिपे मिलनाजुलना शुरू हो गया, उन के बीच अनैतिक संबंध भी बन गए.

सच यह है कि भरेपूरे परिवार में इस तरह के संबंध ज्यादा दिनों तक छिपे नहीं रहते. अंकित और अनीता के साथ भी यही हुआ. एक दिन मोहन सक्सेना ने अंकित को अपनी बहू अनीता के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. अंकित की यह हरकत उन के मुंह पर तमाचे जैसी थी, वह तिलमिला उठे. उन्होंने न केवल दोनों की खूब खबर ली, बल्कि अंकित को नौकरी से निकाल कर उसे अनीता से दूर रहने की हिदायत भी दी.

मोहन सक्सेना को उम्मीद थी कि उन के पुलिस में होने की वजह से अंकित अब कभी उन की बहू की तरफ नजर उठा कर देखने की हिम्मत नहीं करेगा. लेकिन उन की धमकी से न अंकित डरा और न अनीता. ससुर द्वारा पकडे़ जाने के बाद भी न अनीता अपनी हरकतों से बाज आई थी न अंकित. मोहन सक्सेना को जब कभी अंकित अपने घर के आसपास चक्कर लगाते दिख जाता तो उन का खून खौल उठता.

इसी बीच उन्हें पता चला कि अंकित के पास अनीता के कुछ अश्लील फोटो हैं, जिन्हें वह अपने कई दोस्तों को दिखा चुका है. इस से सक्सेना परिवार की बदनामी हो रही थी. परेशान हो कर मोहन सक्सेना ने अंकित का पत्ता साफ करने का फैसला कर लिया. लकवा ठीक होने के बाद मोहन सक्सेना को तांत्रिक संजय व्यास की शक्तियों पर पूरा विश्वास हो गया था. इसलिए वह जबतब उस के दर्शन करने जाया करते थे. इस से पहले अंकित उन्हें इलाज के लिए कार में बैठा कर संजय के पास ले जाया करता था.

इसी आनेजाने की वजह से संजय व्यास से अंकित का भी अच्छा परिचय हो गया था. मोहन सक्सेना की तरह वह भी मानने लगा था कि संजय व्यास के तंत्रमंत्र में काफी ताकत है. अनीता से अंकित का मिलनाजुलना तो जारी था, लेकिन ससुर द्वारा पकड़े जाने के बाद से वह काफी डर गई थी. अंकित अब अनीता को भगा ले जाना चाहता था. उस का कहना था कि दोनों कहीं दूर जा कर शादी कर लेंगे. लेकिन अनीता इतना बड़ा कदम उठाने को तैयार नहीं थी.

अंकित ने सुन रखा था कि तंत्रमंत्र की ताकत से किसी भी लड़की को वश में किया जा सकता है. इसलिए जब अनीता उस के साथ भागने को राजी नहीं हुई तो वह तांत्रिक संजय व्यास की शरण में पहुंच गया. वह संजय से कोई ऐसी तांत्रिक पूजा करवाना चाहता था, जिस से अनीता उस के वश में हो कर भागने को राजी हो जाए. संजय का तो काम ही ऐसे कामों से पैसा कमाना था, सो वह इस के लिए राजी हो गया. फलस्वरूप अंकित का संजय के पास आनाजाना बढ़ गया. मोहन सक्सेना भी संजय के भक्त थे. उन्होंने अंकित को कई बार संजय के पास जाते देखा तो एक दिन उस से पूछ लिया कि वह उन के पास क्यों आता है?

पहले तो संजय ने बात बना कर उन्हें टालना चाहा, लेकिन जब मोहन सक्सेना उस के पीछे पड़ गए तो उस ने उन्हें बता दिया कि अंकित उन की बहू अनीता पर वशीकरण करवाना चाहता है, ताकि उसे अपने साथ भगा ले जाए. अंकित की मंशा जान कर मोहन सक्सेना आगबबूला हो उठे. इस के बाद उन्होंने सोचना शुरू किया तो उन के दिमाग में एक ऐसी योजना आई, जिस से आसानी से अंकित का पत्ता साफ किया जा सकता था.

सक्सेना ने विदिशा आतेजाते भोजापुरा का जंगल देखा था. वह जंगल शाजापुर से इतनी दूर था कि अगर शाजापुर के आदमी की लाश वहां मिल भी जाती है तो उस की पहचान करना संभव नहीं था. सोचविचार कर उन्होंने तांत्रिक संजय व्यास को लालच दिया कि अगर वह पूजा के बहाने अंकित को भोजापुर के जंगल तक ले जाता है तो वह उसे 15 हजार रुपया देंगे. पैसों के लालच में आ कर तांत्रिक संजय व्यास राजी हो गया. योजना के अनुसार, 16 जनवरी की रात संजय व्यास अंकित को ले कर भोजापुरा के जंगल में पहुंच गया. अंकित बहाना बना कर निर्मला गौर की कार ले कर आया था. संजय के कहने पर उस ने कार जंगल के बाहर खड़ी कर दी.

इस के बाद जंगल के अंदर जा कर संजय व्यास ने पूजा के नाम पर अंकित को निर्वस्त्र हो कर आंखें बंद कर के बैठने को कहा. पूजा शुरू हो गई. इसी बीच पीछे से आ कर मोहन सक्सेना और उन के बेटे नितिन ने सिर में लोहे की रौड मार कर अंकित की हत्या कर दी. लाश का चेहरा पहचान में न आए, इस के लिए तीनों ने एक भारी पत्थर से उस का चेहरा कुचल दिया. मोहन सक्सेना ने सोचा था कि न तो लाश की पहचान होगी और न वे लोग कभी पकड़े जाएंगे.

लेकिन बैरसिया पुलिस ने 4 दिनों में ही वर्दी वाले कातिल, उस के बेटे और तांत्रिक को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. अपराधियों के खिलाफ 17 जनवरी को भादंवि की धारा 302ए, 201, 120बी और 34 आईपीसी के अंर्तगत मुकदमा दर्ज कर के जेल भेज दिया गया. Bhopal Crime News

लेखक – अरुण कुमार हरदैनिया

— पुलिस सूत्रो

Bhopal Crime Story: आधी हकीकत आधा फसाना

Bhopal Crime Story: कुछ लोग प्राकृतिक रूप से किन्नर होते हैं, जबकि कुछ को किन्नर बनाया जाता है. अबरार उर्फ सारिका के साथ भी ऐसा ही कुछ था. फैशनेबल सारिका जब शहर की सड़कों पर निकलती थी तो मनचलों की तो छोडि़ए, कई शरीफजादों तक की नीयत डोल जाती थी. पुराने भोपाल के कैंची छोला इलाके की रहने वाली इस खूबसूरत लड़की के बारे में लोग ज्यादा कुछ नहीं जानते थे. अलबत्ता कुछ लोगों को यह जरूर पता था कि सारिका हकीकत में लड़की नहीं, लड़का है, जिस का असली नाम अबरार है.

अबरार उर्फ सारिका भी उन लाखों लोगों में से एक था, जिस का जन्म तो लड़के के रूप हुआ था, लेकिन उस की शक्ल, सूरत, नजाकत और अदाएं लड़कियों जैसी थीं. आम बोलचाल की भाषा में ऐसे लोगों को किन्नर कहा जाता है. सारिका मूलरूप से कहां की रहने वाली थी, उस के मांबाप कौन थे, इस की जानकारी जिन लोगों को थी, उन में से अधिकांश अब जेल में हैं. कुछ दिनों पहले किन्नरों की एक टोली जो शहर में मंजू एंड पार्टी के नाम से जानी जाती थी, ने सारिका से ताल्लुक बढ़ाने के बाद झांसा दिया कि वह उन लोगों के साथ रहे और उन की टोली में शामिल हो जाए. काम के नाम पर उसे बधाई के समय बस उन के साथ डांस करना है. इस के एवज में उसे रोज 3 हजार रुपए मिलेंगे.

पेशकश बुरी नहीं थी. एक दिन में 3 हजार रुपए कमाना बड़ी बात थी, इसलिए सारिका मना नहीं कर पाई. मंजू एंड पार्टी भी उसे बेवजह इतना पैसा नहीं दे रही थी. दरअसल सारिका के जलवे और अदाएं देख कर पार्टी के सदस्यों को लगा था कि अगर वह भी उन के साथ आ जाए तो कमाई बढ़ जाएगी. वजह यह, हूबहू लड़कियों जैसे दिखने वाले किन्नरों की खासी पूछ रहती है. लोग इन पर पैसा लुटाने से परहेज नहीं करते. बातचीत के बाद सारिका ने टोली के साथ नाचनागाना शुरू कर दिया. साथसाथ काम करते हुए अभी कुछ ही दिन ही गुजरे थे कि सारिका पर शारीरिक रूप से किन्नर बनने का दबाव पड़ने लगा.

लेकिन सारिका के अंदर बैठे अबरार को यह मंजूर नहीं था. लिहाजा उस ने पूरी तरह किन्नर बनने से इनकार कर दिया. फलस्वरूप कुछ दिनों बाद ही मंजू एंड पार्टी ने उस पर चोरी का इलजाम लगा दिया. लेकिन तब तक अच्छाखासा पैसा कमा चुकी सारिका पर इस इलजाम का कोई खास फर्क नहीं पड़ा. वह इस की वजह भी समझ रही थी. अपने अतीत को छिपाए रखने वाली सारिका बीती 9 फरवरी, 2016 को अचानक उस समय सुर्खियों में आई जब उस ने जहांगीराबाद थाने जा कर यह रिपोर्ट लिखाई कि आधा दरजन किन्नरों ने उसे अगवा कर के किन्नर बना दिया.

उस दिन बदहवास सी सारिका जब पुलिस मुख्यालय में एसपी अंशुमान सिंह के पास पहुंची तो धारीदार फुल शर्ट और काले रंग की हाफ पैंट पहने थी. उसे देख कर एसपी ने भी यही सोचा कि इस लड़की के साथ जरूर कोई ज्यादती हुई है. बाद में पूछताछ करने पर सारिका ने पुलिस वालों को जो कुछ बताया, वह न केवल दिलचस्प था, बल्कि चौंका देने वाला भी था. सारिका के मुताबिक करीब 5 दिन पहले 6 किन्नर उस के घर आए और उसे अगवा कर के सुरैया मुजरा किन्नर के घर ले गए.

सुरैया किन्नर समुदाय का मुखिया है, इसलिए भोपाल में उसे सभी जानते थे. वह विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुका है. भोपाल का मंगलवारा इलाका किन्नरों की रिहाइश के लिए जाना जाता है. यहीं सुरैया मुजरा भी रहता है. सारिका ने आगे बताया कि किन्नर उसे मंगलवारा स्थित सुरैया के अड्डे पर ले गए और बेहोश कर दिया. 5 दिन बाद जब उसे होश आया तो उस का गुप्तांग गायब था. पूछने पर किन्नरों ने उसे बताया कि हम ने तुझे भी अपने जैसा बना दिया है.

सारिका उर्फ अबरार की जिंदगी में पहले से ही गमों की कमी नहीं थी, अब उसे यह बड़ा सदमा मिला था. वैसे किन्नर और उन की दुनिया उस के लिए नए और अनजाने नहीं थे. सच तो यह है कि धीरेधीरे उन की दुनिया उस की जिंदगी का हिस्सा बनती जा रही थी. ज्ञापन में उन्होंने बताया कि नकली किन्नरों के लीडर निम्मा और सुनील हैं. इन के ग्रुप में नैना, बुलबुल, तानिया, दिव्या, रूपाली, अलकिया, बिहारन, हिना, छमिया, बिल्लो, नेहा, रानी और सारिका शामिल हैं.

सारिका की बात सुन कर एसपी अंशुमान सिंह ने उसे रिपोर्ट लिखाने के लिए जहांगीराबाद थाने भेज दिया. जहां सारिका ने थाने में 6 किन्नरों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई. इन में सब से ऊपर जो नाम थे, उन में प्रमुख थे सुरैया मुजरा, खुशी और काजल. मामला पुलिस तक पहुंच गया था, इसलिए किन्नर गुटों के बीच भीतरी तौर पर तलवारें खिंचने लगी थीं.

सारिका के साथ जहां घटना घटी थी, वह इलाका मंगलवारा थानाक्षेत्र में आता था, इसलिए इस केस को मंगलवारा थाने में ट्रांसफर कर दिया गया. थाना पुलिस ने मैडिकल जांच के लिए सारिका को अस्पताल भेज दिया. इस दौरान सुरैया और उस के साथी किन्नर नेताओं, पत्रकारों, अफसरों और वकीलों के चक्कर काटते रहे. क्योंकि पुलिस ने आरोपी किन्नरों सुरैया, शिल्पा, सबा, नीतू और शबाब आदि के खिलाफ धारदार हथियार से जान लेने की कोशिश करने, बंधक बनाने, मारपीट करने और जान से मारने की धमकी देने का मामला दर्ज कर लिया था.

उसी दिन खुद को असली बताने वाले नगर के किन्नरों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया. उन का कहना था कि कुछ नकली किन्नर नाचगा कर पैसा वसूल रहे हैं, जिस से उन की छवि भी बिगड़ रही है और रोजीरोटी पर भी संकट खड़ा हो गया है. किन्नरों के एक गुट ने राजभवन जा कर राज्यपाल रामनरेश यादव के नाम एक ज्ञापन भी दिया था. सुरैया और उस के साथियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हो गया तो गिरफ्तारी से बचने के लिए पांचों किन्नर फरार हो गए. लेकिन मुखबिर की सूचना पर सबा और नीतू को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. उन का कहना था कि अबरार उर्फ सारिका अपनी मरजी से किन्नर बना है. पूछताछ के बाद गिरफ्तार हुए किन्नरों को जेल भेज दिया गया.

जो किन्नर फरार चल रहे थे, उन्होंने अपर सत्र न्यायाधीश दिनेश प्रसाद मिश्रा की अदालत में अग्रिम जमानत की अर्जी लगाई, लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने उन की जमानत की अर्जी खारिज कर दी. आखिरकार 24 फरवरी, 2016 को पुलिस ने किन्नर वाली गली से सुरैया और सबा को भी धर दबोचा. दोनों को अदालत में पेश कर के उन का पुलिस कस्टडी रिमांड लिया गया, ताकि उन से विस्तृत पूछताछ की जा सके.

पूछताछ के बाद उन्हें अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. अब यह अदालत तय करेगी कि सारिका का गुप्तांग जबरन काटा था या इस में उस की कोई रजामंदी थी. और थी भी तो इस संबंध में कानून क्या कहता है. किन्नर जब इस तरह किसी का लिंग काट कर उसे किन्नर बनाते हैं तो कोई समारोह आयोजित नहीं करते और न ही पुलिस को सूचना देते हैं. असली किन्नर कौन और नकली किन्नर कौन, इस का कोई तयशुदा पैमाना नहीं है.

बहरहाल इस घटना से मध्य प्रदेश सरकार की किन्नरों को मुख्यधारा में जोड़ने की कोशिशों को झटका लगा है. पिछले साल किन्नर घरघर जा कर ताली बजाते सरकारी टैक्स वसूली करते नजर आए थे. इस साल उन्हें लोगों को हेलमेट पहनने के लिए जागरूक करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. कुछ दूसरी सरकारी योजनाओं का भी प्रचारप्रसार उन से करवाया गया था. खास बात यह कि सरकार की ओर से बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में उन के लिए अलग से स्टडी सेंटर खोलने की मंजूरी दी गई है.

