ज्योति ने बुझाई पति की जीवन ज्योति

सनकी ‘मोबाइल चिपकू’ का कारनामा

उस समय रात के 8 बज रहे थे. विनोद तुरंत अपने जीजा ओमप्रकाश के घर पहुंचा. घर का दरवाजा अंदर से बंद था. काफी देर तक दरवाजा खटखटाने के बाद अंदर से कोई आवाज नहीं आई. विनोद जोरजोर से दरवाजा पीटने लगा, तो भीतर से ओमप्रकाश की आवाज आई. विनोद ने जब अपनी बहन नीतू के बारे में पूछा, तो उस ने दरवाजा खोले बगैर ही कह दिया कि वह काफी देर पहले घर से निकल चुकी है.

विनोद उस की बात मानने को तैयार नहीं था. उस ने जब दरवाजे पर धक्का मारना शुरू किया, तो ओमप्रकाश ने अंदर से कहा, ‘‘कुछ देर ठहरो, मैं कपड़े पहन कर बाहर निकलता हूं.’’

5 मिनट बाद घर के पिछले हिस्से में किसी के कूदने की आवाज सुनाई पड़ी, तो विनोद के कान खड़े हो गए. उस ने दोबारा दरवाजा खटखटाया, तो कोई आवाज नहीं आई. उस के बाद विनोद घर के पिछले हिस्से में गया और दीवार फांद कर घर के अंदर कूद गया. अंदर जाने पर देखा कि दोनों कमरों के दरवाजे पर भी ताले लटके हुए थे.

उस ने फिर दरवाजा खटखटाया, पर अंदर से कोई आवाज नहीं आई. उस ने एक कमरे के दरवाजे का ताला तोड़ा, तो देखा कि उस के दोनों मासूम भांजे जमीन पर ही पड़े हुए थे. उन्हें जगाने की कोशिश की गई, तो उन के जिस्म में कोई हलचल नहीं हुई.

दूसरे कमरे का ताला तोड़ा गया, तो वहां सुमन और नीतू बेसुध पड़ी हुई थीं. नीतू के मुंह से काफी झाग निकला हुआ था. अपनी दोनों बहनों और भांजों की ऐसी हालत देख विनोद रोने लगा और उस ने गांव के मुखिया को सूचना दी.

मुखिया के पति महेंद्र चौहान और पंचायत समिति के सदस्य बलिराम चौहान मौके पर पहुंचे और तुरंत पुलिस को खबर की. विनोद ने पुलिस को बताया कि जब उस की छोटी बहन नीतू शाम तक घर नहीं पहुंची, तो उस ने अपने जीजा ओमप्रकाश को फोन पर ही सारा माजरा बताया.

ओमप्रकाश के बात करने के लहजे से लग रहा था कि वह काफी घबराया हुआ है. कुछ देर बाद उस का मोबाइल स्विच औफ बताने लगा. इस से विनोद के मन में तरहतरह की शंकाएं उठने लगीं और वह तुरंत ओमप्रकाश के घर पहुंच गया.

झारखंड के धनबाद जिले के बरोरा थाने की प्योर बरोरा बस्ती में 19 फरवरी को बीसीसीएल में काम करने वाले मुलाजिम ओमप्रकाश चौहान ने अपनी बीवी, साली और 2 मासूम बच्चे को जहर दे कर मार डाला. चारों की लाशें घर में पड़ी मिलीं. 4 जानें लेने के बाद 35 साला ओमप्रकाश फरार हो गया.

पुलिस ओमप्रकाश की खोज में इधरउधर हाथपैर मारती रही और 20 फरवरी को धनबाद के पास ही गोमो रेलवे स्टेशन के डाउन यार्ड की 5 नंबर लाइन पर ट्रेन के सामने आ कर उस ने अपनी जान दे दी.

ओमप्रकाश झारखंड के धनबाद जिले की बरोरा ब्लौक-2 कोलियरी में काम करता था. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के मुताबिक, ओमप्रकाश की बीवी की मौत 17-18 फरवरी को ही हो चुकी थी. उसे जहर दे कर मारा गया था. सुमन, नीतू, पीयूष और हर्षित के पेट में जहर पाया गया. सभी के जिस्म में कोई भीतरी और बाहरी चोट नहीं पाई गई.

ओमप्रकाश की बीवी का नाम सुमन उर्फ तेतरी (30 साल), साली का नाम नीतू (23 साल), बड़े बेटे का नाम पीयूष(12 साल) और छोटे बेटे का नाम हर्षित  (8 साल) था. ओमप्रकाश की ससुराल फुसरो के ढोरी इलाके में है. उस की साली नीतू ढोरी में ही रह कर ब्यूटीशियन का कोर्स कर रही थी.

नीतू के भाई विनोद नोनिया और गुड्डन चौहान ने बताया कि नीतू रोज की तरह 19 फरवरी को ब्यूटीशियन की क्लास करने के लिए घर से निकली थी. शाम को जब वह घर नहीं लौटी, तो घर वालों को चिंता सताने लगी. उन्होंने नीतू की सहेली से उस के बारे में पूछा, तो सहेली ने बताया कि आज नीतू क्लास में नहीं गई थी. उस के बाद नीतू की खोज शुरू हुई.

विनोद ने अपने जीजा ओमप्रकाश को फोन कर के बताया कि नीतू घर से गायब है. ओमप्रकाश ने बताया कि नीतू उस के घर आई थी और शाम को कुछ सामान लेने के लिए बाजार की ओर गई है. उस के बाद वह घर पहुंच जाएगी.