इस लड़ाई के बाद किन्नरों का पुराना गुट तितरबितर हो गया है, जबकि एक नया गुट वजूद में आ रहा है. बहरहाल यह किन्नर वार कब, कैसे और कहां जा कर थमेगा, यह कह पाना मुश्किल है. Bhopal Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Thriller Hindi: जन्मदिन में मिली मौत – बेकसूर को मिली सजा

Crime Thriller Hindi: शहाबुद्दीन ने अपनी होने वाली पत्नी हसमतुल निशां से कहा. ‘‘निशां अपने जन्मदिन की पार्टी पर हमें दावत नहीं दोगी क्या?’’  ‘‘क्यों नहीं, जब आप ने मांगी है तो पार्टी जरूर मिलेगी. हम कार्यक्रम तय कर के आप को बताते हैं.’’ निशा ने अपने मंगेतर को भरोसा दिलाया.

निशां घर वालों के दबाव में बेमन से शहाबुद्दीन से शादी करने के लिए तैयार हुई थी, क्योंकि वह तो शाने अली को प्यार करती थी. इसलिए मंगेतर द्वारा शादी की पार्टी मांगने वाली बात उस ने अपने प्रेमी शाने अली को बताई तो वह भड़क उठा. उस ने कहा ‘‘निशा तुम एक बात साफ समझ लो कि जन्मदिन की पार्टी में शहाबुद्दीन और मुझ में से केवल एक ही शामिल होगा. तुम जिसे चाहो बुला लो.’’

निशा को इस बात का अंदाजा पहले से था कि शाने अली को यह बुरा लगेगा. उस ने कहा, ‘‘शाने अली, तुम तो खुद जानते हो कि मुझे वह पसंद नहीं है. लेकिन अब घर वालों की बात को नहीं टाल सकती.’’

‘‘निशा, तुम यह समझ लो कि यह शादी केवल दिखावे के लिए है.’’ शाने अली ने जब यह कहा तो निशा ने साफ कह दिया कि शादी दिखावा नहीं होती. शादी के बाद उस का मुझ पर पूरा हक होगा.’’

‘‘नहीं, शादी के पहले और शादी के बाद तुम्हारे ऊपर हक मेरा ही रहेगा. जो हमारे बीच आएगा, उसे हम रास्ते से हटा देंगे.’’ यह कह कर शाने अली ने फोन रख दिया.

हसमतुल निशां ने बाद में शाने अली से बात की और उन्होंने यह तय कर लिया कि वे दोनों एक ही रहेंगे. उन को कोई जुदा नहीं कर पाएगा. दोनों के बीच जो भी आएगा, उसे राह से हटा दिया जाएगा.

शहाबुद्दीन की शादी हसमतुल निशां के साथ तय हुई थी. निशां लखनऊ स्थित पीजीआई के पास एकता नगर में रहती थी. वह अपने 2 भाइयों में सब से छोटी और लाडली थी. शहाबुद्दीन भी अपने घर में सब से छोटा था. वह निशां के घर से करीब 35 किलोमीटर दूर बंथरा में रहता था.

शहाबुद्दीन ट्रांसपोर्ट नगर में एक दुकान पर नौकरी करता था, जो दोनों के घरों के बीच थी. हसमतुल निशां ने अपने घर वालों के कहने पर शहाबुद्दीन के साथ शादी के लिए हामी तो भर दी थी पर वह अपने प्रेमी शाने अली को भूलने के लिए भी तैयार नहीं थी.

ऐसे में जैसेजैसे शहाबुद्दीन के साथ शादी का दिन करीब आ रहा था, दोनों के बीच तनाव बढ़ रहा था. हसमतुल निशां ने पहले ही फैसला ले लिया था कि वह शादी का दिखावा ही करेगी. बाकी मन से तो अपने प्रेमी शाने अली के साथ रहेगी.

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शहाबुद्दीन के साथ हसमतुल निशां की सगाई होने के बाद दोनों के बीच बातचीत होने लगी. शहाबुद्दीन अकसर उसे फोन करने लगा. मिलने के लिए भी दबाव बनाने लगा. यह बात निशां को अच्छी नहीं लग रही थी.

शाने अली भी नहीं चाहता था कि निशां अपने होने वाले पति शहाबुद्दीन से मिलने जाए. जब भी उसे यह पता चलता कि दोनों की फोन पर बातचीत होती है और वे मिलते भी हैं. इस बात को ले कर वह निशां से झगड़ता था. दोनों के बीच लड़ाईझगड़े के बाद यह तय हुआ कि अब शहाबुद्दीन को रास्ते से हटाना ही होगा.

शहाबुद्दीन को अपनी होने वाली पत्नी और उस के प्रेमी के बारे में कुछ भी पता नहीं था. वह दोनों को आपस में रिश्तेदार समझता था और उन पर भरोसा भी करता था. अपनी होने वाली पत्नी हसमतुल निशां को अच्छी तरह से जाननेसमझने के लिए वह उस के करीब आने की कोशिश कर रहा था. उसे यह नहीं पता था कि उस की यह कोशिश उसे मौत की तरफ ले जा सकती है.

शहाबुद्दीन अपनी मंगेतर के साथ संबंधों को मधुर बनाने की कोशिश कर रहा था पर प्रेमी के मायाजाल में फंसी हसमतुल निशां अपने को उस से दूर करना चाहती थी. परिवार के दबाव में वह खुल कर बोल नहीं पा रही थी.

12 मार्च, 2021 को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के मोहनलालगंज थाना क्षेत्र में स्थित कल्लू पूरब गांव के पास झाडि़यों में शहाबुद्दीन उर्फ मनीष की खून से लथपथ लाश पड़ी मिली. करीब 26 साल के शहाबुद्दीन के सीने में चाकू से कई बार किए गए थे.

गांव वालों की सूचना पर पुलिस ने शव को बरामद किया. शव मिलने वाली जगह से कुछ दूरी पर ही एक बाइक खड़ी मिली. बाइक में मिले कागजात से पुलिस को पता चला कि वह बाइक मृतक शहाबुद्दीन की ही थी. इस के आधार पर पुलिस ने उस के घर पर सूचना दी.

शहाबुद्दीन के भाई ने अनीस ने शव को पहचान भी लिया. अनीस की तहरीर पर पुलिस ने धारा 302 आईपीसी के तहत मुकदमा कायम किया.

हत्या की घटना को उजागर करने और अपराधियों को पकड़ने के लिए डीसीपी (दक्षिण लखनऊ) रवि कुमार, एडिशनल डीसीपी पुर्णेंदु सिंह, एसीपी (दक्षिण) दिलीप कुमार सिंह ने घटनास्थल पर पहुंच कर फोरैंसिक टीम व डौग स्क्वायड बुला कर मामले की पड़ताल शुरू की.

शहाबुद्दीन के शव की तलाशी लेने पर पर्स और मोबाइल गायब मिला. शव के पास 2 टूटी कलाई घडि़यां और एक चाबी का गुच्छा मिला. यह समझ आ रहा था कि हत्या के दौरान आपसी संघर्ष में यह हुआ होगा.

पुलिस के सामने शहाबुद्दीन के घर वालों ने उस की होने वाली पत्नी हसमतुल निशां के परिजनों पर हत्या का आरोप लगाया. डीसीपी रवि कुमार ने इस केस को सुलझाने के लिए एसीपी दिलीप कुमार के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित की.

टीम में इंसपेक्टर दीनानाथ मिश्रा, एसआई रमेश चंद्र साहनी, राजेंद्र प्रसाद, धर्मेंद्र सिंह, महिला एसआई शशिकला सिंह, कीर्ति सिंह, हैडकांस्टेबल अश्वनी दीक्षित, कांस्टेबल संतोश मिश्रा, शिवप्रताप और विपिन मौर्य के साथ साथ सर्विलांस सेल के सिपाही सुनील कुमार और रविंद्र सिंह को शामिल किया गया. पुलिस ने सर्विलांस की मदद से जांच शुरू की.

शहाबुद्दीन बंथरा थाना क्षेत्र के बनी गांव का रहने वाला था. वह ट्रांसपोर्ट नगर में खराद की दुकान पर काम करता था. 11 मार्च, 2021 को वह अपने पिता मीर हसन की बाइक ले कर घर से जन्मदिन की पार्टी में हिस्सा लेने के लिए निकला था. शहाबुद्दीन की मंगेतर हसमतुल निशां ने उसे जन्मदिन की पार्टी में शामिल होने का न्योता दिया था.

शहाबुद्दीन ने यह बात अपने घर वालों को बताई और दुकान से सीधे पार्टी में शामिल होने चला गया था. देर रात वह घर वापस नहीं आया. अगले दिन यानी 12 मार्च की सुबह 11 बजे पुलिस ने उस की हत्या की सूचना उस के घर वालों को दी.

अनीस ने पुलिस का बताया कि 27 मई को शहाबुद्दीन और हसमतुल निशां का निकाह होने वाला था. बारात लखनऊ में पीजीआई के पास एकता नगर में नवाबशाह के घर जाने वाली थी. शहाबुद्दीन की हत्या की सूचना पा कर पिता मीर हसन, मां कमरजहां, भाई इश्तियाक, शफीक, अनीस और राजू बिलख रहे थे.

मां कमरजहां रोते हुए कह रही थी, ‘‘मेरे बेटे की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. वह घर का सब से सीधा लड़का था. उस ने किसी का कुछ भी नहीं बिगाड़ा था. ऐसे में उस के साथ क्या हुआ?’’

पुलिस ने जन्मदिन में बुलाए जाने और लूट की घटना को सामने रख कर छानबीन शुरू की.

शहाबुद्दीन की हत्या को ले कर परिवार के लोगों को एक वजह शादी लग रही थी. परिवार को शहाबुद्दीन की हत्या के पीछे उस की होने वाली पत्नी और उस के भाइयों पर शक था. इसलिए अनीस की तहरीर पर पुलिस ने हसमतुल निशां और उस के भाइयों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया.

पुलिस ने तीनों को हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू कर दी. पुलिस की विवेचना में यह बात खुल कर सामने आई कि शहाबुद्दीन की हत्या में उस की होने वाली पत्नी हसमतुल निशां का हाथ था. यह भी साफ था कि हसमतुल निशां का साथ उस के भाइयों ने नहीं, बल्कि उस के प्रेमी शाने अली ने दिया था.

शहाबुद्दीन उर्फ मनीष की हत्या की साजिश उस की मंगेतर हसमतुल निशां और उस के प्रेमी शाने अली ने अपने 6 अन्य साथियों के साथ मिल कर रची थी. मोहनलालगंज कोतवाली के इंसपेक्टर दीनानाथ मिश्र के मुताबिक बंथरा कस्बे के रहने वाले शहाबुद्दीन की शादी हसमतुल निशां के साथ 27 मई को होनी थी. इस से हसमतुल खुश नहीं थी.

वह पीजीआई के पास रहने वाले शाने अली से प्यार करती थी. इस के बाद भी परिवार वालों के दबाव में शहाबुद्दीन से मिलती रही. जैसेजैसे शादी का समय पास आता जा रहा हसमतुल निशां अपने मंगेतर शहाबुद्दीन से पीछा छुड़ाने के बारे में सोचने लगी.

इस के लिए उस ने अपने प्रेमी शाने अली के साथ मिल कर योजना बनाई. हसमतुल निशां चाहती थी कि शाने अली उस के मंगेतर शहाबुद्दीन को किसी तरह रास्ते से हटा दे.

योजना को अंजाम देने के लिए शाने अली ने अपने जन्मदिन के अवसर पर 11 मार्च, 2021 को शहाबुद्दीन को मिलने के लिए बुलाया.

गुरुवार रात के करीब साढ़े 8 बजे शाने अली और उस के दोस्त बाराबंकी निवासी अरकान, मोहनलालगंज निवासी संजू गौतम, अमन कश्यप और पीजीआई निवासी समीर मोहम्मद बाबूखेड़ा में जमा हुए. जैसे ही शहाबुद्दीन वहां पहुंचा शाने अली और उस के दोस्तों ने उस पर चाकू से ताबड़तोड़ हमला कर दिया.

अपने ऊपर चाकू से हमला होने के बाद भी शहाबुद्दीन ने हार नहीं मानी और अपनी जान बचाने के लिए वह हमलावरों से भिड़ गया.

शाने अली और उस के हमलावर दोस्तों को जब लगा कि शहाबुद्दीन बच निकलेगा तो उन लोगों ने कुत्ते को बांधी जाने वाली जंजीर से शहाबुद्दीन का गला कस दिया, जिस से शहाबुद्दीन अपना बचाव नहीं कर पाया और अपनी जान से हाथ धो बैठा.

अगले दिन जब शहाबुद्दीन का शव मिला तो उस के भाई अनीस ने हसमतुल निशां के भाइयों पर हत्या का शक जताया. पुलिस ने संदेह के आधार पर ही उन से पूछताछ शुरू की थी. इस बीच पुलिस को हसमतुल निशां और शाने अली के प्रेम संबंधों के बारे में पता चला. पुलिस ने जब हसमतुल निशां से पूछताछ शुरू की तो वह टूट गई.

हसमतुल निशां ने पुलिस को बताया कि उस ने प्रेमी शाने अली के साथ मिल कर मंगेतर शहाबुद्दीन की हत्या कर दी. इस के बाद पुलिस ने शाने अली और उस साथियों को पकड़ने के लिए उन के घरों पर दबिशें दे कर गिरफ्तार कर लिया.

शहाबुद्दीन की हत्या के आरोप में पुलिस ने हसमतुल निशां, शाने अली, अरकान, संजू गौतम, अमन कश्यप, समीर मोहम्मद को जेल भेज दिया. पुलिस को आरोपियों के पास से एक चाकू, गला घोटने के लिए प्रयोग में लाई गई चेन, संजू की मोटरसाइकिल, 2 कलाई घडि़यां, 6 मोबाइल फोन और आधार कार्ड बरामद हुए.

सभी आरोपियों से पूछताछ के बाद उन्हें न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया. 24 घंटे के अंदर केस का खुलासा करने वाली पुलिस टीम की डीसीपी (दक्षिण) रवि कुमार ने सराहना की. Crime Thriller Hindi

Agra Crime: बहन को बीवी बनाने की जिद

Agra Crime: प्रदीप और शिवानी भले ही एकदूसरे को प्यार करते थे, लेकिन उन के रिश्ते ऐसे थे कि शादी नहीं हो सकती थी. शिवानी ने तो घर वालों के दबाव में पैर पीछे खींच लिए, लेकिन प्रदीप जिद पर अड़ गया. नतीजा क्या निकला…

आगरा की ऐतिहासिक इमारतों में ताज के बाद सिकंदरा स्थित अकबर के मकबरे का नाम आता है. इस शानदार और गौरवमयी इमारत का निर्माण बादशाह अकबर ने करवाया था. हर साल देशविदेश के हजारों पर्यटक इस इमारत को देखने आते हैं. इसी ऐतिहासिक इमारत में 6 अप्रैल, 2015 को एक अनहोनी हो गई. किसी पर्यटक ने वहां एक लड़की की खून सनी लाश देखी तो उस ने शोर मचा दिया, जिस से उधर घूम रहे पर्यटक वहां इकट्ठा हो गए. लड़की की लाश देख कर लोग हैरान थे कि पता नहीं किस ने इस की हत्या कर दी. सूचना पा कर वहां मौजूद सिक्योरिटी गार्ड भी पहुंच गए. उन्होंने इस की सूचना थाना सिकंदरा पुलिस को फोन कर के दे दी.

सिकंदरा के गेट से थाना करीब 2 सौ मीटर की दूरी पर था. इसलिए खबर मिलते ही थानाप्रभारी ज्ञानेंद्र सिरोही थोड़ी ही देर में पुलिस टीम के साथ उस जगह पहुंच गए, जहां लड़की की लाश पड़ी थी. उन्होंने लाश का निरीक्षण शुरू किया. मरने वाली लड़की की उम्र 19-20 साल थी. हत्यारे ने किसी धारदार हथियार से उस की गरदन के अलावा पेट पर भी वार किए थे. लाश खून में तरबतर थी. लाश के पास ही एक मोबाइल फोन और एक चाकू पड़ा था. इन पर भी खून लगा था. थानाप्रभारी ने अनुमान लगाया कि हत्यारे ने इसी चाकू से इसे मौत के घाट उतारा है.

थानाप्रभारी ने उच्चाधिकारियों को भी घटना की सूचना दे दी. कोई पर्यटक घटना को अपने कैमरे में कैद न कर ले, इसलिए पुलिस ने बिना फोरेंसिक सुबूत जुटाए ही फटाफट लाश को सील कर के पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. थोड़ी देर बाद ही एसएसपी राजेश डी. मोदक के साथ खोजी कुत्ते और फोरेंसिक टीम भी मौके पर आ गई. फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट को भी बुलाया गया. सभी टीमों द्वारा काम निपटाने के बाद पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया. मृतका के पास से कोई ऐसी चीज नहीं मिली थी, जिस से उस की पहचान हो सकती. इसलिए पुलिस के लिए पहला काम मृतका की शिनाख्त कराना था. लाश के पास जो मोबाइल फोन मिला था, पुलिस ने उस की मैमोरी में सेव फोन नंबरों पर बात करनी शुरू कर दी.

उसी क्रम में एक नंबर मृतका के किसी रिश्तेदार का मिल गया. उस रिश्तेदार से बात करने पर पता चला कि वह फोन नंबर शिवानी नाम की लड़की का है. उस रिश्तेदार से पुलिस को जानकारी मिली कि शिवानी जगदीशपुरा थानाक्षेत्र की आवास विकास कालोनी के सैक्टर-7 में रहने वाले अन्नू नागर की बेटी है.

शाम साढ़े 5 बजे के करीब पुलिस अन्नू नागर के घर पहुंची. घर में अन्नू की पत्नी रेखा मिली. पुलिस को देख कर वह परेशान हो गई. पुलिस ने उस से पूछा, ‘‘आप शिवानी को जानती हैं?’’

‘‘जी, शिवानी मेरी बेटी है. मगर आप उस के बारे में क्यों पूछ रहे हैं?’’ रेखा परेशान हो कर बोली.

‘‘वह सब भी बता देंगे, लेकिन पहले यह बताओ कि शिवानी कहां है?’’ पुलिस ने पूछा.

‘‘सर, वह तो अपना फोन रिचार्ज कराने घर से निकली थी, लेकिन अभी तक लौटी नहीं. मैं उसी का इंतजार कर रही हूं. उस का फोन भी नहीं लग रहा है.’’

‘‘आप का कोई और रिश्तेदार रहता है?’’ पुलिस ने पूछा.

‘‘जी, मेरे जेठजी रहते हैं, वह डीएम औफिस में नौकरी करते हैं.’’ रेखा ने कहा.

पुलिस रेखा को ले कर मुन्नालाल के घर गई. रेखा घबरा रही थी कि पता नहीं क्या बात है, जो पुलिस उसे कुछ बता नहीं रही है. मुन्नालाल उसी समय ड्यूटी से लौटा था. अपनी भाई की पत्नी के साथ पुलिस को देख कर वह भी चौंका. पुलिस ने मुन्नालाल से बात कर के सिकंदरा में मिली लाश का फोटो दिखाया. मुन्नालाल ने उस फोटो को देख कर कहा, ‘‘अरे, यह तो मेरी भतीजी शिवानी है. इसे किस ने मार दिया?’’

‘‘अभी कुछ नहीं पता, सिकंदरा में इस की लाश मिली है. लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है.’’ पुलिस ने बताया.

बेटी की हत्या की बात सुन कर रेखा दहाड़े मार कर रोने लगी. रेखा का पति अन्नू नागर एक प्रकाशन कंपनी में सुरक्षागार्ड की नौकरी करता था. मुन्नालाल ने उसे फोन कर के घर बुला लिया. इस के बाद पुलिस दोनों भाइयों को साथ ले कर थाने आ गई. थाने में लाश के पास से बरामद फोन जब दोनों भाइयों को दिखाया गया तो उन्होंने बताया कि वह मोबाइल शिवानी का ही है. इन बातों से साफ हो गया कि सिकंदरा में पुलिस ने जो लाश बरामद की थी, वह अन्नू नागर की बेटी शिवानी की थी. लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने हत्यारों तक पहुंचने के लिए जांच की शुरुआत शिवानी के घर से ही शुरू की. थानाप्रभारी ने अन्नू नागर से पूछा, ‘‘शिवानी का हत्यारा कौन हो सकता है, मेरा मतलब क्या तुम्हें किसी पर कोई शक है?’’

‘‘सर, मुझे तो एक ही आदमी पर शक है, और वह है मेरे साढ़ू का लड़का प्रदीप. यह काम उसी का हो सकता है.’’ अन्नू नागर ने अपनी शंका प्रकट की.

‘‘वह क्यों?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘सर, वह शादी के लिए मेरी बेटी के पीछे हाथ धो कर पड़ा था.’’ अन्नू ने कहा.

इतना सुनते ही थानाप्रभारी को यह मामला प्रेमप्रसंग का लगा. अन्नू से प्रदीप का पता मालूम करने के बाद वह अगले दिन जिला एटा के गांव निघौली कला स्थित प्रदीप के घर जा पहुंचे. प्रदीप के घर के बाहरी दरवाजे पर कुंडी लगी थी. पड़ोसियों की मौजूदगी में कुंडी खोल कर पुलिस घर में घुसी तो अंदर कोई नहीं मिला. घर की लाइट जल रही थी और सारा सामान पैक था. ऐसा लग रहा था, जैसे घर के लोग सामान सहित कहीं भागने की तैयारी में थे. लेकिन उन्हें पुलिस के आने की भनक लग गई, जिस से वे घर छोड़ कर भाग गए. लोगों ने बताया कि प्रदीप 6 अप्रैल, 2015 की सुबह 7 बजे अपने 2 दोस्तों के साथ बाइक से घर से निकला था. उस के बाद किसी ने उसे नहीं देखा.

प्रदीप का पूरा परिवार भी गायब था, जिस से पुलिस का शक पुख्ता हो गया कि वारदात प्रदीप ने ही की है. काफी देर तक जब कोई वहां नहीं आया तो एक कांस्टेबल को वहां छोड़ कर थानाप्रभारी लौट आए. अब तक शिवानी के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स पुलिस को मिल चुकी थी. उस पर जो आखिरी काल आई थी, जांच में पता चला, वह काल प्रदीप के फोन से की गई थी. सर्विलांस टीम ने उस नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया. अगले दिन उक्त नंबर की लोकेशन दिल्ली में मिली. थानाप्रभारी ने एक पुलिस टीम दिल्ली रवाना कर दी. दिल्ली पहुंचने पर पता चला कि उस की लोकेशन जलेसर में है. पुलिस टीम जलेसर पहुंची. इस के बाद उस फोन की लोकेशन आगरा की हो गई.

जैसेजैसे उस फोन की लोकेशन बदल रही थी, सर्विलांस टीम उस की जानकारी पुलिस टीम को दे रही थी. जब पुलिस टीम को पता चला कि उस फोन की लोकेशन आगरा में है तो पुलिस टीम उस का पीछा करते हुए आगरा पहुंच गई. आखिर 9 अप्रैल, 2015 को कारगिल पैट्रोल पंप के पास से पुलिस ने प्रदीप को हिरासत में ले लिया. पुलिस के शिकंजे में आते ही प्रदीप हक्काबक्का रह गया. थाने ला कर प्रदीप से पूछताछ शुरू हुई. शुरू में उस ने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन पुलिस की सख्ती के सामने उस की एक नहीं चली. उस ने अपना गुनाह कबूल कर लिया और कहा कि उसी ने शिवानी की हत्या की थी.

शिवानी प्रदीप की मौसेरी बहन थी. अपनी मौसेरी बहन की हत्या की उस ने जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला एटा का एक गांव है निघौली कला. रामनिवास इसी गांव के रहने वाले थे. वह पेशे से हलवाई थे. उन के परिवार में पत्नी सरोज के अलावा 6 बच्चे थे. उन में से 2 बेटियों और एक बेटे की वह शादी कर चुके हैं. अपनी बेटी सुमन और बेटे कुलदीप की शादी उन्होंने इसी साल फरवरी में 6 दिन के अंतराल पर की थी. दोनों ही शादियों में अन्नू नागर भी पत्नी रेखा और बेटी शिवानी के साथ आए थे. प्रदीप इन्हीं रामनिवास का बेटा है. शादी में आई अपनी सगी मौसेरी बहन शिवानी प्रदीप को भा गई. शिवानी की नजरों का जादू प्रदीप पर कुछ इस तरह चला कि वह उस के आगेपीछे घूमने लगा. प्रदीप अपनी कोशिशों से शिवानी को आकर्षित कर रहा था.

उसे मौके की तलाश थी. आखिर उसे वह मौका मिल गया. शिवानी किसी काम से छत पर गई तो प्रदीप भी उस के पीछेपीछे वहां पहुंच गया. वहां शिवानी को अकेली देख कर वह खुद को रोक नहीं सका. उस ने कहा, ‘‘शिवानी आज तुम कितनी सुंदर लग रही हो. तुम्हारे सामने सब फीके हैं.’’

शिवानी ने शरमा कर कहा, ‘‘भैया, तुम मजाक बहुत अच्छा कर लेते हो.’’

प्रदीप पास आ कर बोला, ‘‘देखो शिवानी, मेरी तुम्हारी उम्र में ज्यादा फर्क नहीं है, इसलिए तुम मुझे भैया कहने के बजाय नाम से बुलाया करो.’’

‘‘अगर तुम कह रहे हो तो मैं नाम से ही बुलाऊंगी. तुम भी कभी आगरा आना. वहां बहुत सी देखने लायक जगहें हैं.’’

‘‘तुम कह रही हो, इसलिए जरूर आऊंगा. हां, एक बात कहना चाहता हूं कि यह ड्रेस तुम पर बहुत अच्छी लग रही है.’’

प्रदीप की बात सुन कर शिवानी हंसने लगी.

6 दिनों में शिवानी और प्रदीप की कई बार लंबीलंबी बातें हुईं. प्रदीप के मन में अजीब से भाव उमड़ रहे थे, जबकि शिवानी के लिए वह सिर्फ मौसेरा भाई था. शादी के बाद सारे मेहमान जाने लगे थे. प्रदीप के मन में अजीब सी हलचल थी, क्योंकि वह अभी तक अपने दिल की बात शिवानी से कह नहीं पाया था. शिवानी के जाने से पहले वह उस से मन की बात कह देना चाहता था. मौके के इंतजार में वह शिवानी के इर्दगिर्द मंडराने लगा. जैसे ही उसे मौका मिला, वह शिवानी का हाथ पकड़ कर एकांत में ले गया. इस से पहले कि शिवानी कुछ समझ पाती, उस ने कहा, ‘‘शिवानी, मैं तुम से प्यार करने लगा हूं और अब मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता. तुम तो यहां से चली जाओगी, लेकिन तुम्हारे बिना मेरा दिल नहीं लगेगा.’’

प्रदीप की बात शिवानी को कुछ अजीब सी लगी, क्योंकि प्रदीप उस का मौसेरा भाई था. वह उसे कोई जवाब दिए बगैर वहां से चली गई. अगले दिन शिवानी अपने मांबाप के साथ आगरा आ गई. आगरा आने के बाद शिवानी की मनोस्थिति कुछ अजीब सी थी. शिवानी के जाने के बाद वास्तव में प्रदीप बेचैन हो गया. वह जबतब शिवानी को फोन कर के मीठीमीठी बातों से उसे लुभाने की कोशिश करने लगा. शिवानी भी उम्र की उस दहलीज पर खड़ी थी, जहां भावनाओं और उमंगों का सैलाब दूर तक बहा कर ले जाने की कोशिश करता रहता है अर्थात शिवानी का झुकाव भी प्रदीप की तरफ होने लगा. उसे प्रदीप अच्छा लगने लगा.

एक दिन प्रदीप ने शिवानी को फोन किया कि वह आगरा आ रहा है. उस के आने की बात पर शिवानी खुश हो गई. उस का मन भी प्रदीप से मिलने के लिए उमड़ने लगा. प्रदीप आगरा पहुंचा तो शिवानी घर में बिना बताए तय जगह पर प्रदीप से मिलने पहुंच गई. वहां से प्रदीप शिवानी को ताजमहल ले गया. वहीं पर शिवानी ने प्रदीप की मोहब्बत कबूल कर ली. शिवानी और प्रदीप भले ही रिश्ते में भाईबहन थे, लेकिन उन की सोच नए जमाने की थी. इसलिए प्यार के नशे में वे अपने बहनभाई के रिश्ते को भूल गए. प्रदीप ने तय किया कि वह शिवानी से ही शादी करेगा. लेकिन उस के सामने समस्या यह थी कि वह अपने घर वालों से मन की बात कहे कैसे कि वह मौसेरी बहन शिवानी के साथ शादी कर के अपनी दुनिया बसाना चाहता है.

हालांकि वह जानता था कि दिल की बात जुबां तक आते ही परिवार और समाज में तूफान आ जाएगा. पर वह अपने उस दिल का क्या करता, जो केवल शिवानी के लिए ही धड़क रहा था. अपनी दुनिया बसाने की गरज से वह दिल्ली जा कर शादीब्याह में हलवाईगिरी का काम करने लगा. बीचबीच में वह शिवानी से मिलने आगरा आता रहता था. एक दिन जब वह आगरा आया तो उस ने शिवानी से कहा, ‘‘शिवानी, मैं चाहता हूं कि हमारा यह प्यार एक नए रिश्ते में बदल जाए. मैं तुम से शादी करना चाहता हूं, इसलिए तुम अपनी मम्मीपापा से बात कर लो. तुम उन की अकेली संतान हो, इसलिए वे तुम्हारी बात मान भी लेंगे.’’

‘‘तुम यह क्या कह रहे हो प्रदीप. बेशक तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो, पर मेरे मांबाप इस रिश्ते के लिए हरगिज तैयार नहीं होंगे.’’