ओमप्रकाश ने अपने सुसाइड नोट में अपनी साली को बहन की तरह बताया है, लेकिन उस के दोस्तों ने पुलिस को बताया है कि ओमप्रकाश और उस की साली के बीच नाजायज रिश्ता था और दोनों मोबाइल फोन पर घंटों बातें किया करते थे.

ओमप्रकाश के साथ काम करने वाले मजदूरों ने पुलिस को बताया है कि डंपर औपरेटर ओमप्रकाश अकसर उन के साथ बातचीत के दौरान साली से प्रेम संबंध होने की बात किया करता था. काम के दौरान भी वह घंटों अपनी साली के साथ फोन पर बातें करता रहता था. इस वजह से सभी साथी उसे मजाक में ‘मोबाइल चिपकू’ के नाम से पुकारने लगे थे.

ओमप्रकाश को उस की मां सोनवा कामिन की जगह बीसीसीएल में नौकरी मिली थी. साल 2000 में सोनवा की मौत हो गई थी. उस ने सब से पहले फुलेरीटांड कोलियरी में ड्यूटी जौइन की थी और फिलहाल वह ब्लौक-2 में डंपर औपरेटर था. उस के दफ्तर के हाजिरी बाबू अभय पांडे ने पुलिस को दिए बयान में कहा है कि ओमप्रकाश पिछले 2-3 महीने से गैरहाजिर था. वह काफी सनकी आदमी था और बातबात पर तैश में आ जाता था. उस ने कभी भी अपनी ड्यूटी सही तरीके से नहीं की.

अकसर वह पहाड़ी पर बैठ कर अपने स्मार्टफोन में मसरूफ रहा करता था. अफसरों ने उसे कई बार काम से निकालने की धमकी भी दी, लेकिन उस पर कोई असर नहीं होता था. ओमप्रकाश और सुमन की शादी साल 2003 में हुई थी. ओमप्रकाश का पैतृक घर बिहार के औरंगाबाद जिले के रफीगंज के कसमा थाने के तहत पड़ने वाले भटुकीकलां गांव में है.

ओमप्रकाश के भाई जयराम कुमार ने बताया कि 11 फरवरी को ओमप्रकाश गांव गया था. उस ने बताया कि उस का भाई अपनी साली से अकसर बातें किया करता था. 19 फरवरी की सुबह को भी ओमप्रकाश ने जयराम से बातें की थीं, लेकिन साली के साथ उस का कोई गलत रिश्ता था, इस की भनक किसी को नहीं लगी थी. नीतू के भाई विनोद ने बरोरा थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई है, जिस में कहा है कि ओमप्रकाश के साथ नीतू के किसी तरह के गलत संबंध होने की जानकारी किसी को नहीं थी.

बरोरा थाने के थानेदार प्रवीण कुमार ने बताया कि शुरुआती जांच में पता चला है कि ओमप्रकाश पिछले कुछ महीनों से काफी तनाव में था. वह लोगों से मिलता भी नहीं था. काम से लौट कर वह अपने घर में ही कैद हो जाता था.

जिद ने उजाड़ा आशियाना

अपनी ही गलती से बना हत्यारा

चाची का इश्किया भतीजा – भाग 3

डीएसपी केसर सिंह ने भी लाश का निरीक्षण किया. क्राइम टीम ने भी अपना काम कर लिया तो इंसपेक्टर जसविंदर सिंह ने लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद थाने लौट कर उन्होंने हत्या के इस मामले को दर्ज कर के स्वयं ही जांच शुरू कर दी. क्योंकि मामला एक व्यापारी की हत्या का था, इसलिए व्यापारी होहल्ला कर सकते थे. जबकि वह नहीं चाहते थे कि किसी तरह का होहल्ला हो.

हत्यारों तक जल्द से जल्द पहुंचने के लिए सबइंसपेक्टर वासुदेव सिंह के नेतृत्व में उन्होंने एक टीम बनाई, जिस में एएसआई बलकार सिंह, इंद्रपाल, हेडकांस्टेबल कुलदीप सिंह, कुलवंत सिंह, अजायब सिंह और महिला सिपाही जसविंदर कौर को शामिल किया.

पूछताछ में जसमीत कौर ने बताया था कि वह अपने पति परमजीत सिंह उर्फ सिंपल और 2 बेटों, 18 वर्षीय गुरतीरथ सिंह एवं 10 वर्षीय जसदीप सिंह के साथ कटड़ा साहिब सिंह के मकान नंबर 197/8 में रहती थी. उस के पति का अरनाबरना चौक पर कोयले का डिपो था.

कल यानी 22 मार्च की शाम 5 बजे के करीब वह किसी पार्टी के पास जाने की बात कह कर घर से निकले थे. रात 10 बजे के करीब उन्होंने फोन कर के बताया था कि वह किसी दोस्त के यहां बैठे हैं, इसलिए आने में थोड़ी देर हो जाएगी. जब काफी रात हो गई और वह नहीं आए तो जसमीत बेटों और पड़ोसियों के साथ उन्हें ढूंढने निकल पड़ी. काफी कोशिश के बाद भी उन का कुछ पता नहीं चला. आज सुबह उस के पति के भतीजे प्रीत महेंद्र सिंह ने फोन द्वारा सूचना दी कि सनौली अड्डे के पास उन की लाश पड़ी है.