‘वह सब बाद में देखेंगे. अभी तो हमें यह देखना है कि उन की क्या राय है? मैं फिलहाल दिल्ली जा रहा हूं. तुम फोन कर के बताना कि वे क्या कह रहे हैं?’

‘‘ठीक है, मैं कोशिश कर के देखती हूं.’’ शिवानी ने जवाब दिया.

प्रदीप तो चला गया, लेकिन शिवानी को कशमकश में डाल गया. उस के मन में यही बात घूम रही थी कि शादी की बात मां से कैसे कहे. फिर हिम्मत कर के उस ने एक दिन अपनी मां से कहा, ‘‘मम्मी, प्रदीप मुझ से शादी करना चाहता है.’’

बेटी की बात सुन कर रेखा की आंखें फटी की फटी रह गईं. वह हैरान हो कर बोली, ‘‘यह क्या कह रही है? वह तेरा भाई है और भाईबहन के बीच शादी कभी नहीं हो सकती.’’

मां के सख्त तेवर देख कर शिवानी सहम गई. दूसरी ओर रेखा चिंता में पड़ गई. उस ने कहा, ‘‘आज के बाद तू प्रदीप से कभी भी नहीं मिलेगी.’’

मां का गुस्सा देख कर शिवानी कोई जवाब नहीं दे सकी. फोन कर के उस ने प्रदीप से कह दिया कि मम्मीपापा इस रिश्ते के लिए कभी तैयार नहीं होंगे.

‘‘देखो शिवानी, कोई माने या न माने, शादी तो मैं तुम्हीं से करूंगा और जल्दी ही यह बात मैं अपने घर में बता दूंगा. उस के बाद मेरी मम्मी तुम्हारी मम्मी को मना लेंगी.’’ प्रदीप ने कहा. जब रेखा ने बेटी की बात पति अन्नू को बताई तो अन्नू ने शिवानी को डांटने के बजाय प्यार से समझाया कि बेटा समाज ऐसे रिश्तों को कभी कबूल नहीं करता, इसलिए बेहतर यही होगा कि तुम उस का फोन रिसीव ही मत करो. पिता की बात को शिवानी समझ रही थी. वह कशमकश में फंस गई कि अब क्या करे. एक ओर उस के मांबाप थे तो दूसरी ओर उस का प्यार प्रदीप. आखिर उस ने तय किया कि मांबाप की इज्जत को ध्यान में रख कर वह प्रदीप से न तो मिलेगी और न ही उस का फोन रिसीव करेगी.

दूसरी ओर एक दिन हिम्मत कर के प्रदीप ने अपने मांबाप से कह दिया कि वह शिवानी से शादी करना चाहता है. उस की बात सुन कर पिता रामनिवास हक्केबक्के रह गए. उन्होंने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘तेरा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है? तू जानता है कि वह तेरी बहन लगती है. उस से तेरी शादी हरगिज नहीं हो सकती.’’

लेकिन प्रदीप के सिर पर तो मोहब्बत का जादू चढ़ कर बोल रहा था. उस पर पिता के समझाने का कोई असर नहीं हुआ. अपने प्यार की खातिर उस ने अपने घर वालों से बगावत कर ली. उस ने कह दिया कि वह हर हालत में शिवानी से शादी करेगा. अपने मांबाप से बगावत करने की बात शिवानी से बता कर प्रदीप ने शिवानी को फोन किया. लेकिन शिवानी ने उस का फोन रिसीव नहीं किया. कई बार फोन करने के बाद भी जब शिवानी ने फोन रिसीव नहीं किया तो वह परेशान हो गया. उस के बारबार फोन करने की बात शिवानी ने अपनी मां रेखा को बता दी.

रेखा ने एक दिन परिवार वालों को बुला कर पंचायत की. सब ने प्रदीप को फटकारा और कहा कि उस की जिद गलत है. बहन के साथ कभी शादी नहीं हो सकती. प्रदीप को लगा कि वह अकेला पड़ता जा रहा है. उस का बागी मन यह सोच कर परेशान था कि उस की खुशी में समाज का क्या लेनादेना. सभी ने बहुत समझाया, पर उस ने अपना फैसला नहीं बदला. प्यार जब हद से गुजर जाता है तो जुनून बन जाता है. उस ने रात में ही शिवानी को फोन किया. इस बार शिवानी ने उस की काल रिसीव कर के साफ कह दिया कि वह घर वालों की मरजी के बिना कुछ नहीं कर सकती. इसलिए वह उस से शादी करने की बात भूल जाए.

‘‘शिवानी, मना तो मेरे घर वाले भी कर रहे हैं, लेकिन मैं ने उन की बात ठुकरा दी. मैं तुम्हारे लिए उन्हें भी छोड़ने को तैयार हूं. अब तुम अपने कदम पीछे मत खींचो.’’

‘‘प्रदीप, मैं एक लड़की हूं, इसलिए मैं घर वालों के खिलाफ नहीं जा सकती.’’ यह कह कर उस ने फोन काट दिया.

उसी बीच अन्नू को पता चल गया कि शिवानी और प्रदीप के बीच फोन पर बातें हुई हैं तो उस ने शिवानी के मोबाइल का सिम तोड़ दिया. अब प्रदीप का शिवानी से संपर्क पूरी तरह से टूट गया. वह बहुत आहत था. उस की हालत जख्मी शेर सी हो गई. एक दिन उस ने शिवानी के पिता अन्नू को फोन पर धमकाया कि अगर उस ने शिवानी की शादी मेरे अलावा किसी और से कर दी तो वह शिवानी को मार डालेगा. अन्नू प्रदीप की हरकतों से परेशान था. उस ने तय किया कि वह जल्दी ही बेटी की शादी कर के प्रदीप से अपना पीछा छुड़ा लेगा. पिता को परेशान देख कर शिवानी ने उन से वादा किया, ‘‘पापा, आप परेशान न हों. अब मैं प्रदीप से कभी बात नहीं करूंगी.’’

बेटी पर विश्वास करते हुए अन्नू ने उसे नया सिम कार्ड ला कर दे दिया. प्रदीप को पता नहीं कहां से शिवानी का नया नंबर मिल गया तो वह फिर उसे फोन करने लगा. शिवानी ने उस से साफ कह दिया कि उस के पापा उस के लिए रिश्ता देख रहे हैं. वह उस से न शादी कर सकती और न ही कोई संबंध रखना चाहती है. शिवानी के रिश्ते की बात सुन कर प्रदीप एक तरह से पागल हो उठा. उस का किसी काम में मन नहीं लग रहा था. वह गुस्से में उबलने लगा. इस के बाद उस ने कई बार कोशिश की कि वह शिवानी से मिल कर अपने दिल का हाल बताए, लेकिन शिवानी उस से मिलना नहीं चाहती थी. प्रदीप समझ गया कि शिवानी उसे दगा दे गई. उस ने तय किया कि वह शिवानी को किसी और की नहीं होने देगा. अगर वह नहीं मानी तो वह उसे छोड़ेगा नहीं.

प्रदीप के दिमाग पर शैतान बैठ गया. खून उस के सिर पर सवार हो गया. उस ने 5 अप्रैल को एक तेज धार वाला चाकू खरीद कर रख लिया. इस के बाद उस ने शिवानी को फोन कर के कहा, ‘‘शिवानी चलो मैं ही तुम्हारी बात मान कर अपना रास्ता बदल लेता हूं, पर एक बार तुम मुझ से जरूर मिल लो. बस आखिरी बार हमारे प्यार की खातिर.’’

शिवानी मौत की दस्तक से अनभिज्ञ थी. इसलिए उस ने कहा, ‘‘ठीक है, जब तुम इतनी जिद कर रहे हो तो मिल लूंगी.’’

प्रदीप ने उसे मिलने के लिए सिकंदरा बुलाया. शिवानी मां से मोबाइल रिचार्ज कराने की बात कह कर अपने घर से निकली. वह सीधे सिकंदरा पहुंची, जहां प्रदीप उस का इंतजार कर रहा था. शिवानी प्रदीप को देख कर मुसकराई, मगर प्रदीप ने नजर फेर ली. शिवानी ने पूछा, ‘‘कहो, क्या कहना है?’’

‘‘क्या सारी बातें यहीं कर लोगी, अंदर चलते हैं.’’

‘‘प्रदीप मुझे जल्दी घर जाना होगा.’’ शिवानी बोली.

‘‘ठीक है, चली जाना.’’ प्रदीप ने लापरवाही से कहा, ‘‘कुछ देर बैठ कर बातें कर लेते हैं.’’

इस के बाद सिकंदरा के अंदर जाने के लिए उस ने 10-10 रुपए के टिकट खरीदे. टिकट लेने के बाद उस ने इधरउधर देखा. गेट के पास पार्क बिलकुल सुनसान था. वह शिवानी को ले कर उधर आ गया और एक पेड़ की आड़ में बैठ गया. वहां से मेन गेट करीब सौ मीटर दूर था. शिवानी सामान्य थी, पर प्रदीप के शैतानी दिमाग में कुछ और ही चल रहा था.

प्रदीप ने कहा, ‘‘शिवानी अब बताओ कि शादी के बारे में तुम्हारा क्या खयाल है?’’

‘‘प्रदीप, मैं पहले ही कह चुकी हूं कि मम्मीपापा नहीं मान रहे हैं. फिर जरा सोचो, रिश्तेदार और मोहल्ले वाले क्या कहेंगे.’’

शिवानी के इतना कहते ही प्रदीप ने इधरउधर देखा. कोई दिखाई नहीं दिया तो उस ने जेब से चाकू निकाला और शिवानी का मुंह दबा कर चाकू का एक वार उस की गरदन पर कर दिया. मुंह बंद होने से शिवानी चीख भी नहीं पाई. उस की आंखें फटी की फटी रह गईं. प्रदीप ने 5-6 वार उस के पेट में किए. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. उस ने चाकू वहीं फेंका और तेजी से मेन गेट से बाहर निकल गया. इस के बाद एक पर्यटक की नजर शिवानी की लाश पर पड़ी तो उस ने वहां घूमने वाले अन्य लोगों को वह लाश दिखाई. इस के बाद वहां तैनात सुरक्षा गार्डों को लड़की की लाश पार्क में पड़ी होने की जानकारी मिली तो वे घटनास्थल पर पहुंचे और पुलिस को सूचना दी.

प्रदीप से पूछताछ कर के पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. रिश्तों की मर्यादा को न समझने वाले युवक ने अपने जुनून में अपनी ही रिश्ते की बहन की जिंदगी छीन ली, पर उस के चेहरे पर शिकन तक नहीं थी. Agra Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Love Crime: मौत को न्यौता देती मौहब्बत

Love Crime: प्रतिभा और बबलू की जाति तो अलग थी ही, सामाजिक और आर्थिक असमानता भी थी. फिर भी दोनों में प्यार ही नहीं हुआ, वे शादी के लिए घर से भाग भी गए थे. तब उन के विवाह में अड़चन कहां आई?

बबलू और प्रतिभा का कोई जोड़ नहीं था. दोनों की जाति में ही नहीं, सामाजिक और आर्थिक स्तर में भी काफी फर्क था. बस एक ही बात मेल खाती थी, वह थी उम्र. दोनों ही जवानी की दहलीज पर खड़े थे. शायद इसी वजह से दोनों में प्यार हो गया था. प्यार भी ऐसा कि दोनों अपने प्यार के लिए कुछ भी करने को तैयार थे. बबलू उत्तर प्रदेश के जिला एटा के थाना मारहरा के गांव मोहिनी के रहने वाले वीरपाल जाटव का बेटा था. वीरपाल कोई बड़े आदमी नही थे. उन के पास खेती की थोड़ी जमीन थी. उसी की कमाई से 5 बेटों और एक बेटी को पालापोसा. जवान होने पर 2 बेटे राजाराम और प्रमोद दिल्ली चले गए. कमानेधमाने लगे तो वीरपाल ने उन की शादियां कर दीं. शादियों के बाद वे अपनेअपने परिवार को भी दिल्ली ले गए.

उन दोनों से छोटा बबलू गांव में ही रहता था और ड्राइविंग सीख कर किसी की जीप चलाता था. उस से छोटे बंटी और कुलदीप वीरपाल की खेती में मदद करते थे. वीरपाल की पत्नी जावित्री देवी घरपरिवार को ठीक से संभाल रही थी. प्रतिभा भी इसी गांव के रहने वाले विजय प्रताप बघेल की बेटी थी. उन की आर्थिक स्थिति काफी ठीकठाक थी. उन की अपनी कुछ गाडि़यां थीं, जो किराए पर चलती थीं. इस के अलावा वह ब्याज पर भी रुपए देते थे, खेती होती ही थी. विजय प्रताप के परिवार में पत्नी भूदेवी के अलावा 2 बेटियां प्रतिभा, प्रिया और 2 बेटे ललित तथा अंकित थे.

विजय प्रताप के पास किसी चीज की कमी तो थी नहीं, इसलिए वह बच्चों को पढ़ालिखा कर किसी काबिल बनाना चाहते थे. इंटर पास करने के बाद प्रतिभा ने बीएससी करने की इच्छा जाहिर की तो विजय प्रताप ने उस का दाखिला पड़ोस के गांव रामनगर स्थित डिग्री कालेज में करवा दिया. यह 3 साल पहले की बात है. प्रतिभा कालेज तांगे से आतीजाती थी. एक दिन उसे तांगा नहीं मिला तो वह पैदल ही कालेज के लिए चल पड़ी. वह कुछ दूर ही गई थी कि एक जीप उस के पास आ कर रुक गई. उस ने पलट कर देखा तो जीप उस के गांव का बबलू चला रहा था. उस ने कहा, ‘‘आज तांगा नहीं मिला क्या, जो तुम पैदल ही कालेज जा रही हो? खैर कोई बात नहीं, आओ बैठो, मैं तुम्हें छोड़ देता हूं. मैं उधर ही जा रहा हूं.’’

एक ही गांव का होने की वजह से प्रतिभा बबलू को अच्छी तरह जानती थी, लेकिन कभी बातचीत नहीं हुई थी, क्योंकि कभी मौका ही नहीं मिला था. एक तो कालेज के लिए देर हो रही थी, दूसरे बबलू गांव का ही था, इसलिए उस के साथ जीप में बैठने में उसे कोई बुराई नजर नहीं आई. वह चुपचाप बैठ गई. कुछ दूर जाने के बाद बबलू ने कहा, ‘‘आप भाग्यशाली हैं, जो पढ़ रही हैं. मेरे घर में पढ़ाईलिखाई का माहौल ही नहीं था, इसलिए मैं नहीं पढ़ पाया. आप मन लगा कर खूब पढि़एगा.’’

‘‘आप पढ़ नहीं पाए तो क्या हुआ, गाड़ी तो चला लेते हैं. ईमानदारी से कोई भी काम करने में बुराई नहीं है.’’

‘‘गाड़ी तो चला लेता हूं, लेकिन न पढ़ पाने का अफसोस तो रहता ही है. रही काम करने की बात तो जिंदगी गुजारने के लिए आदमी को कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा.’’

‘‘अफसोस करने की जरूरत नहीं है, किसी पढ़ीलिखी लड़की से शादी कर लेना, यह कमी भी पूरी हो जाएगी.’’ बबलू की बात पर हंसते हुए प्रतिभा ने कहा.

प्रतिभा की इस बात पर पहले तो बबलू खूब हंसा, उस के बाद हांफते हुए बोला, ‘‘जब मैं पढ़ालिखा नहीं हूं तो भला कोई पढ़ीलिखी लड़की मुझ से क्यों शादी करेगी?’’

‘‘क्यों नहीं करेगी, देखने में तो अच्छेखासे हो, शक्ल भी बुरी नहीं है. अगर कपड़े अच्छे पहने होते तो टीवी के धारावाहिकों के हीरो जैसे लगते. अब जीप रोक दो, मेरा कालेज आ गया.’’ प्रतिभा ने कहा.

बबलू ने जीप रोकी तो प्रतिभा उतर कर कालेज चली गई. लेकिन उस की बातों ने बबलू पर कुछ ऐसा असर किया कि उस ने मन ही मन तय कर लिया कि इस बार वेतन मिलेगा तो वह अपने लिए अच्छेअच्छे कपड़े जरूर बनवाएगा. उस ने सोचा ही नहीं, वेतन मिला तो उस ने 2 जोड़ी अच्छेअच्छे कपड़े सिलवा भी डाले. उन्हें पहन कर वह प्रतिभा के कालेज जाने वाले रास्ते पर खड़ा हो गया. प्रतिभा आई तो उस ने रोक लिया, ‘‘अब देखो, कैसा लग रहा हूं?’’

‘‘एकदम हीरो लग रहे हो.’’ कह कर प्रतिभा खिलखिला कर हंस पड़ी. उस की इस हंसी ने बबलू के दिल की धड़कन बढ़ा दी. बस इसी के बाद प्रतिभा उसे अच्छी लगने लगी. उस का मन यही करने लगा कि वह उसे ही देखता रहे. अब वह उस की एक झलक पाने के लिए उस के घर और कालेज के इर्दगिर्द मंडराने लगा. वह उस से दिल की बात कहना चाहता था, लेकिन जाति की ऊंचनीच और आर्थिक असमानता उस की जुबान बंद किए थी.

बबलू भले ही दिल की बात नहीं कह पा रहा था, लेकिन समझदार और पढ़ीलिखी प्रतिभा उस की भावनाओं को अच्छी तरह समझ रही थी. वह जानती थी कि एक जवान लड़का किसी जवान लड़की के इर्दगिर्द क्यों मंडराता है? लेकिन वह यह भी जानती थी कि उन की जाति का जो भेद है, वह समाज में ऐसा हंगामा खड़ा करेगा कि उन का प्यार मंजिल तक पहुंच नहीं पाएगा. इसलिए वह चाहते हुए भी बबलू के नजदीक नहीं आ रही थी. प्रतिभा को जब भी बबलू मिलता, वह बच कर निकल जाती. उसे लगता कि बबलू उस से कुछ कहना चाहता है. वह यह भी जानती थी कि वह क्या कहना चाहता है, पर वह मजबूर थी. लेकिन जब उस ने देखा कि बबलू मन की बात कह न पाने की वजह से उदास रहने लगा है तो उसे उस पर दया आने लगी.

इस का नतीजा यह निकला कि उस का दिल पसीजने लगा. आखिर एक दिन बबलू उस के सामने पड़ा तो अपने आप ही उस के होंठों पर मुसकान आ गई. प्रतिभा की यह मुसकान बबलू के लिए हैरान करने वाली थी. उसे लगा, प्रतिभा के मन में भी उस के लिए प्यार पैदा हो गया है. उस की हिम्मत बढ़ी और एक दिन मौका मिलते ही उस ने प्रतिभा से दिल की बात कह दी. जब प्रतिभा ने भी कहा कि वह भी उस से प्यार करती है तो बबलू को मानो जमाने की सारी खुशियां मिल गईं. इस के बाद दोनों चोरीछिपे मिलनेजुलने लगे. लेकिन उन के दिल में हमेशा यह डर बना रहता कि कोई देख तो नहीं रहा है. इस के अलावा इस से भी बड़ा डर इस बात का था कि उस के परिवार वाले बबलू को स्वीकार करेंगे या नहीं? क्योंकि वह उस के लिए जिस तरह के रिश्ते की तलाश कर रहे थे, बबलू में वैसा एक भी गुण नहीं था.

एक तो बबलू उस से नीची जाति का था, दूसरे पढ़ालिखा भी नहीं था. कमाई भी कुछ खास नहीं थी. घरपरिवार भी वैसा ही था. ऐसे में किसी भी कीमत पर उस के घर वाले उस की शादी बबलू के साथ करने को राजी नहीं होते. प्रतिभा इसी ऊहापोह में खोई रहती. बेटी को परेशान देख कर कभीकभी भूदेवी पूछ भी लेतीं, ‘‘क्या बात है प्रतिभा, आजकल तू कुछ उखड़ीउखड़ी रहती है? मैं देख रही हूं, तेरा मन भी पढ़ाई में नहीं लग रहा है. इधर तू कालेज से भी देर से आने लगी है?’’

‘‘मम्मी परीक्षाएं नजदीक आ गईं हैं न, इसलिए देर तक पढ़ाई होती है.’’ प्रतिभा ने मां को समझा दिया.

भूदेवी को लगा, बेटी ठीक ही कह रही होगी. लेकिन जब उन्हें किसी परिचित से पता चला कि प्रतिभा कई बार उसे मारहरा में वीरपाल के बेटे बबलू के साथ दिखाई दी है तो भूदेवी सन्न रह गईं. उन की बेटी किसी नीच जाति के लड़के के साथ घूमती है.

उस दिन शाम को प्रतिभा घर आई तो भूदेवी ने पूछा, ‘‘कहां थी, जो इतनी देर हो गई?’’

‘‘कालेज में मम्मी, भूख लगी है खाना दो.’’

भूदेवी ने गाल पर जोरदार तमाचा मार कर कहा, ‘‘क्या कहा कालेज में थी? मुझ से झूठ बोल रही है. मुझे पता है कि तू मारहरा में जाटवों के लड़के के साथ घूम रही थी. तू परिवार की नाक कटाने पर तुली है. अभी तो सिर्फ मुझे पता है, अगर तेरे बाप को पता चल तो वह तुझे काट कर रख देंगें.’’

प्रतिभा समझ गई कि मां को सब पता चल गया है. फिर भी उस ने असलियत छिपाने की एक और कोशिश की, ‘‘मम्मी, बबलू गांव का है. कभी कोई सवारी नहीं मिलती और वह रास्ते में मिल जाता है तो उस की गाड़ी से आ जाती हूं.’’

भूदेवी को लगा कि हो सकता है प्रतिभा ठीक ही कह रही हो. मान लीजिए आते समय बबलू मिल जाता हो और वह उस के साथ आ जाती हो. इस में कुछ गलत भी नहीं है. उस ने बेटी को गहरी नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘प्रतिभा जमाना बहुत खराब है. लोग कुछ का कुछ मतलब निकाल लेते हैं. इसलिए अच्छा यही होगा कि तुम बबलू के साथ मत आया करो.’’

प्रतिभा ने सिर हिला कर हामी भर दी. लेकिन वह यह भी समझ गई कि अब से उसे बहुत सतर्क रहना होगा. इस के बाद जब वह मौका मिलने पर बबलू से मिली तो सारी बात उसे बता दी. इस के बाद उस ने कहा, ‘‘जब तक उचित समय नहीं आ जाता, तब तक हमें अपने प्यार को सब से छिपा कर रखना होगा, वरना हमें मिलने नहीं दिया जाएगा.’’

प्यार तो वैसे भी दीवाना और जुनूनी होता है. प्रतिभा और बबलू का प्यार भी कुछ ऐसा ही हो गया था. लेकिन लोग उन के बीच दीवार बने हुए थे. अब तक विजय प्रताप को भी प्रतिभा और बबलू के संबंधों के बारे में पता चल गया था. यह परेशान करने वाली बात थी, क्योंकि समाज में इज्जत की बात थी. इसलिए उस ने पत्नी से साफसाफ कह दिया कि प्रतिभा का कालेज जाना एकदम बंद. अगर पढ़ना है तो घर पर बैठ कर पढ़े. उस दिन के बाद प्रतिभा नजरों के घेरे में कैद हो गई. कालेज जाना ही नहीं, घर से बाहर जाना तक बंद कर दिया गया. घर न हुआ जैसे कैदखाना हो गया. विजय प्रताप अब अपने मोबाइल का भी खास ध्यान रखने लगे थे, इसलिए प्रतिभा बबलू से बात भी नहीं कर पाती थी.

आखिर एक दिन मौका मिला तो प्रतिभा ने फोन कर के बबलू को बताया कि घर में सभी लोगों को उन के प्यार के बारे में पता चल गया है, इसलिए उसे घर में बंद कर दिया गया है. घर वालों ने उस की जिंदगी को नरक बना दिया है. पापा हमेशा उस पर नाराज होते रहते हैं. कासगंज वाला मकान किराएदारों से खाली करवा रहे हैं, शायद अब उसे वहीं रखा जाएगा. उस के बाद तो मिलनाजुलना और मुश्किल हो जाएगा.

‘‘प्रतिभा तुम चिंता मत करो. मैं तैयारी कर रहा हूं. हम दोनों भाग चलेंगे और अलीगढ़ में कोर्टमैरिज कर लेंगे. शादी होने के बाद कोई हमारा कुछ नहीं कर पाएगा.’’ बबलू ने कहा.

प्रतिभा को पूरा विश्वास था कि बबलू जो कह रहा था, वह कर के दिखाएगा और सचमुच बबलू ने वह कर दिखाया. वह प्रतिभा को भगा ले गया. प्रतिभा के भागने के बाद तो गांव में जैसे जलजला आ गया. विजय प्रताप की जाति के लोग इकट्ठा हुए और वीरपाल को पकड़ कर कहा, ‘‘किसी भी तरह, कहीं से भी ला कर प्रतिभा को हमारे हवाले कर दो, वरना ठीक नहीं होगा.’’

प्रतिभा और बबलू अलीगढ़ में कोर्टमैरिज कर पाते, उस के पहले ही अलीगढ़ पुलिस ने दोनों को पकड़ लिया. बबलू को पुलिस ने जेल भेज दिया और प्रतिभा को विजय प्रताप के हवाले कर दिया. प्यार के पंछी बबलू को भले ही जेल भेज दिया गया था, लेकिन इस से उस का जुनून कम होने के बजाय और बढ़ गया. गांव में जो बदनामी हुई थी, उस से बचने के लिए विजय प्रताप परिवार को ले कर कासगंज की गंगेश्वर कालोनी स्थित अपने मकान में रहने आ गया था. यहां आने पर मजबूत लोहे की छड़ों का मुख्य गेट लगवाया गया, पूरे मकान को लोहे की मजबूत सरियों से कैदखाने की तरह बनवा दिया गया. लेकिन प्रतिभा के दिल से बबलू नहीं निकल सका तो नहीं निकल सका. जैसेजैसे बंदिशें बढ़ती गईं, वैसेवैसे प्यार भी बढ़ता गया.

छह महीने बाद बबलू जमानत पर छूट कर बाहर आया तो उसे पता चला कि प्रतिभा अब गांव में नहीं, कासगंज में रहती है. अब दोनों के बीच करीब 10 किलोमीटर की दूरी थी, लेकिन प्यार करने वालों के लिए यह दूरी कुछ भी नहीं थी. प्रतिभा को पता चला कि बबलू जेल से बाहर आ गया है तो वह उस से मिलने के लिए छटपटाने लगी. जैसे ही विजय प्रताप का मोबाइल उस के हाथ लगा, उस ने बबलू को फोन कर दिया, ‘‘बबलू, मैं तुम्हारे बिना जिंदा नहीं रह सकती. तुम आ कर किसी भी तरह मुझ से मिलो.’’

कासगंज आने के बाद विजय प्रताप और भूदेवी थोड़ा निश्चिंत हो गए थे कि बबलू यहां कहां मिलने आएगा. वे बेटी के लिए ठीकठाक रिश्ता तलाशने में लगे थे. लेकिन उन की यह निश्चिंतता अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सकी. क्योंकि प्रतिभा ने प्रेमी को मिलने के लिए कासगंज बुला लिया था. बबलू ने प्रतिभा को आश्वासन दिया था कि जीतेजी कोई उसे उस से अलग नहीं कर सकता. जल्दी ही वह उसे फिर भगा कर ले जाएगा. इस बार वह ऐसी जगह भगा कर ले जाएगा, जहां कोई उसे ढूंढ़ नहीं पाएगा. इस बार बबलू ने मिलने का एक अलग रास्ता निकाल लिया था. वह प्रतिभा को नींद की गोलियां ला कर दे जाता, जिन्हें प्रतिभा दूध या खाने में मिला कर घर वालों को खिला देती. इस के बाद घर के सभी लोग गहरी नींद सो जाते तो दोनों निश्चिंत हो कर रात में मिलते.

ऐसा ही काफी दिनों तक चलता रहा. इसी के साथ बबलू पैसे इकट्ठा करता रहा कि वह प्रतिभा को भगा कर ले जाए तो उसे कोई परेशानी न हो. मतलब भर के पैसे हो गए तो दोनों ने 14 नवंबर को भागने का निश्चय कर लिया. लेकिन 14 नवबर को जैसे ही प्रतिभा बैग ले कर घर से निकलने लगी, उस का भाई ललित कुमार जाग गया. उसे इस तरह बाहर जाते देख उस ने कहा, ‘‘कहां जा रही हो दीदी, तुम्हारी वजह से पूरा परिवार परेशान है? हम लोग गांव छोड़ कर यहां आ गए, इस के बावजूद तुम्हारी समझ में कुछ नहीं आ रहा है.’’

‘‘ललित मुझे जाने दो, मैं बबलू के बिना जिंदा नहीं रह सकती.’’ प्रतिभा ने कहा.

ललित ने मेनगेट की चाबी उस से छीन ली और मम्मीपापा को जगा दिया. प्रतिभा को इस तरह जाते देख विजय प्रताप और भूदेवी हैरान रह गए. उन्होंने तो सोचा था कि अब सब कुछ ठीक हो गया है. लेकिन यहां तो मामला और बिगड़ गया था. विजय प्रताप ने प्रतिभा की खूब पिटाई की. लेकिन उस ने भी साफ कह दिया कि वे लोग चाहे जो कर लें, शादी वह बबलू से ही करेगी. बेटी की इस बगावत ने मांबाप को बेचैन कर दिया. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वे इस का क्या करें. इस के बाद उसे हमेशा ताले में बंद कर के रखा जाने लगा. इस तरह प्रतिभा के भागने के सारे रास्ते बंद कर दिए गए.