पुलिस ने जब दुश्मनी वगैरह के बारे में पूछा तो जसमीत कौर ने बताया कि वह सीधेसादे शरीफ इंसान थे. काफी पूछताछ के बाद भी जसमीत कौर से ऐसी कोई बात पता नहीं चली, जिस से तफ्तीश आगे बढ़ाने में पुलिस को मदद मिलती. इंसपेक्टर जसविंदर सिंह ने परमजीत के आसपड़ोस वालों से पूछताछ की तो कुछ लोगों ने चाचीभतीजे के अवैध संबंधों की बात बता दी.

इंसपेक्टर जसविंदर सिंह को परमजीत की कोठी में सीसीटीवी कैमरे लगे दिखई दिए थे. उन्होंने हेडकांस्टेबल कुलदीप सिंह से उन कैमरों की फुटेज निकलवाने को कहा. फुटेज निकलवा कर वहीं जसमीत और प्रीत महेंद्र सिंह के सामने देखा गया. फुटेज के अनुसार हत्या वाले दिन प्रीत महेंद्र सिंह जसमीत के पास आया और कुछ बातें कीं. इस के बाद उस ने अपना पिस्टल निकाल कर चेक किया. चैंबर में एक गोली कम थी तो जेब से एक गोली निकाल चैंबर फुल किया और उसे कमर में खोंस कर चला गया.

फुटेज के ये दृश्य देख कर इंसपेक्टर जसविंदर सिंह टिवाणा पूरी कहानी समझ गए. उन्होंने प्रीत महेंद्र से पूछा, ‘‘तुम यह पिस्टल खोंस कर कहां गए थे, यह पिस्टल किस का है?’’

‘‘जी यह पिस्टल मेरा है. मेरे पास इस का लाइसैंस भी है.’’

‘‘लेकिन चुनाव की वजह से सभी को अपनेअपने हथियार जमा कराने को कहा गया है. तुम ने अपना पिस्टल क्यों नहीं जमा कराया?’’

‘‘मैं शहर से बाहर था, इसलिए जमा नहीं करा सका. कल ही जमा करा दूंगा.’’ प्रीत महेंद्र ने कहा.

परमजीत सिंह की हत्या की पूरी कहानी इंसपेक्टर जसविंदर सिंह टिवाणा की समझ में आ गई थी. लेकिन वह आगे का काम पूरे सुबूतों के साथ करना चाहते थे. उन्होंने प्रीत महेंद्र से अगले दिन अपना पिस्टल ले कर थाने आने को कहा. अगले दिन वह थाने तो गया, लेकिन अपना पिस्टल नहीं ले गया. पूछने पर उस ने कहा कि वह जल्दी में साथ लाना भूल गया.

इंसपेक्टर जसविंदर सिंह टिवाणा को लगा कि अब देर करना ठीक नहीं है, इसलिए उन्होंने एएसआई बलकार सिंह को आदेश दिया कि वह महिला सिपाही को ले कर जाएं और जसमीत कौर को थाने ले आएं.

जसमीत कौर भी थाने आ गई तो इंसपेक्टर जसविंदर सिंह टिवाणा ने दोनों को सामने बैठा कर सुबूतों के साथ मनोवैज्ञानिक ढंग से पूछताछ की तो जल्दी ही दोनों ने परमजीत सिंह की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

दरअसल, परमजीत सिंह ने हत्या से 2 दिनों पहले यानी 20 मार्च को जसमीत और प्रीत महेंद्र को आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ लिया था. हुआ यह था कि परमजीत सिंह दवा खाना भूल गया था, इसलिए घर वापस आ गया था.

संयोग से जसमीत कौर घर का दरवाजा बंद करना भूल गई थी. इसलिए परमजीत सीधे अंदर आ गया और चाचीभतीजे को उस स्थिति में देख कर हक्काबक्का रह गया. सीधासरल परमजीत पत्नी और भतीजे को कुछ कहने के बजाय रोने लगा. रोते हुए ही उस ने कहा, ‘‘तुम लोगों ने मेरे साथ ठीक नहीं किया. इसलिए वाहेगुरु तुम लोगों के साथ ठीक नहीं करेगा.’’

परमजीत बेबस था. रोधो कर चुपचाप डिपो पर चला गया. वह तो चला गया, लेकिन उस के आंसुओं से उन पापियों की आत्मा कांप उठी. दोनों डर गए. जसमीत ने प्रीत महेंद्र का कंधा पकड़ कर झकझोरते हुए कहा, ‘‘अब इस का जिंदा रहना ठीक नहीं है, क्योंकि इस के रहते मैं इस घर में नहीं रह सकती. इस के रहते मुझे हमेशा डर लगा रहेगा कि न जाने कब क्या हो जाए.’’

प्रीत महेंद्र भी डर गया था. इसलिए परमजीत के चुपचाप चले जाने के बाद ही दोनों ने उसी समय उस की हत्या की योजना बना डाली. प्रीत और उस के पिता हरदर्शन का प्रौपर्टी और फाइनैंस का काम था. वे लोगों को ब्याज पर पैसा देते थे. प्रीत का एक छोटा भाई गगनदीप सिंह है, जो बड़े भाई और पिता के इस धंधे को पसंद नहीं करता था, इसलिए वह इन से अलग उत्तर प्रदेश के नोएडा शहर में रहता था.