इतनी बंदिशों में भी बबलू ने एक मोबाइल फोन प्रतिभा तक पहुंचा दिया था, जिस से उन की बातें हो जाती थीं. लेकिन मिलना नहीं हो पाता था. इस तरह उन का प्यार सिसकसिसक कर दम तोड़ रहा था. दूसरी ओर मांबाप परेशान थे, क्योंकि उन्हें कोई अच्छा रिश्ता नहीं मिल रहा था. एक ओर विजय प्रताप प्रतिभा के लिए लड़का ढूंढ़ रहे थे, दूसरी ओर वह बबलू के साथ भागने की तैयारी में लगी थी. उसे मौके की तलाश थी. लेकिन घर वालों ने उस की सख्ती से निगरानी शुरू कर दी थी, जिस से उसे मौका नहीं मिल रहा था. ऐसा नहीं था कि सिर्फ प्रतिभा के घर वाले ही परेशान थे, इस प्रेम प्रकरण से बबलू के घर वाले भी काफी परेशान थे. वे नहीं चाहते थे कि बबलू कुछ ऐसा करे, जिस से उन्हें परेशानी का सामना करना पड़े. वे उसे रोक भी रहे थे, लेकिन बबलू मान ही नहीं रहा था.

तमाम पाबंदी के बावजूद 8 फरवरी की रात दीवार फांद कर बबलू विजय प्रताप के घर की छत पर पहुंच गया. सीढि़यों पर ताला बंद था, इसलिए वह रोशनदान के रास्ते घर के अंदर दाखिल हुआ. विजय प्रताप जाग रहे थे. उन्हें पदचाप की आवाज सुनाई दी तो उन्होंने अपने दोस्त दिलीप को फोन कर के घर आने को कहा. दिलीप पेट्रोल पंप पर सेल्समैन था. विजय प्रताप के बुलाने पर थोड़ी ही देर में वह अपने दोस्त सत्यपाल के साथ उन के घर आ गया. इस के बाद वे प्रतिभा को दरवाजा खोलने को कहा. लेकिन प्रतिभा ने दरवाजा नहीं खोला.  काफी परेशान होने के बाद भी जब प्रतिभा ने दरवाजा नहीं खोला तो विजय प्रताप ने कहा कि वह दरवाजा खोल दे, बबलू को कुछ नहीं कहा जाएगा. तब झांसे में आ कर प्रतिभा ने दरवाजा खोल दिया. दरवाजा खुलते ही सभी ने बबलू को दबोच लिया और दूसरे कमरे में ले जा कर पिटाई शुरू कर दी.

प्रतिभा ने विरोध किया तो उसे मारपीट कर दूसरे कमरे में बंद कर दिया गया. अब वे सोचने लगे कि बबलू का किया क्या जाए, क्योंकि वे समझ गए थे कि यह किसी भी तरह उन की बेटी का पीछा छोड़ने वाला नहीं है. यही सोचतेसोचते सवेरा हो गया. उसी बीच मौका पा कर बबलू ने अपने मोबाइल से भाई को फोन कर दिया कि वह कासगंज में प्रतिभा के घर में फंस गया है. उस की जान खतरे में है. घर वाले मदद के लिए चल पड़े, लेकिन वे पहुंच पाते, उस के पहले ही विजय प्रताप और उस के साथियों ने गोली मार कर बबलू की हत्या कर दी और परिवार सहित घर छोड़ कर भाग गए.

अब तक सवेरा हो गया था, प्रतिभा किसी तरह कमरे से बाहर निकली और सीधे कोतवाली कासगंज जा पहुंची. जब उस ने कोतवाली में ड्यूटी पर तैनात सिपाहियों को बताया कि उस के घर वालों ने गोली मार उस के प्रेमी की हत्या कर दी है तो कोतवाली में हड़कंप मच गया. तुरंत कोतवाली प्रभारी को सूचना दी गई. घटनास्थल के लिए निकलने से पहले उन्होंने इस घटना की जानकारी सीओ ए. के. सिंह और एएसपी आर.एम. भारद्वाज को दे दी. कुछ ही देर से कोतवाली प्रभारी विजय बहादुर सिंह, सीओ ए.के. सिंह, एएसपी आर.एम. भारद्वाज गंगेश्वर कालोनी स्थित विजय प्रताप के घर पहुंच गए थे. घर में कोई नहीं था. प्रतिभा कोतवाली प्रभारी के साथ थी. उस की निशानदेही पर कमरे में पड़े बैड के नीचे से बबलू की लाश बरामद कर ली गई.

इस के बाद घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया गया. घटनास्थल की काररवाई निपटा कर पुलिस अधिकारी कोतवाली वापस आ गए. बबलू के घर वालों को रास्ते में ही पता चल गया था कि उस की हत्या हो चुकी है, इसलिए वे सभी सीधे कोतवाली आ गए थे. इस के बाद प्रतिभा के बयान और मृतक बबलू के पिता वीरपाल की तहरीर के आधार पर उस की हत्या का मुकदमा विजय प्रताप, दिलीप, सत्यपाल और भूदेवी के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. चूंकि बबलू एससी था, इसलिए हत्या के इस मामले में एससी एक्ट भी लगा दिया गया.

कोतवाली पुलिस ने तुरंत मोहिनी गांव में छापा मार कर प्रतिभा की मां भूदेवी, पिता विजय प्रताप और हत्या में शामिल दिलीप को गिरफ्तार कर लिया. लेकिन सत्यपाल फरार होने में कामयाब हो गया. पुलिस ने तीनों अभियुक्तों को कासगंज ला कर एसपी विनय कुमार यादव के सामने पेश किया, जहां की गई पूछताछ में तीनों ने बबलू की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पूछताछ के बाद कोतवाली पुलिस ने विजय प्रताप, भूदेवी और दिलीप को कासगंज की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. दिलीप की जल्दी ही शादी होने वाली थी, लेकिन अब वह हत्या के आरोप में जेल पहुंच गया है. पुलिस चौथे अभियुक्त सत्यपाल की तलाश कर रही है. कथा लिखे जाने तक वह पकड़ा नहीं गया था. Love Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि

UP Crime Story: वाराणसी की पौश कालोनी में सजता देह बाजार

UP Crime Story: कोरोना कर्फ्यू का वीकेंड यानी शनिवार का दिन था. चेतगंज की थानाप्रभारी इंसपेक्टर संध्या सिंह लौकडाउन के दौरान सुबहसुबह साढ़े 6 बजे के करीब चाय की चुस्कियों के साथ इलाके का एक बार मुआयना करने की योजना बना रही थीं. तभी अचानक 4 लोग थाने  में आए.

उन्हें देख कर वह बोलीं, ‘‘जी, बताइए मैं आप लोगों की क्या मदद कर सकती हूं?’’

एक आगंतुक दाएंबाएं देखता हुआ हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘साहब, हम लोग पिशाचमोचन क्षेत्र के रहने वाले हैं. हमारे मोहल्ले के एक मकान में इन दिनों तरहतरह के लोगों का आनाजाना होने लगा है.’’

‘‘तरहतरह के लोगों से आप का क्या मतलब है?’’ संध्या सिंह ने पूछा.

‘‘हमें संदेह है कि मकान में कोई गलत काम होता है. क्योंकि वहां हमेशा नएनए लोग आतेजाते देखे गए हैं. प्लीज, आप वहां की जांच कीजिए, अपने आप पता चल जाएगा कि बात क्या है.’’

उस व्यक्ति की बात पूरी होते ही साथ में आया दूसरा व्यक्ति बोल पड़ा, ‘‘जी मैडम, वहां की संदिग्ध गतिविधियों का खुलासा हो जाएगा.’’

‘‘वे किस तरह के लोग होते  हैं?’’ संध्या को अधिक जानने की जिज्ञासा हुई.

‘‘मैडमजी, आनेजाने वाले लोग दिखने में संभ्रांत लगते हैं, वे 40-45 की उम्र के दिखते हैं. उन के हाथों में रैपर में लिपटा कोई न कोई गिफ्ट पैकेट भी होता है.’’ एक अन्य व्यक्ति बोला.

मोहल्ले के लोगों की बातों को गौर से सुनने के बाद संध्या सिंह ने शिकायत करने वालों के नाम और कौन्टैक्ट के लिए मोबाइल नंबर के साथ कुछ पौइंट नोट कर लिए और छानबीन करने का आश्वासन दे कर उन्हें जाने को कहा.

पिशाचमोचन मोहल्ले के नागरिकों द्वारा बताई गई बातों पर गौर करते हुए उन्होंने तुरंत एसीपी (चेतगंज) नितेश प्रताप सिंह को भी अवगत करवा दिया. उन्हें शिकायत संबंधी पूरी जानकारी दी. मामला उत्तर प्रदेश के पौराणिक शहर वाराणसी का था. ऊपर से यह देश के प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है. इसे देखते हुए पुलिस ने संदिग्ध मकान में छापेमारी की योजना बना ली. संध्या सिंह सहित पुलिस टीम में कुछ और महिला पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया.

सूचना के आधार पर एक पुलिसकर्मी ने पिशाचमोचन स्थित मकान नंबर सी 21/24 के मुख्य गेट पर दस्तक दी. उस की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. कई बार आवाज लगाने और गेट पीटने के बाद तो एक उम्रदराज व्यक्ति ने मुख्य गेट का चैनल खोल कर बाहर की ओर झांकते हुए तेज आवाज में पूछा, ‘‘कौन है?’’

बाहर पुलिस टीम को देख कर उस की आवाज धीमी पड़ गई. वह धीमे से बोला, ‘‘क्या बात है भई, आप लोग यहां?’’

उस का कोई जवाब दिए बगैर पुलिस टीम गेट को एक झटके में बाहर की ओर खोलते हुए मकान के भीतर धड़धड़ाती हुई घुस गई. कुछ पल में ही पूरी पुलिस टीम एक कमरे में थी. सभी पुलिसकर्मी संदिग्ध निगाहों से कमरे में इधरउधर देखने लगे. संध्या सिंह की पैनी निगाहें कुछ तलाशने की स्थिति में थीं. पुलिस की निगाह कमरे से जुड़े एक दरवाजे की तरफ गई. वहां का परदा हटाते ही एक महिला पुलिसकर्मी अनायास बोल पड़ी, ‘‘मैडमजी, इधर देखिए… ये दुष्ट लोग.’’

जब संध्या ने उस कमरे में जा कर देखा तो उन की आंखें भी फटी की फटी रह गईं. अंदर का नजारा देख कर महिला पुलिसकर्मी शर्म से आंखें झुकाए तुरंत बाहर आ गई. जबकि एसीपी चेतगंज ने फौरन कड़क आवाज में सभी को कपड़े पहन कर बाहर आने को कहा.

एसीपी ने कमरे से बाहर आ कर पूछा, ‘‘मकान का मालिक कौन है?’’

वहीं पास खड़े व्यक्ति ने कहा, ‘‘जी मैं हूं.’’

‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’ एसीपी बोले.

‘‘सुरेश कुमार,’’ वह व्यक्ति बोला.

‘‘ये सब यहां क्या है? कौन हैं  ये लोग?’’

तब तक कई लड़कियां और लड़के अंदर के कमरे से बाहर आ चुके थे. उन की ओर ऊंगली उठाते हुए एसपी ने पूछा.

अब सुरेश को काटो तो खून नहीं. वह हक्काबक्का डरी जुबान में बोला, ‘‘साहब, मैं इन लोगों के बारे में कुछ नहीं जानता, केवल इतना जानता हूं कि ये लोग किसी कंपनी में काम करते हैं.’’

मकान मालिक की बात पूरी होने वाली ही थी कि तभी इंसपेक्टर संध्या सिंह एक जोरदार तमाचा जड़ते हुए बोलीं, ‘‘तुम्हारे मकान में कोई इस प्रकार से रह रहा है और तुम्हें कोई जानकारी नहीं. वह भी एकदो नहीं कई लोग.’’

‘‘…जी…जी साहब, मैं सच कह रहा हूं, मुझे कुछ नहीं पता.’’

इतना कहने पर उस के गाल पर दूसरा जोरदार तमाचा पड़ा. लेडी पुलिस से कई लोगों के सामने तमाचा खा कर वह शर्मसार हो गया.

संध्या सिंह बोलीं, ‘‘जब तुम्हें इन लोगों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी तो फिर उन्हें कमरा किराए पर कैसे दे दिया था?’’ इस का जवाब देने के बजाय वह सिर झुकाए खड़ा रहा. पुलिस सभी को थाने ले आई. उन से अलगअलग गहन पूछताछ की जाने लगी.  इस दौरान कालोनी के कई लोग भी काफी संख्या में जमा हो गए. हर कोई जिज्ञासा भरी नजरों से देख रहा था. पूछताछ में कई बातें खुल कर सामने आईं. पुलिस टीम को मौके पर 2 युवतियां व 3 युवक बिलकुल आपत्तिजनक स्थिति में मिले थे. कमरे की तलाशी लेने के दौरान आपत्तिजनक सामग्रियों में कंडोम के पैकेट, 4 मोबाइल फोन व नशीली दवाएं बरामद हुईं.

इस तरह से शहर की पौश कालोनी में सैक्स रैकेट गिरोह का परदाफाश हो चुका था. थोड़े समय में इस की खबर पूरे शहर में फैल गई थी. जिस का असर यह हुआ था कि मीडिया के लोग और कुछ समाजसेवी संगठन भी थाने पहुंच गए. कुछ मानवाधिकार संगठन के लोगों ने चेतगंज थाने जा कर मामले की तह में जाने का दबाव बनाया. इस की सूचना काशी जोन के डीसीपी अमित कुमार को भी दी गई. वे भी चेतगंज थाने पहुंच गए.

पूछताछ के दौरान पकड़ी गई 20 से 25 साल के बीच की उम्र वाली दोनों लड़कियों ने बताया, ‘‘उन्होंने नौकरी करने वाली बता कर कमरा किराए पर लिया था.’’

वह जानबूझ कर ऐशोआराम और मौजमस्ती की जिंदगी के लिए इस धंधे में उतरी थी. उसे अपनी शानोशौकत वाली जिंदगी की जरूरतों को पूरा करने के लिए अत्यधिक पैसे की लालसा थी. पुलिस के अनुसार पढ़ाई के साथसाथ वे अन्य कामों के बहाने देह व्यापार के धंधे में उतर आई थीं. पूछताछ के दौरान 25 वर्षीय पारो (बदला हुआ नाम) ने बताया कि वह इस धंधे में पिछले 2 सालों से है. मोबाइल फोन की मदद से वह अपने इस धंधे को अंजाम देती है. इस के लिए उस ने अपना कोडवर्ड बना रखा है. उस के कोडवर्ड को ग्राहक ही समझ पाते हैं.

पारो ने अपने धंधे के बारे में आगे बताया कि उन के इस धंधे में कई लोगों का हिस्सा होता है. उन का वह नाम नहीं जानती है. हां, चेहरा देखने पर जरूर पहचान लेगी. पकड़े गए युवकों में एक रमेश 28 वर्ष, सुमित कुमार 29 वर्ष एवं राठौर 30 वर्ष ने बताया कि वे सभी वाराणसी शहर के ही निवासी हैं. पुलिस हिरासत में आने के बाद वे बारबार अपने बयानों को पलटते हुए अपना सही पताठिकाना बताने से कतराते रहे. उन का कहना था कि उन्हें वहां धोखे से लाया गया था, लेकिन जब पुलिस ने सख्ती दिखाई तब उन्होंने इस धंधे में शामिल होना स्वीकार कर लिया.

इसी प्रकार पुलिस टीम ने पकड़ी गई दूसरी लड़कियों और लड़कों से अलगअलग कमरों में पूछताछ के बाद पांचों के खिलाफ 29 मई, 2021 को देह व्यापार अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर लिया गया. उन की डाक्टरी जांच करवाई गई. बाद में उन्हें न्यायालय में पेश कर न्यायिकहिरासत में भेज दिया गया. कथा के लिखे जाने तक किसी भी आरोपी को जमानत नहीं मिल पाई थी.

सैक्स कारोबार का गढ़ बनता जा रहा है मड़ुआडीह 

वाराणसी में सैक्स अपराध का धंधा कोई नया नहीं है. दिल्ली के जीबी रोड, इलाहाबाद, मेरठ इत्यादि शहरों की तरह वाराणसी का मड़ुआडीह इलाका सैक्स बाजार के रूप में कुख्यात बताया गया है. जानकारों की मानें तो वाराणसी में पड़ोसी देश नेपाल से ले कर देश के कई राज्यों मसलन असम, बिहार, ओडिशा, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र इत्यादि से कम उम्र की लड़कियां बुलाई जाती हैं. उन से सैक्स के लिए मोबाइल फोन से संपर्क साधा जाता है. उन का अपना नेटवर्क बना हुआ है.

हाल के महीनों में जिस तेजी के साथ वाराणसी में एक पर एक कई जगहों पर सैक्स रैकेट का पुलिस ने खुलासा किया है, उसे देख कर इस बात को बल मिलने लगा है कि इस गिरोह की जड़ें वाराणसी में काफी गहरी हो चुकी हैं. वाराणसी के पौश इलाकों में से जगतगंज के कैलगढ़ कालोनी में 31 मई, 2021 को एक सैक्स रैकेट का खुलासा हुआ था. तब पुलिस ने एक मकान के फर्स्ट फ्लोर पर चल रहे रैकेट का खुलासा करते हुए 3 युवतियों समेत 6 लोगों को पकड़ा था. पुलिस के अनुसार सैक्स रैकेट के लिए लड़कियां फोन द्वारा बुलाई जाती थीं. फोन पर ही ग्राहकों से सौदा तय हो जाता था.

गिरफ्तार युवतियों में एक प्रयागराज की और 2 वाराणसी की थीं. गिरफ्तार युवकों में शिवपुर के लक्ष्मणपुर निवासी सोनू पटेल, चोलापुर के अतुल सिंह और रोहनिया के राजेश सिंह शामिल थे. सैक्स रैकेट की सूचना मिलने पर रात में छापेमारी की गई थी. इस मामले में मकान मालिक ने बगैर पुलिस सत्यापन के मकान किराए पर उठा लिया गया था. एक अन्य मामला वाराणसी के नाटी इमली मोहल्ले के नई बस्ती का भी सामने आया. वहां के रिहायशी इलाके के एक मकान में जब 30 मई, 2021 को छापेमारी की गई तब सैक्स रैकेट का भंडाफोड़ हुआ.  मौके से मकान मालकिन और 2 युवतियों की गिरफ्तारी हुई. पुलिस की काररवाई के दौरान 2 युवक चकमा दे कर भाग गए.

पुलिस ने मकान से छापे के दौरान कई आपत्तिजनक सामान भी बरामद किए. महिला और दोनों युवतियों के खिलाफ जैतपुरा थाने में मुकदमा दर्ज किया गया. मौके से भागे खोजवां निवासी राकेश गुप्ता सहित 2 युवकों की तलाश में पुलिस की टीमें लगाई गईं. नाटी इमली क्षेत्र की नई बस्ती स्थित इस मकान में सैक्स रैकेट चलाए जाने की सूचना पा कर जैतपुरा थाने की पुलिस ने एसीपी (चेतगंज) नितेश प्रताप सिंह के निर्देशानुसार इंसपेक्टर (जैतपुरा) शशिभूषण राय के साथ चिह्नित मकान में छापा मारा था. मकान मालकिन और दोनों युवतियों के खिलाफ देह व्यापार अधिनियम के तहत मामले दर्ज किए गए.

इस तरह से एक सप्ताह के भीतर ही वाराणसी पुलिस ने कई सैक्स ठिकानों पर की छापेमारी की. इस में वाराणसी के चेतगंज थाना की पुलिस ने 29 मई को पिशाचमोचन स्थित कालोनी में किराए के मकान में छापेमारी के अलावा 31 मई को चेतगंज थाने की पुलिस ने लहुराबीर क्षेत्र के कैलगढ़ कालोनी स्थित अपार्टमेंट में किराए के फ्लैट में छापेमारी कर 3 युवतियों और 3 युवकों को गिरफ्तार कर लिया. इस के पहले भी वाराणसी की घनी आबादी वाले रिहायशी इलाके में देह व्यापार का धंधा बीते कुछ महीनों में काफी फलफूल गया था.

जैतपुरा, लालपुर, पांडेयपुर, और चेतगंज थाना क्षेत्रों में जो भी सैक्स रैकेट पकड़े गए, वह घनी आबादी वाले रिहायशी इलाकों में स्थित किराए के मकानों में संचालित हो रहे थे. इस संबंध में डीसीपी काशी जोन अमित कुमार ने सभी थानाप्रभारियों को किराएदारों के सत्यापन करवाने का निर्देश दिया है. UP Crime Story

—कथा में कुछ पात्रों के नाम काल्पनिक एवं पुलिस सूत्रों व समाचार पत्रों पर आधारित है

Real Crime Stories: आईपीएस शिवदीप लांडे – रियल हीरो

Real Crime Stories: आप ने दबंग छवि वाले कई पुलिस अफसरों को बड़े परदे पर देख कर तालियां बजाई होंगी. लेकिन, सही मायने में हमारे असल हीरो वो अफसर हैं, जो समाज में फैली गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार तथा अराजकता को जड़ से खत्म करने का काम करते हैं. वर्दी पहनने का मौका तो बहुतों को मिलता है. लेकिन इस वर्दी का दम बहुत कम लोग ही दिखा पाते हैं. शिवदीप वामनराव लांडे एक ऐसे आईपीएस हैं जो बस एक पुलिस अफसर ही नहीं, बल्कि अनगिनत कहानियों के पात्र हैं. वैसे अफसर जिन के बारे में लोग बस कल्पना करते हैं, हकीकत में ऐसा इंसान सामने देखना अजूबा लगता है.

शिवदीप वामनराव लांडे एक समय बिहार के गुंडेबदमाशों के लिए खौफ बन गए थे. इन से छुटकारा पाने का सिर्फ एक ही रास्ता था और वो था इन का ट्रांसफर. इस बेखौफ आईपीएस अफसर ने फिल्मी स्टाइल में बिहार के ला ऐंड और्डर को कायम किया था. वैसे कहने को तो शिवदीप लांडे पुलिस अधिकारी हैं, लेकिन उन की भूमिका किसी फिल्मी हीरो से कम नहीं रही. बात चाहे उन के आईपीएस बनने की हो, उन के काम करने के तरीके की हो, लोगों के दिलों में उन के प्रति प्यार और सम्मान की हो या फिर उन की प्रेम कहानी की. हर तरह से उन की कहानी किसी ब्लौकबस्टर फिल्म की कहानी जैसी लगती है.

शिवदीप वामनराव लांडे का जन्म 29  अगस्त, 1976 को महाराष्ट्र के अकोला जिले के परसा गांव में एक किसान परिवार में हुआ था. शिवदीप के पिता ने तीन बार 10वीं की परीक्षा दी. लेकिन पास न हो सके. वहीं उन की मां भी केवल 7वीं तक पढ़ पाईं थीं. ऐसे में शायद शिवदीप भी एक किसान बन कर रह जाते. मगर ऐसा नहीं हुआ. क्योेंकि उन के सपने बडे़ थे. उन्होंने कड़ी मेहनत से पढ़ाई की और निष्ठा व लगन से वह सपना पूरा कर दिखाया, जिसे उन के पिता पूरा नहीं कर पाए थे. दरअसल, बचपन से ही उन में कुछ अलग हट कर करने का जुनून था. घरपरिवार में कई तरह के अभाव थे. घर की तमाम मजबूरियां और कमियों के बावजूद बाधाएं उन के पैरों की बेडि़यां नहीं बन सकीं.

2 बडे़ भाइयों से छोटे शिवदीप ने स्कौलरशिप प्राप्त कर इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की. इस के बाद उन्होंने मुंबई में रह कर यूपीएससी की तैयारी की.

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शिवदीप लांडे की परवरिश एक सामान्य परिवार में हुई थी. चूंकि मातापिता अधिक पढ़ेलिखे नहीं थे, इसलिए परिवार की तरफ से पढ़ाई के प्रति कोई दबाव या प्रेरणा नहीं मिलती थी. भले ही उन का जन्म साधारण परिवार में हुआ था. लेकिन शिवदीप के सपने बहुत ऊंचे थे. बचपन से हिंदी फिल्में देखने का शौक रहा था. जिस में अक्सर फिल्म के नायक को पुलिस अफसर के किरदार में बदमाश खलनायक का अंत करते देख वे रोमांचित हो उठते थे. वह अकसर नायक में खुद की छवि देख कर कल्पना लोक में विचरण करने लगते.

बस इन्हीं कल्पनाओं के बीच मन में एक विचार जन्मा कि क्यों न बड़े हो कर ऐसा ही दंबग पुलिस अफसर बना जाए और गुंडों का खात्मा किया जाए. इसीलिए कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी ऊंची शिक्षा पूरी की. महाराष्ट्र के श्री संत गजानन महाराज इंजीनियरिंग कालेज, शेगांव से इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने मुंबई में रह कर संघ लोक सेवा आयोग की तैयारी की.

अच्छी सर्विस छोड़ बने आईपीएस

हालांकि शिवदीप एक प्रतिष्ठित कालेज के प्रोफेसर तथा उस के बाद राजस्व विभाग में आईआरएस के पद पर भी कार्यरत रहे. लेकिन इसी बीच 2006 में उन का संघ लोक सेवा आयोग में चयन हो गया. उन का चयन आईपीएस के लिए हुआ और उन्हें बिहार कैडर मिला. 2 साल प्रशिक्षण का काम पूरा किया. शिवदीप लांडे की पहली नियुक्ति 2010 में मुंगेर जिले के नक्सल प्रभावित जमालपुर इलाके में हुई थी. अपनी पहली पोस्टिंग से ही वे मीडिया की सुर्खियों में रहे थे. लेकिन पटना में तैनाती के दौरान अनोखी कार्यशैली के कारण उन का यह कार्यकाल आज तक अविस्मरणीय है, जिस के कारण शिवदीप पूरे देश में प्रसिद्ध हो गए थे.

पुलिस महकमे में शिवदीप किसी बौलीवुड फिल्मों की कहानी के पात्र की तरह सामने आए थे. जब शिवदीप पटना आए थे, तब शहर गुंडों से त्रस्त था. तमंचे वाले तो थे ही. शरीफ गुंडे भी थे. दवाई वाले गुंडे जो बंदूक नहीं रखते थे, पर दवाओं का अकाल पैदा कर देते थे. शहर में ब्लैक मार्केटिंग कर के शराब की दुकानें जरूरत से ज्यादा खुल गई थीं, लेकिन बिना लाइसेंस के.

10 महीनों में शिवदीप ने शहर को रास्ते पर ला दिया और यह सब कुछ फिल्मी स्टाइल में होता था. यह नहीं कि पुलिस गई और गिरफ्तार कर के ले लाई. नए तरीके आजमाए जाते थे. कभी शिवदीप बहुरुपिया बन के जाते तो कभी लुंगीगमछा पहन के पहुंच जाते. कभी चलती मोटरसाइकिल से जंप मार देते तो कभी किसी की चलती मोटरसाइकिल के सामने खड़े हो जाते. शिवदीप ने पटना को 9 महीने सेवा दी और इन 9 महीनों में उन्होंने यहां के लोगों, खासकर लड़कियों के दिल में एक खास तरह का प्रेम और सम्मान बना लिया.

दरअसल, ये वह दौर था जब पटना में आवारा लफंगों के कारण स्कूली लड़कियों व महिलाओं का सड़कों पर निकलना बेहद मुश्किल था. आवारा गुंडे लड़कियों को न सिर्फ छेड़ते और भद्दे कमेंट करते थे, बल्कि कई बार तो जहांतहां छू भी देते. ऐसे समय में हुई शिवदीप लांडे की एंट्री. वह पटना के नए एसपी बन कर पहुंचे थे. लड़कियों की यह परेशानी जब उन तक पहुंची, तो वे खुद कालेज की लड़कियों से मिलने जाने लगे. लांडे ने सब को अपना नंबर दिया और एक ही बात कही कि जब कोई तंग करे तो उन्हें काल करें या एसएमएस करें. लड़कियों ने यही किया.

उन्होंने सड़कछाप रोमियो को सबक सिखाने के लिए पुरुष व महिला पुलिसकर्मियों के सादा लिबास दस्ते तैयार किए. इस के साथ ही शिवदीप भी कालेजों तथा सार्वजनिक स्थलों पर राउंड मारने लगे. वह शायद पहले आईपीएस थे जो मोटरसाइकिल पर गश्त लगाते थे. एक फोन पर शिवदीप अपनी बाइक उठा कर अकेले ही निकल जाते और अगले ही पल वे लड़कियों की मदद के लिए वहां मौजूद होते. कितने मनचले धरे गए, कई मौके पर सीधे भी किए गए. देखते ही देखते लड़कियों में हिम्मत आने लगी, उन का डर खत्म होने लगा. यही वजह थी लड़कियों के मन में शिवदीप के प्रति स्नेह और सम्मान की. लांडे ने यहां मनचलों को खूब सबक सिखाया.

कुछ ही महीनों में उन्होंने पटना शहर की सड़कों को मजनुओं की टोलियों से मुक्त करा दिया. लड़कियां खुद को सुरक्षित महसूस करने लगी थीं. शहर की हर छात्रा के मोबाइल में उन का नंबर होता था, किसी को जरा भी परेशानी होती तो नंबर मिलाते ही शिवदीप लांडे अपनी टीम के साथ पीडि़त छात्रा के सामने हाजिर हो जाते. पटना में शिवदीप लांडे की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि राजनीतिक दबाव में सरकार ने पटना से जब उन का अररिया तबादला कर दिया तो लोगों ने कैंडल मार्च निकाल कर सरकार के इस फैसले का विरोध किया था. पटना के इतिहास में किसी पुलिस अधिकारी के लिए ऐसा पहली बार हुआ था.

स्थानांतरण के बावजूद पटना के लोगों में उन के प्रति दीवानगी आज तक कायम है. उन्हें आज भी पटना की स्कूली छात्राओं के फोन और एसएमएस आते रहते हैं. लांडे के नएनए आइडियाज की वजह से उन के कार्यकाल में पटना का क्राइम रेट कम हो गया था.