प्रीत महेंद्र सिंह ने योजनानुसार परमजीत को सनौली अड्डे पर यह कह कर बुलाया कि एक पार्टी मात्र एक प्रतिशत ब्याज पर अपना पैसा देना चाहती है. प्रीत महेंद्र को पता था कि उस के चाचा परमजीत को रुपयों की सख्त जरूरत है. इसलिए उस ने उस से यह बात कही थी. यही वजह थी कि उस की बात सुन कर परमजीत सिंह उस की बताई जगह पर शाम साढे 5 बजे के आसपास पहुंच गए थे. प्रीत वहीं उन्हें मिल गया.

प्रीत ने परमजीत का स्कूटर वहीं स्टैंड पर खड़ा करा दिया और उसे अपनी वैगन आर कार में बैठा कर काफी देर तक इधरउधर सड़कों पर घुमाता रहा. जब रात के लगभग 10 बज गए तो वह सीआईए रोड पर आया और बिना कोई बात किए अपने चाचा परमजीत को कार से उतार कर 4 गोलियां मार दीं. उस ने गोलियां ऐसी जगहों पर मारीं कि परमजीत तुरंत मर गया.

इस के बाद लाश वहीं छोड़ कर प्रीत अपने घर चला गया. रास्ते से उस ने परमजीत की हत्या की सूचना जसमीत कौर को दे दी थी. इसी के बाद जसमीत कौर पड़ोसियों और बेटों को साथ ले कर परमजीत को ढूंढने का नाटक करने लगी थी.

प्रीत महेंद्र और जसमीत से पूछताछ के बाद इंसपेक्टर जसविंदर सिंह टिवाणा ने 26 मार्च को दोनों को सीजेएम सिमित ढींगरा की अदालत में पेश कर के 29 मार्च तक के लिए पुलिस रिमांड पर ले लिया.

रिमांड के दौरान पुलिस ने प्रीत महेंद्र की निशानदेही पर परमजीत का स्कूटर, वह वैगन आर कार, जिस में परमजीत को ले जाया गया था, एक पिस्टल, राइफल, 16 जिंदा कारतूस और खून सने कपड़े बरामद कर लिए थे.

रिमांड समाप्त होने पर 29 मार्च को जसमीत कौर और प्रीत महेंद्र सिंह को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से दोनों को जिला जेल भेज दिया गया. जसमीत से प्यार करते समय प्रीत महेंद्र ने जो कहा था कि वह अंतिम सांस तक अपने प्यार को निभाएगा, सचमुच पूरा किया था.

चाची का इश्किया भतीजा – भाग 2

कुछ देर तक दोनों खामोश बैठे एकदूसरे को देखते रहे. जब खामोशी घुटन का रूप लेने लगी तो प्रीत महेंद्र ने कहा, ‘‘मैं ने तो सोचा था कि चाचा घर पर ही होंगे, ऐसे में कोई बात नहीं हो पाएगी.’’

‘‘वह तो आज शंभू बौर्डर गए हैं. कोयले की गाड़ी आने वाली है. अब तो वह देर रात को ही आएंगे.’’ कुछ सोचते हुए जसमीत ने कहा, ‘‘तुम्हें उन से कोई बात करनी थी क्या?’’

प्रीत ने जब सुना कि चाचा रात से पहले नहीं आएंगे तो उस के दिल में चाची को ले उथलपुथल मचने लगी. उसे लगा कि आज उस के मन की मुराद पूरी हो सकती है. जसमीत की बात का जवाब देने के बजाय वह खयालों में डूब गया तो जसमीत ने फिर कहा, ‘‘तुम ने मेरी बात का जवाब नहीं दिया प्रीत?’’

‘‘जवाब क्या दूं. आप को तो मेरे मन की बात पता ही है.’’ प्रीत महेंद्र ने कहा.

‘‘बिना बताए मुझे कैसे पता चलेगा कि तुम्हारे दिल में क्या है या तुम किस से कौन सी बात कहने आए हो?’’ जसमीत ने कहा.

जसमीत कम चालाक नहीं थी. वह प्रीत के मन की बात जानती थी, फिर भी उस के मुंह से उस के मन की बात कहलवाना चाहती थी. इसलिए गंभीरता का नाटक करते हुए बोली, ‘‘पहेलियां मत बुझाओ प्रीत, साफसाफ बताओ, क्या बात है?’’

‘‘बात बस इतनी सी है,’’ प्रीत आगे खिसक कर जसमीत का हाथ पकड़ते हुए बोला, ‘‘मुझे तुम से प्यार हो गया है.’’

प्रीत महेंद्र के ये शब्द सुन कर जसमीत की आत्मा को अजीब सी शांति मिली. उस के मुंह से ये शब्द कहलवाने के लिए उस का दिल कब से बेचैन था. इस के बावजूद वह बनावटी नाराजगी जताते हुए बोली, ‘‘अरे बदमाश, तुझे पता नहीं, मैं तेरी चाची हूं.’’

‘‘और मैं भतीजा,’’ प्रीत ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘तुम्हें पता है कि मैं तुम्हारे पति का भतीजा हूं, फिर भी तुम मुझे देख कर उसी तरह मुसकराती हो जैसे कोई लड़की अपने प्रेमी को देख कर मुसकराती है.’’

जसमीत ने प्रीत महेंद्र का हाथ दबाते हुए कहा, ‘‘तुम तो बहुत होशियार हो भाई. मन की बात जानते थे, फिर भी अपने मन की बात कहने में इतनी देर कर दी. लेकिन एक बात और, तुम यह प्यार कहां तक निभाओगे?’’

‘‘जिंदगी की आखिरी सांस तक मैं यह प्यार निभाऊंगा.’’ प्रीत महेंद्र जसमीत का हाथ छोड़ कर अपने दोनों हाथ उस के कंधों पर रख कर बोला, ‘‘यह मत समझना कि मैं ने तुम्हारा शरीर पाने के लिए तुम से प्यार किया है. यह प्यार पूरी जिंदगी निभाने के लिए किया है और हर तरह से निभाऊंगा भी.’’

‘‘सोच लो प्रीत, मुझे धोखे में रख केवल मेरे शरीर से खेलना हो तो अभी साफसाफ बता दो. हम दोनों शादीशुदा ही नहीं, 2-2 बच्चों के मातापिता हैं.’’

‘‘तुम मुझ पर भरोसा करो चाची.’’

‘‘आज के बाद फिर कभी चाची मत कहना.’’ जसमीत ने हंसते हुए प्यार से प्रीत के गाल को थपथपाते हुए कहा. इस के बाद वह उस की बाहों में समा गई. इस तरह प्यार के इजहार के साथसाथ इकरार ही नहीं हो गया, बल्कि दोनों के तन भी एक हो गए.

पल भर में रिश्तों की परिभाषा बदल गई. मन के मिलन के साथ अगर तन का मिलन हो जाए तो मिलन की चाह और अधिक भड़क उठती है. मन हमेशा महबूब से मिलने के लिए बेचैन रहता है. और अगर घर में मिलने की सहूलियत हो तो बात सोने पर सुहागा जैसी हो जाती है.

प्रीत महेंद्र सुबह 10-11 बजे जसमीत के घर आ जाता था. क्योंकि उस समय बच्चे स्कूल गए होते थे, तो परमजीत सिंह डिपो. दोनों का मिलन निर्बाध गति से चलने लगा था. लेकिन नजर रखने वालों की भी कमी नहीं है. ऐसे लोग उड़ती चिडि़या को पर से पहचान लेते हैं.

सीधेसादे परमजीत को भले ही पत्नी और भतीजे की करतूतों का भान नहीं था, लेकिन गलीमोहल्ले में चाचीभतीजे के संबंधों को ले कर खूब चर्चा होने लगी थी. यही नहीं, उड़तेउड़ते यह खबर यूएसए में रह रही परमजीत की बहनों तक तक पहुंच गई थी. उन्होंने पटियाला आ कर जसमीत और प्रीत महेंद्र को समझाया भी, लेकिन गले तक पाप के दलदल में डूबे जसमीत और प्रीत ने किसी की नहीं सुनी.

परमजीत की बहनों ने अपने चचेरे भाई यानी प्रीत महेंद्र के बाप हरदर्शन सिंह से मिल कर उस की शिकायत की कि वह अपने बेटे को समझाएं. लेकिन समझाने की कौन कहे, हरदर्शन ने ढिठाई से कहा, ‘‘तुम लोग अपनी भाभी को ही क्यों नहीं समझातीं कि वह इधरउधर मुंह न मारे.’’

परमजीत की बहनों ने किसी भी तरह पाप के इस खेल को बंद कराने के लिए किसकिस के हाथ नहीं जोड़े. लेकिन कहीं से कुछ नहीं हुआ. इतना सब करने के बावजूद उन्होंने अपने भाई को यह पता नहीं चलने दिया कि भाभी क्या कर रही है. क्योंकि उन्हें पता था कि भाभी की बेवफाई का पता भाई को चल गया तो वह आत्महत्या कर लेगा.

बहरहाल, प्रीत महेंद्र सिंह और जसमीत कौर का यह घिनौना खेल बेरोकटोक चलता रहा. परमजीत सिंह सुबह नाश्ता कर के घर से निकल जाते तो देर रात को ही लौटते थे. इस बीच घर में क्या होता है. उन्हें पता नहीं होता था.

22 मार्च, 2014 को शाम को करीब 5 बजे परमजीत सिंह जसमीत कौर को यह कह कर अपने स्कूटर से घर से निकले कि वह किसी पार्टी के पास जा रहे हैं, डेढ़-2 घंटे में लौट आएंगे. लेकिन जब वह देर रात तक घर नहीं लौटे तो जसमीत कौर को चिंता हुई. वह अपने दोनों बेटों गुरतीरथ, जसदीप और कुछ पड़ोसियों को ले कर परमजीत की तलाश में निकल पड़ी. लेकिन रात भर इधरउधर भटकने के बाद भी परमजीत का कुछ पता नहीं चला.

रात 10 बजे के आसपास परमजीत ने फोन कर के जसमीत को बताया था कि वह अपने किसी दोस्त के घर बैठा है. इस के बाद न उस का कोई फोन आया था और न ही उस के बारे में कुछ पता चला था, क्योंकि उस का फोन बंद हो गया था.

अगले दिन सुबह यानी 23 मार्च को 8 बजे प्रीत महेंद्र ने फोन द्वारा जसमीत को सूचना दी कि सीआईए रोड के सनौली अड्डे पर चाचा की लाश पड़ी है. इसी सूचना पर जसमीत दोनों बेटों और कुछ पड़ोसियों को साथ ले कर सनौली अड्डे पर जा पहुंची थी. वहां पड़ी लाश परमजीत की ही थी. किसी ने गोलियां मार कर उस की हत्या कर दी थी. जसमीत पति की लाश देख कर रोने लगी थी.