जहां भी रहे, गलत कामों पर रही नजर

पटना की तरह ही रोहतास जिले में भी शिवदीप लांडे ने अपने कार्यकाल के दौरान खनन माफियाओं की नींद उड़ा दी थी.  दरअसल रोहतास, औरंगाबाद, कैमूर में खनन और रोड माफिया का छत्ता बड़ा पुराना है. इस छत्ते में सभी दलों के लोग शामिल हैं. कभी राजद का हल्ला होता, तो कभी भाजपा का शोर मचता था. संदीप लांडे जब रोहतास के एसपी बने, तो उन्होंने भी इस खेल को उजाड़ने में कसर नहीं छोड़ी. हांलाकि कुछ समय बाद रोहतास एसपी के पद से 2015 में लांडे की विदाई कैसे हुई, पुलिस महकमे में यह बात सब को पता है. क्योेंकि बिहार में राजनीतिक दबाव इतना हावी रहता है कि कोई भी पुलिस अधिकारी स्वतंत्र तरीके से काम कर ही नहीं सकता.

बहरहाल, अपनी दबंगई के कारण शिवदीप को रोहतास में भी कई बार अपनी जान तक जोखिम में डालनी पड़ी. उन दिनों शिवदीप रोहतास के एसपी थे. इन्होंने खनन माफिया की नाक में दम कर रखा था. उधर दुश्मन भी घात लगाए रहते थे. एक रोज शिवदीप अवैध खनन रोकने निकले. लेकिन वे इस बात से अनजान थे कि दुश्मन उन की जान लेने के लिए घात लगाए बैठे हैं. शिवदीप जैसे ही वहां पहुंचे, उन पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी गई.

30 से ज्यादा राउंड फायर हुए. पूरा फिल्मी सीन बन गया था. फर्क बस इतना था कि यहां कोई कट बोल कर फायरिंग रोकने वाला नहीं था. न ही बहने वाला खून नकली था. जो भी हो रहा था सब असली था. शिवदीप हटे नहीं, डटे रहे. अंत में शिवदीप के आगे गुंडे पस्त हो गए. इस के बाद शिवदीप ने खुद जेसीबी मशीन चला कर अवैध खनन की सारी मशीनें उखाड़ फेंकी, साथ ही 500 लोगों को गिरफ्तार करवाया. पश्चिम बिहार के रोहतास जिले के एसपी के तौर पर 6 महीने में ही लांडे ने अपने कारनामों से लोगों को अपना दीवाना बना लिया था. खनन माफिया से टकराव के बाद शिवदीप लावारिस छोड़ी गई नवजात बच्चियों के पालनहार के रूप में भी सुर्खियों में रहे.

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दरअसल, अपनी तैनाती के कुछ दिन बाद ही रोहतास के सासाराम स्थित जिला मुख्यालय से 2 किलोमीटर दूर गोटपा गांव के पास रेलवे ट्रैक के निकट भैरव पासवान को एक बच्ची लावारिस हालत में शाल में लिपटी मिली थी. 45 साल के पासवान और उन की पत्नी कलावती के कोई बच्चा नहीं था, इसलिए वह इस नवजात को अपनाना चाहते थे. लेकिन बच्ची की बीमारी के चलते उन्हें डर था कि वह इसे खो देंगे. जब भैरव और उन की पत्नी को कुछ समझ नहीं आया कि क्या करें, कहां जाएं तो उन्होंने जिला पुलिस के मुखिया लांडे से संपर्क किया.

पासवान को मुसीबत में देख लांडे ने चंद मिनटों के अंदर मुफस्सिल पुलिस स्टेशन के इंचार्ज विवेक कुमार को पासवान के घर भेजा जो बीमार बच्ची को पुलिस की गाड़ी में ले कर तुरंत जिला अस्पताल पहुंचे. इस के बाद लांडे खुद अपनी डाक्टर पत्नी के साथ अस्पताल पहुंचे. बच्ची को स्पैशल न्यू बोर्न केयर यूनिट में भरती कराया गया. इस के बाद एसपी लांडे ने डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के चेयरमैन को बुला कर बच्ची को दिए जाने वाले जरूरी इलाज पर बातचीत की. लांडे की इस नेकदिली के कारण बच्ची पूरी तरह सुरक्षित रही. बच्ची को लाने वाला पासवान इस बात पर हैरान था कि वह एक गरीब आदमी है, अगर लांडे साहब और उन की पत्नी ने उस की मदद न की होती तो कोई उम्मीद नहीं थी कि बच्ची जीवित रह पाती.

बच्ची के पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद शिवदीप लांडे के हस्तक्षेप से पासवान ने बच्ची को गोद लेने की प्रक्रिया पूरी करवाई. लावारिस नवजात बच्चियों के प्रति शिवदीप लांडे के भावनात्मक प्रेम को इसी बात से समझा जा सकता है कि साल 2012 में जब वह अररिया में एसपी थे, तब भी उन्होंने एक नवजात बच्ची की जान बचाई थी. जिसे उस की मां ने कड़कती ठंड में उन के सरकारी आवास के गेट के बाहर छोड़ दिया था. मासूम का रोना सुन कर लांडे घर से बाहर आए और उसे अपने सीने से लगा कर अंदर ले गए. बच्ची को गरमी का एहसास कराने और उस की सांसें सामान्य होने के बाद उन्होंने उसे सीडब्ल्यूसी की अध्यक्ष रीता घोष के पास पहुंचा दिया, जहां उस का जरूरी उपचार हो सका.

इस के अलावा जब वह पटना के एसपी सिटी थे, तब भी उन्होंने एक नवजात बच्ची को उस समय बचाया था जब एक प्राइवेट अस्पताल द्वारा ढाई लाख रुपए का बिल बनाने के कारण उस का पिता उसे अस्पताल में ही छोड़ गया था. एसपी सिटी रहते जब इस बात की जानकारी शिवदीप लांडे को हुई तो वह बच्ची की मां का पता लगाने के लिए इस हद तक गए कि पूर्वी बिहार के कटिहार जिले में उस के घर तक जा पहुंचे. वहां पहुंचने पर पता चला कि अस्पताल के पैसे न चुकाने के कारण बच्ची के पिता ने अपनी पत्नी से बता रखा था कि जन्म के दौरान ही उस की मौत हो गई और वहीं उस का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

लांडे ने बच्ची को ही उस के घर तक नहीं पहुंचाया बल्कि उस के इलाज का भी इंतजाम किया, जिस से वह जिंदा रह सकी. खनन माफिया से टकराव के कारण भले ही लांडे का तबादला कर दिया गया. लेकिन वह जहां भी रहे, अपराध और अपराधियों से कभी समझौता नहीं किया.

अनोखी है शिवदीप की प्रेम कहानी

अब जब सब कुछ फिल्म जैसा था, तो भला शिवदीप की शादी आम कैसे होती. शिवदीप द्वारा महिला सुरक्षा के लिए उठाए गए कदम तथा उन की छवि के कारण लड़कियां उन पर मरती थीं. उन के फोन का मैसेज बौक्स हमेशा भरा रहता था. लेकिन इसे शिवदीप ने स्नेह से बढ़ कर और कुछ नहीं माना. क्योंकि उन की प्रेम कहानी तो कहीं और ही लिखी जानी थी. शिवदीप जो उस वक्त बिहार में कर रहे थे, उस की हवा उन के गृहराज्य महाराष्ट्र में भी बह रही थी. उन के कारनामों तथा लुक के कारण वहां भी शिवदीप की खूब चर्चा थी. शिवदीप मुंबई में रह कर पढ़े थे. इस कारण यहां उन का अच्छाखासा फ्रैंड सर्कल था. बिहार में होने के बावजूद वह दोस्तों से मिलने मुंबई जाया करते थे.

ऐसे ही शिवदीप एक दोस्त के किसी समारोह में उपस्थिति दर्ज कराने मुंबई गए थे. इसी पार्टी में उन की मुलाकात एक लड़की से हुई. लड़की का नाम था ममता शिवतारे. शिवदीप एसपी थे, तो ममता भी कम नहीं थी. ममता शिवतारे महाराष्ट्र सरकार में मंत्री और पुणे के पुरंदर से एमएलए विजय शिवतारे की बेटी थीं. यहीं दोनों की मुलाकात हुई. इस एक मुलाकात के बाद मुलाकातों का सिलसिला बढ़ने लगा. जिस का नतीजा यह निकला कि दोनों प्यार में पड़ गए. यह प्यार आगे चल कर शादी में बदल गया. बस ममता और शिवदीप ने 2 फरवरी, 2014 को शादी कर ली और एकदूसरे को जन्मजन्मांतर के लिए अपना मान लिया.

दिल तो कई लड़कियों के टूटे मगर शिवदीप का घर बस गया. परिवार में पत्नी ममता और उस के बाद दोनों के प्यार की निशानी के रूप में जन्म लेने वाली बेटी अरहा अब उन के जीवन की प्रेरणा बन चुकी है. शिवदीप लांडे जहां भी रहे,  जिस तरह अपराधियों की कमर तोड़ी, मीडिया ने उस से उन की ‘दबंग’ पुलिस अधिकारी की छवि बना दी. लेकिन वास्तव में वह अपनी ड्यूटी पर जितना सख्त नजर आते थे, निजी जीवन में उतने ही विनम्र.

यह न समझा जाए कि शिवदीप केवल गुंडे बदमाशों को सबक सिखाने भर के ही हीरो रहे हैं. इस दबंग अफसर के पीछे एक कोमल दिल वाला नायक छिपा बैठा है. एक तरफ जहां शिवदीप अपराधियों के लिए काल का रूप साबित हुए, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने जरूरतमंदों की दिल खोल कर मदद की. विवाह से पहले वे अपने वेतन का 60 प्रतिशत एनजीओ को दान कर देते थे. हालांकि शादी और एक बेटी के जन्म  के बाद दान में कमी जरूर आई है परंतु बंद नहीं हुआ है. वेतन का 25 से 30 प्रतिशत भाग वे आज भी दान में दे देते हैं. इस के अलावा कई सामाजिक कार्यों में भी वह सहयोग करते हैं. उन्होंने कई गरीब लड़कियों का सामूहिक विवाह भी करवाया.

छोटेमोटे चोरउचक्कों से ले कर बड़ेबड़े माफिया तक में शिवदीप का खौफ था. उन्होंने लैंड माफिया से ले कर मैडीसिन माफिया तक की कमर तोड़ी. हालांकि, इन सब की वजह से उन्हें बारबार ट्रांसफर की तकलीफ झेलनी पड़ी. लेकिन उन का जहां से भी ट्रांसफर हुआ, वहां की आम जनता ने उन के जाने का दुख मनाया.

अब तैनाती महाराष्ट्र में

वर्तमान में शिवदीप लांडे केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर महाराष्ट्र के पुलिस विभाग में मुंबई पुलिस क्राइम ब्रांच के एंटी नारकोटिक्स सेल में एडीशनल कमिश्नर औफ पुलिस के रूप में सेवारत हैं और मादक पदार्थ तस्करों की कमर तोड़ रहे हैं. जब आप लीक से हट कर कुछ करते हैं तो आप का नाम सुर्खियों में आना स्वभाविक है. वैसे तो शिवदीप लांडे ने अपनी पुलिस की नौकरी के सारे फैसले लीक से हट कर ही लिए. लेकिन कई मौकों पर उन के नाम की खूब धूम मची. ऐसा एक मौका तब भी आया, जब शिवदीप ने एक लड़की को 3 शराबियों के गिरोह से मुक्त कराया था.

इसी तरह मुरादाबाद के एक इंस्पेक्टर को भेष बदल कर उन्होंने रिश्वत लेते रंगेहाथ पकड़ा था. यह जनवरी, 2015 की घटना है. शिवदीप को जानकारी मिली कि मुरादाबाद के इंस्पेक्टर सर्वचंद 2 व्यापारी भाइयों से उन का पुराना केस खत्म करने के बदले में पैसे की मांग कर रहे हैं. इस बात को साबित करने के लिए शिवदीप तुरंत सिर पर दुपट्टा लपेट कर पटना के डाक बंगला चौराहे पर पहुंच गए. उन की जानकारी के अनुसार इंसपेक्टर पैसे लेने के लिए यहीं आने वाला था. इंसपेक्टर जैसे ही वह पैसे लेने वहां पहुंचा, वैसे ही भेष बदल कर वहां इंतजार कर रहे शिवदीप ने उसे गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद मीडिया में शिवदीप का नाम खूब उछला था.

अच्छा काम करने के बावजूद बारबार तबादला किए जाने से परेशान शिवदीप लांडे ने बाद में बिहार छोड़ने का मन बना लिया. उन्होंने केंद्रसरकार से अपने गृह राज्य महाराष्ट्र लौटने की इच्छा जताई. शिवदीप लांडे के ससुर और महाराष्ट्र सरकार में तत्कालीन जल संसाधन मंत्री विजय शिवतारे ने खुद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से जब उन की पैरवी की तो यह काम और भी आसान हो गया. हालांकि अब शिवदीप भले ही बिहार से जा चुके हैं. लेकिन उन का एक्शन मूड अभी भी जारी है. शिवदीप इन दिनों मुंबई एंटी नारकोटिक्स सेल क्राइम ब्रांच में डीआईजी के पद पर हैं. डांस बार में छापेमारी के साथसाथ कई बार नशीले पदार्थों की धरपकड़ के कारण उन का नाम यहां भी सुर्खियों में बना रहता है.

इसी साल जनवरी में शिवदीप फिर से चर्चा में तब आए, जब उन्होंने हेरोइन तस्करों को पकड़ने के लिए आटो ड्राइवर का भेष बनाया था. इस छापेमारी में मुंबई पुलिस ने 12 करोड़ की हेरोइन बरामद की थी. एक तरह से शिवदीप ने साबित कर दिया है कि चाहे जगह जो भी हो, उन का लक्ष्य एक ही रहेगा, और वो है अपने दबंग स्टाइल में अपराध और अपराधियों का खात्मा करना. इसे एक अधिकारी की लोकप्रियता ही कहेंगे कि जब मुंगेर से शिवदीप का तबादला हुआ तो 6 किलोमीटर तक फूलों की बारिश करते हुए लोगों ने उन्हें विदा किया था. भीषण ठंड में जब पटना से उन का तबादला हुआ तो लोगों ने कई दिनों तक भूख हड़ताल और प्रर्दशन किए.

अररिया जिले से तबादला हुआ तो लोगों ने 48 घंटों तक उन्हें जिले से बाहर ही नहीं जाने दिया. रोहतास में खनन माफियाओं के खिलाफ उन की मुहिम में हमेशा लोगों का साथ मिला. लांडे की पुलिस विभाग में जहां भी नियुक्ति रही, वह लोगों की आंख का तारा बन कर रहे. लोगों ने उन्हें अपनाया. मीडिया ने उन्हें ‘दबंग’, ‘सिंघम’, ‘रौबिनहुड’ और न जाने कितने उपनाम दिए, लेकिन उन के अपने उन्हें  ‘शिवदीप’ नाम से बुलाते हैं. दंबग फिल्म में सलमान खान ने चुलबुल पांडे नाम के जिस पुलिस अफसर का किरदार निभाया है, उन में से अधिकांश किस्से आईपीएस शिवदीप लांडे की रीयल जिंदगी से जुडे़ है. ऐसा कहा जाता है कि सलमान खान ने यह फिल्म आईपीएस अफसर लांडे को केंद्र में रख कर ही बनाई थी, बस इस में कुछ बदलाव कर दिए गए थे. Real Crime Stories