दरअसल, प्रीत महेंद्र किसी काम से सनौली अड्डे की ओर जा रहा था तो रास्ते में भीड़ देख कर रुक गया. जब उसे पता चला कि यहां कोई लाश पड़ी है तो उत्सुकतावश वह भी उसे देखने चला गया. वहां जाने पर पता चला कि वह तो उस के चाचा परमजीत की लाश है. उसे पता था कि चाचा कल शाम से लापता हैं. लेकिन इस तरह उन की लाश मिलेगी, यह उम्मीद उसे नहीं थी. उस ने तुरंत फोन द्वारा इस बात की जानकारी चाची को दे दी थी.

जसमीत तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गई थी. वह पुलिस को सूचना देने कोतवाली जा रही थी कि रात की गश्त से लौट रहे कोतवाली प्रभारी इंसपेक्टर जसविंदर सिंह टिवाणा खलिया चौक पर ही मिल गए. जसमीत ने जब उन्हें पति की हत्या के बारे में बताया तो वह कोतवाली जाने के बजाय घटनास्थल की ओर चल पड़े.

परमजीत सिंह की लाश सड़क के किनारे पड़ी थी. लाश मिलने की सूचना इंसपेक्टर जसविंदर सिंह टिवाणा ने डीएसपी (सिटी) केसर सिंह को दी तो थोड़ी देर में क्राइम टीम के साथ वह भी घटनास्थल पर पहुंच गए. लाश के निरीक्षण में उन्होंने देखा कि मृतक परमजीत सिंह को 4 गोलियां मारी गई थीं, 2 सीने में, एक पेट में दांईं ओर किडनी के पास और एक बाईं ओर पेट में. इन चारों गोलियों के खोखे भी घटनास्थल से बरामद हो गए थे.

आशिक पति ने ली जान

चाची का इश्किया भतीजा – भाग 1

सन 2003-04 में केंद्र और राज्य सरकारों के आपसी मतभेदों के कारण कोयले के दाम आसमान छूने लगे थे. उन दिनों कोयला  सामान्य मूल्य से दोगुने से भी अधिक दाम में बिक रहा था. उस स्थिति में सरदार परमजीत सिंह को कोयला खरीदना मुश्किल हो  गया था. पटियाला के अरनाबरना चौक पर उन का कोल डिपो था. उन का यह काफी पुराना व्यवसाय था. लेकिन कोयले की आसमान छूती कीमतों से उन के इस व्यवसाय को गहरा झटका लगा था.

कोयले के दाम तो बढ़ ही गए थे, इस के साथ एक समस्या यह भी थी कि कोयले का सौदा भी 4-6 गाडि़यों से कम का नहीं हो रहा था. धंधा करने वालों को धंधा करना ही था, इसलिए कोयला महंगा हो या सस्ता, कोयला तो मंगाना ही था. जिस भाव में माल आएगा, उसी भाव में बिकेगा भी.

कुछ अपने पास से तो कुछ ब्याज पर उधार ले कर जैसेतैसे परमजीत सिंह उर्फ सिंपल ने 6 गाड़ी कोयला मंगा लिया. संयोग देखो, परमजीत का माल आते ही केंद्र सरकार ने कोयला कंपनियों को अपने नियंत्रण में ले लिया, जिस से तुरंत कोयले की आसमान छूती कीमतें घट कर सामान्य हो गईं.

परमजीत सिंह का तो दीवाला निकल गया. महंगे भाव पर खरीदा गया कोयला उन्हें मिट्टी के भाव बेचना पड़ा. जिस की वजह से उन्हें मोटा घाटा हुआ. इस घाटे से उन्हें गहरा सदमा लगा और वह बीमार रहने लगे. घाटा हो या मुनाफा, परमजीत ने जिस के पैसे लिए थे, उस के पैसे तो देने ही थे.

इस तरह परमजीत सिंह की हालत काफी खराब हो गई. मिलनेजुलने वाले, यारदोस्त, नातेरिश्तेदार आते और सांत्वना दे कर चले जाते. कोई मदद की बात न करता. उस समय उन की इस परेशानी में उन का भतीजा प्रीत महेंद्र सिंह काम आया. उस ने चाचा की मदद ही नहीं की, हर तरह से साथ दिया. बीमारी का इलाज तो कराया ही, व्यवसाय को फिर से जमाने के लिए मोटी रकम भी दी.

जब तक सब ठीक नहीं हो गया, प्रीत महेंद्र दोनों समय परमजीत सिंह के घर आताजाता रहा. दवा आदि की ही नहीं, घर की जरूरत की अन्य चीजों का भी उस ने खयाल रखा. इसी का नतीजा था कि परमजीत सिंह ने जल्दी स्वस्थ हो कर अपना व्यवसाय फिर से संभाल लिया. परमजीत के ठीक होने के बाद भी प्रीत महेंद्र का उन के घर आनेजाने का सिलसिला उसी तरह जारी रहा.

अब इस की वजह चाचा की बीमारी नहीं, खूबसूरत चाची जसमीत कौर उर्फ गुडि़या थी. दरअसल जब से प्रीत महेंद्र ने चाची जसमीत कौर को देखा था, तभी से उस के मन में एक अजीब सी उथलपुथल मची हुई थी. चाचा से शादी के समय ही वह चाची की सुंदरता पर मर मिटा था.

इस में उस का दोष भी नहीं था. जसमीत थी ही इतनी खूबसूरत. कश्मीर के सेब की तरह गोल और गुलाबी रंग का उस का चेहरा ताजे खिले गुलाब की तरह दमकता था. उस का शरीर भी सांचे में ढला बहुत ही आकर्षक था. 2 बच्चों की मां होने के बाद भी उस की खूबसूरती में कोई कमी नहीं आई थी.

प्रीत महेंद्र ने चाचा के साथ जो किया था, वह छोटीमोटी बात नहीं थी. इसलिए परमजीत सिंह उस का बहुत एहसान मानते थे. चाची जसमीत भी उस की बहुत इज्जत करती थी. चाचीभतीजे में पटती भी खूब थी. इस की वजह यह थी कि भतीजा ही नहीं, चाची भी अभी जवान थी. जबकि परमजीत अधेड़ हो चुका था. चाचीभतीजे ने क्या गुल खिलाया, यह जानने से पहले आइए थोड़ा इन के घरपरिवार के बारे में जान लेते हैं.

सरदार सुरेंद्र सिंह पटियाला के ही रहने वाले थे. उन का कोयले का छोटामोटा व्यवसाय था. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे परमजीत सिंह, हरमीत सिंह और 2 बेटियां थीं. हरमीत की शादी के पहले ही मौत हो गई थी. दोनों बेटियों की शादी कर दी तो वे अपनेअपने पतियों के साथ यूएसए चली गई थीं.

सुरेंद्र सिंह ने परमजीत सिंह की शादी सन 1995 में जसमीत कौर के साथ की थी. जसमीत कौर छोटी थी, तभी उस के पिता की मौत हो गई थी. जसमीत की 2 बहनें और थीं, भाई कोई नहीं था. विधवा मां ने किसी तरह तीनों बेटियों को पालापोसा. शादी लायक होने पर दोनों बड़ी बेटियों की शादी उन्होंने लखनऊ में कर दी थी. जसमीत की शादी परमजीत से कर के वह बेटियों के पास रहने लखनऊ चली गईं थीं.

जिस समय जसमीत कौर की शादी परमजीत सिंह से हुई थी, वह मात्र 16 साल की थी, जबकि परमजीत उस से 20 साल बड़ा यानी 36 साल का था. समय के साथ वह 2 बच्चों की मां बनी. लेकिन वह जवान हुई तो उस का पति बुढ़ापे की ओर बढ़ चला. जसमीत से हुए उस के दोनों बेटों के नाम थे गुरतीरथ और जसदीप.

शादी और बच्चे होने से परमजीत की जिम्मेदारियां बढ़ गई थीं. उस के खर्च के लिए पिता सुरेंद्र सिंह ने एक ईंट भट्टा खोलवा दिया था. लेकिन उस का वह भट्ठा चला नहीं. इस के बाद उस ने अपना कोयले का व्यवसाय संभाल लिया. उसी बीच सरदार सुरेंद्र सिंह की मौत हो गई तो घरपरिवार से ले कर कारोबार तक की जिम्मेदारी उसी पर आ गई.

सब कुछ लगभग ठीकठाक ही चल रहा था. लेकिन 2004 में हुए जबरदस्त घाटे ने परमजीत की कमर तोड़ दी थी. संयोग से मदद के लिए भतीजा प्रीत महेंद्र आगे आ गया था. इसी मदद के बहाने प्रीत महेंद्र का चाचा के घर आनाजाना हुआ तो उसे चाची से दिल लगाने का मौका मिल गया. परमजीत सुबह ही डिपो पर चले जाते थे.  उस के बाद भतीजा प्रीत महेंद्र उन के घर पहुंच जाता था. परमजीत ने पत्नी से कह रखा था कि वह प्रीत महेंद्र का हर तरह से खयाल रखे, क्योंकि उस ने उन्हें बहुत बड़े संकट से उबारा था.

एक दिन दोपहर को प्रीत महेंद्र चाचा के घर पहुंचा तो घर में जसमीत अकेली थी. उस ने डोरबेल बजाई तो जसमीत कौर ने दरवाजा खोला. एकदूसरे को देख कर दोनों मुसकराए. जसमीत बगल हट कर बोली, ‘‘आओ, अंदर आओ.’’

अंदर आ कर प्रीत महेंद्र सोफे पर बैठ गया. दरवाजा बंद कर के जसमीत कौर भी आ कर उस के बगल बैठ गई. जसमीत और प्रीत महेंद्र भले ही चाचीभतीजे थे, लेकिन दोनों हमउम्र थे. इसलिए कभीकभार हलकाफुलका मजाक भी कर लेते थे. लेकिन जब से उस की नीयत में खोट आई थी तब से वह खामोश रहने लगा था. ऐसा ही कुछ हाल जसमीत का भी था. शायद दोनों को ही इस बात का इंतजार था कि पहल कौन करे.

प्यार में जब पति ने अड़ाई टांग

नई नवेली दीपा ने सौतेले बेटे संग रची साजिश – भाग 3

दीपा को पता चल गया था कि बच्चे जयदेव सिंह से नफरत करते हैं, जबकि वह बच्चों पर अपना प्रेम लुटाती है. इस कारण ही वह उस के साथ भी गलत व्यवहार करता है. फिर भी उस ने बच्चों का खयाल रखने में कोई कमी नहीं आने दी. उन के लिए मनपसंद खाना बनाना, स्कूल को तैयार करना, उन के कपड़े धोना, घर की साफसफाई करना, उस की दिनचर्या में शामिल हो गया था. बच्चे भी दीपा से बहुत प्यार करने लगे थे.

दीपा के साथ दूसरी समस्या यह थी कि जयदेव उसे ले कर गलत धारणा रखता है. वह पत्नी पर शक करता था. वह उस पर बड़े बेटे के साथ अवैध संबंध होने का आरोप लगा चुका था. इस आरोप से दीपा और हरनाम सिंह दोनों दुखी हो गए थे. जयदेव उन की बातें सुनने को राजी नहीं था. इस कारण ही दीपा की पिटाई कर देता था. उस के दिमाग में शक का कीड़ा कुलबुलाता रहता था कि दीपा के उस के बड़े बेटे के साथ अवैध संबंध हैं.

शक होने पर लगवाए सीसीटीवी कैमरे

इस कारण ही जयदेव ने अपने घर पर सीसीटीवी कैमरे लगवा लिए थे और उन्हें अपने मोबाइल फोन से जोड़ लिया था. जब वह ड्यूटी पर होता था, तब वह बीचबीच में अपने घर की गतिविधियों पर एक नजर मार लेता था. इस की खबर दीपा के बड़े भाई नीशू सिंह को मिली, तब वह अपने बहनोई के प्रति काफी आगबबूला हो गया. उस के बाद ही उस ने बहन के बचाव के लिए कुछ करने कसम खाई.

बात इसी साल अप्रैल महीने के पहले सप्ताह की है. जयदेव अपनी कीमती जमीन बेचने की योजना बना रहा था, दीपा उस का विरोध कर रही थी. यहां तक कि बच्चे भी नहीं चाहते थे कि जमीन बिके. बच्चों को पता था कि वह सब खेती की जमीन थी. वहीं से साल भर का अनाज आता था. बाजार से चावल, गेहूं और दाल का एक दाना नहीं खरीदा जाता था. अगर जमीन बिक गई तो वह सब नहीं आएगा.

हरनाम सिंह को यह मालूम था कि उस का बाप जमीन बेच कर सारे पैसे शराब में उड़ा देगा. दीपा के भाई नीशू ने जयदेव को ऐसा करने से रोकने के लिए मिल कर एक योजना बनाई. इस में दीपा और दोनों बेटों हरनाम व हरमिंदर सिंह को भी शामिल कर लिया.

घटना से 14 दिन पहले घर के सभी लोग एकदम शांत हो कर रहने लगे. जयदेव को पता चल गया कि जब वह ड्यूटी पर होता था, तब कुछ समय के लिए कैमरे बंद रहते हैं. उसे बच्चों और दीपा ने एहसास करवा दिया कि वह नाहक ही अपने बेटे और पत्नी पर शक कर रहा है.

दीपा ने हरनाम से कहा कि क्यों न जयदेव को ही खत्म कर दिया जाए. आज नहीं तो कल यह जमीनजायदाद बेच डालेगा और वे गरीब हो जाएंगे. जयदेव के मरने के बाद उस के बदले में बेटे या दीपा को जयदेव की जगह कोई नौकरी मिल जाएगी. उस के मरने पर जो पैसा मिलेगा, वह बाकी बच्चों के भविष्य के लिए काम आएगा. छोटी बेटी जासमीन की शादी के लिए भी फिक्स्ड डिपाजिट करवा दिया जाएगा.

सौतेले बेटे के साथ की पति की हत्या

योजना के अनुसार 5 मई, 2023 की शाम 6 बजे कांठ तहसील से जयदेव सिंह रोजाना की भांति अपने घर शराब पी कर आया था. घर आते ही उस ने फिर शराब पी. दीपा को जल्द खाना लगाने के लिए बोला. दीपा ने खाना लगा दिया. खाना खा कर जयदेव सो गया, तब दीपा का भाई नीशू सिंह, हरनाम सिंह रात होने का इंतजार करने लगे.  नीशू सिंह अपने साथ एक देशी तमंचा भी ले कर आया था. हालांकि उस के कारतूस नहीं होने के कारण उस का इस्तेमाल नहीं हो सका था. चारों ने मिल कर एक मोटे डंडे का इंतजाम किया.

5 मई की रात लगभग डेढ़ बजे वे नीचे आ गए. नीशू के हाथ में डंडा था. जयदेव ग्राउंड फ्लोर पर गहरी नींद में सो रहा था. दीपा का इशारा मिलते ही नीशू सिंह ने जयदेव सिर पर डंडे से हमला कर दिया. जयदेव करवट लिए सो रहा था. डंडे के हमले से जयदेव का सिर फट गया, लेकिन वह मरा नहीं था. यह देख कर दीपा और छोटे बेटे ने जयदेव के पैर पकड़ लिए. दूसरी तरफ नीशू और हरनाम ने डंडे को गरदन पर रख कर पूरी ताकत से दबा दिया.

थोड़ी देर में ही जयदेव के प्राणपखेरू उड़ गए. पति की हत्या के बाद ही दीपा ने योजना के अनुसार बाहर आ कर शोर मचाना शुरू कर दिया था.

आरोपी दीपा कौर के बयान के आधार पर पुलिस ने दीपा के साथ भाई नीशू, दोनों बेटों हरनाम सिंह व हरमिंदर सिंह से विस्तार से पूछताछ कर दीपा व उस के भाई नीशू को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश कर दिया. उन्हें 7 मई को मुरादाबाद की जिला कारागार भेज दिया गया. नाबालिग हरनाम व हरमिंदर को बाल सुरक्षा गृह भेज दिया गया.